अपनी बातः अप्रैल मई 2015

baatकुछ हफ्ते पहले की ही बात है जब बसंत ऋतु और नव संवत्सर का पहला दिन था और बाहर बगीचे में कई दिनों बाद धूप खुलकर बिखरी थी, एक उम्मीद और नई उर्जा-सी भरती। बगीचे में भी नीरव शांति की जगह एक हलचल थी। इस डाल से उस डाल पर फुदकते चिड़ियों के नव विहग गुलाब के पौधों पर आए ताजे पत्तों को फुदक-फुदककर कुतर रहे थे, उलटे-सीधे लटक-लटककर अजब-अजब करतब कर रहे थे। देखते ही मन खुद-ब-खुद एक अभूतपूर्व उमंग से भर उठा, आखिर क्यों नहीं, जल्द ही रूप रंग और खुशबू का मेला जो लगेगा – संभावनाएं ही नहीं, तसल्ली देता दिन था। परदे के साथ-साथ आदतन टेलिविजन भी खोल दिया, पर टेलिविजन के खोलते ही खुशी गायब हो गई। एक-के-बाद एक, लगातार अटपटी और त्रासद खबरें थीं। कान तो आदी हो चुके थे, परन्तु मन बेचैन हो उठा। हम चैन से बैठे लोगों की नासमझी और उदासीनता पर , भरे पेट की निष्क्रिय और निंदनीय बेरुखी पर।

क्या आदमी और कद्दू में अब कोई फर्क नहीं? भेड़-बकरों की तरह इन्हें भी हलाल करने में ज़रा भी हिचक नहीं? सैकड़ों नासमझ बच्चियों का सामूहिक अपहरण, उन्हें उत्पादन के लिए पशुओं की तरह गाभिन करवाना- क्या हम इतने कठोर और हृदय-हीन हो चुके हैं? आंख-कान बन्द कर लेने चाहिएँ हमें इन अत्याचारों से? क्या भटके-घबराए शरण में आना चाहें तो चन्द बासी मझलियों की तरह वापस उन्हें समुद्र में फेंककर मरने देना चाहिए? –कई सवाल हैं जो आसपास जल रहे हैं और लगातार जला रहे हैं। एक स्थानीय कौलमनिस्ट केट हौपकिन्स ने तो इन्हें जिन्दा जला देने या गोलियों से भूनने तक की सलाह दे डाली ।

शान्त नीले पानी के लिए मशहूर भूमध्यसागर आजकल नित नई खबरों में है। अपनी सुंदरता के लिए नहीं हजारों अभागों को निगल चुका है, इसलिए। कई-कई जहाज, छोटी मोटी नावें और वह भी न मिले तो दुस्साहसी इंसान ऐसे ही चल पड़ते हैं सपनों और साहस की उर्जा पर, पर कम ही यात्रा पूरी कर पाते हैं। पूरा का पूरा महासागर कब्रगाह बनने को तैयार हैं और सब चुप हैं, देख रहे हैं। मानो अंदर का इंसान या आत्मा है ही नहीं अब। मानो पूर्णतः पत्थर के हो गए हैं हम रंगबिरंगे स्वार्थ और काल्पनिक सुरक्षा-कवच में बन्द। भूलना नहीं चाहिए कि आज जो तकलीफ भरा परिदृश्य भूमध्य सागर और सीरिया अफगानिस्तान, नाइजीरिया आदि का है, हमसे दूर की खबर है , कल आसपास की भी हो सकती है। जंगल में कहीं भी आग लगे, फैलते देर नहीं लगती।

माना, परिवर्तन ही प्रकृति का नियम है और जीवन का भी । कभी कुछ एक-सा नहीं रहता, चाहे कितनी भी कोशिश कर लें हम, तो वक्त और इन्सान से ही यह अपेक्षा क्यों ? फिर हर वक्त शांति का ही हो, यह भी तो संभव नहीं ! पर कोई तो तैयारी होनी ही चाहिए, सहयोग सम्पूर्ण मानवता का, इस तरह की आपदाओं से निपटने के लिए !

तेजी से मात्र परिदृश्य ही नहीं, पात्र तक बदल रहे हैं। वैसे भी एक-से-एक क्रूर समय और उथल-पुथल का साक्षी रहा है आदम-इतिहास पर ऐसे राक्षसी वक्त की तो शायद ही किसी ने कल्पना की हो ! प्रकृति के हर परिवर्तन तक के पीछे एक सनातन क्रम और नियम रहता है, जिसे काल चक्र या ऋतु परिवर्तन भी कहते है। एक सुलझी सोच और तैयारी के साथ अभ्यस्त हो जाते हैं हम इनके। अकस्मात हो तो अनहोनी या आपदा ही कहलाएगी। और आपदाएं तोड़ती हैं, बस्तियों को,सभ्यताओं को। पूरी-कि-पूरी जातियाँ मिटा दी है इन्होंने। इतिहास गवाह है इसका। बेहतर है संभलें और लाठियों का इस्तेमाल सहारा देकर चलने के लिए करें, बजाय एक दूसरे का सिऱ फोड़ने के लिए. चाहे वे लाठियाँ धर्म की हों, विचारों की, या फिर कर्म की ।

थमना और मुड़ना दोनों ही क्रमानुसार एक ही क्रिया के दो आवश्यक हिस्से हैं। जैसे हर मोड़ से पहले थमना जरूरी है, वैसे ही हर सफल क्रांति के पहले सद्भाव पूर्ण सोच भी चाहिए। संहार-ताणडव ही क्रान्ति नहीं। शान्ति,उन्नयन और सृजन से भाईचारे के साथ लाई गई क्रान्ति अधिक समयानुकूल और प्रभावी सिद्ध होगी , इसमें भी तो शक नहीं। प्रयास छोटे-से छोटा ही सही, परिणाम लाता है। उम्मीद जगाता है। बात बारबार दोहराई गई है पर है सच – धर्म जाति और अन्य भेदभावों को भूल, शान्तिदूत बनें और रोक सकते हैं तो इस विनाश को रोकें। जोत से जोत जलाएँ।

लेखनी का यह अंक समर्पित है इसी थकी-हारी और त्रसित मानवता की उम्मीद को…एक उल्लसित महकती ऋतु के अहसास और तलाश को।

उम्मीद है अंक मन भाएगा और आपका सदा की भांति आगे भी वैचारिक और रचनात्मक सहयोग मिलेगा लेखनी को। लेखनी का जून-जुलाई अंक हमने नाव या नौका पर रखने का बनाया है। नावें जो पार लगाती हैं, दूर देश के सपने दिखाती हैं और कभी-कभी डुबोती भी हैं। आपकी रचनाओं का इंतजार रहेगा।

140314-152609  -शैल अग्रवाल

 

चलते-चलतेः हाल ही में नेपाल एक विनाशक भूकंप से गुजरा है। उबरने में शायद कई वर्ष लग जाएँ। अंतर्राष्ट्रीय सहायता मिल रही है, जिसमें भारतीय सेना भी अहम् भूमिका निभा रही है, भारत का यह पड़ोसी देशों की मदद का नया सिलसिला और मानवीय विदेशनीति वाकई में काबिले तारीफ है । आइये हम आप भी मिलजुलकर नेपाल और इस असह्य दुख से प्रभावित परिवारों के लिए मिलजुलकर प्रार्थना करें और जो भी मदद कर सकते हैं करें।

 

Be the first to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published.


*