कहानी समकालीनः हरियाली की खोज में: पद्मा मिश्रा/अक्तूबर-नवंबर 2015

Morning 1_nट्रेन तेज गति से भागी जा रही थी ,रफ़्तार तेज होने के कारण पूरे डिब्बे में  कम्पन और हलचल हो रही थी,- – यह ट्रेन यात्रा मानो जीवन यात्रा बन गई थी,आज ,सालों  पहले बिताये गए यादों के पल किसी चलचित्र की भांति आँखों के सामने से गुजर रहे थे, लगभग बीस सालों के बाद गांव लौट रहा हूँ -मन विह्वल है,जिन गलियों खेत खलिहानों को छोड़ कर रोजी रोटी की तलाश में शहर की ओर दौड़ा था , आज मानो वे साक्षात सामने खड़े  हैं,इतने लम्बे अंतराल,बिछुड़न और उपेक्षा का दंश मुझे झकझोर रहा है,रहा है,-वही गांव -वही मिटटी और गोबर के बने ऊँचे ढूह , , दौड़ते-भागते नंग धंडंग बच्चे –आज भी  ट्रेन को देख कर पत्थर चलाते हैं, – कुछ भी तो नहीं बदला है,-हाँ,बदली है तो पीले-सुनहरे खेतों की कल्पना जो आज झूठी साबित हो रही थी , ट्रेन धीमी हो रही है–कोई गांव आ रहा है शायद,पूछा तो पता चला कि  नया गांव है,मेरे गांव से कुछ ही मील की दुरी पर तो है नया गांव -यहाँ तो कॉलेज  के जमाने में हम सारे दोस्त पैदल ही चलकर आते थे एक दोस्त के घर ,
-स्टेशन पर चहल पहल थी,’चाय–चाय-‘की पुकार लगाते वेंडरों का दल ट्रेन की ओर दौड़ पड़ा है,-मैं भी चाय लेता हूँ,, ,पहले मिटटी के कुल्हड़ में सोंधी खुशबू वाली अदरक की चाय मिलती थी,आठ आने में ,पर अब दो रूपये की चाय में भी वो स्वाद कहीं नजर नहीं आता,-पेपर के कप-ग्लासों से आई आधुनिकता ने गांव की सहज स्वाभाविकता ही छीन ली है,– एक दृश्य देख आँखें ठिठक जाती हैं,–‘शायद कोई परदेशी बन शहर जा रहा है,-जिसे छोड़ने परिजन साथ आये हैं,–घूंघट की ओट से परदेशी पिया को निहारती नववधू भींगी आँखें मन को छू जाती हैं,-बूढी माँ के चरण स्पर्श कर जब वह युवक ट्रेन में चढ़ता है,–पीछे से माँ हाथ उठकर कहती है —”नीके  से जइह ,बबुआ ”, ,लगा उस माँ में आज मेरी माँ जिवंत हो उठी है,-मैं प्रदेश जा रहा हूँ और माँ मेरे कुशल क्षेम की कामना कर रही है,–पर जब मैं गांव छोड़कर शहर आया,था,तो माँ का साथ जल्दी ही छूट गया,फिर गांव जाने की लालसा ही शेष न रही थी,, , ,ट्रेन चल पड़ी है,-गांव नजदीक आ रहा है, पहचाने खेत खलिहान एक एक करके गुजरते जाते हैं,—-मेरा स्टेशन आ गया है – -स्टेशन पर उत्तर कर जैसे ही गांव की ओर पैदल चलना शुरू किया,अचानक कई टेम्पो वाले वहां आ गए और चलने का आग्रह करने लगे ,पर मैं इंकार कर देता हूँ ,क्योंकि पैदल चलते हुए मैं अपने गांव की मिटटी से मिलना चाहता था, टेम्पो वालों की उपस्थिति जरूर आश्चर्य में डाल रही थी,
पूर्व परिचित रास्तों को देख कर आँखें न जाने क्यों भींग जा रही हैं,गांव की गलियों से गुजरते हुए लगा – ये रास्ते मानो मुझसे शिकायत कर रहे हों, –‘देखो,एक दिन तुम हमें छोड़कर चले गए थे न ?’,,गांव की कच्ची पग डंडियों परचलते चलते  ब्रह्म बाबा के चबूतरे  पर कुछ महिलाओं को पूजा करते देख मुझे स्कुल के वे दिन याद आ गए जब हम परीक्षा के दिनों में पास कराने  के लिए ब्रह्म बाबा को तरह तरह के प्रलोभन दिया करते थे,थोड़ी दूर ही गोवर्धन दास का पोखरा था,जहाँ गोधना मेला जुड़ता था –गोवर्धन मेले से जुडी यादें तो आज भी ताजा हैं   – -वहां बिकती चने की चटपटी  चाट ,, ,  गुड कीजलेबियाँ  ,बर्फ की चुस्की  स्वाद  तो आज भी भुलाये नहीं भूलता,-साल भर से मेले की तैयारियां होने लगती थीं,काका और बाबूजी से न जाने कितने बहाने बनाकर हम पैसे एकत्र कर पाते  थे – – पर हम बच्चो से  कहीं ज्यादा माँ को इस मेले का इंतजार रहता था -क्योंकि इस मेले में ही मेरी दीदी अपनी ससुराल के किसी व्यक्ति के साथ आती थी तो माँ से भी मिलना हो जाता था,, , माँ ही क्यों,-आस पास की सभी बेटियां इस मेले में ही अपने मायके वालों से आसानी से मिल पाती थीं -पहले बेटियों को विदा कराने की परम्परा -शुभ दिन,साईत ,या किसी पारिवारिक उत्स्व पर ही हो पाती थी,–अतः यह मेला ही उनका मिलन-स्थल बन जाता था, , ,जहाँ तहँ माओं  के गले लग रोती हुई बेटियां सभी को आंसुओं में डुबो जाती थीं,माँ अपने साथ लाई उनकी पसंद की वस्तुएं उन्हें खिलाकर असीम सुख का अनुभव करती थीं -इन स्मृतियों के पार जा मन न जाने क्यों भींगने लगा था। …
वह रहा सामने मेरा घर !,,दीवारें भले ही गिर गई थीं ,पर उनका बरामदा ,लाल खम्बो वाला ओसारा एक अपनापन लिए मानो मेरे लिए चिर प्रतीक्षारत था,मुझे पहचानने वाली तो केवल काकी ही थीं जिनकी बूढी आँखों में -मेरे द्वारा चरण-स्पर्श करने पर ,अपार ममता उमड़ पड़ी थी,…. आज बीस वर्षों के बाद अपने घर के दालान में खड़े हो आँखें किसी अपने को तलाश रही थीं यद्यपि अधिकांश दीवारें समय की मार  ढह चुकी थीं,पर मेरी छोटी कोठरी,जहाँ मैं पढता था,-सही सलामत थी,शायद काकी और उनके बच्चों ने इसे वर्षों से इस्तेमाल नहीं किया था,कोठरी में ताला लगा था,जिसे काकी ने मेरे लिए खोल दिया था,-सब कुछ वही —मेरी पुरानी किताबें जो पानी में भींग कर ख़राब हो गई थीं ,पर यथावत थीं ,कोने में लिखा ओम भी ज्यों का त्यों था,……
मैंने अपना बैग रख स्नान आदि से निवृत होने की तयारी की–बाबूजी के लगवाये नल से अब भी ठंडा पानी आता है –जानकर ख़ुशी हुई,,,मैं नहाकर बरामदे में आकर बैठ गया ,,,-

-”बबुआ ,सब ओइसने रखल बा,कभी कभी साफ-सफाई हो जाला बाकिर केहु त  पढ़े वाला नईखे ”काकी अंदर आते हुए बोली ,,,वे मेरे लिए भुना चिउड़ा और ठेकुआ लाई थीं,ममत्व से भरा यह जलपान मुझे अमृतोपम लगा,क्योंकि भूख लग आई थी,

– कुछ नन्हीं -उत्सुकता भरी आँखें छुप कर  मुझे निहार रही थीं  ,कि यह कौन  आया है ,-हमने पहले तो कभी नहीं देखा,मैंने उन्हें पास बुलाया और बैग से टाफियां निकल कर उन्हें दीं — धीरे धीरे मुझसे खुलने लगे – परिचय पूछने पर पता चला कि वे मेरे ही मित्रों के पोते पोतियां हैं  ,,,

गुनगुनी धूप का एक छोटा टुकड़ा बरामदे में आकर ठहर गया था,मैंने अपनी आरामकुर्सी धुप में खिसकाई और आसपास के वातावरण में खो गया —–वहीदालान ,,,,वाही चबूतरा ,,वाही घनी छाँह और बड़ी बड़ी शाखाओं वाला पीपल का पेड़ , , ,कुछ भी तो नहीं बदला था मेरे गांव में ,, , बदल गए वे लोग जो कल के अतीत का हिस्सा थे,, ,बदल गईं  परिस्थितियां जो  जीवंतता और जिंदादिली  की मिसाल हुआ करती थीं ,- – अपने घर के बरामदे में बैठा हुए मैंने जब अपने सामने टूटे,बिखरे खपरैल वाले मकान की ओर  देखा तो  बरबस ही   मुझे बज्जर भैया की याद आ गई –यहीवह ऊँचा सा उनके घर का चबूतरा था,जिस पर  बैठे हुए वह सुबह सुबह की  धूप में करीब एक लोटे भर  चाय को  कांसेके गिलास में ढालते  सुड़प सुड़प कर पिया करते थे ,उनके चारो ओर  बैठे हुए गांव के कुछ  मनचले  युवक हुआ करते थे जो कुछ  तो  उनकी बातों के रसीले अंदाज के लालच में , ,ओर  कुछ चाय के बाद छनती भांग  के लालच में  वहीं जमे  रहते थे, , , , चाय की एक एक घूंट के साथ  राजनीति  से लेकर राष्ट्रीय नेताओं तक एवं घर की चौपाल से लेकर समाज के बनते बिगड़ते रूप तक का शापोद्धार कर डालते थे, यदि किसी ने उन्हें छेड़ने के अंदाज में कह दिया —बज्जर भैया ,इंदिरा गांधी के देखल ह ?जबरदस्ती न नसबंदी करवावतिया !,’बस ,फिर क्या था वे तुरंत भड़क उठते –आरे,गोली मार इंदिरवा के, देश के नाश देले बा,”, , और लोग उनकी चाय के साथ साथ उनकी बातों के प्रसाद को भी ग्रहण कर मुंह छिपाकर हँसते हुए मानो असीम तृप्ति का अनुभव करते थे,,,यादों का सफर न जाने कितने पड़ावों को पार करता  उनके दालान में खड़े उस खम्बे पर जाकर अटक जाता है,जिसे पकड़ कभी हम बचपन में गोल गोल चक्कर लगाया करते थे,और बदले में बज्जर भैया की डांट भी खाया करते थे बच्चों के साथ गोलियां खेलते समय उनके दरवाजे की जमीन पर गड्ढे पड़ जाने से वे न जाने कितनी अनोखी गालियाँ देते हुए हमारे पुरखों तक का पिंडदान कर डालते या कभी इस भूल के लिए हमारे पिताजी पर एक मुकदमा ठोंक देने की धमकी दिया करते थे ,शायद अनेक पारिवारिक मुकदमों के चक्र्व्यह में उलझे होने  का तनाव उन पर सदैव हावी रहता होगा,
, , अरे बबुआ ,धूपा में काहें बइठल बाड़ ?”बँटाईदार मिश्री काका की की पत्नी की आवाज पर मैं वर्तमान में लौट आया,–मन कुछ भारी हो चला था – – इतने लम्बे वर्षों का सफर मैंने कुछ ही पलों में तय कर लिया था,- – मन एक बार फिर उन्ही यादों के गलियारों में लौट जाना चाहता है , ,पर समय का पंछी उड़ते उड़ते इतनी दूर निकल गया था,कि उसे पकड़ पाना सम्भव नहीं था,—मैं अपने घर के बगल में बने कुंए पर स्नान करने चला गया,बैठे बैठे समय का पता ही न चला और दोपहर हो गई,धूप भी तेज हो आई थी ,खाने का समय हो गया था,-नहाने के बाद जब भोजन करने बैठा तो बरबस माँ की याद आ गई ,मैं भरे मन से चौकी पर बैठकर भोजन की प्रतीक्षा करने लगा,–भोजन में काकी ने दाल भात  पालक और बैंगन की सब्जी, आलू की सोंधी खुशबु वाली भुजिया बनाई थी,दाल में छौंकी हुई हींग और जीरे की महक बहुत भली लगी,-मैं स्वाद ले लेकर खाता रहा,-शहर में अपने घर की सजी-सजाई टेबल  पर परोसे  विविध पकवानों की अपेक्षा यह ठेठ गंवई स्वाद वाला,भोजन मुझे अमृतोपम लगा,जिसका स्वाद आजीवन नहीं भूल पाउँगा,, ,
”बबुआ ,,और दाल दूँ ?’
”नहीं काकी,अब और नहीं ,,,, हाथ का खाना खाकर माँ की याद आ गई,–शायद माँ खाने के साथ साथ ढेर सारा प्यार भी परोस देती थी,-मैं भावुक होने लगा था ,,,
खाना खाकर काका ने मेरी चारपाई पीपल पेड़ के निचे बिछा दी,ठंडी हवा के झोंको से मैं सो गया ,- – -उठा तो शाम का अँधेरा घिर आया था,वैसे भी गांव में रात जल्दी उत्तर आती है,सूरज डूब रहा था, फिर भी उसकी लालिमा आम के ऊँचे ऊँचे पेड़ों पर कहीं कहीं ठहर सी गई थी,सन्नाटे का प्रेत एक रहस्य्मयी आभा के साथ पूरे गांव में व्याप्त हो रहा था, गांव की महिलाएं -पुरुष सभी शौचादि से निवृत होने के लिए निकल रहे थे,घर में शौचालय की व्यस्था न होने से गांव में यह वर्षों से  चली आ रही परम्परा है, शायद महिलाओं को भी इसी बहाने खुली हवा में साँस लेने का अवसर मिल जाता है,मैं भी अपने पडोसी बिरजू काका को साथ लेकर स्कूल  के बगल वाले रास्ते पर खेतों की ओर  निकल पड़ता हूँ,,,,,,,,
एक बार फिर खेतों का मोह मुझे घेरने लगता है,धीमे धीमे कदमों से चलते -काका से बातें करते हुए हम दूर तक निकल आये थे,स्कूल के पास छोटे छोटे बच्चों को खेलता हुआ देख मुझे अपने बचपन की याद आ जाती है जब मैं भी इसी स्कूल का छात्र हुआ करता था,मैं काका से वहीँ रुकने का अनुरोध करके स्कूल के चबूतरे पर बैठ गया बच्चों की मस्तियाँ,उनके खेल -एक दूसरे से छोटी छोटी बातों पर झगड़ पड़ना मुझे पुनः अपने यादों के सफर में खींच ले जाता है ,,,,
आज लगभग बीस वर्षों के बाद मैं अपने गांव ,अपने पुश्तैनी मकान एवं गलियों कीप्यारभरी  छत्र छाया में,बैठा हुआ हूँ मेरे खेतों के बँटाईदार की पत्नी चाय ले आई है,चाय की चुस्कियां लेते हुए मैं गांव के बदलते हालात  के बारे में सोच रहा हूँ,,,,,
अब  मेरे बचपन का गांव वही नहीं रहा यह तो मैंने अपने गांव की सीमा में प्रवेश करते ही जान लिया था,चारो ओर फैले हरियाली वाले जिन खेतों की मैंने कल्पना की थी,– वे तो कहीं नहीं थे,तब तो सरसों के पीले और टीसी के नील-गुलाबी फूलों के बीच फैली पग-डंडियों पर दौड़ते हुए कभी यह नहीं सोचा था कि एक दिन मैं इन सबसे वंचित रह जाऊंगा,—कटाई के दिनों में धान काटने वाली स्त्रियों के गीत –किसानो द्वारा अनाज का बड़ा सा बोझ बनाकर -पहाड़ सा बना देना -जिस पर हम बच्चे कूदा करते थे,- – आज कहीं खो से गए हैं ,,,,,,,,स्मृतियों की धरोहर में माँ की यादें भी रची बसी हैं,शहर के कालेज से लौटते हुए -इन्ही रास्तों पर जब माँ मुझे दूर से देख लेती थीं,तो तुरंत लकड़ी के चूल्हे पर गरम गरम भात पकाने लगती थी,और घर पहुँचने पर बराबर मुझे गरम खाना ही खिलाती थी,वे  कभी घर की चक्की में गेहूं पीस रही होतीं,तो कभी मूसल से चिउड़ा कूट  होती थीं,–पर माँ अब मेरे अतीत का हिस्सा बन चुकी है,–आँखों की नमी मन पर छाने लगी है,-मन कुछ उदास हो आया है,,,,,आज बीस वर्षों के बाद –  जब मेरी भी उम्रबढ़ चुकी है,-मुझे अपने गांव -अपनी मिटटी की सुगंध और बचपन की यादें यहाँ खिंच लाई हैं,-मेरे साथी अब यहाँ रहे नहीं,,,वे सभी गांव की बदहाली से त्रस्त होकर शहरों की ओर पलायन कर चुके हैं,-परन्तु अपना गांव अपना ही  है,कोई  भले ही न महसूस कर सके,पर इन सारे अपरिचित चेहरों के बीच ,मैं आज भी उस प्यार भरी ऊष्मा को महसूस कर पा रहा हूँ ,,,
आज मुझे अपनी कर्मभूमि जमशेदपुर वापस लौटना है,फिर से अपने पुराने ढर्रे पर जिंदगी वापस लौटेगी,—मेरे अतीत की यादों में माँ,बाबूजी,बज्जर भैया की यादें रची-बसी हैं,–और बसी है इस जमीन की मीठी सोंधी खुशबु -जो आज भी मुझे भाव-विह्वल बना रही है –मैंने किसी सवारी का मोह त्यागकर  फिर उन्ही पग-डंडियों पर चलते हुए शहर तक जाने का निश्चय किया,-जहाँ मुझे ट्रेन पकड़नी थी ,,,,
विदा स्मृतियों,,,मैं फिर आऊंगा,,,,अपनी जड़ों  जुड़ने के लिए -उस हरियाली के लिए -जो कहीं खो गई है,,,,सरसों-तीसी -धान की लहलहाती फसलों के लिए —जो मेरे गांव की पहचान थी -कभी ,,,,,
–पद्मा मिश्रा -जमशेदपुर

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