कहानी समकालीनः लौटनाः शैल अग्रवालःदिसंबर/ जनवरी 2015

                         

  लौटना

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बाहर धुँआधार पानी गिर रहा था और कमरे में पचासों की भीड़ थी। खाना-पीना, हंसी कहकहे, पार्टी अपने पूरे जोर पर थी। अचानक रश्मि का सिर घूमा और वह वहीं पास पड़ी कुर्सी पर बैठ गई। बेचैनी इतनी कि मानो अभी दम निकला। खुद से ज्यादा उसे पेट में पल रहे बच्चे की परवाह हो रही थी – ‘भगवान इसे सकुशल दुनिया में आने दो।‘ प्रार्थना में जुड़े हाथों संग ही आनन-फानन कमरे से बाहर निकल आई वह।

 

खुली हवा में सांस लेना बहुत जरूरी हो चला था उसके लिए। तभी उसे लगा कि कोई पीछा कर रहा है, परन्तु मुड़कर देखने की हिम्मत न हुई रश्मि की। बस एक अहसास था कि  कुछ कहना चाहता है ‘ वह’ बिछुड़ने से पहले…अंतिम विदा,शायद।

 

कौन हो सकता है। अन्तरात्मा ने कहा- कहीं काका तो नहीं। परसों ही तो उनका फोन आया था और भारत आने की जिद भी कर रहे थे वह। उससे मिलने का बहुत मन कर रहा था उनका, ऐसा ही बारबार कहे जा रहे थे वे। तब रश्मि ने भी ढाढस देते हुए जचकी होने के बाद महीने भर में ही अवश्य आ जाएगी, तुरंत ही ऐसा वचन भी दे दिया था उन्हें । यह कहकर शांत किया था कि सात महीने से ऊपर की गर्भवती महिला को तो कोई अंतर्राष्ट्रीय उड़ान उड़ने तक नहीं देती जहाज पर।’ पर यूँ आज का यह अनुभव क्यों, कहीं कुछ अघटनीय तो नहीं घट गया !’ रश्मि उद्विग्न थी।

 

डर से उसका गला खुश्क होने लगा था अब और आगे कुछ सोच तक नहीं पाई घबराई हुई रश्मि। तुरंत ही कहीं पढ़ा हुआ खुद-ब-खुद याद आने गया। माना कि यह सही है कि हम तीन धरातलों पर इस एक ही शरीर में जीते हैं; भौतिक शरीर, जिसमें हम पलते बढ़ते हैं और ऐच्छिक शरीर जो इस का चालक व संचालक है। अंत में वह बृह्मांश या आत्मा जो इस सांसारिक यात्रा की साक्ष्य और साक्षी दोनों ही बनी रहती है। रश्मि तो यह भी जानती थी कि यदि इच्छाएं अधिक प्रबल हों तो दुनिया छोड़ने से पहले एकबार यह ऐच्छिक शरीर इच्छित व्यक्ति से मिलने तक पहुँच सकता है। यह कैसी अशुभ बातें सोच रही है वह। क्यों सोच रही है ऐसा! –उसके काकू स्वस्थ और जीवित हैं। मन ही मन दोहराया उसने। पर कोई अदृश्य शक्ति मानो उसके हिस्से का भी सोचे  जा रही थी- और यदि वह व्यक्ति पूरी श्रद्धा और शक्ति से मनुहार करे तो पुनः स्वकाया में प्रवेश भी कर सकता है। यानी जीवित हो जाता है।

 

रश्मि को अपनी सोच से पल भर को क्षीण ढाढस मिली। अब रश्मि आँखें बन्द करके प्रार्थना करने लगी-प्लीज काकू अपने शरीर में वापस जाओ। अभी तुम बहुत छोटे हो। पचास साठ की यह उम्र कोई उम्र नहीं होती दुनिया छोड़कर जाने की और सबसे बड़ी बात तो यह है कि हमें तुम्हारी बहुत जरूरत है अभी। पर कोई कहीं नहीं लौटा। उस पीछे-पीछे चलती उपस्थिति का अहसास लगातार बना रहा।

 

कलेजा मुंह में लिए, तेज कदमों से ऱश्मि अपने फ्लैट की तरफ बढ़ती जा रही थी। पीछे मुड़कर देखने का साहस नहीं था उसमें। वह करीब-करीब भागती-सी चल रही थी अब तो उन दोनों तरफ ऊँची-खड़ी इमारतों के बीच से और लगातार उसे लग रहा था कि जैसे कोई उसका पीछा कर रहा है।

 

कैसे भी लड़खड़ाते पैरों और कांपते हाथों से ताला खोलकर जब फ्लैट में घुसी तब भी वह साथ था। हाँ सोने वाले कमरे में निढाल धम से अपने बिस्तर पर गिरते ही उसे महसूस हुआ कि ‘वह’ दरवाजे के पास ही ठिठक कर खड़ा हो गया है।

 

डरपोक या कायर नहीं थी रश्मि, चकित अवश्य। सांसें धौंकनी सी चल रही थीं और तेज सांसें उस सूने फ्लैट में इतना शोर कर रही थीं कि असह्य हो चली थीं। कमरे में घुसते ही एक बात और जिसने उसे चकित किया, वह था यह अहसास कि जो अभी तक उसके साथ साथ चल रहा था, कमरे के बाहर यूँ रुक क्यों गया?

 

अभी वह सोचे भी कि ऐसा क्यों हुआ। मन के कोने से आवाज उठी , बेटियों के शयनकक्ष में नहीं जाते न, इसीलिए।

 

अब रश्मी के लिए थिर रह पाना संभव नहीं था। तीर सी कमरे के बाहर आ गई। गला भय और असमंजस से सूखा जा रहा था, परन्तु चुनौतियों से लड़ना, बात की तह में पहुँचना भी उतना ही जरूरी था उसके लिए। फ्लैट में उसके अलावा और कोई नहीं था और कमरे में था थर्राने वाला सन्नाटा।

 

सियाह अन्धेरी रात में वह पीली बल्ब की रोशनी तक विचित्र और रहस्यमय लग रही थी अब तो उसे। कैसे भी नल से पानी का गिलास भरकर वह होठों तक ले ही जा रही थी कि कंधे पर एक परिचित हाथ का भार महसूस हुआ और पुनः काकू की उपस्थिति का अहसास भी। इसबार स्पष्ट और स्थूल रूप में। हाथ की फुंसिया तक साफ दिखाई दे रही थीं उसे। बरसात के दिनों में काकू का एक्जिमा उभर आता है , जानती थी रश्मि।

 

पर पीछे मुड़कर फिर भी नहीं देख पाई वह। तेज कमरों से चलती फिर वापस अपने शयनकक्ष में आ गई। उसे पता था यहाँ वह प्रवेश नहीं करेंगे।संस्कार ज्यों-की-त्यों वही थे अभी भी उनके।

 

अब वह वाकई में डर गई थी, और काकू के लिए चिन्तित भी। परन्तु उसके बस में तो अब शायद वाकई में कुछ भी नहीं था। चुपचाप काकू के लिए प्रार्थना करती सो भी गई हिम्मती रश्मि।

 

राकेश रात भर व्यस्त रहे मरीजों के साथ। यूँ पति का पूरी-पूरी रात औपरेशन करते रह जाना आम घटना थी शल्य चिकित्सक राकेश की पत्नी रश्मी के  लिए और उसने कभी कोई शिकायत भी नहीं की थी, अपितु गर्व था उसे पति की निष्ठा व लगन पर। उनके द्वारा हजारों का कष्ट दूर करने और जान बचाने के इस नेक काम पर।

 

सुबह जब लौटकर राकेश आए तो पत्नी का पीला पड़ता चेहरा देखकर बेहद चिंतित हो गए। ‘लगता है तुम एकदम बाहर ताजी हवा में घूमने नहीं जा रही हो। चलो आज हम समुद्र के किनारे वाली सड़कों से घूमते हुए लेक डिस्ट्रिक्ट तक चलेंगे। मैं कल की और छुट्टी ले लेता हूँ।‘

 

लाख मना करने पर भी चिंतित पति उसके गालों पर गुलाबी रंगत वापस देखना चाहते थे। और तब सैंडविच और चाय का फ्लास्क लेकर वे निकल ही पड़े थे अगली सुबह तड़के ही।

पर राकेश अभी पैट्रोल पंप पर पैट्रोल भरवा ही रहे थे कि गिड़गिड़ाती सी आवाज में रश्मि ने कहा था, ‘ राकेश क्या ऐसा नहीं हो सकता कि आज हम कहीं घूमने न जाएँ। मैं फ्लैट में वापस जाना चाहती हूँ।‘

‘ क्यों? ‘…राकेश पत्नी कि इस अप्रत्याशित मांग से चौंक गए थे।

‘क्योंकि घर से फोन आने वाला है।‘

पत्नी के शब्दों में जाने कितनी करुणा और कितना आग्रह था कि राकेश ने कार वापिस घुमा ली।

अभी वह दरवाजे में चाभी ही घुमा रहे थे कि अंदर फोन की घंटी की आवाज साफ-साफ सुनाई देने लगी।

रश्मि ने दौड़कर फोन उठा लिया। हाय हलो की औपचारिकचा के बिना उसके मुंह से यही निकला ,‘ हलो पापा, पहले यह बताओ कि काकू कैसे हैं? मुझे आप से नहीं, पहले काकू से ही बात करनी है।‘

पापा पूरी तरह से स्तब्ध थे।

क्षण भर के मौन के बाद भरे गले से बोले, ‘ पर काकू तो नहीं रहे बेटा।‘

‘कब कल रात नौ बजे के करीब , न.? मुझे मालुम है।.‘

‘ हाँ, पर तुझे कैसे पता चला?.‘..बेटी के जबाव से पापा वाकई में हैरान थे।

‘मुझसे मिलने आए थे वह।‘ ऱश्मि कह तो गई, पर फोन पकड़कर और खड़ी न रह पाई।

 

रश्मि अब पूरी तरह से आहत थी। ऐसा पता होता तो उन्हें पास बिठाती, जी भरकर बातें करतीं। तो वह वाकई में काकू ही थे जो उससे मिलने आए थे और उसने उनसे बात तक नहीं की। डर गई। मन एक अबूझे अवसाद से डूबा जा रहा था।

हत्प्रद रश्मि एकबार फिर अपने शयनकक्ष की तरफ दौड़ी। उसे अपनी तबियत गड़बड़ाती महसूस हो रही थी। लगा प्रसव पीड़ा शुरु हो गई है । कपड़ों पर भी कुछ खून के धब्बे थे ।

 

‘ परेशान होने की कोई बात नहीं। यदि बच्चा आ भी गया तो स्वागत है उसका, अब वह ‘फुली वायवल‘ है। बत्तीस हफ्ते पर जीवित रह पाएगा वह। हाँ, अगर दो महीने और रुक पाओ तो अच्छा रहेगा उसके लिए। इन्ही आठ हफ्ते में बच्चा ठीक से स्वस्थ हो पाता है।‘

 

राकेश बगल में बिस्तर बैठे आहिस्ता-आहिस्ता पीठ सहलाकर-सहलाकर उसे अब सान्त्वना दिए जा रहे थे और ऱश्मि आंसू-भरी आँखों से पति को अपलक देखे जा रही थी, मानो बहुत दूर कहीं से आवाज आ रही थी उनकी और उसकी समझ में कुछ नहीं आ रहा था।

 

‘ किसी काम की चिंता न करो। जरूरत पड़ी तो मैं छुट्टी ले लूँगा।‘

 

पूरी तरह से आराम की हिदायत देकर तब पति ने नींद की गोली देकर सुला दिया रश्मि को। सदमा गहरा था और आने वाले बच्चे की सुरक्षा के लिए यह जरूरी था कि रश्मि को मन और शरीर से पूरा आराम मिले। होनी अपना काम कर चुकी थी और जाने वाले को लौटाया नहीं जा सकता था।

 

चलते-चलते एकबार फिर प्यार से समझाने की कोशिश की थी उन्होंने।

 

थोड़ी ही देर में थकी और आहत ऱश्मि गहरी नींद सो चुकी थी और सपनों की दुनिया में अब समुद्र के किनारे टहल रही थी। खुली मनभावन धूप और मन्द शीतल बयार। चारो तरफ उल्लास और मौज का कार्निवाल। जून, जुलाई और अगस्त के इन तीन महीनों में ऐसा मेला-सा ही लगा रहता है यहाँ इंगलैंड में। विशेषतः समुद्र के किनारों पर। पति ने प्यार से पूछा- ‘आइस्क्रीम खाओगी?’

‘नहीं ठंडा औरेंज जूस ले लूंगी।’ कड़क धूप में समुद्र किनारे की ठंडी हवा का चेहरे पर पूरी तरह से आनंद लेते हुए रश्मि ने तुरंत ही जवाब दिया।

 

‘एक गिलास जूस मेरे लिए भी। खूब सारी बरफ डलवाकर।‘ भीड़ से अचानक निकलकर सामने काकू आ खड़े हुए थे और  ठंडे जूस की फरमाइश कर रहे थे।

 

एकबार फिर ऱश्मि पूर्णतः स्तंभित थी।

‘ हाँ, हाँ क्यों नहीं काकू।‘ अपना औरेंज जूस उन्हें देते हुए रश्मि ने कहा था।

 

‘नहीं यह तू ले मेरे लिए दूसरा मंगवा। खूब सारी बरफ डलवाकर।‘

 

‘घर चलो काकू। वहाँ मैं तुम्हे खूब अच्छ-अच्छा खाना बनाकर खिलाऊंगी ।एकबार चलकर देखो तो सही कितनी होशियार हो गई है तुम्हारी पगली बेटी, कैसे रखती है अपनी घर गृहस्थी ? तुम तो मेरे घर कभी आए ही नहीं हो।‘

 

अगले पल ही वह काकू के साथ घर में थी। पर यह घर उसका घर नहीं, मायके वाला घर था। जहाँ पीछे बगीचे में मेंहदी के पेड़ के नीचे बैठकर काकू ने तृप्त होकर खाना खाया। और फिर बोले, ‘ तो अब में चलूँ बेटा? ‘

 

‘कभी कभी मिलने तो आओगे ना ? ‘

 

ना चाहते ,हुए भी रश्मि का गला भर आया था। वह काकू को खुशी-खुशी विदा करना चाहती थी ताकि उनकी आत्मा को शान्ति मिल सके।

 

‘–पर तू तो मुझे देखते ही डर गई थी ? ‘ रश्मि के पूछते ही काका ने प्रश्नात्मक उत्तर दिया।

 

‘कैसी बात कर रहे हो आप भी। अपनों से भी भला कोई डरता है कभी।‘

 

रश्मि ने करीब करीब दुख से कटती-सी आवाज में कहा।

 

‘नहीं तू डर तो गई थी, बेटा ।‘ काकू पुनः बोले। और फिर उनके चेहरे पर जो मुस्कान आई वह रोने से भी बद्तर थी।

 

फिर देखते देखते खत्म होती रील की तरह सब मिट गया…वह सपना और काकू सब…। और तब पसीने में लथपथ रश्मि भी जग गई।

 

पति ने सुलाने की बहुत कोशिश की पर सारी दवाओं के बावजूद भी, रश्मि की व्यग्र पुतलियों में अब नींद का एक रेशा तक न था।रात सोफे पर बैठे-बैठे ही निकाल दी उसने।

 

अभी दिन पूरी तरह से निकला नहीं था और वह अँधेरे और उजाले की लड़ाई लगातार जारी ही थी कि रश्मि उठ बैठी। यही नहीं, मन बांटने के इरादे से फ्लैट की सफाई पर तुल गई। पुरानी आदत थी जब भी कोई परेशानी हो , घर के कामों में ऐसी जुट जाती थी कि मन कुछ सोच ही न पाए। महसूस ही न कर पाए।

 

डस्टिंग के बाद जब हूवर निकालने गई तो आँखें फटी-की-फटी रह गईं। सामने हूवर पर काका की मलमल की काली किनारे की सफेद धोती और कुरता करीने से तहाए रखे थे। ‘ यह कहाँ से आए यहाँ पर …कहीं खिलंदड़ी राकेश ने तो यह मजाक नहीं किया उसके साथ। छिः कितना फूहड़ मजाक है यह!‘ रश्मी ने लपक कर धोती कुरते को उठा लिया। कपड़े हाथ में लेते ही रश्मि के हाथ कांपे और वह कपड़ों का जोड़ा जमीन पर बिखर गया। अपने आप एक ऐसा आकार लेते हुए, मानो कोई जमीन पर लेटा हो। कोई क्यों, जैसे काकू ही जमीन पर लेटे हों।

 

बदहवास और भयभीत रश्मि अब राकेश को आवाज-पर आवाज दिए जा रही थी। राकेश दौड़े-दौड़े आए तो रश्मि ने घबराकर कहा, ‘ सुनो इसे उठा दो मेरे आगे से। बाहर कूड़ेदान में फेंक आओ। डर लग रहा है मुझे इससे।‘

 

अगले पल ही उसे लगा कि वह कह रही है कि काकू को बाहर कूड़ेदान में फेंक आओ। तुरंत ही खुदको संयत करके बोली, ‘ यहाँ मंदिर तो हैं नहीं, नहीं तो किसी चर्च में रख आओ। या फिर बेहतर रहेगा कि नदी में ही विसर्जित कर दें हम इन्हें।‘

 

हाँ, वे कपड़े पहने हुए थे और काका के ही लग रहे थे यहाँ तो कोई ऐसे कपड़े पहनता ही नहीं।रश्मि आज तक, सालों बाद भी परेशान है, बारबार राकेश से पूछती है कि वह कपड़े वाकई में थे भी वहाँ पर या मात्र उसकी कल्पना में ही थे। काश्! राकेश कह देते एकबार कि वह उसकी कोरी कल्पना की ही उपज थी, परन्तु राकेश ने तो ऐसा कुछ नहीं कहा। अधिक ज़िद करती तो चुप हो जाते।

 

राकेश का कहना है कि वे कपड़े थे और अपने हाथों से बहाया है उसने उन्हें नदी में।

 

पर रश्मि को आज भी विश्वास नहीं-ऐसा कैसे हो सकता है, भला ?

 

हाँ, एक विचार जरूर बारबार उठता है मन में, कहीं काकू यह तो नहीं बताना चाहते थे कि वह आए थे उससे मिलने और उसी कथ्य की पुष्टि के लिए वह मूर्त प्रमाण छोड़ा हो! पर वे आए तो आए कैसे… कैसे लौटे वह …सात समन्दर पार …मृतकों की दुनिया से! एक रहस्य, जो जितना सोचती रश्मि, गहराता ही जाता उसके लिए।…

 

जहाँ वह पहुँच चुके थे वहाँ से लौटना आसान नहीं। वह तो पीछे छोड़े एक पल तक को वापस नही लौटा पाई  कभी। बस यादें ही रह जाती हैं अतीत की ! पूरी शिद्दत के साथ कई बार लौटना चाहा है उसने भी अतीत के भिन्न-भिन्न बिन्दुओं पर। वे प्यार भरे बेफिक्र दिन जब सुख-दुख का अर्थ ही नहीं जानती थी रश्मि, हर वक्त बस एक सुख और संतोष का सागर ही लहराता था उसके चारो तरफ। पर हमेशा निराशा ही तो हाथ लगी है उसे इस प्रयास में । क्योंकि लौटने की प्रक्रिया बस मानसिक रूप में ही तो होती है, शारीरिक रूप से यह संभव ही नहीं। सब कुछ पलपल ही बदलता रहता है…शरीर, वस्तु, स्थान …खुद हमारी रुचियाँ और परिस्थितियाँ, सब। कहाँ और कैसे संभव हो सकता है फिर लौटना ! …

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