गीत और गजलः अनिरुद्ध सिन्हा

 

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रिश्तों के बोझ ढोके तमाशे किए बहुत

तुमने मेरे नसीब के सौदे किए बहुत

 

इकदिन उसी मुकाम पे आओगे तुम कभी

जिसके खिलाफ़ वक़्त ने धोखे किए बहुत

 

आए कभी तो याद सितारों की जानेमन

महकी हुई बहार से सजदे किए बहुत

 

उस आदमी को मौत डराएगी क्या भला

जिसने हवा से खौफ़ के किस्से किए बहुत

 

कुछ लोग ज़िन्दगी से परेशान जब हुए

हर मोड़ पर गुनाह से वादे किए बहुत

 

 

 

 

 

 

 

 

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हरेक ग़म मेरी ख़्वाहिश के साथ चलता है

मेरे नसीब का चेहरा कहॉ बदलता   है

 

अजीब बात है वो रोज़ ही निकलता है

सफ़र के बीच में सूरज के साथ ढलता है

 

उसी मुकाम पे ठहरी है शाम फिर आकर

कई रुतों से मेरा दिल जहॉ कि जलता है

 

बुरा न   मानिए लोगों   की बेहयायी में

हया के जिस्म को छूकर समय निकलता है

 

उसी को वक़्त ने इल्जा़म दे दिए   सारे

वफ़ा की ऑच में चुपचाप जो पिघलता है

 

 

 

 

 

 

 

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तुम्हारे वादों से वो लिखा ख़त गलत पते पर चला गया है

हवा के हाथों की इस ख़ता ने शहर में रुसवा हमें किया है

 

कदम सफ़र से जु़दा-ज़ुदा हैं यक़ीन भी है ठगा-ठगा सा

न कोई आहट न कोई जुम्बिश ज़ुबां को सबने ही सी लिया है

 

उसी घड़ी तुम पुकार लेना सफ़र में कोई बिछुड़ गया तो

अभी नज़र को नज़र नहीं है नज़र से तुमको छुपा लिया है

 

सितम तुम्हारा, सितम ग़मों का किसे बताएँ किसे सुनाएँ

हमारे दिल की यही है हालत कभी मरा है कभी जिया है

 

वो इक समुन्दर जु़दा-ज़ुदा सा वो एक सहरा लबों पे आया

जो ज़ख़्म से कल मिली थी बारिश उसी को हमने अभी पिया है

 

 

 

 

 

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है सफ़र सामने और खुला अपना सर

ऐ हवा तू ठहर ऐ घटा   तू ठहर

 

आज भी अपनी हद से वो ज़्यादा लगी

सिलवटों से भरी वक़्त की दोपहर

 

जिक्र जब भी हुआ राहबर का यहॉ

और भी कुछ भड़कने लगा है शहर

 

अनगिनत खुरदरे पत्थरों की तरह

इश्क़ का चांद था और उनकी नज़र

 

आहटें भी हवाओं से   घबरा   गईं

मेरे पैरों के छालों का था ये असर

 

 

 

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