कहानी समकालीनः समुद्र देवा- लावण्या शाह/ लेखनी मई-जून 16

ghatv_n‘ सागर ! ‘ जल राशि का यह अपार , अथाह समूह ! पृथ्वी के पट पर चहुँ और फैला हुआ है जिसका आभास आदम मानव को किनारे पर खड़े होकर हुआ होगा ! ‘यही सोचते हुए एक नौजवान सागर में उठतीं गिरतीं मौजों पर आँखें टिकाये , हमेशा की तरह , आगे बढ़ने लगा।
सागर और साहिल दोनों ही उसके जीवन में यूं घुल चुके थे मानों दिन और रात ! प्राकृतिक और सहज ! पर, वो जानता है कि जब बरसात , पागल – सी हो जाती है तब बेकाबू हो जाता है समंदर और उस से भी ज्यादा मौजों का संग्राम दिखलाई पड़ता है जब समदर में ज्वार उठता है। तब तो जल, थल, नभ और क्षितिज सभी एकाकार हो जाते हैं ।
वह यही सब सोच रहा था। बिलकुल मेरे मन की तरह ही तो हो जाता है समंदर ! वह अपने मन में छिपे भाव, सागर के सामने , खोलकर रख देने में बिलकुल भी न हिचकता था। सागर तो उसे बिलकुल अपना लगता है।
” मेरा ” समदर देवा है ..ओ मेरे देवा …” उसके मन ने फिर कहा ….” रोजी , रोटी देनेवाला भी तू ही तो है ! पेट भरने वाला भी और मेरे पुरखों का रखवाला भी तू ही तो है ! मैं जानता हूँ , मेरे कई रिश्ते – नातेदार तेरी गोद में खामोश होकर सोये हुए हैं ! अरे , वे समदर की गोद में समा गये तो क्या हुआ ? ये दरिया , हमारा माई बाप है ! हम मछुआरे समंदर के बेटे हैं ‘
अब उसने देखा, सागर की उत्ताल तरंगें , ज्वार के कारण , शनै: शनै: आगे बढ़ कर किनारे की रेत को लील रहीं थीं। अब तो सागर किनारे से सटे काले ऊबड़ खाबड़ पत्थरों को भी मतवाली लहरें , चुटकी बजाते , पाट ही देंगीं ! आगे क्या होगा वह यह भी जानता था। हां, ऐसे द्रश्य उसने कई बार देखे हैं ! पानी जोर कितना जोर मारता है , बाबा रे ! जब जब ज्वार आगे बढ़ता है तब किनारा एक ओर खड़ा रह जाता है और समंदर की अथाह जल राशि के सिवा कुछ दीखलाई ही नहीं देता ! वयुवक अपनी खुली और गहरी स्वर लहरी में गाने लगा
” खारा पानी कोइ पी न सका ,
एक प्यार का मोती , काम आया,
एक प्यार का मोती , काम आया !
हो….ssss …. हम भी हैं, तुम भी हो,
दोनों हैं आमने सामने …” फिर लडकीयों जैसी पतली आवाज़ निकाल कर आगे लता मंगेशकर की आवाज़ की नक़ल करते हुए गाने लगा।
” देख लो, क्या असर कर दिया प्यार के नाम ने ! ” ….
और फिर वह अपनी मस्ती में , सीटियाँ बजाते हुए गीत की धुन पर वहीं रेत पर गोल गोल घुमते हुए , नाचने लगा !
‘ आहा ! क्या मस्त पिक्चर बानायी राज कपूर ने ! …कल ही तो बस्ती के नजदीक वाले थेटर में फिलिम देख आया था वो ..क्या नाम चुना था बनानेवाले ने …वाह !” जिस देस में गंगा बहती है ! ” …अरे पर , ” गंगा माई ” को देखना , हमरे नसीब में कहाँ राज सा’ब !? उसके दिल ने फरियाद करते हुए कहा ..
” अरे राजा बाबू, हमरा तो समदर देवा है ! पर क्या नाच गाना बनाया रे बाबा …खूब मज़ा आया ..पैसा वसूल किया मैई ने ….दम्बूक …दम्बूक …हो हो हो ‘ कह वो हंसने लगा ” चूंकि चलचित्र में बन्दूक को राज कपूर ‘ दम्बूक ‘ ही बोले थे और इसी तरह अपने में मस्त , सिनेमा को याद करते हुए , वह खुलकर मुस्कुराने लगा।
चलचित्र के द्रश्यों का भरपूर मनोरंजन उस जैसों के लिए , एक टाईम पास का सबसे अच्छा तरीका था। टिकट का पैसा कमाया, थोड़ी देसी दारू सुड़की , गला तर किया , चावल के साथ काशी बाई की पत्थर की सील पे जोर जोर से पीस कर बनायी लहसून प्याज टमाटर के मसाले में देर तक कोयलों पे पकाए मसाले में उसी रोज पकड़ी ताजी पोम्फ्रेट मछली, रस्सेदार मछली का झोल और भात खाया तो हो लिया था उस दिन का एकदम फिट , खात्मा !
बस इसके सिवा और क्या सुख हो सकता है ? उसने अब सोचा।
‘ फिर टिकट लेके, मैं , दुबारा देख आयेगा ” जिस देस में गंगा बहती है फिलिम को ” उसने मन ही मन निश्चय कर लिया ! आज बोहणी होगी …खूब सारी मछलियां मिलेंगीं और खूब कमाऊंगा … मेरा ” समदर देवा ! तू , इत्ता बड़ा है और अपुना पेट भरने के वास्ते , पानी में अपुन के वास्ते , तू , रास्ता बना ही देता है रे ! ” मन में उत्साह भर कर ये सब सोचते हुए , युवक अपनी लम्बी , लकड़ी की नाव के पास पहुंचा जिसे उसने गहरे नीले रंग से पोत दिया था।
नाव के ऊपर उसने , विठोबा की दांडी वाली झंडी भी मस्तूल पे लगा रखी थी जो ज्वार की तेज हवा में झूम झूम कर उसका स्वागत कर रही थी और उसने अपने बलिष्ठ कन्धों के बल से लंगर खेंचने के बाद , नाव को धक्का देते हुए पानी की ओर खदेड़ा। ले चला वह अपनी नौका को ! अपने चिरपरिचित सागर की ओर — यही तो उसका नित्यक्रम था !
किनारे के एक ऊंचे आलीशान , वातानुकुलित फ़्लैट में खड़े खड़े, इस मछुआरे को देख रही एक युवती , मुस्कुराई। उस युवती का बचपन भी बंबई नगरिया में बीता था पर , बंबई जिसे वह ‘ माई इंडीया ‘ कहती थी , वो ‘ भारत ‘ का एक महहूर शहर भी था। जहां भारत के हर प्रांत का इंसान आकर बस गया था और ” मुम्बई आमची ” मतलब ” मुंबई हमारी ” समझने लगा था।
उस युवती के पुरखे भी, न जाने कब आये थे और बस गये थे और बंबई या मुम्बई , अब उस युवती का अपना शहर था।
मीनू पुरुषोत्तम और जयदेव जी की कला से गूंथा ये पुराना और खूबसूरत नगमा उसने अपनी डायरी से निकाल कर, पन्ने पलटते हुए अपना पसंदीदा गीत खोज लिया और अपने सुरीले स्वर में गाने लगी। गीत के बोल , समंदर के खारे जल से मानों भीगे – भीगे हुए से थे।
‘ आँगन में बैठी है मछेरन, तेरी आस लगाए
अरमानों और आशाओं के लाखों दीप जलाए
भोला बचपन रस्ता देखे ममता कहे मनाये
ज़ोर लगाके कहे मछेरन, देर न होने पाये
जनम जनम से अपने सर पर तूफानों के साए
लहरें अपनी हमजोली हैं और बादल हम साए
जल और जाल है जीवन अपना क्या सरदी क्या गर्मी
अपनी हिम्मत कभी न टूटे रुत आए रुत जाए ।
क्या जाने कब सागर उमडे कब बरखा आ जाए
भूख सरों पर मंडराए मुहँ खोले पर फैलाए
आज मिला सो अपनी पूँजी कल की हाथ पर आये
तनी हुई बाँहों से कह दो लोच न आने पाये …”
चलिए हमारे नायक के जन्म स्थान मुंबई से भी मिल लें ! बंबई शहर जो अब मुम्बई के नाम से पहचाना जाता है एक विशाल महानगर तो है परन्तु यह ‘ बंबई ‘ मछुआरो का या कोली और अग्री प्रजाति का मूल स्थान भी है।
” मुम्बा देवी ” के नाम से बसा मुंबई शहर , जगत में अपनी पहचान बनाए हुए २१ वें सदी में , फिल्म निर्माण के व्यवसाय के जरिए ” बोलीवुड ” के नाम से भी मशहूर है और ये कईयों के ‘ सपनों का शहर ‘ बंबई या मुम्बई , भारत भूखण्ड के पश्चिमी किनारे पर अरब समुद्र के किनारे, आबाद है।
यह मुंबई और उसका सागर किनारा, हमारे नायक का ‘ समदर देवा ‘ है। उसीकी भांति उसके जाति भाई , कई किनारों पे बसी बस्तियों के मूल निवासी हैं। अक्सर, बंबई शहर की गलियाँ, समंदर के पास आकर रेतीले साहिलों पर समाप्त होतीं हैं और इन साहिलों पर आकर रुकनेवाली बस्तियों के अलग अलग नाम हैं।
जुहू बीच जो सान्ताक्रुज़ उपनगर में है शायद सर्वाधिक मौज मजे का स्थान है। यहां छोटे घोड़ों से बंधीं गाडीयों में सवार , लोग उछलते हुए किनारे की रेत पर घोडागाडियों में सवारी करते हुए कुश होते हैं। सवारी का मज़ा लेते हैं। किनारे की रेत पर असंख्य लोग पैदल चलते हुए रेत में पैर फिसलाते हुए , सागर में डूबते सुनहरे रक्तिम सूरजको संध्या के समय देख प्रसन्न होते हैं।
भेलपूड़ी , गोलगप्पे, राजस्थानी मूंग की दाल के बड़े, नेस्केफे, चाय, दोसा ईडली पाऊ भाजी, पाँव वडा और भी तरह तरह के खाने से लेकर ,सीप से बने खिलौने और हर तरह के सोवीनीयर स्टोल भी इस जुहू बीच पर बिकते हैं। पर यहां आनेवालों के लिए ,सबसे प्रिय है नारियल का ताज़ा पानी ! जो दक्षिण भारत से मुम्बई आकर बसे, नारियल वाले बेचकर गाढी कमाई करते हैं।
मढ़ आईलैंड फिल्म शूटिंग के लिए सुविख्यात है। उसी की तरह अक्सा बीच है। वर्सोवा के आसपास ऊंची इमारतों में लोग आबाद हैं और समुद्र के पास रहने का सुख उठा रहे हैं।
एक और मशहूर इलाका है , चैपाटी जो गिरगाम उपनगर में बसा समुद्र तट है ! जहां मरीन ड्राईव की अमीर बस्तियों से , लोग मिट्टी के मटके में रखी , केसर , मलाई, चीकू की कुल्फी खाने या भेल पूड़ी खाने , गोल गप्पों के चटखारे लेने पहुँचते हैं और बंबई के सामूहिक गणेश विसर्जन के दिन माने, चौदस की शाम को चौपाटी पर , कुम्भ मेले सा द्रश्य दीखलाई पड़ता है।
दादर उपनगर के पास बसे किनारों पर चौपाटी और जुहू जैसा शोर या हंगामा नहीं होता। गहमा गहमी के बजाय यहां पर अकसर , मध्य वर्गीय परिवार , टहलते दीखलाई पड़ते हैं।
मनोरी, मार्वे और गोराई बीच भी हैं जहां देस भर से आये सैलानी घूमने जाते हैं। कुल मिलाकर इन समुद्र किनारों की ख्याति , जनसमुदाय के आवेग के साथ साथ कालान्तर में बढी ही है।
एक छोटी सी भरी पूरी , दुनिया ही यहां पर आबाद है। लड़के रेत पर , क्रिकेट भी खेलते हैं , कुछ चुस्ती से चलने आते हैं। माने , वोक करने, तो कई व्यायाम करते हैं। कुछ लोग भेलपूड़ी या कुछ और खाते हैं, बाजेवाले , बन्दूक से गुब्ब्बारे फोड़ने के खेल सजाये , खिलौने बेचनेवाले, गरीब, भिखमंगे, हिजड़े, संभ्रांत कुल के अमीर लोग, उनकी आया या ड्राईवर के साथ आये सजे हुए बच्चे , कई सारे परिवार , आईसक्रीम खाते लोग ..रंगीन बर्फ गोला चूसते लोग , ऐसे द्रश्य मुम्बई के किनारों में रोजाना दीखलाई पड़ते हैं।
हां प्यारों ये बंबई शहर के बीच हैं समुद्र किनारे हैं ! यहां आंसू और मुस्कान, मौज और थकन, गरीबी अमीरी एक साथ सांस लेती हैं।
पहले बंबई के , ७ मुख्य भूभाग थे , कोलभात , पालवा बंदर , डोंगरी , मज़गाँव, नयी गाँव और वरली ! यह मूल सात टापू थे जिनके बीच की जमीन को , मिट्टी डलवा कर, समुद्र को पाट कर , नयी जमीन हासिल करके नई जमीन को पाया गया है और यहां पर, बहुधा , जमीन खोदने पर , समुद्री जल तुरँत सतह तक आ जाता है ।नारीयल के पेड़ तथा कई तरह के वृक्ष और पौधे भी यहाँ पर दीख जाते हैं।
यहां के मूल निवासी कोली प्रजाति के लोग, महाराष्ट्र , गुजरात, आंध्र प्रदेश और भारत के कई हिस्सों में भी बसे हुए हैं । महाराष्ट्र में बसे कोली जनजाति के लोग, क्रीस्चीयन या हिदू धर्मी हैं । वे मराठी भाषा से मिलती जुलती ” कोली भाषा ” बोलते हैं जिसके शब्द मराठी भाषा से अलग हैं । जैसे मराठी में कहेंगें ” इकडे ये ” माने ” यहां आओ ” जिसे कोली भाषा में कहेंगें, ” अवारी ये स ” ..
डांडा , वसई , मढ़ आईलैंड में भी कोली और आंग्रे प्रजाति की आबादी फ़ैली हुई है । कोली प्रजा में , कोली, मंगला कोली , वैती कोली, क्रीस्चीयन कोली , महादेऊ कोली और सूर्यवंशी कोली के विभाग भी हैं ।
” एकवीरा देवी ” इनकी मुख्य देवी हैं जो कार्ला गुफा में, आसीन हैं । चैत्र पूर्णिमा देवी पूजन का मुख्य दिवस है। नारीयल पूर्णिमा या राखी का त्यौहार कोली लोगों के लिए ख़ास दिन होता है जब अच्छे हवामान के लिए कोली लोग , समुद्र देवता की पूजा करते हैं और अपने धंधे की सफलता की कामना करते हुए , नारीयल , फूल और कुंकू माने कुमकुम से समुद्र पूजन करते हैं ।
दूसरा बड़ा त्यौहार , जिसे कोली मौज के साथ मनाते हैं वह है , होली ! जिसे वे ” शिमग्या ” कहते हैं और खूब प्रसन्नता से यह उत्सव कोली बस्तियों में यह लोग मनाते हैं ।
दँडकारण्य मेँ रहने वाले, वाल्मिकी ऋषि खानदेश महाराष्ट्र के निवासी थे और कोली लोग रामायण के रचियता को भी बहुत मानते हैँ । कोली संगीत भी काफी समृध्ध है उनके लोक गीतों में समंदर की लहरों सा वेग है।
हमारा नायक है ‘ देवा ‘ ! उसकी बस्ती बिलकुल समंदर की गोद में बसी हुई है । खारे पानी के किनारे ऐसे सटी हुई है के हमेशा दरिया के खारे पानी से मिली हवा में तेज मत्स्य गंध तैरती रहती है । हवा खारेपन से लिपटी हुई कुछ अलग ही एहसास दीलाती है ।
यहाँ रहतीं हैं समंदर में , लकडी की नाव पर सवार होकर , अपने मछुआरे पति के संग कभी कभार , मछलियाँ पकडने जानेवाली साहसी महिलाएँ ! जो ज्यादातर मछली बेचने का काम किया करतीँ हैं । उनकी वेशभूषा भी ख़ास तरह की हुआ करती है । जांघ तक की पहनी हुई साडी को , दो भागों में विभक्त किये , पहनी जाती हैं। साथ रंगीन वस्त्र की कसी हुई चोली और ऊपर , सुफेद दुपट्टा , लोन कपडे का जिस पे , फूल प्रिंट वाली बॉर्डर हुआ करती है ।
कानो में भारी सोने के मत्स्य आकार की बालियाँ, गले में , गोल दानो की सोने की मणियाँ पिरोई हुई माला और केशों को कसकर बांधा हुआ जुडा जिसमेँ किसी की बगिया के सारे सुगँधी और रँगबिरँगी फूल खोँसे हुए रहते हैं। इन मछुआरीन स्त्रियोँ की वेशभूषा , अन्य स्त्रियों से एकदम अलग लगती है। जो कोई उन्हें रास्ते में देखे , बस वही, आँखें फाड़े , देखता रहे ! सच !भारत में कितनी विभिन्नता है !
हमारा मछुआरा नायक ये जानता था कि एक बहुत अमीर मछुआरे – व्यापारी “राजा भाऊ ” भी थे । ३ बड़े – बड़े समुद्री जहाज (जिन्हें फिशिंग ट्राव्लर्स कहते हैं ) के राजा भाऊ , मालिक थे और उसने ये सुन रखा था कि , ताजे लोब्स्टर , झींगा, पोम्फ्रेट जैसी फीश और केँकडे, पकड़ कर वे अकसर , राज कपूर के परिवार के लिए , भिजवा देते थे।
सागर संगीत साहिल तट से टकरा कर उत्ताल तरंगों के फेनिल ज्वाल पर शोभित हो, घोंघों, सीपों और जलचर जीवों के अवशेषों पर अपने को दिन रात प्रवाहित किये सतत बहता रहता है।
समुद्र के समीप रहने के लिए बड़ा धैर्य चाहीये। नदियाँ वेगवान हों तब भी सागर की तरह शोर नहीं करतीं ! कलकल छल – छल बहती धारा , आखिरकार सागर में समा जाती है और सागर में उठते पारावार का क्रम, तो कभी टूटता ही नहीं ! कभी कभी तो इंसान , कपाट बंद कर कुछ पल के लिए मौन की कामना करने लगता है अशांत रहना ही मानों सागर की प्रकृति है और शायद क्रम भी है !
श्रीरामचंद्र के आगे प्रकट हुए सागर देव ने भी करबध्ध उपस्थित होकर, यही प्रार्थना की थी कि, ” हे देव कुपित न हों ! मैं प्रकृति के नियमों का उललंघन कैसे करूं ? ” बम्बईया लोगों को ‘ मुम्बईकर ‘ भी कहते हैं उनकी एक विशेषता है कि वे कभी मौसम या समय के अनुसार रुकते नहीं ! मुम्बई के जीवन की रफ़्तार , बड़ी तेज है – काम, काम और काम ! कोइ यहां बेकार बैठे रहना नहीं जानता। हरेक अपने शौक पूरे करने के लिए जी जान से जुटा भागता रहता है। देवा ये सारी बातें बखूबी जानता था।
देवा ने , छोटी कसी हुई तंग भूरी पतलून पहन रखी थी ऊपर , जालीदार हरी बनियान पहनी थी जिस में से झांकता काले डोरे में बंधा ताबीज झलक रहा था और उसके घुंघराले छ्तरे केश और नीली सागर के जल सी चमकातीं आँखें उस पर गोरा रंग जो खुली हवा में रह कर , पक कर , ताम्बे सा लाल हो कर दमक रहा था। उसने अपने हाथों को चिबुक पे टीकाया और न जाने कितने ख़्वाब उसके नयनों में तैर गये।
तभी एक दूर से चलकर आ रहे मछुआरे की आवाज़ किनारे पर तैर गयी ..’अरे ओय देवा ! इकडे ये …” ( ऐ समुद्र के देवता यहां आओ ” )
” काय रे मामा ? कुठे निघाला ? ” ( क्यूं मामा कहाँ जाने को निकले हो ? )
एक छलांग में , अपनी नैया के पार कूदकर आ पहुंचा देवा , तो मामा भी मुस्कुराने लगा ” अरे देवा ! तुझा बाबा कड़े नाय गेलो तू ? ते तो क़ेवाचे घरी गेले ! माझा पूर्वी सुटले …होते ..” ( अरे देवा, अपने बाबा के पास नहीं गये तुम ? वे तो कबके घर जा चुके ! मुझसे पहले ही निकल लिए थे ” )
मामा ने सवाल पूछा तो वह भी आकर , नाव के भीतर से जाल उठाकर फैलाने लगा ..और बोला ‘” जातो मी रे मामा थांब थोड़ा वेळी …” ( जाता हूँ, .मामा , कुछ देर रूको ) – तब मामा , देवा के सामने देखते हुए हंसने लगा और बोला,
‘ अरे आज तरी बाबा ला मचली नाय सांपडली …” ( आज भी बाबाको मछली नहीं मिली ) और इतना कहते वो जोर जोर से हंसने लगा ….
” देवा ” काबिल और बड़ा लायक लड़का था। समंदर किनारे पडी लकड़ी की कुर्सी पर बैठे , बैठे, अपने खाली समय में वह , ‘ लाईफ गार्ड ‘ का माने ‘ जीवन रक्षा ‘ का काम भी स्वेच्छा से किया करता था। दरिया की मौजों को घंटों निहारना, उसकी आदत थी जिस से वह जान पाया था यह बात के हर छठी लहर के बाद उठती सातवीं लहर, सबसे बड़ी और तेज होती है। ये रहस्य उसे मालूम था
दरिया कई रंगों में दीखलाई देता था। सूरज की किरणों में कभी सुनहरा , पिघले सोने सा दमकता हुआ, तो डूबती संध्या में लिपटा किसी सुहागिन की मांग से बिखरे सिन्दूर की लालिमा को लुटाता , केसरी – रक्तिम दरिया! दोपहर की प्रखर धूप में कभी
बाबा , देवा से की बातों पर विस्तार से बातें किया करते , उन्होंन देवा को किस तरह पाया ये भी , उन्होंने नहीं छुपाया था।
बाबा ने कहा था , ‘ काश ! वह लडकी मुझे मिल जाती तो मैं उसे भी प्यार करता। जिस दिन तुम्हे मैंने उस चट्टान पर पडा पाया था तब ये नहीं सोचा के किसने ऐसा भयानक काम किया होगा ! सच …मुझे दुःख है कि मैं वहां देर से पहुंचा …अगर तुम्हारी माँ से मिल जाता तो उसे भी यहां ले आता …..’
सिर्फ , उस बच्चे को अपने संरक्षण में लेना ही उस वक्त बाबा को , सबसे खास बात लगी थी। अपनी पाईप के कश खींचते बाबा, बातों मे , पुरानी यादों मे, खो कर, कहीं दूर चले जाते और बाबा, को अपने ख्यालों मे उलझा हुआ देख , देवा बाहर निकल आता फिर लौट आता अपने समंदर के सामने ! खारे पानी के सामने बैठ, मौजों का संगीत सुनता रहता और दिन भर तप कर सूरज दरिया में डूब जाता तो वह सोचता , ‘ एक दिन बाबा मुझे अपने दिल की बात बतलायेंगें उस देवी के बारे में भी जिसके चित्र के आगे बाबा , रोजाना अगरबती जलाकर कुछ पल , खामोश खड़े रहा करते थे। बचपन में देवा भी , हाथ जोड़कर खडा हो जाता जैसा उसकी बस्ती के शिव मंदिर में बच्चे करते थे। फिर , बाबा की खामोश अंजलि उसे ऐसा करने से रोकने लगी और वह बाबा को चित्र के सामने एकेले खडा रहने देता और बाहर आ जाता। खुले में सांस लेने !
‘ ये मेरी माँ तो नहीं होगी ? या हो भी सकतीं हैं ! क्या जानूं कौन है ये देवी ? ‘
एक रोज , बाबा भी बाहर आकर देवा के पास खड़े हो गये और पाईप पीते हुए कहने लगे, ‘ देवा कोइ इंसान पूरा बुरा नहीं होता ! ना ही कोइ पूरे का पूरा अच्छा होता है ! नाही पूरा बुरा ही। बीच में जहां आसमान और समंदर मिलते हैं न उस क्षितिज की तरह , एक ‘ ग्रे एरिया ‘ भी होता है। वहां दुसरे सारे रंग , हलके पड़ जाते हैं …. जिस देवी कि तस्वीर के आगे मैं रोज , मौन खडा रहता हूँ न, वो भी कुछ ऐसी ही थी ! ‘ और बाबा फिर धुंएँ में उसका चेहरा याद करने लगे तब देवा ने ही पूछ लिया ,’ बाबा क्या वह मेरी माँ की फोटो है ? ”
” अरे नहीं देवा, अफ्सोस ! उस देवी को तो मैंने कभी देखा ही नहीं ! जिसकी तस्वीर हम रोज देखते हैं, वह थी अमीरी बाई ! बंबई आया तब उन्होंने मुझे इस लायक बनाया कि मैं , कुछ पढ़ लिख कर , अपने पैरों पे खडा हो जाऊं।
आज मुझे याद आ रहा है, बंबई शहर मे , वो मेरा पहला दिन था और एक मंदिर की सीढीयों पर मैं भूख से , थकन से लाचार , पिल्ले की तरह पडा, मैं , कराह रहा था साथ था। एक थैला था मेरे पास ! तभी वो दर्शन करने आयीं ! बड़ी बडी आँखें, पान से लाल ओंठ , अजीब सी चाल !! पर … मैं , एकटक देखता रहा, न जाने क्यूँ वो भी रूक गयीं और पूछा, ‘ अकेले हो ? ” फिर मानों अपने आप से बोलीं ‘ लगता है, शहर में नये नये आये हो ! ‘ फिर कुछ ऊंची आवाज़ में पूछा, ” मेरे साथ चलोगे ? ” और मैं खडा हो गया ! मुझे उस महिला पर पहली नजर में विश्वास हो गया था। “ बाबा ने हँसते हुए बीते दिनों से , वर्तमान में प्रवेश करते हुए कहा,
“ सोच रहा था, ‘ कहीं तो जाना है तो इनके साथ ही चला चलूँ ! पर देवा , मुझे बाद में पता चला कि, जिस बस्ती में वो मुझे ले गयीं वहां भले घर के लोग , मुंह छिपाकर ही जाया करते हैं। अमीरीबाई ,वैश्या थीं पर उमर बड़ी हो चली थी तो अब , पूजा पाठ किया करतीं थीं। अपने पापों के लिए भगवान् से माफी मांगतीं रहतीं …सादगी से रहने लगीं थीं …उस देवी ने मुझे भूखे पेट सोने न दिया .. कीचड में कमल की तरह रखा …कुछ दिन वहां रहा तो मेरी और पास रहती ‘ बिजली ‘ में दोस्ती हो गयी तब , बाई जी ने उसे खूब पिटा !
कहने लगीं ,’ हरी घास देख कर मुंह मारने आ गयी निगोड़ी …तेरा पेट नहें भरा रे ! ‘मेरा हाथ थामे , अपने भगवान् की मूर्ति के सामने खींचकर ले गयीं और माथा टेक कर गिडगिडाने लगीं,
‘ माफ़ कर दो प्रभू ! मैं इसे यहां नरक में घसीट लाई ! आज से ये बच्चा यहां नहीं रहेगा — छमा कर दो ! ”
फिर देवा , उस महान देवी ने , अपने जीवन भर की जमा पूंजी से मेरी लिखाई – पढाई का इंतजाम किया। इलेक्ट्रिक मिकेनिक , रेडियो रीपैर , न जाने क्या, क्य सिखलाया और मैं सीखता गया।
जिस दिन मुझे डिप्लोमा मिला उसी दिन मैं उस देवी के चरण छूने पहुंचा …
जहां एक बनिए की दूकान के बाहर मैं सोया करता था वहां पठान चाचा का राज था। उसके लट्ठ से , सब डरते थे। उस रोज , वे भी बादाम लेकर मेरे साथ चले पर देवा वो देवी मुझे लायक बनाने तक ही शायद ज़िंदा थीं ! हम वहां पहुचे, पर वे फूलों से सजी अर्थी पर , इस दुनिया से बहुत दूर जाने को, अंतिम बार हाथ जोड़े पडीं हुईं थीं !’ याद कर , बाबा की आँखों से आंसू बहने लगे ….पोंछकर उन्होंने कहा, ‘ ग्रे रंग है ना, उसकी वो मिसाल थीं! मैंने ही उनका दाह कर्म किया !
मेरी अपनी माता की छवि मुझे धुंधली सी याद है पर मेरी अमीरी माई को मैं रोजाना अपने सीने में लिए घूमता हूँ ….जिस औरत को समाज ने सताया, उसने अच्छा काम किया और जाते जाते अपनी आत्मा को पवित्र करती हुई चल बसी ….मुझ बेसहारा और अबोध के न जान किस जनम का ऋण उन्होंने चुकाया क्या पता ! ” और बाबा लम्बी सांस लेकर फिर खामोश हो गये !…
पाईप से धुंआ उठता रहा …देवा ने आकर बाबा को सहलाना शुरू किया, उनके कन्धों पे हाथ रखा और वह उन्हें देर तक यूं ही प्यार करता रहा तो बाबा का हाथ भी उसके कंधों पे , मरहम सा , हलके हलके से फिरने लगा … धीरे से देवा बोला’ बाबा , आज आप थक गये हैं ..चलिए सो जाईये , रात का दूसरा पहर हो रहा है …चलिए भीतर चलें …’
फिर कहना आगे की कहानी , आप बंबई कैसे आये ? उस की कहानी भी सुनाईयेगा …’ हां , फिर कभी …’ कहकर बाबा मुड़कर घर की ओर चल दिए थे।
कई कई बार देवा , अपनी ऊंची लाईफ गार्ड की कुर्सी पर बैठे बैठे याद करता उन हादसों को कि किस तरह , अपनी मस्ती में, पानी में खेल रहे नवजवान , बेखबर हो अपनी मौत की ओर बढ़ते हुए , मौत के करीब पहुच जाते थे। कईयों को , उसीने छलांग लगाकर , कूद कर , पानी में तेज तैर कर , बाहें पकड़ कर , कैसे , बाहर निकाला था जान बच तो गयी पर लोग एहसान फरामोश निकल जाते।
एक बार एक स्त्री शर्माती हुई समंदर के सामने खडी थी और फिर आगे ही बढ़ती गयी थी। देवा ने एक सीमा बना रखी थी ! जल की सीमा ! जिसके आगे कोइ भी पहुंचता बस वह फ़ौरन दौड पड़ता ! उस दिन भी उस स्त्री के आगे बढ़ते ही देवा मौजों में कूद पडा था। अगर वो ना कूदता , तो वो डूब ही जाती ! बच तो गयी पर खूब रोई चिल्लाई – देवा पर बिफर कर , झपट पडी…वह बोले जा रही थी , ‘ क्यूं बचाया मुझे ..मर जाने देते …थक गयी मैं अब नहीं होता ..जाने दे ..जाने दे ‘
देवा ने बड़ी मुश्किल से उसे सम्भाला और लोगों ने पुलिस बुलाई I फिर कुछ समय बाद , उसका पति भी आ पहुंचा I ५ बच्चे भी आये , जिन्हें छाती से चिपटा कर वह खूब रोई …समझा बुझा कर उसे घर ले जाने लगे तो धीरे से , आंसू भरी आँखों से उसकी ओर देख कर फुसफुसाते हुए बोली ‘ माझा समदर देवा … ‘ और चली गयी अपने नीरस और लाचार अस्तित्व की ओर ! ..फिर अपने घर की ओर जहाँ गरीबी और बेबसी उसके इंतजार में खड़े थे। वही था उसका संसार !
एक बूढा आदमी भी किनारे पर दिन भर घूमता रहता था।देवा उसका हमदर्द था। उसका दोस्त था। कोइ उस बेचारे से बात न करता पर देवा , उसका हाल हमेशा पूछता। जब देवा भी उसकी दोहराई बातों पे ‘ हूँ हूँ ‘ करने लगता तब , वहीं रेत पर गिर कर वह गरीब, ऊंघने लगता ..फिर उठ कर चल देता, कुछ माँगता। किसी की दया से कुछ ख़ा पी लेता।
कई बच्चे जो वहां आया करते थे देवा को पहचानते थे और एक बड़ी सभ्य महिला भी रोज ही आतीं। सुफेद साड़ी, सुन्दर चप्पलें उतार कर , वे तेज तेज चलतीं। न जाने कौन उन्हें अपने प्रति इतना सजग बनाए रखने की सलाह दिया करता था पर वे अपने स्वास्थ्य के प्रति बड़ी सजग थीं। सिर्फ तेज बारीश हो उसी दिन वे ना आतीं अन्यथा सूरज उगा हो तब वे आतीं ही …जब अपना लंबा वोक पूरा कर वे लौटतीं तो आकर, संतोष भरे चेहरे पर तरल मुस्कराहट तैरने लगती और वे देवा की ओर देख कर मुस्कुरातीं तो देवा पूछ लेता,
‘ आंटी जी , नारियल पियोगी ? लाऊँ ? ” और वो हल्की मुस्कराहट के साथ सर हिलाकर मना कर देतीं। हमेशा मना करने पर भी देवा भी उनसे यही सवाल पूछता और वे हर बार मना कर देतीं … वहीं किनारे पर कहीं अकेले बैठ , कुछ देर सुस्ता लेतीं। समंदर की तरंगों को निहारतीं फिर उठ कर चप्पलें पैरों में डालकर , अपनी सुफेद फीयेट प्रीमियर पद्मिनी कार तक चलकर पहुंचतीं और हाथ हिलाकर देवा को बाय कह कर ड्राईवर के दरवाजा खोल, भीतर बैठ कर अपने घर चलीं जातीं।
बंबई शहर में हज़ारों की संख्या में भिखमंगे आबाद हैं। हैं कहाँ ? अजी हर जगह आपको ये दीख जायेंगें ! मंदिरों के पास, मस्जिदों के सामने , लोकल ट्रेनों में, रेलवे स्टेशनों पे, बस स्टॉप पे, सड़कों के ट्राफीक सिग्नल पे, मोगरे के गजरे बेचते, प्लास्टिक की कंघी , बटन बेचते, उल्हास नगर या धारावी के स्लम माने गरीब बस्ती में , गंदगी में बने नाश्तों के प्लास्टिक पेक में तैयार सेव या ऐसे नमकीन नास्तों के पैकेट बेचते ! बंबई के समुद्र किनारे भी इन भिखारी बच्चों से भरे हुए हैं।
देवा उनका ‘ सुपरमेन ‘ था। अब कोइ ये गुत्थी सुलझाये कि वे कैसे जानते थे कि, ‘सुपरमैन ‘ क्या बला है ! पर इन बच्चों की एक अलग दुनिया है ! जिसमे क्या और कौन सी बातें किस तरह , बाहर की दुनिया से पहुंचतीं हैं उसका क्रम जान पाना किसी के बूते की बात नहीं हो सकती।
देवा जानता है तो सिर्फ एक बात और वो ये कि वह ‘ बाबा का बेटा ‘ है।
एक दिन देवा अपनी कुर्सी पे बैठा था अपने काम में मुस्तैदी से जुटा हुआ था और एक खुशबु का झोंका उसके करीब से , सरसराता हुआ गुजर गया। मत्स्य – गंध के साथ पला बड़ा देवा , असंख्य फूलों के गुलदस्ते के करीब अपने जीवन में कभी गया न था और आज इस रेत के किनारे , ऐसी खुशबु !! उसने पलट कर देखा तो देखता ही रह गया।
एक खुबसूरत लडकी , उसके करीब से गुजर रही थी …हलके गुलाबी रंग का चूडीदार और ऊपर उसी रंग की कमीज़ और दुपट्टा जो हवा में लहराता हुआ उड़ रहा था और अब आहिस्ता से आकर, उसके सर पे बैठ गया था ! देवा की आँखें उस नर्म , मलमल के कपडे में बंद हो गयीं तो लगा गुलाबों में कैद कर दिया है उसे किसी ने .! .वो बौखलाता उठ खड़ा हुआ पर तभी उस लडकी ने, सरका कर , दुपट्टे को अपनी ओर खींच लिया तो देवा धडाम से रेतपर गिर पडा !
‘ ऊह आइ ऍम सो सोरी …’ एक महीन स्वर ने माफी मांगते हुए कहा। पर जब उसने देखा तो वो मुस्कराहट छिपा रही थी …
‘ कोइ बात नहीं मेडम ..आपका राज है ..’ देवा ने लापरवाही से बात को हवा में उड़ाते हुए कहा और अपने कपड़ों से रेत झाड़ते हुए , कुर्सी पे जा बैठा।
देवा , उस स्वप्न सुन्दरी को पानी की ओर बढ़ते हुए देखता रहा ….देवा के तनमन में एक अनोखी हलचल शुरू हो गयी ! ‘ अरे – ऐसा तो कभी नहीं हुआ ! ‘ यों तो बीसीयों लडकियां आतीं , जातीं रहतीं हैं पर देवा किसी की ओर आँख उठाकर देखता भी नहीं। तो आज क्या हुआ ?
देवा की नज़रें न चाहते हुए भी उसी की ओर खींची चली जा रहीं थीं …और वो लडकी सामने उठती गिरती लहरों को देख रही थी ..उसकी आँखों में नमी थी दुःख का सैलाब तैर रहा था। पीड़ा थी उसके दिल में , खारापन इतना सारा कि सामने समंदर भी फीका लगे। मुख पर सुन्दरता थी पर जमाने भर का दर्द भी फैला हुआ था। अपनी उमर से ज्यादा दुःख देखने का एक अहसास था जिसकी वजह से वो मेच्योर दीख रही थी उस लडकी का ध्यान, देवा पर नहीं , आसमान में उड़ते हवाई जहाज पर था। वो सोच रही थी , ‘ कौन होंगें ये लोग ? किस देस जा रहे होंगें ? काश ! मैं भी अहीं दूर जा पाती तो कितना अच्छा होता ! कितना शोर करते हैं ये हवाई जहाज ! क्या भीतर बैठने वाले मुसाफिरों के कान के परदे ऐसे शोर से फट नहीं जाते ?
पर उसे किसीने ये तो कभी नहीं कहा , ना मेरे पापा ने , ना ही बहनों ने ! हूँ ह ..किसी किताब में भी नहीं पढ़ा ! सामने सूरज कैसा चमक रहा है लाल लाल होके …कितना गर्म होगा ..बड़ी बड़ी लहरें उठ कर आ रहीं हैं , आह , चलूँ पानी में ..दूर तक जाऊं ….’ और उसके कदम उठते गये जब् ठन्डे पानी का स्पर्श हुआ तो उसके बदन में एक झुरझुरी सी छा गयी …चप्पलें उतार कर उसने हाथों में पकड़ कर , किनारे की ओर उछाल दीं .!
एक गरीब लड़का भागता हुआ आया और बोला ‘ ऐ दीदी , चप्पल सम्हालेगा , बख्शीश देगी न ? ‘
“ हां बाबा “ कहकर वो पानी की ओर बढ़ गयी तो दुपट्टा सरकने लगा तो उसने कस कर उसे अपने कंधे और कमर से लपेट लिया। अब दरिया में पानी धीरे से बढ़ रहा है, इतना धीमे कि पता भी न चले ….साहिल को अपने आगोश में समा लेने के लिए अधीर …और वो आगे और आगे बढ़ती ही गयी, पानी उसकी कमर से ऊपर होने लगा और पैर डगमगाए …देवा ने जोर से पुकारा’ रूक जाओ ..इससे आगे न जाना …’
पर ऊपर उड़ रहे हवाई जहाज के शोर में शायद देवा की आवाज़ वहां तक पहुँची या न पहुँची पर लडकी ने अनसुना कर दिया तो देवा उठ खडा हुआ … ‘ अरे ..पागल है ये …सुनती नहीं ..अरे रूको …..रूको ! ‘
लडकी ने सुना ही नहीं और वो बराबर आगे बढ़ती जा रही है तब देवा सरपट भागने को ही था कि ….तभी सामने से आते , एक बच्चे ने आकर उस की निकर थाम ली और तुतला कर बोला” लाईफ गार्ड अंकल , मेला छोनू भाग लहा हे उछे पकड़ो न अंकल प्लीज़ ….” देवा को बच्चे बहुत पसंद हैं। ज़रा सी देर को वह ठिठक गया और एक बड़े प्यारे से सुन्दर ५ साल के बच्चे को सामने खड़े देख, उसका दिल पसीज गया, पूछा ‘ कहाँ है तुम्हारा सोनू ? ”
‘ वो देखो न , उस तरफ ..”बच्चे ने देवा को खींचते हुए दीखलाया एक छोटा सा पिल्ला जो रेत पर , भागा जा रहा था। पीछे पीछे उसका पट्टा भी रेत पे , घिसट कर खिंचा जा रहा था …देवा को हंसी आ गयी ! भागा और बोला ‘ लो अभी लाया सोनू को पकड़ के ! ‘
देवा ने फुर्ती से पिल्ले को दबोचा और उस बच्चे के हाथोंमे सौंप दिया जैसे ही देवा नीचे झुका तो वो कुता देवा का गाल चाटने लगा दूसरी ओर से उस बच्चे ने देवा को गाल पे सहला दिया ….पर देवा का ध्यान अब अपनी ड्यूटी पे पलट कर आया तो क्या देखता है कि वो लडकी अथाह पानी में हिचकोले ख़ा रही है ! ” अरे मार डाला ”
देवा जोर से चिल्लाकर हिरन से भी तेज दौड़ से लम्बी छलांग लगाकर मौजों को चीरता हुआ उस डूबती लडकी के पास तेज तेज गति से तैरता हुआ पहुँच गया !
हाँफते हुए, मन में कई तरह की चिंता करते हुए आखिर उस लडकी को थाम कर अपने साथ देवा किनारे पर ले आया पर वह अचेत पडी थी। मानों कोइ जल परी आकर , रेत पर , लेट गयी थी। गुलाबी कपड़ों में लिपटी ! सुफेद हो गया चेहरा , पानी में थपेड़े ख़ा कर रक्त विहिन हो गया था। आँखें बंद थीं मगर सांस चल रही थी। ओंठ नीले पड़ने लगे थे तो देवा ने उसके पेट को जोर से दबाया ताकि पानी जो वह पी चुकी थी बाहर निकल आये।
अब देवा घबडा गया। पर उसे जो भी आता था उन सब की आजमाईश करने लगा हथिलियों को गरम करते हुए जोर से सहलाया , पैरों को रगडा। कॉफी खारा पानी ये पी चुकी थी बेहोश भी थी,’ अब क्या करूं ? ‘ देवा ने सोचा –
‘ हे भगवान् ! कहीं इसकी जान चली गयी तो मैं अपने आपको कभी माफ़ न करूंगा ! ” उसे अपने पे गुस्सा आया। ‘ मैं क्यों भागा उस पिल्ले के पीछे ? मेरा काम है मेरी आँखें हर समंदर में प्रवेश करनेवालों पे रहना चाहीये — खैर ! इस वक्त इसे होश आ जाए बस ! ‘
पर देवा की तमाम कोशिशें नाकामयाब होतीं लगीं तब देवा को और कोइ उपाय न सूझा तो उसने लडकी के ओंठों पर अपना मुंह रख दिया और जोर से उस में प्राण फूंकने लगा। पेट भी दबाता रहा। तब वह लडकी जोरों से खांसी और उसके मुंह से खारे पानी की धारा बाहर निकलकर बह चली। …खूब सारा पानी निकला। उसे अब होश आने लगा था वह मौत के मुंह से निकल कर फिर ज़िंदा लोगों में लौट आयी थी।
लडकी की आँखें धीमे से खुलीं और मानों प्राण लौट आये , प्रकाश की चमक फिर दप्प से जल उठी।
देवा , अब भी उसे चूम रहा था। तभी लडकी संभली , आस पास देखा और उसे याद आ गया कि वह कहाँ है और ये क्या हो रहा है। उसे होश आ गया था।
उस वक्त उस के हाथों में जितनी ताकत थी उसने उस हिसाब से, एक चांटा देवा के गालों पर तड से जड़ दिया !
देवा हकका – बक्का रह गया ! हडबडा कर उठा और उसे भी रोष आ गया बोला
‘ क्या इनाम दिया मेम सा’ब जान बचाने का ! …जाओ मरो … ”
गुस्से में कहकर वो दूर हो गया। एक बार उसने पीछे मुड कर देखा और लम्बे लम्बे डग भरता हुआ देवा, वहां से दूर चला गया।
उसके जाते ही लोगों की भीड़ घिर आयी पर वह लडकी अपने घुटनों में सर डाले , रोने लगी तो सब की सहानूभूति उस के आस पास घेरा बनाए अधिक गहरा गयी।
‘ अरे बेटी , उठो सम्हाल के ..चलो घर पहुंचा दें तुम्हे ‘ एक संभ्रांत महिला ने उसे सहारा देकर उठा लिया और उसे थामे हुए ले चलीं। रेत से दूर होते कदम , मंजरी के पाँव के निशान छोड़ते जा रहे थे पर आज मंजरी के दिल में हलचल मची हुई थी। ‘ कौन था ये लड़का जिसने आज मेरे प्राण बचाए ? इसे तो कई बार मैंने अपनी खिड़की से देखा है …अकसर यहीं मंडराता है बीच पर …था तो वही ! पर हाय ! आज उसने मुझे सब के सामने चूम लिया ! ये क्या हो गया ! हे भगवान् ! क्या मैं आज के बाद कुछ अलग दीखने लगूंगी ? ” वो सोच रही थी और अपने फ्लैट की ओर बढ़ती जाती थी। ” हाय राम ! अगर पापा ने देख लिया तब ? मेरी खाल खेंच लेंगें ! क्या कहेंगें ? बहनें क्या सोचेंगी ? ‘
आज मंजरी अपने दलाल बाप से कुछ ज्यादा ही डर रही थी। …‘ कहने को तो ‘ पापा ‘ है पर मेरी मम्मी इस रावण के अत्याचारों से अपनी जान छुडाकर मौत को गले लगाकर चल बसी ‘….मंजरी को आज माँ याद आयी और आंसू बहने लगे।
उसने अपनी सहायता करनेवाली महिला को शुक्रिया कहा और रास्ता पार कर वह आलीशान कमपाउन्ड वाले एक ६ मंजिले मकान की लिफ्ट की ओर बढ़ गयी। ..यही तो था उसका आशियाना ! जहां वह अपने बदचलन और ऐय्याश बाप के संग जीवन बिता रही थी। एक बार उसे ये भी ख्याल आया ‘ आज मर ही जाती तो जान छूट जाती ..क्या बुरा होता ? आगे का जीवन अन्धकार भरा है …….अनिश्चित है …कहाँ तो मुझे कविता और संगीत पसंद हैं और कहाँ मेरे जीवन का कडुवा सच ! और ये काला मनहूस साया ! मेरी बहन और मेरी मम्मी की जवानी को, रोज बाजार में नीलाम करने वाले जल्लाद बाप का काला मनहूस , साया ! …कब आज़ाद हो पाऊँगी इस बदचलन और ऐय्याश बाप से ? मन को क्या समझाऊँ ? कहाँ भाग जाऊं ? क्या करूं ? कोइ रास्ता मुझे मिले तो मैं निकल जाऊं …..इस कैद खाने में जीते जी मरना नहीं चाहती …’
इस वक्त उसे सहारे की तलाश है कल की कल सोचेगी आज तो आज है और मंजरी अपने पापा के वातानुकूलित फ्लेट के सामने खडी हो कर बेल बजाने लगी ..घर के नेपाली नौकर ने दरवाजा खोला। मंजरी को गीले कपड़ों मे देखकर वो अपने टूटे फूटे दांत निकलकर मुस्कुराया …तो मंजरी का गुस्सा सातवें आसमान तक जा पहुंचा।
‘ बहादुर ! क्या देखते हो ! जाओ ….मेरे लिए एक कप गरम कोफी बनाकर ड्राईंग रूम मे रखो …’ इतना कहकर और मंजरी अपने कमरे की ओर आहिस्ता कदम उठाती दाखिल हो गयी और कीवाड बंद कर लिए।
मंजरी अब स्वप्नलोक में खो गई। देख रही है माँ चीख रहीं हैं, रो रहीं हैं, आंसू बह कर मेक – अप को गन्दला करते अनवरत बह रहे हैं और वे चीख पुकार कर बडबडा रहीं हैं।
‘ नहीं जाऊंगी …राक्षस हो तुम , क्यूं मेरे जान के पीछे पड़े हो …कहाँ गया तुम्हारा बनावटी प्रेम ? जब मुझ नाबालिग को बहला फुसला के अपने साथ भगा लाये थे …नीच हो तुम, मेरे जिस्म की कमाई , रोज शराब मे पी जाते हो ! हाय , मैंने अपने मा बाबूजी को धोखा दिया ! …मेरी मति मारी गयी थी ….जो ऐसा किया !
अब भुगत रही हूँ …पापी हो तुम ! यूं …क्या दीदें फाड़ के देखते हो. ? ..हां ..मारोपीटो और कर भी क्या सकते हो तुम ..अब चुप न रहूँगी …’
मंजरी ने देखा उसके बाप धनसुख ने उसकी बीवी उषा के गाल पे एक जोरदार झापड़ लगाया और उसे धक्के से गिरा दिया और उसके ऊपर खड़े होकर गरजा,
‘ चुप्प ! खाल खेंच के फेंक दूंगा दरिया मे …आज सर खाने आ गयी फिर !
..अब भोली बनती है !! ..जिस रात मेरे संग चुपके से चल दी थी तब कहाँ गयी थी तेरी लाज शर्म …..हें …??
बड़ी सती सावित्री बनती है …बेहया .. तू वही करेगी जो मैं कहूंगा …ज्यादा बकवास न कर ….’ और धनसुख बिलखती हुयी उषा को जमीन पर सर पटकता हुआ छोड़ दिया। फ़्लैट का दरवाज़ा खोलकर दुष्ट बाहर आ गया जहां बाहर एक आसामी पहले से ही इंतज़ार कर रहा था।
‘…हीं हीं …’ हँसते हुए , धनसुख लिफ्ट का बटन दबाकर बोला,’ सेठ , आज रूपया एडवांस ..और दरवाज़ा खुला है …आज सम्हाल के जाना ..अन्दर …लौन्डीया सती सावित्री नाटक के मूड़ मे है …’ सेठ ने पैसा पकडाया जिसे दबोचे हुए धनसुख , लिफ्ट मे बाय – बाय टा – टा बोलकर , हाथ हिलाता हुआ, नीचे उतर गया और सेठ दरवाज़ा ठेल के भीतर घुस आया।
यह बरसों पहले देखे दृश्य को दुबारा दुःस्वप्न में देखते हुए मंजरी , सुबककर चीख उठी !…उसे अब ऐसा लगा मानों अनजान, दरिन्दे उस के कमरे के भीतर घुस रहे हैं और बोलियाँ लगा रहे हैं ! अमीरों की बैठक मे उसका दलाल बाप धनसुख मंजरी को भी भरे बाज़ार नीलाम कर रहा है !…लोग शराब का जाम थामे लडखडा रहे हैं और उसके मुख से यह काल्पनिक दृश्य को सोचते हुए, देखते हुए दिल दहलाने वाली चीख निकल गयी और उसी पल उसे कल्पना के भयानक स्वप्न में ‘ देवा ‘ दरवाज़े के पास दीखलाई दिया तो उसने अपने हाथ उठाकर देवा के सामने बिनती करते हुए , अपने हाथ फैला दीये और चिखी ‘ बचाओ …’
मंजरी चीख रही थी और उसका सपना टूट गया और नींद टूटते ही उसने सुना , कोइ उसके कमरे का दरवाजा बेतहाशा पीट रहा है।
वही था – उसका बाप , धनसुख ! वह बाहर से दरवाजा पीट कर बडबडा रहा था,“ क्या हुआ मरी को …चुप मर ..सारा नशा उतर गया ….”
मंजरी अपनी सांस रोके , बिस्तर पर , नवजात शिशु की तरह सिकुड़कर सिमट गयी उसका मुख सूख गया था। पसीना पसीना हो गयी वो ! तब अपने कमरे के अन्धकार मे उसने अपनी आँखें चारों तरफ घुमाईं और वहीं पर लेटे हुए सोचने लगी,” अभी तो मैं सुरक्षित हूँ ! ये मैं ने एक ..बुरा सपना देखा ! पर मेरी मा का सच भी शामिल था इस बुरे सपने मे ! मेरे भविष्य मे भी मा की तरह , हो सकता है …हाय , मैं क्या करूं ? ” वह अब चौकन्नी हो कर उठकर बैठ गयी।
उस सुबह तक वह थकी थकी उठी थी। आगे क्या होगा इस की चिंता उसे परेशान करने लगी और वह अपनी उदास आँखों से अपनी खिड़की पर खड़े हुए, समंदर को देखने की कोशिश मे सुबह का इंतज़ार करने लगी।
सूरज की पहली किरण आकाश पर देखते ही उसने देखा वही लड़का जिसने , उसकी जान बचाई थी वो भी रेत पर आकर टहल रहा है। वो भी बड़ी सुबह उठ गया था। उसे वहां खड़े देखकर मंजरी को सूझा कि वो भी जल्दी से समदर के किनारे पर चली जाए।
मंजरी ने मशीन की तरह , टी – शर्ट और जींस पहनी , ऊपर एक हल्की मलमल की शर्ट भी पहन ली और अपने टेनिस के जूते पहनकर चुपचाप फ्लैट से बाहर निकल आयी। बाहर आकर उसने , खुली सांस ली।
मन मे सोचा,’ आज लिफ्ट का इंतज़ार नहीं करती ..सातवीं मंजिल तक आते बड़ी देर हो जाती है ,’ उसने सोचा और फूर्ती से सीढियां उतरती हुई मंजरी नीचे दौडती हुई समंदर के किनारे पहुँच गयी।
देवा को देख उसने पुकारा, ‘ सुनो …’ देवा ने घूमकर सुबह के उजाले मे उसे अपनी ओर आते हुए देखा तो वह ठिठक कर वहीं खडा हो गया।
मंजरी उसके पास पहुँची और कहा, ‘ कल आपको थैंक्स नहीं कह पायी …आज कहे देती हूँ ..मेनी मेनी थैंक्स फॉर सेविंग माई लाईफ ‘ …
‘ कोइ बात नहीं ये तो मेरा काम है ‘ देवा ने आहिस्ता से नर्म पड़ते हुए कहा …
अब वह उस लडकी को देख रहा था ..बड़ी भोली सी प्यारी शकल थी इसकी उसने सोचा …’ क्यूट ‘
‘ मैं सामने के ‘ सी – बर्ड ‘ बिल्डिंग मे रहती हूँ …तुम्हें अकसर देखा है यहीं …’
मंजरी ने कहा तो देवा को आश्चर्य हुआ …’ अच्छा ? अपुन का तो , सारा ज़िन्दगी इसी दरया किनारे गुजरा है …’ देवा बोला ‘ और मैं इधर लाईफ गार्ड के ड्यूटी पे रहता हूँ तो देखा होगा ‘ उसने समझाते हुए कहा। अब मंजरी ने पूछ लिया ‘ तुम रहते कहाँ हो ? ‘ ” कौन मैं ? ‘ उसने हाथ के इशारे से बस्ती की ओर इशारा किया ‘ उध र….है अपुना ठिकाना …बस्ती मे …”
‘ ओके ‘..मंजरी ने कहा …’ अकेले रहते हो ‘ अब उसने आगे पूछा तो देवा मुस्कुराया बोला ‘ बाबा है न मेरा उसके साथ रहता हूँ ! ‘
” अच्छा ! तो कभी मिलवाओ न उनसे भी …” मंजरी ने कहा फिर जोड़ दिया , ‘ उनको भी देखा है ..लम्बे से हैं न , यहीं से नाव लेकर जाते देख लिया है कई बार …फिर आगे पूछा , ‘ तो तुम्हारी मा नहीं हैं ? ‘उसने फिर सवाल किया।
अब देवा कुछ झिझका …पर साफ़ दिल का देवा किसी से झूठ क्यूँ बोलता ! और फिर इस लडकी से तो वो , कभी झूठ न कह पाता …
देवा का चेहरा संजीदा हो गया उसने कहा,’ मा ! अरे … अपुन, अनाथ है ! …बाबा को मैं यहीं किनारे पर एक ‘रोक’ – पत्थ्थर पे पडा मिला था , उन्हींने अपुन को आज इस लायक बनाया है। मा को तो मैंने देखा ही नहीं ‘… और उसकी आवाज मे उदासी लहरा गयी तो मंजरी ने देवा की बांह को आहिस्ता से छू लिया। देवा ने मंजरी की कोमल हथेली का स्पर्श अनुभव किया तो दूर कर लिया अपने को …
‘ ओओह …आई एम सोरी …तुम्हे सैड नहीं करने का इरादा था मेरा। ऐसे ही पूछ लिया था , अब तो बाबा से मिलना चाहूंगी …बड़े भले होंगें तुम्हारे बाबा …’
मंजरी ने कहा तो देवा भी खुश हो गया। ‘ अपुन को लोग ‘ देवा ‘ बुलाते हैं पर मेरा भगवान् तो बाबा है। वो न होते तो अपुन कब का खल्लास हो गयला होता ..’ देवा बोला। फिर कुछ मुस्कुरा के अचानक कुछ याद आया हो , ऐसे कहा,’ अभी मेरा ड्यूटी शुरू होने मे टाईम है। बाबा कोफी बना रहा होगा अगर …कोफी पी ना हो तो चलो …बाबा को मिलोगी ? ‘
मंजरी फ़ौरन राजी हो गयी और दोनों एक साथ चल पड़े। बाबा के घर की ओर …..देवा को इस तरह मंजरी के साथ , बाबा के घर की ओर जना बड़ा नोर्मल लग रहा था।
बाबा अपनी कोफी लेकर , ड्रुम नुमा टेबुल पे रख कर अपनी लम्बी सी बाम्बू की कुर्सी पे बैठ ही रहे थे कि देवा ने दरवाजा ठेला और भीतर आकर बोला
‘ बाबा ! ये वही लडकी है जिसका जान अपुन ने बचाया ….’
बाबा ने ऊपर देखा तो देखते रह गये ! सुन्दर , भोली इस छोटी कन्या को देख कर आज उन्हें अपनी मधु याद आ गयी !
वे बोले,’ आओ बेटी , क्या नाम है तुम्हारा ? ” जी मंजरी …”उसने कुछ शरमाकर कहा तो मानो मंजीर बज उठे …
‘ लवली नेम, प्रीटी गर्ल ‘ बाबा ने तारीफ़ की तो मंजरी, नीचे देखकर मुस्कुराई ..
‘ अरे आ जाओ भीतर …अपना ही घर समझो …’ मी कासा सु कासा ..माई होम इझ योर होम ‘ बाबा ने कहा …
अब देवा ने कहा’ बाबा अपुन को मेडम का नाम अबी च मालूम हुआ ! तो मंजरी मेडम , कॉफी पियोगी न ? ‘
‘ हां हां …पिएगी कॉफी हमारी बेटी ‘ बाबा ने कहा। देवा किचन मे जाकर २ नेस कोफी बनाकर ले आया। तो तीनो चुस्की ले, कोफी पीने लगे।
बाबा की सहानुभूति और प्यार भरे व्यवहार से आश्वस्त मंजरी ने धीरे से अपने मन की बातें कहना शुरू किया। बहुत कुछ छिपाया भी, पर बाबा ने फ़ौरन यह समझ लिया कि यह लडकी अकेली है और डरी हुई है।
बाबा से फिर मिलने का वादा कर मंजरी उस दिन चली गयी पर बाबा के मन मे अपने लिए एक चिंता और बहुत सा आदर उनसे पाकर ही अपने घर , अपनी ज़िन्दगी मे लौटी। बाबा ने बहुत दुनिया देखी थी और उनकी अभ्यस्त आँखों ने मंजरी का दुःख पहचान लिया था।
रही सही खबर, उन्होंने आस पास के लोगों से जान लीं। नुक्कड पे , पान की दूकान चालाता वीरू , हर आने जाने वालों की खबर रखता था। कई सारे लोग उसी से पान बंधवाकर , अपनी बातें करते और वह सब की बातें सुनता। बाबा को उसी ने बतलाया के,” मंजरी की एक बहन सबसे बड़ी , स्वाती – उस के बाद , रूपाली उर्फ – रूबी फिर मंजरी ….३ बहनें हैं ये …बड़ी , एक टेक्सी वाले के संग भाग गयी थी। कभी आ जाती है । खासकर जब इन लड़कियों का बाप जिसका ‘ नाम है धनसुख सेठ ‘ वह दुष्ट कहीं बाहर गया हो तभी बड़ी लड़की स्वाती आती है और अपनी छोटी बहन मंजरी से मिलकर , चली जाती है।
स्वाती के बच्चे भी हैं। एक लड़का – एक लडकी ! धंधे से , तंग आकर इस स्वाती ने घर से भाग कर एक टैक्सीवाले से शादी कर ली थी ! टेक्सीवाला बड़े दिलवाला था और पहलवान किस्म का था ! धनसुख ने टैक्सीवाले के साथ खूब गाली गलौज की थी ! पर , स्वाती को उसका नीच बाप, दुबारा चंगुल मे ला न पाया। वो निकल गयी थी ! पापी और नीच धनसुख के हाथ से अपनी जान छुड़वा कर ही तो भागी थी स्वाती ! अपनी गृहस्थी आबाद कर ने ! अब कुछ गरीबी मे जीवन बिता रही है फिर भी अच्छा ही हुआ ! ऊपर से मुस्कुराती है पर आँखों मे आंसू रहते हैं ! ” पानवाले वीरू ने पूरा कच्चा चिठ्ठा खोल दिया।
स्वाती दीदी अकसर मंजरी से कहती ,’ गरीबी लाख बुरी पर इस खराब काम से लाख दर्जे अच्छी है ‘ चुपके से मंजरी से सावधान होने को कहा करती और कहती,’ भाग जा। घर छोड़ के दूर चली जा। मेरी चिडीया है रे , उड़ जा …उड़ जा ‘
मंजरी दीदी के गले लग कर रोती और पूछती , ‘ दीदी ! मैं नन्ही सी जान अकेली इस दुनिया मे कहाँ जाऊं ? आप तो जीजा के संग चलें गये पीछे पापा ने हमे कैद ही कर लिया था फिर रूपा दी की स्कूल छुडवा दी ….वो अजीब मेक अप करने लगी ..पापा उसे लेकर , रोज कहीं जाने लगे …रूपा दी , शराब भी पीने लगी। दोनों रात भर बाहर रहने लगे , देरी से घर आने लगे …. मुझे ये सब देखकर बहुत गुस्स्सा आता है , डरती भी हूँ …’
स्वाती ने गहरी सांस लेते हुए मंजरी को अपनी छाती से चिपटा लिया, बोली ,’ बेचारी रूपाली …रूबी बना कर , उसे , अपने इशारों पे नाचा रहा है हाय हाय ….ये कैसा बाप हमारे नसीब मे लिखा है …’ फिर आंसू पोंछ कर स्वाती दीदी ने उसे समझाया ,’ तू , रूपाली की बातों पर ध्यान न दे … जैसे मैं सीखाती हूँ उसे सुन ! ध्यान से सुन ..समय ज्यादा नहीं है ..मैं फिर आऊँगी ..जैसे ही वो लोग जाएँ टप्प से फोन कर देना, मैं , फिर आ जाऊंगी , कई बार आऊँगी तुझ से मिलने .. समझ गयी ? और चिंता मत कर ! मैं, अपने घर ले जाऊं पर पापा और उनके गुंडे वहां तक आ पहुंचेंगे हमे होंशियारी से काम करना है , मैं तुझे बचाऊँगी … तू, चिंता न कर मेरी नन्ही चिडीया ! ”
दीदी , चली जातीं ! इसी तरह आतीं और उसे कहीं मिलने बुला लेतीं ….
बाबा से मिलने एक दिन मंजरी अकेली आयी तो बाबा ने पूछ लिया ,’ कौन कौन हैं तुम्हारे परिवार मे ? ‘
मंजरी ने कहा,’ एक दीदी है रूबी — वैसे रूपाली नाम था पर उसे ये रूबी नाम पसंद है ..बड़ी दीदी की शादी हो गयी है। लड़का ६ साल का है सोनू और डोली अभी २ १/ २ की है। मेरे जीजाजी लक्ष्मणराव जाधव बड़े अच्छे हैं। दीदी , मलाड रहतीं हैं ..और पापा है ….धनसुख पंचोली और मैं और हां हमारा नेपाली नौकर बहादुर भी है ..बस — ‘
बाबा ने मंजरी को बहुत हिम्मत देते हुए कहा,’ स्कूल मे खूब मेहनत करना – कोई भी काम हो ना बेटी , हमारा घर खुला है ..’
‘ जी थेंक्यू बाबा …’ फिर एकदम से बोली ,’ बाबा , आपका नाम क्या है ? बाबा तो सब कहते हैं …पर ..’
बाबा हँसे ,’ अरे , मैं भी भूल गया हूँ अपना नाम ! सब मुझे ‘ बाबा ‘ ही कहते हैं न, एक ज़माना हुआ कोइ मुझे ‘ किशन ‘ कहा करता था — ‘
‘ कौन कहता था किशन ? ‘ मंजरी से पूछे बिना रहा न गया ..’ बाबा, कहीये न , ‘ उसने ठुनकते हुए कहा …
बाबा ने उसके गालों को आहिस्ता से छूकर कहा,’ आज नहीं , किसी दिन देवा भी होगा तब सुनाऊंगा किशन की कहानी , वादा रहा ! ‘
‘ पक्का वादा ? है न बाबा ! मैं भूलनेवाली नहीं ….याद रखना …’ मंजरी ने कहा
फिर कहा,’ बाबा अब चलूँ …शाम होने आयी है , पापा नाराज़ होंगें …’
‘ हां जा बेटी , चल मैं छोड़ आऊँ तुझे ? ‘ उन्होंने पूछा तो मंजरी ने सर हिलाकर मना किया और भागी बाहर को — बाबा उसे देखते रहे।
रूबी ‘ कोल – गर्ल ‘ है। जिस्म का व्यापार , दुनिया का सबसे पुराना धंधा है। ये पेशा, इंसानियत का अभिशाप होते हुए भी दुनिया मे बसा कोइ भी मानव समाज इस से अछूता नहीं रह पाया ! हम कहते हैं , अरे ~यह कैसी स्थिति है दुनिया मे रहते इंसान की जहां इंसान इतना नीचे गिर जाता है जिसके बारे मे सुनकर भी शर्म महसूस हो ! क्या सिर्फ पुरुष वर्ग ही इस स्थिति के लिए जिम्मेदार है ? स्त्री का कोइ कसूर नहीं ? अच्छाई और बुराई , दुर्गुण और सद`गुण ये भी इंसान के जहान से ही उठते हैं न !
रूबी के मन मे , बुराई ही ज्यादा रही तभी तो उसने , अपने दुराचारी पिता धनसुख सेठ के कहने मे आकर , वेश्यावृति को सहजता से अपना लिया था। रूबी सज धज के रहती। टीप टॉप ! उसके यार , सारे ही, बुरे धन्दों से जुड़े हुए थे। कोइ समंदर मार्ग से सोने की तस्करी करता तो कोइ देसी दारू की भट्ठीयाँ चलाता, या , शराब का वितरण करता या धौंस जमाकर , गरीब और लाचार बस्ती के लोगों से , जबरन पैसा उगलवाता।
‘ बात बात पे ‘ अबे चल निकाल रूपया …’ यही उनके मुंह से निकलता …और अगर ज़रा भी आनाकानी होती तो सामने विरोध करनेवालों के हाथ पाँव तोड़ दीये जाते किसी का झोम्पडा जला कर राख कर दिया जाता। बस्ती मे आने – जाने वालों को डरा धमकाकर , हर बात मनवाई जाती और म्युनिसिपल पानी के नल के आगे , खड़े होकर , वहां पानी भरने आनेवाली बेचारी गरीब औरतों को तंग करना भी इनका रोज का काम था। राक्षस ही थे ये !
जुआघर, अफीम खाना , शराब पीने के बार और दुकानें , ये भी इनके अड्डे थे. जहां उन्हीं के जैसे और दुसरे लोग भी आकर , मुश्किल से मिला थोड़ा सा पैसा , खो देते। कई गरीब स्त्रियाँ दिन रात , चौका बर्तन कर जो भी कमातीं या मछली बेचकर जो मिलता उनमे से कईयों के पति , उन स्त्रियों को मार पीट कर, उनसे वो पैसा छीन लेते और आ कर शराब या जुए मे फूंक देते ! ये सब तो आये दिन यहां होता ही रहता था। शहर के कई धनिक भी उस बस्ती मे आते थे। वे , व्याभिचारी सेठ लोग भी आकर अपने दुर्व्यसनों को यहां की गंदगी मे खुला कर देते, रोज के ग्राहक थे।
रूबी, इस बाज़ार मे नयी नयी चिरैया कहलाती थी और मशहूर थी। बाज़ार के , गुंडे बदमाश, रूबी के इशारों पर चाकू छूरी निकालकर भीड़ जाते। बंदूकें पिस्तोल भी चल जातीं खून खराबा होता और लाशों को दरिया मे पत्थर बांधकर फेंक कर ठिकाने लगा दिया जाता था और ऐसी हरकतों से , रूबी का दबदबा दिनोंदिन बढता रहता। रूबी बड़ी बड़ी एयरकंडीशन गाडीयों मे घूमती ! फाईव स्टार होटलों मे उसके लिए कमरे तय रहते जहां वो अपने ग्राहक से मिला करती। धनसुख भी साथ रहता। होटल की लाऊंज मे बैठकर या बार मे महंगे शराब के जाम पीकर नये ग्राहक पकड़ता। रूबी की पर्स मे पैसा भरा रहता। धनसुख जानता है ये कमाऊ गैया है तो उसे भी खुश रखना कितना उसीके लिए फायदेमंद है ये बात वो अपने हित के लिए खूब जानता है। शातिर इंसान क्या नहीं सोचता ?
रूबी घर से इठलाकर निकलती और मंजरी को ‘ लिटल बर्डी ‘ कहती। ‘ छोटी चिडीया ‘ !! कभी मुस्कुराती तो मंजरी को उस के पीछे छिपी उदासी भी दीख जाती। मंजरी स्वाती दीदी को भी उतना ही प्यार करती जितना रूपाली को और उसका नन्हा सा दिल अपनी बहनों के भविष्य के बारे मे सोच सोच कर कांपता रहता ! अपने बारे मे सोचती तो उसे कोइ रास्ता न सूझता पर कोशिश जारी थी , उसे यहां से बच निकलना ही था।
ये बात उसने गाँठ बाँध कर मन मे , छिपाए रखी थी। मंजरी सोचती, क्या गंदगी और गरीबी ही जिंदगानी के २ पहलू हैं ? इसके अलावा क्या कोइ साफ़ सुथरी जिन्दगी नहीं जीता क्या ? क्या ऐसी कोइ जिंदगानी नहीं जहां अमन चैन हो ? ‘
उसने साफ़ और सुन्दर , लेटेस्ट स्टाईल के कपडे पहने , अमीर घरानों की कई लड़कियों को कोलेज जाते आते देखा है। बड़ी गाडीयों मे, वे भी घूमतीं हैं। मध्य वर्ग की लडकियां बस स्टॉप पे या पैदल या स्कूटर पर सवारी करतीं जाती हुईं भी वो देखती है। उन्हें देख , उनके चेहरे पर छायी शांति और खुशी देख वो सोचती,’ काश ! मैं भी किसी ऐसे घर पैदा हुयी होती तो कितना अच्छा होता! मैं भी भले घर की बेटी होती तो मेरा जीवन संवर जाता ! ‘
फिर सोचती, ‘ किसी गरीब से शादी करूंगी तो , बड़ी मुश्किलें झेलूंगी ….! ‘
तभी अचानक , ‘ देवा ‘ उसकी नज़रों के सामने खडा हो जाता ! मंजरी फिर अपने आप से कहती, ” ..हूंह ..देवा लाईफ गार्ड है, गरीब लड़का है …अरे पर मैं उसके बारे मे क्यों सोच रही हूँ ? ” उसे आश्चर्य होता अपने आप पर ! क्यों उसे बार बार देवा याद आ जाता है ? मुझे उससे क्या लेना देना ! वह अपने आप पर खीज कर सोचती …फिर अपने को समझाती’ अभी मेरे पास सोच समझ कर अपनी जिन्दगी को संवारने के लिए , थोड़ा समय है …देखूंगी, आगे क्या होता है ! ‘और वह अपने स्कूल का काम मन लगाकर करती अच्छे नम्बरों से हर साल पास हो रही थी।
मंजरी को जब भी समय मिलता वह सागर किनारे टहलने अवश्य पहुँच जाती। न जाने कौन सी अद्रश्य डोर उसे वहीं खींच कर ले जाती।
कई बार ‘ देवा ‘ उस के नजदीक आकर कुछ बात करता ओ वह अनसुना कर चल देती। देवा ने पूछा था,’ अब कैसी है तबियत तुम्हारी ? ‘उसने तुनककर पलटकर जवाब दिया,’ क्या हुआ है मेरी तबियत को ? अच्छी भली तो हूँ ! ‘
‘ चल पड़े गर्दन और सीना तान के ….मेंम सा’ब ‘ ..देवा ने पीछे से आवाज़ लगायी पर मंजरी रूकी नहीं …न जाने भले और भोले देवा का अपमान कर या उसे परशान कर मंजरी को क्या मजा आता था पर वह ऐसे ही पेश आती और आती और चली जाती।
एक शाम कोलेज के कई सारे जवान लड़के और कुछ लडकियां, समंदर किनारे , पिक निक मनाने आये। पहले सोफ्ट बोल का खेल हुआ। नेट के दोनों तरफ लड़के और लड़कियों की टीम के बीच , जमकर मुकाबला हुआ। जिसे देखने सैलानियों की भीड़ इकटठा हो गयी ! शाम के धुंधलके मे रेत पर दरियां बिछायीं गयीं और तरह तरह के खाने की चीजें परोसीं गयीं जिसमे समोसे , छोले भठूरे , चटनी , सलाद , सेंडवीचीज़ , पेस्ट्री , कोल्ड ड्रिंक्स , बीयर सब कुछ था। खाना खाने के बाद , वहीं रेत पर वे सुस्ताने लगे तो किसी ने गिटार निकाल कर बजाना शुरू किया तो मस्ती का आलम बिखर गया। मंद मंद समाँ, पैर थिरकने लगे, गलों मे बाँहें झूलने लगीं तो एक सर्कल के बीच मे आग जलाई गयी।
देवा भी वहाँ पहुँच कर सब देख रहा था और मंजरी भी आज कौतुहल से ये नज़ारा देख रही थी। कयी बार दोनों की आँखें टकरायीं और फिर उन्होंने नज़रें , फेर लीं …तरसतीं रहीं आँखें और सागर का संगीत, गिटार से उठते स्वरों के साथ घुलमिल कर बहता रहा। कई गीत गाये गये और जवाँ दिलों की हसरतों को जबान देते रहे। देवा और मंजरी के जीवन का अकेलापन और उस मे बसा खालीपन , आज सागर – संगीत भर रहा था। उस शाम मंजरी को लगा मानो वह किसी सपनों सी दुनिया मे सैर कर रही थी। देवा उस शाम अपने मन मे छिपी बात को पहचानने लगा था। ” हां, उसे मंजरी से प्यार हो गया था ! शायद मंजरी ये न समझी पर मैं समझ गया हूँ ”
वो सोच रहा था और केम्प फायर की आग के सामने , रात्रि के घिरते अन्धकार के बीच मे खडी मंजरी का चेहरा , उसे इतना सुन्दर कभी नहीं लगा था। देवा का दिल उस वक्त पिघल कर , बहने लगा। खून गर्म हो कर दौड़ने लगा और उसने अपनी हथेली कस के , भींच लीं !
देवा के दिल ने कहा,’ इस लडकी के लिए मैं मर मिटने को तैयार हूँ ….मैं उसे बेइन्तहा प्यार करने लगा हूँ …मैं जानता हूँ ये बड़ी भोली है नादान है …इसकी हिफाजत करूंगा …भले वो मुझसे गुस्स्से से बोले , मैं जानता हूँ अगर मैं इसे प्यार करता हूँ तो इसके दिल मे भी मेरे लिए प्यार होगा …ये जानती नहीं ….किसी दिन समझेगी मुझे भरोसा है …’
वहां भीड़ मे शामिल , कुछ मवाली लड़कों की नज़रें भी मंजरी पर टिकी हुईं थीं। मंजरी को सहसा ख्याल आया के कॉफी देर हो चुकी है उसने अपने घर की ओर चलना शुरू किया तो वो लड़के भी उसके पीछे लग गये। देवा ये देख रहा था तो आकर पहाड़ की तरह उनके सामने खडा हो गया। मंजरी ने ये पीछे मुड कर देखा तो देवा को अपनी रक्षा करते हुए देख उसे राहत हुई उसने हाथ हिलाकर आहिस्ता से ‘ थेंक यूं ‘ कहा और भागी अपने ‘ सी – बर्ड ‘ की चारदीवारों की तरफ !
मंजरी नहीं जानती पर देवा कई बार इसी तरह उसे गुंडों मवालियों से बचाने के लिए , लड़ चुका है ! सब कहते हैं,’ ये तो गुलाब का काँटा है ! तभी तो चुभता है ‘
कई बदमाश हँसते और कहते, ‘ आया देख रखवाला ! हां जो होता है कर ले अभी वो दिन दूर नहीं जब इस लौन्डीया का बाप ही इसे हमारे हवाले करेगा ! इसका बाप हमारे पास छोड़ जाएगा तो तू हाथ मलता रह जाएगा …” मंजरी ने एक बार ये ताने सुन लिए थे और वह कांप कर वहीं रूक गयी थी ! देवा का गुस्सा और उन बदमाश लडको पर बरसते देवा के घूंसे भी उस दिन मंजरी ने देख लिए तो उसे’ बाबा ‘ की याद आयी।
मंजरी के कदम, बाबा के घर की ओर मुड गये और वहां आकार ही ठहरे। बाबा ने उसे आते हुए , शायद देख लिया था तो वे दरवाजा खोलकर बाहर आ गये, मुस्कुरा के बोले,’ आज मेरी बेटी को बड़े दिनों के बाद , मेरी याद आयी है ..आओ मंजरी ..कैसी हो ? सब ठीक तो है न ? ”
बाबा ने प्यार से स्वागत किया और आत्मीयता से पूछा तो मंजरी के दिल की बातें बाहर आ गयीं। बोली ,’ बाबा ! आप से मिलने आ जाती हूँ जब जीने की राहों पर आगे का रास्ता नहीं सूझता ! बस तब आप ही याद आते हो ..’
‘ तो उस मे बुरा क्या है बता ! ‘ बाबा ने मुस्कुराते हुए कहा ‘ सही किया जो यहां चलीं आयीं ..आ भीतर चलें …बैठ कर मन की कह लें , सुन लें ‘ बाबा बोले और दरवाजा पूरा खोल दिया ताकि मंजरी भीतर आराम से प्रवेश कर सके।
मंजरी भीतर गयी तो बाबा ने बाहर से ऊंचे स्वर मे कहा ‘ लो देवा भे आ गया। चलो एक साथ कुछ पेट पूजा करें …क्या ख़ायेगी मेरी बेटी बता ….ओ देवा , ज़रा भाग के अपने ख़ास मेहमान के लिए बढीया मिठाई ले आ तो …हां हां , उसी दूकान से लाना , रसगुल्ले ले आ और सुन, समोसे भी और चटनी भी, पैसा तो ले जा ..’ देवा दाखिल हुआ , भीतर बाबा की संदूक खोल , पैसे लेकर फ़ौरन बाहर जाते हुए कहा, ” रूको मैं अभी आया …’
मंजरी की आनाकानी आज नहीं चली, तो वो भी चुपचाप इंतज़ार करने लगी
बाबा तश्तरीयाँ, प्लेट आदि टेबुल पर सजाने लगे तो मंजरी कीचन से एक शीशे के जग मे पीने का पानी और ३ गिलास ले आयी जिसे देख बाबा खुश हुए ,’ बोलते गये” थेंक यूं बेटे ‘ और हलके से सीटी बजाते कोइ धुन गाने लगे …..
देवा भी जल्दी ही लौट आया और सारी स्वादिष्ट चीजें खोलकर, सामने रख दीं। तीनों ने नाश्ता किया। यह सब कितना सहज और सुकून देनेवाला लग रहा था ये मंजरी ही नहीं देवा और बाबा भी सोच रहे थे।
हाथ धोकर बाबा ने अपना पाईप, तमाकू भर कर सुलगा लिया तो बढ़िया खुशबु हवा मे तैरने लगी। कश खेंच, बाबा ने पाईप को ड्रम वाले टेबुल पर रखी एश ट्रे पर सम्हाल के रख दिया और बहुत मीठी आवाज़ मे कहने लगे,
‘ आज दिन आ पहुंचा है जब तुम दोनों मेरे पास हो और मैं अपने बचपन के दिनों की कथा तुम्हें सुनाना चाहता हूँ …सुनोगे न ? ‘
‘ हां बाबा , आज मेरे पापा और रूपा दीदी बाहर गये हैं, कोइ डांटने वाला नहीं …आज मैं सुनूंगी आपकी कहानी …बताईये ..’ मंजरी इतना कहकर, बाबा के पैरों तले कारपेट पर बैठ गयी तो बाबा ने उसे हाथों से उठाकर आराम से , सोफे पे बिठाल दिया कहा, ‘ मेरे बेटी आराम से बैठेगी ..आराम से सुनोगी तो ध्यान से सुनोगी। आ देवा , तू भी तो आ न …’ बाबा ने देवा के बालों को प्यार से सहलाया और उसे भी नज़दीक रखी कुर्सी पे बैठाल दिया। कुछ देर कमरे मे निस्तब्धता छायी रही ऐसा लगा मानो बाबा अपने अतीत मे खो गये हैं।
‘ मंजरी ! तुम्हें पहली बार देखा था उस दिन मुझे मधु की बड़ी याद आयी थी। मेरे गाँव की लड़के थी मधु ! गाँव था चंद्रपुर ! जहां महाकाली का मंदिर था और महादेव को हम अनच्लेश्वर महादेव कहते थे।
हमारी बोली वैदर्भी है। इराई नदी के तट पर बसा ये नगर ग्राम, वर्धा नदी से कुछ दूरी पर है। पुरखे कहते थे इसका पुराना नाम लोकपुर था। बहुत समय पहले , उसे इंद्रपुर भी कहते थे ! खैर ! वैरंगद , कोसला , भद्रावती और मार्कंड ये भी आस पास हैं। पास का …गद्चोरोली ग्राम, ब्रह्मपुरी की ज़मींदारी बनी तब से ही चला था। अब हम , क्या जाने क्या उसका असली नाम था ! पर , मैं तो उसे चन्द्रपुर मे नाम से ही पहचानता हूँ।