ललितः बस थोड़ा और- मनीषा परिहार / लेखनी मई-जून 16

बस थोड़ा और
seaside
थोड़ा विचित्र है, पर इस सवभाव से लगभग पूरी मानव जाति सुसज्जित है । भले ही पेट भरा हुआ क्यों ना हो परन्तु अगर दुसरे की थाली में कोई पसंदीदा मिठाई दिख जाये तो ना जाने क्यों पर यह कम्भख्त जीभ फिर से लपलपाने लगती है। उस दिन कुछ ऐसा ही हुआ , मगर इस बार 45 मिनट की वो छोटी सी मुलाकात मुझे मेरी जिंदिगी, मेरी पहचान से रूबरू करा बैठी।
अपने 6 साल बेटे को पार्क में खिलाने ले गयी थी में उस रोज़ , जहाँ मेरी मुलाकत हुई रेणुका शर्मा से और कुछ देर बात करने के बाद हम में अच्छी जान पहचान भी हो गयी , उसका कारण था हमारा एक ही यूनिवर्सिटी से होना ,फर्क बस इतना था की वो आज भी नौकरी कर रही थी और में नौकरी की तलाश। हमारी उम्र में भी कम से कम १५ साल का अंतर जरूर रहा होगा , मगर बाते यूँ हो रही थी की मनो किसी हमउम्र से अपना दिल सुना रही हुँ। और शायद यहीं कारण रहा होगा की उनसे मिलकर बहुत अच्छा लग रहा था। वो एक कहावत है ना की पानी की प्यास कितने भी मीठे शरबत से नहीं भूजाई जा सकती है ,परदेश में किसी देसी का मिलना भी उस एहसास से कम नहीं होता है। जैसे -जैसे उन्होंने अपने बारे में बतलाया मेरा उनसे प्रभावित होना स्वाभिक था। इकलौता बेटा मेलबोर्न से इंजीनियरिंग कर रहा था ,पति देव अमरीका में साइंटिस्ट थे ,और खुद तो वह मलेशिया के सबसे बड़े बैंक की कॉर्पोरेट हेड थी। उनके बारे में जानकर बस एक ही शब्द आया जुबान पर “वाओ” ……. आप तो ग्रेट हो ,पूरी लाइफ सेट है आपकी और फैमिली की साथ करिअर भी काफी अच्छा संभाल रखा है आपने। में उनकी तारीफ किये जा रही थी और वोह चुप -चाप सुने जा रही थी जैसे की उनको इन बातो से कोई फर्क ही नहीं पड़ता ,मेने भी सोचा ठीक ही है भाई इतने कामयाब लोगों को तो आदद पड़ गयी होगी तारीफ सुनाने की। बात आगे बढ़ती की पसीने में लटपट मेरा बेटा भागते हुए आया और मेरे पास पड़ी बोतल से घट-घट पानी पीने लगा और उसका माथा पोछते हुए मेने कहाँ “आराम से राजकुमार पानी गले में अटक जायेगा तो ख़ासी आएगी”। …..
रेणुका शर्मा : राजकुमार नाम है तुम्हारे बेटे का ?
नहीं -नहीं नाम तो शौर्य है पर मेरा तो राजकुमार ही है ना, अब देखिये इतना बड़ा हो गया है पर आज भी पार्क मेरे बिना नहीं आता है ऐसा नहीं है की डरता है पर बोलता है की माँ तुम होती हो तो अच्छा लगता है ,भगवान जाने क्या अच्छा लगता है, मेरी बात सुनकर वो मुस्कुराने तो लगी मगर उनकी गुमसुम आँखो कभी मुझे तो कभी शौर्य को निहारती रही। पता नहीं क्या तलाश रही थी वो आँखे ,मनो कुछ कुछ भुला बिसरा ढूढ़ रही हो।
शौर्य की जाने की बाद में बोतल बंद कर रही थी की उन्होंने बात को आगे बढ़ाते हुए पुछा तुम क्या करती हो मनीषा ?
अब इतने प्रभावशाली परिचय की बाद अपने बारे में क्या बोलू यहीं सोच रही थी की उन्होंने मेरी उलझन को सुलझाने के अचूक प्रयास को करते हुए बोला की क्या बेतुका सा सवाल है ना, इतना प्यरा बच्चा है ,सारा दिन तो उसी साथ निकल जाता होगा। बोल तो वह सच ही रही थी पर उनकी बात मुझे एक ताने की भांति चूभ रही थी । पता नहीं ऐसा सब जगह होता है या हमारे देश की औरतो को ही इसका कॉपीराइट है की अगर कभी किसी भी कारणवश किसी पढ़ी लिखी लड़की को नौकरी छोड़ कर घर बैठना पड़े तो एक अज़ीब सी आत्मगिलानी के साथ वह जीने लगती है जैसे पता नहीं क्या पाप किया हो उसने और जब भी किसी सफल और कामकाजी महिला से मिलती है तो बस शुरू कर देती है रेडियो अपनी सफलताओं का और मजबूरियों का, की क्यों वो घर पर है। उस दिन में भी इसी तरह का क्लैरिफिकेशन देते हुए बोली :नहीं नहीं में एक जियोलॉजिस्ट हु ,IIT रूर्की से M.tech किया है,११ साल का एक्सपिरेन्स है वह तो फैमिली के कारण छोड़ना पड़ा वरना काफी ब्राइट थी में भी , और रही बात नौकरी की तो वो में ढूढ़ रही हुँ । पर यहाँ मलयसिा में डिपेंडेंट पास पर जॉब मिलना इतना आसान नहीं होता है आप तो जानती होगी ना फिर मेरी किस्मत भी आपकी तरह नहीं की जहाँ जाऊ आराम से जॉब मिल जाये पर कोशिश जारी है। मेने अपनी सफाई खत्म ही नहीं की थी की मेरे कंधे पर हाँथ रखकर उन्होंने बोला,तुम नौकरी से भी बेहतर काम कर रही हो ,खुशियाँ कमा रही हो ,किसी बेबुन्यादि पहचान के लिए अपनी असल पहचान मत खोना। तुम्हारे दफ़्तर नहीं जाने से दफ़्तर बंद नहीं होगा पर तुम्हारे ना होने तुम्हारे राजकुमार को जरूर फर्क पड़ेगा ,यह मेरा अनुभव है।एक अलग सा दार्द था उस आवाज में ,मनो और दो शब्द बोलती तो आँखे अपनी सीमाये भूल कर बरसात की झरी लगा देती। अब कंधे पर हाथ रखने की बारी मेरी थी…. मेने चाहा की वोह खुद को संभाले पर मेरी कोशिश नाकामयाब रही और कुछ बूंदे झलक ही पड़ी पलकों से। वैसे ठीक ही हुआ ,जो दर्द जुबान पर नहीं आ पाते उनको आँसुओ के रास्ते निकाल पाना आसान होता है।
जिंदिगी में कुछ भी अकारण नहीं होता। हर घटना के पीछे एक रहस्य ,एक सिख छुपी होती है ,जो हम सिर्फ उसके घटने के पश्चात ही समझ पाते है। मिलने को तो हम ना जाने कितने लोगो से अक्सर मिलते रहते है मगर कभी कभी किसी अजनबी से हुई एक छोटी सी मुलाक़ात आपकी जिंदिगी को क्या मोड़ दे दे इसका सही अंदाज़ा भी अकसर हम मुलाकात के बाद ही लगा पाते है।
फिर भी खुद को सँभालते हुए ,जूठी हँसी को अपने चेहरे पर बेतुके मेकअप के तरह लगाने की उनकी कोशिश हार रही थी। मौहोल को थोड़ा बदलने के प्रयास में मने उनको ऊपर घर चाय पर चलने के लिए कहा और उन्होंने भी झट से हाँ कर दी और हमारे साथ ऊपर चली आई।
में उनके लिए चाय बना रही थी और वह स्टडी में पड़ी कुछ किताबों के साथ अपना वक़्त बिताने की कोशिश कर रही थी। मुझे थो पता भी नहीं चला की कब उन्होंने मेरे एक पुरानी डायरी की कुछ पन्ने पढ़ लिए और अचानक से बोल पड़ी मुझे नहीं मालूम था की विज्ञानं भी शब्दों की गहराई को नापता है। में तो समझती थी की तुम जियोलॉजिस्ट लोग सिर्फ तेल की कुएं के ही गहराई जानते होगे। उनकी बाते सुन कर में समझ गयी थी की उन्होंने शायद मेरी कोई कविता पढ़ ली है और गैस की आँच काम करके में स्टडी के तरफ भागी और अपनी डयरी उनसे लेते हुए बोली ” खली समय किसी तरह तो बिताना है ना तो बस थोड़ा बहुत लिख कर अपना मन बहला लेती हुँ ” मेरी बात को बीच में रोकते हुए उन्होंने बोला की अपना दर्द बताना हर किसी के बस की बात नहीं और ना अपना दर्द छुपाना ठीक होता है, नहीं तो वो नासूर बन जाता है । अच्छा है की तुम अपनी मन की बात काम से काम किसी तरीके से तो अपने मन से बहार ला पति हो। बस मन से निकालकर यह भावनाये इस डयरी में कैद हो गयी है। इनको आज़ाद कर दो। हवा दो अपने शब्दों को वरना यह यही इस डयरी में अपनी साँसे तोड़ देंगे। तुम बहुत खुशनसीब हो जो वक़्त ने तुमको वक़्त दिया है खुद को निहारने का , पहचानो अपनी असली खूबसूरती को। अब तक की नौकरी तुमको पैसे कमा कर दे रही थी अब जिंदिगी ने तुमको मौका दिया है सुकून कमाने का ,इसे खो मत देना।

तुमसे उम्र और तजुर्बे में बड़ी हुँ इसलिए बोल सकती हुँ की बिज़नेस टारगेट की जगह जो तुमने इन नन्ही खिलकारी को दी है वह कभी बेकार नहीं जाएगी मगर हाँ इन पलो को अगर युहीं कोसती रही तो यह अनमोल लम्हे रेत की तरह फिसल जायेगे और तुमको पता भी नहीं चलेगा।

भले ही हम कितना भी नाम और पैसा क्यों ना कमा ले मगर सुकून तो घर लौट कर ही मिलता है ना ,लेकिन घर अगर खली हो तो वहाँ सुकून नहीं बल्कि सिर्फ झलझलाहट ही मिलेगी । अपने घर को कभी खाली मत होने देना ,रही बात नौकरी की, वो तो तुम काबिल हो जब चाहोगी कर लेना मगर इस वक़्त तुम्हारी जरुरत तुम्हारे बेटे को दुनियाँ की किसी भी आर्गेनाईजेशन से ज्यादा है। अपने रुके कदमों को कोसो मत यह एक क़यामयब परवरिश के लिए रुके है और किसी का रुकना उसकी रफ़्तार तो तय नहीं कर सकता।
हम अपनी अपनी जिंदिगी में इतना उलझ जाते है की अपने उन शौकों की भी बलि चढ़ा देते है जो कभी हमारे जीवन का एक जरूरी हिस्सा रही थी । जैसे तुमको लिखने का शौक है वैसे मुझे गाने का था मगर कभी वक़्त ही नहीं मिला अपने शौक को हुनर में बदलू। तुम बहुत खुसनसीब हो जो तुमको आज वक़्त मिला है। …इसे जियो और जी भर के अपने अरमान लिखो ,खूब लिखो और भरने दो उड़ान अपने शब्दों को।

थोड़ा और की खवाइश कभी खत्म नहीं होती है मेरी जान , मगर जिंदिगी जरूर हो जाती है। इससे पहले की तुम्हारी खत्म हो इसे जी लेना ,रोज़ अपने बच्चे के साथ धीरे धीरे बड़ी होना ,उसकी हर बात को जीना ,माँ होने का पूरा लुफ्त उढ़ाना ,अपना हर शौक पूरा करना। यह सब हर किसी के नसीब में नहीं होता है।

ऐसा लग रहा था की उनकी छाती पर कोई बोझ है , और उनके होठो से छूटता हर शब्द अपनी जीवन की उन बातो को याद करके बोला जा रहा हो जो किसी कारणवश वह ठीक से जी नहीं पायी थी। अगर वासुदेव उनसे उनकी आखरी ईक्षा पूछेंगे तो वह अपना गुजरा वक़्त ही माँगेगी जिसे थोड़ा और के लालच में वह कही छोड़ आई थी। कितनी अजीब बात है 45 मिनट पहले जो मुझे एक सफल और खुश हाल इंसान लग रहा था वह कितना उदास और लाचार था।

इतने में शौर्य ने मुझे अंदर से आवाज़ दी की उसे होमवर्क में मिले सवालों के लिए मेरी ज़रूरत है। थोड़ी देर की इजाजत माग कर में अंदर चली आई और फिर जब लौटी तो रेणुका जी जा चुकी थी। मेज़ पर चाय का आधा भरा कप था और घर का आधा खुआ दरवाज़ा। बिलकूल उनके आधे अधूरे जीवन की तरह।

दिखावटी खुशियों के लिए
हम अपनी अंदरुनी ख्वाइशों को मार देते है,
बस थोड़ा और की चाहत मे,
अपना बहुत कुछ गवा देते है।

खुशियाँ कमाने के लिए
अपनों को रुला देते है ,
बस थोड़ा और की चाहत में ,
अपना बहुत कुछ गवा देते है।

जीवन संध्या में
जब पैर वापिस घर को लौटे है ,
तो आँगन सुना है मेरा
जा चुके है सब मेरी राह तकते तकते
कमाने अपने अपने हिस्से का बस थोड़ा और !