कहानी समकालीनः खारा समन्दरः शैल अग्रवाल/ लेखनी मई-जून 16

खारा समंदरबरसों हो गए हैं अब वह किसी के घर नहीं जाती, किसी से बात नहीं करती।  अब तो किशन भी घर छोड़ चुका है, किशन जो उसका छोटा भाई है, उसी की तरह बचपन से यहीं रहा है। धीरमोहन ने उसे रोका तक नहीं था, हाँ इसी नाम से बुलाती है वह उसे अब। पापा शब्द तो गले में मछली के काँटे सा फँसा कहीं  अटक कर रह जाता है। होटलों  और रेस्टोरैंटों में धीरमोहन कहते-कहते, मिसेज मोहन का नाटक करते-करते करीब-करीब चार साल हो गए थे उसे।  अब तो यही ज्यादा ठीक लगता था।

ज्यूरी में बैठे लोग बड़े ध्यान से उसकी बातें सुन रहे थे। समझ रहे थे। एकएक शब्द को तौल रहे थे और कागज पर नोट बनाए जा रहे थे।  आज उसके भाग्य का फैसला होगा। वैसे मृत्युदँड तो उसे उसी दिन मिल गया था जब उसकी मा, उसे और किशन को इसके पास छोड़कर चार साल की श्यामली के सँग रौजर के घर रहने चली गई थी। दो साल की कँवली  और चन्द महीनों के किशन की जिम्मेदारी का बोझ उसे बहुत ज्यादा  और बेहद ही  अनचाहा लगा था। जिसके पिल्ले हैं वही सँभाले इन्हें। वैसे भी पौला में मा जैसी कोई बात कभी थी ही नहीं। सोलह साल की पौला को जब श्यामली ने खुद बखुद मा कहा तो उसे बिल्कुल ही  अच्छा नहीं लगा था। जरा सा बड़े और समझदार होते ही उसने अपने बच्चों से यह बात स्पष्ट रूप से कह दी थी कि मुझे मा नहीं, पौला कहो।

धीरमोहन से उसने शादी जरूर की थी पर समझ उसे रौजर ही पाया था। रौजर जिसने जाने क्या देखकर एक मामूली से रेस्टोरैंट में काम करने वाले बैरे को अपने कार के गैराज में साझीदार बना लिया था, कारें टेस्ट करने और ठीक करने का धँधा सिखाया था। पर व्यापार की वह साझीदारी धीरेधीरे सहज रूप में कब घर  और बीबी तक  आ गई धीरमोहन ने कुछ जानने की कोशिश तक नहीं की। दो वक्त की रोटी मिलती रहे, उसका घर और बिस्तर सँभालने वाली हो, बस। इससे आगे की, सही-गलत समझने की उसे कभी जरूरत ही महसूस नहीं हुई।  आज भी नहीं। कँवली के गले में  आवाज फँसने लगी, पर वह आज हिम्मत करके सबकुछ बता देना चाहती थी।  अपने दाग धो लेना चाहती थी। बिखरे बादल सी रेशेरेशे टूटती कँवली जानती थी कि  अब तो इस इस छोटे से जीवन को, इस मुठ्‌ठी भर  आसमान सा  अपने में समेटे, बस भटकना ही भटकना है। क्या वह नहीं जानती कि जिस धरती से वह पैदा हुई है उसे  अपने हाथों से जलाकर  आई है।  आसान तो नहीं था वह सब। बिजली बनकर गिरने में वह खुद भी तो बहुत तहस-नहस हो गई है, टूटफूट गई है।

सामने कटघरे में खड़ा आदमी  अजनबी नहीं था कँवली के लिए। उसने कईकई रात बाहों में थपकी देकर रोती बुखार से तपती कँवली को सुलाया है। कभीकभी तो खुद भूखा रहा है  और उसे और किशन को  अच्छे से  अच्छा खिलाया-पिलाया है। खुद गीले में… पर यह बात तो पुरानी, बहुत पुरानी हो चुकी है, इतनी पुरानी कि यदि आंखें बन्दकर, माथे पर बल डालकर भी कँवली याद करना चाहे तो भी स्पष्ट सा कुछ भी याद नहीं आता। बस, अपने आप ही वह हँसता मुस्कुराता चेहरा  मानवीय दैत्य में बदल जाता है। घिनौने  अट्‌टाहास करने लग जाता है। शायद उसके दुर्भाग्य की कहानी इन्ही डरावने सपनों से पैदा हुई थी। डरी-सहमी कँवली की पेशाब में गीली पैन्टी बदलते बदलते कब उसका बाप बेटी और पत्नी के बीच की मर्यादा की देहलीज लाँघ गया था, अब तो कँवली को भी साफ-साफ याद नहीं। हाँ इतना जरूर याद है कि कभी उनका भी एक परिवार था, जिसमें मा बाप भाई-बहन सब रहते थे। एक साधारण मा- बाप, भाई- बहन की ही तरह ही। यह बात दूसरी है कि उन तीन बच्चों को कभी मा नहीं, बस पौला ही मिली थी। पौला एक नासमझ  और  अल्हड़ युवती।

धीरमोहन ने सोलह बरस की पौला को ही श्यामली का उपहार दे दिया था। शायद यही वजह थी कि उसे उससे शादी करनी पड़ी थी। और बात यहीं नहीं रुकी थी। बीस की होते-होते पौला तीन बच्चों से घिरी खड़ी थी। नैपियों और बच्चों के शोर के अलावा उसकी जिन्दगी में और कुछ नहीं बचा था।  और तब उसे तुरँत ही समझ में आ गया था कि ऐसे अब वह और जिन्दगी नहीं बरबाद कर पाएगी। इस नर्क से निकल भागेगी वह। और तब वह चुपचाप रौजर की मिस्ट्रैस बन गई थी।

वैसे तो वह तीनों को ही छोड़ जाती पर तीन साल की श्यामली ने उसे जाते देख,  सुबक-सुबककर रोना शुरु कर दिया था। पूछा था, तुम कब वापस आओगी?  और तब वह उसे छोड़ नहीं पाई थी।  आज श्यामली अपनी सौतेली बहन कैरी के साथ एक खुशहाल लापरवाह जिन्दगी जी रही है।

वैसे सच पूछो तो कोशिश तो धीर मोहन ने भी पूरी ही की थी। सुबह बच्चों को नहला-धुलाकर ही जाता था वह काम पर। चाहे कितनी भी देर क्यों न हो जाए। दोनों बच्चों की छोटी-बड़ी हर जरूरत का उसे बेहद ध्यान था। बेटी तो उसकी बचपन से ही समझदार थी, जैसे कहता, सुनती, करती। पर बेटा किशन ज्यों-ज्यों बड़ा हो रहा था और नटखट, और विद्रोही होता जा रहा था। बाप से बात-बेबात, हर वक्त टकरा जाता। उसकी बात न मानने की मानो उसने कसम खा रखी थी। गोरे-चिट्‌टे किशन को काला-कलूटा धीरमोहन कतई पसँद नहीं था। और गोरी सुन्दर सी मा उससे कोई नाता नहीं रखना चाहती थी। कँवली की बात और थी उसका न सिर्फ रँग ही धीरमोहन की तरह साँवला था बल्कि नयननक्श भी बाप की तरह पूरे भारतीय ही थे। हाँ  आंखें  और बाल जरूर उसने मा के लिए थे। इस मिश्रण से कँवली के रूप में एक मोहक  अनूठापन आ गया था। एक भटकन थी उसके भूरे उलझे बालों में एक कशिश थी उसकी नीली उदास  आंखों में।

धीरमोहन कितना भी थका हो पर बेटी से कभी नाराज नहीं हो पाता था। सोते-सोते जब वह अक्सर बिस्तर गीला कर देती, तब भी नहीं। चुपचाप उठता बेटी के कपड़े बदलता और डरी-सहमी नन्ही कँवली को छाती से लगाए, सो जाता। धीरेधीरे कँवली वहीं सोने लगी बाप के बिस्तर में ही।

रोज वह बेटी के कपड़े बदलता, बिस्तर के सूखे कोने में उसे सुलाता और खुद गीले में ही सो जाता। दिन भर गैराज में थकने के बाद न उसके हाथ-पैरों में जोश रह जाता और न ही मन में। यह बेटी ही तो शायद उसके सभी सपने साकार करेगी। बचपन में कितनी बार उसने भी सोचा था कि बड़ा होकर वह भी वकील बनेगा। काला कोट पहनकर अदालत में जिरह-बहस करेगा। गरीब अभागों को न्याय और चैन दिलवाएगा। पर बात शीशे के आगे खड़े हो कर ‘यस माई लौर्ड’  और ‘ फौर योर  अटेंशन माई लौर्ड’ से  आगे ही नहीं बढ़ पाई कभी।

शायद यह कँवली ही पढ़ जाए। कँवली, जो पढ़ने-लिखने क्या, हरकाम में ही बहुत तेज थी।  और काँटों पर खिलते गुलाब सी दिन-ब-दिन और ज्यादा सुन्दर व समझदार होती जा रही थी। बेटी मन और शरीर दोनों से स्वस्थ रहे इसलिए धीर मोहन रोज रात को उसके लिए बदाम भिगोता और सुबह उठते ही उन्हें दूध में घोटकर बेटी को पिलाता। जैतून और बादाम के तेल से उसके नन्हे हाथपैरों और बदन की मालिश करता।

और एक दिन, इसी तरह मालिश करते-करते,  अचानक उसके हाथ कँवली के शरीर की गोलाइयों पर फिसलने लगे। उसे वह सब दिखलाई देने लगा जो आमतौर पर बाप-भाइयों को नहीं दिखता, या नहीं देखना चाहिए।  आठ साल की कँवली बाप के इस  अनचाहे लाड़दुलार से कभी तो राहत पाती, तो कभी डरकर उसी की गोदी में छुप जाती।  आखिर और किसके पास जाती, किससे कहती ? था ही कौन वहाँ उसके घर में ? भाई किशन तो वैसे भी ज्यादातर बाहर या रिप्रिमांड सेन्टर्स में ही घूमता रहता था।

वैसे सच पूछो तो कोशिश तो धीर मोहन ने भी पूरी ही की थी। सुबह बच्चों को नहला-धुलाकर ही जाता था वह काम पर। चाहे कितनी भी देर क्यों न हो जाए। दोनों बच्चों की छोटी-बड़ी हर जरूरत का उसे बेहद ध्यान था। बेटी तो उसकी बचपन से ही समझदार थी, जैसे कहता, सुनती, करती पर बेटा किशन ज्योंज्यों बड़ा हो रहा था, और नटखट, और विद्रोही होता जा रहा था। बाप से बात-बेबात, हर वक्त टकरा जाता। उसकी बात न मानने की मानो उसने कसम खा रखी थी। गोरे-चिट्‌टे किशन को काला-कलूटा धीरमोहन कतई पसँद नहीं था। और गोरी सुन्दर सी मा उससे कोई नाता नहीं रखना चाहती थी। कँवली की बात और थी उसका न सिर्फ रँग ही धीरमोहन की तरह साँवला था बल्कि नयननक्श भी बाप की तरह पूरे भारतीय ही थे। हाँ  आँखें  और बाल जरूर उसने मा के लिए थे। इस मिश्रण से कँवली के रूप में एक मोहक  अनूठापन आ गया था। एक भटकन थी उसके भूरे उलझे बालों में एक कशिश थी उसकी नीली उदास  आँखों में। धीरमोहन कितना भी थका हो पर बेटी से कभी नाराज नहीं हो पाता था। सोते-सोते जब वह अक्सर बिस्तर गीला कर देती तब भी नहीं। चुपचाप उठता बेटी के कपड़े बदलता  और डरी-सहमी नन्ही कँवली को छाती से लगाए सो जाता। धीरेधीरे कँवली वहीं सोने लगी बाप के बिस्तर में ही।

और फिर एक दिन  अचानक ही वह कलँकी  अनर्थ हुआ। सोई कँवली एक असह्य दर्द और बाप के बोझ से दबकर चीख भी नहीं पाई थी क्योंकि उसने अपने हाथों से उसका मुँह जो दबा रखा था। खून से लथपथ नौ-दस साल की कँवली को साफ भी फिर उसीने खुद ही किया था। सुबह-सुबह एक बड़ा सा प्यानो भी खरीदकर लाया था वह उसके लिए। दो सौ पौंड महीने कमाने वाले के लिए हजार पौंड की रकम कुछ कम नहीं थी। पर आज वह बहुत खुश था। ऐसा सुख वह भी घर बैठे-बैठे… और उसके  अन्दर का घिनौना  आदमी सब सीमाएँ लाँघ गया। अच्छा-बुरा, सही-गलत सब भूल गया। जब कँवली दर्द और उस असह्य बोझ के अन्दर छटपटाने लगती, तो धीर मोहन उसे बहलाता-सहलाता। नये-नये कपड़े और खिलौने लाकर देता।  आश्वासन देता कि अगली बार वह बहुत जेन्टल होगा, क्योंकि पापा उसे बहुत प्यार करता है।  और पापा को उसकी बेहद जरूरत है।

रोज का ही सिलसिला हो गया फिरतो यह सब। उन्होंने घर तक बदल डाला। एक नए शहर में चले गए वे लोग। कँवली एक नये स्कूल में जाने लगी।  अब तो किसी औपचारिकता की भी जरूरत नहीं रही। छोटे से ही गलती का एक शर्मनाक एहसास लिए हुए पापा की लाडली कँवली, बेटी  और बीबी दोनों का ही रिश्ता बखूबी निभाने लगी।  आखिर करती भी तो क्या करती,  और कोई था भी तो नहीं उसके पापा का। चौदह साल की कँवली बहुत जल्दी ही युवती लगने लगी थी। लगने क्या, पूरी युवती बन ही चुकी थी। अपनी बाँहों में पकड़े जब धीरमोहन उसे होटलों और नाइटक्लबों में ले जाता तो कई सिर एकसाथ उनकी तरफ घूम जाते। इतने खूबसूरत जोड़े पर दाह करते लोग। सब  आंखों में कँवली के रूप की प्रशँसा और धीर मोहन के भाग्य के प्रति ईर्श्या होती। उनकी इस ईर्श्या  और सराहना पर धीरमोहन का सीना गर्व से फूल जाता। पोस्टमैन से लेकर मिल्कमैन तक सब उन्हें पति-पत्नी ही समझते थे । और उनकी इस  अनैतिक  और  अटपटी समझ पर दोनों में से किसी ने भी कभी कोई  आपत्ति नहीं उठाई, क्यों कि बाप-बेटी जैसी तो अब उन दोनों में, उस रिश्ते में, कोई बात ही नहीं रह गई थी। वहाँ तो अब बस एक औरत और एक मर्द रह गए थे।

जिन्दगी दीन-दुनिया से बेघबर एक मनमानी रफ्तार पर चलरही थी और धीरमोहन ने  अपनी कँवली के लिए सब सुखसुविधाएँ जुटा दी थीं। यहाँतक कि अब तो एक मास्टर उसे घर पर भी पढ़ाने  आने लगा था। तेज  और चतुर कँवली बहुत अच्छे नम्बरों से पास ही नहीं हुई, बल्कि उसे अपनी मनचाही यूनिवर्सिटी में दाखिला भी मिल गया। कँवली  अपने शहर में नहीं,  अपने  अन्य सँगी-साथियों की तरह,  उनके साथ दूर कहीं, किसी दूसरे शहर में जाकर कानून की पढ़ाई करना चाहती थी। विद्यार्थी जीवन का पूरापूरा अनुभव लेना चाहती थी। जीना चाहती थी, वह।

पर धीरमोहन को तो सबकुछ तितर-बितर होता दिख रहा था। उसके गिरफ्त की गाँठ फिसल रही थी। उसने कँवली को समझाने की पूरी कोशिश की। पर यूनिवर्सिटी तो कँवली को जाना ही था।  और वह भी बस अपने मन  और पसन्द की ही, सबसे  अच्छी यूनिवर्सिटी में ही।

बचपन से ही अन्याय के खिलाफ लड़ने की, कुचले, दलित लोगों का हाथ पकड़ने की एक अदम्य चाह उसके  अन्दर भी तो पल रही थी। किसी भी हालत में वह इस लौ को बुझने नहीं देना चाहती थी। शायद यही वजह थी कि धीरमोहन के डाले किसी भी दबाव का, किसी भी नाटक का कोई  असर नहीं पड़ा उसके ऊपर। कँवली की जिद देखकर धीरमोहन ने बीमारी का बहाना किया और उसने एक वर्ष के लिए अपना दाखिला स्थगित कर दिया। पर  अब जब वह असली वजह जान गई थी, कँवली और देर नहीं कर सकती थी।  और अपने तरीके से जीते धीरमोहन को पूरी व्यवस्था ही बिगड़ती दिख रही थी। वह खुदको कोसने लगा क्यों उसने कँवली की पढ़ाई पर इतना ध्यान दिया, क्यों नहीं किशन की तरह इसे भी भटकने और तड़पने दिया ? भूखा-प्यासा रखा ?

पर, कँवली और किशन में तो बहुत फरक था। कँवली हर काम में तेज थी, सुगढ़ थी। पढ़ने में भी। मा पर जो गई थी। जो भी चाहती थी, आगे बढ़कर उठाना जानती थी वह। जब उसने देखा कि बाप उसकी माँग नहीं समझ रहा तो सामान उठाया और मा के पास रहने चली गई। पर धीरमोहन उसे इतनी  आसानी से तो छोड़ने वाला नहीं था। रोज फोन करता। तरहतरह की दलीलें  और लालच देता।

कँवली की समझ में कुछ भी नहीं आ रहा था। बस एक ही जिद थी कि वह पढ़ने जाएगी। उसकी तो सात पुश्तों में भी याद नहीं आता कि कोई पढ़ा था, या शायद पढ़ना चाहता भी था। शरीर के सुख के लिए जो कुछ चाहिए, बिना पढ़े ही, उसके बाप-दादा, सबने सबकुछ ही तो जुटा लिया था। शादी तो उसने भी सत्रह साल की उमर में ही कर ली थी पर यह बात  और थी कि कुतिया अपने पिल्लों को उसके पास पटक कर भाग गई थी। एक भद्दी सी गाली को मुँह में ही रोककर, गला खखारकर धीरमोहन ने थूक दिया सँग ले जाती तो आज वह कम-से-कम इस कानून के झँझट में तो न पड़ता। कितना समझाया था उसने।

धीरमोहन ने रो-रोकर कँवली को मजबूर किया कि कम से कम वह अपना जन्मदिन तो उसके साथ ही बिताए। दो हजार पौंड का हीरे का ब्रेसलेट लेकर गया था वह उसके लिए। अपनी करीब-करीब सारी रकम ही लुटा दी थी उसने इस कँवली पर। पर कँवली तो कुछ भी सुन और समझ ही नहीं रही थी। बारबार बस वही एक पुरानी रट…मुझे जाना ही पड़ेगा।

अचानक धीरमोहन की आवाज गुस्से में तेज हो गई। कँवली भी झट से ही, सब सुना अनसुना कर, जाने को उठ खड़ी हुई। धीरमोहन अब और बर्दाश्त न कर सका। कहीं उसका हाथ न उठ जाए कँवली पर इस लिए उसने अपने हाथ जेब में डाल लिए।

पर जेब में तो उसका स्क्रूड्राइवर कँवली के इन्तजार में छुपा बैठा था। सबकुछ ठीक करने की उतावली में वह घर जाना और कपड़े बदलना तक, सबकुछ ही भूलगय था।  और  अब इन वकीलों की दलील है कि वह जान बूझकर, कँवली को मारने के लिए ही, यह हथियार  अपने साथ लेकर  आया था। भूल नहीं पाता वह, जाते-जाते वहीं कार पार्क में खड़ी कँवली बारबार कहे जा रही थी-  आज  और अभी से तुमसे सारे रिश्ते तोड़ती हूँ, मैं। वैसे भी तुम कभी भी मेरे बाप नहीं रहे। जो भी दिया, उसकी बहुत बड़ी कीमत बसूली है तुमने।

धीरमोहन का धीरज टूट चुका था और वही अन्दर का राक्षस फिरसे उसपर हावी हो आया था। पुलिस काँस्टेबल और डॉ० की गवाही के अनुसार सत्तरह बार घोंपा था सक्रूड्राइवर उसने अपनी कँवली के कोमल शरीर में। मर्डर के चार्ज में खड़ा था वह इस कटघरे में। सर झुकाए कँवली हर चोट झेलती गई थी। एक तो पसली तकको पार कर गई थी। पर मरी नहीं थी वह। मोटे ऊनी कपड़ों की परतों ने बचा लिया था उसे। इर्दगिर्द जमा लोगों की भीड़ ने बचा लिया था उसे इस जानलेवा हमले से। तभी शायद बस कुछ दिन ही कँवली को अस्पताल में रहना पड़ा था। वरना धीरमोहन का तो अपनी किसी भी चीजपर कोई काबू ही नहीं रह गया था।

नफरत थी  अब कँवली को सबसे। उस स्क्रूड्राइवर से, जिससे उसका बाप बीमार कारें ठीक करता था। आज वह खुद बीमार और बेकाबू होकर उसकी जान का दुश्मन बन चुका था। निर्दयता से मारे जा रहा था उसे। अपनी उस कँवली को जिसे शायद वह इस दुनिया में सबसे ज्यादा प्यार करता था। और जो बात घरके दरवाजों में बन्द कँवली को पीसे जा रही थी, आज उसके लाख न चाहते हुए भी सबके सामने थी।  आम चर्चा का विषय बनी हुई थी। पुलिस ने बयान में सब कुछ ही तो उगलवा लिया था वरना कँवली ने तो कभी किसी से कुछ भी नहीं कहा था।

यह मा-बाप शब्द यह खून के रिश्ते भी कैसे बनाए हैं, उस बनाने वाले ने। अजीब से, चारो तरफ से कसकर घेरे और जकड़े हुए। चाहो तो भी तो नहीं भाग पाते हम इनकी पकड़ से। उसने तो  अपने मा-बाप को कम से कम देखा तो था पर उसका यह अनाथ अभागा बाप तो बस काल्पनिक मा-बाप की बातें  और कहानी किस्से सुनाकर ही खुश हो जाया करता था। नन्ही कँवली सब सुनती थी, तब भी  और  आज बड़ी होकर भी। क्योंकि वह जानती थी कि उसके बाप को यह सब कितना अच्छा लगता है। दर्द समझती थी वह उसके कटे और विषाक्त  अस्तित्व का।  अच्छा लगता था उसे यह देखना कि  अनाथालय में पला-बड़ा धीरमोहन कैसे पल भर के लिए ही सही, इन काल्पनिक रिश्तों से जुड़कर, तृप्त और सनाथ महसूस करने लगता था। यह पीढ़ी दर पीढ़ी का काल्पनिक इतिहास, कुछ पल के लिए ही सही, उसे इस दुनिया से जोड़ देता था। सहज कर देता था उसे। एक साधारण इन्सान बना देता था।

कँवली ने तो बारबार बस यही जाना है कि जब भी वह और उसका बाप…यह कमजोर बीमार कटघरे के पीछे खड़ा, गँदा-घिनौना आदमी, दूसरे लोगों की तरह बस  आम बाप-बेटी वाला रिश्ता निभाता है, तो कँवली को सब कुछ मिलजाता है। कम तकलीफें नहीं उठाई होंगी इसने भी, यूँ  अकेले अकेले ही, विदेश में लावारिस बढ़ते हुए। दुनिया से  अकेले-अकेले जूझते हुए। शायद यही वजह थी कि न चाहते हुए भी उसने दोनों बच्चों को केयर में नहीं दिया था। खुद ही पालने की जिम्मेदारी ले ली थी।  अपने पास ही रक्खा था उन्हें।  आज उस सबकी ही तो सजा भुगतेगा यह। जान से मार डालता, या जिन्दा ही दफन कर देता, तो शायद ज्यादा अच्छा रहता। किसी को पता तक नहीं चलता।

अपनी तकलीफ  और नरक के बावजूद भी कँवली को बाप पर दया आ रही थी। उसने उसके बहशीपन को, उसकी हर दरँदगी को माफ कर दिया था।

बहते आंसुओं के सँग वह  अब जज से बारबार उसपर बहुत सख्त न होने की विनती कर रही थी। उसका बाप आज उसे बहुत ही बूढ़ा और लाचार लग रहा था। उसकी तो पूरी दुनिया में सिर्फ कँवली ही थी। पूरे जिन्दगी के बीस साल उसने सिवाय कँवली के कुछ भी तो नहीं सोचा। कुछ भी तो नहीं जिया। किसी और को उसके दर्द का क्या पता ? कौन हैं यह अनजान लोग उसपर निर्णय लेने वाले, उसकी जिन्दगी का फैसला सुनाने वाले, उसे सजा देने वाले ? शोषण कहाँ नहीं होता और किसके साथ नहीं होता ? सजा देनी है तो इस सामने बैठी पौला को दो, जो उसे छोड़कर चली गई थी। रौजर को दो जिसने दोस्त बनकर धोखा दिया। खुद कँवली को दो, जो अपने स्वार्थ के लिए आज उसे अकेला छोड़कर  अपना भविष्य सँवारने के सपने देख रही है। जाने को तैयार है।

विटनेस-बॉक्स से कटघरे में जँजीरों से जकड़ा धीर मोहन खुद में दफन कँवली को बहुत ही टूटा-बिखरा और पूरी तरह से विक्षिप्त लगरहा था।  आजीवन प्यार से रिक्त जिन्दगी जीता, भूखा-कँगाल, लूट-खसूटकर  अपना पेट भरने वाले भिखारी जैसा। मरुस्थल में निकला एक जहरीला कैक्टस, जिसकी बस आँखों में ही फूल खिलते हैं बाकी पूरा कँटीला  और जहर से बिंधा हुआ होता है। आकँठ विष में डूबा खारे समँदर-सा। बेहिसाब पानी से लबालब तो, पर दूसरों की क्या, अपनी भी प्यास बुझाने में बिल्कुल ही असमर्थ। प्रेत सा बिलखता, क्रँदन करता।  अपनी ही लहरों पर बेमतलब दौड़ता-भागता  और फिर कहीं किसी वीराने में जाकर झाग फेंकता हुआ… खारा समुन्दर। इसमें डूबा तो जा सकता है, पर इसके सहारे जिया नहीं। इसमें तो बस डूबकर आत्महत्या ही की जा सकती है और अपने साथ दूसरों को भी डुबोया जा सकता है।
पौला तो बचकर निकल भागी, पर इस डूबती कँवली को कौन बचाए? वह तो इसी में डुबकियाँ लेती, हाथ-पैर फेंकती, जिन्दा रहने की कोशिश करती, बड़ी हुई है। समाज और आँख पर पट्‌टी बाँधे इसका कानून, पता नहीं अपनी जिम्मेदारी निभा पाए या नहीं, कँवली नहीं जानती। पर वह जानती है कि कई साल पहले ऐसे-ही बचपन में कभी, एक और अनाथ, जिल्लत में दफन, बालक धीरमोहन ने भी शायद एक और खारे समँदर में डूबकर जान गँवाई थी। और उसकी तो चीखों को सुनने वाला भी,  आसपास क्या दूर-दूरतक, कहीं, कोई और नहीं था।…

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