उपन्यास अंश – रोशनी अधूरी सी (2) -इला प्रसाद/ लेखनी मई-जून 16

बिहारी लड़की

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“शुभ्रा बहन जी, एक सौ चौवालीस, भइया आए हैं।” महावीर आवाज लगा रहा है।
सुबह होते ही इन आवाजों का सिलसिला शुरू हो जाता है जो रात आठ बजे तक चलता है। शाम छह बजे के बाद आए मित्र , परिचित, अभिभावक ज्योति कुँज तक न आकर बाहर मेन गेट के पास रुकते हैं और वहीं मुलाकातें होती हैं । उससे क्या ? जिन्हें मिलना है वे गेट के बाहर भी खड़े होकर बातें करते हैं । अँधेरे में छुप कर । यह तमाशे अब शुचि को खास नहीं लगते। हाँ ,शुरू में शुचि पकड़ भी नहीं पाती थी कि क्या बोला गया। अब सुनते- सुनते कान अभ्यस्त हो गए हैं – नाम , कमरा नम्बर और आगन्तुक का विवरण। इन नियमित विजिटर्स में से कई को वह पहचानती है। उनकी कहानियाँ औरों के मुँह से सुनती है। लड़कियाँ मुँह दबाकर हँसती हैं , कामन रूम की खिड़की से मुँह सटाकर नीचे देखती और आपस में इशारे करती हैं। कुछ आहें भरती हैं – काश ! हमें भी कोई मिला होता। शुचि को हँसी आती है ऐसे विजिटर्स पर । “इनके लिए पेड़ के नीचे तम्बू लगाने की व्यवस्था होनी चाहिए । रात नौ बजे गए , सुबह आठ बजे हाजिर । बेचारे को नींद नहीं आई शायद। देखो, कैसे बिना नहाए- धोए चला आया है।” वह अपना मन्तव्य देती है। लड़कियाँ खूब हँसती हैं उसकी इन बातों पर । उन्हें यह उसका भोलापन लगता है। समझती हैं कि वह अपरिपक्व है , अनुभवहीन है। सच यही है भी। उसका मन इस सबसे परे , तटस्थ द्रष्टा बना , अपनी दुनिया में रहता है। एक उद्देश्य से बँधा — पी एच डी । कॉमन रूम में रह्ते – रह्ते एक महीना बीत चुका। इस बीच कई लड़कियाँ कॉमन रूम में आकर उससे परिचय कर गई हैं । सब को पता है अब , राँची से एक लड़की आई है – इलेक्ट्रानिक्स में पी एच डी करने। लम्बी चोटी वाली। बड़ी -बड़ी आँखों और साँवले चेहरे वाली। एकदम पतली। फ़ूँक मारो तो उड़ जायेगी , ऐसी पतली। लगता ही नहीं, इतनी बड़ी है। एकदम बच्ची लगती है, महिला महाविद्यालय के हॉस्टल में रहने के लायक । सीधी सी!

हास्टल में गर्म पानी की कोई व्यवस्था नहीं है। कमरे में हीटर रखने , खाना पकाने की अनुमति है। शुचि को नहाने के लिए गर्म पानी चाहिए । बीएच यू परिसर से बाहर तमाम दूकानें हैं । इस जगह का नाम लंका है ! लंका जाना होगा , कुछ भी खरीदना हो तो। क्या अजीब नाम है ! शुचि ने मुँह बनाया था। “राम लीला होती है यहाँ , आप नहीं जानतीं ? रामनगर की रामलीला तो विश्व प्रसिद्ध है। पूरे बनारस में अलग-अलग जगहों के नाम उसी अनुरूप हैं और रामलीला का वह हिस्सा वहाँ अभिनीत होता है। हम लंका में हैं।” वहीं उपस्थित बनारस की ही निवासी, रसायन शास्त्र में एम एस सी की छात्रा बीना शर्मा उसे बतलाने लगी। शुचि को पहली बार अपनी अल्प बुद्धि पर शर्म आई।

“मेन गेट से बाहर लंका है , चले जाइए। इमर्सन कायल मिल जायेगा । पानी गर्म कर सकेंगी।”
लंका शुचि को अभी भी बहुत दूर लगता है। एक बार गेट से बाहर जाकर वह थक जाती है। लड़कियाँ हँसती हैं उस पर।
“लंका दूर लगता है आपको? हम तो विभाग तक पैदल चले जाते हैं।”
“बाप रे! इतना चल लेते हो तुम लोग!

उसे यहाँ आये एक महीना होने को आया लेकिन इलेक्ट्रानिक्स विभाग आजतक पैदल नहीं गई शुचि। एक दिन लौटते वक्त रिक्शा नहीं मिला तो पैदल लौटना पड़ा और रास्ता भटक गई। लेकिन यह रास्ता भटकना बहुत काम आया। उसने जाना कि तमाम रास्ते एक दूसरे को समकोण पर काटते हैं। यह भी कि एक व्यवस्था है , एक दृष्टि , इस कैम्पस को विकसित करने के पीछे। सबसे पीछे प्रोफ़ेसर्स क्वार्टर हैं उनके आगे वाले रास्ते में तमाम हॉस्टल और उसके आगे के रास्ते में हास्पीटल , वी सी लॉज । विभागों का सिलसिला यहीं से शुरू होता है और फ़िर उसके अगले रास्ते में मुख्य पुस्तकालय, मुख्य कार्यालय आदि। वह इस सोच की प्रशंसा किए बिना न रह सकी। जैसे छात्रों पर नजर रखने के लिए पीछे अभिभावक खड़े हैं। नजर रखते हुए और सुरक्षा का अहसास देते हुए। किन्तु पुरानी इमारतों के बीच नई इमारतें उग आई हैं , कहीं भी, जो सिर्फ़ इस अनुशासन को तोड़ती ही नहीं वरन एक अलग वातावरण भी रचती हैं। इन इमारतों का ढाँचा भी अलग है । पुराने सारे विभाग काशी विश्वनाथ मंदिर कॆ जैसे बने हैं। सीढियों की रेलिंग पर नीचे सीमेन्ट की फ़ूळ पत्तियों वाला ब्रैकेट जिसमें बी एच यू और का. हि.वि. लिखा है। बिल्कुल मन्दिर जैसा लगता है। ये मंदिर ही तो हैं। विद्या के मंदिर। किन्तु इन मंदिरों के अन्दर अब क्या- क्या चलता है, कितनी राजनीति और कितनी बेईमानी यह जानना अभी शेष है!

अधिक समय नहीं लगा। मात्र तीन साल। और शुचि सबकी नजरों में चढ़ गई। इतना ही समय तो लगा था उसे , एक शोध पत्र प्रकाशित करने और अपनी फ़ेलोशिप का इन्तजाम करने में। तब दिव्या और मनीषा दोनों जाने वाली थीं। शुचि विभाग में सबकी प्यारी हो चुकी थी। उन लड़कों की भी जिन्हें उसमें एक सुन्दर चेहरा और मष्तिष्क नजर आता था। जो थोड़ी सी छूट देते ही प्रणय निवेदन को तैयार थे और शुचि दामन बचा कर चल रही थी।
यह खेल तो चलता ही रहा।
युनिवर्सिटीसे निकली तो बी एच यू भौतिकी विभाग पहुँची। वहाँ फ़िर वही। आगे- आगे बढ़ती गई और झेलती गई।
“दीदी , मैंने अभि भैया से पूछा कि कल रात की पार्टी में वे इतने चुप क्यों थे तो पता है उन्हॊंने क्या कहा? ” एम एस सी भौतिकी की छात्रा निवेदिता हँसती हुई उसके कमरे में चली आई थी।
“क्या?”
“बोले , तुम्हारी शुचि दीदी भी तो चुप थीं।”
“उससे कहो कि शुचि दीदी हॉस्टल की तीसरी मंजिल से कूद कर आत्महत्या करने जा रही हैं। वह आकर कूदे मेरे साथ। पहले वह, फ़िर मैं।”
निवेदिता की हँसी बन्द हो गई। ये ऐसी ही हैं। पता नहीं, इन्हें क्या चाहिए!
“इतने लड़के आपके पीछे घूमते हैं। कुछ सीरियस भी हैं तो आप उन्हें मौका क्यों नहीं देतीं। आखिर आपको शादी तो करनी है न?”
“नहीं करनी।”
“ठीक ही सब कहते हैं हॉस्टल में , शुचि दीदी तो पागल हैं।पागल नहीं तो नार्मल तो नहीं ही हैं।”
अति मह्त्वाकांक्षा पागलपन का ही दूसरा रूप है। लेकिन शुचि के अन्दर इसकी जड़े कब जमी , वह अभी ठीक से समझती भी नहीं।

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हास्टल में दो मेस हैं। जिस मेस में शुचि है उसका खाना इतना घटिया है कि उसे पचाने के लिए उसे दवाइयों की जरूरत पड़ती है।रोटियों को तोड़ने से लेकर चबाने तक में उसे कठिन श्रम करना पड़ता है। दाल इतनी पनीली कि “चलो डुबकी लगाएँ, दान का दाना ढूँढ़ लाएँ ” वाला मजाक खाने की टेबल पर चलता रहता है। सब्जी के नाम पर आलू और दो दाने मटर के। बाकी मिर्ची। अधिक खा कर दिखाओ तो जानें। सी -सी करते बुरा हाल….। जिन लड़कियों के पास वक्त है वे कमरे में खाना पकाती हैं। यूँ भी सप्ताहान्त में , रविवार की शाम मेस बन्द रहता है। शुचि लंका जाकर दोस्तों के साथ दोसा खा आती है। जब तक कमरा नहीं मिलता , खाना पकाने जैसी जहमत नहीं उठाई जा सकती।
एक तिकड़ी है – अमृता , विभा और निवेदिता । तीनों ने एक साथ बी एच यू ज्वायन किया था। तेलगु विभा केमिस्ट्री और बंगाली निवेदिता भौतिकी में बी एस सी करने आई थीं। तीनों रूम मेट रहीं। दोस्ती – दाँ त काटी रोटी वाली। आधी कहानी अमृता से सुनी तो बाकी विभा या निवेदिता से सुन लो। तीनों की कहानी एक। “महिला महाविद्यालय हास्टल का मेस महाराज बहुत अच्छा है। पूछ-पूछ कर ,प्यार से खिलाता था।” विभा बता रही थी।
“हम कितना रोते थे तब। नए- नए हास्टल आये थे। रोते ही रहते थे। महाराज कहता “बिटिया , खा लो। खाएँ नाहीं तो दुबला जाईं। तब पढ़ाई कैसे करीं! ” अमृता हँस रही है।
“जबरदस्ती। एक रोटी और लो! थाली में डाल देता था। यहाँ कौन परवा करता है! थर्ड क्लास खाना …बहुत बदमाश है महाराज। जान बूझकर ऐसा बनाता है!” निवेदिता ने अपना मन्तव्य दिया।

शुचि चुपचाप खाना गले से उतार रही है। सबको सुनती हुई। अब वह इस तिकड़ी की चौथी सदस्य है अब । अब उनकी चौकड़ी है। वही प्रेम भाव , वही आत्मीयता शुचि के हिस्से में भी आती है अब। विभा बहुत छॊटी लगती है , चार फ़ुट से ज्यादा लम्बी नहीं, बिल्कुल दुबली- पतली, गोरी, बड़ी आँखॊं और घुंघराले बालों वाली बेहद भावुक किस्म की लड़की। निवेदिता इन दोनों से अलग है। लम्बाई विभा से अधिक, लेकिन नाटे कद की ही, गोरी , साधारण नाक- नक्श। बेहद अस्त -व्यस्त किस्म की। कोई काम ठीक से नहीं करती। विभा और निवेदिता अभी भी रूम मेट हैं। अमॄता एक सीनियर शोध छात्रा के साथ है जो अपना काम समेट रही है। साल भर में चली जायेगी। अमृता को उससे कोई मतलब नहीं खास। वह अपनी मित्र मंडली के साथ ही खाती है , हास्टल में खाली वक्त में विभा के कमरे में होती है। या फ़िर शुचि के पास। चारों का खाना – खास कर रात का, अब साथ-साथ ही होता है। मेस की टॆबल पर सारे किस्से- सुने- सुनाए जाते हैं।

दूसरा मेस को -आपरेटिव मेस है। उस मेस का खाना बेहतर है , शुल्क भी। लेकिन वहाँ पचास से अधिक लड़कियाँ मेम्बर नहीं हो सकतीं। यह मेस हास्टल की लड़कियों द्वारा ही चलाया जाता है। एक ही हाल में अलग टेबुलों पर बैठकर खाती लड़कियाँ अपने आप को श्रेष्ठ समझती हैं, यह शुचि ने कई बार महसूस किया है। उसे समझ में नहीं आता कि जब सदस्यता सीमित है और वेटिग लिस्ट में नाम आने पर क्रमानुसार दी जाती है तो फ़िर अधिक पैसे खर्च कर उस मेस में खाने की पात्रता हासिल कर ये लड़कियाँ श्रेष्ठ कैसे हो जाती हैं! क्या सिर्फ़ इसलिए कि वे अपने पैसे का प्रदर्शन कर सकती हैं? अपनी अमीरी का ढोंग रचा सकती हैं?
शुरु-शुरु में शुचि ने भी चाहा कि उस मेस की वेटिंग लिस्ट में अपना नाम डलवा ले लेकिन उस मेस की लड़कियों के चेहरे का दर्प उसे खल गया। क्या बाकी सब यहाँ फ़ालतू के घरों से आई हुई फ़ालतू लड़कियाँ हैं, जो तुम इस तरह अकड़्ती हो! उसने मन ही मन सोचा। उसकी पूरी मित्र मंडली इस मेस में है। वह अलग टेबल पर बैठकर श्रेष्ठ होने का दम्भ नहीं पालेगी!

लेकिन उसकी सोच सही थी। उनका दम्भ देखने का मौका उसे जल्द ही मिल गया। कुछ एक महीना गुजरा होगा। उसने खुद को कई लड़कियों से घिरा पाया। वह मेस से निकल रही थी, वे जैसे रास्ता रोक कर खड़ी थीं।

“सुना है तुम राँची से आई हो ?” स्वर में व्यंग्य स्पष्ट था।
“हाँ।” शुचि का स्वर भावहीन।
राँची में पागलखाना है।”
“हाँ , है।”
“वहीं से आई हो ?”

इस बार लड़कियों का हुजूम ठहाके लगाकर हँस पड़ा। बौखला गई शुचि।कौन हैं ये? सीनियर्स? हाँ ,हॉस्टल में उससे बहुत पहले से रह रही सीनियर्स। पूरा कॉरीडोर घेर रखा है , निकले किधर से!
“वहीं से आई हो न?” इस बार वाणी में व्यंग्य का पुट था।
“हाँ ,वहीं से। उनलोगों ने निकाल बाहर किया। कहा, लाइलाज हो। बी. एच यू चली जाओ। वहाँ सब तुम्हारे ही जैसे हैं। अपने जैसा लगेगा।” शुचि के मुँह से बेसाख्ता निकला।
“बहुत बोलती है!”
वह किनारे से निकल गई ! इस बार किसी ने नहीं रोका । तब भी शुचि कॉमन रूम में वापस पहुँच कर देर तक बौखलाई रही। इतने ही दिनों में उसके बिहारी होने को लेकर अनेक कटाक्ष किए जा चुके हैं । राँची का होना भी सबसे पहले सबों को पागलखाने की ही याद दिलाता है। कायस्थों को लाला कह्ते हैं । लाला यानि “ला, ला – जो केवल माँगता रहे। शब्दों के नए अर्थ खुल रहे हैं , जीवन की नई परिभाषाएँ। वह पूछना चाहती है सबसे कि किसी प्रदेश विशेष में जन्म लेने का फ़ैसला क्या उनका अपना था ? या कि जाति विशेष में अपना जन्म उन्होंने खुद तय किया था !

भाषा का संस्कार उसे विरासत में मिला है। किसी के भाषा-ज्ञान को वह चुटकियों में तौल लेती है। लेकिन, जब से यहाँ है , उसे गलत साबित करने की कोशिशें हो रही हैं, गोया अच्छी हिन्दी यू. पी. वालों की बपौती हो। कई बार वह इस सन्दर्भ में लड़कियों से उलझ चुकी है और हालांकि हर बार जीत गई है , कभी खुश नहीं हो पाई। उसे लगता कि सबने उसके विरुद्ध मोर्चा खोल रखा है और उसे अपने आप को सही साबित करते रहना पड़ेगा , बार-बार , लगातार , तबतक, जबतक वह यहाँ है। कुछ ऐसे भी फ़िकरे सुने हैं – “बिहारी हो?” लगती नहीं हो।”
तब उसकी इच्छा हुई है कि पूछे “क्यों ? बिहारियों के सिर पर सींग होते हैं क्या?”

बी एच यू में उत्तर बिहार के विद्यार्थियों की बहुलता है और यह कोई खास बात भी नहीं। उत्तर बिहार की सीमा उत्तर प्रदेश से जुड़ी है तो उधर से लोग अधिक आते हैं यहाँ। जैसे राँची के औद्योगिक शहर होने की वजह से वहाँ तमाम प्रदेशों की मिली-जुली संस्कृति है। बगल के राज्य बंगाल के लोग भरे हुए हैं। लेकिन इतनी समझ कहाँ ! कहने वाले तो यहाँ तक कहते हैं कि बी एच यू का सारा कल्चर बिहारियों ने खराब किया है। उसी बिहार की है शुचि। राँची के पागलखाने से छूट कर आई हुई ।बिहारी होकर स्मार्ट तौर तरीकों वाली , शुद्ध हिन्दी बोलनेवाली। कई विषयों पर साधिकार बात करनेवाली। हर किसी को तौलती निगाहों से देखती , चुनौती देती हुई……

उसे याद आया , जब स्कूल बदला था तब कुछ लड़कियाँ, उसका, उसके पुराने स्कूल का मजाक बनाती थीं । उसका पहला स्कूल सरकारी स्कूल था, इस स्कूल की तरह मिशन स्कूल नहीं। लेकिन अर्धवाषिक परीक्षा का परिणाम आते ही उन लड़कियों की, मजाक उड़ाना तो दूर, उससे बात करने की हिम्मत खत्म हो गई थी। वह प्रथम आई थी और उसने जाना था कि वे बस किसी तरह पास हुई हैं। वह जीतेगी यहाँ भी। अपनी मेहनत से, लगन से।
शायद जिनके पास गर्व करने को कुछ नहीं होता , वे भाषा का, जाति का , प्रान्त का, धर्म का या ऐसी ही किसी और चीज का गर्व पालते हैं। जिसे अर्जित करने में श्रम लगता है वह अपनी महत्ता खुद समझा देता है और व्यक्ति में अहंकार नहीं, समझ पैदा होती है।

मनीषा मूलत: उत्तर प्रदेश. की नहीं है। दक्षिण भारतीय है। दिव्या गुजराती। यह कितनी अच्छी बात है!
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शुचि ने साइकिल चलाना सीख लिया है। यह भी अचानक ही हुआ। ठीक उसी तरह , जिस तरह वह एक दिन अचानक कमरा नम्बर ३० में शिफ़्ट कर दी गई। सुबह करीब नौ बजे जब वह विभाग जाने के लिए तैयार हो रही थी , धूपकली ने आकर बतलाया कि उसे मैडम नीचे ऑफ़िस में बुला रही हैं, अभी, तुरंत। बिना किसी भूमिका , उपसंहार के वह जब इतनी सी सूचना देकर विदा हो गई तो शुचि सोचती- सी, बैग कंधे पर लेकर कि उसी तरफ़ से विभाग को निकल जायेगी , सीढि़याँ उतर ऒफ़िस के दरवाजे पर जा खड़ी हुई। मन ही मन वीणा का हास्टल प्रसिद्ध वाक्य दुहराती हुई -“धूपकली , छिपकली … ऐसी ही है मॊटी , कमरे में झाड़ू लगाना हो तो सौ बातें बनायेगी और मैडम बुला रहिन हैं कहने मिनटों में हाजिर।”
वास्तव में उसे वार्डन ने नहीं, क्लर्क मैडम ने बुलाया था। वही थी कमरे में और एक भूरी आँखों , गोल चेहरे वाली साँवली सी , तनिक मोटी , शुचि जितनी ही लम्बी लड़की, जिसके घुंघराले बाल कंधे पर बिखरे हुए थे, बौखलाई हुई उससे बहस कर रही थी ” आप मुझे बिना बतलाए मेरे कमरे में किसी को कैसे डाल सकती हैं ? ”
शुचि दरवाजे पर ही ठिठक गई ; अन्दर जाए , न जाए !”
क्लर्क ने देखा , अन्दर आने का इशारा आँखों से किया। वह अन्दर जाकर टेबल के दूसरी ओर खड़ी हो गई। उसकी तरफ़ इशारा करती हुई वह बोळी “देखो मोनिका सिंह, तुम बहुत देर से बहस कर रही हो। अब चुप रहो। हर कमरे में दो लड़कियों के बेड हैं और तुम्हें अकेले रहना है।”
“नहीं मैडम, मेरा बहुत सामान है। मैं रूम कुकिंग करती हूँ। मुझे पढाई करनी होती है। ‘
” हाँ, ठीक है। यह साइन्स की है। अधिक समय विभाग में ही रहेगी। “फ़िर शुचि को उसने उसके सामने ही आदेश दिया। “तुम आज कमरा नम्बर ३० में शिफ़्ट हो जाओगी। यह मोनिका सिंह है। साइकोलॊजी में रिसर्च कर रही है। तुम्हारी रूम मेट।”
शुचि ने सिर हिला दिया। वह लड़की लाल चेहरा लिए कमरे से बाहर हो गई।
बाद में शुचि ने जाना कि उसे शुचि की शकल अच्छी लगी थी और वह उसे सीधी लगी थी इसीलिए मोनिका ने अंतत: उसे आने देने पर हामी भर ली। यह भी कि जब आप सीनियर हो जाते हैं तो रूम मेट चुनने का अधिकार आपका है। लेकिन बस इतना ही। मोनिका सिंह का कोई पावर नहीं है ,उसका ब्वाय फ़्रॆंड उसी के विभाग से है और स्टूडेंट यूनियन से संबन्ध नहीं रखता, न ही वह किसी प्रोफ़ेसर की वार्ड है।
तो कमरा मिल गया। शुचि की तमाम सहेलियाँ, जो उससे पहले से कॉमन रूम में थीं , कमरों में शिफ़्ट हो चुकी थीं । इसीलिए इस बार किसी ने नहीं कहा कि “अरे, इतनी जल्दी कैसे ?”
कुछ डेढ़ – दो महीने के बाद कमरा मिला। शुचि ने चैन की साँस ली। उसकी सारी कॉमन रूम फ़्रेंड्स दूसरी या तीसरी मंजिल पर थीं। वे सब बारी-बारी से उसके कमरे का चक्कर लगा गईं। “दीदी , ये आर्ट्स वाले ज्यादा पढ़ते नहीं। बस टाइम पास करते हैं। और गॉसिप करेंगे। आप दूर ही रहियेगा। ”
शुचि के पास यूँ भी समय नहीं था। अभी साइकिल चलाना सीखना था। वह विभाग से लौटती और मेस में अल्पाहार के बाद सीधे अपनी दोस्तों के पास पहुँच जाती। “दीदी , आप कोई सेकेन्ड हैंड साइकिल खरीद लीजिए। अपनी साइकिल तो कोई देगा नहीं सीखने के लिए। हॉस्टल से जा रही लड़कियाँ अपनी पुरानी साइकिल बेचती हैं। आप लंका जाकर किसी साइकिल स्टोर वाले से चेक करा लीजिए और फ़िर खरीद लीजिए।”
शुचि ने वही किया।
अब एक साइकिल है और शुचि है। हर वीक एन्ड वह “साइकिल सीखो’ अभियान पर निकलती है। हॉस्टल के ठीक बाहर जो बड़ा सा घास से भरा मैदान है , उसमें ले जाकर उसकी सहेलियाँ कभी विभा और निवेदिता, कभी रूम मेट मोनिका , कभी अमृता भी आ जाती है , उसे दोनों ओर से सहारा देती हैं और वह सीट पर बैठ जाती है। फ़िर वे उसे पैडल मारने को कहती हैं और उसका और साइकिल का सारा बोझ उनके ऊपर। शुचि चलाती है और महसूसती है ,” ऐसे नहीं। ”
यह क्रम चलता है।
उन्हें भी पता है कि शुचि ने तीन सप्ताह में भी कोई प्रगति नहीं की है। वे बार-बार कहती हैं “दीदी आप चलाइए। ” शुचि का डर नहीं जाता। वे कुछ ही देर में थक जाती हैं। दोहरा बोझ। शुचि को तो सन्तुलन की कोई समझ ही नहीं या कि उन्हें सिखाना नहीं आता। वे तो बस ऐसे ही सीख गई थीं। शुचि क्यों नहीं सीख पा रही। एकदम अनाड़ी है।
उस दिन रविवार था।
बहुत आग्रह करके , क्योंकि अब उसकी सहेलियाँ हार रही थीं , उन्हें लगता था कि साइकिल सीखना दीदी से नहीं होगा , वह फ़िर निवेदिता और अमृता को मैदान में ले आई थी। साइकिल के साथ। एक कोशिश मोनिका सिंह ने भी की थी और यह कहकर कि उसे सिखाना नहीं आता , वापस चली गई थी , शुचि को मैदान में अकेला छोड़कर।
सामने एक छोटी सी लड़की , जिसका नाम शुचि को नहीं मालूम था , अपनी सहेली को साइकिल चलाना सिखा रही थी। उसकी नजर शुचि पर पड़ी। “अच्छा, साइकिल चलानी है। बहुत आसान है। आओ, मैं सिखाऊँ।”
अमृता को लगा , मुक्ति मिल गई ।”हाँ दीदी, आप दीदी को सिखाइए।”
“चलो बैठो, साइकिल पर।” उसने सहारा दिया।
शुचि सीट पर जा बैठी।
“चलाओ। जब तक पैडल मारती रहोगी, नहीं गिरोगी। चलाती जाओ। जब उतरने का मन हो, ये ब्रेक हैं, इन्हें दबा कर धीरे से उतर जाना। ” उसने साइकिल को पीछे से हल्का सा पुश देते हुए आगे बढ़ा दिया।
सहसा शुचि अपनी साइकिल के साथ अकेली थी। “चलाओ, रुको मत। गिरोगी।”वह पीछे से चिल्लाई।
शुचि ने धड़ाधड़ पैडल मारने शुरू किए। साइकिल आगे बढ़ती जा रही थी। शुचि घबराई हुई … “चलाओ, वरना गिरोगी।” उस लड़की ने फ़िर पुकारा। वह चलाती गई, चलाती गई। सामने लम्बा मैदान, फ़िर लगा वह और नहीं चला पायेगी। रुकी और गिर गई।
वह लड़की दौड़ कर आई। “कहा था न, रुकना नहीं और गर रुकना हो तो ब्रेक दबा कर उतरना।”
शुचि की साइकिल दूसरी तरफ़ गिरी थी। खास चोट नहीं आई।
“चलो , तुम सीख गई।” उसने शुचि को पीठ ठोंक कर शाबासी दी।
शुचि ने फ़िर चलाया और चलाया। वह सीख गई थी – जिन्दगी का सबसे बड़ा पाठ ” जब तक चलती रहोगी , गिरोगी नहीं। और रुकने का भी, नीचे उतरने भी एक तरीका होता है। जैसे ऊपर चढ़ने का। ”

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वसन्त पंचमी का जुलूस – आइए आखों देखा हाल सुनाएं

वसंतपंचमी बी एच यू का स्थापना दिवस है। यह भी एक विचित्र संयोग है कि शुचि जिन- जिन जगहों से जुड़ी वे विद्या की देवी सरस्वती के स्थान थे। उसका योग आश्रम भी सरस्वती संप्रदाय का है और सरस्वती पूजा के दिन स्थापित हुआ था। पहले वह जानती भी नहीं थी कि सन्यासियों के भी अलग- अलग मठ होते हैं और उसी अनुसार वे नाम के अन्त में गिरि , सरस्वती , भारती….. आदि लगाते हैं। यह तो उसने जब एक सन्यासी की आत्मकथा पढ़ी थी, तब जाना। लेकिन उससे क्या !
आज तो सरस्वती पूजा है। सुबह चार बजे वह उठी थी। उसके हॉस्टल में भी सरस्वती की नई प्रतिमा आई है और सुबह घंटे बजे थे, सारी लड़कियों को पूजा स्थल पर नहा- धोकर तैयार हो कर आने के लिए। आज का ही दिन है जिस दिन वी सी हर हास्टल में चाहे पाँच मिनट के लिए, लेकिन जाते हैं। उसने पहली बार वी सी की शकल देखी। सुना था कि बड़े अनुशासित , कठोर व्यक्ति हैं। बी एच यू को सुधार दिया है। यह इन्हीं का कार्यकाल है जब इतनी शान्ति है बी एच यू में । छात्र संघ को भंग कर दिया गया है और सब ओर शान्ति ही शान्ति। वरना बी एच यू तो बरबाद हो कर रह गया था। पढ़ने लिखने का महौल ही नहीं। उसने श्रद्धा पूर्वक वी सी को देखा था। इन्हीं की वजह से वह यहाँ है , वरना क्या यहाँ रह पाती!
पिताजी आने ही नहीं देते। यही तो कहते रहे थे – “बी एच यू का वातावरण बहुत खराब है बेटी। वह तो जाने के लायक जगह नहीं है।” शुचि को कितना इंतजार करना पड़ा!

पूजा और प्रसाद के बाद शुचि भी अन्य लड़कियों के साथ हास्टल की छत पर जा चढ़ी। कुछ दस ग्यारह बजे सुबह । गुलाबी ठंढ । धूप में खड़ा होना अच्छा ही लगा। सारे नियमों को ताक पर रखकर इस बार छात्र संघ ने जुलूस निकालने का फ़ैसला किया है। झांकियाँ ले कर वे बी एच यू स्थापना स्थल तक जायेंगे जो हास्टल की छत से दिखाई देता है। शुचि भी तमाशा देखेगी। जब से आई तमाशा ही तो देख रही है , सारी घटनाओं से असंपृक्त। साक्षी मात्र। आज एक नया नजारा देखने को मिलेगा। वह उत्साहित है। कोने में रेलिंग से सटकर खड़ी है। सबके बीच, लेकिन थोड़ी दूरी पर।
शुचि ने ऐसा नजारा कभी नहीं देखा था।
नीचे मुख्य सड़क पर लड़कों का जूलूस चल रहा था । गेंदे के वासंती फ़ूलों से सजा रथ और कारें लुभावना दृश्य प्रस्तुत करतीं यदि उन पर वी सी मुर्दाबाद के नारे न लिखे होते। वी सी का पुतला न सजा होता और सड़क पर गुलाल उड़ाते, उत्तेजक भाषण देते छात्र नेता न होते। लाउड स्पीकर चीख रहा था और हॉस्टल की छत पर कानों पर हाथ रखे लड़कियाँ आहे भर रही थीं। “कितना हैंडसम है न सी पी., हाय! कलेजा मुँह को आता है!”
कमरा नम्बर ३२ की राधा ने सीने पर हाथ रख लिया -” क्या पर्सनालिटी है। एक नजर इधर भी देख लो।”
धूप में खड़ी – खड़ी लड़कियों के चेहरे लाल हो रहे थे। कुछ उत्तेजना से, कुछ धूप से। लाउड स्पीकर से चीख चीख कर उन्हें नीचे आने और जुलूस में शामिल होने का निमंत्रण दिया जा रहा था । पुलिस ने देखते ही देखते लाठी चार्ज शुरू कर दिया । छात्र नेता सी. पी. लाठियाँ खा रहा था और ऊपर छत पर खड़ी लड़कियों को चोट लग रही थी जैसे। शुचि अवाक थी!
वह चुपचाप नीचे उतर आई ।
हॉस्टल में लड़कियाँ अभी भी गुट में खड़ी ओ पी के लिए दुखी हो रही थीं – “पता है कपार फ़ट गया है सि पिया का । इतनी लाठी खाई है। वी सी को निकलवा छॊड़ेगा।”
“हाँ , और क्या निकलवा ही देना चाहिए। बनिया, साला !”

जाति महत्वपूर्ण है , व्यक्ति नहीं। कौन हैं ये कूढ़मगज लड़कियाँ – शुचि ने नजर दौड़ाई । उसकी अपनी रूममेट भी वहाँ थी। तो राजपूतों का गुट है। वह वहाँ से हट गई।

हास्टल में राजपूत लड़कियों की बहुलता हो ऐसा नहीं था। किन्तु नीचे के कमरों में अधिकांश कला संकाय की शोध छात्रायँ थी, कुछ तो कई वर्षों से रह रही , बनारस या उसके आस पास के क्षेत्रों से आई हुई। उनमें अधिकांश राजपूत थीं और छात्र राजनीति के विषय में वे एक राय रखती थीं। बी एच यू का शान्त , भयमुक्त वातावरण,समय पर होने वाली परीक्षाएँ, शिक्षा का वातावरण, उनके लिए महत्वपूर्ण नहीं था। छात्र संघ का भंग किया जाना महत्वपूर्ण था। राजपूत ग्रुप का वर्चस्व टूटना महत्वपूर्ण था। वी सी ने कोर्ट से आदेश ले रखा था। पाँच सालों की अवधि मिली हुई थी। उसके बाद ही छात्र संघ के पुन: चुनाव हो सकते थे। छात्र संघ स्थापित हो सकता था , यह सब शुचि ने उस दिन जाना। उसे खुशी हुई , वह काम कर सकेगी। पाँच साल बहुत होते हैं। वह अपनी पी एच डी जरूर पूरी कर लेगी। यहाँ से चली जायेगी। उसे किसी राजनीति से कोई मतलब नहीं था। किसी सी. पी. से कोई प्यार नहीं था, न उसने उसके रूप सौन्दर्य , व्यक्तित्व को ऐसा पाया कि बाकी लड़कियों की तरह आहे भरें।

बाल्टी बजाती लड़कियाँ

बनारस की गर्मी असह्य है। बनारस की गर्मी का यह उसका पहला अनुभव है। शुचि ने इतना गर्म मौसम कभी नहीं झेला। राँची की हरियाली और शीतल हवा की स्मृति अक्सर उसे तड़पा जाती है।गर्मी का मौसम पन्द्रह- बीस दिन बस, उसमें भी तापक्रम इतना अधिक कभी नहीं होता कि लू लगने जैसी कोई बात हो। उसे तो लू की समझ ही नहीं थी। कई दिनों तक तबियत खराब रही और वह उल्टी -सीधी दवाएँ खाती रही। फ़िर जब बुखार हो गया,भूख खत्म हो गई और हास्पीटल के चक्कर लगे तो डाक्टर ने लक्षण समझे- समझाए। वह कई दिनों तक कच्चे आम पका कर खाती और सारे बदन में लगाकर नहाती रही। अब स्वस्थ हुई है।

युनिवर्सिटी में गर्मी की छुट्टियाँ शुरू हो चुकी हैं। उसके गाइड ने उसे छुट्टी नहीं दी, न शुचि की हिम्मत हुई मांगने की। कुछ काम तो हुआ नहीं है अब तक। कुछ प्रयोग शुरु करने की योजना है। अभी नई लैब भी बनी नहीं। पुराने कमरे में कुछ नई मशीने रखी हैं जिन्हें पिछले पाँच सालों में मनीषा ने, बिना किसी की सहायता के, मैनुअल पढ़- पढ़ कर सेट किया है। अब शुचि है, सहयोगी।
हास्टल में बस शोध- छात्राएँ बची हैं लेकिन तब भी सौ के आसपास लड़कियाँ तो होंगी ही और पिछले तीन दिनों से हास्टल में पानी नहीं आ रहा है। पहले ऊपर की मंजिलों पर नहीं आ रहा था, फ़िर हॉस्टल के अन्दर के बागीचे के चारों कोनों पर जो चार नल हैं , सिर्फ़ उनमें पानी सीमित होकर रह गया। आज तीसरा दिन है, जब उन नलों में भी पानी एक घंटे से अधिक नहीं आया। मेस महाराज मेस के पिछवाड़े बने नल से पानी भर कर खाना बना दे रहा है और सारी लड़कियाँ बिना नहाए- धोए घूम रही हैं। बाथरूम सूखे पड़े हैं । टायलेट गंदे। पसीने से चिपचिपा शरीर।
शुचि विभाग से लौटने के बाद , सांझ ढले, दिव्या के कमरे में थी , जब उसने “गतिविधि- विचार मंच” से जुड़ी अमिता सिन्हा का उत्तेजित स्वर कारीडोर से नजदीक आता सुना – “चलो- चलो निकलो बाहर। ऐसे नहीं चलेगा। सबलोग वी सी लाज जायेंगे। तीन दिनों से पानी नहीं आ रहा। हमींलोग हैं जो बर्दाश्त कर रहे हैं। लड़कों का हॉस्टल होता तो…..

शुचि को यही बात अच्छी नहीं लगती। बात- बात में लड़कों से तुलना ! उसे अमिता सिन्हा का व्यक्तित्व प्रभावित करता है । तेज तर्रार , साँवली सी लम्बी लड़की। इकोनामिक्स में शोध कर रही हैं। दिव्या दी की बैचमेट। अपने अन्दर एक तूफ़ान उठाए घूमती हैं जैसे। कहीं भी , कोई भी, अधिकारों की लड़ाई लड़नी हो- सबसे आगे। लेकिन ये सारे समय लड़कों से तुलना क्यों करती रहती हैं? लड़के , लड़के हैं , हमें उनसे क्या? हमें उनके जैसा क्यों बनना है। लड़के सबकुछ सही तो नहीं करते ? हमें अपनी बात कहनी है, कहेंगे, अपनी लड़ाई लड़नी है , लड़ेंगे, अपनी लड़ाई अपने तरीके से। लेकिन फ़िलहाल अपना तरीका क्या होना चाहिए , वह नहीं जानती।

“चलो, सब चलो। कोई हॉस्टल में नहीं रहेगा। बाल्टी ले लो अपनी और चलो। चलो ताला लगाओ कमरे में।” अमिता सिन्हा का स्वर पास आता जा रहा था।

“दिव्या दी , मैं नहीं जाउँगी।” शुचि कोई निर्णय लेने में असमर्थ, घबरा सी गई। भला कभी आजतक उसने ऐसा कोई काम किया है! किसी हडताल, लड़ाई, धरने में हिस्सा लिया है? वह तो अच्छी लड़की रही है हमेशा। चुपचाप पढ़ाई करने वाली। कम बोलने वाली।

“दिव्या आ रही हो?” अमिता ने दिव्या के कमरे का पर्दा हटाकर अन्दर दखिल होते हुए पूछा।
“मुझे छोड़ दो। मेरी पी एच डी का लास्ट स्टेज है।”
“और यह ? चलो तुम।” उसने शुचि को आदेश दिया।
“मैं अपना कमरा लैच करके आ गई थी। “शुचि ने बचने की कोशिश की।
“जाओ। बन्द करके आओ। अपनी बाल्टी भी ले लेना। वी सी लाज पर धरना देना है। वहाँ लान में बैठकर बाल्टी बजायेंगे। चलो जल्दी करो। ” वह अगले कमरों से लड़कियों को निकालने आगे बढ़ गई।

दब्बू शुचि ने फ़िर विनती की “दिव्या दी मैं नहीं जाउँगी।”
“तुम कहीं छुप जाओ। ” दिव्या ने रास्ता सुझाया। और सचमुच जब अमिता सिन्हा वापस सारे कमरे टटोलती , बन्द दरवाजों की गिनती करती वापस दिव्या के कमरे में उसे ढूँढ़ने घुसी तो शुचि दरवाजे के ही पीछे छुपी हुई थी। छुपी रही तबतक, जब तक कि अमिता सारी लड़कियों को जमाकर नीचे की मंजिल पर नहीं चली गई। डरपोक , दब्बू शुचि। ऐसी ही थी वह तब!

रात दो बजे हॉस्टल में पानी आ गया था। लड़कियों ने रुक रुक कर , कुल जमा कुछ दो घंटे बाल्टियाँ पीटी। वी सी शहर से बाहर थे। रात डेढ़ बजे लौटे। उन्हें खाली बाल्टियों का मधुर स्वर सुनाया गया, तब पानी आया। यह सब शुचि ने अगली सुबह जाना। उसे अपने न जाने पर , सबों का साथ न देने को लेकर कोई शर्म नहीं महसूस हुई। वह अच्छी लड़की थी!

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कृष्ण कथा

“मोनिका, तुम आजकल कृष्ण- कथा नहीं सुनातीं?”
शुचि ने यह मजाक में कहा था, लेकिन मोनिका ने रोना शुरू कर दिया।
वह घबरा गई। वह जो दो सप्ताह की छुट्टी लेकर घर चली गई थी , उस बीच क्या अघटनीय घटित हो गया! वह तो इस लड़की से बोर हो चुकी थी। एक यह और एक इसका ब्वाय फ़्रेंड। इसी के विभाग का है , इसी की जाति का। सो भविष्य में शादी को लेकर कोई असमन्जस नहीं। वह तो होगी ही। शुचि में उसने अपना श्रोता ढँढ़ लिया है। शुचि विभाग से लौटकर सीधे मेस जाती है फ़िर वहाँ से नाश्ता कर पैर धोकर कमरे में। अगर मोनिका सिंह उस वक्त कमरे में हुई तो पक्का है कि एक डेढ़ घंटे बैठकर शुचि को उसे सुनना है। शुचि को ऊब होती है किन्तु प्रेम में पगा मन अपने प्रेमी की बातें न करें , तो क्या करे।
“पता है , उसने आज मेरा हाथ देखा।”
“अच्छा।”
“मैंने भी उसका देखा। उसकी तो यश की रेखा गजब की है, यार!”
“अच्छा?”
“तुम्हें भी तो हाथ देखना आता है न? जरा देख तो, मेरा प्रेम विवाह है या नहीं?”
“क्या जरूरत , आपको तो उससे शादी करनी ही है न?”
“हाँ , लेकिन वह बहुत गरीब परिवार से है। मैं इकलौती बेटी हूँ। इसलिए लगता है…. पापा को मना लूँगी।”
“आपसे शादी करके तो वह अमीर हो ही जायेगा। क्या चिन्ता?”
“हाँ , जिससे भी मेरी शादी होगी, उसे बहुत कुछ मिलेगा। यूँ भी हमारे घर में पैसे की कोई कमी नहीं है, इसीलिए तो पापा चाहते हैं कि खूब देख भाल कर शादी करें।”
“ठीक है , वह तो बहुत तेज है न?”
“अरे , हाँ रे ! मोनिका की आँखें गोल हो गईं । आई ए एस में नहीं निकला तो आई पी एस तो पक्का है। फ़िर यू पी का यू पी एस सी एक्जाम भी दे रहा है। कहता है, तुम्हारे ही लिए सब कर रहा हूँ ।”
“अच्छा।”
इस बार घर जाउँगी न तो पापा को बतलाउँगी। दोनो परिवार मिल लेंगे।”
यह किस्सा पिछले छह महीनों से चल रहा है ,अबाधित। छोटी -छोटी राई रत्ती बातें उसे सुननी पड़ती हैं। हॉस्टल गेट के पास दोनों को बैठे हुए , बातें करते भी देखती रही है। पी एम टी के नीचे भी। और मोनिका घंटों बाद रूम में लौटती रही है। “यह क्या खाक पढ़ती होगी”- शुचि ने अक्सर ही सोचा है! जब वह घर गई तो मोनिका भी जानेवाली थी। गई और सप्ताह भर में लौट भी आई है।
अब क्या पूछे!
“आप घर गई थीं न?”
“हाँ , पापा तो मान गए थे। भाई ने सब गड़बड़ की । उनका घर देख आया और फ़िर उनके मुँह पर कह दिया कि हम ऐसे भिखारियों के घर रिश्ता नहीं करते। मदन को बात चुभ गई। वही अड़ गया है अब। मिलने भी नहीं आता। विभाग में एक दिन मिला , कह दिया कि मैं दूर रहूँ उससे।” रोते हुए मोनिका बता गई।

शुचि अपनी जगह से उठी और उसने हौले से अपना हाथ मोनिका के कंधे पर रख दिया। मोनिका का बाँध टूट पड़ा। वह उसके हाथ को अपने कंधे पर दबाए देर तक रोती रही।
शुचि चुप इंतजार करती रही । फ़िर जब उसका रोना थमा , तो उसने अपना हाथ धीरे से छुड़ाया , उसके कंधे सहलाए और कमरे से निकल गई। सोचती हुई कि इसे प्रेम कहेंगे क्या? मोनिका का पक्ष समझ में आता है किन्तु मदन ? ठीक ही है, वह इन झमेलों में नहीं पड़ती।
जाति एक ही है तो वर्ग आगे आया। बाधा बना। और मोनिका उसे बतला चुकी है “हमारे गाँव में लोग बहुत कट्टर हैं । एक लड़की ने प्रेम विवाह करना चाहा था दूसरी जाति के लड़के से तो भाइयों ने घर के आंगन में ही जमीन खोद कर गाड़ दिया था। कोई कुछ नहीं कर सका।” उसी गाँव की मोनिका बीएच यू आकर प्रेम विवाह का सपना देखती है और आश्वस्त है कि लड़का तो उसकी जाति का है। वह करके दिखाएगी।

कृष्ण छोड़ गया। राधा की नियति हर बार एक जैसी। पागल,प्रेमिका की।

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शुचि विभाग से लौटी तो मोनिका कमरे में नहीं थी। शुचि अब विभाग में व्यस्त होती जा रही है। सर ने कुछ धारित्र मंगवाए थे , उनकी धारिता मापना और फ़िर उन पर कोरोना डिस्चार्ज का असर देखना। कुछ अच्छे रिजल्ट मिले हैं। वह उनका विश्लेषण कर रही है। सदा की दोस्त मनीषा से शोध के अतिरिक्त साहित्य , राजनीति, दर्शन आदि अन्य कई विषयों पर बातें कर उसकी बौद्धिक तृप्ति भी हो जाती है। वह मोनिका से दूर ही रह्ती है। पहले भी उसका असमय कमरे में खाना बनाना उसे पसंद नहीं था । उसकी नींद बाधित होती और यह तो अब कभी भी कमरे में आती है और कभी भी जाती है। विक्षिप्तों सी घूमती है। शुचि ने औरों से जाना है कि ज्योतिषियों के चक्कर लगाती है। कई-कई दिन बर्तन नहीं धोती। खाना बनता है और बिस्तर के नीचे बर्तन सरक जाते हैं। जब शुचि कमरे में घुसती है तो बदबू का एक झोंका आता है। कमरे में जूठे बर्तनों की गन्ध भरी होती है। उसे चिढ़ होने लगी है अब। भाड़ में जाए इसका मदन। न मिला तो अपने को मार डालेगी क्या? और मरना है तो खुद मरे , शुचि क्यों झेले।
उसने अपनी अलमारी का दरवाजा खोला तो चौंक गई। आलमारी में चाय की पतीली पड़ी थी। पतीली में अभी भी थोड़ी चाय थी और ढेर सारी पत्तियाँ। पतीली हटाई तो पीछे कुछ लाल-काले धागे , ताबीज जैसा कुछ। शुचि डर गई। यह सब क्या है!
कमरे से निकलते ही सावित्री मिल गई। इसके कमरे में शुचि ने कई रातें काटी हैं । तीसरी मंजिल पर रहती है सावित्री। सोशल साइन्स की शोध छात्रा। कामन रूम में रहने के दौरान एक दिन आकर परिचय कर गई थी। कामन रूम में सब आते थे, देखने के लिए । कितनी लड़कियाँ हैं , कहाँ कहाँ से हैं ! सबसे ज्यादा दोस्तियाँ वहीं हुईं। अब, जब से मोनिका सिंह ने आधी रात को छौंका लगाना शुरू किया है, शुचि भागकर उसके कमरे में चली जाती है। उसकी रूम मेट नहीं है फ़िलहाल और शुचि वहाँ पड़े दूसरे बिस्तर पर चुपचाप सो जाती है। एक अनकहा समझौता है दोनों के बीच और सावित्री पूरी नारद है। आजकल मोनिका की खबरें उसे उसी से मिलती हैं। शुचि और मोनिका के बीच अबोला चल रहा है। शुचि ने चिढ़ कर कुछ तीखी बात कह दी थी मदन के विरुद्ध। मोनिका का प्रेम अभी बाकी है , सुन नहीं सकी।
“आपकी रूममेट तांत्रिक के पास गई है।’
“सच?”
“कई दिनों से जा रही है। वह कहता है कि मदन का मन फ़ेर देगा। मदन उससे बात करेगा और शादी भी।”

“आपको उसने बतलाया?”

“हाँ , भई , कुछ ताबीज ले कर आई है। कुछ धागे।”
“किसे बाँधेगी?”
“पूछिए आप।”
शुचि को याद आया कुछ ही महीने पहले महिला महाविद्यालय की एक लड़की के कमरे से खोपड़ी मिली थी। वह श्मशान से उठा लाई थी। किसी लड़के से प्रेमभंग के बाद किसी तांत्रिक के सुझाव पर उठा लाई थी। अभिमंत्रित खोपड़ी। उसे वार्डन ने मानसिक संतुलन खो देने का आरोप लगाते हुए हॉस्टल से निकाल दिया था। परिसर के सारे हास्टलों में खलबली मची हुई थी। जितने मुँह उतनी बातें। उसके कमरे में भी कुछ भी हो सकता है! फ़िर कहानी बनेगी!

अपनी आलमारी में देखी गई चाय की पतीली और ताबीज उसकी आँखों के आगे घूम गए।
शुचि को लगा, कमरा बदल लेने का वक्त आ गया है।
अमृता का कमरा अभी -अभी खाली हुआ था । उसकी रूम मेट अपनी पी एच डी समेट कर जा चुकी थी। शुचि को जैसे इसी का इंतजार था। वह अमृता के कमरे में वार्डन से अनुमति लेकर शिफ़्ट हो गई। जैसे अपने शोध कार्य में एक कदम बढ़ी थी , हॉस्टल में स्वनिर्णय से लिया गया यह पहला कदम था।

पहला प्रेरणास्पद व्यक्तित्व

उस दिन भी वसंत पंचमी ही थी। लेकिन पूरे एक साल बाद आई दूसरी वसन्त पंचमी। तब तक बहुत कुछ बदल चुका था , शुचि के लिए। वह एक बार घर भी हो आई थी। एक बार फ़िर लगा था कि वह घर में अपेक्षित नहीं है। पिता का स्नेह मरा नहीं है , माँ वही है लेकिन नौकरी कर रही बहन ने फ़िर से कटूक्तियों से नवाजा और किसी में उसे कुछ भी कहने की हिम्मत नहीं थी। शुचि ने फ़िर नये सिरे से महसूस किया था कि घर जाने की कोई जरूरत नहीं है। यदि वह गई तो इसलिये कि हास्टल में लड़कियाँ पूछती थीं कि वह घर क्यों नहीं जाती ! कुछ समय बाद शायद यह आवरण भी हट जाये। या की कोई नई वजह बन जाये , घर जाने की। कौन जाने!

रात ढले शुचि अमृता से कमरे में गप्पे लड़ा रही थी। अब वे रूम मेट हैं। अमृता पहली मंजिल पर है। कमरा नम्बर पचपन। शुचि अब खुश है। हास्टल में भी अब दोस्तों के साथ है।
अचानक कमरे की बिजली चली गई।
कमरे का दरवाजा उढ़का हुआ था ,अमृता ने आगे बढ़कर पूरा खोल दिया।
“पूरे हॉस्टल की बिजली गई है।”
“पटाखे छोड़ रहे हैं क्या ? ये आवाजे कैसी हैं?”
वे बाहर निकल आईं ।
“चलो सारी लड़कियो, नीचे उतरो जल्दी। मैदान में आ जाओ। कमरे से भागो। नीचे आओ।” पुकार सुनकर वे दोनों भी सीढ़ियों की ओर भागीं । “लेकिन हुआ क्या है?” “नीचे चलो दीदी, पता चल ही जायेगा।”

वह और लड़कियों के साथ लगभग भागती सी, अबूझ चेहरा लिए मैदान में उतर आई। सामने आग लगी हुई थी। बिजली के सारे तार जिस मेन स्विच से जुड़े थे, उस बाक्स में आतिश्बाजियाँ छूट रही थीं । पूरे हास्टल में घुप अँधेरा छा गया था। सरस्वती की प्रतिमा के ठीक ऊपर , बगल में लगा मेन कनेक्शन और उससे आगे हॉस्टल का प्रवेश द्वार। कौन आगे बढ़ेगा । मेन स्विच आफ़ करेगा ! सब दम साधे देख रहे थे। रात के ग्यारह बजे।
-किसी भी तरह यह मेन ऑफ़ हो जाता तो कम से कम ये चिनगारियाँ रुक जातीं ।बी एच यू पावर हाउस को खबर करो। इस तरह तो पूरे हॉस्टल में आग लग जायेगी । शाट सर्किट है।
-बाहर जाकर किसी को बुलाओ, मेन स्विच आफ़ करे। महावीर कहाँ है?
-इतनी तेज आवाज ,चिनगारियाँ, तुम्हें दीखता है कुछ? खुद ही क्यों नहीं चली जाती।
-कैसे जायेगा कोई । मरना है। उस आग के पास से बाहर जा सकती हो तुम?
– सही बात है।
-टेलीफ़ोन भी तो वहीं पर रखा है। नहीं तो फ़ोन ही कर लेते।
जितने मुँह उतनी बातें।
आवाजें और शोर ….। शुचि श्रोता और दृष्टा । बस।
सहसा भीड़ में से अमिता सिन्हा निकली और बिजली की गति से बाहर हो गई। पूरी भीड़ ने दम साध कर देखा। वह निकली और उसी गति से कुछ मिनटों में वापस लौटी। शान्त आवाज में उसने लड़कियों को सम्बोधित किया- “सड़क पर दो लड़के साइकिल पर जा रहे थे। उन्हॆँ सारी स्थिति बतला कर भेजा है कि मेन पावर हाउस में सूचित करें और हमारे हॉस्टल का कनेक्शन काट दिया जाय। वरना आग फ़ैल सकती है। जब तक यह आतिश बाजी बन्द नहीं होती कोई अपने कमरे में नहीं जायेगा। पन्द्रह मिनट लगेंगे उन्हें और क्या!”

सचमुच कुछ पन्द्रह मिनट में पटाखे छूटने बन्द हुए और पूरा हॉस्टल पूर्ण अंधकार में डूब गया। लड़कियों ने चैन की सांस ली।
“जरूर इ बार सुरसती मैया की पूजा में कौनो गड़बड़ होई रही।” मेस महाराज ने पहली बार अपनी राय दी।
सब अपने अपने कमरे में गए।
शुचि ने याद किया ,अमिता सिन्हा ने बाल्टियाँ बजवाई थीं!
उसे अमिता सिन्हा को जानना है। बहुत साह्सी है यह लड़की । वह उसके जैसी बनना चाहती है। लेकिन
सांवली लम्बी अमिता सिन्हा के अन्दर की आग की आंच को महसूसती शुचि उसके करीब जा पाती उसके पहले ही अमिता सिन्हा एक दिन हॉस्टल से चली गई। शुचि ने औरों से ही जाना कि अमिता दी किसी मध्यम वर्गीय परिवार से थीं। आर्थिक कठिनाइयों से गुजर रहा उनका परिवार उनकी कोई मदद नहीं कर सकता था। वे बी एच यू फ़ेलोशिप ले कर पी एच डी कर रही थीं और उन्हें अपना काम खत्म करके जाना ही था। क्या उन्हें नौकरी मिल गई? शुचि ने पूछा था ।
“नहीं , लेकिन ढूढ़ लेंगी वो। उन्हें अपने बूते पर जीना आता है!”
ऐसी ही तो बनना चाहती है शुचि भी । अपने बूते पर जीना चाहती है!

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“शुचि तुम टयू्शन करोगी? भौतिकी जैसे विषय में टयूशन बहुत आसानी से मिल जाते हैं । सप्ताह में दो दिन पढ़ा दिया करना।”
बगल के कमरे की , इंगलिश में दो सालों से पी एच डी कर रही , प्यारी सी शकल और मोटी मोटी आँखॊं वाली स्नेहा दी पूछ रही थीं। बहुत प्यार करती हैं उसे। शुचि जानती है। अक्सर सोचती है कि इनका नाम स्नेहा इन पर बिल्कुल ठीक उतरता है।इस कमरे में आते- आते ही , उसकी इनसे दोस्ती हो गई और अब तो वह उनके बारे में सब जानती है। डॆहरी ओन सोन की हैं। घर की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं। माँ स्कूळ टीचर। पिता किसान। घर की खेती है । महीने में एक बार घर जाकर अनाज उठा लाती हैं। रूम कुकिंग करती हैं मोनिका की तरह लेकिन बेहद साफ़- सुथरे अन्दाज। कमरा साफ़ – सुव्यवस्थित। पढ़ने का महौल।

उनसे मिलकर शुचि ने जाना कि बहुत सी लड़कियाँ आर्थिक कारणॊं से भी कमरे में खाना बनाती हैं। बी एच यू में फ़ीस अधिक नहीं , इसलिए साधारण घरों के बच्चे भी यहाँ आ सकते हैं। पढ़ाई कर सकते हैं । आगे बढ़ सकते हैं। जीवन में कुछ करने का, बनने का सपना पाल सकते है॥ और उनके सपने पूरे होते भी हैं। बी एच यू एक नाम है , एक मुहर! जिसका अब भी डंका बजता है देश में।

स्नेहा दी ने बतलाया था।

” मेरी माँ मुझे पचहत्तर रूपये देती है , महीने में।”
“बस ? इतने में हो जाता है?”
“हाँ , और क्या! बारह रुपये ट्यूशन फ़ी। पन्द्रह रुपये हास्टल फ़ीस। बाकी सब्जी, कापियाँ वगैरह खरीदना, .. हो जाता है आराम से। साइकिल है, कहीं आने जाने के लिए। कुछ बचा लिया तो ४०-४५ रूपये में तो गुदौलिया में अच्छा सलवार कुरता मिल जाता है।”

शुचि ने मन ही मन एक बार फ़िर महामना मालवीय की स्मॄति को नमन किया।
वह सही जगह पर है।

“कौन है? किसे पढ़ाना है?” उसने पूछा।
“एक लड़की है। प्लस टू में पढ़ती है। अस्सी पर रहती है। साइकिल से चली जाना। दो सौ मिल जायेंगे।”
लेकिन अस्सी जाना उसके लिए मुश्किल था। इतना साइकिल चलाने का अभ्यास नहीं था । दुर्गा मन्दिर से आगे अब तक साइकिल से नहीं गई थी। सोचा, मिल कर देखे।

वह अगले ही सप्ताहान्त में स्नेहा दी के साथ उस लड़की के घर हो आई। व्यापारी परिवार। सांवले, गोल मटोल प्यारे से चेहरे वाली पुष्पा सेन्ट्रल स्कूल की छात्रा थी। पीढ़ियों से बनारस में रह रहे थे वे लोग। शहर की राइ- रत्ती खबर रखने वाले। उसे वे ठीक- ठाक लोग लगे। थोड़ी बातचीत के बाद उसने पढ़ाने को हामी भर दी, लेकिन शर्त यह कि केवल रविवार को पढ़ायेगी। सप्ताह में एक दिन केवल। और यह भी कि वह अस्सी नहीं जायेगी। वह लड़की उसके पास आयेगी। दोपहर दो से चार का समय।
पुष्पा ने स्वीकार लिया।
अब शुचि का रविवार का दिन भी कार्य व्यस्त रहता।

लेकिन मन की गाँठें खुल रही थी। आंशिक आत्मनिर्भरता का अहसास भी आत्म विश्वास बढ़ाता है।
वह घर पर बतलाने से डरती थी। पिता जी को यह बिल्कुल पसन्द नहीं था कि उनके बच्चे टयूशन पढ़ाएँ। वे अभी नौकरी में थे। यह आर्थिक आधार बड़ा नहीं था लेकिन उनके हिसाब से पर्याप्त था। बच्चों का ट्यूशन करना उन्हें असह्य था। किसी की सहायता के खयाल से बिना पैसे लिए पढ़ा देना स्वीकृत था।
उसने घर पर सूचना न देना उचित समझा।
जब अगली बार घर जायेगी तो बतला देगी।
घर से आये पैसे थोड़े-थोड़े कर बैंक में जमा होने लगे।

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बिग-बास

१९८९ का साल उसके लिए बहुत कुछ ले कर आया। अनुभवों का नया संसार। अब तक वह हास्टल में व्यवस्थित हो चुकी थी। विभाग में मनीषा के साथ जुटी रहती। प्रो. रैणा कभी पिलानी , तो कभी टाटा इन्स्टीट्यूट बम्बई से सिलिकान वेफ़र मंगवा लेते और वह और मनीषा , नई बनी लैब में उनका आक्सीकरण कर फ़िर मेटल डाट जमाकर उनपर धारित्र बनाने की कोशिश करते।डायोड बनाने की कोशिशें होती। डायोड तब भी बन जाते लेकिन कैपेसिटर बनाने की उनकी तमाम कोशिशें असफ़ल रहीं। हाँ , यह हुआ कि पूरे साल भर की मेहनत और इस दिशा में शोध ने उन्हें यह समझ दे दी कि उनकी लैब का वह स्तर नहीं , न हो सकता है , कि वे शोध के लिए अपने मेटल- आक्साइड- सेमीकन्डक्टर यहाँ बना सकें। बने बनाए धारित्रॊं पर काम करके ही आगे बढ़ा जा सकता है। मनीषा और वह सारे वक्त इस विषय से सम्बन्धित जानकारियाँ जुटाते और सर के सामने पहुँच जाते

– सर , मेडीकल ग्रेड के नहीं , इलेक्ट्रानिक ग्रेड के केमिकल चाहिए।
– मालूम है भई। लेकिन अपने फ़ंड में उतने पैसे नहीं हैं।
– सर , आयलर ग्रेड टू की गैस होनी चाहिए।
– फ़ंड नहीं है। एक बार मंगवाया जा सकता है, लेकिन बार- बार नहीं।
शुचि और मनीषा के चेहरे बुझ जाते।

– सर,अपना डि आयोनिज्ड वाटर इतना अच्छा नहीं है। डिवाइस में सोडीयम बहुत आ रहा है। कैरेक्टरिस्टिक्स स्टेबल नहीं है।
– हाँ, सो तो है!
वह और मनीषा एक- दूसरे को देखते । “सो तो है !” लेकिन करें क्या? वे सर के कमरे से निकलतीं और एक -दूसरे को देखकर फ़िक्क से हँस देतीं।
सच यह था कि वे भी जानती थीं कि उनके सर के हाथ में कुछ नहीं है। प्रो. कुन्द्रा सारी कमेटियों में घुसे बैठे हैं। सारे फ़ंड उनके हाथ में हैं। कहीं के चेयर मैन हैं, कहीं प्रेसिडेंट , कहीं वाइस प्रेसिडेण्ट। सेक्शन इन्चार्ज। सारी गोटियाँ उनके हाथ में । सबसे प्रभावशाली व्यक्ति – विभाग का। उन्हें अगर कोई टक्कर दे सकता था तो वह प्रो. सक्सेना थे किन्तु वे सुपर कन्डकटर में काम कराते थे।उनका सेक्शन अलग था। वे भी अपने क्षेत्र के महारथी थे और राजनीति से अधिक उन्हें शोध के क्षेत्र में अपनी पहचान बनाने की चिन्ता थी। अपने शोध छात्रॊं को सताये रहते। उन्हें कोई फ़र्क नहीं पड़ता था कि उनके छात्र उनके बारे में क्या कहते हैं । उन्हें अपने विषय का महारथी साबित होना था। यश पाना था।
महुआ , जिसने उसी साल उनके विभाग में शोध शुरु किया था , ने बतलाया था। उसे बुखार था , वह सर के पास पहुँची
” सर , आज काम नहीं कर सकूँगी। बुखार है।”
” तो दवा लीजिये। कमरे में जाकर बैठने से तो काम नहीं होगा। मुझे भी फ़्लू है । मैं तो काम कर रहा हूँ।”
“काहे का फ़्लू? झूठ बोल दिया। हमारा बीमार होना उन्हें कभी नजर नहीं आता।” उसने जोड़ा।
“लेकिन खुद भी तो विभाग में रहते हैं ।” मनीषा ने टॊका था।
“हाँ , यह तो है।”
“उस सेक्शन में हम सब बन्धुआ मजदूर हैं।” महुआ ने बतलाया था। “किसी को कोई छुट्टी नहीं मिलती। सुबह ९ बजे से रात आठ बजे तक तो काम करना ही करना है।”
” न करो, तो क्या होगा?”
“सर, पी एच डी होने नहीं देंगे।”
“इतना ? इतना नहीं कर सकते।”
“हाँ , पी एच डी होने नहीं देंगे। साल दर साल घसीटते रहो। पेपर छपेंगे तो पहला नाम उनका। बहुत गंदा वातावरण है। व्यवहार भी बहुत बुरा । सारे क्यूबिकल्स में इन्टर्काम है। कभी भी बुलायेंगे , डाँटेंगे। कब चाय पीने गए, कितनी देर लैब में काम किया , सब पर नजर रखते हैं।”
“इसीलिए तुमलोगों का आउट्पुट अच्छा है।”
“उनका फ़ायदा है। हमें तो छह साल के पहले पी एच डी की डिग्री मिलने वाली नहीं। कितने भी पेपर हो जायें। जुबान लड़ाई तो शायद कभी न मिले। आज्ञा पालन करो ।”
“हाँ तो सब जल्दी चले गए, तो शोध कौन करेगा? ” शुचि हँसी थी।
“सही बात है। जब तक नया मुल्ला न फ़ंस जाये , पुराने से करवाते रहो। और जब नये आयें तो उन्हें सिखाओ , तभी तुम्हारी छुट्टी हो सकती है। ये सीनियर इतने बदमाश हैं , तुम सोच नहीं सकती। अपनी कुंठा तुम्हें तंग करके निकालते हैं। कुछ सिखायेंगे क्या , गलती करवायेंगे और फ़िर सर के सामने तुम्हारी गलती बताकर तुम्हारी इमेज खराब करेंगे।
“हद है। इलेक्ट्रानिक्स में ऐसा नहीं है।” मनीषा और शुचि ने स्वीकार किया था।

उस लैब में शोध छात्रॊं की संख्या सबसे अधिक थी। उसका राज भी शायद यही था।
प्रो. सक्सेना ने खुद भी कड़ी मेहनत की है। अपने विषय का ज्ञान है। कई बड़े पुरस्कार हैं उनके नाम। लेकिन अपने छात्रॊं के प्रति वे जरा भी सदय नहीं हैं। अपने प्रति भी नहीं रहे- मनीषा ने बतलाया। शुरु के वर्षॊं के उनका यह हाल था कि सुबह होते ही विभाग आ जाते और देर रात गये लौटते। उनका बेटा तभी पैदा हुआ था। विभाग में लोग पूछते “सर आपका बेटा कितना बड़ा हुआ ?” वह दोनों हाथॊं को चौड़ाई में फ़ैलाते और लेटे हुए बच्चे की लम्बाई बता देते ” इतना ?” सच यह था कि उन्होंने उसे हमेशा सोते देखा। जब घर पहुँचते , वह सोता होता। जब सुबह निकलते , वह सो रहा होता। अब बड़ा हो गया है लेकिन उसे अपने पिता से सख्त नफ़रत है। प्रो सक्सेना ने अपने विषय में जितना नाम कमा लिया हो , इनके घर में इन्हें कोई पसन्द नहीं करता।

उनके क्यूबिकल्स में शुचि कई बार गई थी। अपना कमरा उससे लाख गुना बेहतर है। उसे हमेशा यही लगा। अधिक स्वतंत्रता है इलेक्ट्रानिक्स में। लेकिन ऐसा इसलिए भी है कि वह प्रो. कुन्द्रा की छात्रा नहीं है।
प्रो. कुन्द्रा बेहद चापलूसी पसन्द , दुष्ट व्यक्ति हैं। उनके छात्रॊं को यह भी हिम्मत नही कि खुल कर उनके विरुद्ध कुछ बोल दें। जहाँ प्रो. सक्सेना के लैब का अन्दरूनी किस्सा खुली किताब है, प्रो. कुन्द्रा के छात्र कभी अपने लैब या सर की बुराई करते नहीं पाये जाते।
उसकी एक वजह और भी है। वे अपने छात्रॊं के अभिभावक हैं। हर एक का राई रत्ती हाल जानना, निजी मामले में भी दखल रखना और काम करवाना। हम सब एक परिवार हैं। यह उनका जुमला है। अमेरिका हो आए हैं । यह सब भी शायद वहीं सीखा हो। सुना है उनके घर में बीबी बास है और विभाग में वे। “अपनी कुंठा यहाँ निकालते हैं “- यह शुचि का मत है।
जो चापलूसी करे उसे सिर पर बिठा लिया, जिसने बुराई की, गद्ढे में गिरा दिया।
मनीषा भी उन्हें पसन्द नहीं करती लेकिन वे दोनों कभी भी दिव्या के सामने उनके बारे में कुछ नहीं बोलतीं।
दिव्या अपने लैब में अकेली शोध छात्रा है। बाकी सब लड़के। सबों का व्यवहार बेहद सहयोगी। शुचि के लिए भी और मनीषा के लिए तो होना ही था। सुबह नौ से पाँच वे काम करतीं। दिव्या कभी रात में भी रुकती लेकिन उससे शायद ही उसका काम आगे बढ़ता। कभी सुबह आठ बजे भी जाती । प्रो. कुन्द्रा कभी दस बजे से पहले न आते। उनके क्लास होते। लैब में अक्सर बारह बजे तक दिखाई पड़ते। आते तो शोध छात्रॊं में खलबली मचती। हाजिरी सी लगती।
शुचि और मनीषा इस सबसे मुक्त थीं। वे अपने समय से , जरूरत पड़ने पर , प्रो. रैणा से मिल लेतीं। वहाँ ऐसा कोई आग्रह नहीं था। बल्कि वे दोनों ही सर के पीछे होतीं कि काम आगे बढ़ना है। लेकिन बढ़े तो कैसे। ताला बन्द था। चाबी प्रो. कुन्द्रा के हाथ में थी।

वे दोनों कोशिशें करके थकने लगी थीं लेकिन इसी बीच प्रो. रैणा के पुराने छात्र और पिलानी में उच्च पदस्थ , मनीषा के लिए पूर्व परिचित , जे. सिंह गर्मियों में बी एच यू पधारे । उनकी लैब देखी। उनका काम देखा और कई सुझाव दे गये।

लगा सुबह हुई।
१९८९ का अन्त आते आते उनका पिलानी जा कर अपनी डिवाइस वहाँ से बना लाना तय हो गया। वे अब भविष्य के प्रति आशान्वित थीं।
उनकी वजह से दिव्या का काम भी बढ़ निकला था। मनीषा और शुचि के कैपेसिटर नहीं बने लेकिन दिव्या के डायोड बन गए। यूँ भी प्रो. कुन्द्रा की लैब अलग थी। मनीषा और शुचि उस लैब की यूनिट का उपयोग करती थीं। शुचि का कोरोना सम्बन्धी प्रयोग दिव्या की उपस्थिति में उस लैब में होता था। शुचि अब भी नई मानी जाती थी और उसे किसी से पूछ कर ही , अनुमति लेकर ही उस लैब में काम करना था। हाँ प्रो. कुन्द्रा के सामने वह नहीं पड़ना चाहती थी। प्रो. रैणा ने कह दिया था कि वह वहाँ काम कर सकती है और वह करती थी। प्रो. कुन्द्रा की नजर बहुत तीखी थी , वे जब सामने होते उसका सिरे से पैर तक निरीक्षण करते। वह जानती थी कि इन्हें खबर है कि वह क्या करती है। शुरूआती दिनों में एक बार प्रो. रैणा ने प्रो. कुन्द्रा से उसका परिचय कराया था।
जब से डि आयोनाइज्ड वाटर सिस्टम शुचि और मनीषा ने सेट कर दिया था, प्रो. कुन्द्रा के छात्रों को सुविधा हो गई थी। दिव्या पानी अब प्रो. रैणा की लैब से ले कर काम कर सकती थी। दिव्या काम समेट रही थी। एक सहयोग दोनों तरफ़ से था। शुचि और मनीषा जब लाइब्रेरी जातीं तो दिव्या के शोध सम्बन्धी पेपर्स की जानकारी भी ले आतीं।
लेकिन बिग बास प्रो. कुन्द्रा शुचि से खुश नहीं थे। उसके आने से प्रो. रैणा के शोध छात्र काम करने लगे थे। उनके साथ कुछ अन्य लड़कों ने भी शोध शुरु किया था। उनके पेपर बन रहे थे। खुद शुचि आगे बढ़ रही थी। उसका पहला पेपर स्वीकृत हो चुका था। यह सब ठीक नहीं था। लेकिन प्रो. कुन्द्रा मंजे खिलाड़ी थे । उन्हें उस दिन का इंतजार था जब शुचि कोई गलती करे।
उन्हें पता था, यह लड़की बोलती बहुत है। उनके सारे शोध छात्रॊं से भी दोस्ती है इसकी। अपने जूनियर्स को चिढा़ती और सीनियर्स की मुँहलगी है। सबकी स्नेह पात्र। विभाग के सारे समीकरण गलत करती यह लड़की किसी दिन तो फ़ंसेगी ही।
उन्हें उस दिन का इन्तजार था।

एक उदास अनुभव, एक नई दोस्ती

हास्टल में आजकल एक नाम अक्सर शुचि के कानों टकराता है – सविता! इस लड़की के चर्चे हैं।
यह लड़की विभा और निवेदिता के बगल के कमरे में रहती है। कामर्स की छात्रा। विभा- अमृता -निवेदिता की एक साल जूनियर। कामर्स में है। बेह्द चंचल, आकर्षक । विभा के कमरे में अक्सर मुलाकात हो जाती है लेकिन शुचि उसे सुनती है, देखती है। बोलती कम है। हँसती- मुसकराती सविता जैसे उसे आमंत्रित करती रहती है कि वह उससे खुले, उसे खुलने का मौका दे। लेकिन उस साल की होली से पहले शुचि का वास्तव में उससे परिचय नहीं हुआ था।
उस साल की होली कुछ विचित्र – विशेष रही।
वह हॉस्टल में उसकी दूसरी होली थी। पहली तो यूँ गुजरी कि उसे लगा ही नहीं था कि आज होली थी । नई-नई आई थी तब। कुछ थोड़ी सी लड़कियाँ जो हॉस्टल में छुट्टियों के दौरान रह गई थीं, उनमें से एक भी उसकी परिचित न थी । वह सारा दिन अपने कमरे में बन्द रही और बाहर का शोर बन्द होने के बाद , भोजन के समय नहा- धोकर मेस में खाना खा आई । किसी ने उसे छेड़ा भी नहीं , न कुछ पूछा। फ़िर सारा दिन कमरे में ।
दिन बीत गया।
लेकिन इस बार ऐसा नहीं हुआ।

वह चाहती भी नहीं थी। उसकी पूरी मित्र मंडली हॉस्टल में है। आज के खाने का मेनू कल दिन में ही सविता के कमरे में बन गया था। उसे अपने कमरे में खीर पकानी थी जो वह पका भी चुकी। लेकिन सविता के कमरे में वैशाली के साथ- साथ जो नई , खूबसूरत लड़की दिखी , लम्बी , कटे बालों वाली , नीली जीन्स और हल्की नीली धारियों वाली सफ़ेद कमीज में – वह हमारी मेहमान है आज के लिए जो हमारे साथ होली खेलेगी , यह जानकारी उसे अभी- अभी सविता से मिली है। वह अपने घर में लड़ाई करके कल रात ही वैशाली के कमरे में आ गई थी और शायद आज रात भी यहीं रहे। वार्डन को कोई नहीं बतलायेगा। यूँ भी किसे फ़ुरसत है आज। सब रंग खेलने के मूड में हैं।
इतनी खूबसूरत , इतना जहीन दिमाग और सीज्रोफ़ेनिया! “आम तौर पर इस रोग के रोगी असाधारण प्रतिभाशाली होते हैं । सिमी कौशिक भी है। भाषा पर गजब का अधिकार। अंगरेजी में इसके दो कविता-संग्रह मैकमिलन वालों ने छापे हैं। खूब बिक रहे हैं । “सविता ने जानकारी दी थी ।
“तब भी , मुझे तो डर ही लगेगा इसके साथ होली खेलते हुए ।” शुचि ने हिचकते हुए कहा था।
“कमाल करती हैं आप ? हम इसे एक सहज वातावरण देने की कोशिश कर रहे हैं कि यह अपनी परेशानी भूल जाए और आप हैं कि….”सविता ने वाक्य अधूरा ही छोड़ दिया था।
शुचि चुप हो गई थी।

लड़कियों की टोली पूरे हॉस्टल में घूम रही है। हाथों में रंग-गुलाल लिए , भूत बने चेहरे तमाम कमरों के दरवाजे पीट रहे हैं “हॊळी है! ” और हर पुकार पर लड़कियाँ अपने कमरे से निकल कर टोली में शामिल हो रही हैं। कुल जमा पच्चीस- तीस लड़कियाँ। इससे अधिक हॉस्टल में हैं भी नहीं। सब सप्ताह भर पहले घर भाग चुके। होली में तो हॉस्टल से बाहर सड़कों पर निकलना असंभव सा हो जाता है। इस कदर बदतमीजियाँ होती हैं। रात को हॉस्टल में सन्नाटा गूँजता है। तीन सौ लड़कियों में से इतनी ही रह जाती हैं। शुचि दूसरी मंजिल पर है । पूरे फ़्लोर पर सिर्फ़ तीन ही कमरे हैं जिनमें कोई है। रात को बाथरूम जाने में डर सा लगता है। इतना खाली- खाली सा कॊरीडॊर .. और यह सिमी ! कल रात चली आई। कैसे? कैसे क्या? ऒटो रिक्शा से। सीधे हॉस्टल के दरवाजे पर रुकी फ़िर सीधे अन्दर वैशाली के कमरे में। सविता खिलखिलाई । “हे सिमी , मीट शुचि दी “!
उसने आगे बढ़कर उसके गालों पर गुलाल मल दिया। शुचि के हाथ भी बढ़े और हल्के से उसके गालों को छूकर लौट आए। हरे गुलाल से हरे हुये गालों पर लाल गुलाल का स्पर्श देकर। फ़िर वह थोड़ा खिसक कर अमॄता के साथ चलने लगी। न, इन आँखों में एक भटकन-सी है। सहज नहीं लगती।
शोर बढ़ता गया।
वे हॉस्टल से निकल कर परिसर के अन्दर बने महिला कॉलेज के छात्रावास में घुस गए। वहाँ भी कुछ इतनी ही लड़कियाँ। सारा का सारा झुंड आंगन के बीचोंबीच बने फ़व्वारे के चारों ओर बिखर गया। फ़व्वारा कई दिनों से बन्द पड़ा है किन्तु उसके चारों ओर बने हौज में गन्दा पानी अब भी भरा है। रंग भरी कई बालटियाँ एक दूसरे पर उलेड़ी गईं फ़िर सविता ने अपनी खाली बाल्टी उल्टी कर बजाना शुरू किया ” होली खेलें रघुवीरा अवध में, होळी खेलें रघुवीरा ।” समवेत स्वर उठा और डूब गया । फ़िर से कुछ ने स्वर मिलाया । सिमी ने नाचना शुरू किया। शुचि मूक दर्शकों में। हाथों से ताल देती रही । होठों पर हल्की मुसकराहट लिए।
“इसकी पैंट कितनी टाइट है । फ़ट चुकी जाँघ पर। तब भी नाचे जा रही है।” विभा फ़ुसफ़ुसाई ।
“हाँ ।” वह इतना ही कह पाई।
एक आवेश तारी था सिमी के चेहरे पर। पागलों की तरह वह नाच रही थी अकेली। कुछ लड़कियों ने साथ दिया था पहले फ़िर वे अलग हट गई थीं। उसकी तरह तेज गति से कोई नाच भी नहीं पा रहा था। बस किनारे खड़ी ताल दे रही थीं। उत्साह भरे स्वर , शोर और हंगामा। खेल बढ़ता गया। फ़िर उसने मिट्टी उठाकर मिट्टी से होली खेलने का उपक्रम किया। कई लड़कियाँ शामिल हो गईं।
अमॄता ने शुचि को इशारा किया और वे दोनों चुपचाप भीड़ से बाहर हो गए।
बस इतना ही तमाशा उस दिन शुचि ने देखा था। वह खूबसूरत साँवला चेहरा- तीखे नाक- नक्श वाला- किसी भी फ़िल्मी हिरोइन को मात कर सकता था . गहरे आवेश में थिरकते पाँव और समवेत स्वर “होली है!”
वह अमृता के साथ कमरे में लौट आई थी। यूँ भी तब दिन का एक बज रहा था। धूप कड़ी लगने लगी थी और वे दोनों औरों के साथ कई बार रंग भरी बाल्टी उलट कर भीग चुकी थी, भिगो चुकी थीं – दोस्तो- परिचितों को। भीड़ में किसे होश रहता है। सब अपने ही थे। उस पूरी भीड़ में सिमी का परिचय या तो वह और अमॄता- विभा – निवेदिता जानती थीं या फ़िर वैशाली और सविता। बाकी किसी को तो कुछ मालूम नहीं था !
दोपहर का खाना सविता के कमरे में खाया गया था। दस्तरखान बिछ गया था जैसे। चेन्नई की विद्या वड़े- सांभर बना लाई थी। महाराष्ट्र की पूरन पोली लेकर शुभा आई थी। विभा और निवेदिता चावल और सांभर ले आये थे। सविता की पूरी मंडली- मानसी, वन्दना , विनीता , संगीता सब थे। दाल- पुलाव, राजमा , आलूदम , खीर , लेमन राइस, गोभी-आलू , टमाटर की मीठी चटनी, अचार और भी जाने क्या- क्या! इतना कुछ कि खाया नहीं चखा गया था और सबका पेट भर गया था।
उस महफ़िल में सिमी नहीं थी। उसने वैशाली के साथ मेस में होली का स्पेशल खाना खाया था।
तब इतना ही शुचि ने जाना था। शाम ढले सविता के कमरे में उसे जाते और रात गए निकलते देखा था। बस, वही शुचि की उससे आखिरी मुलाकात थी। सविता तीसरी मंजिल पर थी। शुचि ने अपने कमरे के बाहर की बालकनी से हाथ हिलाया था। जवाब सविता ने दिया था। उन दोनों ने तो उसे देखा भी नहीं था।

थकी हारी , कमरे में जो कुछ बचा खुचा था – पावरोटी और दूध खाकर वह जल्द ही सो गई थी। मेस तो रात को बन्द ही था। बीच रात में दो बार नींद टूटी थी । बाहर कुछ शोर- शराबा था। नींद उसकी रूम मेट अमॄता की भी टूटी थी।
“मेस महाराज ने पी रक्खी है , वही लोग होंगे , हल्ला कर रहे हैं।” अपने बिस्तर से अमृता ने आवाज दी थी।
“मुझे भी यही लगता है।” उसने जवाब दिया था। फ़िर दोनों ही सो गई थीं।
रात के हंगामे का राज अगली सुबह खुला था, जब वे नाश्ते के बाद सविता को ढूँढ़ती हुई उसके कमरे में गई थीं। तब सुबह के साढ़े आठ बज रहे थे। सविता के चेहरे पर रात्रि जागरण की थकान थी और बहुत सारी उदासी।”क्या हुआ सविता ?” शुचि ने पूछा था।
“घोड़े बेच कर सोती हैं आप ? कुछ पता ही नहीं आपको ।”
वह अबूझ सी उसे देख रही थी।
अभी अभी सिमी को उसके घर पहुँचा कर लौट रही हूँ। ब्रश भी नहीं किया है।”
“तुम क्यों गईं?”
उसे मेरे सिवा किसी पर विश्वास ही नहीं था। वह तो रात भर पायल बजाती हॉस्टल कारीडॊर में घूमती रही है। ग्राउन्ड फ़्लोर पर। ”
शुचि को याद आया , वैशाली ग्राउन्ड फ़्लोर पर रहती है।
“लेकिन क्यों?”
“क्यों क्या ! रात होने के साथ ही उसका पागलपन बढ़ने लगा था। शाम को मेरे कमरे में आई तो जाने का नाम न ले। एक छिपकली दिख गई दीवार पर । डंडा लेकर उसके पीछे। इतनी मुश्किल से गई। वैशाली ले गई हाथ पकड़कर , समझा-बुझा कर।”
“हाँ देखा था। तुमने हाथ हिलाया था मुझे। तभी ?”
“हाँ । फ़िर रात गए उसे भ्रम होने लगा कि कोई हॉस्टल गेट के बाहर खड़ा है। पिस्तौल लेकर। उसे मारने के लिए। बस छ्म-छ्म पायल बजाती कारीडोर में एक सिरे से दूसरे सिरे तक घूमना शुरू। पूरा हॉस्टल जाग गया था । मेस के लोग भी। जिस ओर जाती, लड़कियाँ डर के मारे दरवाजा बन्द कर लेतीं। फ़िर दरवाजे की सूराख से देखतीं। उसका हैलुसिनेशन बढ़ता गया। हॉस्टल की छत पर जा चढ़ी। “आज कूदकर मर जाना है। मुझे कोई पसन्द नहीं करता। सबके लिए बोझ हूँ मैं। घर में सब झेलते हैं मुझे। मेरा रिसर्च गाइड भी मुझे मरवाना चाहता है। मैं खुद ही मर जाउँगी ”
“बाप रे! फ़िर कैसे उतारा ?”
“वह किसी को करीब आने ही नहीं दे रही थी। मैंने ही हिम्मत की। सीधा उसकी आँखों में देखती , एक-एक कदम आगे बढ़ती , बातें करती , उसके एकदम करीब हो गई। “जानती हैं शुचि दी, उसकी आँखों में बच्चों सा भोला पन था।” वह चिल्लाती रही “डोन्ट टच मी।(छूना मत मुझे) नीचे कूद जाउँगी। वह बालकनी की चारदीवारी के ऊपर खड़ी थी तब। सारी लड़कियाँ नीचे से दम साधे देख रही थीं। फ़िर मैंने पूछा ” यू लव मी “? जाने कैसे उसने मेरी आँखॊं में देखा ,फ़िर बोली “यस”। ” देन व्हाइ डू यू वान्ट मी टू गेट अरेस्टेड ? इफ़ यू डाई देन दे विल ब्लेम मी “( तो तुम मुझे जेल क्यों भिजवाना चाहती हो ? यदि तुम मर गईं तो वे मुझे दोषी ठहरायेंगे) मैंने एकदम गम्भीरता से कहा। जाने कैसे बात उसकी समझ में आ गई। एकदम शान्त हो गई। नीचे उतर आई। लेकिन फ़िर थोड़ी देर बाद प्रलाप शुरू “यू नो, टुनाइट इज फ़ुल मून नाइट( तुम जानती हो ,आज पूर्णिमा की रात है)। फ़ुल मून डे ( पूर्णिमा के दिन) में सिज्रोफ़ेनिया का रोग बढ़ जाता है। मुझे सिज्रोफ़ेनिया है। यू नो?”
अपनी बीमारी के बारे में इतना पढ़ रक्खा है। वह भी उसकी मुसीबत है।”
“फ़िर ?”
“फ़िर क्या। आप तो सोती रहीं। इतने तमाशे किए उसने। इतना शोर मचाया। फ़ोन किया पुलिस को कि पेड़ के नीचे उसे मारने के लिए कोई खड़ा है। कई बार। पहले तो प्रॉक्टर आफ़िस वालों ने ध्यान नहीं दिया। सोचा होगा होली का तमाशा है, लेकिन वह बार-बार फ़ोन करती रही। उसे रोकने की कोशिश करके हम हार गए। पुलिस आई। कोई होता तो दिखता। हमें जवाब देना पड़ा। वैशाली को मानना पड़ा कि वह उसकी गेस्ट है और वह उसे घर पहुँचा देगी।”
” ओ माई गॉड!
“वह तो घर जाने को तैयार ही नहीं थी। सुबह होते ही ऒटोरिक्शा लेकर प्राक्टर आफ़िस वाले पहुँच गए। मैं उसके साथ गई। उसके घर छोड़कर अभी आ रही हूँ।”
सविता बेहद उदास थी। उसके लिए कुछ न कर पाने के एह्सास से दुखी। तब भी उसने एक दुर्घटना को घटित होने से रो्का था। वरना हॊस्टल के बरामदे में सिमी की लाश पड़ी मिलती।
शुचि की सांस रुक गई। इतनी साहसी है सविता ! इतनी भली। पागलों के साथ भी सहज रह सकती है। उन्हें रोक, मना सकती है। अगर वह हॊस्टल की छत से कूद जाती तो !
और एक वह है। मुर्दे की तरह सोती है। पूरा हॉस्टल जाग गया था। मेस के लोग निकल आए थे और वह और अमृता सोते रहे। “महाराज पीकर गा रहा है!”
लेकिन वह क्या कर लेती ! दर्शकों में ही होती। वह तो सविता के सिवा किसी की सुन ही नहीं रही थी। वैशाली की भी नहीं। सविता के अन्दर की भली , सुन्दर लड़की को उसने पहचान लिया था, शुचि की तरह। वह वाकई इन्टेलीजेन्ट है!
फ़िर धीरे-धीरे करके उसने सिमी के बारे में बहुत कुछ जाना था। उसकी पारिवारिक पृष्ठभूमि – बहुत ही संभ्रान्त परिवार से थी वह। उसकी परेशानियाँ , उसकी कुंठाएँ। उसकी असाधारण मेधा के किस्से सुने थे, लेकिन उसके करीब नहीं जा पाई। हालांकि वह यह भी जानती थी कि सिमी जिस यंत्रणा से गुजर रही थी , उससे बाहर आना उसके वश में नहीं था।
एक दिन वह भी आया , जब सिमी ने आवेश में वह कर डाला जिससे उस रात सविता ने उसे बचा लिया था।

आज, बहुत समय बाद, अपने कमरे में बैठी शुचि फ़िर से बेचैन हो उठी है। क्या वह सिमी कौशिक की माँ को मिल सकती है? कैसे मर गई वह? उसने सुना था, उसे यह बीमारी विरासत में मिळी थी, पिता से । वे बेहद प्रतिभाली वैज्ञानिक थे कभी। आज दुनिया में न हों लेकिन घर का आर्थिक आधार सबल था। उसे घर पर सहानुभूति और स्नेह पाने का हक तो था ?
कई बार औरों की उपेक्षा इन्सान को पहले मार डालती है , वास्तव में मरने से पहले।
सिमी कौशिक क्या पता, बहुत पहले ही मर गई थी ! बस शुचि की स्मृति ने उसे आज तक मरने नहीं दिया है और शायद वह सविता के लिए भी जिन्दा हो !
कुछ स्मृतियों की होली कभी नहीं जलती ……!
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मंडल कमीशन

शुचि और मनीषा अब तेज रफ़तार से चल रहे हैं। जनवरी में वे दोनों पिलानी हो आईं और अपनी डिवाइस बना लाई हैं। अब मनीषा इसी साल काम समेट लेना चाह्ती है। शुचि ने अगले साल का लक्ष्य रखा है। उनका सारा समय या तो लैब में माप लेते हुए, प्रयोग करते हुए या फ़िर लाइब्रेरी में जाता है । गप्पे मारने को वक्त कम है।

“आज लड़के फ़िर आयेंगे।” शुचि ने कारीडोर में सुना।
क्या करे , न जाए विभाग !
जाना तो होगा ही , यह तो रोज का तमाशा है। रोज -रोज न जाऒ तो सारे काम का भट्ठा बैठ जायेगा।
उसने साईकिल उठाई और विभाग की राह ली।
मनीषा नीचे ही मिल गईं।
“सुना है, लड़के आज फ़िर आयेंगे।”
“हाँ , पता है। मेरे सारे मेजरमेन्ट्स चल रहे हैं। बीच में रोका तो पूरा एक्स्पेरिमेन्ट गया। ज्यादा डिवाइस भी नहीं है कि बार -बार करते रहो।”
“सीताराम को कह देंगे, बाहर से आकर ताला लगा जाय और लड़कों के जाने के बाद आकर खोल जाय।”
“हाँ, यह अच्छा आयडिया है।”

शुचि की लैब मेजिनीन फ़्लोर पर है। विभाग में घुसते ही सामने जो पतला सा गलियारा नजर आता है उसमें सारे प्रोफ़ेसरों के कमरे हैं लाइन से। उन्हीं के बीच एक दरवाजा ऊपर को जाता है। जबतक ऊपर न चढ़ो ,किसी की समझ में नहीं आ सकता कि यहाँ ऊपर इतनी बड़ी लैब है। बस बाहर से लगे एयर कंडीशनर नजर आते हैं जो इतनी ऊँचाई पर हैं कि किसी को दूसरे तल्ले पर लगे होने का भ्रम हो सकता है,जबकि लैब बीच में है। एक तरह से यह अच्छा है कि जल्दी कोई ऊपर नहीं आता, दूसरी तरफ़ से खतरनाक – साँझ ढलने के बाद भी काम कर रही शुचि को कोई मार कर चला जाए तो लोगॊं को खबर अगले दिन लगेगी। वह भी तब, जब कॊई ऊपर चढ़कर देखने आए।

मनीषा के साथ वह लैब की एक चाभी सीताराम को थमा आई।
सब यही कर रहे थे। सीताराम मह्त्वपूर्ण महसूस करता हुआ मूँछॊं मे मुस्करा रहा था। लैब अटेन्डेन्ट्स भी कभी कभी बहुत महत्वपूर्ण हो जाते हैं!
“सीताराम जी लड़कों के जाने के बाद खोलना नहीं भूलियेगा। वरना हम भूखे-प्यासे मर जायेंगे।”
वह हँसा। “अरे जाइए बहिन जी , हम बन्द भी करेंगे और खोल भी देंगे।”
“अच्छा तमाशा बना रखा है इन लड़कों ने। जैसे कि रोज- रोज आकर सबका काम ठप्प करा देने से सरकार रिजर्वेशन वापस ले लेगी।” मनीषा भुनभुनाई।
“अजी उनका कहना है कि हमारे-आपके लिए ही तो वे लड़ रहे हैं और आप इतना सा सहयोग भी नहीं कर सकतीं ?”
“यह तो मैं भी मानती हूँ कि यह रिजर्वेशन गलत है। जाति के आधार पर आरक्षण का कोई अर्थ ही नहीं। आरक्षण आर्थिक आधार पर होना चाहिए। ब्राहमणों में भी बहुत सारे बहुत गरीब बैठे हैं। दूसरी ऊँची जातियों में भी।”
सरकार को वोट चाहिए। सत्ता में बने रहने को कुछ भी कर लो।”
“और लड़कों को न पढ़ने का बहाना। ”
हँसती हुई दोनो लैब में जा घुसी।
तब सुबह के नौ बजे थे।

दस बजते-बजते “मंडल कमीशन हाय- हाय ” रिजर्वेशन वापस लो। ” के नारे विभाग के सामने भी स्वर मिलाने लगे।
फ़िर वही शोर -” चलो बन्द करो सब। निकलो बाहर। पढ़कर क्या करोगे? कोई नौकरी मिलने वाली है ? सारी नौकरियाँ बैकवर्ड क्लास को जायेंगी। चाहे वो कितने भी अमीर हों। हम कटोरा लेकर भीख माँगेगे। कुछ समझ में आता है ? चलो बन्द करो। ”
शुचि की साँस ऊपर की ऊपर, नीचे की नीचे। मनीषा तो पानी पीने ऊपर गई थी। लौटी नहीं है अभी तक।
सीताराम ताला लगा गया। उसने ऊपर से ही सुना।
अब !
……………..
फ़िर नीचे जोर-जोर से खट्खटाने की आवाज !
“नहीं सर, कोई नहीं है। ये देखिए ताला लगा है। ” सभे लैब बन्द है। अरे गलत बात हो रही है तो कोय काहे काम करेगा। “वह दम साधे , दूर से आती सीताराम की आवाज सुनती रही।
कम्प्यूटर के स्क्रीन पर लगातार संख्याएँ उभर रही थीं। धारित्र की धारिता ५.०६ माइक्रो फ़ैराड, चालकता २ .०० सीमेन , पाँच वोल्ट पर। और द्शमलव दो के अन्तर पर शुचि को प्लस फ़ाइव से माइनस फ़ाइव वोल्ट्स तक की रीडिंग चाहिए।
बीच में छोड़ा, सब गया !
वह बैठी रहेगी।
लौटते हुए कदमों की पदचाप वह सुनती रही।
मन में गुरू जी, ईश्वर को याद करती रही। अब हर मुसीबत में पहले स्वामी जी याद आते हैं। शुचि ने उन्हें गुरू मान लिया है। आज का यह प्रयोग सफ़ल हो गया तो आगे भी ऐसे किया जा सकता है। सीताराम को चाय के पैसे दे देगी। हर रोज आकर समय से ताला लगा जाय और खोल जाय।
लेकिन मनीषा कहाँ हैं ?
नीचे पूरा सन्नाटा था। वह मह्सूस सकती थी !
शायद सारे लोग – प्रोफ़ेसर्स भी गए।
कुछ घंटे भर बाद , प्रयोग पूरा कर वह नीचे आई। सीताराम दरवाजा खोल गया था।
मनीषा घर गई। उसी ने बतलाया।
दोपहर के भॊजन के बाद जब वह वापस लैब में लौटी तो मनीषा वहाँ थीं। गुस्से से लाल।
“तुमने दरवाजा क्यों नहीं खोला ?”
“कब?”
“मैं नीचे का दरवाजा खट्खटा कर परेशान हो गई। तभी लड़के भी आ पहुँचे और फ़िर सीताराम आ गया ताला लगाने को। मुझे घर जाना पड़ा। अभी खाना खाकर वापस आई हूँ।”
अच्छा तो वह खटखटाहट मनीषा की तरफ़ से थी। तो तब तक ताला नहीं लगा था !
“अजीब लड़की हो तुम। फ़ँसा दोगी किसी को भी।”
“सॉरी।”

कितनी तो डर गई थी वह। अब समझ में आ रहा है !
साँझ ढले हॉस्टल लौटने पर कई लड़कियों का किस्सा सुना। सबने यही किया था।
लेकिन कुछ ही दिन। फ़िर शुचि ने हार मान ली। लड़के अब कभी भी आने लगे थे। उन्होने दूसरी लैब में तोड़- फ़ोड़ भी की थी।
“नहीं दीदी , हम रात को होने वाले एक्स्पेरिमेन्ट भी नहीं कर पा रहे। बाहर से लैब की लाइट दिखती है। वे पत्थर चला कर शीशॆ तोड़ गए।” शोध छात्रा के रूप में वापस लौटी अमृता बता रही थी। रूम मेट अंजना ने हामी भरी।
“अब भइया लोग भी कोऑपरेट नहीं करते। अकेले से लैब में डर लगता है।”
शुचि की लैब में तो कोई भइया नहीं । दूसरी लैब सब ऊपर हैं या फ़िर नीचे , जहाँ बहुत सारे शोध छात्र , छात्राएँ हैं। जो एक लड़का है, सर के साथ वह भी दूसरी लैब में काम करता है । मनीषा की पी एच डी जल्दी ही पूरी हो जायेगी। उसे तो अकेले ही काम करना है ।
कुछ महीने भर यह चलता रहा। फ़िर धीरे- धीरे सब यथावत।
लड़ाई को इतना लम्बा खींचो कि सामनेवाला थक कर हार जाए। या फ़िर आयोग बिठा दो।
शान्त हो गया सबकुछ। मंडल कमीशन की अनुशंसाएँ लागू हो गईं।
शुचि को पी एच डी के बाद नौकरी मिलेगी ? शायद लड़की होना काम आए। उम्मीद बची है अब भी ! सोचकर वह मन ही मन मुस्कराई।
वर्तमानकालानुसारेन वर्तयन्ति विचक्षणा: ।
वर्तमान में जियो ।

“छात्र संघ होता तो और बात थी। अभी तो सब खत्म है। वी सी ने छात्र संघ को भंग करने की कोर्ट से अनुमति ले रखी थी न। इसीलिए तो सब ठंढ़े पड़ जाते हैं इतनी जल्दी। नहीं तो बी एच यू……. !”

शुचि सुन रही है। कुछ हिसाब नहीं लगा पा रही कि छात्र संघ का न होना गलत हुआ है या बीएच यू की शान्ति गलत है! समय भाग रहा है और वह दौड़ रही है बस !

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एक मौत,एक अफ़वाह

शुचि दिव्या के कमरे में ही थी जब बाहर से जया लाल चेहरा लिए अन्दर आई ” दिव्या दी , उसने आज फ़िर मुझसे लड़ाई की।”
शुचि समझ गई । उसने हास्टल में घुसते वक्त देखा था । जया पेड़ के नीचे खड़ी रवि से बातें कर रही थी।

दिव्या हँस दी – ” आज क्या हुआ?”
“वह जिद कर रहा था । एक पेन मुझे गिफ़्ट करेगा। हमेशा कुछ न कुछ ले आयेगा और फ़िर जिद करेगा कि मैं रख लूँ । क्यों रख लूँ? वह कोई कमाता है क्या ? मैंने मना कर दिया तो गुस्से में पेन मेरे ही सामने तोड़ कर चला गया।”

वह हठात चुप हो गई जैसे उसने शुचि को अभी-अभी देखा हो और असमंजस में हो कि इस तरह उसके सामने यह सब कह डालना उचित हुआ या नहीं। वह बिस्तर पर जा बैठी और मेज से उठाकर एक किताब सामने खोल ली।

शुचि फ़िर से खराब चल रही कोटिंग यूनिट की बातों में उलझ गई। वैकुअम नहीं आ रहा । कब, कैसे शुरू होंगे उसके एक्सपेरिमेंट?

“ठीक है , मैं कल रहूँगी , तुम्हारे साथ।”
उसने आश्वस्ति महसूस की। यूँ भी इस उपकरण का उपयोग करने के लिए उसे दूसरी लैब में जाना पड़ता है जो दिव्या के सर की लैब है। वह यूनिट उन्हीं की है और विभाग में उनके दबदबे को शुचि महसूसती हुई चुप रहती है। पसन्द तो बिल्कुल नहीं करती।

जया दिव्या की रूममेट थी । दिव्या की ही तरह दुग्ध धवल वर्ण और मासूम चेहरे वाली। बाटनी में एम एस सी की छात्रा। सविता की बैच मेट। उसका यह मित्र रवि जो उसका राखी – भाई था , अक्सर ही चला आता था और शुचि ने उन्हें ढेरों बार वट-पीपल के जुड़्वाँ पेड़ों के नीचे खड़े बातें करते देखा। स्मार्ट जया की मासूम मुस्कराह्ट का प्रत्युत्तर वह मुसकरा कर देती हुई आगे बढ़ जाती थी। उसे कभी भी जया के करीब जाने की कोई आवश्यकता महसूस नहीं हुई। लेकिन तब वह सविता से जुड़ चुकी थी और सविता के लिए पूरा हास्टल अपना था। वह सबकी प्रिय, लेकिन उसकी बेचैन आत्मा शुचि के सान्निध्य में ही शान्ति पाती थी।

“थैंक गॉड , सवि तुम लड़का नहीं हो वरना बदनाम हो जाती मैं तुम्हारे साथ। इस तरह चक्कर लगाती हो मेरे कमरे के।”
“क्यों ? अभी भी हो सकती हैं | ” उसने गंभीरता से कहा था।
“क्या मतलब?” शुचि कुछ समझी नहीं थी।
“हम होमोसेक्सुअल भी हो सकते हैं ! ” उसने बनावटी गम्भीरता से कहा और फ़िर अपने चिर परिचित अन्दाज में ठहाके लगाने लगी।
शुचि नाराज हो गई ।
तुम्हारे दिमाग में कितना कूड़ा भरा है सवि!”
“कम आन शुचि दी। आप किस दुनिया में रहती हैं ?अपने ही हास्टल में हैं होमो लड़कियाँ।”
“मैं नहीं मानती।” शुचि अड़ गई।
सविता गम्भीरता से नाम बताने लगी, कहानियाँ सुनाने लगी , किन कमरों की कथा है, क्या कथा है सब।
शुचि अरूचि से सुनती रही। एकदम पका दिमाग है लड़की का।
उसे बिल्कुल भी यकीन नहीं आया लेकिन अपने लिए उसने तय किया कि जिन लड़कियों के बारे में सविता बता रही है,वह उनसे दूर रहेगी। चाहे बात में कोई सच्चाई हो न हो। यह तो दुनिया भर की खबरें बटोरने वाली पाकोमामा है!
उसके निश्छल मन को महसूसती, चुप वह उसे सुनती रही।

वह शाम खराब करके सविता चली गई।

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दिव्या दी अब बेहद व्यस्त हो गई थीं।
देर रात तक टाइपिस्ट के चक्कर लगाना । थीसिस से जुड़े ढेर सारे काम …. उनके सारे लैब मेट सहयोगी। इसलिए मनीषा और शुचि को कभी जरूरत महसूस नहीं हुई कि वे उनकी सहायता करें। उनकी शकल न विभाग में दिखाई पड़ती , न हास्टल में। शुचि जानती थी , वह अधिक से अधिक फ़रवरी १९९० तक यहाँ हैं। शुचि और मनीषा इस बीच पिलानी हो आये थे। मनीषा दी भी इस साल के अन्त तक विदा हो जायेंगी।
हास्टल में भी जिस तरह पिछले साल उसकी तमाम मित्र विदा हुईं , इस साल सविता विदा हो जायेगी। उसका और मनीषा का जाना शुचि को सबसे ज्यादा खलेगा। लेकिन उससे पहले बहुत कुछ घटित होना बाकी था।…
सारी परीक्षाएँ खतम हो चुकी थीं । जया का आखिरी पेपर था उस दिन, बस प्रैक्टिकल परीक्षाएँ बची हुई थीं , जब पूरे हॉस्टल का माहौल गरम हो गया था। शाम को विभाग से लौटकर उसने महसूसा कि सबकी निगाहें दिव्या दी के कमरे की तरफ़ लगी हैं। कमरे का दरवाजा खुला , लेकिन परदा पूरा बन्द है और हास्टल कारीडोर में यहाँ वहाँ बिखरी लड़कियाँ कमरे के अन्दर क्या हो रहा है , अन्दाजा लगा रही हैं जैसे।
शुचि जानती थी , दिव्या दी अपने सबमिशन में जुटी हैं । कमरे में जया ही होगी।
“दीदी , आपने सुना , जया के साथ क्या हुआ?” अन्जना ने कमरे में घुसते ही पूछा ।
अंजना शुचि की अगली रूम मेट है। अमृता पिछले साल एम एस सी करके चली गई। शुचि को आश्चर्य हुआ कि वह आज उससे पहले लौट आई है।
“नहीं ।”
“वो जो लड़का आता था न , जया से मिलने , उसने आत्महत्या कर ली आज। सब लड़के जया को ही कारण बता रहे हैं। कहते हैं उसे भी उसकी लाश के साथ फ़ूँक देंगे।”
“क्या बकवास है! वह उसका राखी- भाई है।”
” लेकिन सब ऐसे ही बोल रहे हैं।”
“जया कहाँ है ?”
“अपने कमरे में। बहुत रो रही है।”
“रोयेगी ही । बहुत मानता था वह उसे। वह भी उसे भाई ही मानती थी।”
“आपको विश्वास है!”
“हाँ।”
“मुझे भी लगता है दीदी, जया अच्छी लड़की है। वैसी नहीं है। लेकिन बी एच यू का माहौल गरम है। विभाग में सब उन्हीं की बात कर रहे थे। मैं चली आई।” अंजना ने बतलाया।

शुचि मेस में जाकर नाश्ता कर आई।
क्या करे । वह तो जया से बात करती नहीं। बस पहचानती भर है और दिव्या दी से उसकी तारीफ़ सुनती रही है।
‘शुचि दी ?” कुछ घंटॆ भर बाद सविता ने कमरे में कदम रखा।
“आ जाओ।”
आप जया से मिल आईं?
“नहीं।”
“क्यों?”
“समझ नहीं पा रही, जाऊ न जाऊँ । सुना, वह रो रही है।”
“तो और जाना चाहिए।”
“लेकिन मैं उसे जानती नहीं सविता। पता नहीं कैसे रियेक्ट करे। दिव्या दी होतीं तो चली जाती। क्या बात करूँ। कभी की नहीं। ”
“गजब की पत्थर दिल हैं आप। मैं गई थी। हास्टल में लड़कियाँ तो सब पागल हैं। उल्टी सीधी बोल रही हैं। आप बड़ी हैं। सीनियर हैं । आप जाइए।”
शुचि हिचकिचाई। उठी नहीं।
” ठीक है , शुचि दी , मत जाइए। मैं जाउँगी। शी इज सच अ नाईस गर्ल। सब आपके जैसे तो नहीं होते न। पत्थर के टुकड़े। नशतर चुभोते रहें हर बात पर।”
क्या वह नश्तर चुभोती रही है, सविता को? वह चोट खाती रही है और तब भी उससे अनुरोध करने चली आई है? शुचि ने बहुत अपमानित महसूस किया। नहीं , वह इतनी बुरी नहीं है, चाहे ऐसी ही इमेज वह प्रोजेक्ट करती रही हो- हार्ड हार्टॆड की।
वह जया के कमरे में गई।
जया बिस्तर पर बैठी थी। रुक- रुक कर रोती हुई। वार्डन कमरे में एक ओर कुर्सी पर बैठी हुई। उसे देख मुसकराई।
शुचि इसके लिए तैयार नहीं थी।
दिव्या दी आ गई ? उसने हवा में पूछा।
जया ने “न” में गर्दन हिला दी।
वह लौट आई।
“वहाँ वार्डन बैठी हैं। मैं चली आई।” उसने सविता और अंजना को सूचित किया।
फ़िर रात आठ बजे के पहले तक उसने दो चक्कर और लगाए। दिव्या तब भी नहीं आई थी। वार्डन वहाँ थीं। कारीडोर में लड़कियों की खुसुर-फ़ुसुर जारी थी।

रात साढ़े आठ बजे दिव्या दी ने उसके दरवाजे पर पुकारा ” शुचि !” और बदहवास कमरे के अन्दर चली आईँ।
“तुम मेरे साथ रहो। जया के साथ यह क्या हो गया? मुझे बहुत डर लग रहा है। आज रात मेरे ही कमरे में रहो।”
वार्डन दिव्या के आने के बाद चली गई थीं।
वह रात शुचि ने दिव्या और जया के बीच में रात्रि जागरण कर काटी। थकी दिव्या दी सो गई थीं । वह जया की अनवरत सिसकियों की अकेली गवाह रही।

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सुबह होते ही दिव्या जया का सामान पैक करा कर उसे उसकी लोकल गार्जियन के यहाँ पहुँचा आई। वार्डन ने ऐसा ही करने के आदेश भी दिए थे और जया जाना चाहती थी।प्रैक्टिकल परीक्षाओं में अभी वक्त था।
वहाँ से लौटीं तो हास्टल गेट पर एक अनजान चेहरे ने रोका।
आप जया वर्मा की रूम मेट हैं?
“जी हां। आपको किसने बतलाया?
उसने इशारा कर दिया । हॉस्टल का दरबान दूसरी ओर खड़ा था।

“आप कौन हैं ? आपका परिचय?
“मैं पत्रकार हूँ। मेरा नाम दीपक है। दैनिक “शान्तिदूत” की तरफ़ से आया हूँ। जया वर्मा का इन्टर्व्यू लेना है। ” उसने अपना कार्ड दिखा दिया।
“बौखला गई दिव्या।
“क्या इन्टर्व्यू लेना है आपको? वह घर जा चुकी है।”
“कहां गई।भाग गई? या भगा दी गई?” वह मुसकराया।
“आप पत्रकार अपने को समझते क्या हैं? सच्ची खबर तो छापेंगे नहीं ‘ कहानी बनायेंगे। “शान्तिदूत” की तरफ़ से आए हैं । अशान्ति फ़ैलाने… गुस्से में वह देर तक और भी जाने क्या- क्या बोलती रही। पत्रकार चला गया।
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शुचि ने सुबह बहुत थका महसूस किया। रात भर जागती रही थी। सोचा दोपहर के खाने के बाद विभाग चली जायेगी। कारीडोर से गुजरते हुए लड़कियों के हुजूम पर नजर पड़ी तो उत्सुकतावश वह भी पहुँच गई। क्या पढ़ा जा रहा है आज के अखबार में !
“देखो- देखो लिखा है , वह उसके नाम चिट्ठी और रुपये छोड़ गया है….
“क्या पढ़ रही हो ? ” उसने हवा में प्रश्न उछाला।
“लिखा है…..”
ये इसीलिए तो इस तरह लिखते हैं कि तुम सब पढ़ो। और तुम पढ़ रही हॊ इस झूठी बकवास को। ”
लड़कियाँ सकपका गईं । फ़िर एक- एक कर चली गईं , वहाँ से।
शुचि किसी को नहीं जानती थी। लेकिन वे सब उसे पहचानती थीं।
फ़िर वह सोचने लगी , कहाँ से इस तरह , इतनी तेज आवाज में बोलने का साहस आ गया उसमें ? कब से?
शुचि ने महसूस किया , वह बदल गई है!
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बनारस जैसे संकीर्ण मिजाज शहर के लिए यह एक बड़ी खबर थी। बहुत समय तक बी एच यू के अन्दर और बाहर लोग इसकी जुगाली करते रहे। घटना को कई तरीकों से व्याख्यायित किया गया और लड़की ने कुछ तो किया होगा – माना गया। शव के पोस्टमार्टम की रिपोर्ट आने पर जया को वह दूसरी चिट्ठी सौंप दी गई जो रवि उसके नाम छॊड़ गया था । पहली उसने अपने माता पिता के नाम लिखी थी। उसने जया को स्नेह् से याद किया था किन्तु जया वह चिट्ठी किसी को दिखाना भी नहीं चाहती थी। फ़ूट- फ़ूट कर एक बार फ़िर रोई। बस दिव्या और शुचि ने जाना और एक बार फ़िर उसका फ़ूट- फ़ूट कर रोना देखा।
फ़िर वह वापस घर चली गई । एक महीने बाद वापस आने के लिए।

शुचि अगले सप्ताहांत को, रविवार की दोपहर, अकेली ही थी कमरे में, जब अस्सी से पुष्पा, उससे हॉस्टल में पढ़ने आई। शुचि के बतलाने पर कि वह बहुत थकी है, आज उसे पढ़ा नहीं पायेगी , कहने लगी – “हाँ, उस घटना के चर्चे तो पूरे शहर में हैं। हमने भी अखबार में पढ़ा था। सब कहते हैं, हॉस्टल में रहने वाली लड़कियाँ ऐसी ही होती हैं। उनका कोई चरित्र नहीं होता।”
शुचि की इच्छा हुई पूछे – फ़िर तुम मेरे पास क्यों आती हो? भौतिकी पढ़ने में मैं तुम्हारी सहायता कर देती हूँ, बस इसीलिए ? हॉस्टल में आकर तुम्हारा भी चरित्र खराब हो गया तो? और मैं अच्छे चरित्र की हूँ, इसका क्या भरोसा ? मैं भी तो हॉस्टल में रहती हूँ।”
लेकिन कुछ बोली नहीं, वह उसकी छात्रा भी थी। उसका आंशिक आर्थिक आधार।
उसके जाने के बाद देर तक सोचती रही। स्त्री को घर के दायरे में बन्द रखने के लिए पुरुष कोई भी तर्क ढ़ूँढ़ लेता है। बल्कि बड़े से बड़े झूठ को सच बना कर प्रस्तुत कर सकता है यदि यह उसके हित में हो! जया प्रसंग क्या इसी की पुष्टि नहीं करता?
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यह बदलना बहुत समय से चल रहा था शुचि के अन्दर ,बस उसने महसूसा नहीं था । और आज उसके अन्दर की लड़की बाहर आ गई थी। वह हर किसी से लड़ सकती थी – जया के लिए। उसकी एक पहचान बन चुकी थी। वह हॉस्टल की अच्छी लड़की, केवल पढ़ाई से मतलब रखने वाली, जया के पक्ष में खड़ी है तो शायद जया अच्छी ही होगी। वरना शुचि दी हर किसी को सपोर्ट नहीं करतीं।
“भोली है, नहीं पहचानती।” कुछ ने यह भी कहा।
दिव्या अपने जाने के बाद जया का दायित्व उसे सौंप गईं। जया को वापस आना ही था। उसकी परीक्षाएँ बाकी थीं।
अमृता, निवेदिता, विभा सब जा चुके थे। शुचि की वह सर्किल टूट चुकी थी। निवेदिता अब मजिस्ट्रेट थी। उसकी शादी का कार्ड शुचि को भी मिला था। शुचि उन सबसे सम्पर्क में थी। विभा-अमृता नौकरी तलाश रही थीं। शुचि की सर्किल में अब नये नाम थे। अंजना- शुचि की रूम मेट। सविता – जो जया की बैच मेट थी। स्नेहा दी, जो शुचि से सीनियर शोध छात्रा थीं। शोध छात्रा सावित्री, और थे सविता की मित्र मंडली के लोग। वन्दना, मानसी,संजना, संगीता, …. शुचि की दुनिया बड़ी हो चुकी थी। तीन सालों में सब उसे जानने लगे थे और इसके पीछे बहुत हद तक सविता थी। बेचैन आत्मा। सबकी खबर रखनेवाली और सबको खबर पहुँचाने वाली।
जब जया लौटी तो तब तक विभा वापस आ गई थी। शुचि ने शोध छात्रा के रूप में लौटी विभा को उसकी रूममेट बना दिया।
हॉस्टल अब शान्त नजर आता था लेकिन सड़कों पर लड़कों के लिए जया वर्मा “वही लड़की” थी। उसे देखकर “वही लड़की ” कह कर इशारे किए जाते। शुचि अक्सर ही उसे अपने कमरे में रोता पाती और समझ नहीं पाती कि कैसे, क्या कह्कर ढ़ाढस बँधाए। विभा देर रात विभाग से लौटती। उसका होना न होना बराबर था।

ऐसी ही एक शाम जब वह जया के पास पहुँची तो जया कमरे में बैठी दीवार की ओर मुँह करके रो रही थी।
“बहुत हो चुका जया । भूल जाओ उसे। ”
वह कुछ नहीं बोली। न चुप हुई।
शुचि सामने विभा के बिस्तर पर जा कर बैठ गई।
उठने को हुई तो जया ने सिर उठाया।
“आप यहाँ रहेंगी मेरे पास ? कुछ देर और।”
शुचि अपने कमरे से अपनी किताब उठा लाई।
सांझ से रात हो गई। वह मेस से खाना खाकर आई और फ़िर उसी कमरे में जा बैठी। जया के रोने की मूक गवाह।
वह जाने किस दुनिया में थी। क्या याद करती, क्या सोचती ! शुचि के लिए अबूझ पहेली थी वह। तब भी उसकी उपस्थिति की इच्छुक।
देर रात गए ,जब विभा के वापस आने का वक्त हो गया , वह जया से “अब जाती हूँ ” कहकर अपने कमरे में वापस आ गई।
जया ने सिर हिलाया – सहमति में।
“यह डिप्रेशन में है।” शुचि ने सोचा।

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उस दिन रविवार था – आज भी शुचि याद कर सकती है। जया ने सारा सामान पैक कर लिया था और शुचि के कमरे में विदा लेने आई थी। नीचे आटॊ रिक्शा में सामान लदवाने के लिए रख चुकी थी। शुचि व्यस्त थी । कमरे की साफ़ सफ़ाई में। जया से सुबह ही मिल आई थी कि वह दुबारा उसके कमरे के दरवाजे पर आ खड़ी हुई।
“शुचि दी मैं जा रही हूँ।”
“हाँ जया , शुभ यात्रा।”
शुचि दी, आप यह रख लीजिए।” उसके हाथ में मोटी मजबूत नारियल की कई हाथ लम्बी रस्सी थी।
यह होता रहा है। उसकी तमाम मित्र हॉस्टल छोड़ने के पहले कुछ न कुछ उसे थमा जाती रही हैं। लेकिन आज उसे कुछ भी लेने की इच्छा नहीं हुई चाहे वह एक रस्सी ही क्यों न हो। यह दुखी लड़की खुश रहे बस। उसने दिल से दुआ की।
“नही जया, मुझे नहीं चाहिए।”
“नहीं दीदी प्लीज । आप रख लीजिए। आपको होल्डाल बाँधने के काम आयेगी।”
“लेकिन मेरा होल्डाल दुरुस्त है जया। मुझे इसकी बिल्कुल भी जरूरत नहीं। तुम किसी और को दे दो।”
“नहीं मुझे आप ही को देना है।”
यह क्या है ! ऎसी जिद क्यों ? उसने सप्रश्न उसकी आँखों में ताका।
“तुम विभा को दे दो।”
“नहीं, आप रख लीजिए।”
उसने उसके हाथ से रस्सी ले ली।
“आपको याद है आप उस शाम मेरे कमरे में बैठी रही रही थीं। मैंने आपको रोक लिया था। उसी शाम मैं लंका से यह् रस्सी खरीद कर लाई थी । कमरे के सीलिंग फ़ैन से लटक कर झूल जाने के लिए। मुझे बहुत डर लग रहा था …उस रात … फ़िर मैं आपके सामने बैठी रही ….. रोती रही और अन्त में मैंने खुद को रोक लिया। आप न होतीं तो……..

वह रुक-रुक कर बता गईं। फ़िर वही मीठी मुस्कान। “अच्छी चलती हूँ । बाय शुचि दी। बेस्ट आव लक फ़ार युअर पी एच डी।”
शुचि अवाक! देर तक हाथ में रस्स्सी लिए उसे जाता हुआ दे्खती रही। दरवाजे के फ़्रेम में जड़ी तस्वीर सी।

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मैत्री का नया स्वरूप

सविता क्या सचमुच सूर्य-किरण थी या सूर्य थी ? आजकल अक्सर ही शुचि सोचती है । उसकी उपस्थिति में शुचि के अन्दर का बहुत सा तेज बाहर आया था । वह भी जैसे प्रकाशित हो उठी थी उसकी उपस्थिति में। और वह गई तो जैसे हॉस्टल में अन्धेरा कर गई। “आय एम द लाइट /लाइफ़ ऑफ़ द हॉस्टल।” वह खिलखिलाती। और जैसे एक जिद सी पाल ली थी उस लड़की ने ” शुचि दी , आप मुझे भूल नहीं पायेंगी !” वह हँस देती ,”अरे जाओ ! ..तुममें ऐसा क्या है जो कोई याद रखे । खरगोश जैसी आँखें , बत्तख जैसा मुँह …। पौने छह फ़ुट लम्बी लड़की ।” वह चिढ़ जाती।
जिस दिन सुबह से उसके दर्शन न होते, शुचि को भी कुछ अनमना सा लगता और वह रात के ग्यारह बजे भी शुचि के कमरे का दरवाजा खटखटा लेती। टेबल लैम्प जला कर पढ़ रही
शुचि चौंकती। दरवाजा खोलती, “आज दिन भर आपसे मिली नहीं थी न।” सुनने को मिलता । चेहरे पर होती वही ढेर सी मासूमियत। शुचि को तब अनायास ही सविता पर प्यार आ जाता। फ़िर गर्मियों की ठंढी हो रही रात में वह और सविता देर रात तक हॉस्टल की छत पर टहलते रह्ते और एक -एक कर सविता के मन की परते खुल रही होतीं।
अपने अन्दर कहीं बहुत बेचैन है यह लड़की, यह शुचि ने पहली मुलाकात में ही समझ लिया था । अन्तश्चेतना कुछ ज्यादा विकसित है या घर पर रहते हुए भी मानव मन की कुछ ज्यादा समझ विकसित हो गई, शुचि नहीं जानती। लेकिन जैसे- जैसे वह सविता के करीब आती गई, उसे अपनी समझ पर भरोसा होता गया।
“मैं सबकी बातें समझ लेती हूँ लेकिन किसी को समझ में ही नहीं आता कि कितना गुस्सा मेरे अन्दर खौलता रहता है, हर वक्त। मैं हँसती रहती हूँ और सबको बहुत अच्छा लगता है कि सविता कितनी खुशमिजाज है। डैडी को लगता है मैं पैसे उड़ा रही हूँ। पहली बार में मैनेज्मेंट नहीं क्वालीफ़ाई कर पाई तो क्या मैं बेवकूफ़ हूँ? हॉस्टल में टाइम पास कर रही हूँ? मैं कर लूँगी इस बार।”
“हाँ, सवि, मैं जानती हूँ।”
‘इस बार घर गई, डैडी, ने ठीक से बात भी नहीं की। मैं और घर नहीं जाउँगी। जब टेस्ट क्वालीफ़ाई कर लूँगी, तब तो हॉस्टल छोड़ना ही होगा। जाना ही होगा।”
“तुमने यह जिद क्यों पाल ली है कि बजाज में ही जाना है। बॉम्बे ही जाना है ?”
“अरे आप नहीं समझती शुचि दी, वह सेकेन्ड बेस्ट है, इन्डिया में । मान्यता – मेरी बड़ी बहन वहीं से निकली है। फ़िर बड़ी जॉब, बड़ा पैसा, पोजिशन। मैं चाहती हूँ अपने लिए एक ऐसा स्टेज, जहाँ पर खड़ी होकर मैं बोलूँ तो लोग मुझे सुनें।”
“क्या कहना है तुम्हें दुनिया से ?”
“इस देश की राजनीति बहुत गन्दी है। इकानामी वीक है। इसे ठीक होना होगा।”
“क्या करोगी तुम ?”
“इसीलिए तो मैनेजमेन्ट करना है। आप फ़ीजिक्स की हैं, नहीं समझेंगी।”
………
“और लड़कियों को तो खिलौना समझते हैं लोग। आप जानती हैं डैडी ने उसे मेरा लोकल गार्जियन बनाया है यहाँ। मैं जाती थी उसके यहाँ, कभी वीक एन्ड में। और उसने मुझे अकेला पाकर मुझ पर अटैक किया।”
“वह शादीशुदा नहीं है?
‘है न, लेकिन उस दिन उसके घर पर कोई नहीं था। और उसने मुझे नहीं बतलाया, वरना मैं दरवाजे से ही लौट जाती। ”
शुचि की साँस रुक गई जैसे। क्या हर लड़की को अपने लड़की होने की कीमत चुकानी ही होती है !
सविता अपनी रौ में बहे जा रही थी।
“मैंने उसे एक झटका दिया , उसने सोचा नहीं होगा कि मैं इतना तेज कराटे वाला वार कर सकती हूँ। और फ़िर मैं दरवाजा खोल बाहर हो गई। अब डैडी को मेरे विरूद्ध भड़काता रहता है कि मैं पढ़ाई नहीं करती। लड़कों के साथ घूमती हूँ।”
“तुमने घर पर बतलाया नहीं?”
“फ़ेल हो गई न। डैडी कुछ सुनना ही नहीं चाहते।”
“मम्मी ?”
“मम्मी की कौन सुनता है!”
“तुम कहो, सुनो।”
“कुछ नहीं होनेवाला। कुछ नहीं बदलनेवाला। जब आप सफ़ल होते हैं तो सब आपकी सुनते हैं। वरना सच भी बोलो तो कोई नहीं सुनता। मैंने घर पर कुछ नहीं कहा। बस एक आक्रोश भर गया मन में। मैं कॉलेज से लौटने के बाद हॉस्टल के रस्ते पर फ़ुल स्पीड में पागलों की तरह साइकिल दौड़ाती थी। सब लड़कियाँ कहती थीं, किसी दिन मरेगी। और मैं नहीं समझ पाती थी कि इस तरह मैं किससे बदला ले रही हूँ। ”
“असफ़ल क्रोध अपने आप पर भी उतरता है।”
“हाँ, आज भी मेरा वश चले तो मैं जाकर उसका सिर तोड़ आऊँ।”
शुचि मुसकराई, एक उदास सी मुस्कराह्ट, “ऐसा नहीं होता सवि।”
“हाँ, मैं जानती हूँ। लेकिन दिन -रात मैं अन्दर ही अन्दर जो उबलती रही, उसी के कारण फ़ेल हुई।”
“हाँ ऐसा ही होता है। कॊई फ़ेल हो जाता है। कोई बीमार हो जाता है। लेकिन झेलना उसे ही होता है अपने ऊपर, जिसका शोषण होता है।”
“लेकिन इससे शोषण करने वाले की हिम्मत बढ़ती है।”
“हाँ, इसीलिए आगे बढ़ना होता है। सफ़ल होना होता है। अपने फ़ैसले खुद लेने की कूवत पैदा करनी होती है अपने अन्दर और अपने फ़ैसले पर टिकने की भी।”
“इसीलिए तो मुझे पास होना है।”
“कोई बात नहीं। अब तुम पास हो जाओगी। इस बार तुम निकल जाओगी मैनेजमेन्ट की उस परीक्षा में।’

वह निकल गई। सफ़ल रही। पूरे साल भर शुचि उसे सुनती रही। उसके मनोविज्ञान को समझ उसे साहस बँधाती रही और स्नेह को तरसा हुआ उसका अपना मन भी कहीं ठौर पाता रहा, यह वह आज समझ सकती है। हम देकर भी कृतकृत्य होते हैं, भर जाते हैं अन्दर से। शुचि भरती रही। हॉस्टल भर की लड़कियाँ जब सवि को खोजना चाहतीं तो शुचि के दरवाजे पर दस्तक होती। कभी शुचि की अनुपस्थिति में उसके कमरे में इन्तजार करती सविता बाल्टी बजाती हुई गा रही होती -“बेकरार करके हमें यूँ न जाइए ।…….” और लड़कियों की मन्डली जमी होती। शुचि को सब पहचानते थे। जाने से पहले सविता सबको बता गई कि शुचि दी बहुत अच्छी हैं। किसी की परेशानी समझ उसे रास्ता दिखा सकती हैं। यह उसने तब जाना जब एक -एक कर कई लड़कियाँ उसके पास अपना मन खोल गईं। तब शुचि को नहीं मालूम था कि यह बस एक शुरूआत है और आनेवाले समय में वह बहुत सारी लड़कियॊं की आवाज बननेवाली है।
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नया मेस

लड़कियों ने खाना डीन, छात्र कल्याण, प्रो. किट्टू की मेज पर रख दिया।
वे चार थीं। बंग बालायें। रिन्टी , झुम्पा, पारमिता और संयुक्ता। एम एस सी माइक्रो बायलाजी की छात्राएँ।
डीन ने देखा। टिफ़िन केरियन में सब्जी के बीच एक मरा हुआ काकरोच था।
‘आप इसे खा सकते हैं?
उन्होंने सम्मिलित स्वर में पूछा।
अंजना नाटकीय अन्दाज में कहानी सुना रही है।
फ़िर? शुचि ने पूछा, उसे अण्जना का अभिनय देखकर मजा आ रहा था।
“फ़िर क्या? डीन ने सहमति दे दी कि वे इस मेस को खत्म कर नया मेस शुरु कर सकती हैं। एक और कोआपरेटिव मेस। इस मेस पर सदस्य संख्या की पाबन्दी नहीं रहेगी क्योंकि तब कई मेस बनाने होंगे और उन सबके महाराज का वेतन वे नही दे सकेंगे। नियमत: मेस महाराज का वेतन छात्र कल्याण कोष से जाता है लेकिन जब तक व्यवस्था हो उसका वेतन हमारे मेस फ़ीस से जायेगा। ” अंजना ने बात पूरी की।
वे विभाग से लौट कर कमरे के सामने की बालकनी में खड़ी थीं। ऊपर की मंजिल पर वे चारों लड़कियाँ लगातार बोल रही थीं । कभी इस लड़की से बात करतीं , कभी उससे। वातावरण की गर्मी को भांप कर उसने अंजना से पूछा था कि बात क्या है। अण्जना जो उससे पहले विभाग से आ चुकी थी , सारी कहानी जानती थी।
“कल , रविवार , नया मेस बनाने के लिए टी वी रूम में मीटिंग है। वार्डन भी आयेगी। चलेंगे शुचि दी। है न?”
‘हाँ , जरूर। अगर मैं कहीं और होऊँ, घंटा न सुन पाऊँ तो बता देना।”
“हाँ।”

तो इन्होंने कर डाला ! शुचि ने सोचा। बड़ी बहादुर हैं ये लड़कियाँ। सेन्ट्रल आफ़िस से नजदीक ही है इनका विभाग। चली गई होंगी। किट्टू मिल भी गये आफ़िस में। लेकिन हिम्मत चाहिये। हर कोई नहीं कर सकता ऐसा। नहीं तो उस सड़ियल मेस का खाना कौन खाना चाहता था! बार- बार शिकायत करतीं लड़कियाँ, मेस की फ़ीस बढ़ जाती। वार्डन हमेशा चुन्नीलाल का पक्ष लेती। पता नहीं उससे क्या प्यार था अरोड़ा मैडम को। अपने पूरे परिवार के साथ जाने कितने सालों से हास्टल के पीछे बने अपने क्वार्टर में रह रहा है, चुन्नीलाल श्रीवास्तव। गोरा, मोटा, लम्बा, कड़ी मूँछों वाला, चेहरे पर बेचारगी लपेटॆ हुए। ‘बहिन जी हम का करें। मंहगाई इतना बढ़ गया है। पूरा नहीं पड़ता।” मेस फ़ीस १७० रूपये से २५० रुपये हो चुकी। लड़कियों की संख्या २००। और लड़कियाँ खाती ही कितना हैं! पिछली गर्मियों में शुचि के विभाग का सीनियर रिसर्च असोसियेट हरि शंकर पान्डे उसके टिफ़िन डब्बे पर मर मिटा था “अरे वाह! आपलोगों के तो मजे हैं। विभाग में खाना पहुँच जाता है। हम हैं कि चिलचिलाती धूप में साइकिल चला कर हास्टल खाने जाते हैं और फ़िर घंटे भर के अन्दर ही वापस भी होना होता है। हमारा खाना अपने हास्टल से नहीं मंगवा दे सकतीं ?”
शुचि ने देखा, वह गम्भीर था। मजाक नहीं कर रहा। बोली ” क्यों नहीं। आप मेरे गेस्ट बनकर खा सकते हैं। आप अपना एक टिफ़िन केरियर खरीद लाइये। मैं मेस में दे दूंगी। मेरे खाने के साथ छोटू आपका केरियर भी ले आयेगा और वापस ले जायेगा।”

“आपके यहाँ गेस्ट चार्ज क्या है ?”
“आप सिर्फ़ दोपहर का खाना लेंगे। महीने में १२५ रुपये । दस रुपये हम टिफ़िन केरियर लाने के लिये देते हैं।”
“अधिक नहीं है। केरियर में क्या होता है ?”
“चार सूखे फ़ुलके , थोड़ा सा भात। दाल ., सब्जी , दही और कोई एक फ़ल। अक्सर केला । कभी कभी सेब भी।”
“इतने में हो जाता है आपका खाना ?” वह हँसा
“बच जाता है। गले से जितना उतर सका , उतार लिया।” शुचि ने हथेली गोल कर फ़ुलकों की साइज भी बता दी।
” इतने में हमारा कुछ नहीं होने वाला। ऊँट के मुँह में जीरा। आपके महाराज के तो फ़ायदे ही फ़ायदे हैं।”
उस दिन शुचि के मन में पहली बार यह बात आई थी कि चुन्नीलाल श्रीवास्तव इतना भी बेचारा नहीं है।

अरोड़ा मैडम का महाराज- स्नेह मीटींग में भी नजर आया। सारी लड़कियाँ जमीन पर बिछी दरी पर ठुँसी बैठी थीं। टी वी कॊ ओर मुंह करके। उसी ओर एक कोने में कुर्सी पर मैडम अरोड़ा और उनके पीछे खड़ा चुन्नीलाल। जब से शुचि हास्टल में है , वे ही वार्डन हैं। लेकिन हास्टल में उनके दर्शन खास अवसरों पर ही होते हैं। हाँ सुना है , वे आती हैं , हर रोज। दोपहर आफ़िस में होती हैं। क्लर्क मैडम मन्दिरा गुप्ता के साथ।
छॊटी सी , भरे- भरे शरीर और गोरे चेहरे वाली अरोड़ा मैडम। शक्ल- सूरत की बुरी नहीं। कुछ ४५-५० की उम्र तो होगी। विभा के विभाग की हैं और विभा की प्रिय शिक्षिका भी रही हैं। वह तो फ़िदा ही है उन पर। शुचि को भी वे अच्छी लगती हैं । जया प्रसंग में उनका ठहरा, संतुलित व्यवहार उसे भी प्रभावित कर गया था लेकिन मेस मसले पर उन्हें देखना है। वे शुरु हुईं, पहले तो यह कि कोआपरेटिव मेस की जरूरत क्या है? मेस फ़ीस कम है। कहाँ से अच्छा खाना बनेगा?
“मैडम, तीन बार मेस फ़ीस बढ़ चुकी है।कोई फ़रक नहीं पड़ा।” लड़कियाँ चिल्लाईं।
“हम काकरोच खाने के पैसे नहीं देते हैं।” रिन्टी की आवाज गूँजी।
“चुन्नीलाल नहीं रहेगा। हम नया महाराज लायेंगे। कोआपरेटिव मेस बनायेंगे।” यह झुम्पा थी।
बाकी लड़कियॊं ने समर्थन किया।
चुन्नीलाल गिड़गिड़ाया।”मैडम जी…….. हम कहाँ जायेंगे। हमारे बाल-बच्चे हैं……..”

मैडम का वही शान्त स्वर। शान्त चेहरा।
“ठीक है, कोआपरेटिव मेस बना लो। लेकिन चुन्नीलाल को हटाने की जरूरत क्या है? ”
“चुन्नीलाल नहीं चाहिये। चुन्नीलाल नहीं चाहिये। ” कई स्वर उभरे।

“तुम लोग सोच लो। ” मैडम ने अपनी तरफ़ से मीटिंग बर्खास्त कर दी। वे गईं तो चुन्नीलाल भी चला गया।
अब यह सिर्फ़ लड़कियों की मीटिंग थी।
पारमिता मैडम की जगह पर जा खड़ी हुई। लम्बी, पतली, लम्बोतरे चेहरे वाली पारमिता।
“आप सब सुनिये। हमें कुछ फ़ैसले लेने हैं। आप अपने हाथ उठाइये, अगर सहमत हैं।
“हमें नया मेस चाहिये। को आपरेटिव मेस।’
सारे हाथ समर्थन में उठ गये।
“चुन्नीलाल को हटाना है।”
फ़िर सारे हाथ उठे।
“अगली समस्या यह है कि यदि हम नया मेस शुरु करते हैं तो उसकी जिम्मेवारी कौन लेगा? नियमत: दो मैनेजर होने चाहिये। जो स्थायी तौर पर काम करेंगे और हर महीने के रजिस्टर पर, हिसाब -किताब पर नजर रखेंगे। उसके सिवा हर महीने के लिए दो मैनेजर। वे एक महीने काम करेंगे और फ़िर रजिस्टर अगले मैनेजर को दे देंगे। इस तरह हर लड़की को मेस चलाने में भागीदारी करनी है। मेस में एक शिकायत पुस्तिका होगी। उस पर आप अपने सुझाव लिख सकती हैं। शिकायतें भी। नया महाराज खोजना और शुरु के महीनों में मेस चलाने की जिम्मेवारी हम लेने को तैयार हैं। हम यानी मैं झुम्पा , रिन्टी और संयुक्ता। लेकिन हमारे एक्जाम हैं। एक बरस बाद हम यूँ भी चले जायेंगे। रिसर्च वाली दीदियों में से कोई स्थायी मैनेजर बन जाए। प्लीज!”

वह एक- एक से पूछने लगी । दीदी आप? दीदी आप? विभा ने हाँ में सिर हिला दिया। उसे अभी बहुत साल रहना है। अभी तो आई है।
दूसरा कौन?
‘आप बन जाइये न शुचि दी?”
मैं ?” वह हड़बड़ाई।
“हाँ , दीदी प्लीज। यह सूसन थी। उसकी बगल में बैठी। रूम नम्बर ६० में रहती है।
“अरे दीदी, मैं देखूँगी सब। आपको कुछ नहीं करना पड़ेगा। बन जाइये।” विभा ने साहस बँधाया।
शुचि रुपये-पैसे के मामले से दूर रहना पसन्द करती है। कई कटु अनुभव हैं उसके पास , हास्टल में , मित्रों से ही मिले, वरना अब वह दब्बू या डरपोक नहीं। उसने सहमति दे दी। लड़कियों ने तालियाँ बजा कर दोनों का स्वागत किया।

“कल से कोई मेस में नहीं खायेगा। चुन्नीलाल को भगाना है।” सर्वसम्मति से पारित इन प्रस्तावों के साथ मीटिंग बर्खास्त हो गई।

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अगले दिन मेस में कोई नहीं गया। लड़कियाँ कमरे में ब्रेड गरम कर , दूध/चाय ब्रेड खा कर विभाग गईं। दोपहर का खाना मैत्री जलपान गॄह या ऐसी ही किसी जगह पर। शाम और रात का खाना भी बाहर या फ़िर कमरे में सम्मिलित रूम कुकिंग। वे कटिबद्ध थीं। मेस बदलने के लिए।
नया महाराज देने की जिम्मेवारी कुछ लड़कों ने ली थी। वे रिन्टी ग्रुप के मित्र थे। विभाग के। सप्ताह बीत गया। को आपरेटिव मेस की लड़कियों की अकड़ अब ठंढी होती नजर आ रही थी। वे खुद ही बता रही थीं कि को आपरेटिव मेस कैसे चलता है। क्या नियम हैं, क्या नहीं।
शुचि विभाग जाने के लिए सीढियाँ उतर रही थी। चुन्नीलाल बरामदे में नीचे खड़ा था। आगे बढ़ आया –
“का शुचि बहिन जी , कायथ होके कायथे के पेट पर लात मारत हैं/ हम कहाँ जाई? हमार बाल बच्चा मन भूखॊं मर जाईं।”

शुचि चुप, अनसुना सा करती हुई हास्टल के दरवाजे से बाहर हो गई।

अगले सप्ताह से नया मेस शुरू हो गया।
नये महराज ने प्रभावित करने के सारे तरीके आजमाये। ऐसा अच्छा खाना कि दूसरे मेस की लड़कियाँ यहाँ ज्वायन करने को तैयार। रजिस्टर विभा ने संभाल लिये। सारे कागजों पर वही साइन करती। शुचि ने मेस को कोआपरेटिव बनाने का दायित्व लिया था। उसके लिए जरूरी कागजात डीन तक पहुँचाना। लड़कियों से हस्ताक्षर लेना। उसे जरा भी समझ नहीं थी कि यह सब करना इतना उबाऊ और परेशानी भरा होगा। विभा बेहद लापरवाह लड़की थी। “क्या दीदी , आप झूठ-मूठ परेशान होती रहती हैं। अरे, ये सब ऐसे ही चलता है।”
“तुम अरोड़ा मैडम से कहो तो। उनके किट्टू से बात किये बिना तो मेस कोआपरेटिव होगा नहीं। तुम्हें तो बहुत मानती हैं न। विभाग में मिल लो।”
“अरे दीदी , सब हो जायेगा। किट्टू के पास भी फ़ंड कहाँ हैं । अगले साल, जब नया सेशन शुरू होगा , तभी हो सकता है। अरोड़ा मैडम ने कहा है।अभी तो महाराज का वेतन हमको देना हॊ होगा।”

लड़कियाँ अपनी मेस फ़ीस में छह रूपये ज्यादा दे रही थीं। महाराज का वेतन।
साल भर बीत गया । मेस कोआपरेटिव नहीं बना।

लड़ाई को इतना लम्बा खीचो कि विपक्षी घुटने टेक दे।
नया महाराज अब चुन्नीलाल से बेहतर नहीं था। कभी लड़कियाँ कमरे में आकर शिकायत कर जातीं , आज उनके लिये नाश्ता नहीं था। आज खाने के लिये जब पहुँचीं तो पापड़ खत्म हो गये थे। शुचि ही यह सब सुनने के लिये होती। विभा तो हास्टल में होती ही बहुत कम थी। देर रात गये विभाग से लौटने का उसका क्रम जारी थी। यूँ भी शुचि दी ही थीं जिनसे कहकर वे खुश होती थीं क्योंकि शुचि दी केवल सुनती नहीं थी , महाराज तक उनकी शिकायत पहुँचाती भी थीं।
फ़िर वह दिन भी आया कि इस नये महाराज की भी छुट्टी करनी पड़ी। वह शुचि को खुले आम कोसता हुआ , दूसरे महाराज से लड़ता हुआ विदा हुआ। इस नये महाराज को रसायन विभाग की एक छात्रा अपने मित्र लड़कों की सहायता से ले आई। लेकिन महाराज की गालियाँ शुचि ने खाईं। इस बार भी चुप रहकर। विभा हमेशा की तरह चैन से थी। सच तो यह था कि शुचि विभा के तौर तरीकों से तंग आ गई थी। वह रजिस्टरों पर कभी हिसाब चेक न करती , अगले महीने के लिये मैनेजर लड़कियों को थमा देती। हर महीने नया रजिस्टर होता। शुचि चेक करना चाहती तो रोक देती। “मैं करुँगी न।”
शुचि को लगा, वह अलग हट जाये तो बेहतर। एक ही तरीका था। उसने अपनी तरफ़ से मीटिंग बुलाई और जो मुट्ठी भर लड़कियाँ जमा हुईं उन्हें सूचित किया कि वह मेस के दायित्व से मुक्त होना चाहती है। उसकी पी एच डी का लास्ट स्टेज है अब। कोआपरेटीव मेस बनाने की जिम्मेवारी उसने ली थी। उस दिशा में काम जिस दिन पूरा हो गया , लड़कियाँ समझ लें कि वह अब मैनेजर नहीं है। औरों को भी बता दें।

यह युक्ति कारगर हुई। अरोड़ा मैडम को विभा ने बतलाया। उन्होंने किट्टू से बात की। मेस के काउन्टर पर सूचना और आवेदन पत्र रख -रख कर शुचि परेशान हो चुकी थी\ अब तक एक तिहाई लड़कियों ने ही हस्ताक्षर करने की जहमत उठाई थी। शुचि को समझ नहीं आता था कि कैसी हैं ये लड़कियाँ। खाना अच्छा, समय से चाहिये। पैसे अधिक नहीं भरने हैं, लेकिन एक हस्ताक्षर करने में नानी मरती है।

उस दिन रविवार था। शुचि ने एक-एक कमरे का दरवाजा खटखटाया। आवेदन पत्र पर लड़कियों के हस्ताक्षर इकट्ठे किये। शुभा से बात की। वह उस महीने की मेस मैनेजर थी। अगले दिन शुभा के साथ दोपहर के भोजनावकाश में विभाग से निकल कर डीन के आफ़िस जा पहुँचीं। किट्टू आफ़िस में थे।
वहाँ जाकर पता लगा कि केवल एक लड़की ही अन्दर जा सकती है। शुचि गई।
किट्टू से मिलने का यह उसका पहला मौका था। लेकिन वे उसके नाम से परिचित थे। अरोड़ा मैडम ने बतलाया होगा। उन्होंने अगले सेशन में मेस को कोआपरेटीव बना देने को हामी भरी। उन्हें लिखित आवेदन पत्र का इन्तजार था ।

दो महीने के बाद विभा खुशी से कूदती हुई उसके कमरे में आई। अरोड़ा मैडम ने सूचना दी थी कि मेस कोआपरेटिव हो गया है। शुचि ने मुक्ति की सांस ली।
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एक दुर्घटना

“डॉक्टर ने शुचि दी के चेहरे से पट्टी ह्टाई और बोला “ब्यूटीफ़ुल! ”

सब हँस रहे हैं ……
“अरे क्या नाम था उसका ? यंग था ? हैन्डसम था ? ” कई -कई सवाल एक साथ । जैसे चारों दिशाओं से आए। उसके बिस्तर को घेरकर ही खड़ी थीं सब और उसके साथ हॉस्पीटल से लौटी सन्जना कहानी सुना रही है। रस ले- लेकर। वह हँस भी नहीं पा रही। न उसे रोक या टोक पा रही है। चुप सुन रही है बस।
” डॉ प्रशान्त। हाँ, हाँ, दीदी की ही एज का होगा । दीदी को सब हैंडसम मिलते हैं।”
“अरे वाह दीदी ! अगली बार मैं जाउँगी आपके साथ।”
“दीदी को सब अच्छेवाले मिल जाते हैं। हम इतनी बार हॉस्पीटल गए, एक न एक बुड्ढा मिला।”
फ़िर एक सम्मिलित हँसी !………..
“चल ह्ट, दीदी से मजाक मत करो।”
“हाँ, दीदी को तो चाहिए नहीं। हम मिल लेंगे।”
“तुझे थोड़ी न देखनेवाला है। दीदी सुन्दर हैं। कहा तो “ब्यूटीफ़ुल! ”

कमरे में एक सम्मिलित ठहाका फ़िर से गूँज गया। बगल के हास्टल में रह रही, बी एड करने लौटी जया, विभा, अमृता, सविता की मित्र भूगोल में एम फ़िल कर रही संजना, उसकी अपनी रूम मेट अंजना- सब कमरे में हैं। हँस रही हैं। दो दिन पहले का तनाव छँट चुका है। सबके चेहरे पर खुशी है, हँसी है। उनकी अपनी दीदी ठीक हो रही हैं। सिर्फ़ शुचि है जो नहीं हँस पा रही। बस थोड़ा सा मुस्करा लेती है। वह भी सप्रयास। दर्द अभी भी गया नहीं है। घाव चाहे गहरा न हो लेकिन हँसने पर दुखता है। आज तीसरा दिन है !
दो दिन बीत चुके हैं, उसे यूँ ही बिस्तर पर पड़े हुए। डाक्टर ने प्रूफ़ेन दिया था। शुचि एलोपैथिक दवाओं से बहुत घबराती है। अपने पास आर्निका २०० रखती है हमेशा, वही लिया। आर्निका खा -खाकर उसके बाकी शरीर का बहुत सारा दर्द चला गया, कल रात सो भी पाई, वरना परसों तो उठा भी नहीं जा रहा था । जया, जिसे पंडित जी की चाय की दूकान पर खबर मिली थी, उल्टॆ पैरों विभाग से भागकर वापस आई थी और उसने रुई के फ़ाहे और गर्म पानी से शुचि के घाव साफ़ किए थे। खिचड़ी बनाकर चम्मच से सूप की तरह पिलाया था। शुचि ने छोटे बच्चे की तरह खुद को उसके हवाले कर दिया था। बहुत कृतज्ञ है वह जया की !

जब वह सड़क पर मुँह के बल साइकिल से गिरी थी तो अचानक कुछ समझ में नहीं आया था । धक्का देने वाला स्कूटर आगे निकल गया था। गिरानेवाले के पास समय नहीं होता, रुकने का,पीछे मुड़कर देखने का, तभी तो इतना तेज चलाते हैं। अच्छा यह हुआ कि यह वी सी लाज के सामने हुआ। हास्पीटल बगल में। वी. सी लॉज से पुलिसवाले निकल आए थे, उन्होंने पहले तो उसे सहारा देकर कुर्सी पर बिठाया फ़िर वही हॉस्पीटल ले गए। तब पुलिस को देखकर उसकी मरहम पट्टी तुरन्त हो गई थी। रिक्शे पर बिठाकर एक पुलिसवाला उसे हॉस्टल छोड़ गया। साइकिल भी।
अच्छा हुआ वहाँ पर गिरी – हॉस्पीटल के सामने। गिरना तो नसीब में लिखा होगा । सड़क पर ज्यादा ट्रैफ़िक नहीं था वरना किसी कार के नीचे आ गई होती।

ढेर सारी दर्दनाशक दवाइयाँ और क्रीम लेकर वह कमरे में पहुँची और बिस्तर पर ढह गई।

तब से दो दिन बीत चुके हैं। आज फ़िर से चेक अप के लिए गई थी, सन्जना के साथ। कुछ पट्टियाँ डॉक्टर ने निकाल दीं। अधिक चोट नहीं आई और होंठ पर जो कट गया है वह भी क्रीम लगाने से ठीक हो जायेगा । प्लास्टिक सर्जरी चाहे तो कराए, न चाहे न कराए। उसे शायद कुछ ज्यादा बुरे परिणाम की उम्मीद थी, तभी पट्टी ह्टाते ही बोल पड़ा “ब्यूटीफ़ुल ” और सब मजे ले रहे हैं। शुचि पर सबको प्यार आता है !
जिस दिन गिरी थी उस दिन तो दर्द और दवाइयों के बावजूद दिन भर सो नहीं पाई । खबर पूरे हॉस्टल में आग की तरह फ़ैल गई थी। एक जाती तो दूसरी दरवाजे पर खड़ी। शुचि को अच्छा भी लगा था कि इतनी सारी लड़कियाँ उसका हाल पूछ्ने आईँ। इतनी पापुलर है वह। उसे पता भी नहीं था। पूरा हॉस्टल चला आया था जैसे। शाम ढले जब जया ने कमरे का दरवाजा बन्द कर परदा गिरा दिया, तभी वह सो पाई थी। तबतक सिर में असह्य दर्द हो चुका था और आँखें तक दुखने लगीं थीं।
ग्रह बुर चल रहे हैं या कोई बुरा ग्रह कट गया, पता नहीं ।
मनीषा दी दोपहर में आईं और यह जानने पर कि उसके पास कमरे में पैसे नहीं है, वह बैंक ही जा रही थी , जब यह दुर्घटना हुई, बैंक जाकर अपने अकाउन्ट से चार सौ ले आई। उसके तकिए के नीचे दबाकर चली गईं। वे रुपए अभी भी वहीं पड़े हैं।
कहीं पढ़ा था “खुदा अच्छे दोस्त देकर, बुरे रिश्तेदार देने के लिए तुमसे क्षमा माँगता है।”
शायद यह सच है।
पिछले चार सालों में शुचि टूट- टूटकर कई बार बनी है । हॉस्पीटल के चक्कर भी बार – बार लगे हैं । लेकिन धीरे धीरे बीमार होना कम होता गया। वह जल्दी ठीक भी हो जाती है। डॉक्टर के प्रेस्कृप्शन भरे हुए हैं उसके पास और दस में से छह बार मनीषा दी ने उसे सही डॉक्टर के पास पहुँचाया है। स्नेह बहुत सारे रोगों की दवा है। अब इतने सारे अच्छे दोस्त मिल गए हैं उसे कि बहन का छॊटापन उसे आन्दोलित नहीं करता। दुख अब भी होता है, जब याद आती है और याद भी अब कम आती है। जब घर जाती है तो झेलती है। उसकी कटूक्तियाँ तो सब झेलते हैं – माँ, पिता जी ! तो क्या हुआ, यदि वह झेलती है। कुछ न कहकर भी सामने वाले को परास्त किया जा सकता है। बल्कि वाणी से कब प्रतिकार हो सका है। उससे आगे निकल कर, अपने को बेहतर साबित कर ही वह जीत सकती है। वह जीत स्थाई होगी। अपने आप में पूर्ण। फ़िर टिके रहना होगा, बस। वह तो थी सबसे बेहतर। उसका अतीत तो यही था। फ़िर से उसे पा लेना है। भाई इतनी ईर्ष्या रखता था उससे। कदम- कदम पर व्यंग्य, आलोचना ,कटूक्तियाँ। और साथ देने को बहन। झेल- झेल कर बीमार हो गई। लेकिन अब हास्टल आकर वह बाहर है उस सबसे।वह अपनी दुनिया में खुश है। इसीलिए अधिक घर भी नहीं जाती। गाइड खुश हैं कि वह ईमानदारी से काम करती है, हर छुट्टी में घर नहीं भागती। हर स्थिति का एक उजला पक्ष होता है।
“दीदी, आपने घर पर खबर की?” अमृता पूछ रही है ।
“नहीं, जया ने कहा, मत कीजिए। बेकार परेशान होंगे सब और कुछ कर तो सकते नहीं।, इतना कुछ हुआ भी नहीं है। ठीक हो जायेगा।”
“हाँ , यह तो है ! ”
क्या हम हॉस्टल में रह्कर घर से दूर हो जाते हैं, मन से भी ? शुचि सोच रही है। या कि मन से टूट चुके होते हैं , इसीलिए हॉस्टल में रहने चले आते हैं। कम से कम इस हास्टल में शायद पचहतर प्रतिशत लड़कियों का सच यही है। अबतक तो कितनी ही लड़कियाँ , शुचि के सामने अपना मन खोल चुकी हैं। समृद्ध, मध्यम वर्गीय और सामान्य घरों की लड़कियाँ। सुन्दर और सामान्य चेहरे वाली लड़कियाँ। साइन्स की, आर्ट्स की , वाणिज्य, लॉ पढ़ रही लड़कियाँ। कुछ कर डालने की तड़प इन सबमें है। अपने आप को साबित करने की, अपना वजूद मनवा लेने की तड़प। शायद यह तड़प उसी आक्रोश की, विद्रोह की उपज है जो किसी न किसी रूप में हर एक के अन्दर पल रहा है। शुचि के अन्दर भी।
कुछ के बारे में शुचि जानती है , वे एक तरह से घर से भागी हुई लड़कियाँ हैं। या फ़िर भगाई हुई। माँ बाप नहीं। भाई – भाभी को बर्दाश्त नहीं होतीं। शादी हो नहीं रही, तो हॉस्टल में। एम ए, एम फ़िल , पी एच डी- डिग्रियाँ बढ़ती जा रही हैं। स्नेह को तरसी हुई इन लड़कियों ने यदि अपना ठिकाना खुद नहीं बनाया तो जिंदगी भर उन्हें हॉस्टल में होना है। आज रिसर्च हॉस्टल है, कल को स्टाफ़ हॉस्टल होगा शायद।
शायद इसीलिए महिला महाविद्यालय हॉस्टल की लड़कियाँ, ज्योति कुंज की लड़कियों पर हँसती हैं -“बूढ़ियाँ जा रही हैं !”
लेकिन उन्हें ही कहाँ पता है कि कल को उन्हें भी इसी हॉस्टल में नहीं होना होगा!
शायद यही अभाव गलत रास्ते पर भी ले जाता हो। इनमें से आधी तो ऐसी हैं ही जिनके अफ़ेयर हैं । कुछ के शादी शुदा लड़कों से भी। कुछ के टाइम-पास के लिए। कोई प्रतिबद्धता नहीं । कुछ ने बस फ़ँसा रखा है किसी जहीन लड़के को , आइ ए एस की परीक्षा में , जी आर ई की परीक्षा में , एम एस सी की परीक्षा में या फ़िर किसी और प्रतियोगिता परीक्षा में सफ़ल होना है। “नोट्स मिल जाते हैं , थोड़ा सा हाथ लगा देने की अनुमति दे दो , बस सबकुछ दे देंगे ये।” बाद में हॉस्टल के अन्दर उसने इन्हीं लड़कियों को, मजाक उड़ाते, हँसकर कह्ते सुना है।
शुचि को पहले लगता था कि केवल लड़के बुरे होते हैं। लड़कियाँ, सब अच्छी होती हैं।
अब लगता है, ऐसा नहीं है।
पिछले चार सालों में सचमुच बड़ी हो गई है शुचि !

“तुम्हें नजर लग गई। सी एस आई आर फ़ेलोशिप की खबर क्या आई, अतिरिक्त खर्चे का इन्तजाम हो गया।”
“क्या पता!”
और क्या कहे। अभी तो अगले चार महीनों तक डॉक्टर के यहाँ हाजिरी देनी है। सिर की चोट, नाक पर चोट, पैर पर गहरी चोट, होंठ की प्लास्टिक सर्जरी। बाकी के घाव तो भर जायेंगे लेकिन इस हादसे की स्मृति के रूप में कई दाग बने रहेंगे। चलो, अभी बहुत सारा सफ़र बाकी है !
ठीक होने पर शुचि ने एक चिट्ठी घर के पते पर डाल दी। उसका रोड ऐक्सीडेंन्ट हुआ था। ठीक हो गई है। प्लास्टिक सर्जरी करवाने के बाद गर्मी की छुट्टियों में घर आयेगी।
माँ खबर मिलते ही रो पड़ीं। यह शुचि ने उनकी चिट्ठी से जाना।
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ब्लैक फ़्राइडे

शुचि से उसके सेक्शन के लोगों ने खूब मिठाइयाँ खाई।
शुचि को अच्छा ही लगा। इतने समय बाद फ़ेलोशिप मिली थी। अब वह पूर्ण आत्मनिर्भर थी। घर पत्र डाल दिया था कि और पैसे न भेजें। पहली बार फ़ोन पर बात की। पिता बेहद प्रसन्न। उन्हें हमेशा से भरोसा था उसकी क्षमताओं पर। माँ भी खुश थीं। उसने कह दिया था, इन गर्मियों में घर आयेगी।
प्रो. रैणा संतुष्ट थे। वह काम कर रही थी। उनके सारे छात्रों के पास फ़ेलोशिप थी अब।
शुचि अब भी प्रो. कुन्द्रा की ही कोटिंग- यूनिट का उपयोग करती थी। वह इकलौती यूनिट थी पूरे सेक्शन में, जिसका सारे शोध छात्र उपयोग करते थे। शुचि भी। इस नाते जरूरी था कि उन्हें उसकी सफ़लता की जानकारी मिले। वह पहली बार उनसे मिली। मिठाई के डब्बे के साथ।
“बधाई! ” उन्होंने कहा, तीखी नजर से एक बार देखा और एक मिठाई उठा ली।
शुचि भागी, कमरे से बाहर। बस हो गया। शुचि ने सोचा – यह आखिरी अनुष्ठान भी पूरा हो गया।

गर्मियों तक नक्शा बदल गया। प्लास्टिक सर्जरी करवा कर जब वह पुन: सामान्य रूप से काम करने के लायक हुई , उसने जाना कि वह कोटिंग यूनिट खराब हो गई है। निर्वात पैदा ही नहीं हो रहा।
“बात क्या है सुधीर?” उसने अपने जूनियर से पूछा जो प्रो. कुन्द्रा की लैब में पिछले साल से काम कर रहा था।
” वैकुअम नहीं आ रहा। ”
“लेकिन मुझे तो हाई वैकुअम चाहिये ही नहीं। मैं अपने एक्स्पेरिमेन्ट कर लूँगी। ” फ़िर उसने चिढ़ाया – कल शाम मेरे हास्टल के बाहर क्या कर रहे थे?
सुधीर का चेहरा लाल हो गया। पास खड़े उसके बैचमेट कान्त ने सुना “क्या ? ये कल आपके हास्टल गया था ?”
“अरे नहीं यार ……” वह शर्माया सा श्रीकान्त को एक ओर ले कर चल दिया।
शुचि जानती है, वह सीधा, अच्छा लड़का है। अपनी बहन की मित्र नंदना को मिलने चला आता है कभी कभी। बहन का ही काम लेकर। बस शुचि को उसे खिझाने में मजा आता है। वह भी जानता है कि वह बस यूँ ही खींचती है। कभी बुरा नहीं माना।
अब शुचि विभाग में सीनियरों में आती थी। यह उसका चौथा साल था। दिव्या पिछली फ़रवरी में और मनीषा अक्तूबर में जा चुकी थीं। फ़िर आई तो वाइवा दे कर चली गई। तभी शुचि का ऐक्सीडेंट हुआ था। अब तो मनीषा दी की शादी भी हो चुकी। आने का सवाल ही नहीं। दो अन्य सीनियर लड़के- उनके बैच के, अपनी थीसिस लिख रहे थे और विभाग में कम नजर आते थे। वह अपना काम करने के लिये किसी की अनुमति नहीं लेती थी, वरन सूचित करती थी। आज भी उसने यही किया था।
उसने कोटिंग यूनिट चलाई, अपने कोरोना कोरोज़न के एक्पेरिमेंट किये और डिवाइस लेकर अपनी लैब में चली गई।
उस दिन शुक्रवार था जब शुचि को प्रो. कुन्द्रा का बुलावा मिला। बीच में दो दिन बीते थे बस।
“मुझे ? क्यों? ” वह चौंक गई। लेकिन सुधीर कोई जवाब दिये बिना चला गया। वह लैब के अन्दर उनके कमरे में गई। प्रो. कुन्द्रा अपनी कुर्सी पर बैठे हुये थे।
“आइये!कोटिंग यूनिट में वैकुअम क्यों नहीं आ रहा ?”
“सर, मैं नहीं जानती।”
“आप यूनिट में काम करती हैं, आप नहीं जानतीं?”
” सर मैं लो वैकुअम पर काम करती हूँ। हाई वैकुअम की जरूरत नहीं मुझे। केवल रोटरी पंप चलाती हूँ।”
“तो आपको नहीं पता?”
“नो, सर।”
‘आपने यूनिट खराब की है और आपको नहीं पता। आपने कभी मुझसे परमीशन ली उस यूनिट में काम करने के लिये ? प्रो. कुन्द्रा की आवाज अब कठोर थी।” आज से आप उस यूनिट में काम नहीं करेंगी। समझ गईं आप? जाइये।”
“थैंक यू सर।”
वह बाहर आई और फ़ूट-फ़ूट कर रो पड़ी।
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शुचि रोई बहुत बार- इन चार सालों के हास्टल जीवन में। कभी अपने दुख से, कभी औरों के दुख से। अकेले में। कभी मनीषा के सामने भी। कई बार सोचा पी एच डी छोड़ घर भाग जाये, लेकिन तब मनीषा ने सम्भाल लिया। आज कोई नहीं था ! वह किसके आगे जाकर रोये! किससे अपनी व्यथा कहे !
वह अपने रिसर्च स्कालर रूम में बैठ कर बहुत देर रोयी। प्रो. कुन्द्रा उसे इस तरह अपराधी ठहरा कर अपनी लैब से निकाल देंगे, यह उसके लिये कल्पनातीत था। अभी तो उसके एक्स्पेरिमेन्ट ढंग से शुरू हुये थे। वह खुश थी कि उसे अच्छे परिणाम मिलने लगे थे। अभी तो उसने पी एच डी पाने के सपने देखने शुरू किये थे। अपनी खुशी दोस्तों से बाँटी थी। मिठाई खाई/खिलाई थी। कितने महीने बीते उस बात को ? बस छह महीने पहले की बात है! किसने आग लगाई आखिर ? सुधीर ने? खिझाया था इसलिये? और वह थैंक यू कैसे बोल गई? जाने की अनुमति मिली इसलिये।प्रो. कुन्द्रा इतने गुस्सा क्यों हुये? क्या उसे सॉरी बोलना चाहिये था? लेकिन उसने कोई गलती नहीं की थी, क्यों सॉरी कहती। वह रोती रही।
“विभाग के इन्जीनियर, स्नेही, अधेड़ वय अशोक जी ने अन्दर झाँका, हमेशा की तरह मूँछों में मुसकराते हुये” क्या मैं अन्दर आ सकता हूँ ?”
प्रो. कुन्द्रा का कमरा उसके शोध छात्राओं वाले कमरे से एक कमरा छोड़कर था। बीच में प्रो. सिंह की लैब आती थी। प्रो. सिंह नीचे, उसके गाइड के बगल के कमरे में बैठा करते थे। दूसरी ओर सेक्शन का सेमिनार रूम, इंजिनियर अशोक जी का कमरा। उसका प्रो. कुन्द्रा के कमरे में जाना, बाहर आना, रोना और अपने कमरे में जाना सबने देखा था।

शुचि ने आँसू पोंछ लिये। उन्हें सारी घटना की खबर थी। भूमिका से उपसंहार तक। प्रो. कुन्द्रा शहर से बाहर थे। एक महीने बाद लौटे थे। जब पेशी हुई तो सुधीर के पास दिखाने को कुछ नहीं था। कोई नया रिजल्ट नहीं, कोई नया आयडिया भी नहीं। डाँट खाई तो डर गया। कोई वजह बनानी थी। वैकुअम नहीं आ रहा है। दोष शुचि के सिर। यूँ भी जब से पेपर बना है, फ़ेलोशिप मिली है, मनीषा गई है, वह सबको कांटे सी चुभ रही है।
“लेकिन अब मैं क्या करूँ? कैसे होंगे मेरे एक्सपेरिमेंट?” शुचि की आँखॊं में फ़िर आँसू भर आये। आवाज रुँध गई।
“प्रो. रैणा को बतलाया?”
“नहीं। उन्हें बतलाना तो है ही।”
‘अभी जाओ।”
उसने बैग उठाया। कमरे में ताला लगाया और चुपचाप पूरा कारीडोर पार कर गई। सुधीर, वे सीनियर्स, सब लाइन से लैब के बाहर खड़े थे। किसी ने कुछ नहीं कहा, नहीं टोका, नहीं रोका।अब करने को कुछ नहीं था। वह सर से मिलकर हास्टल वापस चली जायेगी।

प्रो. रैणा अपने कमरे में नहीं थे। शुचि उनसे अगले दिन मिली। यह भी बतलाया कि कि प्रो. कुन्द्रा का कहना है कि उसने उनसे काम करने के पहले परमीशन नहीं ली थी।
प्रो. रैणा के चेहरे पर क्रोध का भाव उभरा और गायब हो गया। बोले कुछ नहीं।
“सर , मैं घर चली जाउँ? लौट कर आउँगी तो काम करुँगी।” शुचि की आवाज रुँध गई फ़िर से।
“जाओ। दो सप्ताह बाद लौटो।”
“थैंक यू सर।”
घर तो यूँ भी जाना ही था। आनन – फ़ानन में टिकट खरीदा । आर ए सी का। अगले शनिवार शुचि नीलाचल से घर की यात्रा पर थी।

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कोयले का ट्रक और मन पर उतरी कालिमा

शुचि का रोना किसी से बर्दाश्त नहीं हुआ। बाकी के चार-पाँच दिन जो वह विभाग गई, सुधीर नजरें चुराता रहा। उसके सीनियर्स, रवि और विजय, ने दायित्व लिया और मंगलवार को यूनिट में वैकुअम आ गया। शुचि मन ही मन बेहद कृतज्ञ हो आई उनकी। वह अब दोष मुक्त थी। प्रो. कुन्द्रा के चेहरे पर अपराधी भाव उतर आया लेकिन तब भी शुचि काम करेगी, ऐसा उन्होंने नहीं कहा।

नीलाचल में बेहद भीड़ थी, हमेशाकी तरह । शुचि का आरक्षण नहीं था। वह मानसिक रूप से तैयार थी , रात भर अपने सूटकेस पर बैठ कर यात्रा करने के लिये। जब से हास्टल में है, अपनी हर राँची यात्रा में, अगर उसका आरक्षण रहा तो भी कभी पूरी सीट पर आराम से सो कर नहीं गई। किसी न किसी के साथ सीट बाँटी है। कोई न कोई लड़की हर बार मिल गई है, परिचित – अपरिचित। बी एच यू की। उसी रास्ते घर जा रही। कभी आधी यात्रा का साथ, कभी पूरी यात्रा का। लेकिन आज अभी कोई दिख नहीं रहा और शुचि ने मांगना सीखा भी नहीं है। देना आ गया है , बस।
वह एक कम्पार्टमेन्ट में घुसी, आमने- सामने की सीटॊं के बीच की जगह पर अटेची डालकर उसी पर बैठ गई। टी टी आया, टिकट दिखा दिया। “कोई व्यवस्था नहीं हो पायेग, आज बहुत भीड़ है।” कह कर वह चला गया। शुचि उसी तरह बैठी रही। रात भर की बात है और क्या!

ट्रेन तेज गति से भाग रही थी। डब्बे में लोग अब व्यवस्थित हो गये थे। रोशनियाँ जल गई थीं। खाने का आर्डर देकर वह चुपचाप सामने की खिड़की से भागते पेड़ों को देख रही थी, घर, पेड़, रास्ते….. सब भाग रहे थे जैसे और उसके साथ ही भाग रहा था शुचि का मन। घर जा कर क्या कैसे बतायेगी! बी एच यू लौट कर कैसे काम करेगी फ़िर …..
एक ओर सामने की नीचे वाली बर्थ पर एक महिला थीं। शुचि को उनसे कुछ सदाशयता की उम्मीद थी। उन्होंने बात भी की, जाना कि हास्टल से घर जा रही है। कुछ देर शुचि उनके साथ उनकी सीट पर बैठी भी लेकिन फ़िर उन्होंने खाने के बाद पैर फ़ैला लिये। शुचि वापस बर्थ से नीचे अपनी अटैची पर। बाकी तो पुरुष ही थे। जगह बदलने से क्या खास अन्तर पड़ेगा! शुचि ने सोच लिया यूँ ही बैठ कर रात काट लेगी।

“तुम इधर आ कर बैठ सकती हो।” सामने की बर्थ पर लेटे हुये पुरुष का प्रस्ताव आया। उसने अपने पैर सिकोड़ लिये थे, उसके लिये जगह बनाने को।”
‘धन्यवाद , मैं ठीक हूँ।”
“चली क्यों नहीं जातीं ?” महिला ने झिड़का।
शुचि की इच्छा नहीं हुई। वह बाहर रह कर लोगों की दृष्टि पहचानना सीख चुकी है। “मैं यहाँ ठीक हूँ।” वह बोली।
“क्या ठीक हो ! सिर टिकाओगी मेरी सीट पर। रात भर क्या सोओगी नहीं? वहाँ बैठ कर सो लेना।”
शुचि ने जवाब नहीं दिया, एक बार फ़िर सामने की सीट पर बैठे सज्जन का मुआयना किया और अपनी जगह से नहीं हिली। इस स्त्री की बगल में ही ठीक है।
“मैं आपको परेशान नहीं करुँगी।” उसने उस स्त्री से कहा।
” तुम अपने आप को समझती क्या हो? हम क्या हास्टल में रहने वाली लड़कियों को नहीं जानते ? बड़ी सती-सावित्री बन रही है।” दूसरी ओर बैठे पुरुष का स्वर उभरा।
‘आप ऐसे-कैसे कह सकते हैं, सर?” शुचि ने प्रतिवाद किया। काश यहाँ उसे जानने वाला कोई होता, कोई और हास्टल की ही लड़की होती तो वह मिल कर लड़ लेती इन सबसे।
” अरे, बहुत देखा है। हास्टल में रहने वाली लड़कियाँ घाट- घाट का पानी पिये होती हैं। सब एक जैसी। नखरे दिखा रही है।” इस बार कई स्वर, एक- दूसरे की सहमति में। वह स्त्री उनके साथ। अपनी कुंठा निकाल रही है शायद। शुचि ने सोचा, लेकिन साथ-साथ ही उसने बेहद अपमानित महसूस किया।
“आप बिल्कुल गलत कह रहे हैं। इस तरह जेनेरलाइज मत कीजिये। घर में रहने वाली लड़की भी दुष्चरित्र हो सकती है। मैं नहीं जानती आपकी चरित्र की परिभाषा क्या है लेकिन तब भी कह रही हूँ। ऐसा नहीं है। घर से बाहर निकल कर अपना व्यक्तित्व, करियर खुद बनाने, अपने फ़ैसले खुद लेने वाली सब लड़कियाँ आपको चरित्रहीन लगती हैं तो लगा करें। आइ केयर अ डैम।”
“अंगरेजी छाँट रही है।”
शुचि ने अपना बैग कंधे पर डाल, सूटकेस उठाया और उस कम्पार्टमेन्ट से बाहर हो गई। पसीने-पसीने। पसीने में आँसू घुल गये। सिर झुकाकर वह कमीज में पसीना पोंछने का नाटक करती जगह तलाशने लगी। किस हिस्से में जाकर बैठे! यहाँ तो सारे पागल लोग हैं!
ठहाके पीछा करते रहे……………….

जगह मिली उसे। डब्बे के दूसरे सिरे पर। पिछले दरवाजे से ठीक पहले वाले कम्पार्टमेन्ट में। बी एच यू के ही मेडिकल कालेज के छात्र- छात्रायें। एक पूरा कम्पार्टमेन्ट घेर रखा था, उन्होंने। छह बर्थ – आठ लोग।तीन लड़कियाँ, पाँच लड़के। शुचि उन्हें नहीं जानती थी। बस हाव भाव से इतना समझा कि उसकी तरह ही स्टूडेंट हैं। पूछ कर सामान रखा। परिचय किया और आश्वस्त हुई।यहाँ से कोई उसे भगायेगा नहीं।
दो बर्थ पर तीन लड़कियाँ थीं। एक पर शुचि को बैठने को जगह मिल गई। रात गुजर गई। लेकिन अभी आगे का सफ़र बाकी था।

नीलाचल हमेशा की तरह लेट थी। राउर केला पहुँचने में जब दिन के दस बज गये तो डब्बे में बेचैनी छा गई। राँची की बोगी कटकर प्लेटफ़ार्म पर पड़ी रही। बाकी ट्रेन आगे जा चुकी थी। डब्बे में नल में अब पानी नहीं था। शुचि भी बाकियों के साथ प्लेट फ़ार्म पर उतरी। हाथ-मुँह धोया, प्लेट फ़ार्म पर, अपनी सीट के सामने, चहलकदमी की, दोसे खरीदे, खाये। अब? जिससे भी पूछा , कोई नहीं बतला सका कि इस बोगी के लिये क्या व्यवस्था होगी। पटना- हटिया वाली ट्रेन , जिससे यह बोगी जोड़ी जाती थी, समय पर आई और गई। उसके बाद की ट्रेन भी गई। यानी कि प्लेट फ़ार्म पर पड़े रहना है। एक ट्रेन शाम चार बजे यहाँ से होती हुई राँची जाती है। उसी में शायद…. । वह वापस अपनी जगह पर आ गई। कम्पार्टमेन्ट में लोग घूम रहे थे। सब तरफ़ अनिश्चय , बेचैनी। फ़ंस जाने की व्याकुलता।
“चलो, बस से जायेंगे। “एक लड़के ने प्रस्ताव किया। शुचि ने बाकियों के साथ सहमति दे दी।
कुछ आधे घंटे बाद वह वापस लौटा। बाकी के चार लड़कों के साथ।
“आज हड़ताल है। कोई बस, टेम्पो , कुछ भी नहीं चल रहा।”
बाकियों के साथ शुचि के चेहरे पर भी हताशा उतर आई।
कुछ लोग जो पहले उतर गये थे, अब अपने सामान के साथ डब्बे में वापस आ रहे थे।
“कुछ करो यार।” बाकी की दो लड़कियों ने लड़कों को चढाया।
वे फ़िर उतर गये।
कुछ पन्द्रह मिनट बाद एक दौड़ता हुआ वापस कम्पार्ट्मेन्ट में चढ़ा।
“एक ट्रक है, उसको रोका है। चलो, उतरो जल्दी। जायेंगे।”
“ट्रक से? ” लड़कियों ने मुँह बनाया।”
“कम आन यार। बैठे रह जाओगे। कुछ नहीं मिलनेवाला। १००-१०० रुपये लेकर लोग घूम रहे हैं, मना रहे हैं । कोई जाने को तैयार नहीं। ट्रकवाला तो अपनी राह जा रहा है। हमारे लिये नहीं। खाली है। ले जाने को मान गया, यही बहुत है। राँची जा रहा है। हम भी पहुँच जायेंगे। चलो, जल्दी करो।”
‘और कोई रास्ता नहीं?”
बैठे रहो। शाम को आयेगी ट्रेन, ले जायेगी। रात को किसी समय पहुँच ही जाओगी।” वह तिक्तता से हँसा।
शुचि औरों के साथ मय सामान उतर आई। प्लेट फ़ार्म पार किया। सड़क पर आई। कुछ एक फ़र्लांग पर कोयले का खाली ट्रक खड़ा था। बाकी तीन लड़के उसे रोके खड़े थे।
“चलो, सामने बैठ जाओ। हम पीछे खड़े हो लेंगे। पूरा ट्रक खाली है। बहुत जगह है, हमारे लिये।”
शुचि अनमनी सी, जीवन में पहली बार ट्रक में बैठी। ड्राइवर की बगल की सीट पर, अन्य तीन लड़कियों के साथ ठुँसी-सी।
एक लड़का उनके साथ खड़ा.. सुरक्षा की जिम्मेवारी लेता हुआ। बाकी के चार पीछे सवार।
दुपहर एक बजे वे सब राँची में थे। वे सब मेकन कालोनी में रहने वाले थे। शुचि ने मेन रोड पर उनसे विदा ली। अपने हिस्से के बीस रुपये दिये, धन्यवाद कहा और रिक्शा पकड़ा। कोयले का चूर्ण अब भी ट्रक में था। सबके चेहरे-कपड़े जगह-जगह काले…..
“आ गई!” बहन ने दरवाजा खोला और घोषणा की।
हँसती हुई वह घर में दाखिल हुई। माँ-पिताजी खुश हुये। मीनू का मुँह बना रहा, हमेशा की तरह, वैसा ही रूखा। इस बार शुचि को फ़र्क नही पड़ा। उसने उसकी कोई परवाह नहीं की। वह अपने बूते पर जीने के लायक हो गई थी।
‘आप मीनू की शादी कर दीजिये। मैं अपनी पी एच डी पूरी करुँगी।” उसने लौटने से पहले पिता से कहा। उसे मालूम था, पिता पहले शुचि की शादी करना चाहते हैं। बड़ी तो वही है। रिजर्व बैंक, राँची में अब मैनेजर की पोस्ट को पदोन्नत पिता का रिटायरमेंट करीब था। एक दायित्व तो पूरा हो!
“शायद अब यह प्रसन्न रहे।” उसने मन में सोचा। भाई व्यवस्थित हो ही चुका है। अब यह भी निकल जाये तो पिता का दायित्व भी घटेगा। वे भी खुश रह सकेंगे। शुचि को लगा, मन का बोझ थोड़ा कम हो गया है। बहुत सारी कालिमा ले कर लौटी थी घर।

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हॉस्टल- परिवर्तन

कई दिनों से हॉस्टल का माहौल गरम है । साइन्स की लड़कियों को नए हॉस्टल में जाना है। ज्योतिकुंज में अन्य सारी लड़कियों के लिए जगह है लेकिन साइन्स की लड़कियों के लिए नहीं । नया हॉस्टल अच्छा नहीं । कुछ लड़कियाँ जा कर देख आई हैं । बगल में लड़कों का हॉस्टल है और बी एच यू के लड़के! ….राह चलते दुपट्टॆ खींच लेते हैं । सड़्क पर स्ट्रीट लाइट भी नहीं । खिड़कियों के शीशे पत्थर मार कर अभी से तोड़े जा चुके । कौन रहेगा वहाँ …
जितने मुँह, उतनी बातें !
कभी मत जाना – सीनियर लड़कियाँ भड़का रही हैं । लड़कों का हॉस्टल होता तो कभी न सुनते । सारे कानून लड़कियों के लिए हैं ।. शुचि समझ नहीं पाती अब भी । हर वक्त लड़कों से तुलना क्यों ? जो लड़के करते हैं वही हमारा आदर्श क्यों ? हम क्या करें किस परिस्थिति में ,हम तय करेंगे अपने अनुसार । हम लड़के नहीं हैं । न हमें होना है। कम से कम शुचि का सच यही है । घॊर निराशा के क्षणों में भी , जब उसे अपने लड़की होने की वजह से कुछ झेलना पड़ा, उसके मन में यह बात कभी नहीं आई कि काश! वह लड़का होती ।
कभी नहीं । वह जो है सो है । स्थितियों को वह नियंत्रित करेगी अपनी आवश्यकताओं , जरूरतों के अनुसार । इसीलिए नहीं कि कोई दूसरा ऐसा करता या फ़िर लड़के यह करते हैं ।

“लड़कों का हॉस्टल होता तो वे कभी नहीं सुनते । तुम लोग भी मत जाओ।” साइकोलाजी की सीनियर शोध छात्रा शुभदा शुचि को समझा रही है।
“साइन्स का हॉस्टल अलग, आर्ट्स का अलग , ये क्या है। हमारे बीच दरार पैदा करने की कोशिश ।”
घर से लौटी शुचि अपने शोध के अन्तिम चरण में है । उसे खुद यह फ़ालतू का झमेला लग रहा है । छह महीने, साल भर टल जाता तो सीधे बिस्तरा समेट कर दफ़ा हो जाती यहाँ से । उसी के जैसी स्थिति कई अन्य लड़कियों की है । और यह हॉस्टल चार सालों में घर जैसा लगने लगा था । तमाम विभागों की लड़कियों से मित्रता । कितने सारे विषयों का ज्ञान यहाँ इकट्ठा किया। बिना किसी भेदभाव के सबके कमरों में गई, सबकी कहानी सुनी । बहुत बड़े दायरे में जी रही थी वह यहाँ। अब सिमटना होगा। सिर्फ़ विज्ञान की छात्राओं /शोध छात्राओं के बीच रहना होगा। यह गलत है।
तमाम लड़कियाँ शुचि दी के कमरे में आईं । आखिर शुचि दी क्या सोचती हैं इस बारे में।
वार्डन कहती हैं कुछ नहीं हो सकता। युनिवर्सिटी का आर्डर है।
वह हॉस्टल अच्छा नहीं है।
वी सी के पास चलें ?
कौन जायेगा ? आप ?
हाँ, हम सब चलेंगे ।
शुचि ने नेतृत्व का जिम्मा ले लिया और फ़िर चकित भी नहीं हुई अपने आप पर। वह तो ऐसी ही है। अन्याय देखा, भिड़ गई। अन्दर का वास्तविक स्वरूप बाहर आ गया लगता है।
जग में जो भी निर्दलित प्रताड़ित जन है।
यह कर्ण उन्हीं का सखा, बन्धु, सहचर है।
…………
मैं उनका आदर्श, कहीं जो व्यथा न खोल सकेंगे…..
दिनकर की पंक्तियाँ गूँजने लगीं मन में।

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जब जाने का दिन आया तो मुश्किल से चार- छह लड़कियाँ उसके साथ थीं। लेकिन वे गए। वी. सी. मिले। स्पष्ट उत्तर – “यह हॉस्टल लड़कियों की बढ़ती संख्या को ध्यान में रखकर विज्ञान विभाग के पैसे से बना है । आपलोगों को जाना तो होगा ही। हाँ, उस हॉस्टल को लेकर जो अन्य शिकायतें हैं, हम दूर करेंगे।”
“हमें उस सड़क पर स्ट्रीट लाइट चाहिए।”
“ठीक है।”
कमरों की खिड़्कियाँ नीची हैं और चारदीवारी भी। खिड़कियों के शीशे हमारे जाने से पहले ही टूट चुके हैं। शीशॊं पर यदि जाली लगी होती तो वे नहीं टूटते। अभी तो कोई पत्थर फ़ेंके तो कमरे के अन्दर आ जायेंगे। चारदीवारी भी थोड़ी और ऊँची होनी चाहिए।”
आप लिखित रूप में यह सब हमें दे दीजिए।
“हम सारे अपेक्षित परिवर्तनों के बाद ही उस हॉस्टल में जायेंगे।”
“ठीक है।”
उस नए हॉस्टल में जाना कुछ और महीनों के लिए टल गया । लेकिन शुचि जानती थी, जाना अपरिहार्य है। जब विभा के साथ जाकर नए हॉस्टल में अपना कमरा तय कर जब बाहर निकल रही थी तो गेट पर वार्डन से मुलाकात हो गई । मैडम अरोड़ा… अब नये हास्टल की वार्डन होंगी। इनसे पीछा छूटने वाला नहीं है।
“कब आ रही हो?”
“जब सब आयेंगे।” वह हँसी ।
“तुम आओ, फ़िर सब आयेंगे।” वार्डन ने चिढे़ हुए स्वर में कहा ।
वह कुख्यात हो चुकी है। आज शुचि ने जाना। क्या फ़र्क पड़ता है …..!
लेकिन उनकी माँगें पूरी हुईँ। सारे परिवर्तन किए गए। और तब लड़कियों ने अपनी सुविधानुसार हॉस्टल में जगह ली।
यह लड़कियों की एक और जीत थी। जो उन्होने लड़की होने के नाते जीती थी। सिर्फ़ अपने लिए…. और वह जीत शुचि की भी थी।

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मानसी का कमरा

शुचि कमरे में हीटर पर दूध उबाल रही थी । मानसी दरवाजे पर आकर खड़ी हो गई “दीदी मैं आपकी साइकिल ले जाऊँ?”
फ़िर कुछ रुककर उसने जोड़ा ” आप आज विभाग जायेंगी क्या?”
उसे पता है, शुचि रविवार को काम नहीं करती।
“ना, जाना तो नहीं है , लेकिन तुम कहाँ जा रही हो ? लौटोगी कब?”
“बस गोदौलिया तक। अपनी लोकल गार्जियन से मिलकर आ जाऊँगी।”
मतलब, कल मिलेगी साईकिल। यह आज तो वापस लौटने से रही। कैसे जो इतनी दूर साइकिल से चली जाती है। शुचि को तो कभी हिम्मत नहीं हुई।
“इतनी दूर जाओगी ? साइकिल से ?”
“अरे, क्या है। हमेशा तो जाती हूँ। मेरी साइकिल का टायर पंक्चर है। मैं ले जाऊँ आपकी साइकिल?”
शुचि ना नहीं कर सकी।
मानसी यह जा, वह जा।
अबतक कितनी ही बार तो शुचि से साइकिल माँग चुकी है यह लड़की। अपनी साइकिल तो खटारा है। जब भी दूर जाना हुआ, माँगती फ़िरेगी सबसे। इतनी खूबसूरत, पहनावे में अव्वल, स्मार्ट। बाप मैनेजर इतनी बड़ी कम्पनी में। कितना तो पैसा होगा घर में। तब भी पूरे हॉस्टल में घूम-घूम कर साइकिल माँगती फ़िरेगी। इसी बहाने तो कितनों से दोस्ती की है इसने। शुचि के करीब भी इसी तरह आ रही है। शायद ही किसी वीक एन्ड में हॉस्टल में रहती हो। लोकल गार्जियन न सही, मूवी चली जायेगी किसी के साथ। विभाग जायेगी, कहीं घूम आयेगी … और फ़िर कहानियाँ ही कहानियाँ। बातें ही बातें करती है यह लड़की। कहाँ से इतना आत्मविश्वास आ जाता है अमीर घरों के लोगों में ? कपड़ों से लेकर हर चीज ये लड़कियाँ आपस में बदल लेती हैं। आज अपने कपड़े पहने घूमती है कल को रुचि की ड्रेस में नजर आयेगी। परसों किसी और के। शायद अपनी संपन्नता का गहरा अहसास ही उन्हें इतना बेफ़िक्र और बेशर्म बना देता हो। जब वे अफ़ोर्ड कर ही सकती हैं तो क्यों न कुछ बचा लें, दूसरॊं का बर्बाद हो तो हो। शुचि को तो कुछ माँगने में ही शर्म आती है। छॊटेपन का अह्सास भी अन्दर की चीज है ! अमीर लोग तो माँग-माँगकर दुनिया बना लेते हैं।

यह लड़की प्रेरणा का श्रोत है- वन्दिता के लिए। एम एस सी केमिस्ट्री की प्रथम वर्ष की वह छात्रा इस पर इस कदर फ़िदा है कि कविता ही लिख डाली है उसने अपनी मानसी दी पर। बहुत भोला , निश्छल मन है वन्दिता का। बचपन में ही श्रवण क्षमता खो बैठी यह लड़की कानों में मशीन लगाए बिना सुन नहीं पाती। शुरू -शुरू में मेस की टेबल पर से कर्कश आवाज में उसका चीख- चीख कर छोटू को बुलाना शुचि को अजीब लगता था । “क्यों इतना चिल्लाती है यह ?” उसने बगल में बैठी शुभ्रा से धीमी आवाज में पूछा था।
“दीदी , उसके कान खराब हैं। उसे पता ही नहीं चलता कि वह कितनी तेज आवाज में बोलती है।”
“ओह! ” शुचि चुप हो गई थी।
वन्दिता उसके करीब कभी नहीं आई लेकिन मानसी से जुड़ने का मौका शुचि को मिला।
नये हास्टल में अब शुचि और विभा रूम मेट थे लेकिन उसकी आदतों से शुचि पहले ही परेशान थी। शोध के अन्तिम दिनों में विभा से तंग आकर जब उसने दूसरे कमरे में शिफ़्ट होना चाहा और वार्डन ने शुचि को अकेले कमरे में रहने नहीं दिया तो मानसी ही काम आई। वह उसके कमरे में शिफ़्ट होगई। मानसी ने ही प्रस्ताव दिया। वह आराम से अपना शोध प्रबन्ध लिख सकेगी। वह खुद तो सप्ताह भर विभाग में और सप्ताहान्त में लोकल गार्जियन के घर रहती है। शुचि आराम से काम कर सकती है !
शुचि कृतज्ञ हुई। उसने पहली बार माना कि उस लड़की में कुछ अच्छा भी है। मांग- मांग कर भी दोस्तियाँ बनाई जाती हैं। उसने उसके साथ बनारस का दशहरा देखा। संकट मोचन के हनुमद-जयंती समारोह।
शुचि ने पहली बार सप्ताहान्त में संकट मोचन मन्दिर में रात गुजारी। नृत्य-संगीत के कार्यक्रम देखते हुए। उसके हास्टल की कितनी ही लड़कियाँ वहाँ मन्दिर के प्रांगण में थीं। प्रोग्राम सप्ताह भर चलें या तीन दिन, शुचि गई बस शनिवार- रविवार को ही। लेकिन तब भी हरिप्रसाद चौरसिया की भैरवी , पंडित जसराज का गायन, संयुक्ता पाणिग्रही, सोनल मान सिंह के नृत्य कभी नहीं भूले। पौ फ़टने से पहले शुरू हुई बांसुरी भैरवी राग में भोर का ऐसा समां बाँध रही थी कि बन्द कमरे में कोई सारे परदे गिरा कर बैठ जाए तो भी उसे भोर होने का अहसास होगा। रात भर की जागी शुचि ने अचानक से ताजगी महसूस की थी और फ़िर उस ताजगी में ही रची- बसी पैदल चलकर हास्टल वापस आ गई थी। बनारस की यादों में इतना कुछ सुन्दर है कि वह शायद ही भूल पाये।

जब शुचि घर से वापस लौटी तो गाइड ने बताया कि वह प्रो. सिंह की यूनिट में काम कर सकती है। नई नई यूनिट आई थी प्रो. सिंह की। शुचि ने देखा भी था लेकिन कभी उसके मन में आया ही नहीं कि वह इस लैब में भी हो सकती है। जब प्रो. सिंह ने खुद उसे कारीडोर में रोका और कहा कि वह काम कर सकती है – उनकी लैब में तो शुचि को मन मांगी मुराद मिली। काम कर सकेगी। संकट मोचन जा कर प्रसाद चढ़ाया। दुर्गा मन्दिर में प्रार्थना की और नये सिरे से अशोक जी के साथ मिलकर, उस नई यूनिट में अपना कोरोना सिस्टम सेट करना शुरू किया। तब गर्मियाँ गई नहीं थीं। अमलतास और गुलमुहर के फ़ूल बिछे रहते सड़क पर। सुबह की गई शुचि साँझ ढले लौटती और ठंढी बयार में सड़क पर साइकिल चलाती रोमांचित हो उठती -” कितना सुन्दर है बी एच यू!”
अगले छह महीनो तक लगातार काम कर उसने अपनी थीसिस का काम समेट लिया।

मानसी यदि सप्ताहान्त में हास्टल में रही तो खाना वही बनाती है। शुचि को एक छोटी बहन मिली है उसमें। अब सप्ताहान्त में मानसी की चारपाई पर शुचि की किताबें , शोध प्रबन्ध से संबन्धित कागज-पत्तर फ़ैले रहते हैं। वह कमरे में बैठ कर थीसिस लिख रही है। लिखती है, गाइड को दिखाती है और फ़िर टाइपिस्ट के चक्कर लगाती है। अभी भी मन टूटा हुआ ही है। काम कर डाला है। एक पेपर लिखा है, तब भी अन्दर से हिल गई है जैसे। “रोनी सूरत! यह क्या प्री पी एच डी सेमिनार देगी!” उसने लोगों को विभाग में कहते सुना है। वह अब विभाग में कम ही दिखाई पड़ती है। अपने बूते पर उसने काम किया है। अपने बूते पर निकलेगी। शुचि इसी साल थीसिस जमा करने का सपना देखती थी लेकिन वह अगले साल के लिये खिंच गया।

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घोटाला-घोटाला

इतनी आसानी से शुचि का बी एच यू से निकलना नहीं लिखा था। पहले विभाग में फ़ंसी और बाहर आई। अब हास्टल था।
वह जुलाई ९२ था। शुचि के प्री पी एच डी सेमिनार जुलाई अगस्त पहले सप्ताह में थे। वह देर रात जागती। बी एच यू के नियमानुसार पहले उसे अपने सेक्शन में सेमिनार देना था। हर दिन एक चैप्टर के बारे में। फ़िर सुझाये गये संशोधनों पर काम करना और अन्त में आखिरी सेमिनार – पूरे शोध प्रबंध का सार। वह सेमिनार जब सेक्शन में स्वीकृत हो जाये तो पूरे विभाग के सामने। विभागीय शोध कमेटी की अनुमति उसके बाद मिलती है। शुचि उसके बाद ही थीसिस जमा कर सकती है।
वह अपने कमरे में जगी हुई थी । रात के ग्यारह बजे होंगे जब उसके दरवाजे पर दस्तक हुई। शुचि ने परदा हटा कर झांका – “क्या है?”
“मेस की मीटिंग है। अभी कामन रूम में। आपको आना है।”
“अभी? रात के ग्यारह बजे? क्यों? ”
“हाँ, मेस में चालीस हजार का घाटा है। ज्योति कुंज से चला आ रहा था। जब लड़कियाँ यहाँ शिफ़्ट हुईं तो पन्द्रह हजार था। तब सबने ज्यादा पैसे भरे थे, लेकिन तब भी अब कैसे चालीस हजार हो गया, समझना है। मेस बंद हो जायेगा। आप ज्योति कुंज में मैनेजर थीं। आपको तो आना ही पड़ेगा। वार्डन को बुलाने लड़कियाँ गई हैं।”
“मैं मैनेजर थी, अब नहीं हूँ। विभा है स्थायी मैनेजर, उससे बात करो। मेरी पी एच डी का लास्ट स्टेज है। ” “हम जानते हैं, लेकिन मेस बंद हो जाएगा। आप प्लीज आइये।”
“ये कोई समय है मीटिंग करने का ? मैं नहीं आउँगी।” शुचि ने दरवाजा बंद कर दिया।

लड़कियाँ चली गईं। वह उन्हें पहचानती भी न थी। हर साल इतने सारे नये चेहरे हास्टल में दिखाई पड़ते हैं। इस साल जो आये, उनसे तो वह बिल्कुल ही परिचित नहीं। अपनी दुनिया में सिमटी हुई है। विभा से दोस्ती टूट चुकी। अमृता अपने विभाग के सीनियर शोधार्थी से प्रेम विवाह कर शहर में रहती है अब। कोई सम्पर्क नहीं। लेकिन उसे सब जानते हैं, उसे पता है। पुराने हास्टल की कई शोध छात्रायें अभी भी हैं और सूचनायें हर अगले बैच को अन्य चीजों की तरह ट्रान्सफ़र हो जाती हैं। फ़िर मेस महाराज भी है, सूचना केन्द्र। जब उस हास्टल से यहाँ आई तो उसी मेस महाराज का बड़ा लड़का यहाँ चला आया। वार्डन की अनुमति थी। वह उसकी इज्जत करता है। घबराता भी है। शुचि ने शुरु में इस हास्टल में भी मेस पर नजर रखी थी, बाद में बिल्कुल अलग हो गई। विभा से अलग होना पूरे तौर पर मेस से अलग होना भी था।
अगली सुबह उसने जाना कि मीटिंग हुई थी रात को। वार्डन की अनुपस्थिति में। लड़कियाँ बेहद नाराज हैं। आज रात फ़िर मीटिंग होगी । वार्डन आयेगी। रात आठ बजे।
शुचि ने सोचा, आज रात वह होगी। जाने तो यह घाटा आया कहाँ से? विभा ने उसे कभी रजिस्टर चेक करने की अनुमति नहीं दी। सारे कागजों पर खुद हस्ताक्षर किये। लापरवाह बनी रही और शुचि को मना करती रही- कुछ भी करने से। कमरे में भी वही लापरवाही। शुचि झाडू लगाये, कमरा साफ़ करे, सप्ताहान्त में खाना बनाये और देवी जी सुबह नौ बजे से रात दस बजे तक विभाग में । पता नहीं क्या करते हैं ये जेनेटिक्स वाले लोग। ऐसा भी नहीं कि जल्दी पी एच डी हो जाती है। देवी जी सप्ताहान्त में भी आठ बजे से पहले नहीं आतीं। आयें, खाना खायें और उपकृत करें। बस। पैसों का हिसाब कभी सही नहीं। तंग आ गई थी शुचि उससे। लेना तो पचास पैसे भी याद रहा हमेशा, देना कभी नहीं।
शुचि लंका जाने के लिये सीढ़ियाँ उतर रही थी। देखा, महाराज नीचे बरामदे में खड़ा है।
“शुचि बहिन जी , हम जा रहे हैं।”
‘क्यों ?”
“पैसा देंगे तब तो खाना बनेगा। मेस में पैसा ही नहीं है। कहीं और काम खोजेंगे।”
“आज रात मीटींग है न?”
“हाँ, जानते हैं।”
“तो रुकिये। देखिये क्या होता है। मेस तो होना ही है। आप जायेंगे, कोई और आयेगा। ”
“आप रहेंगी मीटिंग में?”
“हाँ।”
वह रास्ते से हट गया।
मेस में उस दिन भी लड़कियों को खाना मिला। शुचि को भी।

कामन रूम खचाखच भरा हुआ था। कई लड़कियों को बैठने को जगह नहीं मिली तो दरवाजे पर खड़ी थीं। यूँ भी गार्गी हास्टल का कामन रूम ज्योति कुंज की तुलना में छोटा था। शुचि जब पहुँची, वार्डन आ चुकी थीं। कुर्सी पर बैठी हुई। टी वी के आगे। उनकी बगल में नीचे बैठी , विभा। वार्डन ने उसे भी इशारे से पास बुलाया। शुचि नहीं गई। जहाँ लड़कियों ने जगह दी, वहीं बीच में बैठ गई। सबके मुँह पर एक ही सवाल – जब घाटा ज्योति कुंज में था तो उन लड़कियों को भरना चाहिये जो वहाँ थीं, हम क्यों भरें ? घाटा आया कहाँ से, कैसे?
“मेस कोआपरेटिव नहीं था पहले। लड़कियों की मेस फ़ीस से महाराज का वेतन गया, एक- डेढ़ साल।”विभा ने बताया।
“वह पंद्रह हजार नहीं हो सकता। हम अलग से मेस महाराज की फ़ीस के छह रूपये देते थे। महाराज का वेतन बारह सौ है।” सम्मिलित शोर उठा।
‘यहाँ आने से पहले पन्द्रह हजार था, अब चालीस हजार कैसे हो गया?” लड़कियों की तरफ़ से अगला सवाल। भुनभुनाहट, अस्वीकृति….. शोर बढ़ने लगा।
“शुचि तुम कुछ बताओ।” वार्डन उसकी तरफ़ मुखातिब थीं।
“मैम, मैंने कभी मेस का रुपये- पैसे का हिसाब नहीं देखा। मैंने मेस को कोआपरेटिव बनाने की जिम्मेवारी ली थी। वह होते ही मैं अलग हट गई। मैं कुछ नहीं बता सकती।”
“तो फ़िर क्या करें?”
“करना क्या है। मेस के हर महीने के रजिस्टर चेक किये जायें। हिसाब मिल जायेगा।”
“सारे रजिस्टर कहाँ हैं?”
विभा ने सिर हिलाया। “मेरे पास।”
“तुम शुचि को दे दो।” वार्डन का आदेश हुआ और मीटिंग बर्खास्त।

अब शुचि को यह भी करना पड़ेगा। वह आजकल विभा से बात भी नहीं करती थी। इतनी चिढ़ थी मन में। हमेशा कहा, हिसाब रखो, कभी उसने नहीं सुनी। लेकिन जो भी हो वह दोष मुक्त थी। कभी किसी कागज पर उसने हस्ताक्षर नहीं किये। यह विभा को उसका अपने अधिकार क्षेत्र में अनधिकार-प्रवेश लगता था। शुचि को कई बार बुरा लगा, जब कोई नई लड़की, मेस फ़ीस लेकर मेस मेम्बर बनने आई और शुचि के हाथ से विभा ने कागज ले लिये- “मैं साइन करुंगी।” आज शुचि ने भगवान को धन्यवाद दिया। कभी- कभी वह अपमानित करवा कर भी हमारा भला कर रहा होता है। उसकी योजना इतनी गूढ़, विशिष्ट है कि उस काल खंड के गुजर जाने से पहले कभी समझ में नहीं आती।

शुचि को मेस के सारे रजिस्टर नहीं मिले। ज्योति-कुंज के दिनों के भी कुछ रजिस्टर गायब थे। जो मिले, उनपर हिसाब सही था। कुछ अन्य लड़कियों ने भी चेक किया। विभा अगले ही दिन उसे कमरे में रजिस्टर पहुँचा गई थी। उसे शुचि से कुछ सहानुभूति की उम्मीद थी लेकिन शुचि का चेहरा कठोर बना रहा।

अगले सप्ताह फ़िर मीटिंग हुई। इस बीच मेस में लड़कियाँ प्रतिदिन के हिसाब से महाराज को ही मेस चार्ज दे रही थीं। वही मैनेजर की भूमिका भी निभा रहा था।
शुचि ने मीटींग में बताया – “जो रजिस्टर उसे मिले, उन पर हिसाब सही है। लेकिन बीच- बीच के कई रजिस्टर गायब हैं।”
वार्डन की मुख मुद्रा अब भी शान्त। वे लड़कियों को समझाने लगीं ” देखो, अब जो हो गया, सो हो गया। नये सिरे से मेस शुरु करो और घाटा आपस में बाँट लो। ऐसे सोचो कि तुम बाजार गई थीं और तुम्हारा पर्स गिर गया….

“…और विभा ने उठा लिया।” एक लड़की ने बात पूरी की। शुचि ने मुड़ कर देखा – यह कौन? ज्योति कुंज से इस हास्टल में आई शोध छात्रा वैशाली थी। उससे एक साल जूनियर।
कमरे में जैसे सब एकमत थे। किसी ने उसकी बात का विरोध नहीं किया। अभी भी “हम क्यों दें, विभा /विभा दी भरें” की भुनभुनाहट जारी थी। शुचि से किसी को शिकायत नहीं थी और न शुचि के पास समय था कि वह कोई आन्दोलन खड़ा करती। यूँ भी विभा कभी उसकी मित्र, रूममेट भी रही थी। यह उसे अपने लिये शोभनीय भी नहीं लगा। अब भी विभा रूँआसी, वार्डन की बगल में बैठी थी- अपने लिये सहारा-स्वीकृति ढूँढ़ती हुई।
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मेस शुरू हुआ फ़िर से। लड़कियों ने घाटा भरा। विभा को लेकर शुचि के मन की कड़वाहट और बढ गई। दोष किसका था ? किसने पैसा खाया ? अकेले विभा तो यह कर नहीं सकती। बीच के गायब रजिस्टरों के मेस मैनेजर ? उनमें बंग बालायें भी तो थीं? वार्डन? या ये सब ? यह एक ऐसा रहस्य है, जो शुचि आज तक नहीं समझ पाई।

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पी एच डी क्या बला है!

पी एच डी क्या बला है यह पहली बार शुचि की समझ में तब आया था , जब मनीषा दी की थीसिस सबमिट हुई। उन्हॆं भी अंतत: काम करना उतना मुश्किल नहीं लगा था, जितने उसके बाद के चक्कर। पस्त हो गई थीं वे दोनों। पहले तो गाइड के आगे-पीछे घूमो , समय लो…. वह टरकायेगा … अभी नहीं हुआ , दो दिन बाद…. अगले सप्ताह…. एक महीना…..यह हिस्सा ठीक नही, फ़िर से लिखो…. पूरे चैप्टर पर काले- लाल निशान… जगह- जगह प्रश्न चिन्ह… यही तो हुआ था दिव्या दी के भी साथ। पूरे साल भर उनकी थीसिस के करेक्शन चले थे। फ़िर प्री पी एच डी सेमिनार, सेक्शन में – सप्ताह भर… छह चैप्टर पर छह सेमिनार और अंत में फ़ाइनल… जो पूरे विभाग के सामने दिया जाना था। लेकिन दिव्या दी प्रो. कुन्द्रा की छात्रा थी , उनके तो आसानी से निकलने ही थे। तारीफ़ होनी ही थी। उनकी थीसिस का काम भी उसके सर के साथ काम कर रहे लड़कों ने साथ रहकर करवा दिया लेकिन मनीषा के साथ हर पायदान पर शुचि साथ रही और इसलिये सारा कुछ जाना भी। क्या, कैसे होता है! ट्रन्सपरेन्सी बनाना वह दिव्या दी की हास्टल में सहायता करने के दौरान ही सीख चुकी थी। मनीषा ने वहाँ पर उसकी सहायता नहीं ली , किन्तु टाइपिस्ट के चक्कर दोनों ने साथ- साथ लगाये। एक दिन में कई- कई बार। प्रूफ़ रीडिंग की। ट्रेसिंग्स बनवाई। अब शुचि को पता है , अस्सी जाओ , कवर पेज की प्रिन्टिंग के लिये… ट्रेसिंगस सबसे अच्छी मेटलर्जी विभाग वाले झा साहब बनाते हैं। उनसे बनवा लो। टाइपिंग नरिया में हो जायेगी। पहले यह दूकान नहीं थी इसलिये मनीषा दी को संकटमोचन वाली गली जाना पड़ता था……लेकिन इस सबके बावजूद वह खूब थकी … और सेमिनार… वह तो शायद वह कभी न भूल पाये…
सबसे ज्यादा डर उसे प्रो. कुन्द्रा का था और जब उसने अपने सेमिनार वाले दिन उन्हें अनुपस्थित पाया तो उसे लगा कि अब सब आसानी से गुजर जायेगा। जान लिया कि शहर से बाहर गये हैं। लेकिन कहाँ , अगले दिन वे आ गये। अपनी रोनी सूरत यूँ ही सेक्शन में मजाक का विषय थी , अब ये सेमिनार रुलायेंगे….उसने तो यही सोचा था, लेकिन जाने कहाँ से उसके अन्दर यह साहस आया , इतना साहस आया कि वह प्रो. कुन्द्रा की आँखों में सीधी देखती, उनके सवालों के जवाब देती अपने सारे सेमिनार निकाल ले गई, वह आज भी नहीं समझ पाती। शायद ईमानदारी से किये गये काम, मेहनत का नतीजा था यह। ईमान दारी आत्मविश्वास भी देती है!

प्रो. रैणा इतने भी बुरे नहीं हैं। अब शुचि को अक्सर ऐसा लगता है, जब वह दूसरों से अपनी तुलना करती है। आई टी में काम कर रही श्रुति का गाइड उसकी थीसिस का करेक्शन ही नहीं करता। कहता है “तुम जब मेरे सामने बैठी रहती हो, तभी मैं काम कर पाता हूँ।”
श्रुति दुखी है। सारा काम कर चुकी लेकिन गाइड है कि… “जी में आता है शुचि दी उसका मुँह नोच लूँ। एक साल बीत गया, मेरी थीसिस का करेक्शन ही नहीं करता। ऊपर से कहता है , “तुम इतना डरती क्यों हो? कुछ नहीं करुँगा। शादीशुदा आदमी हूँ , बाल- बच्चे हैं , अपनी नौकरी थोड़े न गँवानी है। बस तुम मुझे अच्छी लगती हो । देखते रहना चाहता हूँ। जरा सा सामने बैठ जाओगी तो क्या बिगड़ जायेगा।”
शुचि अवाक रह गई थी तब। ऐसा भी होता है!

प्रो. रैणा ने तो बस उससे दुबारा-तिबारा चैप्टर लिखवाये और शुचि ने यह सोचकर लिखे कि प्रो. कुन्द्रा को झेलना है तो गलतियों के लिये कोई जगह नहीं छोड़नी है। एक -एक लाइन लिखने से पहले रेफ़रेन्स चेक किये कि ठीक तो है न। अपने प्रयोगों के परिणामॊं की व्याख्या कर सकेगी ठीक से या नहीं… लेकिन इतना ही तो न। कला संकाय के किस्से सुने थे , लड़कियों को गाइड के साथ घूमना होता है , पी एच डी की डिग्री चाहिये तो .. लेकिन श्रुति ! वह तो आई टी में है।
फ़िर से वह उसी निष्कर्ष पर पहुँचती है , शिक्षा और मनुष्यता दो अलग चीजें हैं । डिग्रियाँ जमा करने से हम शिक्षित कहलाने का गौरव पा लेते हैं किन्तु जरुरी नहीं कि अच्छे इंसान भी हो जायें। उसके लिये तो प्रकृति की पाठशाला में जाना पड़ता है , ठोकरें खानी पड़ती हैं और उन ठोकरों से सबक लेकर आगे बढ़ना होता है। शायद इसीलिये शुचि ने इतनी मुसीबतें झेलीं, ठोकरें खायीं, उसकी किस्मत में अच्छा इन्सान बनना भी लिखा है।
अपनी पी एच डी के बाद भी जब तक वह बी एच यू में रुकी, श्रुति को अपने गाइड से निपटने के दाँव- पेंच सिखाती रही- “क्या है, तुम तो हास्टलर नहीं हो? अपने भाई के साथ जाओ… उसके सामने बैठो …. या फ़िर भाई से कह दो , अचानक से टपक जाने की आदत बना ले… वह चौंका रहेगा….”

लेकिन शुचि के बी एच यू छोड़ने तक श्रुति के करेक्शन चलते ही रहे। उसके तब तक पाँच पेपर छप चुके थे .. लेकिन तब भी गाइड उससे विदा लेने को तैयार नहीं था। वह इतनी सुन्दर नहीं थी लेकिन.. लड़की तो थी … अपने गाइड की इकलौती ऐसी शोध छात्रा जो कोई भी समझौता करने से इन्कार करती थी।
स्त्री का अहं पुरुष के लिये तोड़ने की चीज है!