नाटक धरोहरः अंधा युग (भाग 1)-धर्मवीर भारती- जुलाई-अगस्त 16.

Mahabharat 7
पात्र- अश्वत्थामा, गान्धारी, धृतराष्ट्र, कृतवर्मा, संजय, वृद्ध याचक, प्रहरी 1, प्रहरी 2, व्यास, विदुर, युद्धिष्ठिर, कृपाचार्य, युयुत्सु, गूंगा भिखारी, बलराम, कृष्ण।
घटना काल- महाभारत के अट्ठारहवें दिन की संध्या से लेकर प्रभास-तीर्थ में कृष्ण की मृत्यु के क्षण तक का वर्णन।
[नेपथ्य से उद्घोषणा तथा मंच पर नर्त्तक के द्वारा उपयुक्त भावनाट्य का प्रदर्शन। शंख-ध्वनि के साथ पर्दा खुलता है तथा मंगलाचरण के साथ-साथ नर्त्तक नमस्कार-मुद्रा प्रदर्शित करता है। उद्घोषणा के साथ-साथ उसकी मुद्राएँ बदलती जाती हैं।]

मंगलाचरण- नारायणम् नमस्कृत्य नरम् चैव नरोत्तमम्।
देवीम् सरस्वतीम् व्यासम् ततो जयमुदीयरेत्।
उद्घोषणा- जिस युग का वर्णन इस कृति में है उसके विषय में विष्णु-पुराण में कहा है :
‘ ततश्चानुदिनमल्पाल्प ह्रास
व्यवच्छेददाद्धर्मार्थयोर्जगतस्संक्षयो भविष्यति।‘
उस भविष्य में
धर्म-अर्थ ह्रासोन्मुख होंगे
क्षय होगा धीरे-धीरे सारी धरती का।
‘ततश्चार्थ एवाभिजन हेतु।’
सत्ता होगी उनकी।
जिनकी पूँजी होगी।
‘कपटवेष धारणमेव महत्त्व हेतु।’
जिनके नकली चेहरे होंगे
केवल उन्हें महत्त्व मिलेगा। ‘एवम् चाति लुब्धक राजा
सहाश्शैलानामन्तरद्रोणीः प्रजा संश्रियष्यवन्ति।’
राजशक्तियाँ लोलुप होंगी,
जनता उनसे पीड़ित होकर गहन गुफाओं में छिप-छिप कर दिन काटेगी।
(गहन गुफाएँ वे सचमुच की या अपने कुण्ठित अंतर की)
[गुफाओं में छिपने की मुद्रा का प्रदर्शन करते-करते नर्त्तक नेपथ्य में चला जाता है।]
युद्धोपरान्त,
यह अन्धा युग अवतरित हुआ
जिसमें स्थितियाँ, मनोवृत्तियाँ, आत्माएँ सब विकृत हैं
है एक बहुत पतली डोरी मर्यादा की
पर वह भी उलझी है दोनों ही पक्षों में
सिर्फ कृष्ण में साहस है सुलझाने का
वह है भविष्य का रक्षक, वह है अनासक्त
पर शेष अधिकतर हैं अन्धे
पथभ्रष्ट, आत्महारा, विगलित
अपने अन्तर की अन्धगुफाओं के वासी
यह कथा उन्हीं अन्धों की है;
या कथा ज्योति की है अन्धों के माध्यम से
( पटाक्षेप)
—————————-
पहला अंक
कौरव नगरी

(तीन बार तूर्यनाद के उपरान्त कथा-गायन)

टुकड़े-टुकड़े हो बिखर चुकी मर्यादा
उसको दोनों ही पक्षों ने तोड़ा है
पाण्डव ने कुछ कम कौरव ने कुछ ज्यादा
यह रक्तपात अब कब समाप्त होना है
यह अजब युद्ध है नहीं किसी की भी जय
दोनों पक्षों को खोना ही खोना है
अन्धों से शोभित था युग का सिंहासन
दोनों ही पक्षों में विवेक ही हारा
दोनों ही पक्षों में जीता अन्धापन
भय का अन्धापन, ममता का अन्धापन
अधिकारों का अन्धापन जीत गया
जो कुछ सुन्दर था, शुभ था, कोमलतम था
वह हार गया….द्वापर युग बीत गया [पर्दा उठने लगता है]
यह महायुद्ध के अंतिम दिन की संध्या
है छाई चारों ओर उदासी गहरी
कौरव के महलों का सूना गलियारा
हैं घूम रहे केवल दो बूढ़े प्रहरी
[पर्दा उठाने पर स्टेज खाली है। दाईं और बाईं ओर बरछे और ढाल लिये दो प्रहरी हैं जो वार्तालाप करते हुए यन्त्र-परिचालित से स्टेज के आर-पार चलते हैं।]
प्रहरी 1. थके हुए हैं हम,
पर घूम-घूम पहरा देते हैं
इस सूने गलियारे में
प्रहरी 2. सूने गलियारे में जिसके इन रत्न-जटित फर्शों पर कौरव-वधुएँ
मंथर-मंथर गति से
सुरभित पवन-तरंगों-सी चलती थीं
आज वे विधवा हैं,
प्रहरी 1. थके हुए हैं हम,
इसलिए नहीं कि
कहीं युद्धों में हमने भी
बाहुबल दिखाया है
प्रहरी थे हम केवल
सत्रह दिनों के लोमहर्षक संग्राम में
भाले हमारे ये,
ढालें हमारी ये,
निरर्थक पड़ी रहीं
अंगों पर बोझ बनी
रक्षक थे हम केवल
लेकिन रक्षणीय कुछ भी नहीं था यहाँ
प्रहरी 2. रक्षणीय कुछ भी नहीं था यहाँ……….
संस्कृति थी यह एक बूढ़े और अन्धे की
जिसकी सन्तानों ने
महायुद्ध घोषित किये,
जिसके अन्धेपन में मर्यादा
गलित अंग वेश्या-सी
प्रजाजनों को भी रोगी बनाती फिरी
उस अन्धी संस्कृति,
उस रोगी मर्यादा की
रक्षा हम करते रहे
सत्रह दिन।
प्रहरी 1. जिसने अब हमको थका डाला है
मेहनत हमारी निरर्थक थी
आस्था का,
साहस का,
श्रम का,
अस्तित्व का हमारे
कुछ अर्थ नहीं था
कुछ भी अर्थ नहीं था
प्रहरी 2. अर्थ नहीं था
कुछ भी अर्थ नहीं था
जीवन के अर्थहीन
सूने गलियारे में
पहरा दे देकर
अब थके हुए हैं हम
अब चुके हुए हैं हम
[चुप होकर वे आर-पार घूमते हैं। सहसा स्टेज पर प्रकाश धीमा हो जाता है। नेपथ्य से आँधी की-सी ध्वनि आती है। एक प्रहरी कान लगाकर सुनता है, दूसरा भौंहों पर हाथ रख कर आकाश की ओर देखता है।]
प्रहरी 1. सुनते हो
कैसी है ध्वनि यह
भयावह ?
प्रहरी 2. सहसा अँधियारा क्यों होने लगा
देखो तो
दीख रहा है कुछ ?
प्रहरी 1. अन्धे राजा की प्रजा कहाँ तक देखे ? दीख नहीं पड़ता कुछ
हाँ, शायद बादल है
[दूसरा प्रहरी भी बगल में आकर देखता है और भयभीत हो उठता है]
प्रहरी-2. बादल नहीं है
वे गिद्ध हैं
लाखों-करोड़ों
पाँखें खोले
[पंखों की ध्वनि के साथ स्टेज पर और भी अँधेरा]
प्रहरी-1. लो सारी कौरव नगरी
का आसमान
गिद्धों ने घेर लिया
प्रहरी-2. झुक जाओ
झुक जाओ
ढालों के नीचे
छिप जाओ
नरभक्षी हैं
वे गिद्ध भूखे हैं।
[प्रकाश तेज होने लगता है]
प्रहरी-1. लो ये मुड़ गये
कुरुक्षेत्र की दिशा में
[आँधी की ध्वनि कम होने लगती है]
प्रहरी-2. मौत जैसे
ऊपर से निकल गयी
प्रहरी-1. अशकुन है
भयानक वह।
पता नहीं क्या होगा
कल तक
इस नगरी में
[विदुर का प्रवेश, बाईं ओर से]
प्रहरी-1. कौन है ?
विदुर. मैं हूँ
विदुर
देखा धृतराष्ट्र ने
देखा यह भयानक दृश्य ?
प्रहरी-1. देखेंगे कैसे वे ?
अन्धे हैं।
कुछ भी क्या देख सके
अब तक
वे ?
विदुर- मिलूँगा उनसे मैं
अशकुन भयानक है
पता नहीं संजय
क्या समाचार लाये आज ?
[प्रहरी जाते हैं, विदुर अपने स्थान पर चिन्तातुर खड़े रहते हैं। पीछे का पर्दा उठने लगता है।]
कथा गायन- है कुरुक्षेत्र से कुछ भी खबर न आयी
या हारा बचा-खुचा कौरव-दल
जाने किसकी लोथों पर जा उतरेगा
यह नरभक्षी गिद्धों का भूखा बादल
अन्तःपुर में मरघट की-सी खामोशी
कृश गान्धारी बैठी है शीश झुकाये
सिंहासन पर धृतराष्ट्र मौन बैठे हैं
संजय अब तक कुछ भी संवाद न लाये।
[पर्दा उठने पर अन्तःपुर। कुशासन बिछाये सादी चौकी पर गान्धारी, एक छोटे सिंहासन पर चिन्तातुर धृतराष्ट्र। विदुर उनकी ओर बढ़ते हैं।]
धृतराष्ट्र- कौन संजय?
विदुर- नहीं!
विदुर हूँ महाराज।
विह्वल है सारा नगर आज
बचे-खुचे जो भी दस-बीस लोग
कौरव नगरी में हैं
अपलक नेत्रों से
कर रहे प्रतीक्षा हैं संजय की।
(कुछ क्षण महाराज के उत्तर की प्रतीक्षा कर)
महाराज
चुप क्यों हैं इतने
आप
माता गान्धारी भी मौन हैं!
धृतराष्ट्र- विदुर!
जीवन में प्रथम बार
आज मुझे आशंका व्यापी है।
विदुर- आशंका?
आपको जो व्यापी है आज
वह वर्षों पहले हिला गई थी सबको
धृतराष्ट्र- पहले पर कभी भी तुमने यह नहीं कहा …
विदुर- भीष्म ने कहा था,
गुरु द्रोण ने कहा था,
इसी अन्त:पुर में
आकर कृष्ण ने कहा था –
‘मर्यादा मत तोड़ो
तोड़ी हुई मर्यादा
कुचले हुए अजगर-सी
गुंजलिका में कौरव-वंश को लपेट कर
सूखी लकड़ी-सा तोड़ डालेगी।’
धृतराष्ट्र- समझ नहीं सकते हो
विदुर तुम।
मैं था जन्मान्ध।
कैसे कर सकता था।
ग्रहण मैं
बाहरी यथार्थ या सामाजिक मर्यादा को?
विदुर- जैसे संसार को किया था ग्रहण
अपने अन्धेपन
के बावजूद
धृतराष्ट्र- पर वह संसार
स्वत: अपने अन्धेपन से उपजा था।
मैंने अपने ही वैयक्तिक सम्वेदन से जो जाना था
केवल उतना ही था मेरे लिए वस्तु-जगत्
इन्द्रजाल की माया-सृष्टि के समान
घने गहरे अँधियारे में
एक काले बिन्दु से
मेरे मन ने सारे भाव किए थे विकसित
मेरी सब वृत्तियाँ उसी से परिचालित थीं!
मेरा स्नेह, मेरी घृणा, मेरी नीति, मेरा धर्म
बिलकुल मेरा ही वैयक्तिक था।
उसमें नैतिकता का कोई बाह्य मापदंड था ही नहीं।
कौरव जो मेरी मांसलता से उपजे थे
वे ही थे अन्तिम सत्य
मेरी ममता ही वहाँ नीति थी,
मर्यादा थी।
विदुर- पहले ही दिन से किन्तु
आपका वह अन्तिम सत्य
– कौरवों का सैनिक-बल –
होने लगा था सिद्ध झूठा और शक्तिहीन
पिछले सत्रह दिन से
एक-एक कर
पूरे वंश के विनाश का
सम्वाद आप सुनते रहे।
धृतराष्ट्र- मेरे लिए वे सम्वाद सब निरर्थक थे।
मैं हूँ जन्मान्ध
केवल सुन ही तो सकता हूँ
संजय मुझे देते हैं केवल शब्द
उन शब्दों से जो आकार-चित्र बनते हैं
उनसे मैं अब तक अपरिचित हूँ
कल्पित कर सकता नहीं
कैसे दु:शासन की आहत छाती से
रक्त उबल रहा होगा,
कैसे क्रूर भीम ने अँजुली में
धार उसे
ओठ तर किए होंगे।

गान्धारी- (कानों पर हाथ रखकर)
महाराज।
मत दोहरायें वह
सह नहीं पाऊँगी।
(सब क्षण भर चुप)
धृतराष्ट्र- आज मुझे भान हुआ।
मेरी वैयक्तिक सीमाओं के बाहर भी
सत्य हुआ करता है
आज मुझे भान हुआ।
सहसा यह उगा कोई बाँध टूट गया है
कोटि-कोटि योजन तक दहाड़ता हुआ समुद्र
मेरे वैयक्तिक अनुमानित सीमित जग को
लहरों की विषय-जिह्वाओं से निगलता हुआ
मेरे अन्तर्मन में पैठ गया
सब कुछ बह गया
मेरे अपने वैयक्तिक मूल्य
मेरी निश्चिन्त किन्तु ज्ञानहीन आस्थाएँ।
विदुर- यह जो पीड़ा ने
पराजय ने
दिया है ज्ञान,
दृढ़ता ही देगा वह।
धृतराष्ट्र- किन्तु, इस ज्ञान ने
भय ही दिया है विदुर!
जीवन में प्रथम बार
आज मुझे आशंका व्यापी है।
विदुर- भय है तो
ज्ञान है अधूरा अभी।
प्रभु ने कहा था वह
‘ज्ञान जो समर्पित नहीं है
अधूरा है
मनोबुद्धि तुम अर्पित कर दो
मुझे।
भय से मुक्त होकर
तुम प्राप्त मुझे ही होगे
इसमें संदेह नहीं।’
गान्धारी- (आवेश से)
इसमें संदेह है
और किसी को मत हो
मुझको है।
‘अर्पित कर दो मुझको मनोबुद्धि’
उसने कहा है यह
जिसने पितामह के वाणों से
आहत हो अपनी सारी ही
मनोबुद्धि खो दी थी?
उसने कहा है यह,
जिसने मर्यादा को तोड़ा है बार-बार?
धृतराष्ट्र- शान्त रहो
शान्त रहो,
गान्धारी शान्त रहो।
दोष किसी को मत दो।
अन्धा था मैं…
गान्धारी- लेकिन अन्धी नहीं थी मैं।
मैंने यह बाहर का वस्तु-जगत् अच्छी तरह जाना था
धर्म, नीति, मर्यादा, यह सब हैं केवल आडम्बर मात्र,
मैंने यह बार-बार देखा था।
निर्णय के क्षण में विवेक और मर्यादा
व्यर्थ सिद्ध होते आए हैं सदा
हम सब के मन में कहीं एक अन्य गह्वर है।
बर्बर पशु अन्धा पशु वास वहीं करता है,
स्वामी जो हमारे विवेक का,
नैतिकता, मर्यादा, अनासक्ति, कृष्णार्पण
यह सब हैं अन्धी प्रवृत्तियों की पोशाकें
जिनमें कटे कपड़ों की आँखें सिली रहती हैं
मुझको इस झूठे आडम्बर से नफ़रत थी
इसालिए स्वेच्छा से मैंने इन आँखों पर पट्टी चढ़ा रक्खी थी।
विदुर- कटु हो गई हो तुम
गान्धारी!
पुत्रशोक ने तुमको अन्दर से
जर्जर कर डाला है!
तुम्हीं ने कहा था
दुर्योधन से …
गांधारी.- मैंने कहा था दुर्योधन से
धर्म जिधर होगा ओ मूर्ख!
उधर जय होगी!
धर्म किसी ओर नहीं था। लेकिन!
सब ही थे अन्धी प्रवृत्तियों से परिचालित
जिसको तुम कहते हो प्रभु
उसने जब चाहा
मर्यादा को अपने ही हित में बदल लिया।
वंचक है।
धृतराष्ट्र- शान्त रहो गान्धारी।
विदुर-यह कटु निराशा की
उद्धत अनास्था है।
क्षमा करो प्रभु!
यह कटु अनास्था भी अपने
चरणों में स्वीकार करो!
आस्था तुम लेते हो
लेगा अनास्था कौन?
क्षमा करो प्रभु!
पुत्र-शोक से जर्जर माता हैं गान्धारी।
गान्धारी- माता मत कहो मुझे
तुम जिसको कहते हो प्रभु
वह भी मुझे माता ही कहता है।
शब्द यह जलते हुए लोहे की सलाखों-सा
मेरी पसलियों में धँसता है।
सत्रह दिन के अन्दर
मेरे सब पुत्र एक-एक कर मारे गए
अपने इन हाथों से
मैंने उन फूलों-सी वधुओं की कलाइयों से
चूड़ियाँ उतारी हैं
अपने इस आँचल से
सेंदुर की रेखाएँ पोंछी हैं।
(नेपथ्य से) जय हो
दुर्योधन की जय हो।
गान्धारी की जय हो।
मंगल हो,
नरपति धृतराष्ट्र का मंगल हो।
धृतराष्ट्र- देखो।
विदुर देखो! संजय आये।
गान्धारी – जीत गया
मेरा पुत्र दुर्योधन
मैंने कहा था
वह जीतेगा निश्चय आज।
(प्रहरी का प्रवेश)
प्रहरी- याचक है महाराज!
(याचक का प्रवेश)
एक वृद्ध याचक है।
विदुर- याचक है?
उन्नत ललाट
श्वेतकेशी
आजानुबाहु?
याचक – मैं वह भविष्य हूँ
जो झूठा सिद्ध हुआ आज
कौरव की नगरी में
मैंने मापा था, नक्षत्रों की गति को
उतारा था अंकों में।
मानव-नियति के
अलिखित अक्षर जाँचे थे।
मैं था ज्योतिषी दूर देश का।
धृतराष्ट्र- याद मुझे आता है
तुमने कहा था कि द्वन्द्व अनिवार्य है
क्योंकि उससे ही जय होगी कौरव-दल की।
याचक- मैं हूँ वही
आज मेरा विज्ञान सब मिथ्या ही सिद्ध हुआ।
सहसा एक व्यक्ति
ऐसा आया जो सारे
नक्षत्रों की गति से भी ज़्यादा शक्तिशाली था।
उसने रणभूमि में
विषादग्रस्त अर्जुन से कहा –
‘मैं हूँ परात्पर।
जो कहता हूँ करो
सत्य जीतेगा
मुझसे लो सत्य, मत डरो।’
विदुर- प्रभु थे वे!
गान्धारी- कभी नहीं!
विदुर- उनकी गति में ही
समाहित है सारे इतिहासों की,
सारे नक्षत्रों की दैवी गति।
याचक- पता नहीं प्रभु हैं या नहीं
किन्तु, उस दिन यह सिद्ध हुआ
जब कोई भी मनुष्य
अनासक्त होकर चुनौती देता है इतिहास को,
उस दिन नक्षत्रों की दिशा बदल जाती है।
नियति नहीं है पूर्वनिर्धारित-
उसको हर क्षण मानव-निर्णय बनाता-मिटाता है।
गान्धारी- प्रहरी, इसको एक अंजुल मुद्राएँ दो।
तुमने कहा है-
‘जय होगी दुर्योधन की।’
याचक- मैं तो हूँ झूठा भविष्य मात्र
मेरे शब्दों का इस वर्तमान में
कोई मूल्य नहीं,
मेरे जैसे
जाने कितने झूठे भविष्य
ध्वस्त स्वप्न
गलित तत्व
बिखरे हैं कौरव की नगरी में
गली-गली।
माता हैं गान्धारी
ममता में पाल रहीं हैं सब को।
(प्रहरी मुद्राएँ लाकर देता है)
जय हो दुर्योधन की
जय हो गान्धारी की
(जाता है)
गान्धारी- होगी,
अवश्य होगी जय।
मेरी यह आशा
यदि अन्धी है तो हो
पर जीतेगा दुर्योधन जीतेगा।
(दूसरा प्रहरी आकर दीप जलाता है)
विदुर- डूब गया दिन …
धृतराष्ट्र- पर
संजय नहीं आए
लौट गए होंगे
सब योद्धा अब शिविर में
जीता कौन?
हारा कौन?
विदुर- महाराज!
संशय मत करें।
संजय जो समाचार लाएँगे शुभ होगा
माता अब जाकर विश्राम करें!
नगर-द्वार अपलक खुले ही हैं
संजय के रथ की प्रतीक्षा में
(एक ओर विदुर और दूसरी ओर धृतराष्ट्र तथा गांधारी जाते हैं; प्रहरी पुन: स्टेज के आरपार घूमने लगते हैं)
प्रहरी-१ -मर्यादा!
प्रहरी-२ -अनास्था!
प्रहरी-१ -पुत्रशोक!
प्रहरी-२- भविष्यत्!
प्रहरी-१ – ये सब
राजाओं के जीवन की शोभा हैं
प्रहरी 2- वे जिनको ये सब प्रभु कहते हैं।
इस सब को अपने ही जिम्मे ले लेते हैं।
प्रहरी 1- पर यह जो हम दोनों का जीवन
सूने गलियारे में बीत गया
प्रहरी 2- कौन इसे
अपने जिम्मे लेगा?
प्रहरी 1- हमने मर्यादा का अतिक्रमण नहीं किया,
क्योंकि नहीं थी अपनी कोई भी मर्यादा।
प्रहरी 2- हमको अनास्था ने कभी नहीं झकझोरा,
क्योंकि नहीं थी अपनी कोई भी गहन आस्था।
प्रहरी-१ – हमने नहीं झेला शोक
प्रहरी 2- जाना नहीं कोई दर्द
प्रहरी 1- सूने गलियारे-सा सूना यह जीवन भी बीत गया।
प्रहरी 2- क्योंकि हम दास थे
प्रहरी 1- केवल वहन करते थे आज्ञाएँ हम अन्धे राजा की
प्रहरी 2- नहीं था हमारा कोई अपना खुद का मत,
कोई अपना निर्णय
प्रहरी-१ – इसलिए सूने गलियारे में
निरूद्देश्य,
निरूद्देश्य,
चलते हम रहे सदा
दाएँ से बाएँ,
और बाएँ से दाएँ
प्रहरी-२ – मरने के बाद भी
यम के गलियारे में
चलते रहेंगे सदा
दाएँ से बाएँ
और बाएँ से दाएँ!
(चलते-चलते विंग में चले जाते हैं। स्टेज पर अँधेरा)
धीरे-धीरे पटाक्षेप के साथ
कथा गायन- आसन्न पराजय वाली इस नगरी में
सब नष्ट हुई पद्धतियाँ धीमे-धीमे
यह शाम पराजय की, भय की, संशय की
भर गए तिमिर से ये सूने गलियारे
जिनमें बूढ़ा झूठा भविष्य याचक-सा
है भटक रहा टुकड़े को हाथ पसारे
अन्दर केवल दो बुझती लपटें बाकी
राजा के अन्धे दर्शन की बारीकी
या अन्धी आशा माता गान्धारी की
वह संजय जिसको वह वरदान मिला है
वह अमर रहेगा और तटस्थ रहेगा
जो दिव्य दृष्टि से सब देखेगा समझेगा
जो अन्धे राजा से सब सत्य कहेगा।
जो मुक्त रहेगा ब्रम्हास्त्रों के भय से
जो मुक्त रहेगा, उलझन से, संशय से
वह संजय भी
इस मोह-निशा से घिर कर
है भटक रहा
जाने किस
कंटक-पथ पर।

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दूसरा अंक
पशु का उदय

कथा-गायन- संजय तटस्थद्रष्टा शब्दों का शिल्पी है
पर वह भी भटक गया असंजस के वन में
दायित्व गहन, भाषा अपूर्ण, श्रोता अन्धे
पर सत्य वही देगा उनको संकट-क्षण में
वह संजय भी
इस मोह-निशा से घिर कर
है भटक रहा
जाने किस कंटक-पथ पर
(पर्दा उठने पर वनपथ का दृश्य। कोई योद्धा बगल में अस्त्र रख कर वस्त्र से मुख ढाँप सोया है। संजय का प्रवेश)
संजय- भटक गया हूँ
मैं जाने किस कंटक-वन में
पता नहीं कितनी दूर हस्तिनापुर हैं,
कैसे पहुँचूँगा मैं?
जाकर कहूँगा क्या
इस लज्जाजनक पराजय के बाद भी
क्यों जीवित बचा हूँ मैं?
कैसे कहूँ मैं
कमी नहीं शब्दों की आज भी
मैंने ही उनको बताया है
युद्ध में घटा जो-जो,
लेकिन आज अन्तिम पराजय के अनुभव ने
जैसे प्रकृति ही बदल दी है सत्य की
आज कैसे वही शब्द
वाहक बनेंगे इस नूतन-अनुभूति के?
(सहसा जाग कर वह योद्धा पुकारता है – संजय)
किसने पुकारा मुझे?
प्रेतों की ध्वनि है यह
या मेरा भ्रम ही है?
कृतवर्मा- डरो मत
मैं हूँ कृतवर्मा!
जीवित हो संजय तुम?
पांडव योद्धाओं ने छोड़ दिया
जीवित तुम्हें?
संजय- जीवित हूँ।
आज जब कोसों तक फैली हुई धरती को
पाट दिया अर्जुन ने
भूलुँठित कौरव-कबन्धों से,
शेष नहीं रहा एक भी
जीवित कौरव-वीर
सात्यकि ने मेरे भी वध को उठाया अस्त्र;
अच्छा था
मैं भी
यदि आज नहीं बचता शेष,
किन्तु कहा व्यास ने ‘मरेगा नहीं
संजय अवध्य है’
कैसा यह शाप मुझे व्यास ने दिया है
अनजाने में हर संकट, युद्ध, महानाश, प्रलय, विप्लव के बावजूद
शेष बचोगे तुम संजय
सत्य कहने को
अन्धों से
किन्तु कैसे कहूँगा हाय
सात्यकि के उठे हुए अस्त्र के
चमकदार ठंडे लोहे के स्पर्श में
मृत्यु को इतने निकट पाना
मेरे लिए यह
बिल्कुल ही नया अनुभव था।
जैसे तेज वाण किसी
कोमल मृणाल को
ऊपर से नीचे तक चीर जाए
चरम त्रास के उस बेहद गहरे क्षण में
कोई मेरी सारी अनुभूतियों को चीर गया
कैसे दे पाऊँगा मैं सम्पूर्ण सत्य
उन्हें विकृत अनुभूति से?
कृतवर्मा – धैर्य धरो संजय!
क्योंकि तुमको ही जाकर बतानी है
दोनों को पराजय दुर्योधन की!
संजय – कैसे बताऊँगा!
वह जो सम्राटों का अधिपति था
खाली हाथ
नंगे पाँव रक्त-सने
फटे हुए वस्त्रों में
टूटे रथ के समीप
खड़ा था निहत्था हो;
अश्रु-भरे नेत्रों से
उसने मुझे देखा
और माथा झुका लिया
कैसे कहूँगा
मैं जाकर उन दोनों से
कैसे कहूँगा?
(जाता है)
कृतवर्मा- चला गया संजय भी
बहुत दिनों पहले
विदुर ने कहा था
यह होकर रहेगा,
वह होकर रहा आज
(नेपथ्य में कोई पुकारता है, “अश्वत्थामा।” कृतवर्मा ध्यान से सुनता है)
यह तो आवाज़ है
बूढ़े कृपाचार्य की।
(नेपथ्य में पुन: पुकार ‘अश्वत्थामा।’ कृतवर्मा पुकारता है – कृपाचार्य कृपाचार्य’ कृपाचार्य का प्रवेश)
यह तो कृतवर्मा है।
तुम भी जीवित हो कृतवर्मा?
कृतवर्मा- जीवित हूँ क्या अश्वत्थामा भी जीवित है? कृपाचार्य- जीवित है
केवल हम तीन
आज!
रथ से उतर कर
जब राजा दुर्योधन ने
नतमस्तक होकर
पराजय स्वीकार की
अश्वत्थामा ने
यह देखा
और उसी समय
उसने मरोड़ दिया
अपना धनुष
आर्तनाद करता हुआ
वन की ओर चला गया
अश्वत्थामा
(पुकारते हुए जाते हैं, दूर से उनकी पुकार सुन पड़ती है। पीछे का पर्दा खुल कर अन्दर का दृष्य। अँधेरा – केवल एक प्रकाश-वृत्त अश्वत्थामा पर, जो टूटा धनुष हाथ में लिए बैठा है।) अश्वत्थामा – यह मेरा धनुष है
धनुष अश्वत्थामा का
जिसकी प्रत्यंचा खुद द्रोण ने चढ़ाई थी
आज जब मैंने
दुर्योधन को देखा
नि:शस्त्र, दीन
आँखों में आँसू भरे
मैंने मरोड़ दिया
अपने इस धनुष को।
कुचले हुए साँप-सा
भयावह किन्तु
शक्तिहीन मेरा धनुष है यह
जैसा है मेरा मन
किसके बल पर लूँगा
मैं अब
प्रतिशोध
पिता की निर्मम हत्या का
वन में
भयानक इस वन में भी
भूल नहीं पाता हूँ मैं
कैसे सुनकर
युधिष्ठिर की घोषणा
कि ‘अश्वत्थामा मारा गया’ शस्त्र रख दिए थे
गुरु द्रोण ने रणभूमि में
उनको थी अटल आस्था
युधिष्ठिर की वाणी में
पाकर निहत्था उन्हें
पापी दृष्टद्युम्न ने
अस्त्रों से खंड-खंड कर डाला
भूल नहीं पाता हूँ
मेरे पिता थे अपराजेय
अर्द्धसत्य से ही
युधिष्ठिर ने उनका
वध कर डाला।
उस दिन से
मेरे अन्दर भी
जो शुभ था, कोमलतम था
उसकी भ्रूण-हत्या
युधिष्ठिर के
अर्धसत्य ने कर दी
धर्मराज होकर वे बोले
‘नर या कुंजर’
मानव को पशु से
उन्होंने पृथक् नहीं किया
उस दिन से मैं हूँ
पशुमात्र, अन्ध बर्बर पशु
किन्तु आज मैं भी एक अन्धी गुफ़ा में हूँ भटक गया
गुफ़ा यह पराजय की!
दुर्योधन सुनो!
सुनो, द्रोण सुनो!
मैं यह तुम्हारा अश्वत्थामा
कायर अश्वत्थामा
शेष हूँ अभी तक
जैसे रोगी मुर्दे के
मुख में शेष रहता है
गन्दा कफ
बासी थूक
शेष हूँ अभी तक मैं
(वक्ष पीटता है)
आत्मघात कर लूँ?
इस नपुंसक अस्तित्व से
छुटकारा पाकर
यदि मुझे
पिछली नरकाग्नि में उबलना पड़े
तो भी शायद
इतनी यातना नहीं होगी!
(नेपथ्य में पुकार अश्वत्थामा… )
किन्तु नहीं!
जीवित रहूँगा मैं
अन्धे बर्बर पशु-सा
वाणी हो सत्य धर्मराज की।
मेरी इस पसली के नीचे
दो पंजे उग आयें मेरी ये पुतलियाँ
बिन दाँतों के चोथ खायें
पायें जिसे।
वध, केवल वध, केवल वध
अंतिम अर्थ बने
मेरे अस्तित्व का।
(किसी के आने की आहट)
आता है कोई
शायद पांडव-योद्धा है
आ हा!
अकेला, निहत्था है।
पीछे से छिपकर
इस पर करूँगा वार
इन भूखे हाथों से
धनुष मरोड़ा है
गर्दन मरोडूँगा
छिप जाऊँ, इस झाड़ी के पीछे।
(छिपता है। संजय का प्रवेश)
संजय- फिर भी रहूँगा शेष
फिर भी रहूँगा शेष
फिर भी रहूँगा शेष
सत्य कितना कटु हो
कटु से यदि कटुतर हो
कटुतर से कटुतम हो फिर भी कहूँगा मैं
केवल सत्य, केवल सत्य, केवल सत्य
है अन्तिम अर्थ
मेरे आह!
(अश्वत्थामा आक्रमण करता है। गला दबोच लेता है) अश्वत्थामा – इसी तरह
इसी तरह
मेरे भूखे पंजे जाकर दबोचेंगे
वह गला युधिष्ठिर का
जिससे निकला था
‘अश्वत्थामा हतो हत:’
(कृतवर्मा और कृपाचार्य प्रवेश करते हैं)
कृतवर्मा – (चीखकर)
छोड़ो अश्वत्थामा!
संजय है वह
कोई पांडव नहीं है।
अश्वत्थामा – केवल, केवल वध, केवल
कृपाचार्य – कृतवर्मा, पीछे से पकड़ो
कस लो अश्वत्थामा को।
वध – लेकिन शत्रु का –
कैसे योद्धा हो अश्वत्थामा?
संजय अवध्य है
तटस्थ है।
अश्वत्थामा – (कृतवर्मा के बन्धन में छटपटाता हुआ)
तटस्थ? मातुल मैं योद्धा नहीं हूँ
बर्बर पशु हूँ
यह तटस्थ शब्द
है मेरे लिए अर्थहीन।
सुन लो यह घोषणा
इस अन्धे बर्बर पशु की
पक्ष में नहीं है जो मेरे
वह शत्रु है।
कृतवर्मा – पागल हो तुम
संजय, जाओ अपने पथ पर
संजय – मत छोड़ो
विनती करता हूँ
मत छोड़ो मुझे
कर दो वध
जाकर अन्धों से
सत्य कहने की
मर्मान्तक पीड़ा है जो
उससे तो वध ज़्यादा सुखमय है
वध करके
मुक्त मुझे कर दो
अश्वत्थामा!
(अश्वत्थामा विवश दृष्टि से कृपाचार्य की ओर देखता है, उनके कन्धों से शीश टिका देता है)
अश्वत्थामा – मैं क्या करूँ?
मातुल;
मैं क्या करूँ?
वध मेरे लिए नहीं रही नीति
वह है अब मेरे लिए मनोग्रंथि
किसको पा जाऊँ
मरोडूँ मैं!
मैं क्या करूँ?
मातुल, मैं क्या करूँ?
कृपाचार्य – मत हो निराश
अभी…
कृतवर्मा – करना बहुत कुछ है
जीवित अभी भी है दुर्योधन
चल कर सब खोजें उन्हें।
कृपाचार्य – संजय
तुम्हें ज्ञात है
कहाँ है वे?
संजय – (धीमे से)
वे हैं सरोवर में
माया से बाँध कर
सरोवर का जल
वे निश्चल
अन्दर बैठे हैं
ज्ञात नहीं है
यह पांडव-दल को।
कृपाचार्य – स्वस्थ हो अश्वत्थामा
चल कर आदेश लो दुर्योधन से
संजय, चलो
तुम सरोवर तक पहुँचा दो
कृतवर्मा – कौन आ रहा है वह
वृद्ध व्यक्ति?
कृपाचार्य – निकल चलो
इसके पहले कि हमको
कोई भी देख पाए
अश्वत्थामा – (जाते-जाते) मैं क्या करूँ मातुल
मैंने तो अपना धनुष भी मरोड़ दिया।
(वे जाते हैं। कुछ क्षण स्टेज खाली रहता है। फिर धीरे-धीरे वृद्ध याचक प्रवेश करता है)
वृद्ध याचक – दूर चला आया हूँ
काफी
हस्तिनापुर से,
वृद्ध हूँ, दीख नहीं पड़ता है
निश्चय ही अभी यहाँ देखा था मैंने कुछ लोगों को
देखूँ मुझको जो मुद्राएँ दीं
माता गान्धारी ने
वे तो सुरक्षित हैं।
मैंने यह कहा था
‘यह है अनिवार्य
और वह है अनिवार्य
और यह तो स्वयम् होगा’ –
आज इस पराजय की बेला में
सिद्ध हुआ
झूठी थी सारी अनिवार्यता भविष्य की।
केवल कर्म सत्य है
मानव जो करता है, इसी समय
उसी में निहित है भविष्य
युग-युग तक का!
(हाँफता है)
इसलिए उसने कहा
अर्जुन
उठाओ शस्त्र
विगतज्वर युद्ध करो
निष्क्रियता नहीं
आचरण में ही
मानव-अस्तित्व की सार्थकता है।
(नीचे झुक कर धनुष देखता है। उठाकर)
किसने यह छोड़ दिया धनुष यहाँ?
क्या फिर किसी अर्जुन के
मन में विषाद हुआ?
अश्वत्थामा – (प्रवेश करते हुए)
मेरा धनुष है
यह।
वृद्ध याचक – कौन आ रहा है यह?
जय अश्वत्थामा की!
अश्वत्थामा – जय मत कहो वृद्ध!
जैसे तुम्हारी भविष्यत् विद्या
सारी व्यर्थ हुई
उसी तरह मेरा धनुष भी व्यर्थ सिद्ध हुआ।
मैंने अभी देखा दुर्योधन को
जिसके मस्तक पर
मणिजटित राजाओं की छाया थी
आज उसी मस्तक पर
गँदले पानी की
एक चादर है।
तुमने कहा था –
जय होगी दुर्योधन की
वृद्ध याचक – जय हो दुर्योधन की –
अब भी मैं कहता हूँ
वृद्ध हूँ
थका हूँ
पर जाकर कहूँगा मैं
‘नहीं है पराजय यह दुर्योधन की
इसको तुम मानो नये सत्य की उदय-वेला।’
मैंने बतलाया था
उसको झूठा भविष्य
अब जा कर उसको बतलाऊँगा
वर्तमान से स्वतन्त्र कोई भविष्य नहीं
अब भी समय है दुर्योधन,
समय अब भी है!
हर क्षण इतिहास बदलने का क्षण होता है।
(धीरे-धीरे जाने लगता है।)
अश्वत्थामा –
मैं क्या करूँगा
हाय मैं क्या करूँगा?
वर्तमान में जिसके
मैं हूँ और मेरी प्रतिहिंसा है!
एक अर्द्धसत्य ने युधिष्ठिर के
मेरे भविष्य की हत्या कर डाली है।
किन्तु, नहीं,
जीवित रहूँगा मैं
पहले ही मेरे पक्ष में
नहीं है निर्धारित भविष्य अगर’
तो वह तटस्थ है!
शत्रु है अगर वह तटस्थ है!
(वृद्ध की ओर बढ़ने लगता है।)
आज नहीं बच पाएगा
वह इन भूखे पंजों से
ठहरो! ठहरो!
ओ झूठे भविष्य वंचक वृद्ध!
(दाँत पीसते हुए दौड़ता है। विंग के निकट वृद्ध को दबोच कर नेपथ्य में घसीट ले जाता है।)
वध, केवल वध, केवल वध
मेरा धर्म है।
(नेपथ्य में गला घोंटने की आवाज, अश्वत्थामा का अट्टाहास। स्टेज पर केवल दो प्रकाश-वृत्त नृत्य करते हैं। कृपाचार्य, कृतवर्मा हाँफते हुए अश्वत्थामा को पकड़ कर स्टेज पर ले जाते हैं।)
कृपाचार्य – यह क्या किया,
अश्वत्थामा।
यह क्या किया?
अश्वत्थामा – पता नहीं मैंने क्या किया,
मातुल मैंने क्या किया!
क्या मैंने कुछ किया?
कृतवर्मा – कृपाचार्य
भय लगता है
मुझको
इस अश्वत्थामा से!
(कृपाचार्य अश्वत्थामा को बिठाकर, उसका कमरबन्द ढीला करते हैं। माथे का पसीना पोंछते हैं।)
कृपाचार्य – बैठो
विश्राम करो
तुमने कुछ नहीं किया
केवल भयानक स्वप्न देखा है!
अश्वत्थामा – मैं क्या करूँ
मातुल!
वध मेरे लिए नहीं नीति है,
वह है अब मनोग्रन्थि!
इस वध के बाद
मांसपेशियों का सब तनाव
कहते क्या इसी को हैं
अनासक्ति?’
कृपाचार्य – (अश्वत्थामा को लिटा कर)
सो जाओ!
कहा है दुर्योधन ने
जाकर विश्राम करो
कल देखेंगे हम
पांडवगण क्या करते हैं –
करवट बदल कर
तुम सो जाओ
(कृतवर्मा से)
सो गया।
कृतवर्मा – (व्यंग्य से)
सो गया।
इसलिए शेष बचे हैं हम
इस युद्ध में
हम जो योद्धा थे
अब लुक-छिप कर
बूढ़े निहत्थों का
करेंगे वध।
कृपाचार्य – शान्त रहो कृतवर्मा
योद्धा नामधारियों में
किसने क्या नहीं
किया है
अब तक?
द्रोण थे बूढ़े निहत्थे
पर
छोड़ दिया था क्या
उनको धृष्टद्युम्न ने?
या हमने छोड़ा अभिमन्यु को
यद्यपि वह बिलकुल निहत्था था
अकेला था
सात महारथियों ने…
अश्वत्थामा – मैंने नहीं मारा उसे
मैं तो चाहता था वध करना भविष्य का
पता नहीं कैसे वह
बूढ़ा मरा पाया गया।
मैंने नहीं मारा उसे
मातुल विश्वास करो।
कृपाचार्य – सो जाओ
सो जाओ कृतवर्मा!
पहरा मैं देता रहूँगा आज रात भर।
(वे लौटते हैं। पर्दा गिरने लगता है।)
जिस तरह बाढ़ के बाद उतरती गंगा
तट पर तज आती विकृति, शव अधखाया
वैसे ही तट पर तज अश्वत्थामा को
इतिहासों ने खुद नया मोड़ अपनाया
वह छटी हुई आत्माओं की रात
यह भटकी हुई आत्माओं की रात
यह टूटी हुई आत्माओं की रात
इस रात विजय में मदोन्मत्त पांडवगण
इस रात विवश छिपकर बैठा दुर्योधन
यह रात गर्व में
तने हुए माथों की
यह रात हाथ पर
धरे हुए हाथों की
( पटाक्षेप)

——————————————–

तीसरा अंक
अश्वत्थामा का अर्द्धसत्य

कथा गायन- संजय का रथ जब नगर द्वार पहुँचा
तब रात ठल रही थी।
हारी कौरव सेना कब लौटेगी
यह बात चल रही थी
संजय से सुनते-सुनते युद्ध-कथा
हो गयी सुबह; पाकर यह गहन व्यथा
गान्धारी पत्थर थी; उस श्रीहत मुख पर
जीवित मानव-सा कोई चिन्ह न था।
दुपहर होतो-होते हिल उठा नगर
खंडित रथ छकड़ों पर लदकर
थे लौट रहे ब्राह्मण, स्त्रियाँ चिकित्सक,
विधवाएँ, बौने, बूढ़े, घायल, जर्जर।
जो सेना रंग बिरंगी ध्वजा उड़ाते
रौंदते हुए धरती को, गगन कँपाते
थी गई युद्ध को अट्ठारह दिन पहले
उसका यह रूप हो गया आते-आते।
( पर्दा उठता है। प्रहरी खड़े हैं। विदुर का सहारा लेकर धृतराष्ट्र प्रवेश करते हैं।)
धृतराष्ट्र- देख नहीं सकता हूँ
पर मैंने छू-छूकर
अंग-भंग सैनिकों को
देखने की कोशिश की
बाँह के पास से
हाथ जब कट जाता है।
लगता है जैसे मेरे सिंहासन का
हत्था है।
विदुर- महाराज
यह सब सोच रहे हैं
आप?
धृतराष्ट्र-कोई खास बात नहीं
सिर्फ मैं संजय के शब्दों से
सुनता आया था जिसे
आज उसी युद्ध को हाथों से छू-छूकर
अनुभव करने का अवसर पाया है।
( इसी बीच एक पंगु-गूंगा सैनिक घिसटता हुआ आता है। विदुर के पाँव पकड़कर उन्हें अपनी ओर आकर्षित करता है। चुल्लू से संकेत कर पानी मांगता है।)
विदुर- (चौंककर)
क्या है ? ओह।
प्रहरी थोड़ा जल लाओ।
धृतराष्ट्र- कौन है विदुर?
विदुर- एक प्यासा सैनिक है महाराज!
( सैनिक गूंगी जिह्वा से जाने क्या-क्या कहता है।)
धृतराष्ट्र- क्या कह रहा है यह?
विदुर- ‘कहता है जय हो धृतराष्ट्र की?’
जिह्वा कटी है महाराज।
गूंगा है।
धृतराष्ट्र- गूंगों के सिवा आज
और कौन बोलेगा मेरी जय
( प्रहरी लाकर जल देता है। गूंगा हाँफने लगता है।)
प्रहरी 1- (मस्तक छूकर)
ज्वर है इसे तो
धृतराष्ट्र—पिला दिया जल इसको!
विदुर- ( आते हैं।)
ढूँढ रहा हूँ।
कब से तुमको युयुत्सु
वत्स!
अच्छा किया तुम जो वापस चले आय़े।
प्रहरी जाओ, जाकर
माता गान्धारी को सूचित करो
पुत्र-शोक से पीड़ित माता
तुम्हें पाकर शायद
दुःख भूल जाये!
युयुत्सु- पता नहीं
मेरा मुख भी देखेंगी
या नहीं
विदुर- ऐसा मत कहो।
कौरव पुत्रों की इस कलुषित कथा में
एक तुम हो केवल
जिसका माथा गर्वोन्नत है।
युयुत्सु- ( कटुता से हँसकर)
इसीलिए देखकर मुझे आता
बन्द कर लिये
पट नागरिकों ने
सबने कहा
वह है मायावी
शिशुभक्षी
दैत्याकार
गृद्धवत्।
विदुर- इस पर विषाद मत करो युयुत्सु
अज्ञानी, भय डूबे, साधारण लोगों से
यह तो मिलता ही है सदा उन्हे
जो कि एक निश्चित परिपाटी से
होकर पृथक्
अपना पथ अपने आप
निर्धारित करते हैं।
( प्रहरी के साथ गान्धारी का प्रवेश)
प्रहरी-2- माता गान्धारी
पधारी हैं।
( युयुत्सु चरण छूता है। गान्धारी निश्चल खड़ी रहती है।)
विदुर- माता !
ये हैं युयुत्सु
चरण छू रहे हैं
इनको आशीष दो।
गान्धारी- ( क्षणभर चुप रहकर उपेक्षा से)
पूछो विदुर इससे
कुशल से है?
( युयुत्सु और विदुर चुप रहते हैं।)
बेटा,
भुजाएँ ये तुम्हारी
पराक्रम भरी
थकी तो नहीं
अपने बन्धुजनों का वध करते-करते?
( चुप)
पाण्डव के शिविरों के वैभव के बाद
तुम्हें अपना नगर तो
श्रीहत-सा लगता होगा?
( चुप)
चुप क्यों हो?
थका हुआ होगा यह
विदुर इसे फूलों की शय्या दो
कोई पराजित दुर्योधन नहीं है वह
सोये जो जाकर
सरोवर की
कीचड़ में।

कह दो विश्राम करे इधर कहीं
( गूंगा पीछे जाकर आँख मूंदकर पड़ रहता है)
वस्त्र इसे दो लाकर
माता गान्धारी से।
प्रहरी- माता गान्धारी आज दान गृह में
हैं ही नहीं।
विदुर- उनकी आँखों में
आँसू भी नहीं है
न शोक है
न क्रोध है
जड़वत् पत्थर-सी वे बैठी हैं
सीढ़ी पर।
( नेपथ्य में शोरगुल)
धृतराष्ट्र- प्रहरी जाकर देखो
कैसा है शोर वह।
( प्रहरी जाता है)
विदुर- महाराज।
आप जायें
जाकर आश्वासन दें माता गान्धारी को।
धृतराष्ट्र- जाता हूँ
संजय भी नहीं है वहाँ
पता नहीं भीम और दुर्योधन के अंतिम द्वन्द्वयुद्ध का वह क्या समाचार लाये आज।
( शोर बढ़ता है।)
विदुर- महाराज, आप जायें।
(धृतराष्ट्र दूसरे प्रहरी के साथ जाते हैं।)
कैसा है शोर यह ?
( प्रहरी लौटता है।)
प्रहरी-फैल गया है
पूरे नगर में
अचानक
आतंक
त्रास।
विदुर- क्यों?
प्रहरी 1- अपनी हारी घायल सेना
के साथ साथ
कोई विपक्षी योद्धा भी
चला आया है
नगरी में
अस्त्रों से सज्जित है
दैत्याकार
योद्धा
वह
जनता कहती है वह नगरी को लूटेगा ?
( दूसरा प्रहरी लौट आता है)
विदुर- छिः
यह सब मिथ्या है!
मैं खुद जाकर
उसको देखूँगा
रक्षा करो तुम
राजकाज की
( जाते हैं।)
प्रहरी 2- क्या तुमने
देखा था अपनी आँखों से
उस योद्धा को ?
प्रहरी 1- मायावी है वह
रूप धारण करता है नित नए-नए
बन्द कर दिया
जब रक्षकगण ने नगर-द्वार,
धारण कर रूप
एक गृद्ध का
उड़ कर चला आया,
और लगा खाने
छत पर सोए बच्चों को
बन्द नगर-द्वारों के
ऊपर से
फ्रहरी 2- बन्द करो
जल्द से द्वार पश्चिम के !
प्रहरी 1- ( भय से) वह देखो।
प्रहरी 2- ( भय से) क्या है।
प्रहरी 1-वह आया।
प्रहरी 2- छिपो, उधर
छिपो
( दोनों पीछे छिपते हैं। एक साधारण योद्धा का प्रवेश)

युयुत्सु- डरने में
उतनी यातना नहीं है
जितनी वह होने में जिससे
सबके सब केवल भय खाते हों।
वैसा ही मैं हूँ आज
ये हैं महल
मेरे पिता, मेरी माता के
लेकिन कौन जाने
यहाँ स्वागत हो
मेरा
एक जहर बुझे भाले से।
प्रहरी 1- ये तो युयुत्सु हैं
पुत्र धृतराष्ट्र के,
युद्ध में लड़े जो
युधिष्ठिर के पक्ष में।
युयुत्सु- मेरा अपराध सिर्फ इतना है
सत्य पर रहा मैं दृढ़
द्रोण भीम
सबके सब महारथी
नहीं जा सके
दुर्योधन के विरुद्ध
फिर भी मैंने कहा
पक्ष मैं असत्य का नहीं लूँगा।
मैं भी हूँ कौरव
पर सत्य बड़ा है कौरव वंश से
प्रहरी 2- निश्चय युयुत्सु हैं !
लगता है लौटे हैं !
घायल सेना के साथ !
युयुत्सु- मैं भी
सह लेता यदि
सब उच्छृंखलता दुर्योधन की
आज मुझे इतनी घृणा तो
न मिलती
अपने ही परिवार में।
माता खड़ी होती
बाँहें फैलाये
चाहे पराजित ही मेरा माथा होता।
विदुर- ( आते हैं।)
ढूँढ रहा हूँ।
कब से तुमको युयुत्सु
वत्स!
अच्छा किया तुम जो वापस चले आय़े।
प्रहरी जाओ, जाकर
माता गान्धारी को सूचित करो
पुत्र-शोक से पीड़ित माता
तुम्हें पाकर शायद
दुःख भूल जाये!
युयुत्सु- पता नहीं
मेरा मुख भी देखेंगी
या नहीं
विदुर- ऐसा मत कहो।
कौरव पुत्रों की इस कलुषित कथा में
एक तुम हो केवल
जिसका माथा गर्वोन्नत है।
युयुत्सु- ( कटुता से हँसकर)
इसीलिए देखकर मुझे आता
बन्द कर लिये
पट नागरिकों ने
सबने कहा
वह है मायावी
शिशुभक्षी
दैत्याकार
गृद्धवत्।
विदुर- इस पर विषाद मत करो युयुत्सु
अज्ञानी, भय डूबे, साधारण लोगों से
यह तो मिलता ही है सदा उन्हे
जो कि एक निश्चित परिपाटी से
होकर पृथक्
अपना पथ अपने आप
निर्धारित करते हैं।
( प्रहरी के साथ गान्धारी का प्रवेश)
प्रहरी-2- माता गान्धारी
पधारी हैं।
( युयुत्सु चरण छूता है। गान्धारी निश्चल खड़ी रहती है।)
विदुर- माता !
ये हैं युयुत्सु
चरण छू रहे हैं
इनको आशीष दो।
गान्धारी- ( क्षणभर चुप रहकर उपेक्षा से)
पूछो विदुर इससे
कुशल से है?
( युयुत्सु और विदुर चुप रहते हैं।)
बेटा,
भुजाएँ ये तुम्हारी
पराक्रम भरी
थकी तो नहीं
अपने बन्धुजनों का वध करते-करते?
( चुप)
पाण्डव के शिविरों के वैभव के बाद
तुम्हें अपना नगर तो
श्रीहत-सा लगता होगा?
( चुप)
चुप क्यों हो?
थका हुआ होगा यह
विदुर इसे फूलों की शय्या दो
कोई पराजित दुर्योधन नहीं है वह
सोये जो जाकर
सरोवर की
कीचड़ में।
(चुप)
चुप क्यों है विदुर यह?
क्या मैं माता हूँ
इसके शत्रुओं की
इसीलिए
( जाने लगती है)
प्रहरी चलो
विदुर- माता! यह शोभा नहीं देता तुम्हें
माता !
( रुकती नहीं, चली जाती है।)
युयुत्सु- यह क्या किया?
माँ ने यह क्या किया
विदुर?
( सिर झुका कर बैठ जाता है।)
अच्छा था यदि मैं
कर लेता समझौता असत्य से।
विदुर- लेकिन
वह कोई समाधान तो नहीं था
समस्या का!
कर लेते यदि तुम
समझौता असत्य से
तो अन्दर से जर्जर हो जाते।
युयुत्सु- अब यह माँ की कटुता
घृणा प्रजाओं की
क्या मुझको अंदर से बल देगी?
अंतिम परिणति में
दोनों जर्जर करते हैं
पक्ष चाहे सत्य का हो
अथवा असत्य का !
मुझको क्या मिला विदुर,
मुझको क्या मिला ?
विदुर- शांत हो युयुत्सु
और सहन करो,
गहरी पीड़ाओं को गहरे में वहन करो
( कुछ देर पूर्व से गूँगे के हाँफने की आवाज आ रही है जो सहसा तेज हो जाती है।)
प्रहरी 1- कैसी आवाज है प्रहरी यह
वह गूंगा सैनिक
है शायद दम तोड़ रहा।
( प्रहरी 2 जल लाता है)
विदुर- यह लो युयुत्सु
उसे जल दो
और स्नेह दो
मरतों को जीवन दो
झेलो कटुताओं को।
युयुत्सु-( गूँगे के पास जाकर)
गोद में रक्खो सर
मुँह खोलो
ऐसे, हाँ,
खोलो आँखें
( गूँगा आँख खोलता है, पानी मुँह से लगाता है। सहसा वह चीख उठता है। गिरता पड़ता हुआ, घिसटता हुआ भागता है।)
प्रहरी 2- यह क्या हुआ?
युयुत्सु- मैं ही अपराधी हूँ
यह एक अश्वारोही कौरव सेना का
मेरे अग्निबाणों से
झुलस गये थे घुटने इसके
नष्ट किया है खुद मैने
जिसका जीवन
वह कैसे अब
मेरी ही करुणा स्वीकार करे
मेरी यह परिणति है
स्नेह भी अगर मैं दूँ
तो वह स्वीकार नहीं औरों को
व्यास ने कहा
मुझसे
कृष्ण जिधर होंगे
जय भी उधर होगी
जय है यह कृष्ण की
जिसमें मैं वधिक हूँ
मातृवंचित हूँ
सब की घृणा का पात्र हूँ.
विदुर- आज इस पराजय की सेवा में
पता नहीं
जाने क्या झूठा पड़ गया कहीं
सब के सब कैसे
उतर आये हैं अपनी धुरी से आज
एक-एक कर सारे पहिये
हैं उतर गये जिससे
वह बिलकुल निकम्मी धुरी
तुम हो
क्या तुम हो प्रभु?
( सहसा अन्तःपुर में भयानक आर्तनाद)
युयुत्सु- यह क्या हुआ विदुर?
विदुर- प्रहरी जरा देखो तुम!
( प्रहरी 1 जाकर तुरंत लौटता है)
प्रहरी 1- संजय यह समाचार लाये हैं
विदुर ( आकुलता से) क्या?
युयुत्से-
प्रहरी 1- द्वन्द्वयुद्ध में…
राजा
दुर्योधन…
…पराजित हुए।
( विदुर और युयुत्सु झपट कर जाते हैं। आर्तनाद बढ़ता है। पीछे से कोई घोषणा करता है ‘ राजा दुर्योधन पराजित हुए। ‘)
( पीछे का पर्दा उठने लगता है। पांडवों की हर्षध्वनि और जयकार सुन पड़ती है। वनपथ का दृश्य है। धनुष चढ़ाये, भागते हुए कृतवर्मा तथा कृपाचार्य आते हैं।)
कृतवर्मा- यहीं कहीं छिप जाओ
कृपाचार्य!
शंख-ध्वनि करते हुए
जीते हुए पांडवगण
लौट रहे हैं अपने शिविरों को
कृपाचार्य- ठहरो।
उठाओ धनुष
वह आ रहा है कौन?
नहीं-नहीं, वह अस्वत्थामा है
छद्मवेश धारण कर
देखने गया था युद्ध दुर्योधन-भीम का!
( अश्वत्थामा का प्रवेश)
अश्वत्थामा- मातुल सुनो !
मारे गये राजा दुर्योधन
अधर्म से…
कृपाचार्य- ( चुप रहने का संकेत कर)
छिप जाओ!
पांडवों से होकर पृथक
क्रोधित बलराम इधर आते हैं।
( नेपथ्य की ओर देखकर)
कृष्ण भी हैं
उनके साथ
कृपाचार्य- सुनो,
ध्यान देकर सुनो।
बलराम- ( केवल नेपथ्य से)
नहीं!
नहीं!
नहीं!
तुम कुछ भी कहो कृष्ण
निश्चय ही भीम ने किया है अन्याय आज
उसका अधर्म-वार
अनुचित था।
कृपाचार्य- जाने क्या समझ रहे हैं कृष्ण?
बलराम- ( नेपथ्य स्वर)
पाण्डव सम्बन्धी हैं?
तो क्या कौरव शत्रु थे?
मैं तो आज बता देता भीम को
पर तुमने रोक दिया
जानता हूँ मैं तुमको शैशव से
रहे हो सदा से मर्यादाहीन कूटबुद्धि।
कृपाचार्य- ( धनुष रखते हुए)
उधर मुड़ गये दोनों
बलराम- (नेपथ्य-स्वर; दूर जाता हुआ)
जाओ हस्तिनापुर
समझाओ गान्धारी को
कुछ भी करो कृष्ण
लेकिन मैं कहता हूँ
सारी तुम्हारी कूटबुद्धि
और प्रभुता के बावजूद
शंख-ध्वनि करते हुए
अपने शिविरों को जाते हैं पाण्डवगण,
वे भी निश्चय मारे जायेंगे अधर्म से
अश्वत्थामा- ( दोहराते हुए)
वे भी निश्चय मारे जायें गे अधर्म से!
कृपाचार्य- वत्स !
किस चिन्ता में हो ?
वे भी निश्चय ही मारे जायेंगे अधर्म से
अश्वत्थामा- सोच लिया
मातुल मैंने बिल्कुल सोच लिया
उनको मैं मारूँगा !
मैं अश्वत्थामा
उन नीचों को मारूँगा !
कृतवर्मा- (व्यंग्य से)
जैसे तुमने मारा था
वृद्ध याचक को।
अश्वत्थामा- ( चिढ़कर)
हाँ, बिल्कुल वैसे ही
जब तक निर्मूल नहीं कर दूँगा
मैं पांडव वंश को…
कृतवर्मा- लेकिन अश्वत्थामा
पांडव-पुत्र बूढ़े नहीं हैं
निहत्थे भी नहीं हैं
अकेले भी नहीं हैं
खत्म हो चुका है
यह लज्जाजनक युद्ध
अपनी अधर्मयुक्त
उज्जवल वीरता कहीं और आजमाओ
हे पराक्रम सिंधु।
अश्वत्थामा- प्रस्तुत हूँ उसके लिए भी मैं कृतवर्मा
व्यंग्य मत बोलो
उठाओ शस्त्र
पहले तुम्हारा करूँगा वध
तुम जो पाण्डवों के हितैषी हो
कृपाचार्य-( डांटकर)
अश्वत्थामा!
रख दो शस्त्र
पागल हुए हो क्या
कुछ भी मर्यादाबुद्धि
तुममें क्या शेष नहीं?
अश्वत्थामा-सुनते हो पिता
मैं इस प्रतिहिंसा में
बिल्कुल अकेला हूँ
तुमको मारा धृष्टध्युम्न ने अधर्म से
भीम ने दुर्योधन को मारा अधर्म से
दुनिया की सारी मर्यादाबुद्धि
केवल इस निपट अनाथ अश्वत्थामा पर ही
लादी जाती है।
कृपाचार्य- बैठो,
इधर बैठो वत्स
हम सब हैं साथ तुम्हारे
इस प्रतिहिंसा में
किन्तु यदि छिप कर आक्रमण के सिवा
कोई दूसरा पथ निकल आये
अश्वत्थामा- दूसरा पथ!
पाण्डवों ने क्या कोई दूसरा पथ छोड़ा है?
पण्डवों की मर्यादा
मैंने आज देखी द्वन्द्व युद्ध में,
कैसे अधर्मयुक्त वार से
दुर्योधन को नीचे गिरा दिया भीम ने
टूटी जाँघों, टूटी कोहनी, टूटी गर्दन वाले
दुर्योधन के माथे पर रख कर पाँव
पूरा बोझ डाले हुए भीम ने
बाँहें फैला कर पशुवत् घोर नाद किया
कैसे दुर्योधन की दोनों कनपटियों पर
दो-दो नसें सहसा फूलीं और फूट गयीं
कैसे होठ खिंच आये
टूटी हुई जाँघों में एक बार हरकत हुई
आँखें खोल
दुर्योधन ने देखा
अपनी प्रजाओं को
कृपाचार्य- बस करो अश्वत्थामा
शायद तुम्हारा ही पथ
एक मात्र सम्भव पथ है।
अश्वत्थामा- मातुल
फिर तुमको शपथ है
मत देर करो
शायद अभी जीवित है दुर्योधन!
उनके सम्मुख मुझको
घोषित करा दो तुम सेनापति
मैं पथ ढूँढूँगा प्रतिशोध का।
कृपाचार्य- चलो।
कृतवर्मा तुम भी चलो
कृतवर्मा- नहीं, मुझे रहने दो
जाओ तुम!
( कृपाचार्य और अश्वत्थामा जाते हैं)
कृतवर्मा- चले गये दोनों?
कायर नहीं हूँ मैं
दुःख है मुझे भी दुर्योधन की हत्या का
किन्तु यह कैसा वीभत्स
आडम्बर है
हड्डी-हड्डी जिसकी टूट गयी है
वह हारा हुआ दुर्योधन
करेगा नियुक्त इस पागल को सेनापति
जिसकी सेना में हैं शेष बचे
केवल दो
बूढ़े कृपाचार्य और कायर कृतवर्मा !
यह है अक्षौहिणी
कौरव सेना की परिणति?
जाने दो कृतवर्मा
मौन रहो
पक्ष लिया है दुर्योधन का
तो अपनी
अंतिम सांसों तक निर्वाह करो।
( अकेले कृपाचार्य का प्रवेश)
आ गये कृपाचार्य !
कृपाचार्य- देख नहीं सका मैं
और देर तर वह भयानक दृश्य।
कोटर से झांक रहे थे दो खूंखार गिद्ध !
इस झाड़ी से उस झाड़ी में थे
घूम रहे
गीदड़ और भेड़िए
जीभें निकाले
लोलुप नेत्रों से
देखते हुए अपलक
राजा दुर्योधन को।
कृतवर्मा-(व्यंग्य से)
फिर कैसे सेनापति
अश्वत्थामा का अभिषेक हुआ?
कृपाचार्य-बोले वे
कृपाचार्य
तुम हो विप्र
यहाँ जल नहीं है
तुम स्वेद-जल से ही
कर दो अभिषेक वीर अश्वत्थामा का
कैसे उठाऊँ हाथ
अपना आशीष को
झूल गयी हैं बाँहें
कन्धों के पास से
मैंने निर्जीव हाथ उनका उठाया
आशीर्वाद मुद्रा में
किन्तु घोर पीड़ा से
आशीर्वाद के बजाय
हृदय-विदारक स्वर में वे चीख उठे।
अश्वत्थाम – (प्रवेश करते हुए)
पर जीवित रहेंगे वे
उन्होंने कहा है
अश्वत्थामा
जब तक प्रतिशोध का
न दोगे
सम्वाद मुझे
तब तक जीवित रहूँगा मैं
चाहे मेरे अंग-अंग
ये सारे वनपशु चबा जायें।
सुनते हो कृतवर्मा
कल तक मैं लूँगा प्रतिशोध
सेना यदि छोड़ जाये
तब भी अकेला मैं…
कृतवर्मा ( लेटते हुए)
मैं भी तुम्हारे साथ
सेनापति ( ऊब की जमुहाई)
कृपाचार्य- अब तो कम से कम
विश्राम हमें करने दो।
अश्वत्थामा- (नये स्वर में)
सो जाओ आज रात
सैनिकगण
कल सेनापति अश्वत्थामा
बतलायेगा
तुमको क्या करना है
( कृतवर्मा, कृपाचार्य विश्राम करते हैं। अश्वत्तामा धनुष लेकर प्रहरा देता है)
अश्वत्थामा- कितना सुनसान हो गया है वन
जाग रहा हूँ केवल मैं ही यहाँ
इमली के, बरगद के, पीपल के
पेड़ों की छायाएँ सोयी हैं…
( धीरे-धीरे स्टेज पर अँधेरा होने लगता है। वन में सियारों का रोदन। पशुओं के भयानक स्वर बढ़ते हैं। स्टेज पर बिल्कुल अँधेरा। केवल अश्वत्थामा के टहलते हुए आकार का भास होता है। सहसा कर्कश कौए का स्वर और दाई ओर से बिल्कुल काले-काले कपड़े पहने कौए की मुखाकृति का एक नर्तक शिशु आता है, पंख कोल कर मँडराता है और दो बार स्टेज पर चक्कर लगा कर घुटनों के बल झुक कर कन्धों पर चिबुक रख कर पक्षियों की सोने की मुद्रा में बैठ जाता है। इस बीच में अश्वत्थामा पर बिलकुल प्रकाश नहीं पड़ता। एक नीली प्रकाश-रेखा इसी पर पड़ती है। फिर स्वर तेज होता है और बाई ओर उलूकाकृति वाला तेज पंजों वाला नर्तक शिशु आता है। कौए को देखता है। सावधान होता है , फिर उल्लसित होकर पंजे तेज करता है, पंख फड़फड़ाता है। फिर नयी मुद्राओं में आक्रमण करने का अभिनय करता है।
एक प्रकाश अश्वत्थामा पर भी पड़ता है जो स्तब्ध कौतुहल से इस घटना को देख रहा है।
कौआ एक बार अलसाई करवट लेता है और उलूक को देखकर भी बिना ध्यान दिए सो जाता है। उलूक पहले सहम जाता है, उसे सोया देखकर दो-एक बार सावधानी से आजमाता है कि कीं कौआ सोने का नाट्य तो नहीं कर रहा है।
फिर सहसा उस पर टूट पड़ता है। भयानक रव, कोलाहल, चीत्कार। दोनों गुँथे रहते हैं। बिलकुल अंधकार। फिर प्रकाश। कौए के कुछ टूटे पंख और उलूक के पंजे रक्त में लथपथ। उलूक उन पंजों को उठा-उठा कर नृत्य करता है। वधोल्लास का ताण्डव।
एक प्रकाश अश्वत्थामा पर। सहसा उसकी मुखाकृति बदलती है और वह जोर से अट्टाहास कर पड़ता है। उलूक घबराकर रुक जाता है। देखता है, अश्वत्थामा अट्टाहास करता हुआ उसकी ओर बढ़ता है। उलूक कटे पंख उसकी ओर फेंक कर भागता है।
अश्वत्थामा कटा पंख हाथ में लेकर उल्लास से चीखता है)
अश्वत्थामा- मिल गया ! मिल गया ! मातुल मुझे मिल गया !
( प्रकाश होता है। वह रक्त –सना कटा पंख हाथ में लिये उछल रहा है। दोनों योद्धा चौंक कर उठते हैं और कृतवर्मा घबरा कर तलवार खींच लेता है।)
कृपाचार्य- क्या मिल गया वत्स ?
अश्वत्थामा- मातुल !
सत्य मिल गया
बर्बर अश्वत्तामा को।
कृतवर्मा- यह घायल कटा पंख
अस्वत्थामा- जैसे युद्धिष्ठिर का अर्ध सत्य
घायल और कटा हुआ !
कृपाचार्य- कहाँ जा रहे हो तुम?
अश्वत्त्थामा- पाण्डव शिविर की ओर
नीद में निहत्थे, अचेत
पड़े होंगे सारे
विजयी पाण्डवगण !
( अपना कमरबन्द कसता है)
कृपाचार्य- अभी ?
अश्वत्थामा- बिलकुल अभी
वे सब अकेले हैं
कृष्ण गये होंगे हस्तिनापुर
गान्धारी को समझाने
इससे अच्छा अवसर
आखिर मिलेगा कब?
कृतवर्मा- यह सेनापति का आदेश है?
अश्वत्थामा- ( बिना सुने)
तुमने कहा था
नरो वा कुंजरो वा !
कुंजर की भांति
मैं केवल पदाघातों से
चूर करूंगा दृष्टद्युम्न को !
पागल कुंजर
से कुचली कमल-कली की भांति
छोड़ूँगा नहीं उत्तरा के भी
जिसमें गर्भित है
अभिमन्यु-पुत्र
पाण्डव कुल का भविष्य।
कृपाचार्य- नहीं! नहीं ! नहीं!
यह मैं नहीं होने दूंगा !
अश्वत्थामा- होकर रहेगा यह !
साथ नहीं दोगे तो
अकेले मैं जाऊँगा
जाऊँगा
जाऊँगा !
( कृतवर्मा पीछे-पीछे सिर झुकाये जाता है। )
कृपाचार्य- रुको।
किन्तु
सोचो अश्वत्थामा…
( अश्वत्थामा बिना सुने चला जाता है। कृपाचार्य पीछे-पीछे पुकारते हुए जाते हैं। अश्वत्थामा ! अश्वत्थामा ! ! अश्वत्थामा ! ! ! यह ध्वनि धीरे-धीरे दिगंत में खो जाती है। तीन रथों की घर्घराहट और घोड़ों की टापें शेष बचती हैं। पर्दा गिरता है। )
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