माह की कवियत्रीः पंखुरी सिन्हा / अप्रैल-मई 2015

 

प्लास्टिक की छत

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जैसे जनता जानती है अपनी सरकार को

वो जनता जिसकी फूस की झोपड़ी

टपकती है, हर बरसात में

और बाढ़ अब झेली नहीं जाती

वो जनता जिसे पढ़कर सुनाया जाता है

कि गेहूँ आ रहा है

विदेश से, और वो समझ नहीं पाती

कि आखिर गेहूँ क्यों आ रहा है

विदेश से?

क्या हुआ गेहूँ के खेतों का

क्या सब दह गये?

पर अभी तो कटी रब्बी की फसल

क्या यहाँ भी कटी

या केवल देश के धनाढय प्रदेशों में

ऐसा कैसे है, कि दाल इतनी महँगी

किसान इतने ग़रीब

और अखबारों में तड़के की विधिओं के इतने नुस्खे

कुछ लोगों की दाल में इतना घी कैसे है?

और ग़रीब को ही, ग़रीब क्यों बनाया जा रहा?

आखिर मिनिस्टरों की इतनी ऐश कैसे है?

अफसरों की नौकरी इतनी पक्की क्यों?

आखिर वो नहीं लेते, तो कौन लेता है घूस?

वो जनता जो बिल्कुल नहीं समझ पाती

कि हर बहाली हर योजना में इतने घोटाले क्यों हैं?

बस जानती है अपनी सरकार को इतना कि

लाख कहने पर भी मटिया तेल का दाम बढ़ाये दे रही है

जुलुम है

वो जनता जिसे पढ़कर सुनाया जाता है

बड़े शहरों क़ी कैमरा परस्त पत्रकारी खुदाइओं के किस्से

और जो बिल्कुल नहीं जानती कि क्या कैसे है?

क्या, हम आप, जो पढ़े लिखे हैं

बता सकते हैं उसे, या खुद को

कि आखिर क्या कैसे है

कि ऐसा कैसे है

कि हमारे सब हक़ों की चोरी हो गयी?

और हम कुछ नहीं कर सकते?

 

 

 

 

ऐसी साज़िश नहीं रचते

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वो तब भी नौकरी ढूंढ रही थी

जब उसने बड़े स्कूल की बड़ी दीवार फांदी थी

वो अब भी नौकरी ढूंढ रही है

सलामी बजाकर, गीत गाकर

बात ये नहीं, कि नौकरी मिली नहीं

या करने नहीं दी गयी

बात बस इतनी कि ये नहीं होता

और बस नहीं होता

कुबूल नहीं ये

कि एक कदम भी आगे बढ़ाने पर

भयानक सा एक प्रस्ताव आये

जिसके माने, हम खुद समझ न पायें

कि आने वाले की हो कोई खुफिया राजनैतिक पहुंच

और साज़िश भी

और अगले को इत्तला तक नहीं

ये नहीं होता

कि हर कदम आगे बढ़ाने पर

कोई आता रहे

उजबक सा, विदूषक सा

धोखेधड़ी की चाल लिये

कि बस हमें न कहती रहो

आज यह बहाना, कल वह प्रस्ताव

ये नहीं होता

और होना इसका सोची समझी साज़िश है…………..

ऐसी साज़िश नहीं रचते

नौकरी पेशा को नौकरी करने दें

लड़की को कुछ आगे बढ़ने दें……………….

 

 

 

 

 

 

लैपटॉप की क्लिक

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 पकड़ते हुए एहसास का आखिरी कतरा

महसूसने का सबकुछ

सारी शिराएं, आपके होने का सबकुछ

कि ठीक, ठीक क्या हुआ

जब सुनी आपने बेहद भयानक खबर वह

कि घटा है कहीं फिर भयानक हादसा कोई

मारे गए हैं, निर्दोष, निहत्थे

बेखबर लोग

कहीं और

हादसा कोई

जो कभी भी पास आ सकता है

पर अभी नहीं

अभी सिर्फ ख़बर है

पढ़ी जा सकने वाली

अपने लैपटॉप पर अब

ये जानते कि मुमकिन है

लोग, बेहद ताक़तवर लोग

मुमकिन है, वही लोग

कुछ वही लोग

उनके लोग

कुछ और लोग भी

देख रहे हो

आपको पढ़ते हुए खबर वह

कितनी देर लगाई आपने

पढने में ख़बर वह

कितनी बार ऊपर नीचे की

आपने रपट वह

ठीक क्या हुआ

उस दानवी वारदात को पढ़ते

पढ़ते उस जघन्य कृत्य की बारीकियां

लोमहर्षक बारीकियां

जो डाल रहा है

हम सबको खतरे में

राहत ये कि ख़तरा कुछ दूर है।

इतना कसता जाता है

शिकंजा किसी और का

किसी नज़र रखने वाले का

आपकी रोजमर्रे की ज़िन्दगी पर

कि केवल राहत महसूस की आपने

कुछ दूर तक

खौफ उसके बाद

खौफ तो कितना खौफ़?

 

 

 

 

 

चुप्पी के अंतर

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चुप्पी अधिकारी की

पुलिस अफसर की

फरक है जिस तरह

किस तरह

कितनी

कितनी फरक

उस लड़की से

जो करते ही प्रवेश

कामकाजी संसार में

कला की सिद्ध दुनिया में

अभिनय की प्रसिद्ध दुनिया में

दफ्तरी जगह में, करते ही प्रवेश

देखती है कि एक अजीब सा चुनाव है

उनसे लगातार सवाल करते रहने का उसका

और बढ़ते जा रहे हैं

अधिकारों के दायरे उनके

सिमटता जा रहा है उसके नितांत अपने का क्षेत्र

कितनी फरक उसकी अचम्भित चुप्पी से

उस पुलिस अफसर की

जिसे वह लगातार फ़ोन कर रही थी

कि पीछा तक कर रहा था

कोई उसका।

 

 

 

 

 

 

 

हमारी तकलीफों की रिपोर्ट

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जिन तकलीफों की रिपोर्ट लिखाई हमने

क्या हुआ उनका

फाइल बनकर रह गयी, रिपोर्ट हमारी

खाली खबरें आती रहीं

इन, उन, अखबारों में

कि बचा है कितना काम पुलिस के पास

कि कितनी महिलाएं गायब हैं

कहीं कोई आकड़ा नहीं

अगर है तो कोई पता नहीं

कोई तहकीकात नहीं

फिर कहते हैं

हमारे पास बेरोज़गारी है

कोई नौकरी नहीं

तो आखिर पुलिस में और बहाली क्यों नहीं?

 

Pankhuri Sinha

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