मंथनः रामसिंह यादव/ अप्रैल-मई 2015

 

कश्मीर

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कश्मीर…कश्मीर…कश्मीर…

कश्यप ऋषि के नाम पर बना संस्कृत शब्द “कश्मीर” आज इस्लाम और हिन्दुत्व की नाक का प्रश्न बन चुका है।

इस्लाम कहता है कश्मीर भारत का हिस्सा है ही नहीं जबकि हिन्दुत्व कश्मीर को माथे पर सजाये बैठा है। अगर ये  हटा तो भारत का मस्तक छिन्न हो जाएगा।

आखिर कश्मीर क्या बला है? अब इतिहास को क्या खंगालूं क्योंकि इतिहास ढूँढने पर कल्हण की राजतरंगणी, शंकराचार्य द्वारा 

स्थापित मठ और बौद्ध विहार दृष्टिगोचर हो रहे हैं फिर उसके बाद वही बारह सौंवी शताब्दी से इस्लाम का खून खराबा और 

कश्मीरी पंडितों के नाम के आगे बट्ट, गनी, सईद, लोन, सज्जाद, खान आदि शब्दों का उल्लेख मिलने लगता है।

लेकिन इन सबके बावजूद शेष भारत के मुक़ाबले कश्मीर सबसे शांत छवि रखता है सारे भारत में आग लगी होती है, कत्लेआम हो 

रहे होते हैं, राज्यों की जीत, लूटपाट और व्यावसायिक संधियाँ हो रही होती हैं लेकिन इन सबसे दूर कश्मीर में हल्के से प्रतिरोध के 

बाद वहाँ इस्लाम का ही स्वरूप बदल कर पीरों, मजारों और सूफियों का साम्राज्य हो चुका होता है।

 धर्मों की लड़ाई से दूर ये हिमालय की श्रेणी का सबसे उन्नत हिस्सा धरती के स्वर्ग के रूप में सुविख्यात हो जाता है।

सरल और भोले हृदय वाले कश्मीरी, सियासतों से दूर पश्तोडोगरी की लुभावनी धुनों और संतूर की ध्वनि से दुनिया का ध्यान 

आकृष्ट करते हैं, विश्व की अद्भुत हस्तशिल्प कला और उन्नत निरोगी जीवन शैली से दुनिया का परिचय कराते हैं।

 आजादी के ठीक पहले तक कश्मीर का इतिहास सबसे शांत, निरपेक्ष, सरल, सहृदय, सौहार्द, उन्नत अर्थव्यवस्था, सर्वाधिक 

जीवन प्रत्याशा, सौम्य जीवनी और प्राकृतिक नैसर्गिकता का आईना रहता है।

यहाँ तक की 1947 की भारत को बांटने की चाल से भी बच निकलने वाला कश्मीर अंततोगत्वा धर्मों की कुटिल चालों में फंस कर 

ऐसी तबाही का रुख कर लेता है जिसका हश्र अब तक भविष्यविहीन है…

भारत और पाकिस्तान की सुरक्षा खर्च का सर्वाधिक हिस्सा निगलने वाला कश्मीर आखिर किसके लाभ का मोहरा है?

राजा हरि सिंह और उनके मंत्री शेख अब्दुल्ला की नेपाल भूटान जैसी संप्रभुता पर आखिर आघात किसने किया था?

जेहन बेचैन है…….

और सवाल का जवाब वो पाकिस्तानी कबायली सैनिक दे रहे हैं जिनकी फौज 20 अक्तूबर 1947 को कश्मीर  रौंदने के लिए बढ़ी 

चली आ रही थी।फिर आनन फानन में 26 अक्तूबर 1947 को कश्मीर का भारत में विलय और भारतीय सैनिकों का कश्मीर में 

प्रवेश  कर बचे हुये कश्मीर को सुरक्षित रखने के जतन में खुद को झोंक देना।

 शायद वो सिलसिला आज तक जारी है। आज भी भारत के सैनिक अपनी पूरी नौकरी का एक चौथाई हिस्सा कश्मीर के नाम पर दे 

कर आते हैं और उनमे से कई अभागे अपनी जिंदगी दे जाते हैं। कैसी विडम्बना है इतनी जानें लेने के बाद भी कश्मीर जस का तस है, वहाँ के भोले और सीधे सादे नागरिक धर्म के चश्मे से अंधे होकर खुद को सीमापार प्रायोजित चरमपंथ और आतंकवाद की पनाह में सुरक्षित समझते हैं। 

विदेशी मीडिया, मानवाधिकार समूह, संयुक्त राष्ट्र आदि सब अपनी पैनी नजरें गड़ाए भारत प्रशासित कश्मीर की एक एक 

गतिविधि को परखते रहते हैं और मनचाही अनर्गल- अतिवादी परिचर्चाओं के आयोजन में मशगूल रहते हैं।

मानों विश्व का सबसे ज्वलंत मुद्दा कश्मीर ही हो………

 कितना आहत करता है अपने कश्मीर का ये वर्तमान स्वरूप ।  

 चलो आज हम भी कश्मीर की असलियत को परख लेते हैं कि आखिर पाकिस्तान की खालिस्तान बनाने का प्रलोभन देकर कभी 

सिक्खों को उनके वतन से जुदा करने की चाल के चकनाचूर हो जाने के बाद कश्मीर के जरिये भारत को अस्थिर करने का ख्याल 

पाकिस्तानी राजनीति में कैसे आया…….

1965, 1971 और कारगिल युद्ध 1999 में भी भारतीय कश्मीरी, भारत के प्रति विद्रोही नहीं था लेकिन विदेशी पैसे पर जीवित 

चरमपंथियों के द्वारा सत्रह साल के लड़के की मौत पर भड़कायी हिंसा ने भोले कश्मीरियों की आँखों पर विनाश का पर्दा डाल दिया 

है।

पता नहीं किस खुशी, उल्लास और स्वायत्ता की चाह में जनता के हाथों में पेट्रोल बम, पत्थर, विदेशी हथियार थमा कर पुलिस 

और सैनिकों के पीछे दौड़ा दिया जाता था और पुलिस द्वारा आत्मरक्षा में चलायी गयी गोली पर बी॰बी॰सी॰ के पत्रकार, 

मानवाधिकार संगठन नमक मिर्च लगा कर कहानियाँ छापने लगते थे।

 जम्मू कश्मीर की यथार्थता को भला को कैसे ये विदेशी व्यवसायी या स्वयंभू न्यायाधीश समझ सकते हैं?

इन मुद्दों के जरिये ही तो विश्व की दो बड़ी सामरिक शक्तियाँ न्यूक्लियर और बेहद विनाशक हथियार खरीदेंगे।

 जम्मू और कश्मीर की 100 प्रतिशत सियासत के आज तीन टुकड़े हो चुके हैं, जिसमें से 30 प्रतिशत हिस्सा गिलगित-बाल्टिस्तान और आजाद कश्मीर के रूप में पाकिस्तान के पास है, 10 प्रतिशत हिस्सा अकसाई चीन व काराकोरम श्रेणी के रूप में 

चीन के अधीन है और भारत के पास 60 प्रतिशत हिस्सा है।

 1941 की जनगणना के अनुसार जम्मू कश्मीर की कुल जनसंख्या 39,45,000 थी जिसमें 76 प्रतिशत मुसलमान व 24 

प्रतिशत हिन्दू अर्थात सिक्ख-बौद्ध-डोगरा कश्मीरी पंडित आदि थे और आज की वर्तमान जनसंख्या करीब 1,59,99,272 है जिसमें भारत व पाकिस्तान कश्मीर की 

जनसंख्या का ही आंकड़ा मिल सका है क्योंकि अकसाई चीन का इलाका सभी तरह संगठनों व मीडिया के लिए चीनी सरकार ने 

निषेध कर रखा है।

 भारत प्रशासित 60 प्रतिशत कश्मीर के भी तीन हिस्से हैं पहला कश्मीर जिसमें 69,07,622 की आबादी का 95 प्रतिशत 

मुस्लिम है और बाकी 5 प्रतिशत हिन्दू, दूसरा हिस्सा जम्मू जिसमें 53,50,811 की आबादी में 30 प्रतिशत मुस्लिम और 70 

प्रतिशत हिन्दू हैं और तीसरा हिस्सा लद्दाख है जिसमें 2,90,492 की आबादी में कारगिल के 45 प्रतिशत शिया मुस्लिम व 55 

प्रतिशत लद्दाखी बौद्ध हिन्दू हैं।

 अब पाकिस्तान प्रशासित 30 प्रतिशत कश्मीर के भी तीन हिस्सों को देखा जाये तो आजाद कश्मीर के 25,80,000 सूफी 

मुसलमान तथा गिलगितबाल्टिस्तान के 8,70,347 डोगरा मुसलमानों पर नज़र जाती है जबकि चीन प्रशासित कश्मीर की सूरत का कोई अंदाज़ा ही नहीं लिया जा सकता।

 अब मुद्दा आता है की भारत के 60 प्रतिशत कश्मीर में लगभग 1,25,48,925 निवासी हैं जबकि पाक व चीन अधिकृत 40 प्रतिशत कश्मीर की कुल जनसंख्या 34,50,347 में ही सिमट जाती है।

 रोज रोज कश्मीर मुद्दे पर सियासत करने वाले मूर्ख नेताओं जरा इस तस्वीर को अपनी अंधी अक्ल के सामने रखो की भारत प्रशासित कश्मीर में आखिर कौन सी जीवन सुलभ सुविधाएं दी जा रही हैं कि यहाँ की जनसंख्या 1941 में 23,67,000 से लगभग चौगुनी हो चुकी है जबकि 15,78,000 की जनसंख्या वाले उस पार के कश्मीर को दुगुनी आबादी बढ़ाने में लाले पड़ गए…….

 खैर मुझे क्या?

 मै क्यों सिर दर्द मोल लूँ की भारत का मुसलमान इतना सुखी क्यों है, इतना पढ़ा लिखा, लंबी आयु का धनी, मानवाधिकारों के प्रति जागरूक, अच्छी सम्मानपूर्ण जीवन जीने वाला, नौकरी, चुनाव, खेलकूद, सेना, शिक्षा, सेवा आदि में समान भागीदारी का अवसर प्राप्त करने वाला क्यों है?

जबकि ठीक इसके दूसरी तरफ के देशों का मुसलमान मुहाजिर, शिया, सुन्नी, कबायली आदि में बंटा इतना लाचार, अपमानित, संवेदनाहीन, और जीवन की मूल सुविधाओं को तरसने वाला क्यों है? जिन्हें चरमपंथियों व विदेशी सेनाओं की बंदूकों के साये में जीना पड़ रहा है, जिनके गिलगित और बाल्टिस्तान में सेना व आतंकियों के प्रशिक्षण शिविर चल रहे हैं, जहां से अफीम चरस का व्यापार चलाया जा रहा है, जहां के युवा अपनी जिंदगी का 60 प्रतिशत हिस्सा गोलियों के छर्रों और बमों के धुएँ में बिता रहे हैं, जहां मानवाधिकार संगठनों, बी॰ बी॰ सी॰ जैसे विदेशी मीडिया को मसालेदार खबरें बनाने के लिए घुसने भी नहीं दिया जाता, जहां औरतों के अस्तित्व की कोई पहचान नहीं है, जहां की घरेलू हस्तशिल्प कला और कश्मीरी अर्थव्यवस्था अपनी दम तोड़ चुकी है, जहां दुधमुहें बच्चों को बुखार तक से होने वाली मौत से बचाने के लिए कोई अस्पताल नहीं है और दूर शहरों के अस्पताल तक ले जाने के लिए सड़कों का नामोनिशान नहीं है।

2005 के कश्मीर भूकंप और 2014 की कश्मीर घाटी की बाढ़ की तबाही में भारतीय पक्ष के हताहतों की संख्या तो सामने है लेकिन सरहद पार के कश्मीर की गुमनाम मौतों का कोई आंकड़ा नहीं है जिन्हें आज भी सुपुर्दे खाक होने की दरकार है…

 इतनी विषमताएं होते हुये भी चलो मान लिया की कश्मीर पर पाकिस्तान चिंता जायज है, कि वाकई भारतीय सेना कश्मीरी बाशिंदों पर बहुत जुल्म कर रही है जिसकी वजह से कश्मीरी जनता त्रस्त है तो जरा इन्हीं भारतीय सैनिकों की मौजूदगी और त्वरित राहत कार्यों से बचे लाखों कश्मीरियों के जीवन बचने के आंकड़े भी पेश कर दो।

 खामोश हो गए होगे तुम चरमपंथियों और तुम्हारे आका भी क्योंकि ठीक उसी वक़्त दूसरी तरफ तुम, बजाए पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर की निरीह जानों को बचाने के, भारत में आतंकियों और चरमपंथियों की घुसपैठ कराने में मशगूल थे।

वो सेनाएँ जो अपने उत्तराखंड में दसियों हज़ार जानों को नहीं बचा पायी थी लेकिन भारत के कश्मीर में पंजाब के गुरुद्वारों की औरतों से रोटियाँ सिंकवा कर भूखे कश्मीर को जिला रही थी और हजारों हेलीकाप्टरों की रात दिन की उड़ान की बदौलत एक एक कश्मीरी को सुरक्षित किया जा रहा था. उत्तराखंड से भयानक त्रासदी को महज़ कुछ सौ मौतों में ही सीमित कर दिया था।

 चलो मैं भी कहता हूँ कि संयुक्त राष्ट्र द्वारा वोटिंग करा ली जाय, तो जम्मू कश्मीर के तीन हिस्सों में से जम्मू (26% भूभाग) और लद्दाख (59% भूभाग) की हिन्दू व शिया बहुल आबादी किसी भी हाल में पाकिस्तान के झांसे में न आकर भारत के साथ ही रहेगी और बची कश्मीर घाटी (15% भूभाग) आजाद कश्मीर का हिस्सा हो जाएगा यानि भारत के चंगुल से छूट कर पाकिस्तान की स्वायत्ता वाला मुक्त राष्ट्र।

कितना अच्छा लगेगा न कश्मीर के मुसलमानों को, चरमपंथी नेताओं को, लश्कर-तालिबान- आई॰एस॰आई॰एस॰ के जेहादी संतुष्ट हो जाएँगे, पाकिस्तान से हुक्म देते आकाओं को आराम मिल जाएगा। पाकिस्तानी आर्मी के पास भी अब भारत से लड़ने का कोई मुद्दा नहीं बचेगा और वो बेहतर तरीके से बलूचिस्तान के विद्रोही कबाअमन और चैन हो जाएगा भारत में भी क्योंकि जितना पैसा और सैन्य ऊर्जा हम कश्मीर के गद्दारों को संतुष्ट रखने में और सुख सुविधाएं मुहैया कराने में खर्च कर रहे हैं वो अब देश की तरक्की और रोजगार के अवसर बढ़ाने में इस्तेमाल किए जा सकेंगे।यलियों को खत्म कर सकेगी।

 शायद

 

लेकिन,

 

कहीं न कहीं कश्मीर की भोली 95% निरपेक्ष जनता की इस षडयंत्र में फंस कर होने वाली दुर्दशा का दुःस्वप्न हमारे भी दिल में टीस पैदा कर रहा है कि आखिर 5% विदेशी वित्त पोषित स्वार्थी अलगाववादियों चरमपंथियों के फैलाये जा रहे आत्मघाती भ्रम में लाखों बेकसूर ऋषि कश्यप के वंशज या भारतीय सूफियाना इस्लाम के अनुयायियों को तिल तिल कर मरने के लिए छोड़ देना इस भारतीय संस्कृति को आत्मसंतोष दे सकेगा?

 अलग राष्ट्र की मांग करना बहुत आसान होता है। चंद युवा लोगों को विद्रोही भावनाओं में फंसा कर आगजनी करवाओ, छोटे छोटे मुद्दों को गंभीर बता कर अनर्गल बहस करवाओ, जिन युवाओं के हाथों में पशमीना हस्तशिल्प की कमान, संतूर की सुमधुर तरंगे और जुबान से डोगरी गानों की कर्णप्रिय आवाज़ें आनी चाहिए थी उन युवाओं को खास षड्यंत्र के तहत उनकी मूल उन्नत अर्थव्यवस्था से भटकाया जा रहा है।

गिलगित – बाल्टिस्तान, कश्मीर, आजाद कश्मीर और सियाचिन मिलकर मान लो एक नया राष्ट्र बन भी जाता है तो क्या ये एक मुकम्मल राष्ट्र बन पाएगा?

 किसी भी राष्ट्र की सबसे मुख्य जरूरत अनाज होती है…… उसके बाद भौगोलिक परिवेश, फिर रोजगार, तकनीकी, सैन्य प्रबंधन, जरूरत की चीजों की मांग व आपूर्ति हेतु आधारभूत संरचना, संचार साधन, जीवन प्रत्याशा स्थिर रखने के लिए विस्तृत चिकित्सा तंत्र आदि।

इसके अलावा विश्व में सिर्फ भारत ही ऐसा राष्ट्र है जहां की भूमि पर सारी सुविधाएं स्वयंभू मौजूद हैं। किसी भी प्रकार की महामारी अथवा प्राकृतिक आपदा का सामना करने के लिए इस विलक्षण राष्ट्र की भौगोलिक व्यवस्था यहाँ के निवासियों को स्थानांतरण और दूसरी जलवायु में जाकर प्राण बचाने का मौका देती है जो कि विश्व के किसी भी अन्य राष्ट्र में संभव ही नहीं। यहाँ यदि राजस्थान का सूखा है तो पंजाब का अनाज वहाँ की भूख मिटा रहा है। यदि नेपाल के पानी से आती भयंकर बाढ़ की चपेट में बिहार है तो झारखंड और मध्य प्रदेश के जंगलों में सुरक्षित पनाहगाह भी है। यदि तटीय क्षेत्रों में सुनामी और चक्रवाती तूफान हैं तो महाराष्ट्र, कर्नाटक आदि की सम जलवायु भी है। यदि बुंदेलखंड और मराठवाडा का सूखा है तो उसके निवासियों की प्यास बुझाने के लिए गंगा के मैदान और नागपुर जैसे उपजाऊ क्षेत्र भी हैं। 

 और शायद सबसे बड़ी यही वजह है की नेपाल, भूटान और बांग्लादेश जैसे स्वतंत्र देशों के नागरिक खुद को भारत की मुख्य भूमि में ज्यादा सुरक्षित मानते हैं और स्वयं को भारतीय नागरिक साबित करने की पुरजोर कोशिश करते हैं।

 

  राष्ट्र एक जीवित इकाई है, ये भी प्राकृतिक झंझावातों से गुजरता है। कश्मीर के बाढ़ पीड़ित हों या आंध्र प्रदेश के समुद्री तूफान पीड़ित सबको पंजाब और उत्तर प्रदेश का गेहूं तथा छतीसगढ़ का चावल प्राणविहीन होने से बचा लेता है। पहाड़ों की विरल जलवायु में मानव जीवन समतल मैदानों के प्रयत्न से ही सुरक्षित रहता है ये बात कश्मीर के लाखों बाशिंदों द्वारा सबसिडी प्राप्त अनाज लेते वक्त समझना चाहिए। कश्मीर की अर्थव्यवस्था को बर्बाद करने वाले चरमपंथियों क्या भारत से अलग रहकर तुम पाकिस्तान की बेरोजगारी-ऋणात्मक अर्थव्यवस्था-राजनीतिक अनिश्चितता-आतंकियों-सेना के बीच पिसते देश से कोई उम्मीद रख पाओगे?

 आज बांग्लादेश भारत के टूटे हिस्से से बना राष्ट्र है, संयुक्त राष्ट्र संघ से लेकर चीन तक अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिये भारत को घेरने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन वहाँ की लाखों मानव आबादी रोजगार व अनाज की कमी, जीवनयापन के सीमित संसाधन और प्राकृतिक असंतुलन की वजह से बांग्लादेश छोड़ चुकी है। दिल्ली, बिहार, बंगाल, असम, पूर्वोत्तर राज्यों, दक्षिण भारत आदि में बसी ये जनता किसी राष्ट्र के नाम पर नहीं बल्कि एक सुलभ जीवन जीने के लिए भारत का रुख कर रही है। यही हाल भारत के पश्चिमी हिस्से अर्थात पाकिस्तान और अफगानिस्तान का भी है. यदि सीमाओं पर सैनिक इतने मुस्तैद न हों तो आतंकवाद तो कम लेकिन वहाँ की जनता जो बेइंतहा जुल्म और अनिश्चित जीवन संघर्ष में पिस रही है अब तक भारत का हिस्सा हो चुकी होती। 

वहाँ के निवासियों की आकांक्षा और कौतूहल में भारत है। 

भारत का विभाजन करके अपनी स्वार्थ पूर्ति के ध्येय में चिंतन करने वाले अल्पबुद्धि चरमपंथियों, एक जीवित राष्ट्र की प्रत्येक ईकाई के महत्व को समझो।

 कश्मीर जो भारत के सूफी आध्यात्मिक इस्लाम का केंद्र था आज मूर्ख राजनीतिज्ञों की स्वार्थ लिप्सा के कारण कई टुकड़ों में बंट चुका है एक तरफ लोभी कुटिल स्वार्थी चीन हिस्सा हड़पे बैठा है, तो दूसरी तरफ धर्म की मूढ़ता और विकसित राष्ट्रों की कठपुतली बना पाकिस्तान आधे कश्मीर को दबाये हुये है और तीसरी तरफ इन सबके बीच भी कश्मीर की अस्मिता को बचाकर उसको जीवित रखने के लिए सर्वस्व झोंकता एक समभाव राष्ट्र भारत।

 हे भारत की सवा अरब जनता और कश्मीर के एक करोड़ सूफियों, भले ही हमारे कई धर्म हों, कई पंथ हों, कई भाषाएँ और कई लिबास हों, अफगान-द्रविड़-मंगोल जैसी शक्लें लिए हम किसी भी प्रांत में बसते हों लेकिन जिस प्रकार माता-पिता के चेहरे से भिन्न होते हुये भी उसकी संतान के डी॰एन॰ए॰ व आर॰एन॰ए॰ गुणसूत्र, विरोधी शिक्षा और असामान्य सामाजिक परिवेश में भी अपना अस्तित्व सँजोये रहते हैं और वक्त आने पर अपने को प्रस्फुटित करते हैं उसी प्रकार हम चाहे जितना भी बंटे हों लेकिन हमारे भारतीय संस्कार हमें विश्व भर के मानवों से अलग पहचान देते हुये एकता के सूत्र में पिरोते हैं। कश्मीर का मुसलमान जब गर्व से अपने राजा ललितादित्य के मार्तंड मंदिर के अद्भुत सूर्य विज्ञान, 8400 किलो सोने की शिव मूर्ति और ईरान से लेकर बंगाल तक फैले महान साम्राज्य का वर्णन करता है उस अपने महान सम्राट का वर्णन जिसने चीन और यूरोप के साम्राज्यों को भी झुका दिया था तो शायद उसके खून में बसा डी॰एन॰ए॰ और आर॰एन॰ए॰ का गुणधर्म हिलोरें मार रहा होता है। 

 

भारत को धर्म के नाम पर राष्ट्रभक्ति की प्रतिज्ञा करवाने वालों की आँखों के सामने 1948 के भारत और पाकिस्तान के मध्य युद्ध में प्राण देने वाले नौशेरा के शेर ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान का चेहरा क्यों नहीं आता जिन्हें पाकिस्तान अपना सेनाध्यक्ष बनाने का प्रस्ताव दे चुका था लेकिन उस अविवाहित योगी ने अपनी मातृभूमि के लिए प्राण देना श्रेयस्कर समझा। पेटन टैंकों से छलनी हवलदार अब्दुल हमीद का रक्तरंजित शव भारत माता की गोद में पड़ा क्यों नहीं दिखाई देता जिन्होने पाकिस्तानी सेना के टैंको को अपनी जमीन पर पाँव रखने से पहले ही नेस्तनाबूद कर दिया था। सत्ताईस वर्षीय अशफाक़ उल्ला खाँ आखिर किस उम्मीद से पं॰ राम प्रसाद बिस्मिल के साथ खड़े होकर फांसी के फंदे को चूम रहे थे और वतन की मिट्टी को माथे पर लगा रहे थे या 1857 की क्रान्ति की सजा में दोनों बेटों के कटे शीश देख द्रवित बूढ़े बहादुर शाह जफर की यंगून जेल में लिखी रुबाइयों में अपनी धरती की मिट्टी में दफन होने की चाह उन्हें शिवाजी की देशभक्ति से कमतर नहीं सिद्ध करती। वंदे मातरम की दुहाई देते लोगों को ये भी देखना चाहिए की पाँच बार नमाज में झुक कर माथे से धरती को चूमने के संस्कार के पीछे का तर्क और विज्ञान क्या है………. 

 भारत को खतरा हिन्दू और मुसलमान से नहीं है बल्कि इनके अलगाव को भड़का कर अपने हित साधने वाली विदेशी ताकतों से है। हिमांचल के हिमालय पर्वतों पर योग की अलौकिकता पेश करते सिद्ध हैदा खाँ बाबा की आकाश विचरण की किवदंतियाँ, “कबीरा खड़ा बाजार में, सबकी मांगे खैर। न काहू से दोस्ती, न काहू से बैर।। की अदम्य आध्यात्मिकता का परिचय देते कबीर बाबा, राधाकृष्ण के प्रेम के जरिये महान सूफियत को जन्म देती रसखान की अलौकिक वाणी, नानक की शांत आध्यात्मिकता से प्रभावित विश्व को ॐ और आमीन का संदेश देने वाले भाई मरदाना जी जिन्होने संगीत को अध्यात्म से जोड़ कर गुरुवाणी का प्रसार किया, गुरुद्वारे में बजते वीणा की हल्की धुनों में खो जाने वाला अध्यात्म भारतीय इस्लाम और भारतीय हिन्दुत्व को एकाकार कर देता है तथा शिव के सूफियाने संगीत में दीन दुनिया, जात-पांत, ऊंच-नीच, भौतिकता प्राकृतिकता से परे मानवता के उत्कृष्ट चरम पर स्थापित कर परमात्मा में विलीन कर देता है ये भारत का अनूठा संसार।

काश की हम लोग इन चंद कुटिल स्वार्थी तत्वों का सामना कर सकें। अपने मस्तिष्क की आवाज़ से मीनारों की गूँजती तकरीरों और मंदिरों से हुंकारते नेताओं की आवाज़ों का विश्लेषण कर सकें और उसके पीछे छिपे तत्वों के प्रति मुखर हो सकें।

 काश कि दीमापुर की भीड़ का हिस्सा बनने से पहले तथ्यों का संज्ञान ले सकते या पाकिस्तान के सियालकोट के दो भाइयों की नृशंस हत्या वाले वीडियो से बनी सी॰डी॰ दिखाकर मुजफ्फरनगर उबालने वालों की मंशा समझ सकते।

 आज चीन हो, अमेरिका हो, आई॰एस॰आई॰ हो या विकसित देशों का घृणित मीडिया, संचार व खुफिया तंत्र हो जिनसे चुटकियों में अफवाहों को फैला कर उन्मादी भीड़ के जरिये जघन्य अपराध कराये जा सकते हैं और राष्ट्र की विकासोन्मुख ऊर्जा का पतन किया जा सकता है।

 वर्तमान पीढ़ी को मिल कर हमारे भविष्य को नष्ट करने वाली कुटिल चालों का सामना करना होगा और अपने लोकतान्त्रिक सरकारों और मूल्यों को सहारा देना होगा। निश्चित ही सबमें कमियाँ होती हैं लेकिन इनका विरोध और समर्थन भारत हित के अनुरूप करना होगा न की विदेशी शक्तियों को मजबूत करने की दिशा में।

विश्व एक भयानक संक्रमण से गुज़र रहा है। 

और भारत को इसका हल खोजना है।      

 चीन द्वारा पाक अधिकृत कश्मीर और अकसाई चीन इलाके में भारी ड्रिलिंग और सुरंग बनाती परियोजनाएँ एक महाविनाश का संकेत दे रही है. हिमालय श्रंखला और हिंदुकुश श्रेणी में चीनी अतिक्रमण के लिए पाकिस्तान का खुला आमंत्रण भारतीय उप महाद्वीप के लिए बेहद आत्मघाती सिद्ध होगा। 

 जिसकी शुरुआत हो चुकी है। भूमि को खिलौना समझकर खेलने वाला मानव स्वपतन को उन्मुख हो चुका है. कश्मीर, हिमांचल, उत्तराखंड या समूचे उत्तर भारत में मार्च तक सात पश्चिमी विक्षोभों से विरल वर्षा, ओले और तूफानों के जरिये कृषि की तबाही के रूप में भविष्य की चेतावनी का संकेत दे दिया है।

 विश्व भर के धन लोभी मानवों द्वारा ध्रुवों को क्षति पहुँचाने से ध्रुवीय ऊर्जा और चुंबकीय गुणों में व्यवधान पड़ रहा है, जिसके फलस्वरूप विश्व के कई देश भयानक जलवायु अस्थिरता से जूझ रहे हैं। 

भारत पर भी इसकी काली छाया पड़ रही है। हालांकि भारतीय जलवायु की चहुगुणी विशेषता हमें सुरक्षित रखने की एक अनूठी व्यवस्था रखे है लेकिन हमारे द्वारा हिमालय के सरंक्षण में विफल होना पहाड़ी बस्तियों के विनाश का मुख्य कारण होगा। कश्मीर-हिमांचल-उत्तराखंड-नेपाल जो की पश्चिमी विक्षोभ को संभालते थे उनमें शंकुधारी वनों की अनुपस्थिति में प्रकृति का स्व-संरक्षण सिद्धान्त कार्य करेगा. बारिश और बर्फीले तूफानों द्वारा हिमालय को पुनः सुरक्षित और जैव सम्पदा का धनी बनाने की प्रकृति कवायद करेगी. लेकिन प्रकृति के विरूद्ध चल रही परियोजनाओं का खामियाजा सबसे अधिक पहाड़ों से घिरी निचली कश्मीर घाटी और हिमालय से निकलती पाँच नदियों के देश पाकिस्तान की बहुसंख्यक आबादी को ही झेलना है।

 हिमांचल का हिमपात, चीन की भयंकर बाढ़ें, उत्तराखंड में बादलों का फटना, नेपाल का भूस्खलन और बिहार में पहाड़ों से छूटा पानी मानवता को व्याकुल करेगा और उन्हें सुरक्षित स्थान पर जाने पर मजबूर करेगा।

 अब इसके बाद पूर्वी भारत के समुद्र में बनने वाले दाब से बांग्लादेश और तटीय भारत में चक्रवातों का प्रकोप होगा। वर्षा के असमान वितरण से मराठवाडा और मध्य भारत तो सूखे रहेंगे लेकिन मैदानी इलाकों में बेमौसम वर्षा कृषि को गंभीर क्षति पहुंचाएगी। उत्तर भारत का मैदानी इलाका लगभग मानव जीवन को बचाने में कारगर होगा इसी वजह से यहाँ जनसंख्या भार बढ़ जाएगा परंतु सीमित संसाधनों की छीना झपटी में मानवीय अपराधों की बढ़ोत्तरी का मूक गवाह भी बनेगा।

 

हे भारतीय उप महाद्वीप के राष्ट्राध्यक्षों, धर्मज्ञों, राजनीतिज्ञों, मीडिया दिग्गजों और कार्पोरेटरों अपनी संकीर्ण अभिलाषाओं को छोड़ इस जीवित धरा को बचाने के प्रयास में लग जाओ।

दो सालों के अंदर ही हमें प्राकृतिक संकेतों के आधार पर उपाय स्थापित करने होंगे अन्यथा दस साल होते होते हम इस धरा से सत्तर प्रतिशत मानव को खो देंगे। धर्म, सीमाओं और विभिन्नताओं में उलझे पूर्वजों को छोड़ भविष्य की पीढ़ी को सुरक्षित करना वर्तमान पीढ़ी का मुख्य कर्तव्य है। बहुत तेजी से हमें सरोवर, झील, तालाबों, बावड़ी, नहरों आदि का प्राकृतिक ढालों के अनुरूप विस्तृत निर्माण करना होगा जहां ये वर्षा का पानी पुनः धरती के भीतर पहुँचा सकें. सम्पूर्ण भारत में जल विज्ञान की चिरंजीवी प्राचीन भारतीय तकनीकी का प्रयोग करना होगा. विश्व के अन्य देशों में तबाही दूसरी तरह की होंगी अर्थात वायु, बर्फ और मृदा के जरिए लेकिन भारत में वर्षा अर्थात जल की तबाही होगी क्योंकि सभी तरह के विक्षोभों को थाम कर वृष्टि कराने वाला हिमालय मस्तक ताने खड़ा है। प्रकृति संकेत दे रही है की हमारी संरचनाओं और छोटे पौधों की भीषण खेती की वजह से जिन बड़े जंगलों के साथ अन्याय हुआ था अब उसकी भरपाई करने के लिए कमर कस चुकी है। हमें प्रकृति के साथ तालमेल बिठाता हुआ विकास करना होगा न की उसके विरुद्ध, वरना उसके अगले संस्करण में वो और शक्तिशाली प्रहार करेगी। 

बड़ेदीर्घायु स्थानुकूल वृक्षों का भूमि पर आच्छादन करना होगा, प्रत्येक घर में सुविधानुसार क्यारी अथवा लताओं वाली सब्जियों को स्थान देना होगा और पर: कृषि पर निर्भरता को कम करना होगा. औद्योगिक प्रतिष्ठानों के लिए वर्तमान में प्रयोग की जा रही भूमि पर ही बहुमंजिला इमारतों का निर्माण करना होगा, भारत के सड़कों के जाल और रेलवे ट्रैकों के दोनों किनारों को व्यवस्थित ढाल देकर एकीकृत जल प्रणाली के तहत नहर नुमा जाल बिछाना होगा और उन नहरों के दोनों और विशाल वृक्षों की जैव संरक्षित पट्टी का निर्माण करना होगा…  ये नहरों और वृक्षों की सघनता न केवल गाड़ियों की घर्षण से उड़ती धूल जनित फेफड़ों के रोगों को कम करेंगी वरन वायु प्रदूषण को जन्म देती विषैली गैसों के प्रभाव को भी लगभग खत्म कर देंगी साथ ही साथ भूजल बढ़ोत्तरी, कृषि जल उप्लब्धत्ता, जैविक श्रंखला संरक्षण और अचानक भारी वर्षा जल को दिशा देकर समान वितरण करते हुये बाढ़ की विभीषिका को कम करेंगी। 

 

हिमालय से लेकर सागर तक हम भारतीयों को पुरातन प्राकृतिक विज्ञान का अध्ययन करते हुये समग्र विकास करना होगा।

 

ये कुछ सबसे सरल लेकिन दृढ़ निश्चय की बाट जोहते उपाय हैं, जिन्हें वर्तमान मानव अपनी संतति की रक्षा हेतु कर सकता है,

और विश्व के इस सबसे अद्भुत नैसर्गिक जीवित भारतीय उप महाद्वीप को युगों युगों तक अमर रख सकता है।

 

 

वन क्रांति – जन क्रांति

 

           

राम सिंह यादव (कानपुर, भारत) 

yadav.rsingh@gmail.com

http://theforestrevolution.blogspot.in

 

 

 

 

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