रपटः लेखनी सानिध्य /अक्तूबर-नवंबर 2015

         लेखनी- सोच और संस्कारों की सांझी धरोहर

March 2007

(अंक-1-वर्ष-1)

LEKHNI-MARCH-2007 (FIRST ISSUE)

Celebrating Womenhood

संरचना व संपादनः शैल अग्रवाल

लेखनी की शुरुवात 17 मार्च 2007 को सटन कोल्डफील्ड में हुई थी और लेखनी सानिध्य  परंपरा की शुरुवात 15 मार्च सन 2012 को मां गंगा की गोद में, गंगा की लहरों पर वाराणसी में। जी हाँ वही तीन लोक से न्यारी काशी, जहाँ कभी मैं जन्मी, पली और बढ़ी थी। जिसने मुझे शिक्षित किया। संस्कार दिए। वही कबीर, तुलसी प्रसाद और प्रेमचन्द का शहर। प्राचीन होते हुए भी अर्वाचीन। एक शहर जिसके ऋण से उऋण होना आसान नहीं है मेरे लिए। कहते हैं विश्व के पुरातम शहरों में से एक है बनारस। धारणा तो यह भी है कि आदि पुरुष शिव के त्रिशूल पर बसी है काशी, इसी लिए तीन लोक से न्यारी है और अक्षय व अक्षुण्ण है। ज्यों-कि-त्यों है सारी संस्कृति, कला और फक्कड़ मस्ती के साथ, लहलहाती गंगा मां के आंचल में सुरक्षित और सदा नीरा।

राग वैराग का अनूठा समिश्रण है यह- तभी तो यहाँ के पान भी उतने ही मशहूर हैं जितने कि शमशान …गंगा किनारे एकतरफ आरती के घंटों की गूंज सुनाई देती है तो दूसरी तरफ गीत और ठुमरी की। कला और कलाकारों की ही मिट्टी है इस धरती की।

दूसरा लेखनी सानिध्य सटन कोल्डफील्ड में घर पर आयोजित था और तीसरा इसी गीता मंदिर में कृष्ण की बांसुरी और गीता की छाँव में।

ठीक भी है, यदि बनारस में जिन्दगी के पहले बीस वर्ष जिए, तो बरमिंघम में उससे दुगने समय से रह रही हूँ । उतनी ही आदत पड़ चुकी है अब तो इसकी भी। उतना ही अपना है यह भी। हम भारतीय और साउथ एशियन लोगों ने भलीभांति स्थापित कर लिया है खुद को इंगलैंड के लंदन, बरमिंघम, लेस्टर मैनचेस्टर आदि मुख्य शहरों में। अपनों से दूर, अनजाने वतन में घर बनकर गोदी में बिठाया है इन्होंने हमें। आप सभी, अपने दिए हैं। जीवन की कई लड़ाइयाँ जीती और हारी हैं हमने यहाँ। लेखनी पत्रिका की शुरुवात भी तो इसी शहर से की थी मार्च 2007 में। अपनी बात सीधे आपतक पहुंचे, इसी उद्देश्य से आठ वर्ष पूर्व 17 मार्च 2007 को पहला अंक एक सपना बनकर किलका था इंद्रजाल पर । और तबसे आजतक आपकी लेखनी पत्रिका विभिन्न विषयों पर 90 से अधिक विशेषांक निकाल चुकी है। हर विषय अनूठा और संग्रहणीय। प्रिंट माध्यम से निकालने का पाठकों का बढ़ता अनुरोध जो पहले इक्का दुक्का था, बढ़ता ही जा रहा है। मांग सुख तो देती है और उत्साह वर्धक भी है, पर संभव है भी या नहीं, भविष्य ही बता पाएगा। अभी तो बस दो संस्कृतियों के समिश्रण से उठी इसकी यह अनूठी सुगंध विश्व एकता की संस्कृति फैलाए, जन्मभूमि और कर्मभूमि दोनों का नाम रौशन करे यही कामना और प्रयास रहा है। आगामी पीढ़ी के भ्रम और भय, व एकाकी प्रवासी के क्लेश और द्वेश को दूर करने का एक बेहद लघु प्रयास है लेखनी। आवाहन है कि आप भी अपनी सृजनधर्मिता के साथ जुड़ें। बूँद-बूंद जुड़ती हैं तभी तो लहर उठती है। और ये उठती लघु लहरें ही तो हैं जो पत्थर का सीना चीरकर फूटती हैं। नदी- नहर बनकर सींचती-संवारती हैं हमें, जीवन देती हैं। इनकी ताकत को कैसे हम नकार सकते हैं। अपनी ही लिखी दो पंक्तियाँ याद आ रही हैं-

 

“ बूंद बूंद जो उठी लहर संयम टूटे किनारों के

लहर लहर जब उठी लहर, राहें नई ढूंढ लाई। “

 

 

11 अक्तूबर को गीता मंदिर का पावन परिसर था और आयोजन था लेखनी के चौथे सानिध्य व कवि-सम्मेलन का। वर्षों पहले -सदा भवानी दाहिनी, सम्मुख रहें गणेश। पांच देव रक्षा करें बृह्मा विष्णु महेश।। श्वसुर जी द्वारा आशीर्वाद स्वरूप दिए इस श्लोक के मंत्रोच्चार के साथ जो जाने किस दैवीय शक्ति के वशीभूत स्वतः ही जिह्वा पर था, सभी देवताओं और पितरों को प्रणाम करते हुए, अपने शहर में, अपनों के बीच मैंने लेखनी सानिध्य के इस बहु-प्रतीक्षित कवि-सम्मेलन का आगाज किया । बहु प्रतिक्षित इसलिए कि कार्यक्रम मार्च में होना था पर स्वास्थ संबंधी कुछ परेशानियों और अस्पताल के कई अपौंइंटमेंट्स के रहते अक्तूबर तक खिसक गया। फिर निर्धारित किया तो बस यूँ ही भारत से आई मित्र के साथ फोन पर बात करते हुए जिन्हें अगले दिन यानी 12 अक्तूबर को भारत लौटना था और हमें 14 अक्तूबर को बल्गेरिया । आनन-फानन ही सब तैयारियाँ हो गईं और एक खूबसूरत कवितामय दिन की अपेक्षा के साथ गीता मंदिर के पावन परिसर में एकत्रित थे हम काव्यप्रेमी। हमारा सौभाग्य था कि स्वनाम धन्य कई कवि मौजूद थे उसदिन इस सानिध्य में, ( सिवाय उनके जिनके आग्रह पर बेहद जल्दी में मैंने आयोजित किया था इसे) जो ब्रिटेन के विभिन्न शहरों से आए और ब्रिटेन में हिन्दी के सशक्त हस्ताक्षर हैं। इतने चांद सितारों को एकसाथ वह भी दिन में, दोपहर के वक्त एकसाथ देखकर मन और वाणी दोनों ही विह्वल थे।

शीघ्र ही नव रात्रि शुरु हो रही थी, जब जीवन में नव शक्ति के संचार के लिए हम नव दुर्गा के नौ रूपों का आवाहन करते हैं और वहाँ तो भिन्न-भिन्न शक्ति और गुणों से संपन्न कई नारी शक्तियों उपस्थित थीं। हमने सभी की शुभकामना के साथ ज्ञान दीप इन्ही से प्रज्वलित कराया। कंउसलेट जनरल के साथ चार विभूतियों-लेफ्टिनेंट जनरल श्रीमती सतिंदर टांग, लेबर पार्टी की कांउसलर जाकिया जुबेरी, बरमिंघम की बहुभाषी संस्था के संपादक कृष्णकुमार की पत्नी चित्रा कुमार और लंदन से पधारी डाइनैमिक कवियत्री और ब्लौगर शिखा वाष्णेय ने जब पंचमुखी ज्ञान दीप को प्रज्वलित किया तो पूरा परिसर ही गरिमा से आलोकित था। अब बारी थी मंदिर के औजस्वी पंडित धर्मदत्त जी की जिन्होंने मंत्रोचार के साथ मां सरस्वती का आवाहन किया और हमें अपना आशीर्वाद दिया।

भारत से बाहर , भारतीय दूतावास हमारी उपेक्षाओं और आकाक्षाओं का पहला संपर्क सूत्र रहता है। परिवार के मुखिया का रिश्ता बन जाता है हर भारतवंशी का इसके साथ। इनका वरद् हस्त हमें सुरक्षा और आत्मबल देता है । अपनेपन का अहसास और आश्वासन देता है। हमारे आग्रह पर काव्य गोष्ठी की अध्यक्षता की माननीय कांउसलेट जनरल जितेन्द्र कुमार शर्मा जी ने। सरस और नदी से कलकल बहते संचालन का भार संभाला एकबार फिर प्रिय मित्र और अनुज अजय त्रिपाठी जी ने।

ओपनिंग बैट्समैन की पाली संभाली हमारी अपनी बरमिंघम की वंदना मुकेश शर्मा ने जिनकी छोटी-छोटी कविताएं कार्यक्रम को शुरु में ही श्रोताओं को संवेदना की मनोरम ऊँचाइयों पर ले गईं । कार्यक्रम में कविताएँ विविध रस की गंभीर और मनोरंजक, सभी तरह की थीं जिन्होंने अंततक श्रोताओं को बांधे रखा। चाय पर लिखी मिसेज सिन्हा की कविता ने और कृष्ण कन्हैया जी की जन्मदिन पर लिखी कविता ने व आनंद सिन्हा की पत्नी पर लिखी कविता ने पाठकों को खूब हंसाया। वंदना मुकेश, शिखा वाष्णेय, अजय त्रिपाठी , मेरी, शील निगम, कृष्णकुमार आदि सभी कवियों की कई कविताएं रोमांटिक थीं तो कई सोचने पर मजबूर करती हुई। गीत और गजलों का अलग ही समां बांधा नरेन्द्र ग्रोवर, तेजेन्द्र शर्मा और उषा राजे सक्सेना जी ने अपनी भावपूर्ण गजलों द्वारा। गेय रूप में या सपाट बयानगी के रूप में, मन को बाँधने और साधने का हुनर सभी कवियों ने अंत तक बखूबी निभाया। मानो एक अदृश्य सोजभरी उर्जा बह रही थी हमारे बीच।

वैसे तो किसी भी बहती धारा को रोकना टोकना अच्छा नहीं, ना ही संभव फिर भी आमंत्रित कवियों ने खुद ही ध्यान रखा और तीन घंटे की निर्धारित समय सीमा के अंदर ही न सिर्फ श्रोता विभिन्न रसधार में भरपूर डूबे, भीगे व उतराए, अपितु पल भर को भी भटकने या ऊबने का मौका नहीं मिल पाया उन्हें। मंच और परिसर के बीच लगातार एक मनोरम तारतम्य बना रहा। सुमधुर काव्य धारा कहीं भी बाढ़ या सुनामी नहीं थी। सभी को मौका मिला और सभी ने इस अजस्त्र काव्य रसधारा का जी भरकर आस्वादन किया। परिसर से आकर कार्यक्रम के अंत में रेडिओ एक्सेल के आनंद जी और वालसाल की रीना गुर्टू ने भी पाठकों तक अपनी रचनाएँ पहुँचाईं।

सभी की कविताएँ सरल व सुपाच्य थीं। या फिर कहूँ कि कवियों ने हृदय के करीब रचनाओं का पाठ किया और कार्यक्रम समाप्त होने के बाद भी कविताओं की गूंज श्रोताओं के साथ रही।

नीरज जी ने कहा था- मानव होना भाग्य है , कवि होना सौभाग्य।हमारा सौभाग्य ही था कि कई स्वनाम धन्य कवि मौजूद थे, जो ब्रिटेन के विभिन्न शहरों से आए। ब्रिटेन में हिन्दी के सशक्त हस्ताक्षर हैं। इतने चांद सितारों को एकसाथ वह भी दिन में, दोपहर के वक्त देखकर मन और वाणी दोनों ही विह्वल थे।

लंदन से- शिखा वाष्णेय, तेजेन्द्र शर्मा, जाकिया जुबेरी और उषा राजे सक्सेना।

मैनचेस्टर से शील निगम । हल से डॉ. राम आसरे सिंह। नौटिंघम से जया वर्मा और मिसेज सिन्हा। वूवरहैम्पटन से नरेन्द्र ग्रोवर और दलजीत कौर।

बरमिंघम से वंदना मुकेश शर्मा, कृष्ण कन्हैया, डा. कृष्ण कुमार, अशोक शर्मा, सतिंदर टौंग, दलजीत कौर, अशोक सिन्हा, अजय त्रिपाठी और खुद मैं । सभी द्वारा पढ़ी गई कविताओं का संकलन तो संभव नहीं पर फिर भी भारत से प्राप्त अन्य कविताओं के साथ कई इस अंक में टंकित हैं। उम्मीद है आपको प्रस्तुति पसंद आएगी।

अंत में धन्यवाद देना चाहूँगी एकत्रित सभी मित्र और श्रोताओं का जिन्होंने रस लेते हुए बेहद धैर्य और तन्मयता से हमें सुना। कुछ नाम जिनके बिना धन्यवाद अधूरा है-रश्मि मानसिंह, सतिंदर टांग, अजय त्रिपाठी, धर्मदत्त जी और गीता मंदिर के सभी स्वयंसेवी भाई बहन, जिन्होंने सदा बड़े उत्साह के साथ हमारी मदद की है। अन्नपूर्णा बन हमें दोपहर का भोजन परोसा है। और आप सभी मेरे अपने जो ब्रिटेन के कोने-कोने से आए। आभारी हूँ उन सभी की जिन्होंने बेहद अपनापन और स्नेह दिया। मेरा जन्मदिन नहीं था फिर भी तोहफे लाए, अस्वस्थता के रहते हुए भी आए। तहेदिल से आभारी हूँ आपके इस स्नेहमय सौहाद्र की, अपनेपन की। गलतियाँ भविष्य में दोहराएँ न इसलिए बहुत कुछ सीखा भी इस दिन। विलंब के कई कारण तो अपरिहार्य थे पर कुछ को भविष्य में बेहतर और सुचारु किया जाएगा। कार्यक्रम की अनचाही विलंबित शुरुवात थी, तो अंत में दूर से आए कवियों को जल्दी तो होनी ही थी। रेल और बस आदि के छूटने का अंदेशा जो था। लोगों ने उठना शुरु कर दिया। जैसे तैसे साधा। काउंसलर जनरल जो अध्यक्षीय वक्तवय के लिए पूरे प्रोग्राम में साथ साथ टिप्पणी लिख रहे थे, उन्हें लगा कि अब उनके लिए भी वक्त नहीं हमारे पास। उनके आशीर्वचन और विचार नहीं सुन पाए इसका दुख रहेगा।

सभी अपने थे और जब स्नेह एक हवा, एक खुशबू की तरह तैर रहा था चारो तरफ तो इन छोटी-मोटी परेशानियों से परेशान होना व्यर्थ था। जाने से पहले एक प्यार भरा सरप्राइज था मेरी तरफ से। भाई जगजीत टौंग 11 अक्तूबर को ही अपना जन्मदिन मना रहे थे। पूछने पर कि कौनसा है, हंसकर कहते- इक्कीसवाँ, with wear & tear. भाई तेजेन्द्र का जन्मदिन भी आगामी 21 अक्तूबर को था। जब परिवार में दोहरे जन्मदिन हों तो सेलिब्रेशन केक तो कटना ही था । केक आया, पर कैंडल घर पर छूट गईं। फिर भी केक कटा और प्यार से कटा। उसके बाद ही हमने समोसे, गाजर का हलवा और बनारसी चूड़ा मटर आदि व्यंजनों का गरमा-गरम चाय के साथ आनंद लिया।

सात बज चुके थे और एकबार फिर वही विदा की कठिन वेला थी जब वह खूबसूरत दिन समापन की ओर बढ़ रहा था। सात बजे ही मंदिर में शाम की आरती भी होती है। कितनी भी जल्दी हो, हममें से कइयों ने श्रद्धापूर्वक आरती ली और फिर उसके बाद ही, भाव भीनी यादों की गठरी व कार्यक्रम की चन्द तस्बीरों के साथ अगले वर्ष की प्रतीक्षा और शुभकामना में डूबे हँसते-मुस्कुराते अपने-अपने घरों की तरफ पलट पाए ।

 

चित्र वीथिकाः

 

 

 

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