अपनी बातः शैल अग्रवाल

 

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लौटना एक नैसर्गिक आदत है।

 

पक्षी, मानव सभी लौटते हैं कभी जरूरत से तो कभी चाहत से, जैसे कि हम लौटे हैं सैकड़ों मुश्किलों के बाद भी लेखनी के इस अंक को लेकर । पर जो  छूटा, क्या  उस रूप में कभी वापस  मिल पाता है, क्योंकि हाथ में न तो कल था ना ही आनेवाला कल है…और इस आज का तो प्रवाह ही सदा इतना तेज रहा है कि जबतक पकड़ने के लिए हाथ बढ़ाओ, कल बन जाता है!

जरूरत में तो इन्सान हर समझौता कर लेता है, सब स्वीकार लेता है पर जब चाहत, स्मृति या मात्र जिज्ञासा-ऐसी किसी भी वजह से  लौटते हैं, तो अपेक्षाएं इतनी अधिक रहती हैं कि बदले हुए वर्तमान से प्रभावित यथार्थ को देखकर प्रायः निराशा ही हाथ लगती है और फिर शुरु होती है क्षोभ और असंतोष से उत्पन्न कुछ बदलने की चाह, कुछ सुधारने की मांग, अतीत से जुड़े रहने की हसरत और परिस्थितियों पर खरे उतरने की जद्दोजहद, पर जब कुछ भी स्थाई ही नहीं तो क्या यह संभव भी है ? क्यों लौटना हमेशा दुखदायी ही है जैसा कि राम , कृष्ण , गांधी, जैसे महात्माओं तक के साथ हुआ! सीता के साथ हुआ। अनन्य प्रेमी राधा और कृष्ण के साथ हुआ, विश्व में हर उस देश और सभ्यता के साथ हुआ जिसने आज से मुंह मोड़कर बारबार अतीत में ही लौटना चाहा; धर्म की लड़ाई के नाम पर या फिर आदर्श राष्ट्र के सपने के नाम पर, वजह चाहे जो भी हो परन्तु नतीजा विभ्रम और क्षोभ ही रहा है।

वक्त के यादगार लमहे हों या फिसलता जीवन, ये वो महकते फूल हैं जिनकी पत्तियाँ एकदिन भुरभुराकर झरेंगी ही, चुटकियों में यूँ ही चन्द महकती स्मृतियाँ छोड़कर और हम फिर-फिर के पूर्णतः सम्मोहित हुए बारबार इसी तिलिस्म में फंसेगे, लौटते रहेंगे, बिल्कुल जीवन और मृत्यु की तरह, पुनर्जन्म की तरह…आखिर वक्त खुद भी तो एक जादू ही है। प्रेम या दुख की तरह बनाता और बिगाड़ता है, कभी धोखे से तो कभी सम्मोहन से, थिर नहीं रहता कहीं और किसी के लिए भी…

अब इन्हें मील के पत्थर कहें या फिर स्मृतियों का संग्रहालय या फिर अतीत के अस्थि कंकालों के उद्धार के लिए गंगावतरण या फिर मात्र संग्राम स्थली या कर्म भूमि…वजह कोई भी हो लौटना स्वेच्छा से हो या मजबूरी में, पर लौटते तो हम हैं ही।… चाहे हंसे या रोएं, पर्यटन का नाम दें या तीर्थ का, उत्सव का या सुख-दुख के साझे का… जीवन निकल जाता है इन फिसलती परछांइयों के पीछे दौड़ते-दौड़ते।

जैसे कि घटाएँ लौटती हैं मरु पर, अनबुझ प्यास तपन पर, या फिर बरसों का छूटा करीब-करीब अनजान हो चुका परदेसी वापस अपने घर पर, अबकी यह अगस्त-सितंबर का अंक इसी लौटने पर है…लौटना सावन का , हरियाली का, धागों में बंधे रिश्तों के पर्वों का, देशप्रेमियों के सपनों का , नई नई उम्मीदों का। यह भी एक इत्तफाक ही है कई कठिनाइयों और ढाई तीन महीने के विराम के बाद आपकी लेखनी भी आप तक लौट रही है एक नए रूप और सज्जा में, वह भी देश के स्वाधीनता दिवस पर। स्वतंत्रता पर्व और आगामी जन्माष्टमी की लेखनी के सभी पाठकों को अशेष शुभकामनाएँ। उम्मीद है अंक पसंद आएगा। आपकी प्रर्तिक्रियाओं का हमें इंतजार रहेगा..

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