कविता में इन दिनोः ओम निश्चल अक्तूबर / नवंबर 2014

कविता में इन दिनों: पुष्‍पिता अवस्‍थी

Pushpita Awasthi

पुष्‍पिता अवस्‍थी अब तक अपनी सुकोमल कविताओं से जानी जाती रही हैं। अक्षत, शैल प्रतिमाओं से, तुम हो मुझमें आदि संग्रहों की कविताएं इसका प्रमाण हैं। किन्‍तु हाल में प्रकाशित उनके नए कविता संग्रह ”शब्‍दों में रहती है वह” से उनका मिजाज कविता में बदला है तथा उसमें वैश्‍विक प्रतीतियों की आमद दीख पड़ती है। विश्‍व के अनेक देशों का भ्रमण कर चुकीं पुष्‍पिता अवस्‍थी की कविताओं में केवल विश्‍व का भूगोल ही व्‍यापक होता हुआ नहीं दिखता बल्‍कि उनकी चिंता का क्षेत्र भी सुविस्‍तृत होता है। भौगोलिक विविधताओं के बावजूद कैसे मनुष्‍य का मन लगभग एक-सा होता है इन कविताओं में इसकी प्रतीति की जा सकती है। किन्‍तु यह प्रतीति भी बिना विश्‍व मैत्री के संभव नहीं है। ”शब्‍दों में रहती है वह” में पुष्‍पिता का कवि-मन वैविध्‍यपूर्ण जीवनानुभवों से गुज़रता है तथा तब यह जान पाता है कि स्‍त्री कहीं भी हो, उसके हालात एक-जैसे हैं : ‘औरत की देह ही/ औरत का ताबूत है/ जिसे वह जान पाती है—उम्र ढलने के बाद/ जीवन भर एक ही यात्रा/भौतिक ताबूत से दैहिक ताबूत तक।’

 

पुष्‍पिता के कवि-जीवन में यह एक बड़ा परिवर्तन हैं। यद्यपि जो लोग उनकी कोमलकांत पदावलियों के अभ्‍यासी हैं, उनके लिए यह परिवर्तन तनिक खटक सकता है क्‍योंकि इसमें वाजिब स्‍थूलता भी है और कहीं कहीं जीवन के भावबोध से गुजरने का सूक्ष्‍म अहसास भी। पर पुष्‍पिता कविता को अंत तक बिखरते बिखरते सम्‍हाल लेना जानती हैं ।

 

‘लेखनी’ के इस स्‍तंभ के अंतर्गत नंद किशोर आचार्य, अरुण कमल, वर्तिका नंदा, भगवत रावत, विनोद कुमार शुक्‍ल, ओम भारती, प्रतापराव कदम, संजय कुंदन, तजिन्‍दर सिंह लूथरा,ज्ञानेन्‍द्रपति, नरेश सक्‍सेना, अशोक वाजपेयी, एकांत श्रीवास्‍तव,सवाईसिंह शेखावत, सविता भार्गव व लीलाधर जगूड़ी,प्रभात त्रिपाठी,अरुण देव, सविता सिंह, ज्‍योति चावला, पवन करण, मंगलेश डबराल व यतीन्‍द्र मिश्र के  पुष्‍पिता अवस्‍थी के इसी साल प्रकाशित संग्रह ‘शब्‍दों में रहती है वह’ पर ओम निश्‍चल का आलेख : वैश्‍विक चिंता का वितान।

 

 

कविता संग्रह

वैश्‍विक चिंता का वितान

ओम निश्‍चल

 

शब्‍दों में रहती है वह

कवयित्री:पुष्‍पिता अवस्‍थी

किताबघर प्रकाशन,24,?????????????????

कविताओं में प्राय: प्रेम की पुलकित वसुंधरा का आख्‍यान रचने वाली पुष्‍पिता अवस्‍थी हिंदी की सुपरिचित कवयित्री हैं जिन्‍होंने प्रवास में रहते हुए भी अपने भीतर भारत की माटी-सरीखी संवेदना और वैश्‍विक चिंता की अनुभूतियों को खूबी से सिरजा है। वे सूरीनाम में रहीं तो सूरीनामी गंगा को काशी की गंगा-सरीखा मान दिया और इन दिनों नीदरलैंड में रह रही हैं तो वहां की प्रेमपगी धरती को अपने भीतर रचा बसा रखा है। वे विश्‍व के अनेक देशों में यायावरी करती हुई अंतत: जिस चिंता और संवेदना के कंधे पर अपना सिर टिकाती हैं और रचना के करघे पर वे जो कुछ रचती बुनती हैं वह अंतत: उनकी आत्‍मा की ही उपज है। उनकी कविताओं में स्‍त्री का अनुराग भरा चित्‍त प्रतिबिम्‍बित होता है तो वह भारतीय विवृति भी जो समूची वसुधा को अपना नीड़ मानती आयी है। शब्‍दों में रहती है वह संग्रह से पुष्‍पिता अवस्‍थी ने यह जताने की चेष्‍टा की है कि वे विश्‍व को अपनी कवि-आंखों से निरखती परखती हुई धरती के सौंदर्य को अपनी कविताओं में अक्षुण्‍ण रूप में सहेज लेना चाहती हैं।

दरअसल, भारतीयों के लिए जो विदेश है, पुष्‍पिता के लिए वह विदेश भी स्‍वदेश सरीखा है—आत्‍मीय और अपना। विदेश में भी अपनी पहचान रचने की प्रक्रिया में ही वे शब्‍दों में प्रवेश करती हैं। पूरी आत्‍मीयता के साथ उनका अपनापन कविताओं में धड़कता है। उनकी कविताओं की संरचना लालित्‍य के प्रत्‍ययों से निर्मित होती है और अक्‍सर किफायतपरस्‍त उनकी कविता के पीछे एक चुप्‍पी सी छाई रहती है। लेकिन उनका मौन मुख होता है। वे अपने अर्थ खुलने पर बोलती हैं—चुप चुप सी रहती हुई। वे अनायास ही नहीं कहतीं: शक्‍तियां चुपचाप जन्‍म लेती हैं/ और अपनी चुप्‍पी में ही पैदा करती हैं –शक्‍ति। विश्‍वनाथ प्रसाद तिवारी ने प्रकृति को देवता का काव्‍य कहे जाने का उल्‍लेख करते हुए पुष्‍पिता की कविताओं में प्रकृति प्रेम की तसदीक की है। अपनी विश्‍व यायावरी के दौरान देश के कोने-अँतरों का भ्रमण करते हुए पुष्‍पिता ने प्रकृति को कहीं चित्रकार की तरह तो कहीं प्रकृति के लोकगायकों की तरह तो कहीं वहीं के बाशिंदें की तरह उसे उकेरा है। अपने शब्‍दों के अँकवार में समेटा है। यथा अमर इंडियन परिवारों के बारे में उनका एक कवितांश देखिए —

सघन घन-बीच

मछली-सी बिछलती तैरती

जंगली मानसूनी बरसात पीकर जीवन जीती नदियों में

अपने जीवन की कटिया डाले हुए जीती है बन जाति। (जंगल जग के मानवप्राणी)

 

ब्राजील के जंगलों का यह दृश्‍य है तो यूरोप के तीन देशों के संधिस्‍थल इटली,फ्रांस और आस्‍ट्रिया पर स्‍थित नाउदर्स गांव का चित्र उकेरती हुई वे लिखती हैं—

नाउदर्स के पेड़ों में

फलों की तरह लदी रहती हैं चिड़ियॉं

जो अपने नीड़ बनाती हैं —होटलों के गोखों और छत-ऊपर

जंगल की प्रमुख नागरिक हैं मधु मक्‍खियां

मौका पड़ते ही झपट लेती हैं पर्यटकों पर

नाउदर्स निवासियों का गोपालन

और होटल सेवा प्रमुख जीवन साधन (नाउदर गॉंव)

 

यहॉं कथा, कोमो झील, झील का अनहद नाद, स्‍नो बेल्‍स(बर्फ की घंटियां), नर्सेस,-आत्‍मरति, ब्राजील की रियो नीग्रो जैसी प्रकृतिपरक गहरी संवेदनशील कविताएं हैं तो त्रिनिदार और टुबैगो, सेंटलूशिया तथा अंजोरे द्वीप पर कविताएं लिख कर उन्‍होंने अंतलांतिक महासागर और कैरीबियाई सागर के इन द्वीपसदृश उतराते हुए द्वीपों का साक्षात दर्शन ही प्रस्‍तुत कर दिया है। दरअसल दो तीन वर्ष पूर्व प्रकाशित संग्रह ‘शैल प्रतिमाओं से’ (डच-अंग्रेजी-हिंदी) में प्रकाशित ‘पृथ्‍वी’ कविता में कवयित्री ने पृथ्‍वी को उस अकेली औरत के रूप में देखा है जो जीने का दुख चुपचाप सह रही है। इधर पृथ्‍वी पर तरह तरह के खतरे बढ़े हैं। ग्‍लोबल वार्मिंग, प्रदूषण, एक और महायुद्ध की तरफ बढ़ती हुई महाशक्‍तियां और जलसंकट। इस चिंता का वितान वैश्‍विक है जिसमें प्रकृति और उसके सारे उपादान समाहित हैं। पृथ्‍वी, स्‍त्री , बच्‍चे पुष्‍पिता की प्रकृति के प्राणतत्‍व हैं। इसी में सृष्‍टि है….संवेदनाएं हैं, प्रेम है पीड़ा है। हर्ष और विषाद है। सुख है, सुख के स्‍वप्‍न हैं। मन के श्रृंगार का रचाव है, आत्‍मा के आनंद का व्‍याख्‍यान है। संग्रह में भ्रमण के परिभ्रमण का चाक्षुष आह्लाद है, जीवन और जगत की गूँज है, संवेदना की राग-रागिनियां हैं और उदासियां भी। शब्‍दों के प्रति आस्‍थावान कवयित्री शायद इन्‍हीं तत्‍वों से तादात्‍म्‍य महसूस करती है।

प्रकृति से तादात्‍म्‍य के साथ साथ पुष्पिता की कविताओं का जीवन और विश्‍व की वैचारिकता से संश्‍लिष्‍ट रिश्‍ता है। वे विभेदकारी और विभाजनमूलक विचारों को कौतुक से परखते हुए सृजन और निर्माण के लिए प्रतिश्रुत दिखाई देती हैं। उन्‍हें यह दुखद लगता है कि कोई हमेशा भीतर से छीनता रहता है, इंसान का अपनापन जो हमेशा उसका अपना घोंसला है। पुष्‍पिता अवस्‍थी ने इन कविताओं में विदेशी धरती के मानवीय प्रसंगों को पूरी संजीदगी से समेटा है। यहां अश्‍वेत शिशु के जन्‍म पर मॉं का संतोष है तो ‘पेट भरो की भूख’ में दुनिया की अमिट भूख का एक लोमहर्षक जायज़ा भी। वे जगह ब जगह भारतवंशियों की पीड़ा का आख्‍यान लिखते हुए यह भूल नहीं जातीं कि सूरीनाम और हालैंड जैसे देशों का नख-शिख भारतीय मजदूरों ने अपने श्रम और पसीने से सँवारा है। एक ओर मकबूल फिदा हुसैन की चित्रकारी तो दूसरी ओर जाकिर हुसैन की तबलावादिकी का हुनर उनकी कविता में गूँजता है। यूरोप की साइकिल की महिमा का गान है तो फुटबाल खेल की विरासत का वैभव है। मॉं की लेगेसी है तो स्‍त्री का इंद्रधनुष भी भूमंडल के चतुर्दिक उनकी कविताओं के माध्‍यम से अनुभव होता है। गर्भ की उतरन में स्‍त्री होने की व्‍यथा दज्र है। पाश्‍चात्‍य और दक्षिण एशियाई देशों के युवाओं के लिए उभर रही दासता दबोच के तेवर हैं। ब्राजील की रियो नीग्रो नदी की श्‍यामाभा है तो न्‍युजीलैंड की माओरी जाति(अमर इंडियन)की धड़कती दास्‍तान है। प्रणयगर्भी कविताओं में उनके मन का ब्रह्मांड है। नवातुर गर्भिणी स्‍त्री के आह्लाद का अद्भुत उन्‍माद है। आल्‍पस संवाद कविता को पढते हुए कोई भी पाठक स्‍वयं को आल्‍पस से संवाद करते हुए अनुभव कर सकता है।

 

अपने अनुभव और संवेदना की आंखों से दुनिया को निहारते हुए कवयित्री अक्‍सर अपनी स्‍त्री देह में लौटती है तथा तब जो महसूस करती है वह दुनिया-भर की स्त्रियों की चरितगाथा लगने लगती है। वे कहती हैं: औरत की देह ही/ औरत का ताबूत है/ जिसे वह जान पाती है—उम्र ढलने के बाद/ जीवन भर एक ही यात्रा/भौतिक ताबूत से दैहिक ताबूत तक। (ताबूत) इसी तरह वह एक ग्रेवयार्ड से गुजरते हुए सोचती है: ‘चलती हुई कारों के उस पार/मृतकों का ग्रेवयार्ड है/ और इस पार चलते और चलाते हुए मनुष्‍यों का जिंदा ग्रेवयार्ड।‘ उन्‍होंने अब तक के प्रवास में कैरेबियाई धरती की संवेदना को गहराई से महसूस किया है तथा औपनिवेशिक दासता के इतिहास को जैसे निकट से गुजरते हुए देखा है। कहना न होगा कि वे शब्‍दों की धातु को पहचानने वाली कवयित्री हैं और शब्‍दों की अक्षय देह में ही जैसे दुबक कर रहने में गहरे सुकून और संजीवनी का अनुभव करती हैं।

 

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डॉ.ओम निश्‍चल,

जी-1/506 ए,

उत्‍तम नगर, नई दिल्‍ली-110059

मेल: omnishchal@gmail.com

Phone 8447289976

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