परिचर्चाः ज्यां पॉल सार्त्र-सुशील कुमार

ज्यां पॉल सार्त्र जैसा चिंतक और लेखक अब विरल है।
सार्त्र का नाम तो आपने सुना ही होगा। कई मार्क्सवादी उनका नाम जानबूझ कर भी लेना नहीं चाहते या चिढ़ते भी हैं,, खैर।
बात यह है कि सार्त्र का मार्क्सवाद एक सरल स्वीकृति नहीं था। वह आलोचनात्मक दृष्टि से गढ़ा गया एक बेहद गूढ़ दार्शनिक रुख था जिसके भीतर उतरना इतना आसान नहीं है। वास्तव में वह मानते थे कि आधुनिक युग में मार्क्सवाद ही वह बौद्धिक क्षितिज है जिसे पार नहीं किया जा सकता। उनके अनुसार वर्ग संघर्ष, ऐतिहासिक भौतिकवाद और आर्थिक संरचनाएँ मनुष्य की सामाजिक स्थिति को निर्धारित करती हैं, परंतु यह दृष्टि तब तक अधूरी है , जब तक उसमें व्यक्ति की स्वतंत्रता और उसकी आत्मनिष्ठ जिम्मेदारी को शामिल न किया जाए। इसको खालिस मार्क्सवादी लोग समझना इसलिए नहीं चाहते क्योंकि वे उसके आगे जाकर सोचने से ही परहेज करते हैं। उन्होंने ने जो एक विचार- घेरा बनाया हुआ है , वहीं उनका संसार है, उससे बाहर वे जाना नहीं चाहते..फिर भी,
देखने वाली बात यह है कि अस्तित्ववाद में उन्होंने मनुष्य की स्वतंत्रता, चुनाव और प्रामाणिकता पर बल दिया और मार्क्सवादी ढाँचे से जोड़कर दिखाना चाहा कि व्यक्ति केवल ऐतिहासिक शक्तियों का उत्पाद नहीं है, बल्कि अपने निर्णयों के द्वारा वह समाज की दिशा बदलने में भी सक्षम है। इस प्रकार सार्त्र ने अस्तित्ववाद और मार्क्सवाद का संश्लेषण करने की कोशिश की, जिसे वह अपने समय की सबसे ज़रूरी बौद्धिक परियोजना मानते थे। लेकिन इस संश्लेषण में बड़ी बाधा मार्क्सवादी चिंतन की कट्टरता है जिसे हम पूर्वाग्रह भी एक हद तक मान सकते हैं।
राजनीतिक जीवन में भी ज्यां पॉल सार्त्र ने वामपंथी आंदोलनों का सक्रिय समर्थन किया। अल्जीरिया की स्वतंत्रता, वियतनाम युद्ध का विरोध और 1968 के फ्रांसीसी छात्र-विद्रोह में उनकी उपस्थिति ने दिखा दिया कि वे केवल चिंतनशील दार्शनिक नहीं थी। यहां वह हस्तक्षेपकारी बौद्धिक भी थे । लेकिन वह सत्ता-समर्थक संस्थागत मार्क्सवाद से हमेशा असहज रहे और सोवियत मॉडल की कठोरता को नकारते रहे। सोवियत आज कहां है, आपको मालूम है। गो कि किसी विचारधारा की पोंगापंथी और कट्टरता ही उसके बीज को प्रस्फुटित होने नहीं देती।
सार्त्र बीसवीं शताब्दी के उन विरल चिंतकों और साहित्यकारों में आते हैं, जिन्होंने दार्शनिकता को मात्र अकादमिक तर्क-वितर्क तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने उसे जीवन की ठोस और जटिल परिस्थितियों में लागू किया। उनके दर्शन की केंद्रीय स्थापना यह है कि मनुष्य का अस्तित्व उसके सार से पूर्व आता है।
दूसरे शब्दों में, कोई पूर्वनिर्धारित ईश्वर-प्रदत्त या दैवीय रूप से निश्चित सार मनुष्य के भीतर विद्यमान नहीं होता। मनुष्य जन्म से किसी प्रयोजन या भूमिका का वाहक नहीं है। वह इसे अपने चुनावों, निर्णयों और कर्मों के द्वारा स्वयं अपने अर्थ को रचता है। इसीलिए स्वतंत्रता ही उनके चिंतन का मूल शब्द है। मनुष्य स्वतंत्र है और इस स्वतंत्रता का बोझ अनिवार्य रूप से उसके कंधों पर है। इसी से उनके यहाँ “जिम्मेदारी” की अवधारणा आती है। जब मनुष्य स्वयं को गढ़ता है तो वह केवल अपने लिए ही नहीं गढ़ता।
इस बात को मार्क्सवादी अनुयायी समझना नहीं चाहते। लेकिन जरा सोचिए, बिना स्वयं की निर्मिति के समाज बन पाएगा क्या ?
सार्त्र ने इस प्रक्रिया में “बुरा विश्वास” या bad faith की अवधारणा प्रतिपादित की। बुरा विश्वास का अर्थ है अपनी स्वतंत्रता से भागना, अपने अस्तित्व की वास्तविक ज़िम्मेदारियों से बचना और समाज, परंपरा, धर्म या किसी संस्था के सहारे अपने निर्णयों की जिम्मेदारी टाल देना। उनके लिए प्रामाणिकता का अर्थ था अपने अस्तित्व को ईमानदारी और आत्मस्वीकृति के साथ जीना। यही कारण है कि उनका साहित्यिक और दार्शनिक लेखन हर बार यह रेखांकित करता है कि मनुष्य का जीवन किसी और के द्वारा तय नहीं किया गया, बल्कि उसे स्वयं अपने मार्ग का चुनाव करना है।
उनकी कृतियाँ जैसे Being and Nothingness या नाटक No Exit इसी गहन अस्तित्ववादी संकट और चुनाव की स्वतंत्रता की व्याख्या करती हैं।
यही दार्शनिक पृष्ठभूमि हमें उनके उस ऐतिहासिक निर्णय तक ले जाती है जब 1964 में उन्हें साहित्य के लिए नोबेल पुरस्कार घोषित किया गया और उन्होंने उसे स्वीकार करने से स्पष्ट इंकार कर दिया। यह अस्वीकार उनके मन का कोई आकस्मिक आवेग या वैराग्य नहीं था। वह तो उनके तर्क-श्रृंखला में ही गहराई से निहित था। यहां यह गौर करना चाहिए कि उन्होंने स्वीडिश अकादमी को पुरस्कार घोषणा से पहले ही पत्र भेज दिया था कि वे इस प्रकार के किसी भी संस्थागत सम्मान को स्वीकार करने के पक्ष में नहीं हैं। यद्यपि पत्र निर्णय के बाद पहुँचा और पुरस्कार उनके नाम घोषित हो गया, किंतु सार्त्र ने सार्वजनिक रूप से इसे अस्वीकार कर दिया।
क्या आज ऐसा कोई लेखक ऐसा माई का लाल है, जो इस उदाहरण को दुबारा प्रस्तुत कर सके ? भारत तो छोड़िए, पूरे विश्व में मिलना नामुमकिन है।
उन्होंने अपने वक्तव्य में साफ़ कहा था कि यह अकादमी का अपमान करने के लिए नहीं है, बल्कि उनके जीवन भर के सिद्धांत का हिस्सा है। यहीं नहीं, उन्होंने हमेशा संस्थागत सम्मानों को भी अस्वीकार किया था। 1945 में फ्रांस सरकार ने उन्हें “लीजन ऑफ ऑनर” देने की घोषणा की थी, तब भी उन्होंने मना कर दिया। उनके (नोबेल पुरस्कार के) अस्वीकार पर कोई सवाल भी नहीं उठाया जा सका ,यानी ऐसा उनका व्यक्तित्व और उनका दर्शन ही था जिसे पुरस्कारों की श्रेणियों से भी आबद्ध नहीं किया जा सका।
उनके अनुसार लेखक को किसी भी पुरस्कार या संस्था से जुड़ने का अर्थ है अपने को किसी व्यवस्था का अंग बना देना और यह स्थिति लेखक की वैचारिक स्वतंत्रता के लिए खतरनाक है। उनके ही शब्दों में: “एक लेखक को स्वयं को संस्था में परिवर्तित होने देना नहीं चाहिए।”
यह भी अनुभव किया जाना चाहिए कि सार्त्र के इस निर्णय में कोई व्यक्तिगत जिद या कोई अहंकार अथवा जुनूनी भाव नहीं था। कहना होगा कि यह उनके व्यापक दार्शनिक और राजनीतिक दृष्टिकोण से जुड़ा प्रतिपादन था। उस समय विश्व शीतयुद्ध की विभाजक रेखाओं में बँटा हुआ था। एक ओर पूँजीवादी पश्चिम था और दूसरी ओर समाजवादी पूर्व। सार्त्र का मानना था कि सांस्कृतिक आदान-प्रदान इन खेमों की संस्थाओं के माध्यम से नहीं, बल्कि प्रत्यक्ष मानव-मानव संबंधों के आधार पर होना चाहिए। नोबेल जैसे पश्चिमी पुरस्कार उनके विचार में समूचे विश्व की विचारधाराओं को समान मान्यता नहीं देते हैं। राजनीतिक सत्ता-संतुलन के भीतर अपना पक्ष चुनते हैं। इस कारण यदि वे पुरस्कार स्वीकार करते तो यह संदेश जा सकता था कि वे किसी एक खेमे के साहित्यिक-राजनीतिक वर्चस्व को वैध ठहरा रहे हैं। यह उनके विचार में लेखक की सार्वभौमिक जिम्मेदारी और प्रामाणिकता के विरुद्ध होता।
हालांकि उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि लाखों क्रोनर की धनराशि ठुकराना सहज नहीं था। आर्थिक दृष्टि से यह कठिनाई का निर्णय था, किंतु अस्तित्ववादी दृष्टि से यह उनके लिए एक अनिवार्यता थी। यह सचमुच एक बहुत विरल बात है और यहीं सार्त्र हमेशा के लिए हमारे आदर के पात्र बन जाते हैं।
सार्त्र के लिए स्वतंत्रता का अर्थ था प्रलोभनों और बाहरी दबावों से ऊपर उठकर आत्मनिष्ठ निर्णय लेना। उन्होंने अपनी दार्शनिक स्थापना को व्यवहार में उतारकर दिखाया।
इस घटना का साहित्यिक और बौद्धिक समाज पर व्यापक असर पड़ा और हलचल मची । विश्व साहित्य जगत चौंक गया कि कोई लेखक उस पुरस्कार को कैसे ठुकरा सकता है जिसे अधिकांश साहित्यकार अपने जीवन की सर्वोच्च उपलब्धि मानते हैं!
जिन आलोचकों ने इसे सार्त्र की अहंकारपूर्ण मुद्रा कहा माना या अनावश्यक नाटक करार दिया , वे भी अंततः मात खा गए। सच्चाई तो यह है कि बड़ी संख्या में बुद्धिजीवियों और लेखकों ने उनके इस साहसिक कदम की सराहना की। यह कदम लेखक की स्वायत्तता और संस्था-विरोध की बहस का नया अध्याय बन गया।
अब यह प्रश्न गंभीरता से उठने लगा कि क्या पुरस्कार और सम्मानों की राजनीति लेखक की स्वतंत्र आवाज़ को बाधित करती है या उसे विस्तार देती है। आज तो आप पुरस्कारों की राजनीति और रणनीति को देख ही रहे हैं, इस पर यहां मैं ज्यादा बात नहीं करूंगा। इशारा ही काफी है।
इस प्रकार, सार्त्र के निर्णय ने साहित्यकार की भूमिका को केवल सर्जक तक सीमित न रखकर उसे एक जिम्मेदार नैतिक सत्ता के रूप में रेखांकित किया। उन्होंने सिद्ध किया कि लेखक का दायित्व किसी राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय संस्था की मान्यता पर निर्भर नहीं है। यह उसके लेखन की प्रामाणिकता और स्वतंत्रता में निहित है।
यही कारण है कि आज भी जब साहित्यकार और कलाकार अपनी वैचारिक स्वायत्तता की रक्षा के लिए किसी पुरस्कार को ठुकराते हैं, तो उनका कदम सीधे सार्त्र की परंपरा से जुड़ता है। लेकिन अब ऐसे चिंतक और लेखक बहुत बिरला मिलेंगे।
यह भी उल्लेखनीय है कि आज तक वे अकेले ऐसे साहित्यकार हैं जिन्होंने अपनी स्वतंत्र इच्छा से नोबेल पुरस्कार को अस्वीकार किया, गो कि बोरिस पास्तरनाक ने राजनीतिक दबाव में नोबेल नहीं ले पाए, पर उनकी इच्छा उसे लेने की थी, जबकि सार्त्र ने दार्शनिक सिद्धांत और वैचारिक शुचिता के आधार पर इसे ठुकराया। इस दृष्टि से उनका निर्णय साहित्यिक इतिहास में अद्वितीय है।
कह सकते हैं कि सार्त्र की यह घटना उनके दर्शन की सच्ची व्याख्या है। उन्होंने दिखाया कि अस्तित्ववाद केवल अमूर्त विचार नहीं है। वह जीवन के सबसे कठिन निर्णयों को दिशा देने वाला सिद्धांत है। जब उन्होंने पुरस्कार अस्वीकार किया तो वे वास्तव में अपने दर्शन की ही पुष्टि कर रहे थे—कि मनुष्य स्वतंत्र है कि उसे अपने चुनावों की जिम्मेदारी लेनी है और कि प्रामाणिकता किसी भी बाहरी सम्मान से अधिक महत्त्वपूर्ण है।
विश्व साहित्य और बौद्धिक समाज ने इससे यह सीखा कि विचार और आचरण में यदि एकरूपता न हो तो दर्शन केवल खोखले शब्द रह जाते हैं। सार्त्र ने अपने निर्णय से यह सुनिश्चित किया कि उनका दर्शन जीवित, सुसंगत और क्रांतिकारी बना रहे।
यही कारण है कि नोबेल अस्वीकार करने की यह घटना बीसवीं शताब्दी के साहित्य और दर्शन की सबसे बड़ी घटनाओं में गिनी जाती है।
उसने यह स्थापित कर दिया कि साहित्यकार का असली सम्मान किसी पुरस्कार से नहीं, बल्कि उसके वैचारिक साहस और स्वतंत्र अभिव्यक्ति की शक्ति से होता है। सार्त्र ने अपने त्याग से यह प्रमाणित किया कि स्वतंत्रता और प्रामाणिकता ही मनुष्य और साहित्य दोनों की चरम पहचान हैं।


सुशील कुमार
13 सितम्बर, 1964, पटना सिटी (बिहार)
कवि-लेखक

• प्रकाशित कृतियाँ:
कविता संग्रह:
कितनी रात उन घावों को सहा है(2004), तुम्हारे शब्दों से अलग (2011 ), जनपद झूठ नहीं बोलता (2012), हाशिये की आवाज (2020), पानी भीतर पनसोखा (2025)
आलोचना: आलोचना का विपक्ष (2019), हिंदी ग़ज़ल का आत्मसंघर्ष (2021)
बाँसलोई में बहत्तर ऋतु (2025)

झारखंड शिक्षा सेवा कैडर में जिला शिक्षा पदाधिकारी के पद से दुमका से सितंबर, 2024 में सेवानिवृत्त।

पता: हंसनिवास, कालीमंडा, दुमका (झारखंड) – 814101
ईमेल: sk.dumka@gmail.com
मो. न. 9006740311

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