पढ़ते-पढ़तेः ट्रेमोण्टाना- गेब्रियल गार्सिया मार्खीज़-अनुवादः उर्मिला जैन-शैल अग्रवाल

अनुवाद आए दिन किए जाते हैं प्रायः किसी एक की बात दूसरों तक पहुंचाने के लिए । परन्तु साहित्य में यह काम सीधा और सरल नहीं। एक वैज्ञानिक-सी एगाक्रता और योगी जैसा संयम व समर्पित दीवानगी चाहिए। मां की ममता या प्रेमिका सी दीवानगी के साथ न सिर्फ अपनाना और आत्मसात् करना होता है दूसरे की रचना को अपितु उसी लगन के साथ पुनः निर्मित भी और ऐसा तभी संभव है जब हम वाकई में इतना पसंद करें कि दूसरों के साथ बांटने की इच्छा जाग उठे। ऐसे ही अतिरेक उत्साह में मैंने भी कुछ अनुवाद किए हैं पर वे पुश्किन और पाबलो नरूदा की छोटी-ठोटी कविताओं के हैं, पूरी की पूरी कहानियाँ नहीं। कठिन काम है परकाया प्रवेश फिर साहित्य सपाट बयानगी भी तो नहीं, निहितार्थ और प्रयोजन होते हैं यहाँ।…रोचक रचना एक ऐसी तस्बीर है जो नौ रसों के हल्के गहरे कई-कई रंगों से भरी जाती है और हर रंग भी दूसरे के साथ पूर्णतः घुला-मिला। बस इतना ही नहीं, पूर्ण विराम और अर्धविराम के बीच एक रहस्यमय और उत्तेजक मौन होता है, जो उतना ही सशक्त और उत्तेजक होता है, जितने कि चयनित शब्द-समूह।
गौबरियल गार्सिया मार्खीज की रचनाएं मानव अनुभूतियों के हर रंग को लिए हुए हैं। कल्पना और यथार्थ का अद्भुत मिश्रण रचा है उन्होंने अपनी रचनाओं में। कल्पना की उड़ान तो है पर यथार्थ की धरती पर खड़े होकर और वह भी बन्द नहीं खुली आँखों के साथ…भुक्तभोगी और देखा-रिसा सब साथ में लेकर। मन के सारे रहस्यों को उसी उन्माद और आवेग, उसी संयम के साथ अनावृत किया है उन्होंने जैसे जीवन हमारे आगे करता है इन्हें-कभी प्यार से धीरे-धीरे, तो कभी पूर्णतः अप्रत्याशित और चौंकाते हुए। जीवन की तरह ही सारे विरोधाभास और कठोरता को सहते हैं ये पात्र इन कहानियों में। शायद यही वजह है कि पात्र जाने पहचाने लगते हैं और पाठक जुड़ जाता है। पर रचनाएँ आम जीवन सी कहीं भी नीरस नहीं। एक प्रवाह और आवेग बना रहता है, पर वर्णन हमेशा वही नपेतुले और सहज शब्दों में ही है । इतना संयम एक कुशल चितेरे के पास ही होता है जिसकी पैनी दृष्टि के साथ कलम भी सधी हुई हो। जो भावों की नदी में बहाना तो जानता है पर पाठकों को सुनामी में डुबोता नहीं। नोबल प्राइज विजेता मार्खीज अपनी रचनाओं में सबकुछ खुलकर स्पष्ट नहीं करते। बहुत कुछ अनकहा और पाठकों की कल्पना पर भी छोड़ देते हैं। और यही मार्खीज की रचनाओं की शक्ति है कि पढ़ने के बाद ये आपको सोचने पर मजबूर करती हैं। किताब की पांच -छह कहानियाँ जो मैंने पढ़ीं, हर कहानी ने मन में एक गहन उदासी भी छोड़ी। उदासी जिसे आप रूमानी या दार्शनिक भी कह सकते हैं। उदासी समाजिक अन्याय और क्रूरता पर, उदासी मन की आतुरता और कातरता पर। उस औलौकिक विधान की असमता या न्योयोचितता पर। जीवन जिसे हम इतना महत्व देते हैं, उसकी क्षणभंगुरता, लघुता और बेबसी पर, जो प्रतिबद्धता तो देती है पर लड़ने की चाह नहीं। अधिकांशतः घटनाओं में मकड़ी के जाले से फंसे रह जाते हैं ये पात्र। पर क्या यही जीवन नहीं!
कल्पना यथार्थ और जीवन के रवैयों का यह इंगित समिश्रण ही है जो इन कहानियों को अलग और विशिष्ट बनाता है। जीवन के निर्मम कठोर यथार्थ को बेहद निर्लिप्तता के साथ बयान करती हैं कहानियाँ। वह सिर्फ वहाँ फोन करने गई थी- कहानी अवश्य पढें। एक प्रखर शीशे में उभरी छवि सी घटनाएँ उभरती हैं -न अन्यथा के रंग भरे गये हैं कहीं और ना ही छवियों को तोड़ा मरोड़ा ही गया है। शब्दों के माध्यम से कथाक्रम का यूँ पुनः हिन्दी में निर्माण , वह भी उसी रोचकता से कि पाठक एक मिनट को भी न ऊबे।

उर्मिला जी भी वाकई में बधाई की पात्र हैं। उर्मिला जी के अनुवादों में भी सब कुछ वैसे ही और उसी नपेतुले रूप में और स्पष्टता से ही उतरा है। एक भी शब्द उन्होंने अपनी तरफ से ना ही कहीं जोड़ा है और ना ही छोड़ा है। यही पहचान है एक सफल अनुवादक की।

साहित्य मात्र शब्द कोष ही तो नहीं, शब्दों द्वारा रचित एक ऐसी इमारत है जहाँ हर शब्द एक दूसरे पर आश्रित है, अगर तस्बीर हूबहू और सही उतारनी है तो उसी निर्धारित क्रम और कड़ी में ही काम करना होगा क्योंकि वही पर तो उनकी तरल तीव्रता और शक्ति बसती है। बात स्पष्टता और सहजता से मूल भाव को सहेज कर तभी उभरती है जब अनुवादक ने खुद उतनी ही शिद्दत से उस बात को ही नहीं , उसमें निहित भावार्थ और उद्देश्यों को भी समझा और महसूसा हो । काम आसान नहीं । फिर कहूँगी एक वैज्ञानिक-सी निष्पक्ष और निर्लिप्त एकाग्रता ही नहीं, अनुवादक के पास मित्र सी सहानुभूति भी जरूरी है हर कहानी के मर्म या बातों की तह तक पहुँचने के लिए और उर्मिला जी के पास यह नजर है।
कभी कभी सोचती हूँ हम सभी अनुवादक है उसकी इस वृहद रचना या सृष्टि के. जीवन को अपने नजरिए से देखते, जीते, पर मौलिक रचना उसी की।
किसी भी रचना का हम तभी आनंद ले पाते हैं जब रचना मनोनुकूल हो पढ़ते समय़ हम उसमें अपनी कल्पना के रंग भर सकें , बह पाएं। मार्खीज ने मानव स्वभाव की इस कमजोरी को भलीभांति समझा और जाना है। उनकी रचनाएँ कहीं भी बौद्धिकता या किसी वाद का लबादा ओढ़े प्रतीत नहीं होतीं। बोझिल न होकर सहज रूप में बहती हैं और अपने संग बहाती हैं। बात विरोधाभास लग सकती है परन्तु इस संदर्भ में माँ की उपमा ही उभरती है मन में -माँ जो संतान के कहे अनकहे हर भाव और जरूरतों को समझने के लिए, उस समरसता और पूर्ण एकात्मकता के लिए उसे पलपल बहुत ध्यान से देखती और सतत् समझती और जानती रहती है। और यही एक सच्चे रचनाकार का भी धर्म है और उसके संवाहक का भी। रचनाकार यदि निर्माता है तो अनुवादक उसका प्रशंसक, सहयोगी और प्रचारक। हर रचना को जरूरत होती है ऐसे प्रशंषक और सहयोगियों की। पर न हर रचना इतनी सशक्त होती है और ना ही इतनी रोचक कि प्रबुद्ध, कर्मठ और निस्वार्थ रूप से सेवारत लोगों का मन मोह पाएं। अधिकांश सुंदर से सुंदर रचनाएँ भी जंगल में खिले खूबसूरत फूलों की तरह अनदेखी ही रह जाती हैं। परन्तु हिन्दी के पाठकों तक मार्खीज की कहानियाँ पहुंचाने का काम उर्मिला जी ने बखूबी निभाया है। और इसके लिए वह बहुत-बहुत बधाई की पात्र हैं। कहानियाँ मूल कहानियों की तरह ही रोचक प्रवाह से बहती और पाठकों को अपने साथ बहाती हैं। पढ़ना शुरू करने पर आप उन्हें बीच में नहीं छोड़ सकते। भाषा इतनी सशक्त है कि चन्द शब्दों में ही पूरी तस्बीर खींच देती है-कहीं-कहीं तो अचंभित कर देती है। भावों की तीव्रता के साथ भाषा में एक रोचक बुद्धि विलास है। नाटकीयता और चित्रात्मकता है । जो अचंभित ही नहीं करती और और जानने की उत्सुकता जगाती हैं-
किताब की शीर्षक कहानी टेरेमोण्टाना को ही ले लें-
अपना समुद्री जैकेट पहने हुए वृद्ध पहरेदार बीच वाली कड़ी में गर्दन के साथ लटका हुआ था और बर्बर वायु के अंतिम झोकों में अभी भी झूल रहा था।
एक भी फालतू का शब्द नहीं, पर वर्णन तीव्र और स्पष्ट, एक तूफान की ही तेजी से चलती है यह कहानी, अपने साथ बहाती, उड़ाती, डराती, फिर शांत हो जाने के लिए थपकियाँ तक देती। गिरने के भय से पेड़ कांपने लगते हैं। तेज हवा की प्रचंडता वाकई में डराती है जब लंबे से लंबे पेड़ भी जमीन तक झुक जाते हैं मानो हाथ मिलाना चाहते हों या पीक ए बू कर रहे हों , और वापस खुद ही नहीं तनेंगे हमें भी अपने साथ ले उड़ेंगे। और यही खूबसूरती है इस कहानी की। कहानी सांस नहीं लेती और ना ही लेने देती। उर्मिला जी के अनुवाद में भी वही गति है जो मार्खीज की भाषा में-
“ उस लड़के ने स्वीडिशों की एक मिनट की लापरवाही का लाभ उठाकर अपरिहार्य मृत्यु से बचने के लिए , उस तेज चलती वैन से घाड़ी में छलांग लगा ली थी।“
यथार्थ और कल्पना का यह अद्भुत समिश्रण ही है जो पाठकों को बांधे रखता है। और मार्खीज की रचनाओं में प्रचुर मात्रा में है यह। उर्मिला जी ने अपने अनुवाद में भी बखूबी सहेजा है इसे, वैसी ही संतुलित और संयमी भाषा में ही -एक भी शब्द फालतू का नहीं और ना ही कोई अन्यथा विस्तार या वर्णन ही कहीं।
कुछ अन्य कहानियों के अन्य चन्द वाक्य देखें, जो विवश करते हैं पूरी कहानी पढ़ने को।
कहानी-बिजली पानी की तरह है
टोटो ने मुझसे पूछा था कि एक स्विच को छूते ही प्रकाश क्यों हो जाता है और मुझमें इतना साहस नहीं था कि मैं इस पर दुबारा सोचूं।
“ प्रकाश पानी की तरह है, “ मैने उत्तर दिया , “ तुम नल खोलते हो और यह गिरने लगता है।

कहानी-मैं केवल फोन करने आई थी-
1.
वह उससे बोली,” प्यार कम समय का भी होता है और लंबे समय का भी। “ और बिना किसी दया के साथ उसने समापन किया, यह एक थोड़े समय वाला था।

2.
“हेलो!”
उसे बोलने के लिए इंतजार करना पड़ा, क्योंकि उसका गला रुँध गया था। उच्छवास लेकर उसने कहा “ बेबी प्यारे! “
उसके आंसुओं ने उसे अभिभूत कर लिया। लाइन की दूसरी तरफ , जरा सी देर के लिए एक संत्रस्त करने वाली चुप्पी थी, उसके बाद ईर्षा से जलती एक आवाज ने उगला-“ रंडी“ और उसने रिसीवर पटक दिया।
यहाँ यह जान लेना जरूरी है कि ये वे दो प्रेमी हैं जो एक दूसरे को बेहद प्यार करते हैं । एक बहुत बहुत उदास कहानी।
बर्फ में खून के छींटे
1.
अपनी दहशत पर अंकुश रखते हुए उसने कहा , “ मैंने इससे भी बड़ा और कड़ा देखा है। इसलिए जो तुम कर रहे हो , इस पर फिर सोचो, क्योंकि तुम्हें मेरे साथ एक काले आदमी से भी अधिक अच्छा करना है। “
जबकि वास्तव में नैना डाकोण्टे कुंवारी थी और उस क्षण के पहले उसने कभी नग्न पुरुष को नहीं देखा था।
2.
यह पहली बार है , जब तुमने मुझे मना किया है।
“ सचमुच,” उसने उत्तर दिया, “यह पहली बार है कि हम विवाहित हैं। “
मंगलवार की झपकी-
1.
‘ उसके दोनों हाथ एक चिटका हुआ चमड़े का बैग कसकर पकड़े हुए थे । वह ऐसी शांत दिख रही थी जैसे कोई गरीबी का अभ्यस्त व्यक्ति दिखता है।‘
2.
“ यदि तुम्हें कुछ करना हो तो अभी कर लो, “ औरत ने कहा, “ बाद में भले तुम प्यास से मर रही हो, पर तुम पानी नहीं पीना। और जो भी करो, उसके लिए रोना मत।“
यह ताकत मार्खीज की है और हिन्दी भाषा में उसी तीव्रता के साथ हमतक पहुँचाना, यह कौशल उर्मिला जी का है। पुनः पुनः बहुत बहुत बधाई और धन्यवाद की पाश्र हैं वह इन खूबसूरत कहानियों की तरफ हमारा ध्यान आकर्षित करने के लिए। जो चंद्रकांता संतति की तरह उत्तेजक हैं। हैरी पौटर की तरह एक अद्भुत कल्पना लोक में ले जाती हैं हमें। और साथ में मानवीय गुणों को भी उजागरल करती हैं। उनकी किताब ट्रेमोन्टाना अधिक से अधिक पाठकों के हाथ में पहुंचे, मेरी हार्दिक शुभकामनाएँ।
शैल अग्रवाल