
पाँच लघुकथा। 
नीलमणि
लघुकथा-१
कॉफ़ी कैफ़े
लगभग बीस साल बाद तीन पुरानी सहेलियाँ— नीलू, रेखा और कविता कॉफ़ी कैफ़े में मिलीं। कॉलेज के दिनों की मस्ती याद करते-करते बात अचानक पतियों पर आ गई।
नीलू हँसते हुए बोली, “मैंने अपने पति को शादी से पहले आठ साल तक जाना, सोचा अब सब समझ लिया। लेकिन शादी के बाद पता चला कि मैं तो इनको दाल में नमक जितना ही जानती थी।”
रेखा ने भी ठंडी साँस भरते हुए कहा, “अरे! मेरी तो सिर्फ़ दो साल की जान-पहचान थी। तब लगा बहुत कुछ जान लिया है, लेकिन शादी के बाद समझ आया, असल में, मैं उन्हें चाय में शक्कर जितना ही समझ पाई थी।”
दोनों हँसते-हँसते कविता की ओर देखने लगीं। कविता शांति से कॉफ़ी का घूँट भरते हुए बोली, “तुम दोनों भाग्यशाली हो, कम-से-कम प्रेम का स्वाद तो चखा। मैंने तो अब तक वो स्वाद भी नहीं चखा। हाँ, पति की रोज़-रोज़ एक जैसी आदतों का ‘धैर्य-रस’ ज़रूर पी रही हूँ। सालों से एक ही स्वाद— बिना शक्कर की कॉफ़ी जैसा।”
नीलू ने कहा, “हाँ कविता, जिंदगी का स्वाद बिल्कुल कॉफ़ी जैसा सतरंगी ही है—
किसी को यह कड़वी ब्लैक कॉफ़ी की तरह मिलता है,
किसी को इसमें दूध और चीनी घुली नसीब होती है,
तो किसी की प्याली में क्रीम, केक और बिस्किट भी साथ चले आते हैं। तीनों ज़ोर से हँस पड़ीं।
***
लघुकथा-२
टन टन टन
गुप्ता जी रोज़ की तरह आज भी अख़बार में घुसे थे, गुप्ता जी की आदत थी जब तक घड़ी 9:00 न बजाए, अखबार से चिपके ही रहते थे। आज भी घड़ी ने जैसे ही 9 बार पुकारा, गुप्ता जी झट तौलिया उठा, लपड़ धपड़ बाथरूम की ओर लपके।
धड़ाम!!!
अचानक आंगन से ज़ोरदार आवाज आई।
रीना, जो किचिन में नाश्ता और टिफिन की जुगलबंदी में लगी थी, घबराकर दौड़ी। बाहर आकर जो नज़ारा देखा तो हँसी रोकना मुश्किल हो गया।
आंगन में गुप्ता जी बड़े शाही अंदाज़ में फ़िसले पड़े थे।
उनका भारी-भरकम शरीर, टेढ़ा-मेढ़ा होकर जमीन पर ऐसा पसरा था मानो किसी मूर्तिकार का बड़ा सा अनगढ़ अधूरा शिल्प।
रीना ने होंठ दबाकर हँसी छुपाई, फिर गंभीर आवाज़ में बोली –
“क्या ढूँढ रहे हो गुप्ता जी?
धरती के अंदर छुपा खज़ाना या बाथरूम का शॉर्टकट?”
खिसियाते गुप्ता जी अब कराहते हुए बोले –
“अरे रीना… ये फर्श बड़ा धोखेबाज़ है, ऊपर से चिकना और अंदर से कठोर!”
रीना अब हँसी रोक न सकी। पूरा आँगन ठहाकों से गूंज उठा।
***
लघुकथा-३
नमक
मैं और रीना रोज़ की तरह शाम की सैर पर निकले ही थे कि अचानक उसका फोन बज उठा।
रीना ने धीरे से मेरे कान में फुसफुसाया –
“कर्नल साहब।”
उधर से भारी-भरकम आवाज़ आई –
“तुमने पकौड़ियों में नमक नहीं डाला!”
रीना चौंकी –
“डाला है… मैं तो खाकर भी आई हूं।”
कर्नल साहब तर्क पर उतरे –
“नहीं! एक पकौड़ी मैंने बचा कर रखी है, तुम आकर खाकर देखो। नमक नहीं है।”
रीना ने आराम से कहा –
“सॉरी जी…”
और फोन कट!
मैंने रीना की ओर देखा तो वो बड़ी शांति से बोली –
“अब मैं किसी बहस में नहीं पड़ती। सॉरी बोल देती हूं और बात खत्म। 40 साल साथ रहने के बाद इतना तो सीख ही लिया कि बहस में जीतकर भी घर की शांति भंग हो जाती है।”
मैंने रीना की समझदारी को सैल्यूट किया और मन ही मन सोचने लगी –
“कर्नल साहब ने ज़िंदगी का सबसे बड़ा युद्ध तो जीत ही लिया है – नमक की जंग!”
***
लघुकथा-४
नोट की जाति नहीं होती
गाँव में एक दलित, प्यासा यात्री आया। उसने एक घर से पानी मांगा। घर के लोगों ने नाक-भौं सिकोड़ते हुए दरवाजा बंद कर लिया।
थोड़ी दूर आगे एक मंदिर था। वहां भी पुजारी ने उसे दूर रहने को कहा- “अस्पृश्य हो तुम, जाओ यहाँ से।”
प्यासा और दुखी यात्री बड़बड़ाने लगा-
‘यही लोग, जब बाजार जाते हैं, मांस की दुकान के मालिक से भी नोट खुशी-खुशी लेते हैं। वह नोट किसके हाथ से आया, किस जाति से आया, यह कोई नहीं पूछता। दुकानदार, पुजारी, सेठ सभी उस पैसे को खुशी से थाम लेते हैं। नोट पर किसी जाति की छाप नहीं होती। वह सबके लिए एक जैसा होता है। ना ऊँच, ना नीच।‘
एक बच्चा जो यह सब देख, सुन रहा था। दौड़कर घर से पानी लाया और प्यासे व्यक्ति को पिलाया।
लौटकर अपनी माँ से बोला– “माँ प्यासे इंसान को पानी देने से पहले भी उसकी जाति क्यों देखते हैं, नोट किसी के भी हाथ से ले लेते हैं, जाति नहीं पूछते …?”
माँ की आँखें भर आईं। उसने बेटे से कहा, “बेटा, जब इंसान से ज्यादा नोट की महिमा गाई जाए तो समझो समाज बीमार हो गया है। इंसान अगर इंसान को समझ ले, तो जाति बच नहीं पाएगी।”
***
लघुकथा-५
साईकिल पर दादी
रविवार की सुबह थी। रिया मोबाइल पर गेम खेल रही थी, तभी घर के बाहर घंटी बजी — ट्रिंग ट्रिंग !
रिया भाग कर बालकनी में गई — और जो देखा उस पर यकीन नहीं हुआ !
दादी, नीली साड़ी में, सिर पर गुलाबी हेल्मेट लगाए, नए स्पोर्ट्स शूज़ पहनकर साईकिल चला रही थीं — और वो भी बिना थके !
“दादी ! ये क्या?” रिया ने हैरानी से पूछा।
दादी मुस्कुराईं, “बिटिया, अब उम्र नहीं, जज़्बा देखा करो!”
पास के बच्चे दादी के साथ सेल्फी लेने लगे — “वाह, क्या दादी हैं!”
मम्मी ने हल्के गुस्से से कहा, “माँ! आपको ज़रूरत क्या थी इतनी स्टाइल मारने की?”
दादी हँसी, “कमर दर्द गया, बी पी कम हुआ और सबकी बोलती भी बंद !”
रिया तालियाँ बजा रही थी, “दादी, आप तो असली हीरो निकलीं !”
दादी ने रिया को सिखाया कि ज़िंदगी में उम्र नहीं, नजरिया मायने रखता है।
अगले दिन रिया ने मोबाइल छोड़ा, अपनी छोटी साईकिल उठाई… और हेल्मेट पहनकर दादी के पीछे दौड़ पड़ी।

पाँच लघुकथा

सनत साहित्यकार
सम्पर्क : “ऋतु साहित्य निकेतन”, जूट मिल थाना के पीछे बगल गली, हनुमान मन्दिर के पास, रायगढ़ (छत्तीसगढ़) पिन : 496001
मो. : 7067643452
ई-मेल : writerskc64@gmail.com
लगुकथा-१
गलत फैसला
– भाई, आजकल आप क्या लिख रहे हैं ?
– मैंने लिखना छोड़ दिया है।
– क्यों ?
– मेरे इलाके में कोई साहित्यप्रेमी नहीं है। मेरी कविता-कहानी को कोई नहीं सुनता। मैं लिख भी लूँ तो किसे सुनाऊँ ? इसलिये मैंने लिखना छोड़ ..। और आप बताइये क्या हाल है ?
– हाल तो आपके ही इलाके के जैसा है। परन्तु मैं तो प्रतिदिन …।
– क्या ?
– लिखता हूँ। वही कविता-कहानी। मैंने लिखना छोड़ा नहीं है।
– जब उधर कोई सुनने वाला नहीं है फिर भी ?
– हाँ।
– यार, आप गजब बात करते हैं।
– मैंने अपने अध्ययन कक्ष की दीवार पर कान का चित्र बनाया है। उसी को सुनाता हूँ। आँगन के फूलों को सुनाता हूँ। हवा को सुनाता हूँ। छत पर चढ़कर आकाश को सुनाता हूँ। नहीं तो नदी की ओर चला जाता हूँ। उसके तट पर बैठकर उसकी कलकल जलधारा को सुनाता हूँ। पर मैं बराबर लिखता हूँ।
– ओह! तब तो मैं ही गलत सोचता हूँ।
***
लघुकथा-२
योजना
वह साठ वर्ष का हो गया था। घर के सदस्यों ने उसका जन्मदिन मनाया। सबने सोचा – अब यह बुड्ढा बेकार बैठा-बैठा रोटी तोड़ेगा। इस बूढ़े को जल्दी से जल्दी घरेलू काम में लगाओ।
बूढ़े का प्रातःकालीन भ्रमण बन्द हुआ। उसे झाड़ू, कपड़ा और पानी पकड़ाते। घर-आँगन की साफ़-सफ़ाई में लगाते। थैला देकर बाजार भेजते। बरतन थमाकर डेयरी से दूध लाने को कहते। लाईन में लगकर बिजली बिल जमा कर आने को बोलते। जो भी दिया जाता बूढ़ा खा-पी लेता। रात में मुख्य दरवाजा बन्द करता। फिर बरामदे में चौकीदार की तरह खाँसता-खाँसता सो जाता।
घर में बूढ़े से इच्छाएँ पूछी जातीं न सलाह ली जाती। जो कुछ भी अच्छा बोलता बूढ़े की हँसी उड़ाते। उसकी बात को दबा दिया जाता। वह बड़ा परेशान हो जाता। दौड़-धूप से कभी अस्वस्थ भी हो जाता। पर पास में कोई नहीं आता। बूढ़े का प्रयास ही काम आता। ऊपर की ओर देखता और आहें भरता।
पेड़ पर बैठी चिड़ियाँ बातचीत करतीं :
पहली – जब यह बूढ़ा पहले हट्टा-कट्टा प्रौढ़ था, तब कमाकर सबको पालता-पोसता था। सब इसकी कितनी इज़्ज़त करते थे। इसका महत्त्व समझते थे।
दूसरी – हाय, बेचारा बूढ़ा हो गया है। फिर भी प्रतिदिन कितना खँटता है। पता नहीं इसका क्या होगा ?
पहली – अरी, कलियुग में मनुष्यों ने अपनी सम्वेदना को मार लिया है। बूढ़ों को भारी बोझ समझते हैं।
दूसरी – हाँ, मुझे थोड़ा अन्दाज़ा है। जैसा कि अक्सर होता है घरवाले बूढ़े को दस्तखत के लिये राजी करेंगे। सम्पत्ति को अपने नाम करायेंगे। उसे सबने घोर तकलीफ़ देने की योजना बनायी है।
पहली – यह बूढ़ा नरमदिल का है पर बुद्धिमान भी है। स्वयं वृद्धाश्रम जाने की तैयारी में है। वहाँ अपने जैसे बूढ़ों को साथी बनायेगा। बूढ़े को सुन्दर पेन्टिंग करना आता है। बढ़िया गाता-बजाता भी है। लोग प्रशंसा में दो मीठे बोल अवश्य बोलेंगे। तब बूढ़ा वृद्धाश्रम में खाते-पीते आनन्द से जी लेगा।
***
लघुकथा-३
पाँचवें प्रकार का आदमी
शहर के चौक का नुक्कड़। छह चेहरे गोल घेरा बनाकर बैठे थे। भूने चने और मूँगफली टूँगते चर्चा में मस्त थे। दुनिया में आदमियों के प्रकार बता रहे थे।
एक ने कहा, “तीन प्रकार के आदमी होते हैं। एक प्रकार के आदमी आदमियों पर चर्चा करते हैं, जैसे फलाना झूठा है। ढिकाना बेईमान है। अमका बेवकूफ है। समका लम्पट है। दूसरे प्रकार के आदमी घटनाओं पर चर्चा करते हैं, जैसे अमेरिका में ऐसा हुआ। रूस में वैसा हुआ। ब्राजील में ऐसा हुआ। भारत में ऐसा हुआ। तीसरे प्रकार के आदमी बिरादरियों पर चर्चा करते हैं, जैसे हमारी बिरादरी सबसे अच्छी है। उनकी बिरादरी बहुत ख़राब है। उनकी बिरादरी तो कंजूस है और हाँ उनकी बिरादरी तो अधिक आक्रामक और कट्टर है।”
दूसरे ने कहा, “भाई, मैं भी बताऊँ ?”
“हाँ बताओ-बताओ।” सब उत्सुक हुए।
“चौथे प्रकार के आदमी भी होते हैं, जो आत्मा, परमात्मा और मुक्ति पर चर्चा करते हैं।”
तीसरे ने कहा, “भाई, मैं भी बताता हूँ – दुनिया में पाँचवें प्रकार के आदमी भी होते हैं, जो सदैव सकारात्मक चर्चा करते हैं, जैसे हम जीवन को सुन्दर इस प्रकार से बना सकते हैं। हम ऐसा उपाय करेंगे, तो ग़रीबी दूर होगी। हम ऐसा खायेंगे, तो स्वस्थ रहेंगे। हम ऐसा काम करेंगे, तो ख़ुशहाली आयेगी। ऐसा काम करेंगे, तो हमसे लोग प्रेम करेंगे। वैसी नीति अपनायेंगे, तो हमारा देश आगे बढ़ेगा।”
“हाँ यार, उस पाँचवें प्रकार के आदमी की चर्चा में बहुत दम होता है। भौतिक दुनिया में उस चर्चा का बड़ा महत्त्व भी है। उस पर चर्चा करने वाले आदमियों की जेब से दो पैसे निकलते भी अवश्य हैं। दिल खोलकर सहायता करते भी हैं बेचारे।”
तभी एक नौकरीपेशा आदमी उन चेहरों के समीप आया। बोला, “भाई लोग, बहुत अजीब स्थिति है दुनिया की। चकाचौंध केवल बीच शहर में ही दिखती है। बाहर निकलकर देखेंगे, तो रो पड़ेंगे आप। मैं झोपड़पट्टी इलाकों में जाता हूँ। भूखों-नंगों को रोटी-कपड़ा बाँटता हूँ। बच्चों को पढ़ने को प्रेरित करता हूँ। उन्हें कॉपी, पुस्तकें, पेन और बैग खरीदकर देता हूँ। आप लोग मुझे भी अपने साथ शामिल करना चाहें, तो बताइयेगा। यह रहा मेरा परिचय कार्ड।”
उस आदमी के जाने के बाद सबने कहा, “निश्चित ही पाँचवें प्रकार का आदमी यही है!”
***
लघुकथा-४
सेवा
– अरे! तुम उसके कपड़े धो रहे हो ?
– हाँ।
– बढ़िया स्वादिष्ट खाना भी बनाते होगे ?
– हाँ।
– अपने हाथ से खाना भी खिलाते होगे ?
– हाँ।
– उसके जूठे बरतन भी माँजते होगे ?
– हाँ।
– पैर भी दबाते … ?
– हाँ भाई।
– आख़िर तुम निकले न अपनी बीवी के पक्के गुलाम के गुलाम।
– अरे नहीं मेरे भाई। मेरी बीवी, बच्चे के साथ मायका गई हुई है। मैं घर में अपनी बीमार बूढ़ी माँ की सेवा कर रहा हूँ।
***
लघुकथा-५
शिक्षित लुटेरे
यात्री बस जंगल के सुनसान सड़क से गुजर रही थी। तभी सात गुण्डे बीच सड़क पर खड़े दिखाई दिये। दुर्घटना की आशंका से ड्राइव्हर ने बस रोक दी। अचानक गुण्डे दौड़े। बस का दरवाज़ा खोला। ड्राइव्हर और कण्डक्टर को बाहर खींच निकाला। बिना कुछ बोले लात-मुक्कों से उनकी पिटाई की। उन्हें एकदम अशक्त कर दिया।
गुण्डे फिर तपाक से बस में घुसे। चाकू और पिस्तौल दिखाये। सवार प्रत्येक यात्री से जबरिया रुपये माँगने लगे। हक्के-बक्के यात्री उनके सामने गिड़गिड़ाने लगे –
“मुझे छोड़ दो बाप .. मुझे भी छोड़ दो भैय्या .. मेरे पास आने-जाने और कुछ खाने भर के रुपये हैं। .. मैं बहुत ग़रीब आदमी हूँ। मेरे बच्चे का इलाज चल रहा है। कल से उसकी दवा खत्म हो गई है। मैं उसे खरीदने शहर जा रहा हूँ .. मैं दिव्यांग हूँ। ट्राइसाइकिल के लिये डी.एम. साहब को आवेदन पत्र देने जा रहा हूँ। मुझे छोड़ दो सरकार।”
एक मैडम बोली, “देखिये, मुझे भी छोड़ दीजिये। मैं पीएचडी का थीसिस जमा करने यूनिवर्सिटी जा रही हूँ। मेरे पास आने-जाने के ही रुपये हैं।”
एक गुण्डा गुर्राया, “मैडम, चालाकी मत दिखाइये। हम भी सात में से दो बी.ए. और पाँच एम.ए. हैं। छोड़ेंगे कैसे ? निकालिये रुपये।”
गुण्डों के लूटकर जाने के बाद एक बुज़ुर्ग यात्री कह रहा था, “जिस देश के युवक लिख-पढ़कर लूटपाट और गुण्डागर्दी जैसे घटिया काम करते हों, उस देश को विवेकानन्द और गाँधी का देश कहने में शर्म आती है।”

पाँच लघुकथा

वंदना श्रीवास्तव रिदम
लखनऊ यूपी
लघुकथा-१
अंततः—
वो चाहती थी कि जब उसकी मृत्यु हो,
तो कोई रोए नहीं….
क्योंकि दिखावा उसने जीतेजी बहुत देखा था,मरने के बाद वो सच्चाई के साथ जाना चाहती थी, वो सबसे ज्यादा खुश मरने समय थी, और उसके मरने के बाद उसके चेहरे पर सुकून था, जैसे मुक्ति मिल गई हो उसे शरीर रूपी पिंजरे से।
पर जब आज वो खुश थी, तो सब रो रहें क्यों रहे थें…
जब वो रो रही थी,तब सब हंस रहे थें,नौटंकी कर रही सब कह रहे थे, वो गिड़गिड़ाती रही, तड़पती रही, चिल्लाती रही, आंसू बहाती रही।
सबने कहा ये तो रोज का है इसका छोड़ो, जाने दो,रहने दो इसको ऐसे, फिर वो रोती रही सब हंसते रहें, उसकी पीड़ाओं पर उसे तंज कसते रहे।
आज वो खुश थी मरकर, पर उसकी आंखो में आंसू नही थे आज, ज़रा भी नही चेहरे पर शांति थी, जैसे किसी शरीर रूपी पिंजरे से मुक्त हुआ हो कोई पंछी सालों के बाद।
वो आज़ाद थी अब, समाज के बंधनों से, बनावटी रिश्तो दिखावटी अपनेपन से,अब उसके रोने का समय समाप्त हो चुका था।
क्योंकि आज वो मुक्त हो गई थी सारी पीड़ाओं से
वो खुश थी, इसलिए सब रो रहें थें शायद।
उसे पता था, कुछ पीड़ाओं का अंत यहां इस दुनियां में नही होता ????
***
लघुकथा-२
बस यूंही..
ये ख़ामोशी कितनी खूबसूरत है ना .. उसने कहा
है ना..जैसे प्रकृति सांस ले रही हो
धीरे धीरे स्थिर होकर…मैंने जवाब दिया
तुम हमेशा ही ऐसी बाते करती हो या फिर कभी कभी कुछ हो जाता है तुम्हे..उसने कहा
मै हंसी और फिर कुछ देर गहरी सांस लेकर बोली
हां शायद मैं इन सब चीजों में खुद को देखती हूं, महसूस करती हूं इन्हे, जैसे ये मुझसे कुछ कहते हो भीने भीने स्वर में..समेटना चाहते हो मुझे खुद में
हा हा हा…..वो हंसा
पता है, तुम्हारे इन्हीं बातों की वजह से लगता जैसे मैं तुमसे जुड़ता चला जाता हूं..उसने कहा
मैं हल्की सी मुस्कुराई….
तुम मुस्कुरा क्यों रही हो , कभी कभी लगता है जैसे मैं तुम्हे पूरी तरह से जानता हूं,लेकिन तुम्हारी बाते या कहूं की तुम्हारी चुप्पी भी मुझे फिर सोचने पर मजबूर कर देती है, कि क्या मैं तुम्हे सच में जनता हूं..उसने कहा
मैंने धीमे से कहा, सुनना कहना बोलना समझना ज़रूरी तो नहीं, कभी कभी बस महसूस करना चाहिए, और ये ख़ामोशी में लिपटी ध्वनियां सबसे ज़्यादा बोलती है, सुनो ना कभी इन्हे,…
उफ़ तुम और तुम्हारी बाते..उसने कहा
मैं फ़िर मुस्कुराई
फिर से वहीं तुम्हारी बिना कुछ बोले मुस्कुरा देना,क्या चलता है दिमाग़ में तुम्हारे हां.. उसने कहा।
मैं कुछ नहीं बस यूंही..ऐसे ही..बेवजह..!!
और मन ही मन कहती हुई, बेवजह की कुछ तो वजह होगी,यूं बेवजह ,बेवजह नहीं होती..!
उसने मेरी तरफ देखा , मैंने नज़र हटा ली उसकी तरफ से, और गहरी सांस लेते हुए, महसूस करने लगी उन सारी आस पास के प्रकृति की ख़ामोशी को जो बोल रही थी , हां शायद बहुत कुछ बोल रही थी।
***
लघुकथा-3
“मैं यहीं हूं”….
आपका नाम उसने पूछा…..
कृष्णम को थोड़ा अजीब लगा पर उसने कहा कृष्णम नाम है मेरा
Hello कृष्णम उसने फिर कहा
कृष्णम झेप सा गया, मानो गुस्से में कुछ बुरा भला बोलने ही वाला हो कि तभी
“मैं यही हूं”.. फिर से आवाज़ आई..
आप अकेले इतनी रात हो गई,परेशान ना हो मैं यहीं हूं..किसी का इंतजार कर रहे…?
कृष्णम ने गहरी सांस ली,और बोला नहीं.. नहीं तो
और अचानक उसे याद आया, व्रशाली भी तो ऐसे ही मिली थी पहली बार, जब उसने पूछा था, अकेले है क्या आप इतनी रात हो गई परेशान ना होना “मैं यही हूं” ,,और उस दिन भी कृष्णम झेप गया था, कि पता नहीं कौन है,लेकिन व्रशाली बोलती जा रही थी.. और पता नहीं कब कृष्णम व्रशाली के साथ कंफर्टेबल हो गया, और दोनों बात करने लगे मानो बहुत पुराने दोस्त या की बचपन से जानते हो एक दूसरे को नाम पता फोन नंबर सब कुछ एक दूसरे से पूछ लिया था कुछ ही घंटे साथ बिताकर पूरी ज़िन्दगी जी ली हो जैसे दोनों ने….
तभी ट्रेन की आवाज़ आई और व्रशाली ने कहा कृष्णम मेरी ट्रेन आ गई तुम चिंता मत करो मैं तुम्हे अकेला छोड़कर नहीं जाऊंगी,, तुम्हे भेजने के बाद दूसरी ट्रेन से चली जाऊंगी ऐसा लग रहा था मानो कृष्णम छोटा बच्चा और व्रशाली को चिंता हो तेज़ उसकी, तभी कृष्णम ने कहा नहीं व्रशाली टाइम बहुत हो गया तुम इसी ट्रेन से जाओ और मैं अकेला थोड़ी हूं, और भी तो लोग बैठे है अब मेरी ट्रेन आने ही वाली है तुम इसी में जाओगी पता नहीं फिर दूसरी ट्रेन कब तक आएगी…
व्रशाली के लाख मना करने के बाद भी कृष्णम ने एक ना सुनी और अंततः व्रशाली चुप थी, कि तुम्हे समझाना मुश्किल है बहुत, कि तभी ट्रेन की सीटी की आवाज आई कृष्णम ने कह व्रशाली ट्रेन जा रही जल्दी करो वरना छूट जाएगी दुःखी नज़रों से वृशाली ने कृष्णम को देखा मानो कह रही हो मत भेजो मुझे…
पर जाना पड़ा उसे अब ट्रेन चल चुकी थी व्रशाली दौड़ी ट्रेन पकड़ने को और अब वो पहुंच चुकी थी, ट्रेन के दरवाज़े के पास जैसे ही उसने दरवाज़ा पकड़ा उसका हाथ स्लिप हुआ और कुछ ही पल में वहां चीखें थी…
व्रशाली ट्रेन के नीचे जा चुकी थी और ट्रेन चलती जा रही थी …
एक पल मानो सब बदल गया अभी तो ठीक से दोनों मिले भी नहीं थे…..
अचानक कृष्णम को ट्रेन की आवाज़ सुनाई दी और वो व्रशाली की यादों के झरोखे से बाहर निकला..
पलट कर बेंच पर देखा तो वहां वो लड़की नहीं थी जो उससे नाम पूछ रही थी….कृष्णम की ट्रेन अब आ चुकी थी वो बिना कुछ सोचे उठा और ट्रेन की सीट पर बैठ गया
ट्रेन चलनी स्टार्ट हुई…
तो अचानक खिड़की से कृष्णम की नजर बाहर गई देखा एक हाथ उस बाय बोल रहा था उसने तुरन्त खिड़की के पास जाकर देखा और दंग रह गया ये तो उसी लड़की का लाल जैकेट था जो उसके पास बैठी थी इतनी देर बोले जा रही थी , तभी ट्रेन और आगे बढ़ी अब उस लड़की का चेहरा सामने था कृष्णम साफ देख पा रहा था, और उसकी आंखे खुली और बेचैन सी हो गई उस पल…शून्य सा हो गया था वो व्रशाली को देखकर हां ये व्रशाली ही तो थी, इतनी देर से साथ बैठ के बाते कर रही थी
कृष्णम सोच रहा था काश मैंने एक बार देख तो लिए होता सिर उठाकर की कौन …
तभी व्रशाली की ने कुछ कहा थोड़ी दर्द और खुशी भरी आवाज़ में ..मैंने कहा था ना परेशान ना हो मैं हूं …”मैं यही हूं” तुम्हारे साथ….
ट्रेन चली जा रही थी कृष्णम बस देखते जा रहा था, और धीरे धीरे व्रशाली ओझल हो रही थी आंखो से …..उसी पहली बार की तरह.……।
***
लघुकथा-४
प्रेम का अंतिम अध्याय
मैं सब ठीक कर दूंगा,एक दूसरे से दूर होना, बिछड़ना हमारे प्रेम को समाप्त कर देगा..मानस ने वैदेही का हात ज़ोर से पकड़ते हुए कहा
प्रेम बिछड़ने से समाप्त नहीं होता मानस..वैदेही ने कहा
मेरा हात छोड़ो मुझे दर्द हो रहा, और टूटती हुई चूड़ी वैदेही की कलाई पर लाल रंग छोड़ गई….
तुम समझती क्यों नहीं, कहीं नही जाना तुम्हे समझी यही रहोगी तुम..मानस ने इस बार तेज़ और थोड़े गुस्से भरे लहजे में कहा
ऐसे ठीक करोगे तुम सब..वैदेही ने नीचे ज़मीन पर गिरती खून की बूंदों के देखा मानो दायरे खींच रही हो दोनो के दरमियां..और बोली, किसी को ज़बरदस्ती बांध कर नही रखा जा सकता,और नाही प्रेम करवाया जा सकता है,व्यक्ति सिर्फ़ प्रेम से ही बाधित हो सकता है वो भी स्वयं की खुशी से!
क्या प्यार ऐसा होता है,जो सामने वाले के बाहर के दर्द को नज़र अंदाज़ कर दे..तो फ़िर क्या वो भीतर की पीड़ा कभी समझ पाएगा..वैदेही ने धीमे और डगमगाई आवाज़ में कहा
हां..ये मेरा प्यार है हक़ है मेरा तुम पर, और मैं देखता हूं तुम कैसे जाओगी, क्या मेरे बिना, मेरे प्यार के बिना रह पाओगी कहीं भी..मानस ने चीखते हुए कहा
उस पल दर्द भर आया हो जैसे वैदेही के चहेरे में,बिछड़ना प्रेम की समाप्ति नही होती मानस..बल्कि पास रहकर एक दूसरे की पीड़ा,खुशी,अच्छा,बुरा, दर्द ना समझ पाना प्रेम का ना होने के बराबर है…वैदेही ने इस बार हिम्मत भरे लहजे से कहा
प्रेम एक दूसरे के दूर जाने पर नही समाप्त होता,प्रेम तो तब समाप्त हो जाता है, जब हम पास होकर भी एक दूसरे को नही जान पाते,साथ होकर भी एक दूसरे को ना समझना प्यार का अंत होना होता है….
वैदेही ने दरवाज़ा खोला और बाहर जाते हुए बोली मानस..सहने की एक सीमा होती है,जब वो सीमा समाप्त हो जाती है,तो प्रेम की जगह पछतावा रह जाता है…
ये हमारे प्रेम का अंतिम अध्याय है,इससे आगे तुम्हारे लिए मैं और मेरे विचार स्वार्थी होंगे!
वैदेही की आंखों में अब पीड़ा नही गहरी शांति थी, मानस अब निरुत्तर था, चाहकर भी कुछ ना बोल सका, सिर्फ़ वैदेही को जाते हुए देखता रहा!
***
लघुकथा-५
इंतजार
संध्या पूजन का समय था, पक्षियों की चहचहाहट हर तरफ़ गूंज रही थी,वैदेही ने आज फ़िर इक दीप जलाया और अपनी डायरी पेन लेकर वहीं बैठ गई, उसने लिखना चाहा पर अब शब्द कहीं खो चुके थे, बाते यादें बनकर धुंधली हो गई थी,लेकिन वक्त के साथ और भी गहरी हो गई हो जैसे!
हल्की हवा चली और डायरी के पन्ने पलटने लगे, इक इक पन्ने के साथ वैदेही की यादें भी किसी कोने से पलटकर उसे देख रही थी, पर अब उन यादों पर एक पर्दा सा लग गया हो जैसे, बस उन पन्नों पर लिखे कुछ शब्द मात्र रह गए थे,जिनकी गूंज अभी भी सुनाई दे रही हो ज,कोई पुकार रहा हो,कोई राह देख रहा हो!
अचानक इक पन्ना खुलकर रुक गया,और वैदेही की नज़र जैसे ही उसपर पड़ी,मानो समय भी थम गया हो उस पल!
जब वैदेही अगस्त्य से पहली बार मिली थी तो उसकी निश्चल सी मुस्कान, चंचलता से भरपूर व्यक्तित्व, अल्हड़पन, उसकी सादगी,और खुलकर बोलने वाला अंदाज़ अगस्त्य को भा गया था, तुम आकाश में उड़ने के लिए बनी हो, वैदेही के आज़ाद ख्याल अगस्त्य को बहुत पसंद आया था, किसी पिंजरे में बंद रहने के लिए नही अगस्त्य ने वैदेही से कहा था!
ना..मैं तो इसी के लिए बनी हूं, खुले आसमान के नीचे धरती पर ही खुश हूं मैं, दूर से चीज़े जितनी अच्छी लगती है,पास से शायद उतनी ही बेरंग लगे, और मैं रंग बिखरने के लिए बनी हूं, इतने बड़े आसमान में इक छोटा तारा बनकर नही रहना चाहती!
वैदेही की ऐसी बाते अगस्त्य को उसकी ओर और खींचती जाती, धीरे धीरे अगस्त्य वैदेही को पसंद करने लगा था,या यों कहें की वैदेही की ओर खींचता जा रहा था,धीरे धीरे धीरे वो जाने कब वैदेही से प्रेम करने लगा,उसे खुद पता ना चला!
एक ओर शांत,समझदार,गंभीर प्रवत्ति का अगस्त्य जो कि अब स्वभाव के एकदम उलट बहुत बोलने वाली,खुलकर हंसने वाली,बिल्कुल नादान बच्चे सी निश्छल वैदेही ,जिसे स्वच्छंद,स्वतंत्र उड़ना आता था बस, इस दुनियां से अलग उसकी अलहदा दुनियां थी!
अगस्त्य ने धीरे धीरे वैदेही को प्रेम बताया, प्रेम करना सिखाया, खुद वैदेही सा हो गया था, और वैदेही अब और अधिक खुश रहने लगी थी,परंतु उस नही पता था कि एक दिन उस चंचल सी कोमल फूल को प्रेम में कभी इतना रोना पड़ेगा, कि हंसी तो दूर अब वह जैसे बोलना भी भूल जायेगी, मुस्कान कहीं गुम हो गई थी उसकी अब तो आंसू भी सुख चुके थें, और वही वैदेही अब शांत,गंभीर,चुपचाप सी हो चुकी थी,जैसे पतझड़ में पत्ते टूटकर बिखरने के बाद पेड़ बंजर सा हो गया हो!
अपने प्रेम से बिछड़ने के बाद व्यक्ति जीवित तो रहता है,परंतु जीना भूल जाता है, कुछ ऐसा ही वैदेही के साथ हुआ था, जब अगस्त्य आखरी बार शहर जा रहा था, तब उसने कहा था, मेरा इंतज़ार करना..मैं आऊंगा तुम्हारे लिए!
वैदेही ने जवाब में कहा था, हां.. मैं इंतज़ार करूंगी तुम्हारा, तुम्हें आना होगा मेरे लिए!
फिर कुछ दिन बाद अगस्त्य नही आया, बल्कि एक खबर आई की एक्सिडेंट में अगस्त्य की मौत हो गई!
वो आखरी पल था, जब वैदेही ने भी अपना सब कुछ छोड़ दिया था,यहां तक कि खुले आकाश में उड़ने वाली वैदेही अब एक घर के कमरे में बंद पक्षी सी हो गई थी, जो पिंजड़े से तो बाहर थी,लेकिन अब उड़ना नही चाहती हो,बस कमरे के कोने में बनी खिड़की से बाहर ताकती रहती थी, जैसे उसकी आंखे अभी भी अगस्त्य को ढूंढ रही हो,वो खिले रहने वाली वैदेही अब अत्यंत शांत हो गई थी,और मन अब कठोर सा हो चला है, शायद आंतरिक पीड़ा अब समस्त हदे पार कर चुकी है,!
अगस्त्य ने वैदेही को उड़ना तो सिखाया था,पर उसके बिना नही, प्रेम जाते हुए इंसान की रूह तक ले जाता है,जिसके बाद व्यक्ति जीवित तो रहता है,पर जीवन जीना भूल जाता है,अचानक हवा बंद हो गई और डायरी भी, साथ में शायद वैदेही के ह्रदय का दरवाज़ा भी अब सदा के लिए बंद हो गया था,खुली थी तो बस वो खिड़की जिससे देखती हुई वैदेही की नज़रे आज भी अगस्त्य का इंतज़ार कर रही हैं, और एक आवाज़ कि..
तुम इंतज़ार करना,मैं आऊंगा तुम्हारे लिए!
वैदेही ने वो आखरी पन्ना खोला जिसके बाद उसने लिखना छोड़ दिया था, और लिखा मैं आज भी इंतज़ार कर रही हूं तुम्हारा अगस्त्य,तुम्हे आना होगा मेरे लिए!
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