निवेदिता श्री, शितांशु अरुण, रूपम झा

पाँच लघुकथा
निवेदिता श्री
लखनऊ

लघुकथा-१
माँ की चाह
लहराती–बलखाती हवा रुक सी गयी थी,
“दीदी! उदास तो इधर बहुत समय से तुमको देख रही हूँ पर आज कुछ अधिक अवसाद में लग रही हो।हुआ क्या?”
“आज मेरे बच्चे गोष्ठी और बड़े–बड़े कार्यक्रम कर रहे हैं मेरे सम्मान में।”
“फिर तो ये ख़ुश होने वाली बात हुई न दी!”
“एसी कार से आकर,एसी कमरे में बैठ कर,मोबाइल का प्रयोग कर के मेरे घावों पर नमक मल कर की गयी गोष्ठी का अर्थ क्या? काश…एक दिन के लिये ही सही मोबाइल, एसी, कल–कारखाने, यातायात बन्द कर देते तो मुझे भी खुशी होती कि बच्चे पृथ्वी दिवस पर एक दिन ही सही,अपनी धरती माँ को प्रदूषण से मुक्त कर उसके घावों पर मरहम रख रहे हैं ।”

***

लघुकथा-२
बिगड़ रहे हो
चिड़ा – ”कितनी दुबली हो गई हो।पिछले माह ही तो हमारे घोसले में जब आईं तो कितनी हृष्ट पुष्ट थीं।”
चिड़ी –”हां, मां जी कहती हैं नजर लग जाएगी।बाहर न निकल। बाहर फुदके बिना भूख ही नहीं लगती तो दाना नहीं चुगती।मुफ्त में डायटिंग हो रही जी।स्लिम–ट्रिम अच्छी नहीं लग रही तुमको?”
चिड़ा – ”अच्छी तो लग रहीं हो पर कमजोर हो जाओगी।मैं नया घोसला बनाता हूं आज।शाम से खूब फुदकना।”
चिड़ी–” भक्क ! जरा–जरा सी बात पर मनुष्यों की तरह मां –बाप को छोड़ दोगे?बिगड़ रहे हो..”

***

लघुकथा-३
पलायन
“देख लीजिएगा आप एक दिन मैं अपना घर छोड़ कर भाग जाऊँगी टीचर!”
बच्चों की सनक भरी बातों पर वह ध्यान नहीं देती थी।बस सारे बच्चे अपना दुःख उससे बाँट सके इसका ही प्रयास रहता था उसका।आखिर एक समय वह भी तो छात्रा थी।कैसे–कैसे सपने आते थे।घर से भागना भी एक परीकथा सा ही लगता था।
और आज वो सच में अपने बैग में दो जोड़ी कपड़े ले कर खड़ी थी सामने।
“ऐसे बचकाने काम नहीं करते बेटी।बताओ तुम्हारे मम्मी–पापा दुःख और शर्म से मर नहीं जाएंगे?”
“माँ की डायलिसिस रोज होती है।वैसे भी मर ही रही है और पापा मर ही जाएं तो अच्छा है।ये देखिए।”
उसकी पूरी देह पर दाँतो के निशान उसकी अंतहीन पीड़ा कह रहे थे।
“अब नहीं रोकूँगी मेरी बच्ची..”इसके अतिरिक्त कुछ निकला ही नहीं मुँह से।

***

लघुकथा-४
आधुनिका
फोन पर ही दहाड़ मार कर रोने की आवाज सुन कर सीधे उसके फ्लैट पर ही आ गयी,
“क्या हुआ है?इतनी दुखी क्यूँ है?तू तो आराम से लिव इन में थी न।क्या झगड़ा हो गया?”
“क्या कहूँ और किस मुँह से कहूँ कि आज वो किसी और के फ्लैट में चला गया।उसे अब मेरे साथ कोई फीलिंग नहीं महसूस होती, ये कह रहा था।जो पिछले साल भर तक जीने-मरने की कसम खाता रहा।मुझे सब्ज़ बाग दिखाता रहा।अब उसका मन भर गया।ऐसा भी होता है क्या?”
“सच्ची-सच्ची बात बता दिल पर हाथ रख कर।तुझे अधिक पैकेज वाला ,इससे भी हैंडसम लड़का मिलता तो भी तू इसके साथ रहती???”
“………….”

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लघुकथा-५
पहले आप
“माझी जो नांव डुबोए उसे कौन बचाए…”
“क्या भैया सुबह से ही ये क्या मनहूस गाना गाए जा रहे हो?”
उत्तर देने की जगह भैया गीली आंँखों से बहन को ही देखने लगे।
“क्या भाई!किसी गोपी ने दगा दे दिया क्या??चिंता काहे की?तुम तो कृष्ण कन्हैया हो ।कोई एक राधा से तो बंधे नहीं हो”
तभी कमरे से अम्मा निकल आयीं,
”तुम्हारे चरित्तर पता चल गए बबुआ को।चिट्ठी तुम्हारी किताब से जो गिरी वो बबुआ को मिली।अब का मुँह दिखाएंगे घर के मर्द?”
”वही मुंँह दिखाएंगे अम्मा जो दस–दस घर की लड़कियों से प्रेम की पींग बढ़ाते हुए दिखाते रहे।हम तो सच्चा प्यार करते हैं।हांँ नहीं तो..हमारा मुंँह न खुलवाओ।पहिले अपने गिरेबान में झांँके मर्द।”

पाँच लघुकथा।
शीतांशु अरुण
बरारी भागलपुर

लघुकथा-१
इस्तेहार
“जरा उधर तो देखो,कितना मनोरम दृश्य है।” रोहन के बोलते ही सरिता उधर देखने लगी।
” मां से ज्यादा बच्चे का ख्याल भला कौन रख सकती है।”
” हां कह तो तुम ठीक ही रही हो,किन्तु क्या हमारे साथ ऐसा हुआ है।”
दोनों की आंखें नम हो गई और एक दुसरे से नजरें चुराते हुए शुन्य में निहारने लगे।
लॉन में बैठे सरिता और रोहन चाय कि चुस्की के साथ मौसम का आनन्द ले रहे थे। गर्मी का मौसम मन्द मन्द हवा मन में गुदगुदी पैदा कर रही थी।सामने ही वृक्ष पर एक पक्षी अपने बच्चे को दाना चुगा रहीं थी।कुछ क्षण रोहन निहारने के बाद सरिता को बताया था।
” सरिता हमलोगों को भली भांति ज्ञात है कि अनाथ आश्रम में बच्चे क्यों पलते हैं चूंकि हम-दोनों ने उसे झेला है। लेकिन जरा सोचो बृद्ध आश्रम में मां बाप क्यों पलते हैं।”
सरिता प्रश्न भरी नजरों से सिर्फ़ रोहन को देखे जा रही थी।
” उनको तो अपनी घर गृहस्थी रही होंगी,बाल बच्चे होंगे। प्यार से लालन पालन भी किये होंगे। बच्चों का भी घर वसाये होंगे ।फिर भी वे अनाथ क्यों हैं? ”
सरिता निरुत्तर थी क्यों कि इन सारी बातों से ये अपरिचित थी।
” हमें मां पिता का प्यार नहीं मिला जिसके लिए आज तक हम दोनों तरस रहें हैं और जिन्हें मिला वो मां बाप का ही त्याग कर रहे हैं। आखिर ऐसा क्यों?
” मां को तो कई प्रकार कि विवशताएं रही होंगी बच्चे को त्याग करने की, किन्तु बच्चों की…।
” सरिता हम दोनों को मां पिता जी का प्यार चाहिए है न।”
” हां तो ”
” क्यों नहीं हम इसके लिए एक ईश्तेहार लगा दें।”
“क्या कह रहे हो,लोग तुम्हें पागल या सनकी कहेंगे ”
“क्या अंतर पड़ता है बचपन से आज तक ताना ही तो सुनते आए हैं। जरा हम भी तो देखें आखिर मां पिताजी के प्यार में ऐसी कौन सी कमी होती है जो बच्चे उन्हें बृद्ध आश्रम में छोड़ आते हैं।या फिर बच्चे को इनका परवरिश करना भारी लगता है इसलिए….।”
इश्तेहार कि सहमति बनी। इश्तहार लगाया गया।
सप्ताह भी नहीं बिता कि एक दम्पति इश्तहार की प्रति के साथ आ गये।
” आपने ही इश्तेहार लगाया है,हम दोनों पति-पत्नी हैं। ‌बेटा बहू को हमारी सेवा से चीढ़ है‌। हमारी पूंजी उनके परवरिश में समाप्त हो चुकी है ‌।बृद्ध आश्रम में जीवन व्यतीत कर रहा हूं। क्या आप मुझे साथ रखैगे।”
” अरी सुनती हो- मां पिता जी आए हैं। लाडो दौड़ों दौड़ो देखो दादा दादी आ गये।”
,सरिता आकर चरणस्पर्श की,लाडो दादी से लिपट गई।
बृद्ध दम्पति के आंखों में आंसू भर आया। रूंधे स्वर में बोले
“वर्षों से बांहे तरस रही थी किसी को सीने से लगाने के लिए।”

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लघुकथा-२
नेत्रदान

” क्या हुआ आज इतने उदास क्यों हो” सुधा सोफे पर बैठे अपने डॉक्टर पति चन्द्र को चाय थमाते हुए बोली।
” आज मन बहुत बेचैन है,पता नहीं उस मासूम लड़की का क्या होगा।”
” ऐसा क्या हो गया ” पास बैठती हुई सुधा बोली।
” जानती हो सुधे एक दिन मेरे क्लिनिक में शहर के एक प्रतिष्ठित व्यक्ति आये थे।जब वो अपना दास्तां सुनाया तो मेरा रुह कांप उठा था।”
सुधा चुपचाप उनके चेहरे को निहारने लगी।
” बताया मेरी एक पौत्री है स्नेहा। जब वो गर्भ में थी तभी सड़क दुर्घटना में उनकी मां पिता की मौत हो गयी थी। जितना मुश्किल से डॉक्टर ने इसे बचाया उतनी ही शिद्दत से मैंने इसे पाल पोस कर बड़ा किया है । इश्वर ने सबकुछ उसे दिया है सिर्फ आंख में ज्योति को छोड़कर। मैं अपना आंख उसे देना चाहता हूं।क्या आप मेरी मदद कर मुझपर उपकार करेंगे। ”
” फिर तुमने क्या….”
” मैंने उन्हें समझाया इस उम्र में..। मेरे पुछते ही उनका गला रूंध गया, आंखें छलछला उठी। रूंधे गले से बोले _आज मैं स्नान के लिए बाथरूम घुसा ही था कि दरवाजे पर दस्तक हुई। स्नेहा को दरवाजा खोलने को कहा। मैं अपने ऊपर पानी डालने ही वाला था कि स्नेहा की चीख सुनाई पड़ी। मैं जल्दी से स्नेहा के पास आया, स्नेहा का पुरा शरीर कांप रहा था मुझसे लिपट कर रोने लगी । मैं सब समझ चुका था। कुछ क्षण रुके फिर मेरा पांव पकड़ते हुए बोले आप मेरी आंखें उसे दे दीजिए। मैं खतरा जानते हुए भी इन्कार नहीं कर सका।”
” तो क्या तुमने आपरेशन कर दिया,सब ठीक तो है?”
” सुनो तो आज आंख पर से पट्टी खुलने का दिन था, मैंने स्नेहा से पुछा पहले किन्हें देखना चाहोगी। बिना देर किए मुस्कुराती हुई बोली अपने दादा जी को। जानती हो फिर एकाएक वो ख़ामोश हो गई।”
” तुमने क्या किया।”
” जब मैंने खामोशी का कारण पूछा तो बताईं मैं तो केवल उनके स्पर्श और आवाज़ को ही पहचानती हूं। भला उन्हें देखकर मैं कैसे पहचानूंगी।”
” मैंने आस्वस्त कराया हॉल में वो अकेले बैठे रहेंगे काला चश्मा लगा कर। पट्टी खुलते ही दौड़कर दादा जी से लिपटकर रोने लगी, किन्तु न तो दादा जी के हाथ में जान थी न उनके शरीर में प्राण।”
चन्द्र बोलते बोलते सिसकने लगा।
” हां उनके हाथ में एक पर्ची थी सुधे जिसपर लिखा था मैंने बहुत दुनियां देख ली शेष जो बची है तुम्हारी नज़रों से देख लेंगे।”

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लघुकथा-३
फ़र्ज़

” मनोज जरा कार पीछे ले चलो तो ।”
अदिति अपने पति के साथ शहर जा रही थी। मुख्य रास्ते पर जाम लगा हुआ था इसलिए वैकल्पिक रास्ते से निकल रहे थे।
” क्यों क्या हुआ?”
” कुछ नहीं,तुम पीछे ले चलो।”
” तुमको देर हो जायेगी।”
” कोई देरी नहीं होगी,जरा जल्दी करो।”
मनोज अनमने ढंग से कार बैक कर पीछे लाया।
सड़क किनारे एक महिला को दो तीन महिलाएं सम्हाले हुए खड़ी थी।दो चार पुरुष किसी भी सवारी गाड़ी को रोकने का प्रयास कर रहे थे, किन्तु सुनसान रास्ते के कारण कोई गाड़ी रुक नहीं रही थी। कार रुकते ही अदिति झट से उतर कर उस महिला की जांच करने लगी और जोर से आवाज लगाई
” मनोज तुम जल्दी से कार से बाहर आ जाओ”
” क्या तुम इसे अपने साथ ले जाओगी देखती नहीं हो सारा शरीर कीचड़ से भरा पड़ा है।गाड़ी खराब हो जायेगी।”
” पहले तुम बाहर आओ ” अदिति की आवाज में कठोरता थी।मनोज जैसे ही कार से बाहर निकला कि अदिति अन्य महिला के सहयोग से उस महिला को कार के अन्दर ले ली।
” तुम्हें कुछ नहीं होगा बस हिम्मत रखो” अदिति उसे हिम्मत दिलातीं हुई बोली।
महिला ज़ोर ज़ोर से चिल्ला रही थी।कुछ ही क्षण पश्चात बच्चा के रोने का आवाज आया,बाहर खड़े सभी लोगों के होंठों पर मुस्कान छा गई। लेकिन मनोज क्रोध से लाल पीला हो रहा था और अदिति पर चिल्लाते हुए कहा –
” तुम पुरे कार को खराब करवा दी,अब हम कैसे चलेंगे।”
अदिति शान्त स्वर में बोली-
” इन्सानों की जान से ज्यादा इस कार की कीमत नहीं है।”
” गाड़ी कौन साफ करेगा तुम्हारा बाप।”
बाप का नाम सुनते ही अदिति उससे ज्यादा आवाज में चिल्लाती हुई बोली
” बस इससे आगे कुछ मत कहना…।’
” बोलना क्या जी तो करता है कि तुम्हें…..।”
बोलते हुए मनोज अदिति पर हाथ उठा दिया, अदिति भी आपे से बाहर हो गई और मनोज का हाथ पकड़कर झिड़कते हुई बोली –
” भीख की गाड़ी पर इतना घमंड ”
क्या कहा ये भीख की गाड़ी है।”
” और नहीं तो क्या है-सिर्फ फटे कपड़े पहन कर लोगों के आगे हाथ फैला कर भीख मांगना ही भीख नहीं है।किसी बेटी के बाप के आगे भी मांग रखना भीख ही है।ये कार भी तो तुम्हें मेरे ही बाप ने भीख में दिया है।”
अदिति की बात सुनते ही मनोज का सर चकरा गया। उसे लगने लगा जैसे कोई भरे बाजार में बदन का सारा कपड़ा उतार कर नंगा कर दिया हो।शर्म से अपना गर्दन झुका लिया।
अदिति समझाते हुए बोली –
” डॉक्टर का कर्तव्य के साथ फ़र्ज़ भी होता है कि किसी भी परिस्थिति में मरीज़ का जान बचाने का प्रयास करना और मैंने भी वही किया जो मुझे करना चाहिए था। ये क्यूं भुल गये तुम कि मैं तुम्हरी पत्नी के अतिरिक्त एक डॉक्टर भी हूं । ”

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लघुकथा-४
का वर्षा जब कृषि सुखाने।
“नहीं नहीं मालिक आप मुझे छोड़कर मत जाइए, मेरी जिंदगी बचपन से लेकर आज तक आप के साथ ही गुज़री है।आप चले गए तो मेरा क्या होगा।”
भोला का रो रोकर बुरा हाल हो रहा था।
धन्नी बाबू बिस्तर पर लेटे-लेटे अन्तिम सांसें ले रहे थे। धन्नी बाबू धन से ही नहीं व्यवहार के भी धनी थे, किन्तु सारी जिंदगी बेटा बेटी बहु दामाद के प्यार के लिए तरसते रहे थे।जब धन्नी बाबू को लकवा मार दिया तो सेवा के भय से सारे लोग घर छोड़कर चले गए थे।जब अन्तिम समय का खबर मिला तो सम्पत्ति के लालच में सभी जुट गए ।
” मेरे पास जितनी भी सम्पत्ति है उनमें से आधी सम्पत्ति का मालिकाना हक भोला को जाता है,शेष बचे सम्पत्तियों में मेरे बेटे बेटी का हक़ होगा।”
वकील साहब का वसियत पढ़ते ही सारे परिवार के लोगों में अफरातफरी मचने लगी।
” ऐसा नहीं हो सकता है।हमलोग ऐसा होने भी नहीं देंगे।भोला हमारे घर का सदस्य नहीं बल्कि मेरे घर का नौकर है।” बड़ा भाई जब ये बोला तो छोटा भाई भी चीखकर बोला
” हमलोग मिलकर मुकदमा करेंगे।”
वकील साहब मुस्कुराते हुए बोले –
“कोई फायदा नहीं,ये सारी सम्पत्ति आपकी पुस्तैनी नहीं बल्कि इनके स्वयं से अर्जित की हुई है।ये जिन्हें चाहेंगे उन्हें दे सकते हैं और फिर ये रजीस्टर्ड वसियतनामा है।”
” हममें से कोई भी आग नहीं देगा और ना ही श्राद्ध करवायेगा।”
” उसकी भी व्यवस्था में कर चुके हैं। जरा पुरी वसियत सुन तो लो।”
वकील साहब कुछ क्षण रुके फिर पढ़ने लगे-
” हमें पता है कि जो मेरे जीते-जी कद्र नहीं किया वो मेरे मरने के बाद क्या करेंगे इसलिए यदि मेरे परिवार के लोग कर्मकांड करने से इन्कार करते हैं तो सारा कर्मकांड का अधिकार भोला का होगा।” सारे सदस्यों के पांव तले से जमीन खिसकने लगी।
” तो ठीक है सब काम भोला ही करायेगा।” बहु चील्लाती हुइ बोली।
वकील साहब आगे पढ़ना शुरू किये –
“चूंकि मेरे बेटे बेटियों ने कभी पुत्र धर्म का पालन नहीं किया है, इसलिए हमने धर्म पुत्र के रूप में भोला को पुरे होशोहवास में स्वीकार किया है”।
अब इन लोगों को गलती का एहसास होने लगा था।धन्नी बाबू का गला घर्राने लगा।लोग मुंह में जल देने लगे।भोला दूर बैठा एकटक धन्नी बाबू को निहारे जा रहा था। अपने पिता जी का कष्ट देखकर बड़ा बेटा को रहा नहीं गया और भोला को पकड़ कर रोते हुए उठाकर जल देने कहा।भोला को पास देखकर धन्नी बाबू के होंठों पर मुस्कान छा गई। ज्योंहि भोला गंगा जल के साथ तुलसी दल दिया कि धन्नी बाबू इस दुनियां को….।
सारे परिवार के लोग वर्षों बाद आज धन्नी बाबू के सीने से लगकर रो रहे थे। किन्तु अब ‘ का बर्षा जब कृषि सुखाने’।

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लघुकथा-५
किंकर्तव्यविमूढ़
” किसी भी कीमत पर वंदी को सफल बनाना है।कुछ भी हो जाए किसी को भी इस जाम को तोड़ने नहीं देना है।”
हरि चीख चीखकर कर लोगों को ललकार रहा था।
” भाई साहब मेरे एम्बुलेंस पर गंभीर स्थिति में एक मरीज हैं,अगर समय पर अस्पताल नहीं पहूंचा तो शायद जान भी जा सकती है।”
” तो हम क्या करें पार्टी का उसूल तोड़ दें।”
” आप चाहें तो रास्ता बन सकता है।”
” लेकिन मैं नहीं चाहूंगा कि वंदी असफल हो।”
एम्बुलेंस का चालक बार बार निवेदन करता रहा किन्तु उन पर कोई असर नहीं पड़ रहा था तभी एक व्यक्ति पीछे से आकर बोला-
” अरे हरि तुम जानते भी हो कि उस एम्बुलेंस में कौन है। उसमें तुम्हारे ही पिता जी हैं।”
इतना सुनते ही हरि बेचैन हो गया और दौड़कर पिता जी के पास आया। पिताजी हरि का हाथ पकड़ते हुए बोले –
” बेटा किसी भी तरह मुझे बचा लो।”
हरि रोते हुए कहा
“आप को कुछ नहीं होगा मैं रास्ता बनाता हूं।”
हरि दौड़ते-भागते अपने साथियों से निवेदन करता रहा किन्तु हरि की आवाज भीड़ में दब कर रह गई। हरि रोते हुए वापस पिता जी के पास आया लेकिन तब तक तो….।
” हरि कौन है” नेता जी अपने जत्था के साथ एम्बुलेंस के पास आकर पुंछने लगे।हरि आश्चर्य से नेता जी को देखते रहा। जब कोई कार्यकर्ता ने बताया कि यही हरि है तो नेता जी अपने गले से माला निकाल कर झट से हरि के गले में डाल दिया और हरि का हाथ हवा में उड़ाते हुए बोले –
” इसके जैसे समर्पित कार्यकर्ताओं के बल पर ही तो पार्टी टीकी है।” बोलते हुए नेता जी वहां से चल दिए।
हरि को समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करें हंसे या रोयें तो पत्थर कि मूर्ति के भांति स्थिर होकर स्वयं से बोला।
” वाह रे मेरा त्याग जिसके कारण मेरा सबकुछ लूट गया वो मुझे पहचानते तक नहीं।”
हरि किंकर्तव्यविमूढ़ सा कभी गले में पड़े माला को,कभी पिता जी के पार्थिव शरीर को तो कभी दल बल के साथ जाते हुए नेताजी को देखता रहा ।

पाँच लघुकथा
रूपम झा
गाजिया बाद

लघुकथा-१
गरीबी और पूस की रात
पूस की कड़कड़ाती ठंढ, ऐसे मानो हड्डियाँ बर्फ की मानिंद गल रही थी। पूरे शरीर का लहू जम रहा था। कोहरे के कारण दो गज की दूरी पर खड़ा आदमी नहीं दिख रहा था। ऐसे मौसम में झुनिया को चार बजे भोर में उठकर चावल तैयार करने के लिए धान उसना करना था क्योंकि; मुट्ठी पर चावल भी नहीं था घर में जिसे पका कर वह अपने चार बच्चों का पेट भरती।
वस्त्र के नाम पर उसके पास एक सूती साड़ी थी,एक बाजू फटी हुई ब्लाउज और तीन जगह से गाँठ बँधी हुई खोड़का।
पति की एक फटी हुई धोती थी,उसी को दोहरा कर उसने ओढ़ लिया और फटाफट लग गई दोचुल्हे में पुआल झोंकने। चूल्हे के ऊपर मिट्टी की बड़ी- बड़ी हाँडी रख कर उसमें भिगोया हुआ धान डालकर जैसे ही उसने पुआल में आग जलाकर चुल्हे में डाला,उसके ठिठुरते हुए बदन को बड़ी राहत मिली। आग की गरमाई से उसकी साँसों में भी गरमी और फुर्ती आ गई। दनादन एक पे एक हँडिया भर भरकर उसने छ: बजे सुबह तक सारे धान उसन लिये। सुबह होते ही सब बच्चे जग गए। तीन बच्चे थोड़े बड़े हो गए थे तो समझदार भी हो गए थे। गरीबी क्या होती है? उन तीनों को भली-भाँति पता था किन्तु, छोटी बच्ची नासमझ थी। नाम था लाडो!
लाडो ने आँख मलते-मलते बड़ी मासूमियत से माँ से पूछा…………”माँ ये गरीबी क्या होती है?”
माँ उसे बताना नहीं चाहती थी पर उसके कोमल मन को समझाना भी जरूरी था। उसने अपनी लाडो को गोद में उठाकर पुचकारते हुए कहा………” जब इतनी ठंढ में माँ काम करती है और लाडो के पापा रात को खेतों में ठिठुरकर चोरों से अपने फसल की रखवाली करने जाते हैं फिर भी लाडो हँसती नहीं है तो उसे गरीबी कहते हैं। इतना सुनते ही लाडो खिलखिलाकर हँस पड़ी और फिर उसी मासूमियत से बोल पड़ी………लो भाग गई गरीबी।”
इतने में छगन भी खेत पर से आ गया और सबकी खुसर-फुसर सुनकर बोला…….क्या पंचायत चल रही है? सबेरे- सबेरे इतनी ठंढ में बच्चों को क्यों जगा दिया?जानती है लाडो की माँ! पूस की रात अमीरों के लिये हैं,हम गरीबों को बड़ा सताती है रे! लेकिन तू चिंता मत कर इस साल फसल अच्छी हुई है,तुझे एक नई चद्दर जरूर खरीद दूँगा। अब झुनिया भी गुलमोहर की तरह सूर्ख लगने लगी थी…..हँसती हुई बोली जिसके घर में लाडो हो, वहाँ न गरीबी टिकेगी ना पूस की रात कुछ बिगाड़ पाएगी। हमारा साथ ही हमारा अलाव है, लाडो के बापू!

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लघुकथा-२
प्रवासी पंछी

सुलोचना जब से नए शहर में आकर रहने लगी थी,उसका मन तरह-तरह की विविधता पूर्ण विचारों में खोया रहता था। कभी प्रकृति को लेकर,कभी जीव- जंतुओ को, तो कभी इन रंगारंग पंक्षियों की चहचहाहट उनके मन- मस्तिष्क को झंझोरती रहती थी। लगभग छ: माह हुए थे उसे राजधानी छोड़े हुए और दक्षिण में पड़ाव डाले। विगत अट्ठाईस वर्षों से वह भारत के विभिन्न प्रदेशों में विचरण कर रही थी,,,,,,,बिल्कुल उस प्रवासी पक्षियों की तरह जो अपने शरीर के अनुकूल जलवायु और भोजन की तलाश में इस प्रदेश से उस प्रदेश की तरफ अपना रुख कर लेता है,,,,या यों कहें की जीवन- यापन हेतू उसका इस कदर भटकना अनिवार्य है।
सुलोचना जहाँ रह रही थी वह एक छोटा सा शहर था,जो दक्षिणी भारत के क्षेत्र में आता है। तीन मंजिल का मकान था जिसमें सबसे ऊपर तीसरी मंजिल पर वह रहती थी। कमरों के आगे खुली छत थी,इसलिए सुबह तड़के ही पंछी गण कलरव करने लगते थे और सुलोचना उन्हें देखकर कुछ पल के लिए मंत्रमुग्ध हो जाती थी। चीं-चीं,चूँ-चूँ,,,,,अहा! कितनी प्यारी शब्द ध्वनि,,,,,मन प्रफुल्लित हो जाता था उसका। घर के चारों तरफ कुछ दूर पर ही अमलतास और गुलमोहर,,,,,,,चेरी,सखुआ और सागवान के बड़े-बड़े पेंड़ थे जिससे वायु भी शुद्ध मिलती थी। बड़ा ही शुकून था उस इलाके में,,,,,,,आठों पहर मदिर-मदिर ठंढ़ी हवा बहती रहती थी जो तन से लेकर मन तक शीतल कर जाती थी। अमलतास के पीले- पीले फूल जब गुलमोहर के रक्तिम फूलों से मिलते थे तो ऐसा प्रतीत होता था मानो हल्दी और कुंकुम का मिलन हो रहा हो।
सुलोचना रोज सुबह उठकर अपनी दिनचर्या में लग जाती ,,,,,,,उसके पति पास में ही किसी निजी उद्योग विकास कार्यालय में काम करते थे। वो फजीरे लगभग आठ बजे अपने कार्यालय के लिए प्रस्थान कर जाते थे,,,,,,,,,,उसके बाद सुलोचना अपने दैनिक कार्यों को पूरा कर दिनभर प्रकृति के विभिन्न रूपों और गतिविधियों का अवलोकन करती रहती थी।
रोज की भाँति उस दिन भी वह वही क्रियाकलाप दोहरा रही थी कि उसका ध्यान सहसा उन गोरैये के जोड़े पर गया,,,,,,,जो पता नहीं कितनी देर से एक-दूसरे को कुछ समझाने की कोशिश कर रहे थे। सुलोचना उसकी भाषा तो नहीं समझ पा रही थी किंतु भाव स्पष्ट समझ में आ रहा था कि वों अपने घोंसले बनाने की क्रिया में आपस में जिरह कर रहे थे। शायद यही कहते होंगे,,,,,,,”हम प्रवासी हैं,,,,,,ज्यादा दिनों तक अपना बसेरा कहाँ रहता है?,,,,,,,,,जब तक बच्चे बड़े हो जाँय तबतक घोंसले को व्यवस्थित रखना है,,,,,,,फिर कहींऔर बसेरा बना लेंगे।”
सुलोचना का अन्तर्मन विह्वलता की पराकाष्ठा पार कर गया।
उसका मन एकबार फिर भारी हो गया और वह सोचने लगी,,,,,,,,,वो भी तो आज अट्ठाईस वर्षों से प्रवासी की तरह ही जी रही है,,,,,,,,,कभी इस शहर तो कभी उस शहर! कुछ सालों का पड़ाव फिर गमन। आखिर कबतक इन प्रवासियों की तरह उसे भी शहर-दर-शहर भटकना पड़ेगा? सहसा उसके अन्तर्मन से एक आवाज़ आई,,,,,,,,री बावरी! ये सम्पूर्ण संसार ही पर्यटन स्थल है,,,,,,,यहाँ सभी प्रवासी ही हैं।

***

लघुकथा-३
चुलबुली चिरैया

बात कुछ समय पहले की है। बेला लोकल ट्रेन से सफ़र कर रही थी। लोकल ट्रेन में बैठना ही उसके जीवन का पहला अनुभव था। उसे ये भी नहीं पता की,,,,ऐसे ट्रेन में कोई क्लास नहीं होता। ” सब धान साढ़े बाईस पसेरी” ये लोकोक्ति बड़ी फिट बैठ रही थी। जैसे तैसे टिकट घर से टिकट लेकर वह प्लेटफार्म पे इंतज़ार करने लगी। रेलगाड़ी समय से लगभग डेढ़ घंटे लेट थी,वह ऊब चुकी थी किंतु कोई दूसरा विकल्प भी नहीं था। सर्दी का मौसम था,ठंढी हवा ने झकझोरा तो उसे लगा,,,,,,क्या है? इतना क्यों परेशान होना,,,,,,एकबार ये अनुभव भी सही,,,,,आखिर इतने लोग इस ट्रेन में सफर करते ही हैं,मैं कोई अनूठी थोड़ी हूँ।
विचारों का उहापोह टूटा,ट्रेन प्लेटफार्म पे लग चुकी थी,वह दौड़ कर एक डब्बे में चढ़ गई। भाग्य अच्छा था,बैठने की जगह मिल गई। बेला तो अपनी कुशलता पर फूले नहीं समा रही थी कि इतनी भीड़ में भी उसने सीट हासिल कर ली। सात आठ स्टेशन के बाद एक औरत चढ़ी साथ में एक बहुत ही प्यारी सी बच्ची,यही कोई पाँच साल की रही होगी। उसको देखते ही जैसे बेला को भीड़ में कोई अपना मिल गया,जैसे तैसे उसको अपने बगल में बैठा लिया और अपने शॉल से उसके कान ढकने लगी। अगले ही पल उस बच्ची की निर्भयता और चतुराई देख कर वह दंग रह गई। “नहीं नहीं मुझे ठंढ नहीं लग रही,मेरे जैकेट में टोपा है,,, ,आप अपना शॉल ओढ़िए,आपको ठंढ लग जाएगी।”
बेला अवाक,,,,,अरे यह तो बहुत स्मार्ट है,उसने मन में सोचा फिर पूछा,,,,,नाम क्या है?
“पीहू”
कहाँ जाना है?
” सासनी”
वहाँ से सासनी लगभग छ: स्टेशन बाद थी,सो दोनों के बीच में काफी बात चीत हुई। बेला ने अपने पास के बटर केक और चिप्स देने की जब कोशिश की तो वह नन्ही सी बच्ची बोली,,,,,आपको नही पता? सफर में किसी का दिया नहीं खाना चाहिए। बेला हतप्रभ होकर उसे निहारे जा रही थी,इतने कम उम्र में कोई कैसे इतना समझदार हो सकता है? जबकि चुलबुलापन उसके नस नस में भरा था। देखते- देखते सफर तय हो गया,बेला के मन में वो समा सी गई। उसकी कुछ बातें ऐसी थी जैसे कोई तीस चालीस साल का व्यक्ति बोल रहा हो। दिमाग तो जैसे कंप्यूटर। पूछो,,,जबाब हाजिर। सुंदरता जैसे गुलाब की पंखुड़ी। अदाएँ,,,,मानों कोई मंझी हुई फिल्म अदाकारा हो।
बेला का उसी ट्रेन से अब बराबर आना जाना होता है,किंतु वो सफर उसके जीवन का अविस्मरणीय सफर बन गया। जब भी ट्रेन सासनी से गुजरती है उसकी आँखे उसे बरबस ढूँढती हैं। काश! एकबार फिर उस चुलबुली चिरैया से मिल पाती।
रूपम झा

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लघुकथा-४
अगला पड़ाव
मनोहर लाल लगभग अठारह वर्ष के रहे होंगे? तब से वो घर से बाहर परदेश में नौकरी कर रहे हैं। इसी दौरान उनकी शादी भी हुई और ईश्वर की अनुकम्पा से दो पुत्र रत्न की प्राप्ति भी हुई।
दोनों बच्चे बड़े होशियार, पढ़ने में भी और बाँकी चीजों में भी। मनोहर बाबू की पत्नी भी उनके मनोनुकूल स्वभाव की हैं।
सब दिन सास-ससुर के साथ रहीं और प्रेमपूर्वक बच्चों का लालन – पालन किया।
बच्चे अब सयाने हो गए हैं, अच्छेे पद पर कार्यरत हैं। मनोहर बाबू के रिटायरमेंट का समय नजदीक आ गया है। अबतक जिन्दगी भागम-भाग में गुजर रही है।
अब मनोहर बाबू अपने बेटे का परिवार बसाने की सोच रहे हैं,बेटे की शादी की तैयारियाँ चल रही हैंएक दिन मनोहर बाबू ने अपनी पत्नी से कहा…..सुनो! दमयन्ती……. मुझ जैसा पति पाकर तुम्हारी कोई आकांक्षा पूरी नहीं हुई किन्तु अब हम भी नौकरी से रिटायर हो जाएँगे और घर में बहू भी आ जाएगी। ………हम जवानी में तो साथ नहीं रह सके परंतु अब जो हमारा अगला पड़ाव होगा ना…….सास-ससुर बनने का…….हम उसे खुशनुमा बनाएंगे। हमें बेटी नहीं है……..बहू को बेटी जैसा प्यार करेंगे,खूब खुशियाँ बटोरेंगे। बच्चे काम करेंगे और हम बैठ के अपने गिले- शिकवे की गुत्थी सुलझाएंगे। अब तुम्हें मैं कोई शिकायत का मौका नहीं दूँगा। यह सुन दमयन्ती भी मुस्कुरा उठी और शर्माते हुए यह कह कर चली गई……. “धत्त।”
आगे ईश्वर की मर्जी। अभी खुशी खुशी लग गए दोनों अपने अगले पड़ाव की तैयारी में।

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लघुकथा-५
ओढ़नी

आरूषी एक बहुत ही संस्कारी लड़की थी। एक अच्छी सभ्य परिवार की बेटियों के सारे गुण थे उसमें। माँ – पापा आँख मूँदकर उसपे विश्वास करते थे। बचपन से लेकर सयानी होने तक कभी,किसी तरह की कोई ऐसी गलती उसने नहीं की थी,जिसपर उसके माँ-पापा को शर्मिंदगी महसूस हो।
देखने में तो सुन्दर थी ही साथ ही पहनावा भी बहुत आदर्श था।
सलवार,कमीज और ओढ़नी। बिल्कुल सलीके से रहती थी। अभी बारहवीं में पढ़ती थी किन्तु समझदारी में अपने उम्र से पाँच साल आगे थी।
पिछले कुछ दिनों से वह कुछ सहमी- सी रहने लगी थी,उसकी माँ को कुछ संदेह हुआ तो सीधे पूछ बैठी……..”आरू! क्या बात है? आजकल बुझी- बुझी सी क्यों रहती हो? उसने माँ को आनन-फानन में यह कहके समझा दिया कि कुछ नहीं पढ़ाई का दबाब है।
वैसे कुछ दिनों से उसने अपना नीला सूट नहीं पहना था,माँ ने पूछा…….नीला वाला सूट क्यों नहीं पहनती? ये सुनते ही आरूषी को साँप सूँघ गया। माँ बार-बार पूछ रही थी,वो कुछ जबाब नहीं दे रही थी।
माँ तेजी से उसके कमरे में गई और उसकी आलमारी में नीला सूट तलाशने लगी। कुछ प्रयास के बाद ही सूट मिल गया ,साथ में नीली ओढ़नी भी। ओढ़नी हाथ में लेते ही उसकी माँ कलेजा पीटने लगी………हे भगवान! अब मैं क्या करूँ? जवान बेटी…….कहाँ क्या हुआ?……कैसे फटी ये ओढ़नी?…….पता नहीं कहाँ मुँह काला कर आई?आरूषी की माँ …..कृतिका जोर -जोर से रोए जा रही थी साथ ही आरूषी को लगातर पीटते जा रही थी। दरअसल ओढ़नी फटी भी इस तरह से थी कि संदेह होना लाजमी था।
माँ का कहर सहते-सहते जब आरूषी थक गई,तो जोर से चिल्लाई…….बस कर माँ! बहुत हो गया। पहले सुन तो सही ओढ़नी फटी कैसे?……..गणेश काका सड़क पार कर रहे थे और सामने से एक मोटर साइकिल तेज रफ़्तार में आ रही थी,अगर मैं भाग कर उन्हे नहीं पकड़ती तो वो शायद…….इतना सुनते ही कृतिका सब समझ गई कि क्या हुआ होगा? क्योंकि ;आरूषी के अन्दर एक और गुण था …….दयालुता का।
कृतिका ने रोते- रोते बेटी को गले से लगा लिया। आरूषी बोली माँ! काका को बचाने में मैं गिर गई। काका को तो मैंने बचा लिया पर मेरी ओढ़नी सड़क पर पसर गई और मोटर साइकिल ओढ़नी पर से दौड़ गई। मैं अपनी ओढ़नी नहीं बचा पाई,पर इसका मतलब ये तो नहीं……….. माँ कब तक ओढ़नी का आकलन चरित्र से करोगी।

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