कविता आज और अभीः नारी मन 2


भूल जाती हूँ मैं

भूल जाती हूँ मैं
लोग मुझे बावली कहते हैं

मैं एक पत्नी हूँ
बहू हूँ, माँ हूँ
मेरे बच्चे हैं,

वे बड़े हैं
सब भूल जाती हूँ।

सड़क पर गिल्ली-डंडा खेलते
बच्चों के साथ गिल्ली उड़ाने को
मचल जाती हूँ।

इक्को-दुग्गो खेलती बालाओं
का स्टापू उछाल
मन के दो पैरों से

सात-आठ पर खड़ी हो जाती हूँ ।

तितली का पीछा करते
बालू का कण बन
पंखों पर अटक जाती हूँ।

समुद्र किनारे बने
रेत के महल को
कदमों तले दबाती हूँ

आकांक्षाओं से उन्हें
फिर से बनाती हूँ।

मोमी रंग की कलम बन
बालक की उँगलियों से फिसल
कोरे कागज़ पर

गुचड़-मुचड़ कर आती हूँ।

अपने ही भीतर फिर
झूम के खिलखिलाती हूँ

भूल जाती हूँ मैं
कि लोग मुझे बावली कहते हैं।

मैं हूँ…

अबला नहीं सबला हूँ मैं।
बुझा न सको जिसकी आँच को,
ऐसी शुद्ध प्रज्ज्वला हूँ मैं।

अशक्त नहीं सशक्त हूँ मैं।

ममता, करुणा, दया में न बाँटो,
इनके तप से अविभक्त हूँ मैं।
निकृष्ट नहीं उत्कृष्ट हूँ मैं,

मानव जाति की जन्मदायिनी
इस संसार की सृष्ट हूँ मैं।
भीति नहीं साहस हूँ मैं।

हाथ छोड़ न सको जिस तन
ऐसा कठोर लौहरस हूँ मैं।
अपमान नहीं स्वाभिमान हूँ मैं।

नहीं हो कम न ही चाहूँ ज्यादा
अब बराबर सम्मान हूँ मैं।
हिम नहीं ज्वाला हूँ मैं।

बहुत सह लिया अस्तित्व का ह्रास
निज मुख स्वयं निवाला हूँ मैं
भिक्षा नहीं परीक्षा हूँ मैं।

निस्वार्थ साथ जीवनभर दे जो,
दीक्षामय अन्वीक्षा हूँ मैं।
अपव्यय नहीं मितव्यय हूँ मैं।

नहीं घटूँगी तुम्हारे कर्मों / कृत्यों से
अपने हित की अव्यय हूँ मैं।

संताप नहीं हरिताभ हूँ मैं।

जन्म से पहले मारने वालों
अमृत पीकर अमिताभ हूँ मैं।
क्षीण नहीं ताकत हूँ मैं।

सम्बल दे सकूँ हर दुर्बल को
दुश्मन के लिए हिमाकत हूँ मैं।

देवी नहीं नारी हूँ मैं।

पूजो मत मानव समझो बस
समभाव भरी आभारी हूँ मैं।

-डॉ. आरती ‘लोकेश’
-दुबई, यू.ए.ई.

Mobile: +971504270752
Email: arti.goel@hotmail.com


चंदा तारे
शब्द बनकर बह चले मेरे सब चन्दा औ तारे
बहुत जतन से जो मैंने अपनी चूनर पर थे टांके
पक्की गांठ लगाकर टांका वह जोड़ा था
सूंई तो बहुत नुकीली थी, धागा ही कुछ छोटा था ”

बीज और वृक्ष

इस बीज के वृक्ष बनने से पहले इसकी धूप, हवा और खाद-पानी
सब कुछ मैं ही तो हूँ
क्योंकि यह बीज और वृक्ष
दोनों, मेरे अपने ही तो रूप।

नदी हूँ मैं
तुम्हारी कोख से जन्मी
तुम्हारी गोद में खेली
फिर बह चली
दुनिया की राहों से
आकांक्षाओं के समंदर की ओर
बिना जाने
कौन सी गोद मेरी
कौन सा घर
मेरा घर आंगन

या यही बस एक समाधि
मेरी इति और नियति

निगल चुका है एक ज्वार
एक सिंधु मुझे..

और तुम यूँ शांत
अटल पर्वत-सी आज भी
इंतजार करतीं
मेरे लौट आने का

ओस बिन्दु-सी कांपती
अपनी ही नेह उष्मा में

ललक-ललक

हिमपातों से घिरी
पर अपने ही विश्वास में
जमी-थमी।

काली और दुर्गा
मीरा राधा और सोहनी
असफल दास्तानें हैं
अधूरे प्रेम की
इनमें गौरव मत लेना
भटक रहीं आज भी ये
सीता ने तो इतने दुःख सहे
नाम रखने तक से कतराते लोग
बेटियों के, एक छल ही तो
नारी जीवन सदा से
प्रेम आधा-अधूरा पल
खुशबू सा जो उड़ा
अर्धांगिनी कब पूरी हुई
एडम की पसली से बनी
उसके लिए ही तो गई गढ़ी
आजीवन जाती छली
बाजारों में बिकती
घर के अंदर भी
तिरस्कार सहती
बस मंदिरों में देवी पुजती
कितनी भी त्रासद हो रात
बिन्दिया माथे पर इसके
हर सुबह ही
सूरज सी उगती

ये पायल बिन्दी और कजरा
कितनी जंजीरें बांधी
कितने भ्रम पाले
बनने को कठपुतली
या फिर हाथों का गजरा
पोंछ आँसू उठो निर्भया
एक रूप तुम्हारा ही
रणचंडी काली और दुर्गाॅ!

शैल अग्रवाल
बरमिंघम, यू.के.

अगर सच में जानना चाहते हो मुझे तो,
किसी साँचे में डालकर मत देखो, चूक जाओगे।

नीले-नीले आकाश-सी मैं,
उमड़ते-घुमड़ते बादल, चमकती बिजलियाँ कभी,
बरसती नन्हीं-नन्हीं फुहारें भी।

किसी धरौंदे में कैद ना करो, चूक जाओगे।

चमकते सूरज-सी रोशन मैं,
दहकता आग का गोला, प्रकाशित दोनों जहाँ जिससे,
इन्द्रधनुषी न्यारी-प्यारी किरणें भी,

दीपक ना समझ लेना, चूक जाओगे।

विशाल फैले समुन्दर-सी मैं,
उठती तूफानी लहरें, साहिल से मिलने की प्यास में,
शांत फिर-फिर लौट आती।

बहता सोता ना मान लेना चूक जाओगे।

अगर सच में जानना चाहते हो मुझे तो,
किसी साँचे में डालकर मत देखो, चूक जाओगे।

बहार हूँ मैं, पतझड़ भी मुझमें है।
जय हूँ मैं, पराजय भी मुझमें है।
झूठ हूँ मैं, सच भी मुझमें है।
दोस्तों की दोस्त, दुश्मनी भी मुझमें है।
सीता हूँ मैं, कैकयी भी मुझमें है।
सावित्री हूँ मैं, रक्षा भी मुझमें है।
माँ हूँ मैं, बेटी भी मुझमें है।

नारी हूँ मैं, नर भी मुझसे है।

पंचतत्व की दुनिया है ये
ये दुनिया सारी मुझमें है,

ये दुनिया सारी मुझसे है।
अगर सच में जानना चाहते हो मुझे तो,
किसी साँचे में डालकर मत देखो, चूक जाओगे।

गुनगुनाती धूप -सी मैं, बादलों की छाँव भी।
खिलते गुलों की रूप-सी मैं , पतझड़ी बरसात भी।
गुनगुनाती धूप-सी मैं—-

तपन सूरज की है मुझमें, चन्द्रमा की छुअन भी हूँ ,
राम की सीता हूँ मैं, सुरबाला -सी सौगात भी ।
गुनगुनाती धूप-सी मैं—–

मुझको बाँधों तुम न फिर से, चंचला -चपला भी हूँ।
गाँव की गोरी हूँ मैं, जग की बुलंद आवाज भी।
गुनगुनाती धूप-सी मैं—–

हर किसी साँचें में ढलती ,मैं निराली चेतना हूँ।
रूकती, झुक जाती कहीं भी, वो अमर जज़्बात भी।
गुनगुनाती धूप-सी मैं—–

सृष्टि की अनुपम हूँ रचना, हर कवि की कल्पना हूँ ।
नर को नारायण बनाती , वो अनोखा साज भी।
गुनगुनाती धूप -सी मैं——

डॉ इन्दु झुनझुनवाला


” मेरा अस्तित्व!”
बनी रहूंगी तनी रहूंगी मैं
एक मुट्ठी की तरह
धनुष पर खिंचे बाण सी
समेट कर उंगलियाँ हथेली पर
दाब दोगे जमीन पर
तो भी अंकुरित होती रहूँगी
मेरी जड़ें काट कर
बोनसाई बनाने की
कोशिश करोगे जितनी
उतनी ही बढती रहूंगी मैं
बरगद की तरह
अपनी मुट्ठी की ताकत को
शस्त्र बना कर
उँगलियों को अस्त्र बना कर
रचूँगी एक नया इतिहास
मैं अबला नहीं -सबला हूँ
संतुलित रह कर
तराजू कांटे की तरह
अब नहीं झुका सकोगे तुम
कभी इधर कभी उधर
क्यूंकि अब मैं
जान गईं हूँ कि
ओस की बूँद की तरह नहीं
मेरा अस्तित्व
जो क्षण में समाप्त हो जाए !


स्वयंसिद्धा !”

अपने भंवर में फंसी रहूँ
ऐसी नहीं नदी हूँ मैं
अपने आवेगों से लड़ती
जीवन पथ में आगे बढती
विश्वास भरी सदी हूँ मैं
राम रहीम ,रहमान -कृष्ण संग
काशी काबा ,वृन्दावन तक
संस्कारों की सविता सी
आभा और संस्कृति हूँ मैं
चाल मेरी तूफानी है
लय हूँ जीवन की
बंधी नहीं समुन्द्र सी पर
उसके गहरेपन की
अभिव्यक्ति हूँ मैं
हार न कभी मानूंगी
तज कर नारी के संत्रास
रचूँगी एक नया इतिहास
विश्व प्रकृति का आह्वान करुँगी
नियति को ललकारती
एक सार्थक जिद्द हूँ मैं
शब्दकोशी ज्ञान लिए
एक स्वयंसिद्ध हूँ मैं !

– सरस्वती माथुर
जयपुर, भारत

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