नयना आरती कनिटकर, अर्चना राय, ज्योत्सना सक्सेना

पाँच लघुकथा


नयना आरती कनिटकर

लघुकथाृ1
“आर्तनाद”
मैं और अर्जुन आमने-सामने थे. इस संग्राम में हम दोनों ही बराबर थे.कई बार पार्थ के धनुष की प्रत्यंचा काटने के बावजूद भी वे प्रकाश की गति समान पलक झपकते ही पुन: प्रत्यंचा चढ़ा लेते . हम दोनों के बीच दैवीय अस्त्रों के प्रयोग से घमासान चल रहा था. मैनें जैसे ही उसके शिरच्छेदन के लिए नागास्त्र का प्रयोग किया श्री कृष्ण ने उसी समय रथ को थोड़ा भूमि में धँसा लिया और वह बच गया. यद्दपि युद्ध गतिरोध पूर्ण हो रहा था किंतु मैं भी तब उलझ गया जब मेरे रथ का पहिया धरती में धँस गया. मैने धनंजय से बार-बार अनुरोध किया कि नियमों का पालन करते हुए बाण चलाना बंद करे किंतु—-
मेरा शरीर अर्जुन के बाणों से छिद्रित हो रहा था. मैं असहाय सा था. मेरा अंतिम समय निकट जान पड रहा था. बहुत कुछ मेरे आँखो के आगे चल चित्र सा चल रहा था कि कैसे गुरु द्रोणाचार्य ने मुझे शस्त्र की शिक्षा इसलिए नही दी कि मैं क्षत्रिय नहीं था. परशुराम ने मुझे शिक्षा तो दी… मगर साथ ही श्राप से सब हर लिया. अपने अज्ञात माता-पिता के लिए मेरा हृदय हाहाकार करता , मैं शून्य से लड़ता,तड़पता अनगिनत प्रश्न करता रहा किंतु सब मौन.जब माता कुंती से अपने जीवन का इतिहास सुना तो मेरा हृदय विक्षिप्त सा हो गया.एक तथाकथित दिव्य पिता की संतान को कितना अपमान सहना पडा. मेरे पिता सदैव मुझे अपनी आँखो के सामने अपमानित,आहत पीड़ित देखते भी मौन रहे.
द्रौपदी स्वंयवर मे भी मेरे युद्ध कौशल, शरीर सौष्ठव को देखकर उसके आँखो मे आयी चमक को मैं आज तक नहीं भुला पाया हूँ .मेरे धनुष पर प्रत्यंचा चढाते ही धृष्टद्युम्न द्वारा सुतपुत्र कहकर मुझे अयोग्य ठहराया गया. द्रौपदी मुझे वर ना पाई . इसमें उसकी क्या ग़लती थी फिर भी अपमान के ताप में जलता मैं द्युतक्रिडा के वक्त उसे वैश्या कह गया और वही से महाभारत के युद्ध का बिगुल बज उठा.
सच को स्वीकार्य करुं तो हर बार मुझे छला मेरे आत्मभिमानी सहचरों ने मेरे पिता ने, गुरु द्रोण ने, परशुराम ने ,घटोत्कच ने और यहाँ तक कि पितामह ने भी जो सत्य के ज्ञाता होने पर भी दुर्योधन के साथ मेरी मित्रता पर आँखें मूंदे हुए थे.
“हे माते! मैं आज समझ रहा हूँ कि जब एक अभिमानी पुरूष ही पुरूष को छलने की कुटिल चाले चलता रहा तब आप एक कुँवारी माँ बनकर कैसे मुझे स्वीकार कर पाती. आपको वर के रुप में मुझे सौंपना भी एक छल का ही तो हिस्सा था वर्ना क्या वे इसका परिणाम जानते ना थे.
पितृसत्ता के साये में भाई द्वारा रोक देने पर द्रौपदी भी मुझे कैसे वरण करती. उसे वैश्या कहने का प्रतिफल ही ये महायुद्ध हैं.
” हे द्रौपदी! तुम वाचाल नहीं हो!. अपने पंच पतियों को ललकारने के लिए तुम्हारे हिम्मत के आगे आज में नतमस्तक हूँ.
मेरे सहित कुंती, द्रौपदी सभी दंभी पुरूषसत्ता के छल की शिकार हुए हैं.
“हे सर्वशक्तिमान ! मुझे क्षमा करना अगले जन्म मे मुझे माता कुंती के उदर——–एक स्त्री के साथ छल की सजा……”
तभी पार्थ के दैविय अस्त्र से शिरच्छेदन….

***

लघुकथा-2
“अंतिम कदम ”
फ्लाइट में बैठते ही मैंने एक दीर्घ श्वास छोड़ा, थोड़ा सामान्य हुई . एक लम्बी ट्रैंनिंग कर मैं घर वापसी के प्रवास पर निकली थी . सुकून था और आत्मविश्वास भी . आज मेरी सबसे नजदीकी किसी की थी तो वो थी डायरी . जो मेरी एक सहेली ने बिदाई में दी थी . तब उसने कहा था
“रख ले जब कभी मन कुछ कहना चाहे और सुनने वाला कोई न हो तब इससे बातें करना .” उस वक्त मुझे थोड़ा आश्चर्य हुआ था किन्तु अब वही मेरी सखी-संगिनी थी . किसी और से जुड़ाव मैं महसूस ही नहीं कर पाई थी .
डायरी में स्थान, समय, कई घटनाएँ बहुत तल्ख़ थी. स्वयं को व्यक्त करना मेरी एक स्वाभाविक आवश्यकता थी .
मैंने अपनी डायरी खोली . “बारिश का वो पहला दिन छोड़ दे तो आगे के अनेकों पन्नो पर बस ….वे मात्र फड़फड़ा कर रह गए थे .
पहला पन्ना शुरू हुआ ….
२५ जून—
बारात वापसी में रात का प्रवास मेरे साथ बैठे बृजेश का गाड़ी में ही अँधेरे का फायदा उठाने का प्रयास …
२६ जून —
अनेक रसम रिवाज में बिता दिन . हनीमून की तैयारी की व्यस्तता के बीच बेसब्र वो पति महाशय ….
१ जुलाई …
उन पांच दिन में वो -मैं और हमारा शरीर साथ थे बस! . हाथो में हाथ डाले घूमते हम संवादों से कोसों दूर. कारबेट के जंगल की वो डरावनी रातें. एक दिन अचानक अल सुबह बाघ के दर्शन .
तेज घुमड़ते बादल , बारिश , मैं – तुम और हनीमून की वो पहली बारिश.जो बाद में बस आँखो से बरसती रही. गीले शरीर से नजदीक आते तुम और एकमात्र संवाद .” आई लव यू टू मच.”
” मी टू” कहने के पहले ही मेरे होठों का स्पर्श .
मैं संवाद के अवसर ढूढ़ती रही और वो लौट गया था मोर्चे पर. जाते वक्त हाथों में हाथ लिए एक वादा लेकर गया . अगर ना लौट सका तो …मुझे उसका स्थान लेना हैं. मैं भरमा गयी . इसने मुझे अभी जाना ही कितना हैं और वादे की बातें.
फिर पन्ने बस भरते रहे न कोई उम्मीद , ना आशा ..बस , बनाना -खाना , सास -ससुर की सेवा , बीच बीच में उनके उलाहने इसके आलावा क्या लिखती . तब मन का क्लेश पन्नों पर उतरा .
मैं पढ़ती जा रही हूँ …
२०अगस्त —
ब्रजेश कुछ दिनों के लिए घर आये . बहुत सी बातें थी जो मैं करना चाहती थी. कुछ बदलाव महसूस कर रही थी शरीर में … पर ..अचानक एक दिन उन्हें फिर से लौटना पड़ा . बातें फिर से अधूरी … क्या करती किससे कहती.माता-पिता अपना कर्तव्य निभाकर मुक्त हो गए थे …
२५ अगस्त —
आतंकवादी हमले की खबर के बाद वो ‘गुड न्यूज’ की रिपोर्ट उसके स्पर्श के बिना यूं ही टेबल पर पडी रही .
फिर एक बार एक मूसलाधार बारिश, सारा आसमां रोया लेकिन मैं गर्भवती वीरांगना बन उसकी इच्छा के खातिर सलामी दे आयी , पर एक भी आँसू ना बहा सकी .
४ सितम्बर —
मेरा जीवन का सबसे कठीन निर्णय .उसका वादा याद आया . मुझे जीवन में दोनों के बीच प्यार का प्रतीक रखना इतना महत्वपूर्ण नहीं लगा . मैंने महसूस किया कि मुझे वास्तविकता में जीना चाहिए. बस! फिर गर्भपात और घर निकाला .
बीचा के पन्नो में पढाई का संघर्ष और बहुत कुछ घटा . पढ़ते पढ़ते आखों से अविरल धरा बहा रही थी .
कब साल बीत गया ….
फिर आया मेरे जीवन का सबसे आनंद का दिन सेना में मेरी भर्ती.
२जुन –से
पेज थोड़ा खून से भरा है …
काँटों, कीचड़, रस्सियों से छिले हुए हाथ। जीवन के सबसे मेहनती दिन जब खाने-पिने तक का कोई होश ना था.
“अब मुझे पता चल रहा है, रे बृजेश .. सचेत न होने का क्या मतलब है। तुम्हारा आँखो में आँख डालकर बात करना याद आता है और मैं ट्रेनिंग के ये कष्ट सहजता से निभा ले जाती हूँ, सच्ची में .
३१ जनवरी ….
पासिंग आउट परेड ….सेना में भर्ती की ओर बढ़ते कदम
पढ़ते पढ़ते आँखे डबाडबा रही हैं . सब कुछ यादें गद्दमगड हो रही हैं .
साथ में चिता में जलती लकड़ियों की आवाज उससे उठती चिंगारी, मैं, डायरी सब विलीन हो रहे आपस में .
सुलगा है तो अब जीवन का नया पन्ना जिसकी किताब बनाने के लिए मैं अब सज्ज हूँ .

***

लघुकथा-3
” दृष्टिकोण ”
वो साप्तहिक हाट बाजार में ले जाने वाले सारे लकड़ी के खिलौने इकठ्ठा करते करते बड़बड़ाता जा रहा था ” बड़ी जल्दी कर दी रधिया तूने जाने की अब तेरे इस नासपीटे बेटे को कैसे सम्हालू समझ नहीं आ रहा .
” शिव ! ओ शिव! ,अरे शिवल्या सुन तो जरा ,अरे इस गठरी को ठेले पर धर और चल मेरे साथ .”
” अब कहा जाना है बाबा ? रोज रोज का झंझट है ये . कभी इस गांव, कभी उस गांव . मई ना जाऊ”
“अरे चल बेटा. ऐवे ही पहचान होवे है सब से . पुश्तैनी धंधा है अपना . ये लकड़ी के खिलौने आसपास के गांव में बहुत प्रसिद्ध है . जब छोरिया मायके आवे तो अपने बच्चो को ले आवे . एक खिलौना जरूर से दिलाए उन्हें .”
” बाबा कोई नहीं लेता अब ये खिलौने . पास के शहर के मॉल में देखों कैसे चाबी के ,तो रिमोट से चलने वाले किस्म -क़िस्म के खिलौने मिलते है . अब बच्चो को वे ही भाते (सुहाते) है .” फाइल के कागजात से अपना सर उठाते शिव ने कहा
” अच्छा चल ठीक है .ये तू क्या कागजो में सर घुसाए बैठा है ”
” बाबा ! इस कागज़ पर अपना साइन ठोंक दो. मैंने बैंक से कर्ज उठाकर वह एक दूकान खरीद ली है वहाँ. मैं अब आधुनिक खिलौने बेचूँगा. ”
“बेटा! ये चमक-धमक ज्यादा दिन की नहीं होती . बहुत ऊंच-नीच चलती है यहाँ बड़े लोगो की . तुम आज नहीं समझोगे .बाबा ने बिना देखे कागज़ पर हस्ताक्षर कर दिए
शिवा कागज लेकर तुरत-फुरत बाहर निकल गया .
बाबा पुकारते रह गए
बाबा ने अपना गठ्ठर उठा ठेले पर डाला और चल पड़ा लखेरापुरा गांव की तरफ .
नयना (आरती) कानिटकर

***.

लघुकथा-4
प्यादी चाल”
चलो सरिता जल्दी तैयार हो जाओ और हा सुनो! वो हरे-गुलाबी काम्बिनेशन की साड़ी है ना वो पहनना.आज बॉस का जन्मदिन है.
” अरे सुधीर !! वो साडी तो तुम्हें पसंद नही है ना ?? याद है जब पिछली बार मैने पहनी तब तुम नाराज़ हुए फिर आज–।”
” हा!हा! तो क्या हुआ पर अखिलेश जी को तो तुम उसदिन इस साड़ी में बहुत अच्छी लगी थी —और हा सुनो! चलते-चलते एक सुन्दर सा तोहफ़ा भी ले चलेंगे। ऑफ़िस मे जल्द ही पदोन्नती की सूची जारी होना है।

जन्मदिन की पार्टी पूरे शवाब पर थी जाम-से जाम टकराए जा रहे —
अरे!! आइए-आइए सुधीर और हमारी खूबसूरत सखी सी सरिता कहाँ रह गई।”
“अरे !! तुम पिछे क्यो खड़ी हो !!!आओ मुबारकबाद दो हमे—अपने दोनो हाथ आगे बढा आलिंगन–
“बहुत शुभकामनाएँ सर!! वही से हाथ जोड़ते हुए सरिता ने कहाँ”—अखिलेश कसमसा कर रह गए.
“सुधीर ने सरिता के कान मे फुसफुसा कर कहा ! क्या होता जो अखिलेश जी का मान रख लेती समझ रही हो ना ,मैने बताया तो था कि पदोन्नति —”
“अखिलेश जी एक तोहफ़ा हमारी तरफ से–” अनमनी सी सरिता आगे बढते हुए बोली
“अरे!! इसकी क्या जरुरत थी” –सरिता से हाथ मिलाते हुए उन्होने हाथ कस कर दबा लिया.”
सरिता हाथ छुडाते हुए चिख पडी!!! अखिलेश जी!!! , सुधीर!!!
’सुधिर !!क्या तुम अपनी तरक्की के लिये प्यादे की तरह मेरा इस्तेमाल करना चाहते हो जो चुपचाप एक-एक घर आगे बढ़ता है.”
शायद तुम नही जानते अगर मैं प्यादी चाल चल दू तो राजा को भी मार सकती हूँ.
सन्नाटा!!!!!

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लघुकथा-५
भूख –
सुभद्रा मेरी पत्नी पिछले एक -डेढ़ सप्ताह से आईसीयू में हैं, वृद्धावस्था ,पुराना मधुमेह और उच्च रक्तचाप से पीड़ित हैं। मैं घर पर अकेला ही हूँ , अपने आप को काफी थका सा महसूस कर रहा हूँ।
बच्चों की भागदौड़ बदस्तूर जारी है। बेटी भी आयी हुई है ।
50 साल का साथ हैं हमारा , उसके चले जाने पर अकेला हो जाऊँगा । मैं थोड़ा भयभीत हूँ , हालांकि मृत्यु अपरिहार्य है।
पर जब वो नहीं रहेंगी तो क्या होगा मेरा , वह बड़ा ध्यान रखती थी बहुत अनुशासित । समय पर भोजन, पानी सब कुछ फिर उसे पता है कि मैं भूख सह नहीं पता हूँ ।अभी ही देखो न अस्पताल के चक्करों के कारण बेटा-बहू व्यस्त है तो खाने-पीने का समय आगे पीछे हो रहा है और मैं परेशान हो रहा हूँ ।
आज सुभद्रा का स्वास्थ्य ज्यादा ख़राब है, इसलिए अभी तक नाश्ता नहीं हुआ है , घर में उस मूड में कोई नहीं है , लेकिन शरीर का क्या मुझे तो …?
ये मैं भूख का क्या ले बैठा हूँ ,इतना स्वार्थी सोचने में शर्म भी आ रही है।

” पापा! ..चलिए अस्पताल जाना हैं ” तभी बहू को रोते मेरे पास आते हुऐ देख मेरे हाथ -पैर ढीले पड़ गए .
उसने मुझे उठाने की कोशिश की .
मेरी आँखों के सामने अब तक का सारा सहजीवन पल भर में उभर आया और उसी क्षण एहसास हुआ कि मुझे बड़ी जोर की भूख लगी है.
नयना आरती कानिटकर

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पाँच लघुकथा

अर्चना राय, भेड़ाघाट, जबलपुर (म.प्र.)
Write to Archana Rai

लघुकथा-1
मदर…टू प्वाइंट ओ

सप्ताह में कम-से-कम चार बार फोन करने वाली माँ का काफी दिनों से फोन नहीं आने पर हाल-चाल जानने आख़िरकार विदेश में बसे बेटे ने माँ को फोन लगा ही लिया।
“हैलो माँ।”
“हाँ, बेटा।” माँ की आवाज़ में एक ख़नक थी। सुनकर उसे झटका-सा लगा। पहले जब भी माँ से बात करता उनकी आवाज़ में दुख और उदासी साफ़ महसूस होती थी।
“आपकी तबियत तो ठीक है न?”
“मैं तो बहुत अच्छी हूँ। तू कैसा है?” सुनकर उसे दोबारा झटका लगा। पहले तो उसके पूछने से पहले ही अपनी शिकायतों का पिटारा ख़ोल कर बैठ जाती थीं। जो फ़ोन रखने तक खत्म ही नहीं होता था। आज उसका हालचाल पूॅंछ रहीं थीं।
“क्या बात है माँ, आजकल आप फ़ोन ही नहीं करतीं?”
“अरे क्या बताऊँ ये ‘दीनू’ है न! ये मुझे एक मिनट भी फुर्सत रहने दे, तभी न करूँ। कभी माॅं, नाश्ते का समय हो गया…माँ, सोने का समय हो गया… माँ, वाॅक पर जाना है…. तो कभी दवा लेकर खिलाने मेरे आगे-पीछे घूमता रहता है।”
“माँ, ये द..’दीनू’ कौन है?”
“अरे! वही तेरा भेजा रोबोट… मैंने उसका नाम दीनू रखा है। अच्छा है न? तेरे बचपन का नाम रखा है।”
“हूँ।”
“बेटा, तूने इस रोबोट का चेहरा और आवाज अपनी तरह बनाकर बहुत ही अच्छा किया है। कभी-कभी तो मैं भूल ही जाती हूँ कि ये तू नहीं बल्कि एक रोबोट है।”
“अच्छा माँ! मुझे आपसे कुछ बात करनी है।”
“हाँ, बोल।”
“आपको तो पता है कि राधिका की डिलेवरी डेट आने वाली है। तो मैं चाहता हूँ आप यहाँ आ जाओ।”
“बेटा, मेरा आना तो संभव नहीं है।”
“पर क्यों?आप तो कब से यहाँ आना चाहती थीं। और अब आप मना कर रही हैं?”
“हाँ! मैं आना चाहती थी। क्योंकि मैं अकेली थी, और बेटे के साथ रहना चाहती थी। पर अब नहीं, क्योंकि अब दीनू मेरा बेटा मेरे पास है। उसके साथ मैं बहुत खुश हूँ।”
“माँ! … आप ये क्या बोल रहीं हैं?”
“बेटा मैं तो नहीं आ सकती हूँ, पर तेरे लिए एक सलाह जरूर देती हूँ।”
“क्या?”
“जिस तरह तूने अपने जैसा हू-ब-हू दिखने वाला रोबोट बनाया है। वैसे ही अपनी माँ की तरह दिखने वाला रोबोट भी बना ले। जो माँ वाली जरूरत पूरी कर दे….अच्छा! मैं फोन रखती हूँ। मेरी वाॅक का टाइम हो गया है। मेरा बेटा दीनू मुझे बुला रहा है।”
कहकर उन्होंने फोन काट दिया।

***

लघुकथा-2
सीढ़ी
उनके दिन के चैन के साथ, रातों की नींद भी उड़ गई थी। एक वायरल वीडियो ने महज चंद दिनों में ही उनकी बुलंदी को अर्श से फ़र्श पर ला दिया था। उसे बचाने उन्होंने क्या कुछ नहीं किया,…मीडिया कांफ्रेंस रखी,…खुला मंच रखकर घोषणा पत्र जारी किया,..और भी बहुत कुछ,पर वे अपने व्यापार को डूबने से न बचा पाए। दशकों से कमाई इज्जत चंद दिनों में धूल हो गई और वे कुछ न कर सके थे। एक आखिरी कोशिश के लिए आखिर वहाँ पहुॅंच ही गए जहाँ वे जाना नहीं चाहते थे।
“तुम्हारा मैंने क्या बिगाड़ा है?”
“जी,…मैं कुछ समझा नहीं?”
“मेरी कंपनी के उत्पाद एकदम शुद्ध हैं। उनमें कोई मिलावट नहीं है। यह देखो इंडियन लैबोरेट्री का प्रमाण पत्र।”
“ये आप मुझे नहीं जनता को जाकर दिखाइए।”
“जनता सबूतों को कहाँ देखती है, उसके लिए तो उसके प्रिय अभिनेता ने जो बोल दिया उनके लिए वही सच हो जाता है। इसलिए यह सबूत मैं आपको दिखाने लाया हूंँ कि शायद आप…”
“सर, इनकी जरूरत नहीं है। मैं जानता हूंँ, आपकी ईमानदारी को।” जवाब सुनकर वे प्रश्नवाचक नजरों से देखने लगे।
“हाॅं भाई! सच कह रहा हूंँ। विश्वास न हो तो देख लो आप के ब्रांड के प्रोडक्ट ही मैं इस्तेमाल करता हूंँ।”
” अच्छा?…तो फिर आपने ऐसी झूठा विज्ञापन क्यों किया?”
“वह क्या है न सर, आजकल मेरा करियर कुछ खास आगे बढ़ नहीं रहा था,इसलिए!…”
“आपने अपना करियर आगे बढ़ाने के लिए मेरे दादाजी के नाम के ब्रांड को बदनाम कर दिया।” कहते हुए उनकी आँखों में नमी तैर गई।
“अगर ऐसा था तो, मैं ही क्यों?…किसी बेईमानी करने वाले को चुनते।”
“वह क्या है न सर? बेईमान को बेईमान कहने से वह पब्लिसिटी नहीं मिलती जो ईमानदार को बेईमान…”-कहते हुए वह ढ़िठाई से हॅंसने लगा।

***

लघुकथा-3
डोरियाॅं
अस्पताल के बेड पर पड़े -पड़े दुख और ग्लानि से उनका दिल बैठा जा रहा था। जब से उन्हें पता चला कि उनके आपरेशन के लिए बेटे ने घर गिरवी रख पैसे जुटाये हैं, उनके आँसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। वे उस घड़ी को कोस रहे थे, जब उन्होंने बेटे से मिलने गाँव से शहर आने का फैसला किया था।
न आता तो कम- से- कम ये एक्सीडेंट न होता, न ही बेटे के सिर पर मुसीबतों का पहाड़ टूटता। सोच- सोच कर उनका बुरा हाल था। पैर टूटने से कहीं ज्यादा उन्हें घर गिरवी रखने का दर्द हो रहा था।
बेटे- बहू को सामने से आते देख उनका जी चाहा कि अभी धरती फट जाए और वे उसमें समा जाते। मैं अपने बेटे से कैसे नजरें मिला सकूँगा,…बहू मेरे बारे में क्या सोच रही होगी?
पिता तो वो होता है जो बच्चों के दुख- तकलीफ दूर करता है। और एक वो है जिसने अपने बच्चों को ही मुसीबत में डाल दिया है। काश! एक्सीडेंट में मैं मर क्यों न गया, मन- ही- मन अपने आप को लानतें दे रहे थे।
“बेटा मनीष,..बहू मुझे मा..आ. फ..करना…. ” हाथ जोड़कर वे हिलक उठे।
“अरे! पिताजी, ये आप क्या कर रहे हैं..” बेटे ने झट उनके हाथों को थाम लिया।
“बेटा मुझे पता ही नहीं चला, कब पीछे से आकर कार ने टक्कर मार दिया…. ”
“पिताजी सड़क हादसा तो किसी के साथ भी हो सकता है… इसमें आपकी कोई गलती नहीं है।” बहू ने कहा।
“पर बेटा!मेरी वजह से घर….” कहते हुए उनकी हिचकियाँ बॅंध गयीं।
“कोई बात नहीं पिताजी आपके साथ और आशीर्वाद से ऐसे कई घर बना लेगें। ” बेटे ने ढाढ़स बंधाया।
“हम्म…” बेटे की बातों ने उनके मन पर पड़े बोझ को हल्का कर दिया।
दर्द और कमजोरी की वजह से उनकी आँखें मुॅंद रहीं थीं, इसलिए वे अपनी आँखे बंद कर शांत भाव से लेट गए।
“पिताजी!…आप बिल्कुल भी चिंता मत कीजिये …. सब ठीक हो जाएगा। ” आगे बढ़कर बहू ने ससुर के माथे पर प्यार से हाथ फेरकर सहलाते हुए कहा।
ममता भरा नर्म स्पर्श पाकर उन्होंने आँखें खोली, सामने देखकर वे चकित रह गए… अचानक उन्हें बहू के चेहरे में अपनी माँ की छवि दिखाई दे रही थी।
वो भी तो ऐसे ही उनके सिर पर हाथ फेर सारी तकलीफें हर लेती थी।
वहाँ खड़ी नर्स की आँखें बरबस भीग गयीं…
एक तीस साल की माँ का, साठ साल के बेटे को दुलार करते देखकर।

***

लघुकथा-4
लघुकथा – अँगारे

“अम्मा, पेट में बड़ी जलन हो रही है।” सूखे होठों पर बार- बार जीभ फिराकर गीला करने की कोशिश कर, पेट को कसकर पकड़कर वह कराह उठा।
बेटे के कृषकाय शरीर, कोटरों में धसीं आँखें, पीला पड़े चेहरे को देख उसका कलेजा मुँह को आ गया।

“हाँ बेटा रु…क जा, अभी घडे़ का ठंडा पा…नी देती हूँ।” वह अपनी रूलाई रोकते हुए बमुश्किल बोल पाई।

“अम्मा पानी नहीं कुछ खाने को चाहिए है।”

“हाँ, अभी तेरे बापू कुछ लेकर आते होंगे।”

वह बेटे की हालत देख वह बदहवाश- सी बार -बार झोपडी के दरवाज़े तक आती और निराश हो वापिस बेटे को गोद में लिटाकर सहलाने लगती।
आखिर वह क्या करे, अपनी लाचारी पर उसे रोना आ रहा था।

पिछले तीन दिनों से रोज मंत्री के गुर्गे बस्ती के सभी मर्दों को दारू का लालच देकर प्रचार के लिए हांककर ले जा रहे थे।चाहकर भी वह पति को जाने से रोक नहीं पा रही थी।

बनिए ने भी कई बार हाथ- पाँव जोड़कर मिन्नतें करने के बाद भी, पिछली उधारी चुकता किये बिना और राशन उधार देने से साफ मना कर दिया था।
“काशी की तबियत बिगड़ती जा रही है, घर में भी अन्न का दाना नहीं है, काशी के बापू कब आओगे…।” आग से तपते बेटे को गोद में लिए वह मन- ही- मन उधेड़बुन में लगी थी।कि तभी

“अरे! काशी की अम्मा, देखो अखबार के पहले पन्ने में हमारी फोटो छपा है, वह भी मंत्री जी के साथ।” घर में घुसते ही अखबार दिखाकर हल्कू खुशी से बोला।

“हमारा मंत्री जी की रैली में जाना बड़ा काम आया।”

“…..”

पर पत्नी के कुछ न कहने पर उसने फिर कहा।

“अरे! गौर से तो देख, फोटो में मंत्री जी ने मेरे कंधे पर हाथ रखा है।” हल्कू ने हुलस कर कहा।

“अब हम भी बड़ा फेमस हो गया हूंँ। सब लोग हमें पहचान कर बधाई दे रहे हैं। आज हम बहुत खुस हैं।

“काश! तुम्हारी ई पहचान, हमारे काशी के पेट की जलन शांत कर देती।” कभी ठंडे चूल्हे की ओर तो कभी अपने बेटे की पथराई आँखों को देखते हुए, वह भर्राई आवाज़ में बोली, और उसकी आँख से गर्म आँसू टपक गया।

लघुकथा-5-
गाँधी गिरी

गाँधी चौक पर स्थापित बापू की आदम कद मूर्ति के सामने सड़क के उस पार बने मंदिर के बाहर, सुबह से ही शहर भर के गरीब और भिखारियों का जमावड़ा लगा था। और हो भी क्यों न, आज ही के दिन हर साल, नेता जी अपने जन्मदिन के उपलक्ष्य में, पूजा करने के बाद सभी को अपने हाथों से खाने का सामान देते थे।

रशीद भी अपने बाल- बच्चों सहित खड़ा, नेता जी के मंदिर से बाहर आने का इंतजार कर रहा था। अभी नेताजी पूजा समाप्त करके प्रसाद वितरित करने ही वाले थे कि, अचानक तेज तूफान के साथ मूसलाधार बारिश शुरू हो गई और अफरा-तफरी मच गई। लगातार बारिश होने और अपने तय कार्यक्रम में जाने देर होती देख नेताजी खाने का सारा सामान वही, भिखारियों के मुखिया गंगाराम को देकर सभी को बाँटने की हिदायत देकर कार में बैठकर धुआँ उड़ाते हुए निकल गए।
” चलो भाइयों,… जल्दी से लाइन लगाकर खड़े हो जाओ और एक-एक कर मेरे पास आकर खाना लेते जाओ।”- बारिश बंद होते ही गंगाराम ने सब से कहा।

बाकी सभी तो लाइन में खड़े हो गए, परंतु, रशीद निराश होकर अपने परिवार सहित, वापस घर की ओर मुड़ गया, क्योंकि गंगाराम से उसकी कुछ खास बनती नहीं थी।
अभी कुछ कदम आगे गया ही था कि
“कहाँ जा रहे हो? अपना खाना तो लेते जाओ।”

उसने पीछे मुड़कर देखा गंगाराम हाथ में खाना के पैकेट लिए खड़ा था।
देखकर रशीद प्रश्नवाचक नजरों से उसकी तरफ देखने लगा।

“ले लो इस पर तुम्हारा ही हक है।”

“पर मैं तो तुम्हारा ….”

“दोस्त,… ये खाना जरूर नेताजी का है, पर मैं नेतागिरी नहीं करता।”- हँसकर कहता हुआ गंगाराम, दूसरे भिखारियों को पैकेट देने लगा। ये देख चौक पर लगी गाँधी जी की मूर्ति मुस्कुरा उठी।

***

पाँच लघुकथा

ज्योत्सना सक्सेना
पता: 10/697,कावेरी पथ मानसरोवर जयपुर 302020
फ़ोन:9829577660

लघुकथा-1
लड्डू

बेसन सेकते हुए हाथ भी जले ..अनुभवहीनता के कारण कष्ट भी हुआ ..लेकिन मिष्टी की पसंद का ख्याल आते ही शेखर बाबू के चेहरे पर मुस्कराहट आ गई ..घर से दूर रह रही मिष्ठी के लिए इतना करना तो लाज़िमी है ना .. कितना खुश होती थी छोटी मिष्ठी जब सुधा लड्डू बनाती थी ..” माँ थोड़ा सा चखने दो ना ” मनुहार करती थी वो
”ना .. ना .. पहले ठाकुर जी का भोग..फिर सबको मिलेगा ” सुधा के आगे शेखर भी चुप्पी लगा जाता था ।
कितना कुछ बदल गया है बीते सालों में ..सुधा बीच मझधार में छोड़कर चली गई ..बेटा बहू अमरीका में बस गए ।शहर से 800 किमी दूर रह रही मिष्टी का भी इंजीनियरिंग का आखिरी साल है। खुद की सेवानिवृत्ति में भी एक साल ही शेष हैं ..बस मिष्टी के हाथ पीले होते ही मेरी जिम्मेदारियां ख़त्म ..गर्म बेसन में चीनी का बूरा डालकर गोल करने के प्रयास में फिर जल रहे थे उनके हाथ ..बड़े मनोयोग से लड्डू डिब्बे में भरकर स्टेशन की ओर निकल पड़े। उफ्फ!रास्ते में कितना जाम मिलता है आजकल.. बड़ी मुश्किल से उनकी कार नियत समय पर स्टेशन पहुंची।प्लेटफार्म टिकिट लेने में और मिष्ठी की सखी को ढूंढने में इतना समय लग गया की धीरे धीरे ट्रेन सरकने लगी थी ..कहीं रह ना जाये ये लड्डू का डिब्बा .. कांपती टांगों से दौड़ते जा रहे थे शेखर बाबू ..आखिर मिष्टी की रूममेट शिखा दिख ही गई ..दौड़ते दौड़ते वो डिब्बा उसे थमाया, हाँफ गए थे ।पास की बेंच में बैठकर चैन की साँस ली …विजयी मुस्कान से हाथ हिलाती शिखा को देख रहे थे .. काफी वक्त लगा उन्हें अपनी सांसों को संयत करने में ..थोड़ी देर तक एक बेंच में बैठकर सुस्ताने लगे।
अगले दिन व्हाट्सअप पर मैसेज टोन सुनकर बड़ी उत्सुकता से जल्दी जल्दी चश्मा लगाकर मेसेज पढ़ा “पापा ! आपने बिना पूछे लड्डू क्यों भेजे .. आजकल मैं डाइटिंग पर चल रही हूँ ,इसलिए बाँट दिए मैंने सारे लड्डू .. मेरे लैपटॉप की हार्ड डिस्क भर गई है..हम सहेलियां पिकनिक पर जाने वाले हैं तो आप मेरे अकाउंट में बीस हजार रुपए जरूर से डलवा दीजियेगा ..लव यू पापा”
उंगली के छाले में अचानक दर्द महसूस किया था शेखर बाबू ने…

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लघुकथा-2
थकान

“मोहिता के आने से घर मे खूब रौनक हो गई है.. सूना हो जायेगा घर .. उसके जाने पर”
नीलम से ये कहते बहुत उत्साहित और उदास भी थी सुनयना…बहुत दिनों बाद स्कूल आई थी..
लॉक डाउन के बाद केवल बोर्ड परीक्षाओं के लिए विद्यालय खुला था।
” दो साल रह गए हैं रिटायरमेंट को.. वी आर एस लेकर मोहिता के साथ बंगलोर क्यों नही शिफ्ट हो जाती”नीलम ने उसकी उदासी देखकर कहा
“अरे नहीं! अश्विनी तो मझधार में छोड़ चल बसे.. अभी मेरे ऊपर मकान का लोन और मोहिता के एजुकेशन लोन का ऋण बकाया है.. साथ ही उसकी शादी की जिम्मेदारी भी शेष है”
“हां.. सही कह रही हो.. लेकिन नौकरी लगने के बाद एजुकेशन लोन तो मोहिता को चुकाना चाहिए ना.. ” नीलम की प्रश्नवाचक निगाहें सुनयना के चेहरे को टटोल रही थी
“बंगलोर बहुत महंगा शहर है… मुश्किल से गुजारा करती है वो वहां.. फिर मल्टीनेशनल कंपनी में नौकरी के हिसाब से उसे अपने को भी मेंटेन करना पड़ता है”
“ह्म्म्म” नीलिमा से बातों के दौरान घर आ गया।
आने के बाद कितनी ऊर्जावान हो गईं हैं वो इन दिनों… खुद में बहुत बदलाव देख रही है… आजकल.. दौड़ दौड़कर मोहिता के पसन्द के व्यंजन बनाना.. घर को आधुनिक तरीके से सजाना..
स्कूल जाते समय टेबल पर मोहिता के लिए खाना.. गैस पर आधी पकी खीर और उसे सोता छोड़कर ड्यूटी चली गईं थी।सांझ का धुंधलका फैलने लगा था.. आहिस्ता से हाथ डालकर सांकल खोली।
मोहिता छत पर किसी मित्र से बातों में मशगूल थी.. हाथ मुँह धोकर कपड़े बदलकर किचन में गैस पर खीर रखकर छत पर जाकर मोहिता को चौंकाना चाहती थी सो दबे पांव सीढियां चढ़ते अंतिम दो सीढ़ी पर ठिठक गईं..
“अरे यार! तुम्हे समझ नही आता है.. अभी कैसे आऊं?इस लौकडाउन के चक्कर मे पूरा बजट बिगड़ा हुआ है…तभी तो इस गांव में पड़ी हूँ.. दिन भर मातोश्री की पकाऊ बातें झेलती हूँ.. जरा एक आई पैड का प्रबंध हो जाए.. फिर आती हूँ जल्दी”
उल्टे पांव लौट आई सुनयना..
बहुत थकान महसूस हुई..
ओह! ये क्या … उफ़न गई सारी खीर…

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लघुकथा-3
आस्तिक कौन?

संध्या समय में गप्प गोष्ठी के लिए घरों के बाहर बैठी महिलाएं बतरस में डूबी थीं कि फर्राटे से अपनी स्पोर्टी बाइक से अपनी धुन में मगन शिवांश पास से गुजरा।
“अग्रवाल साब का बेटा शिवांश ही है ना”पल्लवी फुसफुसाई
” अरे नाम का ही शिवांश है लेकिन ना पूजा पाठ..ना कोई संस्कार” मिसेज मेहता बोल उठीं
” श्वेता ने कॉन्वेंट में पढ़ाकर इसके मिजाज बढ़ा दिए हैं, और भी तो बच्चे है जो भजन कीर्तनों में शामिल होते हैं, हमारा प्रांजल तो खूब धार्मिक है”
बूढ़ी काकी का भी तुलनात्मक स्वर शामिल था।
“हमारा पंकज भी शिवांश के बराबर ही है लेकिन वो तो नियम से मंदिर जाता है”
दुबाईन अपने बेटे की तारीफ़ के पुल बांध रही थी कि अचानक बहुत जोर की “धड़ाम “आवाज़ ने सबका ध्यान भंग किया।
सामने मजदूर ऊंचाई से गिर पड़ा संभवतः रस्सी टूट गई थी.. अफ़रा तफ़री का माहौल अचेत मजदूर के इर्दगिर्द मोहल्ले के सभी लोग तमाशबीन खड़े थे।
“अरे पंकज इसे उठा.. देख सिर से कितना खून बह रहा है”
” मुझे तो खून देखकर डर लगता है,प्रांजल तुम उठाओ इसे”पंकज बोला
“अरे 100 नंबर पर फोन कर दो” प्रांजल ने सलाह दी।
” हटो.. हटो..क्या हुआ? ” शिवांश किसी काम से शायद लौट आया था।
घटना समझ में आते ही घर से दौड़कर बैंडेज और चादर लाया। पापा से कार निकालने को बोला। मजदूर से सिर पर पट्टी बांधी । लोगों की मदद से उस अचेत मजदूर को चादर में लपेटकर कार में लेकर हॉस्पिटल की ओर चल दिया।
खिड़की में से झांकती श्वेता मन ही मन मजदूर की सलामती की प्रार्थना करती सोच रही थी “आस्तिक कौन? ”

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लघुकथा-४
भरोसा
“अरे !क्यों आ गई? मैंने तुझे आज आने को मना किया था न, व्रत में भूखी प्यासी काम करेगी? ” रीमा ने सजी धजी शामली को देख कहा
सितारों जड़ी लाल साड़ी, सुर्ख मेहंदी, चूड़ी से सजे हाथ आज शामली बड़ी सुंदर लग रही थी , साथ मे नन्ही पिंकी को भी लाई थी ।
लेकिन ये क्या? शामली की उदास आंखों से दो बूंद पानी टपक गया..
“क्या हुआ आज फिर मारपीट की तुझसे पिंकी के बापू ने?”
“कहता है.. पिंकी उसकी बेटी नहीं.. जबकि अभी खुद पास के पार्क में उस छिछोरी कमला के संग मुंह मार रहा है..अभी देखकर आई हूं ” गहन उदासी में एक सांस में सब कह गई शामली
हंसमुख स्वाभिमानी शामली बरसों से रीमा के घर काम कर रही थी।
कभी-कभी अपने नकारा शराबी पति के बारे में बताती लेकिन पति और बेटी पिंकी से बहुत प्यार करती थी ।
पिंकी के बारे में बड़े गर्व से बताती “दीदी! अंग्रेजी स्कूल में डाला है ,टीचर बनाउंगी ..पढ़ने में बहुत होशियार है ”
कल ही शामली ने एडवांस पगार ली थी। करवा चौथ का सामान लाई थी ।बड़ी खुश थी ..बता रही थी “दीदी! पति की लंबी उम्र की कामना के लिए पूरे दिन उपास करूंगी। रात को चांद देखने के बाद ही पिंकी के पापा के हाथों पानी पियूंगी.. फिर साथ में पुए पकवान खाएंगे”
“दीदी आज आपके साथ चाय पीने का मन है। हलवाई के यहां गर्मागर्म समोसे देखकर आपके लिए भी ले आई” शामली की आवाज से रीमा चौंकी
“लेकिन तेरा व्रत?”
“उसने भरोसा तोड़ा है मैं व्रत नही तोड़ सकती?”
हंसते हुए शामली ने जवाब दिया।

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लघुकथा-५

संस्कार
जून की भरी गर्मी में देविका उस मजदूर को पूरी बांह की शर्ट और पैंट में गर्ल्स हॉस्टल की पुताई करते देख रही थी..लगातार तीन दिन से पसीने में नहाए मजदूर को देखकर उनसे रहा ना गया। उससे पूछ बैठी ” तुम शर्ट उतारकर क्यों नहीं काम करते”
“अरे! नहीं.. नहीं मांजी..लड़कियों का हॉस्टल है ना”मजदूर की तल्लीनता भंग हुई मानो।
देविका नाम मात्र के कपड़े पहने अपनी बेटी और गेस्ट रूम के आसपास फिरकती तितलियों सी लड़कियों को अवाक सी देख रही थीं।

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