अंजु खरबंदा, शर्मीला चौहान, छवि निगम

  1. पाँच लघुकथा
    अंजु खरबन्दा, दिल्ली

लघुकथा-1
डिश वॉशर

घर में बर्तन साफ करने की मशीन आने से सभी बेहद खुश थे। गली मोहल्ले के लोग भी उत्सुकतावश चले आते देखने । इस शहर में शायद ये पहला घर होगा जहाँ ऐसी मशीन आई होगी । सुना तो था कि विदेशों में ऐसी मशीनें होती हैं अब अपने देश में भी…!
मशीन को देखने का कौतूहल कई दिनों तक बरकरार रहा । सभी तो खुश थे एक दादी को छोड़कर! वह वैसे भी जल्दी खुश होती ही कहाँ हैं! हर चीज में कोई न कोई कमी निकाल ही देती हैं ।
अपने कमरे में बैठे सारा दिन बुड़बुड़ाती रहतीं
“बस इन मशीनों पर निर्भर हो जाओ! शर्म ही नहीं आती आजकल के बच्चों को!”
“अब भला इसमें शर्म की क्या बात! ये तो गर्व की बात है कि पहली मशीन हमारे घर आई ।”
सभी दादी की बातें सुन खूब हँसते ।
एक दिन छोटे ने पूछ ही लिया
“दादी! मशीन आने से सभी तो खुश हैं! सिर्फ तुम्हीं क्यों परेशान हो?”
“कभी सोचा ! मशीन आने से बर्तन साफ करने आने वाली महरी शांति के दिल पर क्या बीतती होगी ! उस्का घर कैसे चलता होगा और..!”
“और..!”
“और शांति के न आने पर मेरा अकेलापन कैसे कटे..!”
आगे के शब्द दादी के गले में ही घुट कर रह गए ।

लघुकथा-2

मुखिया

“भैया टूर से आ गये क्या!”
“नहीं अभी नहीं आये ।”
सुलभा ने धीरे से जवाब दिया ।
“फिर बाहर गैलरी में मर्दाना कपड़े किसके सूख रहे हैं!” कौतूहल से रीटा ने पूछा ।
“लोगों की नजरों से बचने के लिये गाहे बगाहे पति के कपड़े बाहर गैलरी में सूखने डाल देती हूँ!
“क्यूं !”
“इससे लोगो को लगता है कोई मर्द घर पर है
“मतलब !”
“नही तो वे सोचते हैं अकेली औरत जात… छोटे बच्चों के साथ हमारा क्या बिगाड़ लेगी !”

खबर या शोर?

रात के नौ बजे थे। टीवी पर प्राइम-टाइम डिबेट शुरू हो चुकी थी।
पाँच-छह चेहरे स्क्रीन पर चमक रहे थे हर कोई चीख़ रहा था, उँगलियाँ लहरा रहा था।
स्क्रीन के नीचे मोटे लाल अक्षरों में लिखा था
“देश संकट में!”
“सच्चाई का खुलासा अभी!”
पास ही सोफ़े पर बैठे छोटे से अर्जुन ने अपनी दादी से पूछा
“दादी, ये सब क्यों चिल्ला रहे हैं? क्या सबको झगड़ा करना ज़रूरी है?”
दादी मुस्कुराईं और बोलीं
“बेटा, पहले खबर खेत-खलिहान से आती थी, गाँव-शहर से आती थी। लोग सच सुनते थे। अब खबर भी बाज़ार बन गई है। यहाँ जितना शोर होगा, उतनी बिकेगी।”
अर्जुन मासूमियत से बोला
“तो दादी, क्या सच शोर मचाए बिना नहीं सुना जा सकता।
अब दादी की आँखें भर आईं
“बेटा! सच हमेशा धीमे स्वर में बोला जाता है ताकि दिल तक पहुँच सके। ये जो चिल्लाहट है, ये सिर्फ़ कानों को बहलाती है, दिल को नहीं!”

अतीत की खिड़की

होशियारपुर से शादी का बुलावा आया था । ट्रेन से जाना तय हुआ । सर्दी हल्की हल्की दस्तक देने लगी थी, इसलिये सोचा चलो इस बार एसी की बजाय जनरल कोच से सफ़र का आनन्द लिया जाए ।
पहले बीवी बच्चे जनरल से जाने पर कुछ नाराज हुए पर फिर थोड़ी ना-नुकुर के बाद मान गए । दिल्ली से लगभग आठ घंटे का सफ़र । सीट बुक थी तो ज्यादा परेशानी नहीं हुई । बच्चों ने झट खिड़की वाली सीट झपट ली । सारा सामान सेट कर मैं और पत्नी बातों में मशगूल हो गए ।
“दीदी! जम्मू की शॉल ले लो! बहुत बढ़िया है!”
रंग बिरंगी शॉलों का भारी गठर उठाए एक संवाली सलोनी कजरारी आँखों वाली युवती पत्नी को इसरार करने लगी ।
“कितने की है?”
“अढाई सौ की!”
“इत्ती महंगी !”
“ज्यादा पीस लोगी तो कम कर दूंगी!”
“मैंने दुकान खोलनी है क्या?”
“ले लो न ! बहनों और भाभियों के लिये!”
मैंने पत्नी को इशारा किया तो उसने आँखें तरेर कर मुझे चुप रहने का संकेत दिया ।
“अच्छा 5 पीस लूँ तो कितने के दोगी?”
“दो सौ रुपए पर पीस ले लेना दीदी!”
“न ! सौ रुपए पर पीस!”
“दीदी ! सौ तो बहुत कम है!”
कहते हुए उसका गला रुंध गया और उसकी कजरारी आँखें भर आई ।
“चल न तेरी न मेरी डेढ़ सौ पर पीस!”
“अच्छा दीदी ! ठीक है ! लो रंग पसंद कर लो !”
कुछ सोचते हुए उसने कहा और गठर पत्नी के सामने सरका दिया ।
पत्नी ने पाँच शॉलें अलग कर ली और मेरी ओर देख रुपए देने का इशारा किया ।
मैंने झट 750 रुपए निकाल कर दे दिये ।
उसके जाने के बाद रास्ते भर पत्नी की सुई इसी बात पर अटकी रही
“वो एक बार में ही डेढ़ सौ में मान गई, गलती की थोड़ा तोल मोल और करना चाहिए था !”
और मेरी सुई… अतीत में जा अटकी थी ।
बेटी को गोद में बिठा रेलगाड़ी की खिड़की से झांकता मैं सोच रहा था –
मेरे पिता भी रेलगाड़ी में सामान बेच जब थके हारे घर आते तो उनकी आँखों में भी वही नमी होती थी जो आज उस लड़की की आँखों में थी ।

पाँच लघुकथा

शर्मिला चौहान, ठाणे, महाराष्ट्र
लघुकथा-१
शक्ति
रोज की तरह मीनू, आज भी मूर्ति वाली गली में जा खड़ी हुई। सात साल की बच्ची रोज बड़े ध्यान से, मूर्तिकार बाबा के काम को देखती रहती। पास ही मजदूरों की झोपड़-पट्टी में रहती है। आज बाबा मूर्ति पूरी करने वाले हैं।
उसने पूरी मूर्ति बनते हुए देखी है। देवी का शरीर, हाथ-पैर और चेहरा, सबकुछ एक एक कर बनता गया। बाबा ने जैसे माटी में जान फूंँक दी है।
“कितनी सुंदर है देवी माँ! आँखें तो और किसी की ऐसी न होगी।” सोचते हुए मीनू सूखी मिट्टी के ढ़ेर पर बैठ गई।
अपने नन्हें हाथों से, मुट्ठी भर भर कर मिट्टी इधर-उधर करने लगी। उसके छोटे भाई को उसकी माँ साथ लेकर काम पर जाती है और मीनू सारा दिन यहाँ-वहाँ खेलती भटकती रहती। भूख लगती तो अपनी झोपड़ी खोलकर, सुबह की रखी रोटी, भात खा लेती और फिर बाहर।
उस झोपड़-पट्टी में उसकी उम्र के सभी बच्चे ऐसे ही हैं। जो बारह -तेरह साल के हैं वो कहीं ना कहीं काम करने लगे हैं।
“मैं बिल्कुल देवी माँ जैसी हूँ, वैसे ही लंबे बाल हैं मेरे भी।” अपने तेल लगे, काले लंबे बालों को हाथों से नापने लगी।
“अरे बाबा! आज आपने देवी माँ को ये क्या दे दिया हाथों में?” उछलकर मूर्तिकार बाबा के सामने पहुंच गई मीनू।
“ये तो अस्त्र-शस्त्र है देवी का। तलवार, कटार, गदा, धनुष सब है।” मूर्तिकार ने कहा।
“ये क्यों रखती है देवी?” मासूम सा प्रश्न किया मीनू ने।
“राक्षसों, बुरे लोगों से लड़ने के लिए, उनको हराने के लिए।” मूर्तिकार अपना काम करते हुए बच्ची की जिज्ञासा शांत कर रहा था।
“मैं भी तो देवी जैसी हूँ बाबा! मेरे बाल भी देखो लंबे हैं परंतु मैं राक्षसों से नहीं लड़ सकती। मेरे पास अस्त्र-शस्त्र नहीं है।” मीनू ने धीमी आवाज में कहा।
मूर्तिकार बाबा हाथ धोकर अपने घर के अंदर चले गए। बाबा ने मीनू को बैग में पुस्तकें, कलम, और एक स्लेट दे दी।
अब देवी का साज-श्रृंगार पूरा हो गया था।

लघुकथा-२
मन की बात
सुमित्रा ने माँ के सिरहाने पानी भरा लोटा धरते हुए कहा, “तालाब जा रही हूँ। नहाते, कपड़े धोते तक एक दो छोटी मछली भी मिलेगी तो ले आऊंगी। बहुत दिनों से तुझे मछली-भात खाना है ना?’ खटिया पर पड़ी माँ की आँखें चमकने लगी।
सिर पर से कपड़ों का बंँधा बोझा उतारकर तालाब के किनारे रख, पहले अपना पुराना, सिला बांँधा छोटा जाल फेंक दिया।
“आज मछली फंँस जाए तो खाने में मजा आ जाए।” कपड़े को कुटेले से पीटती सुमित्रा ने लार गटक ली।
सिर पर माटी लगाकर बाल धोए और कपड़े पहनते हुए, तालाब में स्वयं को निहारते हुए स्वयं पर लजाने लगी।
लहरें आती तो प्रतिबिंब फैल जाता अतः उठती लहरों के स्थिर होने का वह दिल थामकर इंतजार करने लगी।
सहसा, जाल में हलचल हुई और सुमित्रा की खुशी से चीख निकल पड़ी। आधी फुट की खूबसूरत, गोल-मटोल, चाँदी की तरह चमकीली मछली तड़फड़ा रही थी।
जाली समेटकर उस मछली को पानी के कलसे में डाल, सुमित्रा धुले कपड़ों का गट्ठर बनाने लगी।
मछली की तड़फड़ाहट उसे बेचैन कर रही थी। उसे अंजुरी में भरकर देखा तो लगा उसकी आँखें नम हैं। मूक आँखों की भाषा, सुमित्रा के हृदय पर दस्तक देने लगी।
एक क्षण बाद ही उसे पानी में वापस छोड़ते हुए बोली, “जा, तेरी माँ भी रास्ता देख रही होगी ।” कपड़ों का गट्ठर अपने सिर पर धरे, पार पर फैली करमता भाजी तोड़ते चली। अब मुंँह में भाजी का स्वाद असीम तृप्ति दे रहा था।

लघुकथा-३
किरायेदार
मधु को आठवाँ महीना लग गया था। दिन-रात वह गर्भस्थ शिशु को, अपने पेट पर हाथ रखकर स्पर्श किया करती थी।
बाहर की हल्की ठंड और सूर्य की बादलों संग लुका छिपी के बीच मधु ऊनी कपड़ों को तार पर फैला रही थी। पेट पर एक झटका सा पड़ा और उसकी सिसकी निकल गई।
“अब आखिरी महीने में क्यों अड़चन बढ़ा रही है? शांति से बैठी रह, मैं जो करती हूँ चाकरी।” अपनी सास की आवाज़ सुनकर मधु का मुँह कसैला हो गया।
सामने नज़र उठाई तो जमुना काकी के कमरे में किराए से रहने वाला जोड़ा, अपनी गृहस्थी समेटकर गाड़ी में डाल रहा था।
“बच्चा पेट में घूमता है माँ, लात मारता है मानो मुझे बता रहा हो कि अब मैं बाहर आने वाला हूँ।” मधु ने अपनी सास से कहा।
“तू समझती क्यों नहीं, तेरे अपने बच्चे की अच्छी परवरिश शिक्षा के लिए, इस घर को ठीक कराने के लिए ही तो तूने दूसरे का बच्चा अपने पेट में पाला है। इससे ज़्यादा प्रेम लगाना ठीक नहीं। कुछ दिनों बाद ये अपने माँ-बाप के पास चला जाएगा।” सास ने मधु को समझाते हुए कहा।
“पता है मुझे। रोजी मजदूरी करने वाले परिवार के सपनों को पूरा करने के लिए, उस घर की स्त्री को अपनी कोख का सौदा करना पड़ता है।” मधु की आंँखों के सामने वो कागज़ात घूम गए जिन पर उसने अपने हस्ताक्षर किए थे।
सामान लदी गाड़ी की घरघराहट से मधु चौंक पड़ी। अपने बरामदे में खड़ी जमुना काकी, जाते हुए उस किराएदार जोड़े को विदा करते हुए पल्लू से आँखें पोंछ रही थी।
अपने ढहते हुए घर को घूरती मधु ने, एक बार फिर अपने नम हाथों से पेट को छू लिया मानो अपने ‌इस किरायेदार से घर खाली करने की तारीख जानना चाहती हो।

लघुकथा-४
हकीकत
विश्व के दो देशों के बीच युद्ध हो रहा था और बाकी देशों ने अपनी अपनी मजबूरी स्पष्ट कर दी। एक बड़ी मछली, दुनिया के समंदर में अपने से छोटी कम सशक्त मछली को अपने में समा लेने को लालायित थी‌।
बड़ी, सशक्त और लड़ाकू सेना सुसज्जित होकर, छोटे देश के विभिन्न शहरों पर कब्ज़ा जमाने का प्रयास कर रही थी। आक्रमणकारियों के तमाम विध्वंस के बावजूद, उस देश ने घुटने नहीं टेके। निवासी बंकरों में, घरों में कैद भूखे प्यासे अपने देश के लिए जान की बाजी लगाने को तैयार हो रहे थे।
बच्चों और बुजुर्गो को छोड़कर, सभी ने देशरक्षा हित हथियार उठा लिया। सड़कों पर आक्रमण कारी सैनिकों का काफ़िला घूम रहा था। सड़क पर किसी को भी देखकर तुरंत गोली चलाने के आदेश का वो पालन कर रहे थे।
“ऐ..! कहाँ जा रहे हो? जाओ अपने घर में, वरना मुझे गोली चलानी पड़ेगी।” दस-बारह साल के एक लड़के को सड़क पर देखकर शत्रु सैनिक चिल्लाया।
“यह सड़क मेरे देश की, यह शहर मेरे देश का और मैं इस देश का हूँ। मैं क्यों भागूँ, तुम भागोगे। मेरा पूरा परिवार युद्ध के लिए तैयार हो रहा है, सिर्फ दादी और मैं रह गए।” उस बच्चे की आँखों में अपने देश की जीत के प्रति चमक देखकर शत्रु सैनिक एक क्षण के लिए काँप गया।
उस बच्चे ने झपटकर सैनिक के हाथों से बंदूक छीन ली और अगले ही क्षण कई दिशाओं से एक साथ कई गोलियों की आवाजें गूँजने लगीं।
अब सड़क पर पड़े दोनों देशभक्तों के, पार्थिव शरीर से मुक्त होती आत्माएँ गले मिल रहीं थीं।

लघुकथा-५
बदलता ज़ायका
पिछले पंद्रह दिनों से, इस लाचार बूढ़े घर की कमर सीधी होने लगी थी। मज़दूरों के एक जत्थे ने, घर के हुलिए को बदलने के लिए कमर कस लिया था। समयाभाव के बावजूद अमेरिका से आए, नववंशजों ने अपनी धरोहर को संवारने का फैसला किया था।
“दादू! इस बंद कमरे में क्या है?” पोते के स्वर से दादाजी उत्साहित हो गए।
“मेरे पिताजी के ज़माने के बेहतरीन बरतन हैं मनुज। कांँसे,पीतल, तांँबे एवं पंचधातु से बनी गुंडियाँ, गगरी, लोटे और थालियाँ।” बरतनों की चमक दादाजी की आँखों में उतर आई।
सालों से बंद दरवाजों की घुटन झेलते बरतनों को, मधुर स्मृतियों की तरह निखारा जाने लगा‌। इठलाते हुए वो अपने अपने संस्मरण सुना रहे थे मानो दादाजी की अँगुलियों के स्पर्श से उनका रोम रोम आल्हादित हो रहा था।
“दादू! ये टी-सेट कितना खूबसूरत है?” मनुज की नव ब्याहता ने अपनी ऊँची एड़ी की सैंडिल से, अँगुलियों के बल और ऊँचा उठते हुए काँच की आलमारी से नाक चिपकाकर, टी सेट से आँखें चार करते हुए कहा।
“यह तो चार पीढ़ियों से है, किसी विशेष व्यक्ति के आगमन पर ही इसे निकाला जाता था। मैंने अपनी ज़िंदगी में सिर्फ तीन-चार बार ही इसमें चाय पी है।” दादाजी की आँखों में वो विशेष पल तरंगित हो रहे थे।
“तुम्हारी दादी ने कभी इसमें चाय नहीं पी।” दादाजी का स्वर, पुराने समय के लिंगभेद, पर्दा प्रथा की कसक से मध्यम पड़ गया था।
शाम को नव पीढ़ी ने, मजदूरों सहित सबको साथ ले, चाय की महफ़िल सजा दी। मुस्कुराते हुए दादाजी नई पीढ़ी की नई सोच के साथ, सामंतवादी टी-सेट में भरी समाजवादी चाय का लुत्फ़ उठा रहे थे।

पाँच लघुकथा

छवि निगम
लखनऊ,उत्तर प्रदेश

लघुकथा-१
नियम कानून
“सुनिए, ये कैसा दोस्त है आपका! ट्रैफिक रूल्स क्या पता नहीं इसे ? देखिये तो कैसे गाड़ी चला रहा है” जब तेज रफ़्तार कार स्पीडब्रेकर पर फिर से उछली , तो स्वाति ने डर कर आँखें बन्द कर लीं।
समीर ने उसे चुप करने को आँखे दिखायीं, पर उसे बुदबुदाने से रोक नहीं पाया ” नियम कानून न मानना कितनी ग़लत बात है। लगता है स्टेशन से इनके घर तक भी सहीसलामत नहीं पहुंच पाएंगे हम लोग। हद है सच्ची”
तभी खिड़की के बाहर उसकी नज़र पड़ी, तो चीख ही पड़ी ” अरे, सिग्नल ग्रीन नहीं हुआ था अभी। और ये आप रॉंग साइड गाड़ी क्यों दौड़ा रहे हो भैया ?”
दोनों दोस्त ठठा के हंस दिए। समीर का दोस्त बोला ” अरे भाभी, चालान-वालान की फ़िकर नॉट। आप चिल करो। देखो, अपनी गाड़ी पर पार्टी का झंडा लगा है न ?”
स्वाति मुस्कुरा दी। अब उसके बैठने में अकड़ थी और चेहरे पर बेपरवाह दर्प की चमक। उसकी ये मुस्कुराहट कायम रही, हालाँकि उनकी कार अभी-अभी एक खोमचे वाले को टक्कर मारने से बाल बाल बची थी..
लघुकथा-२
“भुलावा”
कभी कभी मन होता है, सूरज को ज़रा झिंझोड़ दूं,चाँद पर दो बाल्टी पानी डाल दूं। कभी कहीं कुछ तो बदले। क्या वही रोज रोज का रूटीन… वही ज़िन्दगी के ख़ालीपन में एक ग़ैरजरूरी चीज़ होने का अहसास। सोचते हुए निर्मला ने अपने बालों को पोंछने के बाद बॉलकनी की रेलिंग पर तौलिया सुखाते हुए अपने हाथों पर आती हल्की झुर्रियों की ओर देखा। इस उबाऊ और नीरस ज़िन्दगी से कैसे निज़ात पाएं? सोफ़े की सेटिंग कितनी बार बदलें, कितना टीवी देखें , फ़ोन पर आँखें फोड़ें, उन्ही मॉल दुकानों रेस्तरां के जाके आख़िर कितने बेमक़सद चक्कर लगाएं…
बालों की झूल आई लट को कानों के पीछे खोंसते हुए उन्होंने एक बोरियत भरी निग़ाह चारों ओर फैलाई। वही माचिस के एक के ऊपर एक रखे डिब्बे जैसे फ़्लैट, दूर सड़क पर खिलौनों जैसे सरकती गाड़ियाँ …और क्या था देखने को भला? ऊबते हुए निर्मला वापस जाने को मुड़ी ही थीं, कि चौंक गयीं। अपने ऊपर एक गढ़ती निग़ाह महसूस हुयी थी उन्हें। धीरे से मुड़कर देखा, एन सामने वाले ब्लॉक की बॉलकनी में कोई खड़ा … एकटक इधर ही देख रहा था। चश्मा लगाये बिना वो ठीक से देख नहीं सकती थीं, पर एक तपन महसूस कर सकती थीं। ऊपर से नीचे तक उनमें एक सिरहन दौड़ गयी। उन्होंने जल्दी से पीठ कर ली। जरूर कोई ग़लतफ़हमी होगी.
नहीं!
बहाने से उन्होंने दोबारा देखा। रेलिंग पर कुहनियां मोड़कर अपना चेहरा हथेलियों पर टिकाये वो लड़का …सचमुच उन्हीं को निहार रहा था। निर्मला के कान की लवें तक लाल हो उठीं। जाने किन भूलेभटके अहसासों ने आज दिल पर फिर दस्तक दे दी। घुटनों के हल्के दर्द को दरकिनार करते तेजी से वो अंदर चली आयीं।
अगली दोपहर फिर वो अकेली थीं। पर आज चेहरे पर क्रीम-पाउडर की लुनाई थी। घने बालों में झलकती चांदी हेयरडाई के तले खो चुकी थी। गुलाम अली की ग़ज़ल के साथ वो भी गुनगुना रही थीं। अरसे बाद किचन में उनके हाथों की खुशबू गमक रही थी।
हाँ,बॉलकनी में निर्मला ने भारी पर्दा खींच रखा था। बाहर देखने का खतरा मोल नहीं ले सकती थीं। न तो उन्हें कल उस पार खड़े उस शख़्स से कुछ कहना था , न उसके बारे में कुछ जानना था न ही कभी मिलना था। लेकिन शायद.. वो आज भी उनके इंतज़ार में वहीं खड़ा हो, ये भुलावा फ़िलहाल जीने के लिए काफी था..

लघुकथा-३
‘फांक’
शाम को बेटा जैसे ही लौटा, घर आम की खुशबू से महक उठा। कमला जी ने झट पूछा ” दशहरी ले आये क्या ?” तो बेटे की ” अं… आं…” को काटकर बहू तपाक से बोली ” नहीं तो अम्मा !”
पर उन्होंने बहू को झट-से झोला लेकर अंदर जाते देख लिया था। उनका दिल जैसे दो फांक हो गया। देर तक वो अपने सामने रखे बेस्वाद खाने को देखती रहीं। फिर धीरे-धीरे लाचारी में बुझा उनका मन.. गुस्से से सुलगने लगा।
क्या वो जानती नहीं थी परसों खीर बनी थी, और उससे 2 दिनों पहले हलुआ ? पर उन्हें मिला क्या ? वही लौकी-तरोई और पतली-सी दाल ! ठीक है, माना कि शुगर ज्यादा है उनकी, पर सारी दवाएँ तो वो ले ही रही हैं न ! चलती-फ़िरती हैं, घर के छोटे-मोटे काम भी कर देती हैं। और ” अम्माजी ज़रा साग साफ़ कर दीजिए…मुन्ने की मालिश तो और कोई कर ही नहीं सकता…आपके हाथ वाला मिर्च का अचार खाने का मन है ” ये सब फरमाइशें करते न ध्यान आता किसी को उनकी सेहत का ! फ़िर ज़रा-जा मीठा देते क्यों जान निकली जाती है ?
सुलगता हुआ मन जब भभकने लगा, तो वो उठीं, और अंदर वाले कमरे की ओर बढ़ने लगीं। बरामदा पार करते हुए अचानक उनकी नज़र कोने में पड़ी कबाड़ से ढकी…बेंत की आरामकुर्सी पर पड़ी,तो वो ठिठक गईं। सुन्न होते शरीर से…बस उसे देखती ही रह गईं।
फ़िर घिसटते कदमों से वो वापस लौट पड़ीं। अब उनकी आँखों मे नमी तैर रही थी, और यादों में एक धीमी घिघियाती आवाज़ ” ज़रा-सा दे दो बहूरानी…बस एक फांक..”

लघुकथा-4
“तरकश का आख़िरी तीर ”
‘कितनी खडूस मालकिन है रे बाबा ! महीनों से कहे कहे जुबान घिस गयी, मिन्नत करे करे कमर नोहराई गयी, आँखें इत्ती झरीं कि मसलने पर भी अब एक बूंद तक न टपकती, लेकिन वो औरत मक्खीचूस !! पगार ही नही बढ़ाती। क्या करूं, कुछ बुझाता ही नहीं” देर शाम अपनी खोली को निढाल लौटती शिवबाला का बड़बडाना जारी था’ चालू कहीं की ! एक्सटरा काम लेने कइसी मीठी छुरी बन जाती है की बाला आज जरा तीन-चार करारे पराठे तो सेक दे…बढ़िया से पैर दबा दे बड़े दुख रहे…मेहमान आ रहे बाला तो ज़रा सोफा खिसका दे कालीन झाड़ दे…हाँ नहीं तो! पर जब मैं बोलती की भाभी देखो महंगाई कित्ती जानलेवा हुई रही, खोली का किराया देना मुसकिल , सौदा सब्जी अनाज सब आफ़त ऊपर से बच्चों की पढ़ाई अलग मुसीबत.. तब वो सुरसा कैसी होसियारी से सब अनसुना कर जाती है हाँ नी तो ‘
बेचैन मन और टूटा हुआ दिल उसे रात में भी करवटें लेने और कुढ़ते रहने पर मजबूर किये हुए था ‘ वैसे तो मेकअप-उपक पर मजे से हजारों लुटा देती हैं मालकिन। लेकिन जो वाजिब सौ दो सौ हमें ज्यादा देने पड़ें, जान निकल जाती है जैसे ‘
आखिरकार गहरी सांस भरके वो उठ बैठी ‘ अब तो लगता है कल झाड़ू लगाते बखत साहब से ही बात करनी पड़ेगी ”
ख़ुद को जैसे घसीटते हुए वो उठ बैठी। बेमन लालटेन जलाई, फ़िर अपना पुराना बक्सा खोलकर खखोरने लगी। तह से खींचकर उसने एक गठरी खोली, और उसमें से ख़ास गहरे गले वाला ब्लाउज, और ऐसे ही मौके के लिए रखी झीनी साड़ी बाहर निकाली…कल पहनने के लिए

लघुकथा-५
‘ढांचा’
विधायक आवास की एक गैलरी में रखा वो लकड़ी का कैबिनेट कभी काफी अच्छी हालत में रहा होगा। पर फिलहाल कील-कांटे ठोककर उसे घर के बाहर कर दिया गया था।और अब रसूूखदार मुलाकाती और जरूरतमन्द फरियादी…सभी मिलने आने वाले अपने जूते-चप्पल उतारके उसमें रखकर अंदर जाया करते। चमकदार कैबिनेट से दुलकते शूरैक में तब्दील हो चुका वो ढांचा…खंबे का सहारा लेकर…दिन ब दिन बढ़ते बोझ तले चरमराता जाने कैसे अभी तक टिका हुआ था।
अचानक एक दिन वो चौंक उठा। अभी-अभी बुरी तरह घिसे टायर का सोल लगी उधड़ी भूरी बद्दी वाली जो चप्पलें आयी थीं…उन्हें वो पहचानता था। उसके तल्ले पर जो बिवाइयों के गहरे निशान थे, वो तो उसके दिल पर भी छपे हुए थे। यही निशान उसे दुलारते थे, जब वो नन्हा पौधा था। इसी के साथ जुड़ा था वो स्पर्श जो बड़ा होते हुए उसे सहलाता था…और जब उसे काटकर ले जाया जा रहा था, तो उसकी दर्द से मुंदतीं आँखों को गाड़ी के पीछे भागती यही दो चप्पलें नज़र आयीं थी।
अब अपने सीने से उन्हीं चप्पलों को लगाये, वो आतुरता से तन गया। कुछ धड़कन सी धमक महसूस होने लगी। उसे सहारा देने को लगाये गए दो फट्टे गिर गए…सतह के एक-आध टुकड़े और झड़ गए…कुछ दरारों ने मुंह बा दिए …पर उसने परवाह नहीं की। ठंसे पड़े नोकदार जूतों और सैंडलों की चुभन उसे अब महसूस ही नहीं हो रही थी।
देर शाम बिवाईयों से ढके दो पैर लड़खड़ाते हुए कमरे से वापस आये। पहले से भी ज्यादा घिसटते हुए। चप्पलों में पैर डालते हुए झुर्रियों से भरा एक खुरदुरा हाथ कैबिनेट पर सहारे के लिए ज़रा टिक गया, तो वो जानीपहचानी छुअन उसे पुलक से भर गयी। अभी तक सारे सितम बर्दाश्त करत हुयेे खड़ा रहा वो ढांचा…अचानक भरभरा के उस दूसरे हाड़मांस के ढांचे की बाँहों में ढह गया। अब दोनों को अलग करना मुश्किल था। अंत में दोनों ढांचे एकाकार थे।

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