नमन बापूः शैल अग्रवाल

हम सबके हैं प्यारे बापू… 150 वर्ष बाद भी…याद कर ही लेते हैं हम उन्हें किसी-न-किसी बहाने … नमन …150 वीं जयन्ती विशेष।

किसी मनचले और पश्चिम में पले बढ़े भारतीय मूल के चित्रकार द्वारा बनाई यह गांधी जी की तस्बीर आज के युग के गांधी की है। अगर आज गांधी जी जी रहे होते तो कैसे दिखते, कैसे कपड़े पहन रहे होते, वगैरह , वगैरह…पर यह तो कल्पना की उड़ान है। कई बार कल्पना यथार्थ से कतई मेल नहीं खाती। गांधी जी का रहन-सहन , उनकी जीवन शैली खुद उनकी अपनी स्वेच्छा से चुनी हुई थी। उनके सिद्धांत और विचारों के अनुकूल।। बदलते फैशन आदि का उनके जीवन में कोोई दखल नहीं रहा कभी। यह बात दूसरी है कि आज भी गांधी जी और गांधीवाद का पूरा विश्व कायल है।

मेरे जीवन के आदर्श और बचपन से ही मेरे लिए नायक रहे, बाबूजी के अनुसार देश के प्रेरणा पुरुष और कर्मवीर थे महात्मा गांधी, जो कहने से अधिक करने में विश्वास रखते थे। वह जो कहते थे, वही करके भी दिखलाते थे। सादा जीवन और उच्च विचार के साक्षात प्रतिमूर्ति, जिनका कहना था कि जब आधे से अधिक मेरे देशवासी नंगे और भूखे हैं तब मैं कैसे भरपूर जीवन जी सकता हूँ। अभूतपूर्व आत्मबल था गांधी जी के पास। उस समय के अन्य हजारों युवाओं की तरह ही बहुत विश्वास और श्रद्धा थी बाबूजी की भी राष्ट्रपिता गांधी जी में, और यही वजह थी कि गांधी जी और उनके प्रेऱणा पुरुष विवेकानन्द और महामना टैगोर ने बचपन से ही बहुत अधिक सम्मोहित किया मुझे भी।
इसबार गुजरात यात्रा में एक और देश के नायक जिनकी सादगी और चरित्र ने बहुत प्रभावित किया वह थे लौहपुरुष सरदार बल्लभ भाई पटेल और उनकी इकलौती बेटी मनीबेन, जिन्होंने छाया की तरह पिता का साथ निभाया और आजीवन उनका संबल बनी। इतनी विनम्र और किफायती कि सुनकर आंखें भर आएँ। पिता के फटे कुरतों से ही अपने लिए ब्लाउज सिलती थीं वह। कैसे-कैसे संयमी कर्मवीरों का युग था वह , सोचकर ही मस्तक श्रद्धा से नत् हो जाता है।

गांधी जी को जानने और समझने की ललक में तीन महीने बाबूजी भी साबरमती के आश्रम में रहे थे । महात्मा के साथ गंदा ढोते , कोढ़ियो की सेवा करते, छोटे से छोटा काम करने का आत्म -संयम सीखा था उन्होंने भी। बहुत गर्व के साथ चरित्र निर्माण के लिए हम बच्चों को सुनाया करते थे वह वहाँ की कहानियाँ।

अफसोस रहेगा कि युगपुरुष गांधी जी से मिलने का मौका जिन्दगी ने मुझे नहीं दिया, कमसे कम कुछ याद रख पाऊँ, ऐसा तो नहीं ही। बाबूजी कहते हैं कि दस महीने की मुझे वो गांधीजी से मिलवाने ले गए थे और उनकी गोदी में भी बिठाया था। सुनकर बड़ी गौरवान्वित महसूस करती हूँ, पर कुछ याद नहीं। साल भर की ही अबोध उम्र तो थी वह मेरी, जब गांधी जी दुनिया छोड़ गए थे। फिर तो बस कहानी-किस्से और किताबें ही रह गईं उनसे मिलने और उन्हें जानने-पहचानने को और जहाँ तक मुझे याद है गांधी जी पर कहीं भी कुछ लिखा मिल जाए, पढ़ने से नहीं रोक पाई कभी। 16 वें जन्मदिन पर गांधी जी की आत्मकथा का तोहफा दिया था बाबूजी ने मुझे और आज भी याद है, पूरी की पूरी पढ़कर ही अलमारी में वापस रख पाई थी …यह उनके चुम्बकीय दृढ़ चरित्र का आकर्षण ही तो रहा होगा उस उम्र में भी मेरे लिए।..

फिर वह शर्मनाक समय भी आया जब गांधीवाद को रोटियों की तरह भुनाया जाने लगा। उनका नाम , उनकी पार्टी कइयों के लिए भृष्टाचार और झूठ का गढ़ बन गई। ऐसे ही जानी और मानी जाने लगी। .

अक्सर सोचती हूँ कि कैसे होते हम और हमारा भारत, अगर इसमें गांधी जी न होते? दो ही तो आधुनिक भारत की असली परिभाषा हैं -गांधी जी के पहले और गांधी जी के बाद।

गांधी, जिन्हें ईसा मसीह या अन्य तेजस्वी और दृढ़ क्रांतिकारी व समाजवादियों की तरह हमारा समाज झेल नहीं पाया… सच की तरह, शिव की तरह। पर जो दुनिया भर का गरल पिए हो उसे स्वीकारना, आत्मसात करना, पचा पाना आसान भी तो नहीं।… फिर भी कई थे जिन्होंने उनके आदर्श और मानकों को , सत्य और अहिंसा के हठ को अपना प्रेरणा स्त्रोत बनाया। मन में उनके आदर्श और सिद्धान्तों को स्मारकों की तरह सजाकर रखा । और यह इज्जत भारत में ही नहीं, पूरे विश्व में मिली बापू को। कइयों ने तो उन्हें हमारी शताब्दी के सबसे महत्वपूर्ण व चतुर पुरुष तक की उपाधि दे डाली।

चतुर का तो पता नहीं पर अपने इरादों के दृढ़ और निश्चय ही मानवता के हिमायती व हमदर्द अवश्य थे बापू और यही वजह है कि चाहकर भी विश्व उन्हें भूल नहीं पा रहा…150 साल बाद भी हम उन्हें याद कर रहे हैं, उनका जन्मदिन मना रहे हैं। सूझबूझ से भरे, संयमी और दुखी व असहायों के हितैषी अथे बापू। अन्याय के खिलाफ न सिर्फ उन्होंने आवाज उठाई अपितु उसके लिए गोली तक खाई।
आज यह जो देश विदेश, चारो तरफ ही गांधी जी खड़े दिखते हैं- दीवारों पर लटके तो कहीं सार्वजनिक पार्कों में खड़े… क्या बस इतना करके हम उन्हें वह सम्मान दे देते हैं, जिसके वह वाकई में अधिकारी हैं, उत्तरदायित्व निभा देते हैं उनके प्रति…चिड़िया रोज बीट करती हैं इनपर तो । गांधी जी की आत्मा उन पुतलों से नहीं, उनके सिद्धांतों से ही हमारे बीच रह पाएगी।

गांधी जी ने कहीं कहा था आंख के बदले आंख तो पूरे विश्व को अंधा कर देगी पर आज जब आंख के बदले आंख नहीं, पूरी-की-पूरी लाश ही चाहिए हरेक को, तो बापू के इन सिद्धंतों के मर्म को कैसे समझ पाएगा यह युग! गांधी जी ने कहा था अहिंसा शेरों का धर्म हो तभी अच्छा लगता है , चूहों से अहिंसा की अपेक्षा हास्यास्पद है। शरीर और मन दोनों से ही स्वस्थ करके ही सच और अहिंसा के मार्ग पर चला जा सकता है। वरना तो कोई फरक ही नहीं कि सब अंधे हैं या पूरी मानवता ही लुप्त होने की कगार पर है। पुतलों के इस जंगल में खड़ी अक्सर सोचती हूँ, कौन थे गांधी, देश के पिता या फिर देश के लिए एक दुरूह , आज की नहीं, पुरानी सोच के शख्श , जो कर्म को ही स्वाधीनता मानते थे, सत्य और अहिंसा में विश्वास करते थे। युद्ध नहीं , बुद्ध के प्रचारक को फिर कैसे हमारे देश ने देश का विभाजक मान लिया और खुद हिन्दूवादी, अपने ही देशवासियों ने गोली मार दी। बाँया हो या दाँया था तो अपना ही वह हाथ जिसने उनके जीवन का अंत किया। क्या सच की यही सजा है हमारे समाज में! तरह तरह के प्रश्न उठते हैं मन में। तरह तरह के आरोप लगाए गए उन पर, जिनमें विदेशी लेखकों और अवसर वादियों का बड़ा हाथ दिखता है। चरित्र तक को मलिन करने की कोशिश की गई। कई तो बेहद अभद्र व अश्लील भी थे जिनमें से एक उनका वह इंद्रियों पर नियंत्रण के लिए निर्वस्त्र सूबसूरत युवतियों के साथ खुद निर्वस्त्र सोने वाला प्रकरण , पता नहीं सच है या झूठ पर यदि सच भी है तो गांधी जी का संयम हमारे ऋषि मुनियों से भी बड़ा ही था। विश्वमित्र तक उर्वशी के आगे फिसल गए थे। गांधी जी को जो इज्जत व जन-सम्मान भारत ही नहीं, पूरे विश्व में मिली, वह आज भी देवतुल्य और अतुलनीय है। उनके सिद्धान्तों की सार्थकता आज भी उतनी ही है जितनी कि पिछली सदी में थी।

वह गांधी जी ही थे जिन्होंने सर्व प्रथम आगाह करा था कि भारत को स्वाधीनता से अधिक स्वच्छता की जरूरत है और आजादी के सत्तर साल बाद ही सही, हमारे वर्तमान प्रधान मंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी ने गांधी जी के इस स्वच्छता अभियान को जिस लगन से अपनाया है उसने न सिर्फ भारत का चेहरा ही नहीं, अपितु विश्व के आगे उसकी किस्मत भी चमका कर रख दी है। उम्मीद है न सिर्फ अब देश को कई बीमारियों से मुक्ति मिलेगी, अपितु नारी सम्मान में बृद्धि और उनके साथ अंधेरे के भेड़ियों द्वारा किए गए जबरन व्यभिचार आदि से भी उन्हें मुक्ति मिल पाएगी। वाकई में भारत को मंदिरों से ज्यादा शौचालयों की ही जरूरत है, ताकि लोग खुले में न जाएँ, (विशेषतः महिलाएँ और नन्ही बच्चियाँ) और देश स्वच्छ रह सके। और महिलाओं को निपटने के लिए वह जानलेवा अंधेरे का ही इंतजार न करना पड़े।

एक ललक और भी थी मन में- गांधी के गुजरात को जानने की, जो इस वर्ष, 70-72 साल की उम्र में ही सही, इस फरवरी के महीने में पूरी हो पाई। जी भरकर आँखों में भरा उनकी जन्मस्थली को, साबरमती आश्रम और साबरमती नदी को भी, गीतकार प्रदीप के शब्दों में कहूँ तो जिसके संत ने वाकई में ‘कर दिया कमाल’ । पोरबन्दर में, दीवारों पर लटके एक एक चित्र को ही नहीं , जहाँ वह जन्मे उस जगह को भी साथ लेकर ही लौटी हूँ, बिल्कुल वैसे ही जैसे कि मदुराई के गांधी संग्रहालय में रखे उस गोली खाए , खून के धब्बे को समेटे कपड़े की याद मन से जाती ही नहीं। उस दिन भी तो, तीन दिन बाद भी, कन्या कुमारी के उस मशहूर स्मारक और संग्रहालय तक में, जो कि समंदर के बीच था उसकी लहरों पर भी लहराता रहा था वह कलंकित पल को संजोए कपड़ा, आसपास के पानी तक को आकाश की तरह ही लाल और मटमैला करता हुआ। कुछ गलतियाँ वाकई में कभी नहीं सुधारी जा सकतीं, अवसाद जाता ही नहीं मन से।

इस बार भी साबरमती आश्रम अहमदाबाद में और गांधीनगर व गांधीधाम सब देखा। जी भरकर देखा और सोखा। मन-ही-मन गांधी जी को जी भरकर जिया और साकार भी किया।

बड़ों से सुनी और किताबों में पढ़ी गांधी जी की उन सभी स्मृतियों को नमन करते हुए, इसी वर्ष फरवरी में की गई गांधी जी के उसी गुजरात की यात्रा से कुछ तस्बीरें आपके साथ साझा करने का लोभ संवरण नहीं कर पा रही हूँ, उम्मीद है आपको भी पसंद आएंगी-


सरदार बल्लभ भाई पटेल के घर पर, अहमदाबाद।


बापू टैगोर के साथ।

साबरमती आश्रम अहमदाबाद में गांधी जी के साथ चंद सकून के पल ( फरवरी 2019)

गांधी जी के माता पिता करमचंद गांधी और पुतली बाई के साथ पतिदेव डॉ. नरेन्द्र कुमार अग्रवाल ( पोरबन्दर , गांधी जी की जन्मस्थली। फरवरी 2019)


लेखिका गांधी जी के प्रिय चरखे के साथ,
साबरमती आश्रम, अहमदाबाद।