दो लघुकथाएँ (2)


अमृत

माँ के हाथों से बनी और स्कूल के लंच बॉक्स से वापस आई रोटी को सड़क पर फेंका तो गली के आवारा कुत्ते पागलों की तरह आपस में लड़ते हुये रोटी पर टूट पड़े और उसके टुकड़े टुकड़े कर दिए . वहीँ पास से गुजरता हुए एक मासूम अनाथ बच्चे ने उन रोटी के टुकड़ों को समेटा और अमृत समझ कर खा गया … शायद कल से भूखा था।

भविष्य

“यह सामने मुर्गी का बच्चा है…इसकी गर्दन सर से अलग करनी है … यदि तुम ऐसा कर गए तो हम तुम्हे अपने क्रांति दल मैं शामिल कर लेंगे ” सरदार ने बड़े दबंग तरीके से उस युवा से कहा . उस युवा ने जोश के साथ आगे कदम बढाए. आँखों मैं चमक थी ,सहसा उसने उस बच्चे की आँखों मैं दया की भीख देखी .. कुछ देर के लिए वो थम गया .. अचानक वो झटके से उठा और एक झटके मैं चूजी की गर्दन अलग कर दी… उसकी आँखों मैं अब वेह्शिपन नज़र आ रहा था उसके हाथ कुछ और चूजों को बर्बाद करने के लिए मचल गए … सरदार ने उसकी पीठ थपथपा कर अपने दल मैं शामिल कर लिया।
… वहीँ दूर खड़ा एक बुजुर्ग यह सब देख कर सोच रहा था की यदि ऐसे ही हमने अपने चूजों को आज के युवाओं को थमा दिया तो हमारे देश के भविष्य मैं मासूम खिलखिलाते चूजे देखने को नहीं मिल पाएंगे।

अगम अग्रवाल
सशक्त युवा कथाकार


बैल
वह फूट फूटकर रोने लगा ।

“इसके दिमाग में गोबर भरा है गोबर” -विमला ने मिक्की की किताब को मेज पर पटका और पति को सु्नाते हुए पिनपिनाई , ‘मुझसे और अधिक सिर नहीं खपाया जाता इसके।मिसेज आनन्द का बंटी भी तो पांच साल का ही है, उस दिन किटी पार्टी में उन्होंने सबके सामने उससे कुछ क्वेश्चन पूछे—वह ऐसे फटाफट अंग्रेजी बोला कि हम सब देखती रह गईं। एक अपने बच्चे हैं—’’

“ मिक्की! इधर आओ।’’

वह किसी अपराधी की तरह अपने पिता के पास आ खड़ा हुआ ।

“हाउ इज़ फूड गुड फार अस? जवाब दो बोलो।”

“इट मेक्स अस स्ट्रांग, एक्टिव एंड हैल्पस अस टू—-टू—टूऊ ”

“क्या टू – टू लगा रखी है! एक बार में क्यों नहीं बोलते?” उसने आँखें निकालीं, “एंड हैल्प्स अस टू ग्रो।”

“ इट मेक्स असटांग—” वह रुआँसा हो गया।

“ असटांग !! यह क्या होता है, बोलो—-‘ स्ट्रोंग’—-‘ स्ट्रोंग’—-तुम्हारा ध्यान किधर रहता है—हँय ?” उसने मिक्की के कान उमेठ दिए।

“इट मेक्स स्टांग—” उसकी आंखों से आँसू छलक पड़े।

“यू-एस—‘अस’ कहाँ गया । खा गए ! ” तड़ाक से एक थप्पड़ उसके गालों पर जड़ता हुआ वह दहाड़ा, “ मैं आज तुम्हें छोड़ूँगा नहीं—”

“फूड स्टांग अस—”

“क्या ? वह मिक्की को बालों से झिंझोड़ते हुए चीखा ।

“ पापा ! मारो नहीं—अभी बताता हूँ—बताता हूँ … स्ट्रोंग…फूड…अस…इट…हाऊ…इज़…” वह फूट फूटकर रोने लगा ।

शिक्षाकाल
“सर,मे आय कम इन?” उसने डरते-डरते पूछा।

“आज फिर लेट? चलो, जाकर अपनी सीट पर खड़े हो जाओ।

वह तीर की तरह अपनी सीट की ओर बढ़ा—-

“रुको!” टीचर का कठोर स्वर उसके कानों में बजा और उसके पैर वहीं जड़ हो गए। तेजी से नज़दीक आते कदमों की आवाज़, “जेब में क्या है? निकालो ।”

कक्षा में सभी की नज़रें उसकी ठसाठस भरी जेबों पर टिक गई। वह एक-एक करके जेब से सामान निकालने लगा—-कंचे,तरह-तरह के पत्थर, पत्र-पत्रिकाओं से काटे गए कागज़ों के रंगीन टुकड़े, टूटा हुआ इलैक्ट्रिक टैस्टर, कुछ जंग खाए पेंच-पुर्जे—

“और क्या-क्या है? तलाशी दो।” उनके सख्त हाथ उसकी नन्हीं जेबें टटोलने लगे। तलाशी लेते उनके हाथ गर्दन से सिर की ओर बढ़ रहे थे, “यहाँ क्या छिपा रखा है?” उनकी सख्त अंगुलियाँ खोपड़ी को छेदकर अब उसके मस्तिष्क को टटोल रहीं थीं ।

वह दर्द से चीख पड़ा और उसकी आँख खुल गई।

“क्या हुआ बेटा?”माँ ने घबराकर पूछा ।

“माँ, पेट में बहुत दर्द हैं” वह पहली बार माँ से झूठ बोला, “आज मैं स्कूल नहीं जाऊँगा ।”

सुकेश साहनी
जन्म : 5 सितम्बर, 1956(लखनऊ)

शिक्षा : एम.एस–सी. (जियोलॉजी), डीआईआईटी (एप्लाइड हाइड्रोलॉजी) मुम्बई से।

कृतियां : डरे हुए लोग, ठंडी रजाई (लघुकथा–संग्रह), मैग्मा और अन्य कहानियाँ, (कहानी–संग्रह), अक्ल बड़ी या भैंस (बालकथा–संग्रह), लघुकथा संग्रह पंजाबी,गुजराती,मराठी एवं अंग्रेजी में भी उपलब्ध । मैग्मा कहानी सहित अनेक लघुकथाएँ, जर्मन भाषा में अनूदित। अनेक रचनाएँ पाठ्यक्रम में शामिल ‘रोशनी’ कहानी पर दूरदर्शन के लिए टेलीफिल्म।

अनुवाद : खलील जिब्रान की लघुकथाएँ, पागल एवं अन्य लघुकथाएँ, विश्व प्रसिद्ध लेखकों की चर्चित कहानियाँ,।

‘रोशनी’ कहानी पर दूरदर्शन के लिए टेलीफिल्म।

सम्पादन : हिन्दी लघुकथा की पहली वेब साइट www.laghukatha.com का वर्ष 2000 से सम्पादन। आयोजन, महानगर की लघुकथाएँ, स्त्री–पुरुष संबंधों की लघुकथाएँ, देह व्यापार की लघुकथाएँ, बीसवीं सदी : प्रतिनिधि लघुकथाएँ, समकालीन भारतीय लघुकथाएँ, बाल मनोवैज्ञानिक लघुकथाएँ ब्लाग : http://www.kathaakaarssahni.blogspot.com/

http://www.sukeshsahni.blogspot.com/


गरीब बौद्धिक
वह खासे बौद्धिक हैं. अपने दायरे और कार्यक्षेत्र में चर्चित. अनेक सरकारी और गैरसरकारी संस्थाओं से सम्मानित और पुरस्कृत. दुनिया की दृष्टि में सम्पन्न. दिल्ली जैसे महानगर के पॉश इलाकों में दो मकान. कीमत करोड़ों की, लेकिन अपने को गरीब कहते हैं. कुछ लोग गरीब होने के उनके तर्क को सही मानते हैं. उनका मानना है कि पांच-सात करोड़ की सम्पत्ति आज के संदर्भ में कुछ भी नहीं, क्योंकि इस देश का एक अल्प शिक्षित मंत्री पांच वर्षों में उससे पचास-सौ गुना अधिक अपने खाते में जमा कर लेता है जबकि उन्हें बौद्धिक हुए पैंतीस वर्ष हो चुके हैं. इस दौरान वह कितने ही सौ पृष्ठ कागज काले कर चुके और देश-विदेश में कितने ही विश्वविद्यालयों में भाषण भी दे आए, लेकिन पांच-सात करोड़ पर ही अटके पड़े हुए हैं.

बौद्धिक होने से पहले वह गरीब नहीं थे, लेकिन बौद्धिक होते ही जब उन्हें इस बात का अहसास हुआ कि अमेरिका का एक बौद्धिक चंद दिनों में ही करोड़ों में खेलने लगता है तब वह उनसे अपनी तुलना करने लगे और सार्वजनिक तौर पर अपने गरीब होने की घोषणा करने लगे. एक दिन एक हिन्दी दैनिक का एक पत्रकार उनकी गरीबी पर बातचीत करने के लिए पीतम पुरा स्थित उनके निवास पर पहुंचा. उन्होंने खुलकर बातचीत की और सिद्ध कर दिया कि वह गरीब हैं. पत्रकार के साथ उनकी बातचीत उस अखबार में प्रकाशित हुई. उनके घर से कुछ दूर चौराहे पर बैठने वाले भिखारी ने उसे पढ़ा. वह उन्हें जानता था, क्योंकि उसने भी कभी बौद्धिक होने का भ्रम पाला था लेकिन समय के साथ दौड़ नहीं पाया और भीख मांगने की स्थिति तक पहुंच गया. अखबार में उनकी बातचीत पढ़कर देर तक भिखारी गुमसुम रहा, फिर भीख मांगने वाला कटोरा उठाकर वह उनकी कोठी की ओर चल पड़ा. जिस समय वह वहां पहुंचा वह कहीं जाने के लिए गाड़ी में बैठने के लिए घर से बाहर निकले ही थे.

वह गाड़ी की ओर बढ़े कि भिखारी सामने आ गया और उनकी ओर कटोरा बढ़ाकर खड़ा हो गया. वह जल्दी में थे. भिखारी कॊ घूरकर देखा और पर्स से पांच का नोट निकालकर कटोरे में डालने लगे, लेकिन भिखारी ने नोट लेने से इंकार करते हुए कहा, “सर, मैंने कल के अखबार में आपकी बातचीत पढ़ी है.

आप मुझसे अधिक गरीब हैं – मैं यह कटोरा आपको देने आया हूं. इसकी आवश्यकता मुझसे कहीं अधिक आपको है सर!”

हकीकत
सुबह एक कवयित्री मित्र का फोन आया. बोलीं, “आपने अमुक अखबार देखा?” “देखा. उसमें कुछ खास है?” “स्नेह रश्मि के कविता संग्रह की समीक्षा—-.” ” वह भी देखा–लेकिन…” मेरी बात बीच में ही काट वह बोलीं, “मेरा संग्रह प्रकाशित हुए एक वर्ष होने को आया और किसी भी पत्र-पत्रिका ने अभी तक उसकी समीक्षा प्रकाशित नहीं की, जबकि मैंने सभी को समीक्षार्थ प्रतियां भेजी थीं. स्नेह रश्मि के संग्रह को प्रकाशित हुए छः माह भी नहीं हुए और कितनी ही पत्रिकाओं और रविवासरीय अखबारों में समीक्षाएं प्रकाशित हो चुकीं हैं.” उनके स्वर में उदासी स्पष्ट थी. ” देखिए—” मैने उन्हें नाम से संबोधित करते हुए कहा, “आपके पति दूरदर्शन या आकाशवाणी में निदेशक नहीं हैं और न ही किसी मंत्रालय या लाभप्रद विभाग में ऊंचे पद पर हैं. आकाशवाणी या दूरदर्शन में निदेशक नहीं तो कम से कम प्रोग्राम एक्ज्य़ूकेटिव ही होते—लिखने वाले लपककर आपका कविता संग्रह थामते और आपको बताना भी नहीं होता कि आपने कहां-कहां समीक्षार्थ प्रतियां भेजी हैं. वे स्वयं पत्र-पत्रिकाएं खोज लेते. स्नेह रश्मि के संग्रह की भांति ही वे आपके संग्रह पर भी टूट पड़े होते और सारे कामकाज छोड़कर उस पर लिखते. आपके पति हैं तो रक्षा मंत्रालय में लेकिन ऎसे पद पर भी नहीं कि वहां की कैंटीन से लिखने वालों के गले तर करने की व्यवस्था कर सकते.” “यह तो मुझ जैसी साधनहीना के साथ ज्यादती है.” लंबी सांस खींच वह बोलीं. ” कुछ जोड़-जुगाड़कर आप भी इंडिया इंटर नेशनल सेंटर या इंडिया हैबिटेट सेंटर में एक

गोष्ठी कर डालें—समय की वास्तविकता को समझें–वर्ना—.” “वर्ना–वर्ना—” उनके शब्दों में पहले की अपेक्षा और अधिक उदासी थी. उनको उदास जान मैं उनसे अधिक उदास हो चुका था।

रूपसिंह चन्देल
कानपुर जनपद के गॉंव नौगवॉं (गौतम ) में १२ मार्च , १९५१ को जन्मे कथाकार रूपसिंह चन्देल के अब तक छ: उपन्यास , दस कहानी संग्रह , तीन किशोर उपन्यास , लघुकहानी संग्रह , यात्रा संस्मरण , दस बाल कहानी संग्रह सहित सैंतीस पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं , जिनमें ‘रमला बहू’ , ‘पाथरटीला’ ‘नटसार’ और ‘ शहर गवाह है’ (उपन्यास), ‘हारा हुआ आदमी’ , ‘आदमखोर तथा अन्य कहानियॉं ‘ ‘जीनियस’ तथा ‘चौपालें चुप हैं ‘ (कहानी संग्रह ) और ‘ऐसे थे शिवाजी’ तथा ‘क्रान्तिदूत अजीमुल्ला खॉं’ (किशोर उपन्यास) बहु-चर्चित रहे हैं । कुछ रचनाओं के अंग्रेजी , बांग्ला , गुजराती तथा पंजाबी भाशाओं में अनुवाद ।

‘प्रकारातंर’ (लघुकहानी संकलन) तथा ‘बीसवीं शताब्दी की उत्कृश्ट आंचलिक कहानियॉं ‘ (दो खण्ड) का सम्पादन ।
विश्व के महान साहित्यकार लियो तोल्स्तॉय के अंतिम , अप्रतिम और अब तक हिन्दी में अप्रकाशित उपन्यास ‘ हाजी मुराद ‘ का अनुवाद तथा ‘ दॉस्तोएव्सकी के प्रेमपत्र’ प्रकाशित।

संपर्क – बी-३/२३० , सादतपुर विस्तार ,

दिल्ली -११० ०९४

मोबाइल नं० – ०९८१०८३०९५७

बचत
रिक्शा रुका और मिस्टर हेंडसम और मिसेस ब्यूटीफुल बाहर निकले| हेंडसम ने गर्दन ऊंची की कालर ठीक किया और पाकिट से कंघी निकालकर बाल संवारे|ब्यूटीफुल ने पर्स खोला आइना निकाला सूरत देखी रुमाल मुँह पर फेरा फिर अपने कटे फटे ओंठों की मरम्मत कर एक लिपस्टिक को धन्य कर दिया|ओंठों का स्पर्श पाकर लिपस्टिक मुस्कराने लगी|हेंडसम ने ब्यूटीफुल की तरफ और ब्यूटीफुल ने हेंडसम की तरफ प्यार भरी नज़र से देखा और हाथों में हाथ डालकर आगे बढ़ गये|
“ओ बाबूजी,ओ मेम साब हमारा पैसा”रिक्शे वाला चिल्लाया|
हेंडसम पीछे मुड़ा और एक दस का नोट रिक्शेवाले की तरफ बढ़ाया “पहले क्यों नहीं कहा? यह कहकर रिक्शे वाले पर रौब झाड़ा|
“पहले क्यों नहीं कहा,क्या रिक्शे वाले को बिना कहे पैसा नहीं दिया जाता?रिक्शेवाला थोड़ा अकड़ा|
“चल ले ले और भाग यहां से हेंडसम ने रईसी बताई|
“दस रुपयॆ ..तीस से कम नहीं होंगे दो किलो मीटर से दो सवारी ढोकर लाया हूं|”
“अबे लेता है कि नहीं ,नहीं तो मैं चला|
“बाबूजी दस रुपये बहुत कम हैं ,एक सवारी के आधा किलोमीटर के ही दस रुपये मिल जाते हैं तीस से कम नहीं होंगे|वह जिद पर अड़ गया|
“क्या तीस से कम नहीं होंगे? क्या पैसा पेड़ में फलता कि हिलाया और बरस गया ,महनत करना पड़ती है|”हेंडसम बड़बड़ाया दस का नोट पाकिट में रखा और् मिसेस ब्यूटीफुल के हाथ में हाथ डाल आगे बढ़ गया|रिक्शे वाला गालियां देते हुये चला गया|इन बड़े लोगों को शरम भी नहीं आती गरीबों का पैसा खाते हुये
वह बड़बड़ा रहा था|
हेंडसम और ब्यूटीफुल एक क्लाथ एम्पोरियम में प्रवेश कर गये|साड़ी ब्लाउअस नाइटी मिडी और न जाने क्या क्या ब्यूटीफुल ने खरीदे और पेक कराये|शानदार टर्फ की शर्ट जींस के पे‍ट्स हेंडसम ने खरीदे और बंडल में बंधवाये|दुकानदार की चाय पीकर उसके भाग्य पर चार चांद लगाकर कांउंटर पर खड़े हो गये|कांउंटर मेन ने पंद्रह हज़ार रुपयों का बिल दिया हेंडसम ने बड़े जोश खरोश से बिल पेमेंट किया और ब्यूटीफुल का हाथ पकड़कर बाहर आ गया|
दुकान दार मंद मंद मुस्कराया उसे सुबह समाचार पत्र में पढ़ा अपना भाग्यफल याद आगया”आज चार गुना लाभ होगा” तभी तो चार हज़ार का मा ल पंद्रह में…..|
हेंडसम भी खुश है रिक्शे वाले से तीस रुपये बचाकर… मैं भी खुश हूं क्यों यह नहीं मालूम!

सरकारी फंड
मैं सरकारी दौरे पर जा रहा था|एक सहयोगी भी साथ में था|बस में बैठे बैठे हम लोग चर्चा कर रहे थे कि इस साल लक्ष्य में दिये काम पूरे नहीं हो पांयेंगे क्योंकि सरकारी फंड समाप्त हो चुका है|बस में सफाई करने वाला कर्मचारी झाड़ू लगा रहा था|सारा कूड़ा कचरा एकत्रित कर वह बस के दरवाजे पर फुट बोर्ड पर रखकर चलता बना|बहुत देर तक जब वह वापिस नहीं आया तो हम लोग बस से उतरकर उसे तलाशने लगे|दूसरी बस से उतरते देख हमने उससे पूछा कचरा फुटबोर्ड पर क्यों छोड़ दिया मुसाफिरों को चढ़ने उतरने में परेशानी हो रही?”बाबूजी फंड खतम हो गया है जब फंड आयेगा तो कचरा उठा लेंगे|तीन माह से वेतन नहीं मिला है,जब सरकारी फंड समाप्त हो जाने पर आप लोग काम बंद कर देते हैं तो हमारा फंड समाप्त हो जाने पर मैं क्यों काम करूं|”इतना कहकर वह चल दिया|मैं सोचने लगा बात तो सोलह आने सच है क्यों सरकारी फंड फंड समाप्त हो जाता है साल समाप्त होने के पहले क्यों?”


प्रभुदयाल श्रीवास्तव
जन्म 4 अगस्त 1944 धरमपुरा दमोह {म.प्र.]
शिक्षा वैद्युत यांत्रिकी में पत्रोपाधि
लेखन विगत दो दशकों से अधिक समय से कहानी,कवितायें व्यंग्य ,लघु कथाएं लेख, बुंदेली लोकगीत,बुंदेली लघु कथाए,बुंदेली गज़लों का लेखन

प्रकाशन लोकमत समाचार नागपुर में तीन वर्षों तक व्यंग्य स्तंभ तीर तुक्का, रंग बेरंग में प्रकाशन,दैनिक भास्कर ,नवभारत,अमृत संदेश, जबलपुर एक्सप्रेस,पंजाब केसरी,एवं देश के लगभग सभी हिंदी समाचार पत्रों में व्यंग्योँ का प्रकाशन, कविताएं बालगीतों क्षणिकांओं का भी प्रकाशन हुआ|पत्रिकाओं में भी कई रचनाएं प्रकाशित

कृतियां
1 दूसरी लाइन [व्यंग्य संग्रह]शैवाल प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित
2 बचपन गीत सुनाता चल[बाल गीत संग्रह]बाल कल्याण एवं बाल साहित्य शोध केन्द्र भोपाल से प्रकाशित
3 बचपन छलके छल छल छल[बाल गीत संग्रह]बाल कल्याण एवं बाल साहित्य शोध केन्द्र भोपाल से प्रकाशित

धरती घूमती है
” परीक्षाएँ समाप्त हो गई हैं, इसका मतलब यह तो नहीं कि सारे दिन बाहर ही खेलते रहो। कुछ पढ़ा-लिखा भी करो…नालायक!”

” यह क्या, तुम तीसरी क्लास की किताब लेकर बैठे हो। तीसरी की परीक्षा तो इस बार दे ही दी है, फिर ये किताबें पढ़ने का क्या लाभ ?….बेशर्म कहीं के।”

” हाँ -हाँ ला देंगे चौथी क्लास की किताबें भी। परिणाम तो आने दो। जाओ, कुछ और पढ़ो।”

“अरे। सारा दिन कहानी किस्से पढ़ते तुम बोर नहीं होते। आँखों पर भी जोर पड़ता है, इस तरह। खुली हवा में सुबह-शाम बाहर खेल आया करो। यही तो उम्र है खेलने कूदने की। चलो उठो, जाओ…।”

पूर्ववत

पिछले दिनों सरकार द्वारा भूमिहीन हरिजनों को खेती योग्य जमीन आबंटित करने की योजना बनाई गई। कार्यक्रम तेजी से लागू किया गया। गाँव के समस्त भूमिहीन हरिजनों ने आवेदन भी किया।

एक सप्ताह बाद कार्य-समाप्ति की घोषणा के साथ ही भूमि-आबंटन के आँकड़े संबंधित विभागों को भिजवा दिए गए।

पहली ही बारिश के बाद रामू , दीनू और भुलिया के साथ अनेक हरिजन अब भी पूर्ववत ग्राम सरपंच के खेतों में हलों की मूंठ पकड़े काम कर रहे थे।

हाँ, सरपंच को अपनी बढ़ी हुई जमीन के लिए कुछ और किसानों व मजदूरों की जरूरत थी।

अशोक वर्मा ( दिल्ली , भारत)
थोड़े शब्दों में अधिक कह जाने वाले सशक्त रचनाकार।

त्रिशंकु
भगवान दास जितने ज्यादा पैसे वाले हैं उतने ही दिल के भी बड़े हैं। रिश्तों का निर्वाह खूब जानते हैं भगवान दास अत: उनसे मिलने और बातचीत करने में कभी हीनता का बोध् नहीं होता। रिश्तेदार और दोस्त गऱीब हों या अमीर सबको खूब मान देते हैं। भेदभाव का सवाल ही नहीं उठता। बेटी की शादी थी। मेहमानों का स्वागत करने के लिए भगवानदास स्वयं मुख्य द्वार पर उपस्थित थे। सभी का प्रेमपूर्वक और आदरभाव के साथ स्वागत कर रहे थे। राधेश्याम जी का बड़ा आदर करते हैं भगवान दास। हैसियत में कोई मुकाबला नहीं पर बड़े भाई का दर्जा दे रखा है उन्हें। जैसे ही राधेश्याम जी ने प्रवेश किया भगवान दास ने उन्हें गले लगा लिया और उनका हाथ थामे देर तक बातें करते रहे। बच्चों को साथ न लाने की शिकायत करते रहे। इतने में एक लंबी-सी चमचमाती हुई गाड़ी बिल्कुल करीब आकर रूकी। गाड़ी में से एक नेतानुमा व्यक्ति उतरे और आगे बढ़े। जैसे ही ये सज्जन दिखलाई पड़े भगवान दास ने राधेश्याम जी का हाथ जो उन्होंने अपने हाथों में थाम रखा था तत्क्षण छोड़ दिया और राधेश्याम जी से बिना कुछ कहे फ़ौरन उस नेतानुमा व्यक्ति की ओर लपके। ”अमर प्रकाश जी आपके इंतजार में आँखें पथरा गयीं।“ भगवानदास ने दोनों हाथों को अत्यंत शिष्टता से जोड़ते हुए कहा। राधेश्याम जी की समझ में नहीं आ रहा था कि अब क्या करें? अंदर जाएँ या बाहर क्योंकि भगवानदास ने उन्हें अधर में लटकता हुआ छोड़ दिया था। भगवान दास नये आगंतुक का हाथ थामे राधेश्याम जी की बगल से ऐसे आगे निकल गये जैसे उन्हें जानते ही न हों। कोई कहे या न कहे बहरहाल खाना तो खाना ही था इसलिए राधेश्याम जी भी अंदर की ओर बढ़ चले। फार्म हाउस की मुलायम-मुलायम मखमली घास पर भी राधेश्याम जी की चाल को देखकर ऐसा लगता था कि जैसे वो काँटों से बचने का प्रयास करते हुए संभल-संभल कर चले जा रहे हों।

समाजसेवी

अनिल कुमार जी से मेरी मुलाक़ात बहुत पहले हुई थी एक मित्र के यहाँ। राश्ट्रीयता की अवधारणा पर उनका लेक्चर सुनकर मैं वाकई उनसे प्रभावित हुए बिना न रह सका। उनका लेक्चर ही प्रभावशाली और ओजपूर्ण नहीं था अपितु क़ौम की हर खुशामद करने के लिए भी वे तत्पर दिखलाई पड़ रहे थे। समाज में व्याप्त समस्याओं और कुरीतियों को लेकर भी वे काफी चिंतित थे। मित्र ने मुझे बताया कि अनिल कुमार जी के बड़े-बड़े अच्छे-अच्छे लोगों से संबेध हैं और अपनी बिरादरी के रिश्ते कराने में भी रुचि रखते हैं।

एक दिन मैंने भी अनिल कुमार जी से कहा,“भाई साहब, हमारी बिटिया भी शादी के लायक हो गई है, उसके लिए भी कोई उपयुक्त वर हमें बतलाइये।“ “हाँ,हाँ, क्यों नहीं? मेरा काम ही भाइयों की सेवा करना है पर एक काम करना नरेंद्र बिटिया का बायोडाटा मुझे भिजवा देना,“ अनिल कुमार जी ने आश्वस्त करते हुए कहा। मैं अगले दिन ही बिटिया का बायोडाटा लेकर अनिल कुमार जी के यहाँ पहुँच गया। मुझे देखते ही अनिल कुमार जी ने पूछा,“हाँ भई कैसे आया नरेन्द्र?“ मैंने उन्हें पिछले दिन की बात याद दिलाई और कहा,“ अनिल कुमार जी बड़ी बिटिया की शादी तो कई साल पहले कर चुका हूँ। बेटे की शादी की मुझे कोई चिंता नहीं। बस सारी चिंता छोटी बिटिया की है। मेरे पास कुल मिला कर बारह-तेरह लाख रुपये हैं और ये सारे पैसे मैंने छोटी बिटिया की शादी के लिए ही संभाल कर रखे हैं।“

मैं कुछ और कहना चाहता था पर अनिल कुमार जी ने बीच में ही मेरी बात काटते हुए कहा,“अरे मुझे क्या समझा रहा है? मुझे पहले से ही अंदाज़ा था कि तेरा बजट ऐसा ही होगा दरम्याना-सा कोई बारह-पंद्रह का।“ फिर पास ही एक मेज़ पर रखी फाइल की ओर इशारा करते हुए अनिल कुमार जी ने कहा,“ बायोडाटा सामने मेज़ पर रखी फाइल में रख दे। मैं देखता हूँ इस बजट में यदि कोई लड़का मिलता है तो।“


सीताराम गुप्ता
5 नवंबर 1954

जन्म स्थान -दिल्ली का एक गांव

टी.वी. प्रेजेन्टेशन में डिप्लोमा। उर्दू तथा रूसी साहित्य में रुचि। इन्ही के साथ अरबी व फारसी भाषाओं का भी अध्ययन किया। कुछ अनुवाद कार्य उर्दू में आये। देश भर की अनेक पत्र-पत्रिकाओँ में लेख, कविताएँ और व्यंग्य प्रकाशित। कविता संग्रह -मेटामौर्फोसिस -प्रकाशित तथा यात्रा वृतान्त -मानस यात्रा-शीघ्र प्रकाश्य। पहली कविता रूसी भाषा में छपी। आध्यात्मिक उपचार, व्यक्तित्व विकास और उनके समग्र रूपान्तरण पर निरंतर लेखन।
संपर्क-सूत्र- –
ए.डी.-१०६-सी, पीतमपुरा,
दिल्ली-११००३४
फोन नं. ०११-२७३१३९५४

दो गज़ ज़मीन चाहिए
सुधा अपनी सहेलियों के साथ कार के हिचकोलों का आनंद लेती हुई खुशनुमा माहौल का भरपूर आनंद लुटा रही थी. अक्टूबर का महीना, कार के शीशे बंद, दायें बाएँ शिकागो की हरियाली अपने आप को जैसे इन्द्रधनुषी रंगों का पैरहन पहना रही हो.

जान लेवा सुन्दरता में असुंदर कोई भी वस्तु खटक जाती है; इसका अहसास उसे तब हुआ जब उसकी सहेली ने रास्ते में एक ढाबे पर चाय के लिए कार रोकी. चाय की चुस्की लेते हुए उसी सहेली ने जिसकी कर थी, अपने बालों को हवा में खुला छोड़ते हुए चाय के ज़ायके में कुछ घोलकर कहा –

‘सुधा, अपनी कार का होना कितना जरूरी है, जब चाहो, जहाँ चाहो, आनंद बटोरने चले जाओ. यह एक जरूरत सी बन गई है. बिना उसके कहाँ बेपर परिंदे उड़ पते हैं?’

सुधा नज़र-अंदाज़ न कर पाई. तीर निशाने पर बैठा था. अपनी औकात वह जानती थी और उसीका परिचय सभी सहेलियों से बिना किसी मिलावट के अपनी मुस्कान के साथ कराते हुए कहा, “मैं ज्यादा पैसे वाली तो नहीं, पर मुझे अपनी ज़रूरतों और दायरों का अहसास है. उन्हीं कम ज़रूरतों ने मुझे सिखाया है कि मुझे फ़क़त दो गज़ ज़मीन चाहिए.”

शर्तों पर शादी
“रुको! आगे क़दम न रखना”

सजी-धजी नवेली दुल्हन आशीर्वाद लेने के लिए पाँवों की तरफ़ झुकी ही थी कि बिजली की तरह कड़कती आवाज़ ने उसे चौंका दिया। अभी तो ग्रहप्रवेश बाक़ी था, वह घर की चौखट के बाहर थी और भीतर से अनादर भारी आवाज़।

उसका पति आँखों में बेबसी लिए, गुमसुम नज़रों से पिता की ओर देखता रहा, एक लाचारी को झेलते हुए इतना ही कह पाया… ‘पिताजी…….’

‘’अरे चुप कर, अभी छ: महीने भी न हुए, एक से जान छुड़ा भी न पाये हैं तो दूसरी ले आया। यह घर के अंदर तब ही पाँव रख पाएगी जब यह लिखकर देगी कि यह तुझसे तलाक़ नहीं लेगी।“

नवेली दुल्हन पति की ओर सवाली निगाहों देखते हुए गणित जोड़ने लगी कि आखिर मजरा क्या है?
“ पहली वाली हनीमून के बाद लौटी तो अलग ही तेवर थे, दस दिन में तलाक के लिए अर्ज़ी दी और 50 लाख की मांग कि जिसकी भरपाई मैंने जैसे खुद को गिरवी रखकर की है, अब यह दूसरी शादी! तुम दोनों की अनबन मुझे कहीं का नहीं छोड़ेगी। घर में बसना चाहती हो तो लिखकर देना होगा !! मुझे घर में अपनी बहू चाहिए, कोई लुटेरन नहीं !


देवी नागरानी

संपर्क सूत्रः पता: ९-डी॰ कॉर्नर व्यू सोसाइटी, १५/ ३३ रोड, बांद्रा , मुंबई ४०००५० फ़ोन: 9987938358


कमीज

अचानक उसकी साइकिल की चेन टूट गई तो उसने अपनी किस्मत को कोसा-ये लो, पांच रुपए की चपत और पड़ी। रात गहराने लगी थी। उसने पगडंडी वाले छोटे रास्ते की ओर पैर बढ़ाए। तभी एक सुनसान जगह पर उसे चार गुंडों ने घेर लिया। साइकिल छीनी, जेब में बाइस रुपये थे, वह ले लिए और खाने का ख़ाली डिब्बा भी ले लिया।

तभी उसने अन्धेरे में भी उनमें से एक को पहचान लिया।

“अरे बन्ने! तू… ?”

क्षण भर को वे सब सकते में आ गए। तभी उनमें से एक बोला, “ पहचान लिया साले ने। टपका दो इसे।“

पलक झपकते ही दो ने उसे झपटकर पकड़ा और एक ने चमकता हुआ छुरा निकाला। बचने के लिए वह बहुत छटपटाया, बहुत गिड़गिड़ाया। उसने किसी से कुछ न कहने की कसम भी खाई। पर छुरा उसकी ओर बढ़ता ही आ रहा था।

अपना अंत आया देख उसके मुंह से चीख निकल गई और साथ ही वह कह गया, “ तो एक मिनट रुको, मैं कमीज उतार दूँ। “

छुरेवाले का हाथ ठिठका और वह बोला, “ कमीज उतार के क्या सोचता है, तू बच जाएगा? “

“ नहीं, कमीज तो बच जाएगी… “ वह रुँधे गले से बोल उठा, “ पिछले हफ्ते ही सिलवाई थी, बड़ी मुश्किल से…पचासी रुपए में। मेरे बेटे को दे देना…न हो तो तुम्ही पहन लेना…या किसी ग़रीब को दे देना। इसे क्यों काटते हो? “

अचानक सन्नाटा कुछ और गहरा हो गया।

दुश्मन

कई बार मैने उसे यूनिवर्सिटी बस स्टैंड के पास देखा था। अपना एक कटा पैर दिखाकर वह वहां बरसों से भीख मांगता था।

अचानक एक दिन वह स्टेशन पर दिखाई दिया। कौतूहलवश मैं पूछ बैठा, “ इधर कैसे? आप तो…”

“ हाँ साब उधर छोड़ दिया। मजबूरी में छोड़ना पड़ा। “

“ कैसी मजबूरी?”

“उधर एक साला जान का दुश्मन आ गया था। वहीं बैठ के जूता पालिश करने लगा। लोगों ने मेरे को पैसा देना बंद कर दिया। लोग हँसते थे मेरे पे।“

“ क्या हो गया ? कैसा दुश्मन ? “ मेरी जिज्ञासा बढ़ी।

“ था एक…उसके दोनों पैर कटे थे। “

-सीतेश आलोक
सशक्त और संवेदनशील रचनाकार। कमीज लघुकथा की मार्मिकता स्तब्ध करने वाली है।