दो लघुकथाएँ (1)


जाति
कारख़ाना खुला। कर्मचारियों के लिये बस्ती बन गई।

ठाकुरपुरा से ठाकुर साहब और ब्राह्मणपुरा से पंडितजी कारखा़ने में नौकरी करने लगे और पास-पास के ब्लाँक में रहने लगे।

ठाकुर साहब का लड़का और पंडितजी की लड़की दोनो जवान थे.उनमें पहचान हुई और पहचान इतनी बढ़ी कि दोनों ने शादी करने का निश्चय किया।

जब प्रस्ताव आया तो पंडितजी ने कहा…ऐसा कभी हो सकता है भला ? ब्राह्मण की लड़की ठाकुर से शादी करे ! जाति चली जाएगी।

ठाकुर साहब ने भी कहा कि ऐसा नहीं हो सकता.पर-जाति में शादी करने से हमारी जाति चली जाएगी।

किसी ने उन्हें समझाया कि लड़का – लड़की बड़े हैं ..पढ़े-लिखे हैं..समझदार हैं..उन्हें शादी कर लेने दो.अगर शादी नहीं की तो भी वे चोरी छिपे मिलेंगे और तब जो उनका संबंध होगा वह व्यभिचार कहलाएगा…

इस पर ठाकुर साहब और पंडितजी एक स्वर में बोले…

होने दो. व्यभिचार से जाति नहीं जाती है ; शादी से जाती है।

हरिशंकर परसाई

गुलमोहर
मकान के बाहर लॉन में सूरज की ओर पीठ किए बैठे जतन बाबू न जाने क्या-क्या सोचते रहते है। मैं लगभग रोजाना ही देखता हूँ कि वह सवेरे कुर्सी को ले आते हैं। कंधों पर शाल डाले, लॉन के किनारे पर खड़े दिन-ब-दिन झरते गुलमोहर की ओर मुँह करके, चुपचाप कुर्सी पर बैठकर वह धूप में सिंकने लगते हैं। कभी भी उनके हाथों में मैंने कोई अखबार या पुस्तक-पत्रिका नहीं देखी। इस तरह निठल्ले बैठे वह कितना वक्त वहाँ बिता देते हैं, नहीं मालूम। बहरहाल, मेरे दफ्तर जाने तक वह वहीं बैठे होते हैं और तेज धूप में भी उठकर अन्दर जाने के मूड में नहीं होते।
“लालाजी,” ऑफिस जाने के सीढ़ियाँ उतरकर नीचे आया हुआ मैं अपने मकान-मालिक से पूछता हूँ—“वह सामने…”
“वह जतन बाबू है, गुलामी…”
“सो तो मैं जानता हूँ।” लालाजी की तरह ही मैं भी उनका वाक्य बीच में ही लपक लेता हूँ—“मेरा मतलब था कि जतन बाबू रोजाना ही…इस तरह…गुलमोहर के सामने…?”
“वही तो बता रहा हूँ बाबूजी!” सीधी-सादी बातचीत के दौरान भी चापलूस हँसी हँसना लालाजी की आदत में शामिल है। स्वाभानुसार ही खीसें निपोरते-से वह बताते हैं—“गुलामी के दिनों में जतन बाबू ने कितने अफसरान को गोलियों-बमों से उड़ा दिया होगा, कोई बता नहीं सकता। कहते हैं कि गुलमोहर के इस पौधे को जतन बाबू के एक बागी दोस्त ने यह कहकर यहाँ रोपा था कि इस पर आजाद हिन्दुस्तान की खुशहालियाँ फूलेंगी। वक्त की बात बाबूजी, उसी रात अपने चार साथियों के साथ वह पुलिस के बीच घिर गया और…”
“और शहीद हो गया।” लालाजी के वाक्य को पूरा करते हुए मैं बोलता हूँ।
“हाँ बाबूजी। जतन बाबू ने तभी से इस पौधे को अपने बच्चे की तरह सींच-सींचकर वृक्ष बनाया है। खाद, पानी…कभी किसी चीज की कमी नहीं होने दी। खूब हरा-भरा रहता है यह; लेकिन……”
“लेकिन क्या?”
“हिन्दुस्तान को आज़ाद हुए इतने बरस बीत गए।” चलते-चलते लालाजी रुक जाते हैं—“पता नहीं क्या बात है कि इस पर फूल एक भी नहीं खिला…।”

लड़ाई
दूसरा पैग चढ़ाकर मैंने जैसे-ही गिलास को मेज पर रखा—सामने बैठे नौजवान पर मेरी नजरें टिक गईं। उसने भी मेरे साथ ही अपना गिलास होठों से हटाया था। बिना पूछे मेरी मेज पर आ बैठने और पीना शुरू कर देने की उसकी गुस्ताखी पर मुझे भरपूर गुस्सा आया लेकिन…बोतल जब बीच में रखी हो तो कोई भी छोटा, बड़ा या गुस्ताख नहीं होता—अपने एक हमप्याला अजीज की यह बात मुझे याद हो आई। इस बीच मैंने जब भी नजर उठाई, उसे अपनी ओर घूरते पाया।
“अगर मैं तुमसे इस कदर बेहिसाब पीने की वजह पूछूँ तो तुम बुरा नहीं मानोगे दोस्त!” मैं उससे बोला।
“गरीबी…मँहगाई…चाहते हुए भी भ्रष्ट और बेपरवाह सिस्टम को न बदल पाने का नपुंसक-आक्रोश—कोई भी आम-वजह समझ लो।” वह लापरवाह अंदाज में बोला,“तुम सुनाओ।”
“मैं!” मैं हिचका। इस बीच दो ‘नीट’ गटक चुका वह भयावह-सा हो उठा था। आँखें बाहर की ओर उबल आयी थीं और उनका बारीक-से-बारीक रेशा भी इस कदर सुर्ख हो उठा था कि एक-एक को आसानी से गिना जा सके। मुझे लगा कि कुछ ही क्षणों में बेहोश होकर वह मुँह के बल इस टेबल पर बिछ जाएगा।
“है कुछ बताने का मूड?” वह फिर बोला। अचानक कड़वी डकार का कोई हिस्सा उसके दिमाग से जा टकराया शायद। उसका सिर पूरी तरह झनझना उठा। हाथ खड़ा करके उसने सुरूर के उस दौर के गुजर जाने तक मुझे चुप बैठने का इशारा किया और सिर थामकर, आँखें बंद किए बैठा रहा। नशा उस पर हावी होने की कोशिश में था और वह नशे पर; लेकिन गजब की ‘कैपिसिटी’ थी बंदे में। सुरूर के इस झटके को बर्दाश्त करके कुछ ही देर में वह सीधा बैठ गया। कोई भी बहादुर सिपाही प्रतिपक्षी के आगे आसानी से घुटने नहीं टेकता।
“मैं…एक हादसा तुम्हें सुनाऊँगा…।” सीधे बैठकर उसने सवालिया निगाह मुझ पर डाली तो मैंने बोलना शुरू किया,“लेकिन… उसका ताअल्लुक मेरे पीने से नहीं है…हम तीन भाई हैं…तीनों शादीशुदा, बाल-बच्चों वाले…माँ कई साल पहले गुजर गई थी…और बाप बुढ़ापे और…कमजोरी की वजह से…खाट में पड़ा है…कौड़ी-कौड़ी करके पुश्तैनी जायदाद को…उसने…पचास-साठ लाख की हैसियत तक बढ़ाया है लेकिन…तीनों में-से कोई भी भाई उस जायदाद का…अपनी मर्जी के मुताबिक…इस्तेमाल नहीं कर सकता…।”
“क्यों?” मैंने महसूस किया कि वह पुन: नशे से लड़ रहा है। आँखें कुछ और उबल आयी थीं और रेशे सुर्ख-धारियों में तब्दील हो गए थे।
“बुड्ढा सोचता है कि…हम…तीनों-के-तीनों भाई…बेवकूफ और अय्याश हैं…शराब और जुए में…जाया कर देंगे जायदाद को…।” मैं कुछ कड़ुवाहट के साथ बोला, “पैसा कमाना…बचाना…और बढ़ाना…पुरखे भी यही करते रहे…न खुद खाया…न बच्चों को खाने-पहनने दिया…बाकी दोनों भाई तो सन्तोषी निकले…लात मारकर चले गए स्साली प्रॉपर्टी को…लेकिन मैं…मैं इस हरामजादे के मरने का इन्तजार कर रहा हूँ…”
“तू…ऽ…” मेरी कुटिलता पर वह एकदम आपे-से बाहर हो उठा, “बाप को गालियाँ बकता है कुत्ते!…लानत है…लानत है तुझ जैसी निकम्मी औलाद पर…।”
क्रोधपूर्वक वह मेरे गिरेबान पर झपट पड़ा। मैं भी भला क्यों चुप बैठता। फुर्ती के साथ नीचे गिराकर मैं उसकी छाती पर चढ़ बैठा और एक-दो-तीन…तड़ातड़ न जाने कितने घूँसे मैंने उसकी थूथड़ी पर बजा डाले। इस मारधाड़ में मेज पर रखी बोतलें, गिलास, प्लेट नीचे गिरकर सब टूट-फूट गए। नशे को न झेल पाने के कारण आखिरकार मैं बेहोश हो गिर पड़ा।
होश आया तो अपने-आप को मैंने बिस्तर पर पड़ा पाया। हाथों पर पट्टियाँ बँधी हुई थीं। माथे पर रुई के फाहे-सा धूप का एक टुकड़ा आ टिका था।
“कैसे हो?” आँखें खोलीं तो सिरहाने बैठकर मेरे बालों में अपनी उँगलियाँ घुमा रही पत्नी ने पूछा।
“ये पट्टियाँ…?” दोनों हाथों को ऊपर उठाकर उसे दिखाते हुए मैंने पूछा।
“इसीलिए पीने से रोकती हूँ मैं।” वह बोली, “ड्रेसिंग-टेबल और उसका मिरर तोड़ डाला, सो कोई बात नहीं; लेकिन गालियों का यह हाल कि बच्चों को बाहर भगा देना पड़ा…रात को ही पट्टी न होती तो सुबह तक कितना खून बह जाता…पता है?”
मुझे रात का मंजर याद हो आया। आँखें अभी तक बोझिल थीं।
“वॉश-बेसिन पर ले-चलकर मेरा मुँह और आँखें साफ कर दो…।” मैं पत्नी से बोला और बिस्तर से उठ बैठा।

बलराम अग्रवाल
जन्म: 26 नवम्बर, 1952 को उत्तर प्रदेश(भारत) के जिला बुलन्दशहर में।
शिक्षा : एम ए (हिन्दी), अनुवाद में स्नातकोत्तर डिप्लोमा।
पुस्तकें : सरसों के फूल(1994), दूसरा भीम(1997), जुबैदा(2004), चन्ना चरनदास(2004), संस्कृत नाट्य:चिन्तन परम्परा और समाज (अप्रकाशित), समकालीन हिन्दी लघुकथा का मनोविश्लेषणात्मक अध्ययन (अप्रकाशित)।
सम्पादन व अन्य : मलयालम की चर्चित लघुकथाएँ(1997) के अतिरिक्त प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद, रवीन्द्रनाथ टैगोर, बालशौरि रेड्डी आदि वरिष्ठ कथाकारों की कहानियों के लगभग 15 कहानी-संकलनों एवं ‘वर्तमान जनगाथा’ सहित कुछेक पत्रिकाओं का संपादन/अतिथि संपादन। ‘अण्डमान व निकोबार की लोककथाएँ’ का अंग्रेजी से अनुवाद व पुनर्लेखन(2000)। 1997 से हिन्दी साहित्य कला परिषद, पोर्ट ब्लेयर(अण्डमान-निकोबार द्वीप-समूह) की पत्रिका ‘द्वीप लहरी’ के संपादन में सहयोग। कुछेक कहानियों का अँग्रेजी से हिन्दी में अनुवाद। अनेक वर्षों तक हिन्दी-रंगमंच से जुड़ाव। हिन्दी फीचर फिल्म ‘पोस्टर’(1983) व ‘कोख’(1992) के संवाद-लेखन में सहयोग। हिन्दी ब्लॉग जनगाथा(Link:http://www.jangatha.blogspot.com), कथायात्रा(Link: http://kathayatra.blogspot.com) एवं लघुकथा-वार्ता(Link: http://wwwlaghukatha-varta.blogspot.com) का संपादन/संचालन।
सम्प्रति : अध्ययन और लेखन।
संपर्क : एम-70, नवीन शाहदरा, दिल्ली-110032 (भारत)
दूरभाष : 011-22323249


जड़ की समझ
ट्रेन तो लेट थी ही, रस्ते की भीड़ भी कम न थी । काफ़ी जद्दो-जहद के बाद सुभाष ढकुरिया पहुंचा । इंटरव्यू की जगह साफ़ पता नहीं थी और वह धैर्य खोता जा रहा था । महानगरों में लोगों की व्यस्तता बिना काम के भी रहती है । किसी से पूछे भी तो कोई सुनकर भी अनसुने की ढोंग रचता और कोई इसकी अंग्रेजी मिश्रित हिंदी को समझ नहीं पाता । मेन रोड की बाँयीं ओर खड़े होकर कभी आती-जाती गाड़ियों को देखता तो कभी लम्बी सांसें छोड़कर किसी रेलिंग के सहारे खड़ा रहता ।
इसी बीच अपने भारी थैले को कंधे से उतारकर एक चबूतरे पर रख कर बैठने जाता कि उसे थोड़ी ही दूरी पर एक महिला दिखी जो एक छोटी सी कुटिया के बाहर पैंट-कमीजों पर लोहे की स्त्री फेर रही थी । सुभाष की नज़र उस महिला की साड़ी पर पड़ी । उसने साड़ी के पहनावे पर अंदेशा लगाया कि वह महिला उसी के क्षेत्र की होगी । थैले को फिर कंधे पर लादा और कदम बढ़ाया । पास जाकर खड़ा हुआ तो कोई ग्राहक समझकर महिला ने थोड़ी-मोड़ी बांग्ला में कहा — कि काज आछे बबुआ ? सुभाष उस महिला की बांग्ला से असहजता समझ गया और उसके मुंह से निकल पड़ा — गोड़ लगs तनी माँ जी ! शूट-बूट वाले किसी युवक से उस विराट नगर में एक स्त्री करने वाली महिला को ये उम्मीद नहीं थी । वह काम छोड़कर सामने आयी और बोली– जीते रहs बबुआ ! दोनों एक दूसरे के हाथों को पकड़ रखे थे और वह स्पर्श उनके लिए ‘ प्यासे को पानी’ जैसा था । समय कम था । सुभाष ने टूटी-फूटी भोजपुरी में झट से माफोई ऑफिस का पता पूछा । महिला ने जवाब दी– ऊ पुलवा भिरि बबुआ । नजिके हs । बैठ जा, तनि पानी पी लs । सुभाष तो नौकरी की ता;तलाश में था और उसे जल्दी ऑफिस पहुंचना था पर वह थम गया और जम भी गया । पानी पिया, बातें की ।
उसे पता चला वह महिला उस कुटिया में अकेले ही वैधव्य-जीवन बीता रही है और गाँव-घर से भी नाता टूट चूका है । सुमधुर कही जानी वाली बांग्ला भी उन्हें थपेड़ लगता है और सुभाष का गोड़ लगना उनकी घर-वापसी जैसी थी। सुभाष इंटरव्यू में अच्छा किया। नौकरी की खबर बाद में मिलती। उसे घर वापस आना था । फिर ट्रेन से सफ़र शुरू। रस्ते भर उस महिला की बोली कानों में गूंजती रही । घर पहुँच कर सुभाष ने अपने पिता से कहा– पापा, आज मेरी भाषा मेरी शिक्षा से अव्वल निकली और वही मुझे इंटरव्यू दिला पाई वरना मैं सिर्फ अंग्रेजी की दुनिया में गोता लगाता रहता और ऑफिस तक शायद पहुँच ही नहीं पाता । मेरी भाषा की महत्ता मुझे समझ में आई । सुभाष के पिता भी अपनी गलती को मन ही मन भांप कर सहम सा गए और एक लम्बी साँस लेते हुए ‘ काम ऑन माय सन’ न कहकर ‘ आ जा बबुआ, गले लग जा ‘ कहते हुए गले मिले । घर के अन्दर से माँ चीखती हुई बोली– अब समझे जी ? कहते थे न जड़ मत काटिये ! माँ खाने पर बुलाई तो सुभाष ने स्फूर्त जवाब दिया– आव तनि माँ ।

सौ-पचास का कमाल
दो तल्ले घर में रहने के लिए सिर्फ ५ सदस्य ही थे । ललित राय ने ऊपरी तल्ले को भाड़े में देने का मन बनाया । एक परिवार को दिया गया । मालिक और भाड़ेदार में अच्छा संपर्क बन गया । भाड़ेदार की बेटी बड़ी हुई तो शादी भी उसी घर से दी गयी । लड़के की शादी भी हुई । बहु आई । सब कुछ ठीक चल रहा था पर कुछ महीनों में मन-मुटाव की बात सामने आने लगी । एक दिन बहु ने घर पर फंदा लगाकर आत्महत्या कर ली । ललितजी ने पुलिस केस से तो अपने भाड़ेदार को बचाया पर घर वालों के प्रतिरोध से घर खाली करवाना पड़ा । अब समस्या यह थी कि उस कमरे का क्या किया जाय । सारे लोग डर से दिन के उजाले में भी इधर-उधर प्रेतात्मा का दर्शन करने लगे । सब दीवार से सट कर ही बैठते और दिन-रात घर की बिजली जलती रहती । गलती से अगर कोई चूहे ने कहीं गिलास या कोई वर्तन ही गिरा दिया तो सारे लोग एक साथ विकट शोर मचाते ।

ललितजी ने सोचा कि ऐसे मैं हार्ट-फेल तक की नौबत आ सकती है । इन्होने खुद उस कमरे में सोने की बात सभी से कही । मना करने पर भी वे सोते रहे और उन पर किसी भी प्रेतात्मा का प्रभाव नहीं पड़ रहा था । लोग हैरान थे । घर के सदस्य भी भौचक थे । वे बिल्कुल निडर होकर उस कमरे में रहते थे ।

किसी ने पूछा — ललित, आप कैसे उस कमरे में अकेले रह लेते हैं ?

ललित जी का जवाब था– जैसा रहा जाता है । बेकार की बातों पर मैं समय नहीं गंवाता । और ये लोग सब काम छोड़ कर प्रेतात्मा के पीछे लगे हैं । ऐसे में प्रेतात्मा नाम का कुछ होता भी होगा तो वो भी परेशान हो जाये । मेरे पास अगर वो आये तो मैं कहूँगा कि पास आकर टक्कर ले ले और नहीं तो सौ-पचास लेकर दफ़ा हो जाये ।

पूछने वाले ने मन ही मन सोचा — पुलिस, किरानी या चपरासियों को सौ-पचास देने की बात सुनी थी अब तो लोग प्रेतात्मा को भी दे कर काम निपटाने की सोच रहे हैं ।
मनोज आज़िज़


सवेरा
उस अंधेरे कमेरे में बंद ढेर सारे बच्चों के चेहरे पर दहशत की लिखी इबारत साफ़ पढ़ी जा सकती थी। अलग-अलग हिस्सों से पकड़ कर उन्हें लाया गया था और इस अंधेरे कमरे में बंद कर दिया गया था। कमरे का ताला बंद करते हुए वह सोच रहा था कि इस बार अच्छा-ख़ासा मुनाफ़ा होगा। बच्चों की तादाद ज्यादा है। एक बच्चे पर उसे कितना मिलेगा वह दिन भर यही हिसाब जोड़ता रहा। सालों से वह इस धंधा में लगा हुआ है। बच्चों को चुराना और फिर उन्हें बेच देना उसका धंधा था……बस आज की रात बीतनी थी…..कल सुबह ग्राहक आएगा और वह बच्चों को उनके हवाले कर फिर से शिकार पर निकल जाएगा……..यह सब सोचते-सोचते उसे नींद आ गई। नींद बहुत ही गहरी थी। पता नहीं कितनी देर तक वह सोता रहा। नींद खुली तो रात हो चुकी थी। उसने कमरे की तरफ़ देखा। ताला उसी तरह लगा था। उसे भूख लग रही थी।
वह उठा और बाज़ार की तरफ़ निकल पड़ा। लौटते हुए अचानक उसके क़दम ठिठक कर रुक गए। कोई मज़हबी जलसा था। लोगों की भीड़ लगी थी। कोई मौलाना तक़रीर कर रहे थे। वह भी भीड़ में शामिल हो गया। यह पहला मौक़ा था जब वह इस तरह के किसी जलसे में बेमन से ही सही शरूक हुआ था। ले देकर ीद-बक़रीद की नमाज़। बस मज़हब के नाम पर काम पूरा। पता नहीं मौलाना के शब्दों में क्या था कि वह तक़रीर खत्म होने तक वहीं खड़ा रहा। लौटते हुए उसके कानों में मौलाना के शब्द गूंज रहे थे- ‘पैग़ंबर हज़रत मोहम्मद ने किसी से भेदभाव नहीं किया। लोगों को ग़ुलाम बनाए जाने के वे ख़िलाफ़ थे। उन्होंने हज़रत बलाल हब्शी को ग़ुलामी से निजात दिलाई। वे इंसानी रिश्तों में मोहब्बत के क़ायल थे। सबसे बड़ी बात यह है कि हम जो ज़िंदगी जी रहे हैं वह झूट है, सच सिर्फÞ और सिर्फÞ मौत है। मरने के बाद हमें अपने कर्मों का हिसाब देना है। यह तय आपको करना है कि आप अपने साथ वहां क्या ले जाएंगे।’ बार-बार उसके सामने मौलाना के शब्द गूंज रहे थे। उसे लगा मौत उसके सामने खड़ी है और उसका हाथ ख़ाली है। ख़ुदा के यहां वह क्या लेकर जाएगा। बस यही एक लम्हा था जब रोशनी उसके अंदर फूटी और वह रास्ते में ही बैठ कर जाÞर-ज़ार रोने लगा। दिल पर जमा बरसों का मैल धुलने लगा। पता नहीं कितनी देर तक वह उसी तरह रोता रहा। आंसू थमे तो सारा मैल धुल चुका था।
रात बीत चुकी थी। तेज़-तेज़ क़दमों से चलता हुआ वह कमरे पर पहुंचा। बच्चों के कमरे का ताला खोल कर बत्ती जलाई। देखा बच्चे नींद में डूबे हैं। उनके चेहरे पर फैली मासूमियत को देख कर वह फिर रोने लगा। देर तक रोता रहा। फिर अपनी जगह से उठा। बच्चों के हाथ-पांव में बंधी रस्सियां खोलीं। उनकी जेबों में कुछ रुपए रखे। बच्चे अब भी नींद में मदहोश थे। फिर वह उन्हें उसी हाल में छोड़ कर कमरे से निकल गया…..। रात ढल रही थी और रोशनी की मधिम सी किरण धीरे-धीरे धरती पर फैल रही थी। दूर मस्जिद से फ़जिर की नमाज़ की अज़ान गूंजने लगी…..आज पहली बार उसके क़दम मस्जिद की तरफ़ उठ रहे थे…..अब उसके अंदर…बहुत अंदर एक सकून फैला था….।

पनाह
मौलाना साहब कभी भी उस गली से होकर नहीं गुज़रते। आख़िर शहर की सबसे बदनाम गली थी और उनके जैसा परहेज़गार आदमी उस गली की तरफ़ मुंह करना भी पसंद नहीं करेगा। वे लंबा रास्ता तय कर घर से मस्जिद आते-जाते। हालांकि इस रास्ते का इस्तेमाल कर के वे समय भी बचा सकते थे। लेकिन उन्होंने इस छोटे रास्ते से होकर घर जाने की बजाय बड़े रास्ते को ही तरजीह दिया। कितनी ही जल्दी क्यों न हो उन्होंने उस छोटे रास्ते का इस्तेमाल कभी नहीं किया। बरसों से यह उनका मामूल था…..
एक रात अशां की नमाज़ पढ़ा कर घर लौट रहे थे। उन दिनों शहर का माहौल ठीक नहीं था। बात-बात पर लोग एक-दूसरे का गला काटने पर आमादा हो जाते थे। रात ज्यादा हो गई थी। पर वे मामूल के मुताबिक़ धीरे-धीरे कदम धरते हुए घर की तरफ़ लौट रहे थे। छोटे से रास्ते को छोड़ कर ज्यों ही वे बड़े रास्ते की तरफ़ मुड़े गली से बदहवास सी दौड़ती एक लड़की को आते देख कर उनके क़दम ठिठक गए…….लड़की ने भी उन्हें देख लिया था। वह तीर की तरह उनकी तरफ़ आई…..मुझे बचा लें….
वे कुछ बोल भी नहीं पाए थे कि गली से चार-पांच लड़के निकले। वे उस लड़की के पीछे आए थे। उन्हें देख कर ही लग रहा था कि उनके तेवर ठीक नहीं हैं……पर मौलाना साहब को देख कर लड़के भी दूर ही रुक गए…….मौलाना ने उन लड़कों को पहचान लिया…..वे उनके मोहल्ले के ही लड़के थे…..।
मौलाना को माजरा समझते देर नहीं लगी……मौलाना के साथ खड़ी लड़की को देख कर लड़के पसोपेश में थे…..एक ने हिम्मत कर कहा ‘इसे हमारे हवाले कर दें।’
‘क्यों…..’ मौलाना ने पूछा।
‘इसे हलाल कर डालना है’। उसने फिर कहा।
‘लेकिन इसका क़सूर क्या है ?’ मौलाना ने पूछा।
‘इसका क़सूर बस इतना है कि यह हिंदू है’ इस बार दूसरे लड़के ने कहा।
‘तो क्या हुआ’ मौलाना ने बहुत शांत स्वर में कहा।
‘और मज़हब में काफ़िरों को मारने की इजाज़त है’ तीसरे ने बात को आगे बढ़ाई।
‘मज़हब को बीच में मत ला।’ अचानक मौलाना की आवाज़ तेज़ हो गई…..उन्हें इस तरह गुiस्सा करते हुए वे लड़के पहली बार देख रहे थे।
‘किस मज़हब की बात करते हो…..मज़हब ने इजाज़त दी है….’मौलाना ग़ुस्से से कांप रहे थे। ‘मज़हब ने कभी भी औरतों, बच्चों और बूढ़ों को मारने की इजाज़त नहीं दी है और बेक़सूरों को मारने की तो उसने कभी भी इजाज़त नहीं दी है। यह लड़की मेरी पनाह में है और इसकी तरफ़ हाथ क्या नज़र भी उठाने की कोशिश की तो मैं तुम लोगों की आंखें निकाल लूंगा’। फिर वे लड़की से मुख़ातिब हुए ‘चलो बेटी, तुम्हें तुम्हारे घर तक छोड़ दें’। उसे साथ लेकर वे उस छोटे रास्ते से उस गली में दाख़िल हो गए जहां अब तक उन्होंने पांव नहीं धरा था।


फजल इमाम मल्लिक
जन्म- 19 जून, 1964 को बिहार के शेखपुरा जिला के चेवारा में।
पिता/माता- जनाब हसन इमाम और माँ सईदा खातून।
शिक्षा- स्कूली शिक्षा श्री कृष्ण उच्च विद्यालय, चेवारा (शेखपुरा)। इंटर रांची युनिवसिर्टी के तहत रांची कालेज से । ग्रेजुएशन भागलपुर युनिवसिर्टी के रमाधीन कालेज (शेखपुरा)। व्यवसायिक शिक्षा पटना के आईआईबीएम से होटल प्रबंधन में पोस्ट ग्रेजुएशन।
लेखन- उर्दू और हिंदी में समान रूप से लेखन। लघुकथाएँ, कविता, कहानी, समीक्षा और सम-सामयिक लेखन। साहित्य-संस्कृति पर नियमित लेखन।
पत्रकारिता- लंबे समय से पत्रकारिता।
1981 से जनसत्ता में बतौर खेल पत्रकार करियर की शुरुआत। इससे पहले सेंटिनल (गुवाहाटी), अमृत वर्षा (पटना), दैनिक हिंदुस्तान (पटना) और उर्दू ब्लिट्ज (मुंबई) से जुड़ाव। बतौर खेल पत्रकार विश्व कप क्रिकेट, विश्व कप हाकी, एकदिवसीय व टैस्ट क्रिकेट मैचों, राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय फुटबाल मैचों, राष्ट्रीय टेनिस, एथलेट्किस वालीबाल, बास्केटबाल सहित दूसरे खेलों की रिपोर्टिंग।
इलेक्ट्रानिकमीडिया- एटीपी चैलेंजर टेनिस, राष्ट्रीय बास्केटबाल, कोलकाता फुटबाल लीग, राष्ट्रीय एथलेटिक्स का दूरदर्शन के नेशनल नेटवर्क पर लाइव कमेंटरी। कविताएँ-इंटरव्यू दूरदर्शन पर प्रसारित। आकाशवाणी के लिए लंबे समय तक सहायक प्रोड्यूसर (अंशकालिक) के तौर पर काम किया। कविताएँ-कहानियाँ कोलकाता व पटना, गुवाहाटी के आकाशवाणी केंद्र से प्रसारित।
प्रकाशन- लधुकथा संग्रह मुखौटों से परे और कविता संग्रह नवपल्लव का संपादन।
संपादन- साहित्यक पत्रिका श्रृंखला व सनद का संपादन।
सम्मान- साहित्य व पत्रकारिता के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए कवि रमण सम्मान, रणधीर वर्मा स्मृति सम्मान, सृजन सम्मान और रामोदित साहु सम्मान।संप्रति- जनसत्ता में वरिष्ठ उपसंपादक।

संपर्क-
फ़ज़ल इमाम मल्लिक
4-बी, फ्रेंड्स अपार्टमेंट्स, पटपड़गंज,
दिल्ली-110092।
फोन: 9868018472/9350102013।
ईमेल: fazalmallick@gmail.com

छप्परफाड़ कमाई
पहाडी इलाके में बाढ़ ने तबाही मचा दी। अनेक बह गए, कुछ रास्ते में फंस गये. वे भूखे-प्यासे थे. तभी कुछ लोग खाने के पैकेट और पानी की बोतलें लेकर पहुँचे। लगा, भगवान् भेष बदल कर आये हैं। तभी उनमें से एक व्यक्ति ने कहा, ”एक रोटी के चालीस रुपये और पानी की बोतल के दो सौ लगेंगे”. मरते क्या न करते, सबने पैसे दिये. सामान बेच कर व्यापारी लौट रहे थे। एक बोला, ”आज तो एक ही झटके में हजारों कमा लिए। भोलेबाबा ने छप्पर फाड़ कर दिया है”. उसने इतना कहा ही था कि उसका साथी चीखा, ”अरे बच के। देखो, चट्टान गिर रही है” सब तेजी से भागे लेकिन सफल नहीं हो पाए और वहीं दब कर मर गए। हाँ, उन के कमाए चमकदार नोट ज़रूर सलामत थे.

जेंटलमेन प्रोमिस
पिछले साल की तरह इस बार भी ‘वे’ बाढ़ की तबाही का हवाई सर्वे कर रहे थे। लोग बह रहे हैं, मरे पड़े हैं, घर डूब गए है। ऊपर से ऐसे दृश्य निहारो, तो बड़ा रोमांचक होता है. मीडिया के सामने आंसू बहा कर वे घर पहुंचे तो पत्नी बोली, ”आप बड़े वो हैं। इस बार भी अकेले-अकेले उड़ गए”। बच्चे बोले, ”हम भी एन्जॉय करते पॉप”। महोदय ने शरमाते हुए कहा, ”अरे, डोंट बादर, तबाही तो आती रहती है। अगली बार साथ-साथ चलेंगे। इट इज जेंटलमेन प्रोमिस।”
संतुष्ट हो कर पत्नी लेडीज़ क्लब के लिए निकल गयी और बच्चे ‘लाँगड्राइव’ पर।

गिरीष पंकज

जन्म-१९५७, वाराणसी, शिक्षा- एम (हिंदी), बीजे( प्रावीण्य सूची में प्रथम), लोक कला-संगीत में डिप्लोमा, विद्यावाचस्पति की मानद उपाधि, प्रकाशन- ३ व्यग्य उपन्यास( मिठलबरा कि आत्मकथा, माफिया,पालीवुड की अप्सरा), ८ व्यग्य संग्रह ( ट्यूशन शरणम गच्छामि, भ्रष्टाचार विकास प्राधिकरण, ईमानदारो की तलाश, नेताजी बाथरूम में, मंत्री को जुकाम, मेरी ५१ व्यग्य रचनाये, हिट होने के फार्मूले, मूर्ती की एडवांस बुकिंग) सहित २९ पुस्तके प्रकाशित. एक ग़ज़ल संग्रह यादो में रहता है कोइ प्रकाश्य . सम्मान-पुरस्कार- अट्टहास सम्मान, लीलारानी स्मृति सम्मान, रमनिका फाउन्देशन सम्मान, रामेश्वर गुरु सम्मान, करवट सम्मान, समन्वय सम्मान, केपी नारायणन पत्रकारिता सम्मान, हिंदी सेवाश्री सम्मान(त्रिनिदाद) सहित २० से ज्यादा सम्मान. विदेश प्रवास- दस देशो की यात्राए. विशेष- गिरीश पंकज की व्यंग रचनाओ पर ६ शोध हो चुके है. इस वक़्त कर्णाटक एवं पंजाब के दो शिक्षक शोध कार्य कर रहे है. अनुवाद – उपन्यास मिठलबरा का उड़िया एवं तेलुगु में तथा माफिया का कन्नड़ में अनुवाद . सम्प्रति- संपादक, ” सद्भावना दर्पण”, सदस्य, ” साहित्य अकादमी”, नई दिल्ली, अध्यक्ष-छत्तीसगढ़ रास्त्रभाषा प्रचार समिति. संपर्क- जी-३१, नया पंचशील नगर, रायपुर. छत्तीसगढ़. ४९२००१ मोबाइल :०९४२५२ १२७२०, ई मेल –
girishpankaj1@gmail.com


परम्परा
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त्रिपाठी जी के घर में कोहराम मचा हुआ था। हर कोई गुस्से से उबल रहा था। घर के सभी सदस्य बैठक में गहन चिंता की मुद्रा में बैठे थे। बीच-बीच में सभी एक-दूसरे का मुंह ताक लेते थे। बड़ी लड़की द्वारा अपने सहपाठी के साथ प्रेमविवाह करने का फैसला लेने की घोषणा भर से मानो भूचाल आ गया था।
आक्रोश में त्रिपाठी जी बार-बार उबल रहे थे, ‘चाहे मेरी जान चली जाए, यह शादी नहीं होने दूंगा। इस घर की भी कोई मर्यादाएं हैं, परम्पराएं हैं। आखिर समाज को क्या मुंह दिखाऊंगा..? ‘बड़की की मां को भी कोई कम गुस्सा नहीं आ रहा था। घर के बाकी सदस्यों का भी यही हाल था। मां ने तो बड़की को उसकी इस करतूत पर ठोक-पीट भी दिया था। स्थिति विस्फोटक देख चारों लड़कियां दूसरे कमरे में चलीं गयीं। इस डर से कि जाने क्या हो अब।
काफी देर की चुप्पी के बाद पंडिताइन ने हिम्मत बटोरकर सन्नाटा तोड़ा और गम्भीर स्वर में त्रिपाठी जी को समझाया- ‘देखो जी, लड़की सयानी है। ब्याह की उमर भी है। चार-चार बैठीं हैं घर में, पैसा पास-पल्ले है नहीं। कहां से लाओगे चारों के ब्याह के लिए इतना पैसा। यूं ही कुंवारी बैठाए रखोगे क्या? बड़की कहती थी कि लड़का ऊंचे खानदान का है। कई-कई फैक्ट्रियां हैं उसके पिता की..और, उसने खुद ही ब्याह का प्रस्ताव रखा है बिटिया के सामने। इसलिए दान-दहेज का झंझट भी न होगा। ‘ वे एक ही सांस में सारी बात कह गयीं। उनके स्वर में विवशता साफ झलक रही थी।
‘तो क्या मनमानी होने दें..? एक को देख दूसरी बिगड़ेगी..। ‘ त्रिपाठी जी भड़क गये। ‘जैसी हैसियत है उसके हिसाब से सबके हाथ पीले करूंगा..। ‘
‘मनमानी काहे की पंडित जी..? जरा ठंडे दिमाग से सोचो। बिटिया सयानी है। यही क्या कम है कि उसने हम लोगों को अपना पहले से बता दिया। वरना, ब्याह करके लड़के के संग कहीं चली जाती तो हम कहीं के न रहते…। ‘ कहते-कहते आंखें भर आईं पंडिताइन की।
‘तुम शायद ठीक कहती हो बड़की की मां। मैं सोचता हूं कि जब बात इतनी बढ़ गई है तो जरा सोच-विचार के बाद लड़के के घर वालों से बात कर लेंगे चलकर। घर-बार और रिश्ता ठीक है तो हर्ज ही क्या है…। ‘ रूंधे गले से त्रिपाठी जी ने कहा। और तनाव से घिरे घर में एक बार फिर से खुशनुमा माहौल हो गया।

दंगा
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शहर में जबरदस्त सांप्रदायिक दंगा भड़का हुआ था। दो धर्म विशेष के लोग एक-दूसरे के खून के प्यासे हो रहे थे। हर तरफ हिंसा का तांडव चल रहा था। मानवता रो रही थी मगर किसी को कोई फिक्र नहीं।
इसी दौरान एक सुबह मुख्य चौराहे के पास एकाएक मजमा जमा हो गया। नुक्कड़ पर पर कूड़े के ढेर पर एक नवजात शिशु बिलख-बिलख कर आसमान सर पर उठाये था। यह दृश्य देखकर समूहो में बंटा हिंसक आदमी गलियों-मकानों की आड़ से बाहर आने को मानो विवश हो उठा। प्रेम और दया की परिभाषा लगभग भूल चुके लोगों के मन में नंग-धड़ंग पड़े उस अबोध के प्रति वात्सल्य और करुणा का भाव उमड़ पड़ा। कुछ उत्सुकता भी थी।
आपसी बैर-भाव भूलकर भीड़ में शामिल हर कोई बच्चे को लेकर चर्चा में मशगूल था। तभी एक मुल्ला जी ने अदबदा कर घूरे में से उस फूल से बच्चे को गोद में उठा लिया। उनके कोई सन्तान न थी, बाकी सब तो अल्लाह का दिया उनके पास था। उन्होंने सहमति के लिए अपनी मंशा सबको बताई तो हर किसी का सर ‘हां ‘ में हिला। और फिर, खुशी से नाच उठे मुल्ला जी उस मासूम को गोद में लेकर । उन्हें देखकर सभी की आंखें गीली हो गईं।

-सुबोध श्रीवास्तव,
‘माडर्न विला’, 10/518,
खलासी लाइन्स,कानपुर (उप्र)-208001.भारत।
मो.09305540745
ई-मेल: subodhsrivastava85@yahoo.in

एक नई शुरुआत

दादी अभी भी नाराज चल रही है ,सुबह से केवल चाय पी और ठाकुरजी के आगे बैठकर माला जप रही हैं – -स्निग्धा को कभी कभी दादी पर बहुत तरस आता है -बेचारी क्या करें ,पुरानी परम्पराओं में जकड़ी हुई अपनी रूढ़ियों और संस्कारों को नहीं छोड़ पातीं – -उन्होंने तो बचपन से यही देखा था कि बेटा अमूल्यअमानत है ,श्रेष्ठ है क्योंकि वह वंशबेल बढ़ाता है वारिस है घर का , ,और बेटियां तो पराया धन ! , ,उन पर खर्च क्यों करें ? ,उस दिन यही सब बातें उन्होंने पापाजी के सामने कह दीँ – – तब कभी भी ज्यादा न बोलने वाले पापाजी ने दादी का घोर विरोध किया था -कड़े शब्दों में फटकार लगाईं थी ,बेचारी माँ !,कभी दादी तो कभी पापा के बीच दौड़ती रही थीं ,पर विस्फोट तो हो चूका था ,दादी नाराज हो गई थीं – -बात यूँ थी कि स्निग्धा मेडिकल की प्रतियोगी परीक्षा में अव्वल आई थी और उसके नामांकन के लिए पैसों की व्यवस्था पापा ने मुश्किल से की थी ,यदयपि बड़ी कम्पनी में कार्यरत थे -पैसों की कोई विशेष परेशानी नहीं होती यदि पिछले वर्ष यह फ़्लैट नहीं ख़रीदा होता —छोटे भाई के स्कूल आठवीं के छात्रों का टूर गंगटोक जा रहा था ,बस -दादी का लाड़ला गुड्डू पापा से टूर पर जाने के लिए दस हजार रूपये मांग रहा था -पापा ने मना कर दिया कि दीदी का एडमिशन कराना है ,घूमने का क्या -हम फिर चलेंगे साथ –बस यही बात दादी को चुभ गई -उनके लाडले पोते की छोटी सी इच्छा जो पूरी नहीं हुई थी , ,बेटी को डॉकटरी पढ़ाना क्या जरुरी है ?- उनके जमाने में तो लड़कियां चिट्ठी पत्री लिखना -पढ़ना जन लें -बस यही सबसे बड़ी योग्यता थी , , , ,उनकी बेटियां भी तो बी ए तक पढ़ीं हैं ,तो क्या सुखी नहीं हैं ? , ,स्निग्धा अगले साल बाईस की हो जायेगी , बी ए तक पढ़ाकर कहीं शादी -ब्याह कर दो बस ,”दादी भुनभुना रही थीं ,पापा तो गुस्से से पैर पटकते हुए ऑफिस चले गए थे,गुड्डू भी रो धोकर सो चूका था बस ,माँ आंगन में भूखी प्यासी बैठी दादी को मना मनाकर हार चुकी थी – -वास्तव में गुड्डू की बात को लेकर दादी का नाराज होना तो एक बहाना मात्र था -वह नहीं चाहती थीं कि स्निग्धा कि पढ़ाई पर ज्यादा खर्च हो ,–छह साल बर्बाद होंगे सो अलग ,तब कहीं जात बिरादरी का लड़का मिले न मिले -दहेज़ के लिए पैसे कहाँ से आयेंगे ! , ,”दादी के अपने तर्क थे ,जिसके सम्मुख माँ ,पापा,स्निग्धा के सारे तर्क बेकार हो चुके थे ,-पूरा वातावरण शांत पर तनावग्रस्त था , , , ,सुबह के आठ बज रहे रहे थे -पापा चाय पीकर अख़बार पढ़ रहे थे ,स्निग्धा भी वहीँ बैठकर अपना प्रोजेक्ट पूरा कर रही थी -हृदय का बड़ा चित्र बनाकर ,रक्त संचरण दर्शाता हुआ एक मानव शारीर पेंट कर रही थी , , ,पता नहीं दादी कब धीरे से आकर पास बैठ गई थी -नाराज तो थी ही बीच बीच में झुक कर स्निग्धा के चित्र को भी देख रहीं थी -कौतूहलवश,जब रहा नहीं गया तो पूछ बैठी –”ये क्या है ?स्निग्धा ने बिना सिर उठाये जवाब दिया –”ये दिल है दादी ,ये ही धड़कता है तो हम जिन्दा रहते हैं ””ये लाल नीली सी डोरियां सी क्या है ”-स्निग्धा ने बताया कि ये नलियां हैं ,जो लाल रंग की हैं -साफ़ खून वाली हैं ,और नीली गंदे खून वाली , ,इस तरह दादी सवाल पूछती गई और स्निग्धा एक कुशल अध्यापक की तरह जवाब देती गई – -दादी की उत्सुकता चरम पर थी –”तू ये ही सब पढ़ेगी बिटिया ?” , , ,”हाँ दादी जब तेरा दिल बीमार होगा तो मैं ही तो उसे ठीक करुँगी – -सोच दादी ,बाहर के डाकटर कितना पैसा ले जाते हैं ,जब घर का ही डाकटर होगा तो पैसे बचेंगे -है ना ?”दादी खिलखिलाकर हंस पड़ी –”तो तू शादी करेगी न हमारी मर्जी से ?” ,पहले तो स्निग्धा समझी नहीं पर बात समझ में आते ही दादी के गले में बाहें दाल दीं –”हाँ दादी ”,आज स्निग्धा पापा के साथ नामांकन के लिए जा रही थी दादी का आशीर्वाद लेकर ,बेटे बेटियों के फर्क वाली रूढ़ियों की दीवार तोड़कर…एक नई शुरुआत के साथ – गुड्डू भी शरारत वश मुस्करा रहा था …।


सपनों की सड़क
तीन दिनों से कालोनी की सड़क बन रही है,लगता है जैसे कोई बड़ा आयोजन हो रहा हो,-सरकारी अफसरों की आवाजाही बढ़ गई है,,मजदूरों का शोरगुल ,कहीं मिटटी काटने और गिट्टी सीमेंट मिलानेवाली मिक्सिंग मशीन की धड़धड़ाती आवाजें विचित्र सा माहौल बना रही हैं,,,पुरे वातावरण में कोलतार की गंध फैली हुई है,,इतनी गर्मी व् उमस के बावजूद बेचारे मजदूरों के हाथ पसीना पोंछने के बाद तुरंत बेलचा उठा अपने काम में जुट जाते हैं,,, अपनी छत से मैं भी इस पूरे दृश्य को आत्मसात कर रही हूँ मजदूर मजदूरिनों के छोटे बच्चे एक किनारे बैठ कर टकटकी लगाये अपने माँ बाप को काम करते देख रहे हैं,,कुछ बच्चे मेरे घर के लोहे के गेट पर चढ़ कर खेल रहे हैं,-बहुत छोटे छोटे बच्चे हैं,जिनके चेहरों पर जिंदादिली की मुस्कान है, और आँखों में चंचलता–उनकी खिलखिलाती हंसी से उस नीरस वातावरण बोझिलता बीच बीच में भंग होती रहती है,
”एई चुप कोरो,”-चटाक् ”-किसी बच्चे ने दूसरे को कस कर थप्पड़ मार दिया था ,बदले में वो भी उससे उलझ जाता है,उसकी माँ आकर उसे शांत करती है,- उसके आंसू पोंछ जब जाने के लिए मुड़ी तो वह बिलख उठा–माँ!,,माँ गो,,आमी भात खाबो ”
”एखने थाक –आश्छि आमी ”,, वह बच्चे की भूख को नकार ,अपने काम में मगन हो गई,ताकि काम जल्दी पूरा कर बच्चे को कुछ खिला सके,चार पैसे कमा सके ,,,
मुझे उस निरीह भूखे बच्चे पर दया आ रही थी धुप भी तेज थी,उस भीषण गर्मी में भला कब तक वह भूख-प्यास बर्दाश्त कर पाता ?अपनी रसोईं से बिस्कुटों का डिब्बा उठाया और बाहर आकर उन छोटे बच्चों में बाँट दिया ,कुछ देर तक सभी बड़ी शांति से बैठकर बिस्कुट खाते रहे फिर सारे लड़ाई झगड़े भूल अपने खेल में व्यस्त हो गए,,,,काश!,,इंसान भी बच्चों जैसा होता -पल भर में सारे लड़ाई झगड़े भूल शांति-सुख की नींद सो पता तो दुनिया में यह मार-काट तो न मचती !,, अपने घर के दरवाजे पर खड़ी थी,धूप तेज होने पर भी कालोनी वाले वहां से टले नहीं थे,उनके घर के सामने की सड़क पर गिट्टी की मोटी चादर बिछ सके और समतल जमीन बने इस बात की परख करते हुए अपना काम जो करवाना था,सरकारी काम है-कहीं जैसे तैसे निपटा कर न चले जाएँ ,,,जिसके लिए वे अघोषित जाँच अधिकारी बने ,डटे हुए थे ,,मेरी कालोनी का वार्ड पार्षद अभी अभी मुझसे पानी की दो बोतलें मांग कर ले गया है, -चार कुर्सियां मैंने पहले ही भिजवा दी थीं ,,,सभी अधिकारी और ठेकेदार एक साथ बैठे थे,गाड़ियों की लम्बी कतार लगी थी,–इसी बीचसड़कों की लम्बाई-चौड़ाई और मोटाई की भी जाँच होती -फिर सड़क आगे बढ़ती , शाम होने लगी थी ,काम रोक दिया गया,सारे मजदूर आजके दिन की पगार के लिए इकट्ठा हो गए थे,,,तभी जोरदार हल्ला हुआ,पता चला की ठेकेदार कम पैसे दे रहा था -बाकि मजदूरी कल देने का आश्वासन देकर जिसका विरोध मजदूर कर रहे थे,-,क्या खाएंगे -बनिए का उधार चुकाना है -साहब,,,बच्चा बीमार है ,,सबकी अपनी अपनी परेशानियां –लेकिन परवाह किसे थी ?,,बहस चल रही थी,,मजदूर नाराज थे और फैसलाहुआ कि वे आगे का काम नहीं करेंगे जब तक पैसे पूरे नहीं मिलेंगे”,,,समझौते की कोशिशें जारी थीं ,,
लेकिन इन सबसे अलग ,,,कुछ नन्हे हाथों ने अपना काम बंद नहीं किया था,,,वे नन्हे कदमों से गिरते-पड़ते ,गिट्टी,बालू सीमेंट मिलकर खेल खेल में ,अपने अनगढ़ हाथों से ,करीब एक मीटर सड़क बना चुकेथे ,,ये उनके सपनो की सड़क थी -जहाँ न भूख थी,न गरीबी,न बनिए का उधार चुकाना था,-न अपने माँ,बाबा की तरह जिंदगी की जद्दोजहद से जूझना था,,-वे तो अपने खेल में -अपने सपनों की दुनिया में वे मगन थे – -!

–पद्मा मिश्रा -जमशेदपुर

फिर वही मारपीट, हत्या, बलात्कार…। तंग आ गया हूँ इन समाचार पत्रों से। कभी-कभी तो सुबह-सुबह अच्छी खबर दे दिया करें।
अजी सुनते हो ! ये देखो, अखबार में आपके गांव में मारपीट का समाचार छपा है। जरा पता करो अपने घर का तो कोई घायल नहीं हुआ?
हुँह! ये घरवाले भी कोई सूचना नहीं देते, इसके लिए भी अखबारों पर निर्भर रहना पड़ता है । कहते हुए वे फोन बूथ की तरफ चल पड़े।

2)
पेप्सी-कोला, हाय-हाय ! बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ खूनी हैं ! बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ भारत छोड़ो ! के नारों के साथ नौजवानों का जुलूस आगे बढ़ा जा रहा था। चौराहे पर मीडिया के लोगों को देखकर वे और तेजी से नारे लगाने लगे। जब मीडिया के लोग कवरेज करके चले गये तो उनमें से एक बोल पड़ा ‘ अरे यार! गला सूख रहा है कुछ ठंडा-वंडा मिलेगा कि फ्री में ही नारे लगवाओगे। ‘ देखते ही देखते नारे लगाते नौजवान बगल के रेस्टोरेंट में घुस गये। पेप्सी कोला की बोतलें अब गले में तरावट ला रही थीं।

कृष्ण कुमार यादव

तेरहवीं

शाम को एक छोटा सा कार्ड बिना दरवाज़ा खटखटाए कोई फेंक गया। रात को मुन्ना हाथ में लिये मुझे दिखा रहा व बोला, ‘‘अम्मा, पिछली गली वाली दादीजी की तेरहवीं है। कल दोपहर का खाना है व 2 से 3 बजे तक पगड़ी की रसम।’’ उसके बताते ही मेरे शरीर में बिजली सी कौंध गई। मेरा अच्छा-खासा प्यार था उनसे। दूसरे दिन मैं समयानुसार उनके पिछले वाले बड़े से आँगन में पहुँच गई। बड़ा सा शामियाना, आज़ाद टैंट वालों का इन्तज़ाम। खाना सजा हुआ, लोग घूम-घूमकर चटकारे लेकर खाते हुए। सिर्फ कमी थी तो ये कि डी.जे. के अष्लील गानों पर लोग नाच नहीं रहे थे। माहौल चुपचाप खाकर, लिफ़ाफा पकड़ाकर जाने का था। कोने में खड़ी-खड़ी मैं ये दृष्य देख रही थी कि अचानक मेरा ध्यान दादी की उस स्थिति पर चला गया, जब मैं उन्हें आखिरी बार मिलने गई थी। ढीली खाट, जिस पर बिछी चादर न जाने कब बिछाई गई थी। गुच्छा-गुच्छा होकर दादी के बदन को तंग कर रही थी, दादी कभी इधर से सीधी करती कभी उधर से। तकिया बेहाल था। कमरे में ज़ीरो वाॅट का बल्ब था। न कोई खिड़की, न झरोखा। पास में एक प्लास्टिक की टूटी बालटी पड़ी थी। सुबह-सुबह पानी का लोटा, गिलास रख दिया जाता। लाख आवाज़ें देने पर भी कोई न आता। हरिया भागता-भागता कभी-कभी चाय का गिलास, दो रस दे जाता। दादी बेचारी हाँफती-हाँफती उठती, मुष्किल से नहाती, धोती, अपने अस्त-व्यस्त बाल अपने हाथों से सुलझाती। कभी किसी से कोई षिकायत न करती। कोई हाल पूछता तो कहती, ‘‘बेटा बुढ़ापा ही तो सबसे बड़ी बीमारी है।’’ तरस आता उन्हें देखकर। किसी के पास वक्त न था उन्हें कुछ पूछने का, उनकी सेवा करने का, पर आज ये लाखों रूपये खर्च कर दिखावा क्यूँ?

रसम

छुट्टियों के बाद स्कूल में मेरा पहला दिन था। नीना को सामने से आता देख मुझे अचम्भा सा हुआ। वह स्कूल की पी.टी. अध्यापिका है। पूरा दिन चुस्त-दुरुस्त, मुस्काती, दहाड़ती, हल्के-हल्के कदमों से दौड़ती वह कभी भी स्कूल में देखी जा सकती है। आज वह, वो नीना नहीं कुछ बदली सी थी। उसने अपने सिर के सारे बाल मुंडवा दिये थे। काली शर्ट व पैंट पहने कुछ उदास सी लग रही थी। कुछ ही समय में पता चला कि इन छुट्टियों में उसके पापा की मृत्यु हो गई थी। सुनकर बुरा लगा। शाम को मैं करीब चार बजे उसके घर गई। उसने मुझे बैठक में बिठाया। पानी लाई व मेरे पास बैठ गई। पूछने पर पता चला कि उसके पिता की मृत्यु हृदय गति रूकने के कारण हुई थी। रात का समय था, वह उन्हें अस्पताल ले गई जहाँ डाक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। घर आकर उसने अपने रिष्तेदारों को पिता जी मृत्यु की सूचना दे दी। सुबह पूरा जमघट लग गया। सवाल कि संस्कार पर कौन बैठेगा? चाचा के 3 बेटे थे। तीनों खिसक लिये। समय का अभाव था। नीना की दो बड़ी बहनें शादीषुदा थी, उनके बच्चे व पति भी व्यस्त थे। वह 10 दिन बैठ नहीं सकते थे। लाष को उठाने से पहले यह कानाफुसी नीना तक पहुँच गई। वह माँ के पास बैठी थी। उसने आँसू पोंछे व पिछवाड़े वाले ताऊजी से कहा जो रात से उनके साथ थे, ‘‘ताऊजी, मैं करूँगी पिताजी का अन्तिम संस्कार, मैं बैठूँगी सारी पूजा पर।’’ सबके दाँतों तले अंगुली आ गई। पर नीना ने किसी की परवाह न की। कंधे पर सफ़ेद कपड़ा रख कर, सबसे पहले अपने पापा की लाष को कंधा दिया व शमषान तक पूरी विधिपूर्वक सब कार्य किया। बताते-बताते उसकी आँखें कई बार नम हुई। बोली, ‘‘मैडम, मेरे पापा उकसर कहते थे मेरी दो बेटियाँ, एक बेटा है। मुझे क्या पता था कि आज………..’’ मैंने उसके कंधे पर हाथ रखा और कहा, ‘‘नीना, मुझे तुझ पर गर्व है।’’

शबनम शर्मा