
भ्रमित
शहर में वृक्षारोपण प्रोग्राम चल रहा था। वहीं पुरानी परिचित लक्ष्मी से मुलाकात हो गई।वह जोर शोर से उसमें हिस्सा ले रही थी और बता रही थी कि उनकी संस्था पर्यावरण के लिए बहुत काम कर रही है।
लौटते समय वह मुझे अपने घर ले आई।
“अरे लक्ष्मी तुम्हारे घर के दोनो तरफ कितनी हरियाली थी।उन आम ,अनार और गुलमोहर के पेड़ोंं की वजह से यह घर कोठी का लुक देता था ,कहाँँ गये सारे पेड़?”
“पति का स्वस्थ्य ठीक नही था तो वास्तुशास्त्री ने कहा यहाँ का वास्तु अच्छा नहीं है, कोने का पेड़ हटा कर वहाँँ खुला वाटर टेंक बनाओ ,उसमें कमल खिलाओ और किचन के बाहर एक्सटेंन्शन कराओ तो दूसरा पेड़ भी कटवा कर एक कमरा बनवाया।”
“कुछ फायदा हुआ ?”
“पति ही नहीं रहे।”
“फिर वास्तु वाले से कुछ पूछा नहीं?”
“पूछा था ,बोला घर का वास्तु तो ठीक हो गया है पर मौत को कौन रोक पाया है ?”
“यहाँ एक नीबू का पेड़ भी तो था कुछ साल पहले जब मैं आई थी तब उसमें सैंकडों नीबू लगे थे, अभी है? ”
“हाँ था तो पर नींबू हमारे यहां ज्यादा काम नहीं आते थे उसे हटा कर वहां एक छोटा सा मंदिर बनवा लिया था।”
उनके पर्यावरण प्रेम की पोल खोलता उनका घर देख कर मैं अपने को रोक नही पाई–“लक्ष्मी बाहर आप पर्यावरण की रक्षा के लिए बड़ी संख्या मे पेड़ लगवा रही हैं और अपने घर के जमे जमाए पेड़ो को कटवा दिया ? ”
“हमारा कौन सा अपना है ,किराए का ही तो है।”
-पवित्रा अग्रवाल
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भ्रमित
‘मुझे एक गिलास पानी ला दो प्लीज़।’
‘अभी लाई, बस जरा यह हाथ का काम निपटा लूँ। दो मिनट इंतज़ार कर लें, प्लीज़।’
‘हर काम तुन अपनी मरजी से क्यों करना चाहती हो?’
‘और आप भी तो बिल्कुल हिटलराना अन्दाज़ में अपनी मर्जी से ही?’
‘ क्यों नहीं? ट्रंप की मर्जी से ही तो सारी दुनिया चलती है।’
‘भ्रम ना पालें। सारी नहीं, सिर्फ ताश की ! और ताश की दुनिया सारी दुनिया नहीं।’
पत्नी ने मुस्कुराकर पति को पानी का गिलास थमा दिया।
शैल अग्रवाल
आणविक संकेतः Shailagrawal@hotmail.com
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