पाँच लघुकथा

दिव्या राकेश शर्मा

लघुकथा-१
गोवर्धन
” दादा! इस बार फसल के लिए डर लग रहा है।” सुखिया ने अपनी चिंता गाँव के प्रधान के सामने रखी।हर बार की बाढ़ आधी फसल को निगल जाती और पीछे रह जाती किसान की मेहनत रोते बिलखते।
“कोशिश तो कर रहा हूँ बांध के प्रार्थना पत्र की मंजूरी की।देखो सरकार के कानों में जूँ रेंगती है कि नहीं।” प्रधान ने बुझे मन से जवाब दिया।
चौपाल पर बैठे सभी लोग सन्नाटा ओढ़कर बैठ गए।उमस भरी धरती पर सन्नाटे की चादर अजीब सी दुर्गंध दे रही थी। यह दुर्गंध भूखी अंतडियों से उठ रही थी शायद।
“बारिश न होने की दुआ भी नहीं माँग सकते….।” भीरू ने सन्नाटा तोड़ा।
“बावला है! ऐसी बात सोचना भी मत।क्या पता इंद्र तेरी दुआ सुन ले।” सुखिया ने भीरू को झिड़कते हुए कहा।
” बिना चढावे के इंद्र भी नहीं सुनता।” इतना कह भीरू हँस पड़ा।
“इंद्र के कान तो सुन भी लेंगे लेकिन वो जो अफसर बैठा है उसे चढावा लेने के बाद ही सुनाई देता है।चलो चढावा दे भी दें अपनेअपने पेट बांधकर लेकिन पिछली बार की तरह बेकार न हो जाए।पानी तो जैसे फसलों की मौत बनकर आता है।” प्रधान बोला।
“तो क्यों बैठे हो सरकार की ओर आँखें टिकाए! अरे कन्हैया क्यों नहीं बन जाते!”
“कहना क्या चाहता है तू भीरू?” प्रधान ने भीरू की ओर कुछ गुस्से से देखा।
” कहना क्या है!रिश्वत देने से अच्छा उस पैसे को बांध बनाने में खर्च कर दो।कान्हा की तरह छोट़ी उंगली तो नहीं लेकिन मेहनती हाथ तो हैं हमारे पास!” भीरू कुछ ऊँचे स्वर में बोला।
भीरू की आवाज़ में शामिल आत्मविश्वासी शब्द सबके कानों में उतर गए।जो भूखी अंतडियों की दुर्गंध को हटाने लगे।
कई आवाजें एक साथ सन्नाटे में गूंजने लगी। इस शोर की खनक से उमस भरी धरती भी शीतलता देने लगी।
लघुकथा-२
सतर्कता
“देख बिरजू न हजार कम न दो हजार ज्यादा।दाम खरा है, उठाना है तो उठा ले ईंटें।वरना छोड़ दें।हमें कौन सा गाहकों की कमी है।” भट्टे के मालिक ने जब बिरजू से यह कहा तो बिरजू का मन उदासी ओढ़ कर बैठ गया।उसकी आँखों के सामने आँगन की टूटी दीवार घूम गई।बिरजू मन ही मन बोला,
“का जवाब दूंगा शक्को को अब! ताना मारेगी,कहेगी कि रात दिन दूसरों के घर बनाने के लिए ईंटें ढोते हो।दो ईंटें खुद के परिवार के लिए नहीं ढो सकते।अब क्या कहूँ उस पगली को कि ईंटें ढोने वाला ईंटों का मालिक नहीं होता।”
बिरजू चुपचाप से वहाँ से उठ चला।उसे टोकते हुए भट्टे के मालिक ने कहा,
“ अरे ले जा कौन सा नकद मांग रहा हूँ उधार ले जा ।दे दियो थोड़े-थोड़े करके।तू तो पुराना आदमी है।”
बिरजू ने पलटकर भट्टे मालिक को देखा और मुस्कुरा कर कहा,
“ उधार का बोझ इन ईंटों के बोझ से भारी होता है बाबू साहेब।चलता हूँ जब जेब में पैसा होगा तब आऊंगा।”
बिरजू वहाँ से चला आया ।घर पहुंचा तो पत्नी को.सारी बात बताई।उधार की ईंटों की बात सुन शक्को बोली,
“बड़े बावले हो तुम!जब वो उधार दे रहा था तो ले लेते ईंटें। चाहिए ही कितनी थी !”
उसकी बात सुनकर बिरजू ने टूटी हुई दीवार की ओर देखा और बोला,
“घर में जवान बेटी है हमारे।याद रखना गरीब के घर में जवान बेटी हो तो गरीब को उधार नहीं लेना चाहिए।उधारी गरीबों की बेटियों को खा जाती है।”
लघुकथा-३
इंटॉलरेंस
“कूड़ा….” घर के बाहर कूड़े वाले ने जोर से आवाज लगाते हुए गेट पर हाथ मारा।
“ये कमीना भी उसी वक्त आता है जब इंसान जरूरी काम कर रहा हो..,” भुनभुनाते हूए फोन मेज पर रखकर, दृष्टि डस्टबिन उठाकर बाहर की ओर लपकी।
बाहर जाकर देखा तो कूड़ेवाला तीन मकान छोड़कर खड़ा था और सबके कूड़े में से कूड़ा छांट रहा था।
“अब आकर ले जा…. कब तक हाथ में कूड़ा लिए खड़ी रहूंगी!” तमतमाकर वह चिल्लाई।
“आ रहा हूँ दो मिनट रूकिए।” उसनें जवाब दिया और फिर से कूड़ा छांटने लगा।
“अब इसका भी इंतजार करो… कुछ कह दो तो नखरे दिखाने लगेंगे… ये इंटॉलरेंस किसी को दिखाई नहीं देता।” बुदबुदाते हुए वह डस्टबिन पटक अंदर चली गयी और फोन उठाकर बाहर आ गई साथ ही वफेसबुक पर ‘इंटॉलरेंस का शिकार होती महिलाएँ’ शीर्षक पर लिखे गए लेख पर चल रही बहस में शामिल हो गई।
‘सबसे ज्यादा बर्दाश्त कर रही हैं हम औरतें… हर जगह हर संस्कृति में हमें दबाया जाता है।’ दृष्टि ने प्रतिउत्तर में एक टिप्पणी लिख दी थी।’
‘कौन दबा रहा है मैड़म? असल में औरतें बहुत होशियार होती हैं। फायदे के लिए खुद को बेचारी बनाएं रखना चाहती हैं।’ किसी ने उसकी टिप्पणी के उत्तर में लिख दिया।
‘औरतें कभी फायदा नहीं उठाती बल्कि तुम जैसे लोग अपनी माँ का भी फायदा उठाते हो।’ उसकी महिला मित्र ने जवाबी टिप्पणी लिख दी।
इसके बाद उसके विरूद्ध ही जैसे सबने मोर्चा खोल दिया।
किसी ने लिखा कि महावारी पर नौटंकी करती यह औरतें झूठा फेमिनिज्म का एजेंडा चला रही हैं। किसी ने उच्छृंखल कहा तो किसी ने लिखा कि इसे औरतों के साथ न जोडों… किसी ने लिखा कि यह तुम्हारा झूठा नारीवाद है और किसी ने वामपंथी कह कुछ गालियां लिख दी।
दृष्टि सबको जवाब दे रही थी कि तभी उसे परेशान करने यह कूड़ेवाला आ गया। वह अब तक वहीं खड़ा था।दृष्टि का गुस्सा बढ़ता जा रहा था।
दृष्टि पोस्ट पर आए कमेंट्स को देखने लगी तभी एक कमेंट ने उसके दिमाग के पारे को और बढ़ा दिया। किसी ने लिखा कि इस देश में सिर्फ मुसलमान और दलित असहिष्णुता के शिकार हो रहे हैं… इससे ध्यान भटकाने के लिए तुम जैसी महिलाएँ ऐसे प्रपंच रचती हैं।
“सामने होता तो इसकी गर्दन दबा देती… ओ आयेगा कि नहीं तू?” कमेंटकर्ता को गाली देते हुए वह कूडेवाले पर फिर चिल्लाई।
अगले पल वह उसके सामने था। उसने दृष्टि के हाथ से डस्टबिन लिया और अपनी गाड़ी में उलट दिया।
वापस मुड़ती दृष्टि कुछ देख अचानक ठिठक गई। कूडेवाले की गाड़ी पर नजर डालकर कुछ देखने लगी। वहाँ पड़े मौहल्ले भर के कूड़े को उसने अपने हाथों से अलग-अलग किया हुआ था जिनमें शामिल थे खून से सने सेनिटरी पैड्स… डायपर्स… और न जाने क्या-क्या। यह देख वह खुद पर शर्म महसूस करनी लगी और सोच में पड़ गई कि समाज में इंटॉलरेंस के असली शिकार कौन है?
लघुकथा-४
पुष्करिणी
जलाशय के निकट दीप प्रज्वलित कर यशोधरा ने प्रथम पग ही रखा था कि सहसा उसकी नजर एक स्त्री पर पड़ी।
स्त्री का मुख अलौकिक तेज से दमक रहा था।मंत्रमुग्ध हो यशोधरा उनके समीप खींच चली गयी।
“आप कौन है देवी?आपके मुख की आभा देवतुल्य लग रही है।”यशोधरा ने प्रश्न किया।
“मैं वहीं हूँ जिसका स्मरण तुम रोज करती हो।”मधुर स्वर में उन्होंने प्रतिउत्तर दिया।
“माते सीता!”इतना कहकर यशोधरा उस स्त्री के चरणों में झुक गई।
उसकी आँखों से अश्रु ,सरिता की तरह बहने लगे व उस अलौकिक स्त्री के चरणों को भिगोने लगे।
“इस जल को संचित करो यशोधरा।यह यूँ व्यर्थ करने के लिए नहीं है।”माता सीता ने यशोधरा को उठाते हुए कहा।
“किन्तु माता जिस स्त्री का पति उसका परित्याग कर चला गया हो उसके जीवन में अश्रु ही लिखें है विद्याता ने।”यशोधरा ने दुखी होकर कहा।
“स्त्री इतनी साधारण कब से हो गई कि वह अपने भाग्य के लिए ईश्वर को दोषी मानें!क्या भाग्य से स्वंय ईश्वर बच सके?”माता ने कहा।
“परंतु…मैं भी उनके साथ सन्यास ले सकती थी माता , फिर क्यों उन्होंने मेरा त्याग किया?मेरी पीड़ा को क्यों जान सके!”
“उस पुष्करिणी को देखो यशोधरा…उसमें संचित जल को देखो।”माता ने कहा।
प्रश्नचित हो यशोधरा जलाशय की ओर देखने लगी।
“जानती हो उसका निर्माण पुरुषों ने किया या स्त्रियों ने?”माँ ने पूछा।
“निस्संदेह पुरुषों ने”यशोधरा ने उत्तर दिया।
“और उसमें एकत्रित जल कहाँ से आया?”माता ने कहा।
“वर्षा से।किन्तु आप यह प्रश्न क्यों पूछ रही हैं माता!”
“यह संसार भी एक पुष्करिणी ही है और हम स्त्रियां वर्षा का जल।जल के बिना जलाशय अस्तित्वहीन है।वैसे ही हमारे बिना पुरुषों का आधार अस्तित्व हीन है।”
“परंतु माता हमें यह संसार सदैव निर्बल और दीनहीन ही मानता है और हमारे लिए अश्रु बहाता है।”यशोधरा ने कहा।
“स्त्री कभी निर्बल नहीं थी।मैं सीता बनी इसलिए प्रभु पुरषोत्तम कहलाए।”
“तुम यशोधरा हो तभी सिद्धार्थ बुद्ध कहलाए।”माता सीता ने दृढता से कहा।
माँ के शब्दों के तेज से यशोधरा का मन उज्वलित हो गया।
लघुकथा-५
रसोई
“विभा चाय ले आओ बढिया सी।” घर के अंदर घुसते ही सुधीर ने पत्नी को आवाज़ लगातार कहा और खुद पिता के निकट बैठ गया।
“पापा देखो, चार कमरे निकल आएं हैं और मंदिर के लिए अलग स्पेस भी।” सुधीर ने उत्सुकता से पिता के सामने नक्शा बिछाकर कहा।
“बढिय़ा, अच्छा यह बता कि ड्रांइग रूम का साइज क्या है?छोटा नहीं होना चाहिए दिनभर वहीं बैठना होता है मुझे।”पिता नक्शे को देखते हुए बोले।
“अरे पापा! यह देखो, पूरे पंद्रह बाई पंद्रह का निकल रहा है। ध्यान से देखो न।दो बेडरूम चौदह बाई बारह के और एक बारह बाई बारह का।सुधीर की आवाज़ में अलग खनक थी।
“बस सब बढिया हो गया।बस अब काम शुरू करवा दे प्लॉट पर।इस दड़बे से निकलें बाहर।” पिता ने कहा।
“रसोई का क्या साइज है?”विभा ने पूछा.
“अरे यार तुम चाय रखो पहले ,बहुत थक गया हूँ।” सुधीर ने विभा की बात को अनसुना कर बोला।
सुधीर और श्वसुर जी को चाय पकड़ा विभा फिर नक्शे को देखने लगी.
“आठ बाई आठ की रसोई तो बहुत छोटी बनेगी।” विभा बोली।
“आठ बाई आठ की रसोई छोटी नहीं होती और वैसे भी तुम्हें कौन सा रसोई में खाट बिछानी है!खाना ही तो बनाना है।”
चाय का घूंट भरते हुए सुधीर ने कहा।
“मेरा तो पूरा दिन ही वहीं बीतता है बस खाट ही नहीं बिछाती। गर्मी में कितनी घुटन हो जाती है तुम क्या जानो।” विभा के स्वर में उदासी थी।
“अरे यार, मम्मी ने पूरी जिंदगी इस छह बाई छह की रसोई में बीता दी उन्होंने तो कभी शिकायत नहीं की छोटी रसोई की!”सुधीर ने चिढ़ते हुए कहा।
“कभी खड़े होकर देखना जून की गर्मी में।खुद पता चल जायेगा मैं शिकायत कर रही हूँ या परेशानी बता रही हूँ।” विभा बोली।
“यार नौटंकी न करो।क्यों काम में विघ्न डाल रही हो!अब नक्शा बन गया है।” सुधीर झल्लाते हुए बोला.
“तो ठीक करवा ले नक्शा। शिकायत नहीं की तो क्या मुझे दिक्कत नहीं थी!खूब परेशानी होती थी इस पिंजरे सी रसोई में खाना बनाने में पूरी जिंदगी सोचती रही कि अगर नया घर बना तो रसोई खूब खुली बनाऊंगी।” अब तक चुप बैठी सुधीर की माँ बोल पड़ी।
“सच में माँ,मैं अपने बेडरूम से ज्यादा रसोई को खुला चाहती हूँ ताकि चार मेहमानों के आने पर खाना बनाने में दिक्कत न हो।” सास की बात से बल ले विभा बोली।
“बिल्कुल सही है।औरत की पूरी जिंदगी रसोई के धूँए में स्वाहा हो जाती है लेकिन किसी को इसका एहसास नहीं होता।सुधीर तू रसोई का साइज दो फुट बढ़ा और देख रसोई में हवा और रौशनी बराबर हो।” माँ ने आदेश दिया।
“फिर तो ड्राइंगरुम छोटा करना होगा।पापा से पूछ लो पहले माँ।” सुधीर ने पिता की ओर देखकर कहा।
“तेरे पापा को बनाना पड़ता है क्या खाना!” माँ चिढ़ते हुए बोली।
“बेटा सुधीर ,रोटियां चाहिए तो जो यह सास बहू कहें मान ले भाई।” पिता ने पत्नी की ओर देखकर बेचारगी से कहा।
“नहीं पापा, रहने दीजिए। यदि आप दोनों की सहमति नहीं है तो मैं कुछ नहीं कहूंगी।” विभा धीरे से बोली।
“अरे बेटा, मेरी सहमति तो सबकी खुशी में है और सबकी खुशी तो घर की लक्ष्मी से जुड़ी है। वह दुखी तो कैसी सहमति!और फिर हम दोनों को यह बात समझनी चाहिए थी कि कैसे गर्मी में एक औरत घर का पेट भरने के लिए बिना शिकायत जलती रहती है।”
श्वसुर जी की बात सुन विभा का चेहरा खिल उठा।उसने सुधीर की ओर देखा।
“ठीक है भई।बहुमत की जय जय कार है।कल ही रसोई के साइज और वेंटिलेशन को लेकर बात करता हूँ।लेकिन एक शर्त पर।” सुधीर ने बोला।
“कौन सी शर्त?” माँ ने पूछा।
“मुझे समोसे खाने हैं वह भी माँ के हाथ के।” सुधीर चहकते हुए बोला।
“तू नहीं सुधरेगा।अब भी माँ को गर्मी में मारेगा।बीवी को बोल अपनी!” माँ ने नकली गुस्सा दिखाते हुए कहा।
“नहीं माँ,आपकी बहू को कुछ नहीं कहूंगा क्योंकि जान गया हूँ कि बहुमत उसी के पास है।” सुधीर ने दोनों हाथ विभा की ओर जोड़ दिए।
उसकी इस हरकत पर तीनों के चेहरे पर हँसी खिल गई जैसे बसंत की धूप आँगन में पसर गई हो।
पाँच लघुकथा

दिव्या माथुर
लंदन, यू.के

लघुकथा-१
‘है न जोआन्ना?’
सहायक प्रबंधक रोज़मैरी ने जोअन्ना जैसी अल्पशिक्षित और कमज़ोर दिमाग वाली औरतों को क्लीनिंग-एजेंसी में भर्ती कर लिया था, चार पाउंड प्रति घंटा की एवज में वह उनसे छै पाउंड्स की रसीद पर घुघ्घी मरवा लेती।
नया कुर्क नरेन शिक्षित था, उसने घुघ्घी मारने से साफ़ इन्कार कर दिया।
रोज़मैरी रोती हुई झट मैनेजर के पास पहुंची और उन्हें बताया कि कल रात नरेन ने शराब पीकर उनसे छेड़कहानी की।
‘है न जोआन्ना?’ रोज़मैरी की मुँहलगी जोअन्ना ने उनकी हाँ में हाँ मिलाने में ही अपनी खैर समझी। नरेन ने अपने सहकर्मियों को एक कातर दृष्टि से देखा; चुप थे।
लघुकथा-२
जंक
कार-बूट-सेल्स में घूम-घूम कर छोटी बड़ी चीज़ें इकट्ठी करने का एक ही तो शौक़ था इन्दिरा का, जिन्हें बहु रीता ‘जंक’ कह कर पुकारती थी। उनके कीमती सामान को गत्ते के बक्सों में भरकर इन्दिरा के शयनकक्ष रखवा देने के पश्चात भी उसे तसल्ली न हुई।
‘इस जंक को फ़िकवा दें तो पिया का बिस्तर यहाँ फ़िट हो जाएगा, मैं कबाड़ियों से बात करती हूँ,’
‘मेरी मित्र डोरोथि चैनेल-वन पर इस जंक का औक्शन करवा देगी,’
‘ये गोरे आपको कुछ नहीं देने वाले,’
‘मैं अब कितने दिन की मेहमान हूँ, जो भी मिलेगा, सब कैंसर-चैरिटि को चला जाए तो अच्छा,’
बाराती, घराती और वह
पच्चीस साल बाद सैम भोपाल लौटा था, ब्यावरा में चाची की भतीजी का विवाह था। बाराती जीम कर उठे तो घराती जीमने बैठे। सैम के दोने में कढ़ी परोसी ही गई थी कि एक चप्पल आकर उसकी पत्तल में गिरी।
‘यार, तेरी ससुराल में कढ़ी में पकोड़ियों की जगह चप्पलें डाली जाती हैं!’
‘चाट ली हो तो हमारी चप्पल तो वापिस कर दे, भाई,’
तभी एक मरगिल्ला सा बच्चा आया और कढ़ी से सनी चप्पल उठाकर चाटने लगा, वह बारातियों की ओर इस आशा से देख रहा था कि वे एक और चप्पल फेंकें तो आज उसका पेट भर जाए।
लघुकथा-३
मनहूस
पार्क-रौयल स्टेशन के बाहर खड़े युवक ने रोज़ की तरह अपने हैट के किनारे को छूकर अनिता का अभिवादन किया। उसके लम्बे-चौड़े शरीर पर बच्चों जैसा मासूम चेहरा कुछ अजीब सा लगता था, कन्धों पर झूलते सुनहरी उलझे हुए बाल और बेतरतीब सुनहरी दाढ़ी।
उस दिन बैंक-हौलिडे थी; अचानक दो लफंगे प्रकट हुए और अनिता का हैंड-बैग खींचने लगे।
‘यू पाकी बिच, गिव अस यौर हैंडबैग…’
‘लीव हर एलोन, युवक ग़ुंडों से भिड़ गया। पल भर में ही ग़ुंडों ने उसे ज़मीन पटक दिया। उसके ‘हेल्प हेल्प’ चिल्लाने पर एक गुंडे ने उसके पेट में चाकू घोंप दिया।
शोर सुन कर सामने की कौर्नर-शौप वाला दौड़ा आया, ‘एडम इज़ मेंटलि-रिटार्डेड, यू नो,’
‘ओह!’ अनीता ने अपनी जैकेट उतार कर एडम पर डाल दी।
एम्बुलेंस आ पहुंची थी; अनिता एम्बुलेंस में एडम के सिरहाने जा बैठी।
लघुकथा-४
स्वामी जी
जैट-एयरवेज़ की फ़्लाइट में मेरे साथ की सीट पर गेरुए वस्त्र और रुद्राक्ष की माला धारण किए हुए एक स्वामी बैठे थे, जिनकी बाँह मेरी बाँह को छू रही थी।
स्वामीजी, कैन वी ईट चिकन?’ पीछे से किसी ने पूछा।
‘लाश हज़म कर सको तो ज़रूर खा लो। मुझे देखते हुए वह फिर मुस्कुराए।
जैसे ही हवाई-जहाज़ में अन्धेरा किया गया, वह ‘एक्सक्यूज़ मी’ कहते हुए उठ खड़े हुए। उनके लौटने के इंतज़ार में मैं टहलने लगी पर वह नहीं लौटे। आगे शौचालय की तरफ़ गयी तो मैंने उन्हें एक फ़र्स्ट-क्लास की सीट पर बैठे देखा; एयर-हौस्टैस उनसे सटी खड़ी थी।
‘स्पैशल व्हिस्की फ़ॉर यू एंड यौर फ़ेवरिट चिकन-प्लैटर, स्वामी,’
लघुकथा-५
नई नवेली विधवा
‘लैला का जनाज़ा है ज़रा शान से निकले,’ सत्तर वर्षीया माइरा ने हैनरी से वादा लिया था कि मृत्योपरांत वह उसका जनाज़ा बड़े धूम-धड़ाम से निकालेगा किन्तु वह खुद ही चल बसा। उसके बचपन के मित्र, बैरी, ने मायरा को उसके नखरों समेत संभाल लिया।
फ्यूनरल के बाद एकाएक बूंदाबूंदी शुरू हो गयी, मातमी कारों की ओर दौड़े।
चालीस वर्षों के विवाहित जीवन में ऐसा कभी नहीं हुआ कि माइरा को बारिश में बिना छतरी के खड़ा रहना पड़ा हो। बैरी छाता लेने दौड़ा। अपना छाता माइरा पर ताने विंस्टन उसे अपनी लैम्बोर्गिनी की तरफ़ ले चला।
पाँच लघुकथा

डॉ. आरती ‘लोकेश’
दुबई, यू.ए.ई.
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आरती लोकेश गोयल
लघुकथा-१
‘विषाण’
“साहब जी! आप महान हो, आपसे बढ़िया कवि इस दुनिया में पैदा ही नहीं हुआ। आप न होते तो साहित्य का क्या होता? यह तो गर्त में समा गया होता।”
फेसबुक पर लिखे इस कमेंट को पढ़कर विक्रम लोट-पोट हो रहा था।
“किसी और की पोस्ट पर पढ़कर हँसी आती है और अपनी पर पढ़कर खुशी मिलती है।” निशांत ने जवाब दिया।
“अरे यार! लोग इतना झूठ कैसे बोल लेते हैं? समझ नहीं आता।” विक्रम ने सोचने वाली मुद्रा बनाई।
“चल छोड़! तेरी पोस्ट पर भी आते हैं ऐसे कमेंट तो।” सहज भाव से निशांत ने कहा। उसे लगा था कि विक्रम खुश ही होगा यह सुनकर।
“तेरा क्या मतलब है? मेरी कविताएँ इनकी तरह घटिया तो नहीं होतीं न! मेरी हर कविता में एक गहरी बात होती है। इन लोगों की तरह का सतही लेखन मैं नहीं करता।” विक्रम की आवाज़ में तल्खी पैदा हो गई थी।
“अरे! मैं यही तो कह रहा हूँ कि बिना पढ़े ही लोग कमेंट कर देते हैं। अब झूठे-सच्चे की पहचान थोड़े ही कोई कर सकता है। सब के सब पुच्छ-विषाण हीन हैं।” निशांत ने बात सँभाली।
“अगर भगवान मेरी बात मानें, तो इन सब झूठे लोगों के सींग उग आएँ।” विक्रम हँसा।
“हाँ! तब ठीक रहेगा। और चापलूसों के पूँछ भी।” निशांत ने सुर में सुर मिलाया।
“हाथी वाले दिखावे के दाँत भी…” विक्रम ने आगे बढ़ाया।
“अरे-अरे! बस भी कर। मेरे मुँह में बत्तीस दाँत हैं। कहते हैं कि बत्तीस दाँत वाले की जिह्वा पर एक बार सरस्वती विराजती है। तब कही हुई बात सच हो जाती है। कहीं ये भी…”
“अरे धत! ऐसा भी होता है कहीं। यदि हो भी जाए तो बहुत ही भला हो समाज का।” विक्रम ने खुशी जताई।
तभी घंटी बजी तो निशांत उठकर दरवाजा खोलने चला गया। जब वह वापस आया तो उसके हाथ में एक शीशा था।
“यह शीशा किसी ने उपहार में … …” वह बोलते-बोलते चौंका। उसका चेहरा सफेद पड़ गया।
“अरे! यह क्या हुआ? विक्रम! … तुम्हारे सिर पर यह सींग कैसे? इतने बड़े और भयावह…?
और… और… और यह पूँ…ऊ…छ?” वह डर से चीख पड़ा।
निशांत के काँपते हाथों से शीशा धरती पर गिर पड़ा। उसके सैंकड़ों टुकड़े ज़मीन पर बिखर गए। निशांत को उसमें अपना अक्स दिखाई दे रहा था- छोटे-छोटे सींगों और दो नए दाँतों के साथ।
लघुकथा-२
‘अग्निपरीक्षा’
मालिक यमदानी इलैक्ट्रिशियन विजय के साथ बातें करते, खिलखिलाते हुए फ़ैक्ट्री में दाखिल हुए।
“ललित! आज सभी वर्करों को छुट्टी दे दो।” मालिक यमदानी ने आते ही कहा।
“मालिक! अभी तो वर्कर उस बिगड़े कंसाइनमेंट को सुधार रहे हैं। उन्हें छुट्टी कैसे दी जा सकती है इस कठिन समय में?” ललित चौंका।
“अच्छा! …चलो, ओवर्टाइम रोक दो। कैम्प भेज दो सबको। शाम के बाद कोई न रुके फ़ैक्ट्री में। …यह अग्निपरीक्षा का समय है।” यमदानी ने मुस्कुराते हुए कहा।
“केवल आज का ओवरटाइम कैंसिल करता हूँ… घरेरीराम को छोड़कर…, उसके कैंम्प में बरसात का पानी भरा है।” ललित की बात पूरी होने से पहले ही यमदानी अपने केबिन में दाखिल हो चुके थे।
ललित को आश्चर्य हुआ। उसे आज का यह बर्ताव कुछ अटपटा लगा। एक मामूली से इलैक्ट्रिशियन से इतनी घनिष्टता उसने पहले कभी न देखी थी। इतनी हँसी-ठिठोली? वह कोई उनका मुँहलगा भी न था।
उसने कामगारों को खबर सुना दी। कुछ खुश हुए और कुछ उदास। पाँच बजे सभी अपने-अपने कैम्प में चले गए। मालिक यमदानी भी फ़ैक्ट्री से चार बजे ही निकल गए थे। घरेरीराम निर्लिप्त भाव वहीं अपनी चादर बिछाकर लेट गया था। ललित भी सब निर्देश पालन कर घर आ गया।
आज मालिक के अजीब से व्यवहार से कुछ दिन पहले हुआ वार्तालाप उसके मन-मस्तिष्क में दोहराया जाने लगा।
“तुमसे एक काम तो ढंग का होता नहीं। फ़ैक्ट्री घाटे में जा रही है।” मालिक ने ललित को झिड़का था।
“मालिक! मैं पूरी कोशिश कर रहा हूँ। स्टोर में थान में से कपड़ों के टुकड़े बचे हुए हैं, उन्हें बेचने में जी-जान से लगा हुआ हूँ ताकि वेस्टेज के भी कुछ पैसे बन जाएँ।” उसने सफ़ाई दी।
“उससे क्या खाक मिलेगा? घाटे की भरपाई की जुगत लगाओ।”
“जो कंसाइन्मेंट वापस आ गया है, उसमें भी पार्टी की माँगों के अनुसार सुधार करवा रहा हूँ। भगवान ने चाहा तो उसके पैसे आ जाएँगे।”
“ओवरटाइम लगा दो…। जो भी कारीगर छुट्टी लेकर घर जा रहा हो, कैंसिल कर दो। अब की बार कोई कमी न रहे। इस कबाड़ से भी मुनाफ़ा होना चाहिए।”
“जी मालिक! यह समय ही कुछ ऐसा है। लगता है अग्निपरीक्षा का समय चल रहा है। यह कन्साइनमेंट भी अप्रूव हो जाए तो नफ़ा-नुकसान बराबर हो जाए।”
“अग्निपरीक्षा! …हाँ! यही है शायद…!”
शाम सात बजे ललित को खबर मिली कि फ़ैक्ट्री में आग लग गई है। वह भागा-भागा फ़ैक्ट्री पहुँचा दमकल की गाड़ियाँ आग पर काबू पाने की कोशिश कर रही थीं। उसकी चीख निकल गई। उसने मालिक को फ़ोन मिलाया।
“मालिक! फ़ैक्ट्री में… आग…! … स्टोर भी… पुराने कंसाइनमैंट के डिब्बे…!” रोते-रोते वह ठीक से बता भी न पा रहा था।
“ओह! … शुक्र है कि ज़्यादा नुकसान नहीं हुआ।” बात काटकर यमदानी बोले।
“मालिक! घरेर…ई…ई..ई…!”
“तुम बीमा कंपनी को फ़ोन लगाओ। बताना कि बहुत नुकसान हुआ है। उन्हें करार के मुताबिक सौ करोड़ की भरपाई करनी है। स्टोर में रखा सारा सामान जल गया। बहुत बड़े-बड़े कंसाइनमैंट जलकर खाक हुए हैं। बाकी छोड़ो, …बस, लग जाओ उनके पीछे।”
लघुकथा-३
पराई थाली का भात
गौरव के नए ऑफ़िस के मुहुर्त में उसके बचपन का दोस्त रवीश पहुँचा। ऑटो से उतरते ही गौरव को सामने पाकर रवीश ठिठक गया। कौतुहल से वातावरण की जगमग देखने लगा। रवीश को भली-भाँति याद था कि अभी पिछले वर्ष ही तो गौरव ने अपने कारखाने की चौथी शाखा का शिलान्यास किया था। आज साल भर में ही पाँचवी शाखा का उद्घाटन भी हो गया। मन विश्लेषण करने लगा, ‘सालभर बाद देखा है गौरव को। आर्थिक प्रगति चेहरे की चमक और वज़न वृद्धि में अपना प्रमाण दे रही है।’ रवीश ने अपने मरियल से शरीर पर नज़र दौड़ाई। एक गौरव का अपना व्यवसाय जहाँ उन्नति ही उन्नति है और एक उसकी सरकारी नौकरी; कोई तरक्की नहीं, बस खटते जाना बारहों महीने, तीसों दिन…। तब महीने के अंत में कुछ रकम हाथ आती है कट-कटाकर। एक विस्तृत सी उसाँस मानो कह रही थी, ‘काश! मेरे माता-पिता ने मुझे कोई बिज़नस कराया होता।’
रवीश के ऑटो से उतरते ही गौरव ने दौड़कर उसे गले लगा लिया और स्वागत-सत्कार कर भोजन-कक्ष में भेज दिया। गौरव अपने प्रिय मित्र के आ जाने पर दिल से आभारी था। मन ही मन सोचने लगा कि रवीश के विवाह की दसवीं सालगिरह पर भी वह न जा पाया था। उस दिन उसे कस्टम ऑफ़िस से कुछ ज़रूरी माल छुड़ाने के लिए स्वयं जाना पड़ गया था। विचार आया, ‘रवीश कितना भाग्यशाली है कि छुट्टी लेकर कहीं आ-जा सकता है। एक बार सरकारी नौकरी मिल गई तो सारी ज़िंदगी की जद्दोजहद खत्म। 9 से 5 की बँधी हुई नौकरी, परिवार के साथ समय बिताना, अपनी सेहत के लिए कसरत करने का भी खुला समय। सेवानिवृत्त होने के बाद भी पेंशन के साथ इलाजादि का जिम्मा सरकार का। यहाँ तो बुढ़ापे के लिए जोड़ने को भी दिन-रात एक करना पड़ता है। तनाव और चिंता रात-रात भर जगाए रखते हैं। काश! मैंने तब ज़्यादा मेहनत कर ली होती और सरकारी नौकरी के इम्तिहान में पास हो गया होता।’
तभी बेयरे ने रवीश की थाली में भात डाल दिया।
लघुकथा-४
जलती ट्रेन
“जलाएँगे! जलाएँगे!”
“इस ट्रेन को फूँक डालेंगे।”
“हमारी माँगें पूरी करो।”
भीड़ के साथ-साथ नारे लगाता और क्रोध में उफ़नता हुआ समीर ट्रेन की बोगी पर मिट्टी का तेल छिड़कने लगा। पटरियों के बीच धरने पर बैठे अराजक लोगों ने डरी-सहमी ट्रेन को आधा किलोमीटर दूर ही थमने को विवश कर दिया था। इतने में भी उग्र प्रदर्शनकारियों को शांति न मिली तो उन्होंने जलती मशालें लेकर ट्रेन के डिब्बों पर धावा बोल दिया।
ट्रेन में बैठी युवा सवारियों ने कूदकर भागने की कोशिश की तो वे भीड़ के पैरों तले रौंद दिए गए। उन्हें कुचलते हुए बेकाबू उपद्रवी पैट्रोल, डीज़ल, जलते कोयले, जो मिला उससे ट्रेन का अस्तित्व मिटाने में अंधाधुंध जुटे रहे।
कितने ही बुज़ुर्गों ने, जो भागने की ताकत न रखते थे, ट्रेन में बैठे रहकर जान देना स्वीकार किया। कुचले जाने से बेहतर जलकर मरना था। ट्रेन धूँ-धूँ कर जल उठी और देखते ही देखते मौत तांडव करने लगी।
प्रदर्शनकारियों के हौंसले बुलंद हुए और वे बेसब्री से अगली ट्रेन की प्रतीक्षा करने लगे। अपना विरोध जताकर समीर को भी कलेजे में ठंडक जान पड़ी। तभी उसका फ़ोन बजा।
“समीर! मॉम-डैड पहुँचने वाले ही होंगे। उनके सकुशल पहुँचते ही खबर देना।” बहन सीमा का स्वर शोर को चीरता हुआ कानों में किसी तरह पहुँचा।
“अरे! वे कैसे आ रहे हैं? मुझे तो उनके आने की कोई खबर नहीं?” समीर के माथे पर बल उभर आए।
“प्रयागराज की ट्रेन से…” समीर के कान सुन्न हो गए। उसका शरीर नीला पड़ गया जैसे नसों में ज़हर भर गया हो।
सीमा आगे बोली, “वे लखनऊ से दो दिन पहले प्रयागराज गए थे एक समारोह में शामिल होने। तो वहीं से सीधा तुम्हारे पास आ रहे हैं तुम्हें सरप्राइज़ देने!”
समीर ने राख का ढेर बनी ट्रेन की ओर देखा और बदहवास बिखरी लाशों को।
“और पैट्रोल लाओ, डीज़ल लाओ; ट्रेन आने वाली है।” का शोर वातावरण में गूँज रहा था।
लघुकथा-५
‘विद्या हँस दी’
“विद्या! तुम जानती हो, प्रधानाचार्य शुक्ला जी हिंदी दिवस के लिए अंग्रेज़ी प्रोफ़ेसर से अंग्रेज़ी में अपना भाषण लिखवा रहे हैं?” एक प्राध्यापक ने सूचना दी।
वह हँस दी।
“तुम हिंदी की प्राध्यापक हो। तुमसे नहीं लिखवाया?” वे फिर बोले।
वह हँस दी और आगे चल दी।
“विद्या! तुम लेखिका हो। तुम बताओ हिंदी को सब कठिन क्यों कहते हैं?” विश्राम-कक्ष में एक प्राध्यापिका ने पूछा।
वह हँस दी।
“दैट्स वाय ईवन हिंदी बेल्ट पीपल स्पीक इन इंग्लिश। राइट विद्या?” विज्ञान प्राध्यापक गुणाकर शिंदे बोले।
वह मुस्करा दी।
छात्र यशवर्धन नायर ने प्रवेश की आज्ञा माँगी। विद्या ने उसे अंदर आने की आज्ञा दे दी।
“धन्यवाद अध्यापिका जी! आपके सहयोग से हिंदी भाषण प्रतियोगिता में मैं प्रथम आया हूँ।” वह विद्या के पास आकर बोला।
वह मुस्करा दी। छात्र ने उसके पैर छूए। उसने उसके सिर पर हाथ रखा। वह चला गया तो वह प्रश्न-पत्र जाँचने लगी।
“विद्या! इस छात्रा ने परीक्षा की वर्तनी गलत लिखी है, तुमने इसके अंक नहीं काटे?”
वह मुस्करा दी।
वह कक्षा लेने जा रही थी कि रास्ते में छात्रा अवन्ति शर्मा मिली।
“मैम! मैं हिंदी नाटक में पार्ट नहीं लूँगी। मेन करेक्टर का रोल आप किसी और को दे दीजिए। मेरा सलेक्शन इंग्लिश सॉन्ग के कोरस में हो गया है।” छात्रा बोली।
वह चुप रही।
अवंति शर्मा के जाते ही शालिनी चक्रवर्ती दौड़ी हुई विद्या के पास आई।
“शिक्षिका जी! क्या हम वह पात्र ले सकता हूँ? हम अच्छा अभिनय करती हूँ। मैं मेरा सब संवाद भी याद कर लेगी। आप पार्श्व स्वर नहीं देना होगा।”
वह चुप रही। स्नेह से मुस्कराकर शालिनी के कंधे पर हाथ रखा।
“विद्या मैम! तुमने उसकी गलत हिंदी पर टोका क्यों नहीं? सुधरेगी कैसे?” पास आते ही प्रधानाचार्य की निजी सचिव विभा तिवारी ने कहा।
वह चुप रही।
“सर को हिंदी में एक छोटा-सा भाषण लिख दो। केवल 2 मिनट का। कुछ कोट्स भी डाल देना। ध्यान रहे, ज़्यादा मुश्किल शब्द न हों।” विभा बोली।
वह चुप रही।
“और हाँ, रोमन स्क्रिप्ट में ही लिखना प्लीज़!” चलते-चलते विभा पीछे मुड़कर बोली।
विद्या खिलखिलाकर हँस दी।
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