दस लघुकथा

मर्द

चित्रा मुद्गल

” आधी रात में उठकर कहां गई थी?”

शराब में धुत पति बगल में आकर लेटी पत्नी पर गुर्राया।

” आंखों को कोहनी से ढांकते हुए पत्नी ने जवाब दिया ” पेशाब करने!”

” एतना देर कइसे लगा?”

” पानी पी-पीकर पेट भरेंगे तो पानी निकलने में टेम नहीं लगेगा ? ”

” हरामिन, झूठ बोलती है? सीधे-सीधे भकुर दे, किसके पास गयी थी ?”

पत्नी ने सफाई दी-” कऊन के पास जाएँगे मौज-मस्ती करने!

माटी गारा ढोती देह पर कऊन पिरान छिनकेगा ?”

” कुतिया…”

” गरियाव जिन, जब एतना मालुम है किसी के पास जाते हैं

तो खुद ही जाके काहे नहीं ढूंढ लेते ? ”

” बेसरम, बेहया…जबान लड़ाती है !

आखिरी बार पूछ रहे हैं-बता किसके पास गयी थी?

” पत्नी तनतनाती उठ बैठी- ” तो लो सुन लो, गए थे किसी के पास। जाते रहते हैं।

दारू चढ़ाके तो तू किसी काबिल रहता नहीं… ”

” चुप्प हरामिन, मुंह झौंस दूंगा, जो मुंह से आंय-बांय बकी।

दारू पी के मरद-मरद नहीं रहता ?”

” नहीं रहता… ”

” तो ले देख, दारू पी के मरद-मरद रहता है या नहीं?”

मरद ने बगल में पड़ा लोटा उठाया और औरत की खोपड़ी पर दे मारा।…

मोबाइल
एच. आर. हरनोट
उसके छोटे-छोटे पांव थे। देख कर नहीं लगता था कि किसी बच्चे के होंगे। लम्बे, बेतरतीब बढ़े हुए नाखूनों से ढके उंगलियों के छोर। चमड़ी ऐसी मानो किसी नाली में कीचड़ के बीच महीनों से पड़ा पुराने जूते का चमड़ा हो। नंगे पांव जैसे ही ज़मीन पर पड़ते, बिवाईयां उघड़ने लगतीं। दर्द की टीस उठती पर भीतर ही भीतर कहीं दब कर रह जाती। उनसे खून रिसता रहता। लोगों की नजरें उन पर कम, बच्ची की अधनंगी टांगों पर ज्यादा फिसलती रहती। इससे पहले कि आखें कुछ टटोलती हुई मैली-फटी फ्राक के बीच जाए, वह झटपट कटोरा उनके मुंह के आगे कर देती,

“दे दो बाबू दे दो, भगवान के नाम से दे दो। भला होगा।”

वह कुछ पल उनके हाव भाव परखती। तिलों में तेल न देख कर आगे चल देती। वही सब दोहराते गिड़गिड़ाते। किसी ने कभी एक दो रुपए का सिक्का कटोरे में फेंक दिया तो टन्न की आवाज से उसके चेहरे पर धूप की चमक छा जाती। पथराई और उनींदी सी आंखे सहज ही भोर होने लगती। यह सिलसिला सूर्य से सूर्य तक चलता रहता। दिन भर सिक्के समेटने के चाव में उसकी भूख प्यास उसी तरह गायब रहती जैसे उसकी देह से बचपना।

उसके हाथ का कटोरा खाली नहीं रहता। उसमें दिन-बार के हिसाब से भगवान जी बैठे रहते। सोमवार को भगवान शिवजी की मैली फटी फोटो और उसके आगे धूप की जलती हुई बत्ती। इस रोज शिव सेना के कार्यकर्ता और सोमवार के व्रती लोग खूब सिक्के डाल कर पुण्य कमा लेते। शिव मन्दिर के आगे उसने कई बार बैठने का प्रयास भी किया, लेकिन उधर पहले से अड्डा जमाए सीनियर भिखारी उसे भगा देते। उस वक्त अपने छोटे होने का मलाल उसे अवश्य होता।

मंगल को भगवान जी बदल जाते। शिवजी की जगह हनुमान जी ले लेते। कटोरे के ओर-छोर सिंदूर पुता रहता। हनुमान मन्दिर के रास्ते एक जगह डेरा जमा देती। लेकिन पूरे दिन मुश्किल से दस-बारह सिक्के भी नसीब न होते। लेकिन कटोरा प्रसाद से अवश्य भर जाया करता। कभी भाग्य में वह भी न होता। मांगते-मांगते दिन भर की थकान से अनायास जब भी उसकी आंख लगती तो हनुमान भक्त शरारती बन्दर कटोरा छीन लेते। आधा उनके पेट में तो आधा नीचे बिखर जाता। उसकी आँख जगती तो उन्हें भगाने-डराने की बहुत कोशिश करती पर बन्दरों पर कोई असर न होता। उल्टा जैसे उसकी खिल्ली उड़ा रहे हो। देवदार के पेड़ पर चढ़ते हुए कटोरा फैंक देते। परसाद के बीच रखे सिक्के जगह-जगह बिखर जाते। नालियों में। छलानों पर उगी हरी घास के बीच। वह मन में रोती-बिलखती उन्हें तलाशती रहती। अच्छी-खासी मशक्कत करनी पड़ती। उसके बैठने की जगह के आसपास सिंदूर पुता रहता। बाहर से आए पर्यटकों के लिए यह जगह भी श्रद्धेय हो गई थी। कई बार तो बच्ची जब वहाँ नहीं होती तो दो-चार सिक्के उधर फैंके रहते।

बुध और वीरवार को बच्ची का कटोरा खाली होता। उस दिन पता नहीं क्यों कोई भगवान उसमें नहीं होते। वह जगह-जगह भटकती रहती। जैसे ही कोई विदेशी पर्यटक दिखता, दौड़ती उनके पास पहुंचती। मुंह से कुछ न कहती। जानती होगी कि ‘ दे दो बाबू’ से यहां काम चलने वाला नहीं। अंग्रेजी तो वह नहीं जानती। जिस अंग्रेज का पीछा पकड़ती उससे लेकर ही कुछ हटती। दिन भर यदि चार छः अंग्रेज मिल भी गए तो और दिनों की बनिस्बत कटोरे में अधिक धन इकट्ठा हो जाता। शाम ढलते ही वह खिलखिलाती अपनी झोंपड़ी की ओर भागती। झोंपड़ी सड़क के नीचे एक पैरापिट के नीचे बनी थी। उतरते-उतरते उसका वास्ता कभी बकरी, कभी कुत्ते और कभी बच्चों से पड़ जाता। पर वह अपने में मस्त उन्हें प्यारती-दुलारती चली जाती—क्षणों में जैसे उसका बचपना लौट आया करता। उसके अम्मा-बापू भी इस कमाई से बहुत खुश हो जाते। एवज में उस दिन उसे खूब खाना मिल जाता ।

शुक्रवार को संतोषी माता की तस्बीर कटोरे की मालिक हो जाती। कंवारी लड़कियों का पीछा बच्ची तब तक नहीं छोड़ती, जब तक वह एक-आध रुपया न ले ले। शनिवार को कटोरा शनिदेव जी का हो जाता। सरसों के तेल से भरे कटोरे में एक पुराने टीन के जंग लगे टुकड़े का भगवान डोलता रहता। बच्ची को इस दिन बहुत भाग-दौड़ करनी पड़ती। असली पंडों से बचती-बचाती वह कई बार गिर भी पड़ती।

इतवार को बच्ची नहीं दिखती थी। शायद अवकाश पर रहती होगी।

आज जब वह काम पर निकली तो सड़क में पहुंचते ही उसका सामना एक चुनाव पार्टी से हो गया था। उसे यह पता नहीं था कि चुनाव का मौसम आ गया है। और दिनों की बनिस्बत हर जगह चहल-पहल हो गई थी। पार्टी ने उसे घेर लिया और कटोरे में पहले से विराजमान भगवान जी की जगह उन्हें देवी नुमा मुकुट पहने किसी महिला की तस्वीर सजा दी। पल भर में उसका कटोरा सिक्कों से भर गया। नए भगवान से बच्ची खूब प्रसन्न हो गई। उससे पहले कभी भी उसने उस तस्बीर को नहीं देखा था।

लेकिन दूसरे दिन उसका सामना एक दूसरी पार्टी से हो गया। उन्होंने बच्ची को खूब गालियां दीं। उसका कटोरा नीचे फेंक दिया। कटोरे में विराजमान तस्वीर को अपने पैरों तले रौंद दिया। जो कुछ सिक्के उसमें थे उन्हें भी गिरा दिया। लेकिन एक नेता ने अपने साथियों को तत्काल समझा बुझा कर शांत कर दिया। वह बच्ची के पास गया और उसे प्यार से दुलारा। खूब स्नेह जताया। फिर अपने झोले से एक भगवे रंग में रंगा कटोरा निकाला और उसके हाथ में पकड़ा दिया। फिर एक फोटो उसमें रख दी। कहा कि यह भगवान राम की है। बच्ची एकटक देखती रही। उसके लिए भगवान राम नए रूप में थे। रथ पर बैठे, पगड़ी बांधे, हाथ में धनुष पकड़े हुए हल्की छोटी मूछों वाले भगवान। उनके गले में लाल-हरे रंग का पट्टा था। जैसे ही फोटो कटोरे में सजी, सिक्कों की बरसात होने लगी। कई बार कटोरा भर जाता तो वह भाग कर मां को दे आती और फिर निकल जाती। स्टिकरनुमा धनुरधारी भगवान उसे दूसरे भगवानों से ज्यादा पावरफुल लगे थे।

अगले दिन जब इसी भगवान को कटोरे में सजा कर वह सड़क पर पहुंची तो अचानक उसका सामना पहले वाली पार्टी से हो गया। कार्यकर्ता उसके कटोरे में धनुषधारी भगवान को देख कर आग बबूले हो गए। एक-दो कार्यकर्ता जैसे ही उसकी तरफ बढ़े, दूसरी पार्टी अचानक धमक गई। फिर क्या था सभी एक दूसरे पर टूट पड़े। बच्ची जान बचा कर भाग निकली। उसकी समझ में कुछ नहीं आ रहा था।

उस दिन हर जगह शहर में दंगे हुए थे। बच्ची के मां-बाप ने उसे कई दिनों बाहर नहीं भेजा। लेकिन न कमाने का मलाल उन दोनों के चेहरों पर बना रहा।

चुनाव का मौसम शान्त हुआ तो एक दिन जैसे ही बच्ची अपने काम पर निकली, एक नई पार्टी से उसका सामना हो गया। उस पार्टी ने उसे प्यार से अपने पास बिठाया। घर का अता-पता पूछा और उसे वापिस घर ले आए। उसके मां-बाप घर पर ही थे। उन्होंने बच्ची का सौदा अपने मोबाइल के विज्ञापन के लिए तय कर दिया। मां-बाप को एक बार ही इतने पैसे मिल गए जितने बच्ची ने आज तक की मेहनत से भी न कमाए थे। इस पर हर महीने पांच हजार और। उन्हें क्या चाहिए था।

अब बच्ची के हाथ में न कोई कटोरा होता और न कोई भगवान। न मैली फ्राक से उसका बदन ही ढका रहता। वह बिल्कुल नंगी होती। उसके नंगे बदन पर कंपनी के नाम और मोबाइल फोन के स्टिकर चिपके रहते। वह दिन भर कम्पनी के बताए रास्तों पर चलती रहती। शाम होती तो कम्पनी वाले उसके बदन से अपने विज्ञापन उतार देते और वही पुरानी फ्राक पहनाकर उसे घर भेज देते।

उस मोबाइल कम्पनी ने पहाड़ों के दूर-दराज इलाकों तक पहुंचने की जद्दोजहद में अब भोले-भाले लोगों और उनके बच्चों का पुरजोर इस्तेमाल करना शुरु कर दिया था। लेकिन लोगों के पास यह सोचने का समय ही नहीं था कि यह घुसपैठ बाजार को उनकी बहु-बेटियों के कमरों तक ले जा रही है।

किराए का मकान

नीरज नैथानी

जिन्दगी भर किराए के मकान में बसर करने वाले
तथा किराये के मकान के छोटे, तंगहाल व असुविधाग्रस्त कमरों से

त्रस्त रहे मेरे मित्र के अपने निजी भवन का निर्माण कार्य चल रहा था।

संयोग से मित्र के साथ उसके निर्माणाधीन मकान को देखने जाने का

अवसर मिला। इस समय, मकान के अन्तिम चरण का कार्य प्रगति पर था।

मित्र ने एक बड़े आकार के कक्ष में प्रवेश करते हुए गर्व से बताया ,

यह ड्राइंग रूम है, उसके बाद साथ के लगे कमरे में ले जाकर बोला

यह बेडरूम रहा, बेडरूम के बाहर खुली बड़ी सी लौबी, उसके बगल में

बड़ा किचन, सामने पूजाघर, उसके साथ में स्टोर व स्टडीरूम

फिर बाहर निकलने के लिये दरवाजा तथा बाहर आकर समीप में

बन रही छोटी सी अन्धेरी कोठरी एवं उससे जुड़ी एक और बहुत ही

तंग कोठरीनुमा संरचना। मैने पूछा ये दो स्टोर, उसने छूटते ही उत्तर दिया,

स्टोर नहीं यार, ये तो किराये पर देने के लिए एक रूम सेट है।

सहनशीलता

तीसरे दिन भी जब वही ग्राहक चप्पल खरीदने आया तो हैरत भरी नजरों से से देखते हुए दुकानदार ने कहा-

‘ लगातार दो दिनों से आप मेरे यहां से नई चप्पल खरीदकर ले जा रहे हैं। क्या आपको नई-नई चप्पलें पहनने का शौक है। ‘

सहज भाव से ग्राहक ने उत्तर दिया- ‘ नहीं ऐसा नहीं है। मैं हर रोज मन्दिर जाता हूँ र भगवान के दर्शन कर जब लौटता हूं तो अपनी चप्पल को गायब पाता हूं। ‘

दुकानदार ने उसे मशवरा दिया- ‘ यदि आपकी कोई चप्पल चुरा ले जाता है तो आप भी किसी दूसरे की चप्पल पहन सकते थे।‘

‘ नहीं भाई मैं ऐसा नहीं कर सकता।‘

‘क्यों नहीं कर सकते? गजब की सहनशक्ति है आप में। ‘

अपने जूते उतार पाँवों के के तलवे में पड़े छालों की तरफ सारा करते हुए ग्राहक ने कहा- ‘ यदि मैं किसी की चप्पल पहन कर चला आता तो मेरी तरह ही उसे भी कष्ट भोगना पड़ता। रही सहनशीलता की बात तो प्रभु भक्ति और उसकी अनुकम्पा से ही मेरे भीतर उसका उदय हुआ है। ‘

ग्राहक के इस उत्तर को सुन ग्राहक ने फिर कोई सवाल नहीं किया। प्रसन्न हो वह ग्राहक को चप्पलें पहनाने लगा।

प्रताप सिंह सोढ़ी

निरुत्तर
बेटे को ब्रेकफास्ट देकर नीरू उसके लिए दूघ लेने चली गई। बेटे ने जब ब्रेड खाने के लिए उठाई तो वह नीचे गिर गई। बेटा उसे यूँ ही उठाने लगा तो नीरू ने देख लिया।

“ बेटा, इसे रहने दो। “

“ क्यों मां? “

“ यह खराब हो गई है। “

“ कैसे? “

“ इसे मिट्टी लग गई है। मिट्टी में बहुत सारे हानिकारक कीटाणु होते हैं जो इन्सान को बीमार कर देते हैं। “

नीरू उस ब्रेड को एक तरफ रखकर दूसरी लेने के लिए चला गई। इतने में रिक्शावाला बेटे को लेने आ गया। नीरू ने बेटे को नई ब्रेड दी और जमीन पर गिरी ब्रैड रिक्शा वाले को खाने के लिए दे दी। बेटा तुरंत बोल उठा- “ भैया, यह ब्रेड मत खाना।“

“क्यो? “

“ तुम बीमार हो जाओगे। “

“ कैसे? “

“ इस पर मिट्टी लगी हुई है। मिट्टी वाली चीज खाने से आदमी बीमार हो जाता है। क्यों मां, ठीक है न ? “

मां चुप थीं, उसे कोई उत्तर नहीं सूझ रहा था।

प्रेम विज

एजेण्डा

“आप इस देश की नींव हैं। नींव मज़बूत होगी तो भवन मज़बूत होगा । भवन की कई कई मंजिलें मज़बूती से टिकी रहेंगी,” पहले अफ़सर ने रूमाल फेरकर जबड़ों से निकला थूक पोंछा। सबने अपने कंधों की तरफ़ गर्व से देखा, कई कई मंज़िलों के बोझ से दबे कंधों की तरफ़ ।

अब दूसरा अफ़सर खड़ा हुआ, “आप हमारे समाज की रीढ़ है। रीढ़ मज़बूत नहीं होगी तो समाज धराशायी हो जाएगा।” सबने तुरंत अपनी अपनी रीढ़ टटोली। रीढ़ नदारद थी। गर्व से उनके चेहरे तन गए– समाज की सेवा करते करते उनकी रीढ़ की हड्डी ही घिस गईं। स्टेज पर बैठे अफ़सरों की तरफ़ ध्यान गया … सब झुककर बैठे हुए थे। लगता है उनकी भी रीढ़ घिस गई है।

“उपस्थित बुद्धिजीवी वर्ग”- तीसरे बड़े अफ़सर ने कुछ सोचते हुए कहा, “हाँ, तो मैं क्या कह रहा था ,” उसने कनपटी पर हाथ फेरा, , “आप समाज के पीड़ित वर्ग पर विशेष ध्यान दीजिए।”

पंडाल में सन्नाटा छा गया। बुद्धिजीवी वर्ग ! यह कौन सा वर्ग है ? सब सोच में पड़ गए। दिमाग़ पर ज़ोर दिया। कुछ याद नहीं आया। सिर हवा भरे गुब्बारे जैसा लगा। इसमें तो कुछ भी नहीं बचा। उन्होंने गर्व से एक दूसरे की ओर देखा। ¬समाज-हित में योजनाएँ बनाते बनाते सारी बुद्धि खर्च हो भी गई तो क्या।

अफ़सर बारी बारी से कुछ न कुछ बोलते जा रहे थे। लगता था, ¬सब लोग बड़े ध्यान से सुन रहे हैं। घंटों बैठे रहने पर भी न किसी को प्यास लगी, न चाय की ज़रूरत महसूस हुई, न किसी प्रकार की हाज़त।

बैठक ख़त्म हो गई। सब एक दूसरे से पूछ रहे थे, ¬”आज की बैठक का एजेंडा क्या था? ”

भोजन का समय हो गया। साहब ने पंडाल की तरफ़ उँगली से चारों दिशाओं में इशारा किया। चार लोग उठकर पास आ गए। फिर हाथ से इशारा किया, पाँचवाँ दौड़ता हुआ पास में आया, “¬सर!”

“इस भीड़ को भोजन के लिए हाल में हाँक कर लेते जाओ। इधर कोई न आ पाए।” साहब ने तनकर खड़ा होने की व्यर्थ कोशिश की।

पाँचवाँ भीड़ को लेकर हाल की तरफ़ चला गया।

“तुम लोग हमारे साथ चलो।” साहब ने आदेश दिया।

चारों लोग अफ़सरों के पीछे पीछे सुसज्जित हाल में चले गए।

चारों का ध्यान सैंटर वाले सोफे की तरफ़ गया। वहाँ चीफ़ साहब बैठे साफ्ट-ड्रिंक पी रहे थे। साहब ने चीफ़ साहब से उनका परिचय कराया, ” ये बहुत काम के आदमी हैं। बाढ़, सूखा, भूकंप आदि जब भी कोई त्रासदी आती है; ये बहुत काम आते हैं।”

चीफ़ साहब के चेहरे पर कोई भाव नहीं आया।

“चलिए भोजन कर लीजिए।” उन्होंने चीफ़ साहब से कहा, “हर प्रकार के नानवेज का इंतज़ाम है।”

“नानसेंस!”¬ चीफ़ साहब गुर्राए, “मैं परहेज़ी खाना लेता हूँ। किसी ने बताया नहीं आपको ?”

” सारी सर” -छोटा अफ़सर मिनमिनाया¬, “उसका भी इंतज़ाम है, सर! आप सामने वाले रूम में चलिए।”

वहाँ पहुँचकर चारों को साहब ने इशारे से बुलाया। धीरे से बोले, “निकालो।”

धीरे से चारों ने बड़े नोटों की एक-एक गड्डी साहब को दे दी। साहब ने एक गड्डी अपनी जेब में रख ली तथा बाकी तीनों चीफ़ साहब की जेबों में धकेल दीं।

चीफ़ साहब इस सबसे निर्विकार साफ्ट-ड्रिंक की चुस्कियाँ लेते रहे, फिर बोले, “जाने से पहले इन्हें अगली बैठक के एजेंडे के बारे में बता दीजिएगा।”

-रामेश्वर काम्बोज ’हिमांशु’
-37-बी/2, रोहिणी, सैक्टर-17, नई दिल्ली-110089

नंगा
-संजीव शर्मा

उस युवती ने सिगरेट का आखिरी लम्बा कश लिया और सिगरेट के टुकड़े को ऐश ट्रे में रगड़ दिया। काउच पर सीधी हो कर लेट गयी और जब आदमी ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी तो तराशी हुई मुस्कान के साथ बोली, ‘‘सर, गो अ हेड! टाइम इज मनी फॉर मी?’’

वह आदमी कुछ असमंजस की स्थिति में था। चालीस-बयालीस के आस-पास की आयु, कलर किए गए बाल जिनके बीच से खोपड़ी झांकने लगी थी, हल्की-सी तोंद और आंखों में पल-पल बदलते भाव। वो उस वर्ग का प्रतिनिधित्व करता है जो हर सुबह पांच मिनट नाक से हवा निकाल कर अपनी सेहत की देखभाल करता है, नहाने के बाद जोर-जोर से कुछ रट कर लोक-परलोक सुधार लेता है, कुत्ते को रोटी डालकर और सूरज की ओर मुंह करके छत के कोने में जल की कुछ बूंदे टपका कर पर्यावरण के प्रति अपनी जिम्मेदारी से निवृत हो लेता है और हर बुराई के लिए दूसरे को जिम्मेदार ठहरा कर अपनी आत्मा को पवित्र कर लेता है।

दिन भर घर-गृहस्थी में खटती पत्नी के आधे-अधूरे, अधजगे, कई बार पसीने से गंधाते, समय से पहले ढीले पड़ गए शरीर के अलावा स्त्री देह से उसका परिचय सिर्फ परदे की ओट से कामवाली को ताकने या सड़क पर आती-जाती महिलाओं/लड़कियों को इस अंदाज से घूरने कि मैं तो कहीं और देख रहा था, तक ही सीमित था। इस तरह एक एक्जीक्यूटिव सूइट में एक यूक्रेनियाई कॉल गर्ल के साथ रहना उसके ख्वाबो में भी नहीं था।

लेकिन किस्मत से विश्व बैंक और सरकार से पैसे का ऐसा अकूत प्रवाह आया कि पूरे शहर को खोद कर पाइप लाइन बिछाने का कार्य चालू करने का आदेश पारित हो गया। इस शहर में एक रिवाज है, दशक में एक बार पूरे शहर में पाइप लाइनें डाली जाती हैं। सूखी, चटकती पाइप लाइनों को जमीन के अंदर दफना दिया जाता है और दुबारा पाइप लाइनों को बिछा दिया जाता है। लेकिन इनमें कभी पानी आएगा इस उम्मीद में कितनी आंखों में झाइयां पड़ चुकी हैं कहा नहीं जा सकता।

इसी के साथ कार्यालय के बाहर जाइलो, बोलेरो, स्कार्पियो, सफारी की लाइनें लग गयी, जिनमें भरी हुई ठेकेदारों, सप्लायरों की भीड़ मक्खियों की तरह ठेकों की चाशनी पर मंडराने लगी। उसके जैसा मामूली-सा जूनियर इंजीनियर अचानक एक ख़ास व्यक्ति हो गया। वो उस मंदिर का पुजारी हो गया, बड़े-बड़े साहबों रूपी भगवानों को रिझाने की कुंजी उसके ही पास थी। इसलिए सारी भीड़ उसके आस-पास ही जमा होने लगी। नोट कोई खास बात नहीं थी, उसे गिन कर देने वाले भी थे और तोल कर देने वाले भी। लेकिन जब एक ठेकेदार ने अकेले में ले जाकर ये अजीबोगरीब पेशकश की तो वो सकपका गया। वैसे वो इज्जतदार व्यक्ति था, एक बेटी भी थी जिसकी इज्जत का उसे बहुत ख्याल था, समाज में प्रतिष्ठा थी। लेकिन इज्जत भी बहुत अद्भुत चीज होती है, बिलकुल बच्चों के खेलने वाली रबर की तरह जिसे हम अपने इच्छा से किसी भी आकार में ढाल सकते हैं।

इसलिए मौन स्वीकृति देकर उसने प्रस्ताव स्वीकार कर लिया, कई कागजों पर दस्तखत हो गए, साहब राजी हो गए, कई नोटों से भरे ब्रीफकेस इधर से उधर हो गए और उसके साथ ही मजदूरों की फौज फांवड़े, कुदाल, तसले उठा कर कुछ ही दिन पहले बनी शहर की सड़कों को खोदने के लिए टूट पड़ी। और देखते ही देखते शहर सड़कों के श्मशान में बदल गया।

इस सबके बीच उसके हाथ में हवाई जहाज का एक रिटर्न टिकट आ गया, अपने शहर से दूर इस प्रसिद्ध महानगर में आने का ताकि इज्जत की बेदाग चादर तनी रहे और उसके नीचे हर तरह की नीचता बिना किसी भी प्रकार की हीन भावना लाए की जा सके।

यहां होटल में पहुँच कर खूबसूरत वेशधारी महिलाओं के अभिवादन का जवाब देते हुआ वह अपने कमरे में पहुँच गया। सबसे पहले गुलाब की पंखुडि़यों से भरे बाथ टब में इत्मिनान से स्नान किया, फिर जिंजर-हनी टी पी, उसके बाद पास्ता विद व्हाइट सॉस, रशियन सलाद और फ्रैंच फ्राइज। खाने में कोई खास मजा नहीं आया लेकिन ऑर्डर किया था तो खाना ही था। जीभ को तो वही कचैड़ी, जलेबी सूतने की आदत है फिर भी यह सोच कर खाने का स्वाद लिया कि देश की राजधानी के सबसे मंहगे होटलों में से एक का खाना खाया जा रहा है।

उसके बाद कुछ देर 24 डिग्री सेल्सियस तापमान की तरावट में आलीशान पलंग पर आरामदायक झपकी ली और फिर दरवाजे की घंटी बजने पर उठ गया। दरवाजा खोला तो यह लंबी चौड़ी युवती, जिसकी लम्बाई उससे भी कई इंच ज्यादा थी, अंदर आ गयी। भक्क गोरा रंग, बड़ी-बड़ी लेकिन कुछ भूरी-सी आंखे, बड़ा चेहरा, गालों की हड्डियां उभरी हुई, भरे-भरे होंठों पर लगायी गहरी लाल लिपिस्टिक और कंधों पर बिखरे दोहरे रंग के करीने से कटे हुए बाल। लुभावना कसा हुआ नीला टॉप और घुटनों तक की डेनिम स्कर्ट, स्कर्ट के नीचे दिखती कसी हुई पिंडलियां और बैंगनी रंग की हाई हील सेंडल। एक ही नजर में उसने भांप लिया कि युवावस्था में फिल्मों देखी हुई हॉलीवुड हिरोइनों, जिन्होने घर के सूने कोनों में बैठ कर किए हुए अनगिनत मानसिक, शारीरिक विलासो को रंगीन किया था, इस कमनीय काया के सामने फीकी हैं। कल्पना की हर उड़ान के लिए इसके पास कोई-न-कोई ठौर-ठिकाना है।

सधी हुई मुस्कान, बिलकुल नपे-तुल ढंग से हाय-हैलो, रोबोट की तरह नाम मात्र के अधोवस्त्रों को छोड़ कर बाकी कपड़ों को उतारना फिर सिगरेट सुलगाना, उसे जल्दी-जल्दी कश लेकर खत्म करना और फिर काउच पर लेट जाना और उस आदमी द्वारा चुपचाप बैठे रहने पर दुबारा उसी गढ़ी हुई मुस्कान के साथ कहना, ‘‘‘‘सर, गो अ हेड! टाइम इज मनी फॉर मी?’’

उस आदमी की हालत भी खराब थी। दो बच्चों के बाप, अगले साल शादी की रजत जयंती है फिर भी उसे लग रहा था कि वो कुंआरा है और स्त्री देह से उसका कोई परिचय ही नहीं है। या शायद उसकी वही हालत थी जो किसी भूखे के सामने छप्पन भोग रख देने से होती है। वो समझ ही नहीं पाता कि पहले क्या खाए और बस भोजन को ताकता हुआ रह जाता है।

लेकिन कुछ तो करना ही था, उसने हिम्मत बटोरी, उस युवती पर झुका और अपने कंपकपाते सूखे होंठ उसके होठों पर रख दिए।

‘‘वॉट द हैल यू आर डूइंग?’’ उस युवती ने उसे इतनी ताकत से धकेला कि वो फिसल कर फर्श पर गिर पड़ा।

‘‘व्हाट हैपंड?’’, उस आदमी ने किसी तरह साहस बटोर कर कहा।

‘‘डू एनीथिंग यू वांट, ऑर आस्क मी टू डू व्हाटऐवर यू वांट, बट नेवर डेयर लिप टू लिप किसिंग’’ वो बुरी तरह झल्ला रही थी।

‘‘बट व्हाई?’’, वो आदमी हैरत में डूब गया। उसे याद आया कि अभी कुछ दिन पहले जब उसने दांतो के एक डाक्टर का पानी का बिल कम कराया था तो उसने उसके मुंह का फ्री चेक अप करके सब कुछ ओ. के. बताया था।

‘‘यू सन ऑफ़ बिच, लिप टू लिप किसिंग इज फॉर लवर नॉट फॉर कस्टमर!!’’
वो आदमी भोंचक्का रह गया। विचार उसके दिमाग में चक्करघिन्नी की तरह घूमने लगे थे। अचानक उसे लगने लगा कि वो नंगा होकर बिकने के लिए बाजार में बैठा है और ये गरिमामयी औरत उसे हिकारत से घूर रही है।


आत्मसंवाद
-हरिहर झा

फुटबॉल की टीम में विकास कप्तान था और दीपक एक अच्छा खिलाड़ी। दोनो में अच्छी दोस्ती थी। विकास वैसे तो अच्छा कप्तान था पर उसकी एक कमजोरी थी। वह मित्रों की बीवियों पर बुरी नजर रखता था – विशेष कर दीपक की बीवी सुनयना पर।
एक बार दीपक ने विकास सहित मित्रों को अपने घर पर डिनर पर बुलाया। पहले विह्स्की का दौर शुरू हुआ। सभी बातों में मशगुल हो गये। आज विकास चालाकी से सुनयना के रूम में घुस आया था। बातों में उलझा कर विकास छिछोरी हरकत करता हुआ ज्यों ही कुछ आगे बढ़ा सुनयना ने बड़ी शालिनता से रोक दिया। सुनयना खुद को कमजोर समझ कर चिल्लाने वालों में नहीं थी।
उसने द्रढ़ता से कहा “कुछ शरम करो विकास, मैं और दीपक दोनो आपकी बहुत इज्जत करते हैं इसका यह अर्थ नहीं।“
शर्मिंदगी झेलता हुआ विकास कमरे से बाहर आ गया । एक बार उसे भय लगा कि वह दीपक को सब कुछ बता सकती है तब उसकी इज्जत दो कोड़ी की भी नहीं रह जायगी। फिर भी अपनी छिछोरी सोच में एक बार उसे लगा वह कोई दूसरा अच्छा मौका ढूंढेगा। उसे अफ़सोस भी हुआ कि वह क्यों जल्दबाजी कर बैठा? उसे कुछ धीरज और ’टैक्ट’ से काम लेना चाहिये था। पता नहीं वह क्यों अभी भी आशावादी था।
विकास बाहर देखता है एल्कोहल सब पर भारी रंग दिखला रही थी। उसके मित्र नशे की हालत में दीपक की ’उड़ाने’ में लगे थे। विकास की कुटिलता से दूर यहाँ मित्रों की निश्छल हँसी का आनंद चल रहा था। दीपक को कोई विरोध नहीं था क्योंकि वह मधुशाला की रंगीन दुनिया में पहुँच चुका था जहाँ मान अपमान धुयें में उड़ चुके थे। बुरा लगने वाले सभी शब्द अपने अर्थ खो चुके थे और बाकी कुछ बचा था तो हँसी-ठिठोली।
“दीपक, आज तुझे यह पार्टी देने की कैसे सूझी? वैसे तो तू इतना भूक्खड़ है कि दूसरे की थाली छिन लेने में जरा भी नहीं झिझकेगा। कुछ तो शरम खा।“
मित्रों को इतनी अच्छी पार्टी देने के बाद इसका कुछ अर्थ नहीं रह जाता पर दीपक ने नाटकीय मुद्रा में हामी भरी “मैं शरम खाता हूँ।“
“अरे! तू तो किसी की मिठाई झपट कर लेने में भी संकोच नहीं करता। इसके लिये तू और शरम खा”
“मैं और भी शरम खाता हूँ।“
“तू किसी की झूठी चाय पीने में शरम नहीं करता। इस बात पर और शरम खा” ।
दीपक ने चुपचाप सिर हिला कर कहा “मैं और भी शरम खाता हूँ।“
अब विकास की बारी थी वह बोला “इतनी सारी शरम खा ली अब तक पेट नहीं भरा इस बात पर और शरम खा।“
थोड़ी देर सन्नाटा रहा फिर सब ठहाका लगा कर हँस पड़े। सबने विकास के इस ’डॉयलाग’ की प्रशंसा की । किन्तु विकास समझ चुका था कि यह कथन दीपक के लिये नहीं था। सामने लगे काच में विकास को अपना ही चेहरा दिखाई दे रहा था।

एक टुकड़ा आसमान
श्रुति मिश्रा
आखे खुलते ही विभा को अपने सास की जोर जोर से चिल्लाने की आवाज़ सुनायी दी |महारानी की सुबह १० बजे से पहले तो होती ही नही है | जल्दी जल्दी नहा धो कर विभा रसोई घर पहुच गयी | विभा की नयी नयी शादी हुई थी| कितने ही सपने सजा कर वह अपने ससुराल आई थी |बचपन मे ही माँ के प्रेम से वंचित हो जाने पर वह अपनी सास मे ही अपनी माँ की छवि को देखने की कोशिश करने लगी |लेकिन उसकी सास तो उसको फूटी आख भी पसंद नही करती है | दिन भर घर के काम , और तानो से परेशान हो जाती है | दूसरी तरफ उसका पति अजय उसके लिए संवेदनहीन | पढ़ी लिखी विभा सारे दिन तानो और घर के कामो के साथ अपनी जिंदगी यह सोचकर गुजारने लगी की कि शायद उसकी सेवाभाव से उसकी सास और उसका पति बदल जाए लेकिन वो यह भूल गयी थी कि जिसकी जो फितरत होती है वो कभी नही बदलती है | शादी को अभी एक साल ही हुआ था कि बच्चे बच्चे की रट शुरू हो गयी |उसके माँ न बन पाने के कारण उसका ससुराल मे रहना मुश्किल होता जा रहा था |देखते ही देखते शादी के पाच साल गुज़र |इसी बीच उसके देवर की शादी भी हो गयी |देवर की शादी के बाद विभा की मुश्किले और भी बढ गयी | देवरानी बड़े घर से आई थी , बेहद सुंदर थी |परिवार के सभी लोग उसके आगे पीछे लगे रहते |कुछ ही दिनों मे विभा की देवरानी गर्भवती हो गयी |अब विभा की सास को यह चिंता होने लगी कि कही विभा का मनहूस साया उसकी छोटी बहु रानी पर न पड़े | उन दिनों रानी का छोटा भाई रोहित घर आया हुआ था | स्वभाव से रोहित बहुत हस मुख था |उसके अच्छे स्वभाव के कारण विभा उससे बात करती थी |एक दिन अकेले मे विभा को रोहित से बात करते देख उसकी सास ने घर मे खूब हो हल्ला किया | विभा की सास जब तब उसके पति से उसके खिलाफ बोलती ही रहती थी |अब तो उसका पति भी दूसरी शादी को तैयार था |लेकिन कर नही सकता था ,सरकारी नौकरी जो चली जाती | इसी डर से दोनों माँ ,बेटे चुप थे | वो लोग ऐसे मोके की तलाश मे थे जिससे विभा को घर से निकाला जा सके |अजय को वो मोका जल्दी ही मिल गया जब विभा अपनी तबीयत ख़राब होने पर पड़ोस मे रहने वाली भाभी के लड़के के साथ अस्तपताल चली गयी |जिसके कारण उन दोनों ने विभा को घर से धक्के मार कर निकाल दिया |उसको दुनियावालो के सामने चरित्रहीन औरत घोषित कर दिया |विभा ने भी बिना किसी विरोध के घर छोड़ दिया |लेकिन वह यही सोचती रही कि उसकी गलती क्या है ?उसका माँ न बन पाना या उसको दुनियादारी ना आना | इतने वर्षो तक जिसने अपने पति की सेवा की उसी ने उसके उपर चारित्रिक दोष लगा कर उसको निकल दिया |आखो से आसू बहाती हुई , दिल मे ज्वार भाटा को जलाये विभा चरित्र की एक नयी परिभाषा गढ़ने के लिए निकल पड़ी |

अधूरी परीक्षाः सुधा भार्गव

अनेक देवी -देवताओं की मन्नतों के बाद सुरया के लड़का हुआ था !एक माह के बाद उसके हाथ की हड्डी टूट गई और प्लास्टर चढ़ गया !हंसते -खेलते बच्चे को पीडा से तिलमिलाते देख सुरया के दिल में दर्दके फफोले फूट पड़ते ! उसका बेटा पुजारी की कृपा से हुआ था !ऐसे बच्चे उसके समाज में देवी के चरणों का प्रसाद हैं !वह तभी मिलता है जब माँ बाप परीक्षा में खरेउतरें!पुजारी ने एक दिन शिशु को मंदिर की छत पर खड़े होकर नीचे फ़ेंक दिया !बच्चे को लपक तो लिया गया पर उसकी हड्डी टूट गई !उसकी अस्वस्थयता की खबर सुन कर सुरया की बुआ आई और सांत्वना देने लगी !सिर पर हाथ फेरा -बेटी ,परीक्षा तो तुमने पास कर हीली !कुछ दिन में बच्चा ठीक हो जायेगा ! सुरया फूट पडी -‘बुआ ,अभी तो परीक्षा अधूरी है .दूसरा बच्चा होने पर उसकी बलि देनी होगी !जो देवी ने दिया उसे लौटना होगा !!