त्रिलोचन की कविताः ठेठ का ठाठ- प्रतिभा मुदलियार


उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिले के कठघरा चिरानी पट्टी में जगरदेव सिंह के घर 20 अगस्त 1917 को जन्मे त्रिलोचन शास्त्री का मूल नाम वासुदेव सिंह था। उन्होंने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से एम. ए. अंग्रेजी की एवं लाहौर से संस्कृत में शास्त्री की डिग्री प्राप्त की थी। उत्तर प्रदेश के छोटे से गांव से बनारस विश्वविद्यालय तक अपने सफर में उन्होंने दर्जनों पुस्तकें लिखीं और हिंदी साहित्य को समृद्ध किया। शास्त्री बाजारवाद के घोर विरोधी थे। हालाँकि उन्होंने हिंदी में प्रयोगधर्मिता का समर्थन किया। उनका कहना था, भाषा में जितने प्रयोग होंगे वह उतनी ही समृद्ध होगी। शास्त्री ने हमेशा ही नवसृजन को बढ़ावा दिया। वह नए लेखकों के लिए उत्प्रेरक थे। सागर के मुक्तिबोध सृजन पीठ पर भी वे कुछ साल रहे। 9 दिसंबर 2007 को ग़ाजियाबाद में उनका निधन हो गया।

प्रगतिशील धारा के कवि होने के कारण त्रिलोचन मार्क्सवादी चेतना से संपन्न थे। लेकिन इस चेतना का उपयोग उन्होंने अपने ढंग से किया। प्रकट रूप में उनकी कविताएँ वाम विचारधारा के बारे में उस तरह नहीं कहतीं, जिस तरह नागार्जुन या केदारनाथ अग्रवाल की कविताएं कहती हैं। त्रिलोचन के भीतर विचारों को लेकर कोई बड़बोलापन नहीं है। उनके लेखन में एक विश्वास हर जगह तैरता है और वह विश्वास है परिवर्तन की क्रांतिकारी भूमिका का।

वास्तव में प्रगतिशील काव्यधारा में व्यापकता बहुत है। रचनाशीलता की दृष्टि से प्रगतिवादियों में विविधता हैं और साथ ही एक दूसरे से परस्पर अलग भी हैं। नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल, मुक्तिबोध, शमशेर और त्रिलोचन की रचनाशीलता को साथ-साथ और समग्रता में देखने पर उनमें व्यापकता और विविधता का बोध होता है। इन कवियों में रचनात्मक सरोकार की एकता है पर प्रत्येक की काव्य रचना का निजी रुप-रंग भी है। त्रिलोचन की कविता को सरसरी तौर पर देखना कविता के साथ अन्याय करना है। इससे कविता में निहित वह परतें नज़र नहीं आती जो काव्य वस्तु के भीतर सहेजी होती हैं। त्रिलोचन की काविता की सहजता ही उनके काव्य को असाधारणता का स्पर्श करा देती है । इसीलिए भी कहा गया कि, उनकी ‘कविता को पढना सृजनशील होने का खतरा उठाना है’। ( साक्षात त्रिलोचन)

त्रिलोचन इतने लंबे रचनाकाल से जुड़े रहकर भी किसी भी आन्दोलन, यहाँ तक कि प्रगतिशील कविता-आंदोलन के भी केंद्र में कभी नहीं रहे हैं। वे अपने समानधर्मा कवियों से अलग हटकर सतत रचते रहे हैं।

दरअसल, प्रत्येक कवि अपनी-अपनी रुचि और संस्कारों से काव्य में अपनी एक निजी भूमिका निभाता है साथ ही अपना दर्शन भी विकसित करता है। यह उसके अपने जीवनबोध तथा परिवेश से निर्धारित होता है। अतः जाहिर है कि यही जीवन-बोध एक कवि को समानधर्माओं से अलग पहचान भी देता है।

त्रिलोचन की रचनाशीलता की ताज़गी, उर्जा और अनुभव को केवल प्रगतिशील कविता के निश्चित परिपाटी में नहीं देखा जा सकता है। कारण त्रिलोचन का काव्य कहीं उससे भी परे का है। त्रिलोचन की कविता का पाठ करते समय मुझे लगा कि उनकी कविता विस्फोटों से भरी हिन्दी कविता के शोर से दूर ले जाती है। घोर एकांतिक अनुभूतियों से उपजी निराशा, घुटन, टूटन जैसी चिंताओं और चिंतनों से भरी कविताओं की भीड़ में, कभी त्रिलोचन ने स्वयं को डूबने ही नहीं दिया और एक स्थिर-चित्त कवि के समान अपने भीतर के संसार में डूब कर जो अनुभूति वे पाते गये, उसी के अनुसार उन्होंने कविताएँ लिखीं। आत्मालोचन में उन्होने लिखा है,

‘पहले मैं सोचता था। उत्तर यदि नहीं मिले तो फिर क्या लिखा जाए। किंतु मेरे अन्तर निवासी ने मुझसे कहा, लिखा कर, तेरा आत्म विश्लेषण क्या जाने कब तुझे, एक साथ सत्य, शिव, सुंदर को दिखा जाए, अब मैं लिखा करता हूँ। अपने अंतर की अनुभूति बिना रंग चुने, कागज़ पर बस उतार देता हूं।’

(आत्मलोचन, तुम्हें सौंपता हूं, पृ.-44)

समकालीन कविता के प्रमुख प्रगतिशील कवि – मुक्तिबोध, नागार्जून, केदार और शमशेर के साथ त्रिलोचन प्रथम पंक्ति के कवि हैं । इन पाँच शीर्षस्थ कवियों की अपनी-अपनी विशिष्टतायें हैं। जहाँतक त्रिलोचन की कविता की विशेषता है वे सीधे लोक से जुडे हैं उनमें कोई ढोंग नहीं है उनमें है तो बस एक सहजता, एक सच्ची अनुभूति की अभिव्यक्ति। उन्होंने जो लिखा वह ठेठ भारत का ठेठ चित्र था…उसी ठेठपन के कुछ पहलू यहाँ प्रस्तुत हैं। मैंने इस ठेठ भाव को केवल लोक, प्रकृति और भाषा संरचना तक ही सीमित रखा। और एक बात यहाँ स्पष्ट कर दूँ कि ठेठपन से मैंने अपनी सुविधा के लिए जो अर्थ ग्रहण किया है वह केवल और केवल लोक की सीमा में है।

लोक का ठेठपन

त्रिलोचन का साहित्य मानवीय संवेदनाओं का अक्षय कोश है। वे समाज के उपेक्षितों, मानवाधिकार से वंचित जनता के सच्चे पैरोकार हैं। वे ग्राम्य-जीवन के अद्भुत चितेरे हैं। त्रिलोचन ने गाँव को निकट से जिया और लिखा भी। उनकी वाणी में गहन बोध, पैनी एवं दूरदृष्टि तथा स्षष्ट एवं सुलझी विवेचना झलकती है। वे बहुत ऊँचा हो जाने के बावजूद अपने गाँव कटघरा चिरानी पट्टी से जुड़े रहें। त्रिलोचन ने प्रगतिशील कविता में भारत के ग्रामीण जनता का प्रतिनिधित्व किया। त्रिलोचन जैसे साधक और सिद्ध कवि अपनी अनुभूति और साधना के बल पर ग्राम का जो दृश्य प्रस्तुत करते हैं वह हिन्दी कविता की उपलब्धी है। त्रिलोचन ने वही लिखा जो कमज़ोर के पक्ष में था। वे मेहनतकश और दबे कुचले समाज की एक दूर से आती आवाज़ थे। उनकी कविता भारत के ग्राम के उस वर्ग को संबोधित करती है जो कहीं दबा है, कहीँ जग रहा है, कहीं संकोच में पड़ा है। वे उन्हीं के कवि है। ठेठ जन के ठेठ कवि— तभी ते वे स्वयं कहते हैं

“उस जनपद का कवि हूँ
जो भूखा दूखा है
नंगा है अनजान है कला नहीं जानता
कैसी होती है वह क्या है वह नहीं मानता”।

त्रिलोचन की कविता में चित्रित ग्राम का ठेठपन उनकी कई कविताओं में झलकता है, पर इसकी प्रतिनिधि कविता को देखना हो तो उदाहरण के स्वरूप उनकी ‘फैरु’, ‘परदेसी के नाम पत्र’, ‘नगही महरा’, ‘चंपा काले -काले अच्छर नहीं चीन्हती’, ‘बैठ धूप में’, ‘दुपहरी थी जेठ की’, ‘गाय’, ‘ईख पकने पर’ आदि आदि देखी जा सकती हैं। कवि अक्सर अपने अंतरंग अनुभवों का सादा बयान देते है जिसमें व्यवस्था के प्रति अराजक विद्रोही स्वर नहीं है। ऐसे अनुभवों को त्रिलोचन बिना अलंकार, बिंब, प्रतीक, जैसे काव्य उपादानों के कविता में रखते है पर लोक की अटूट धारा के चलते कविता दमकने लगती है- द्रष्टव्य है ‘चंपा काले -काले अच्छर नहीं चीन्हती’ की कुछ पंक्तियाँ-

‘मैंने कहा चम्पा, पढ़ लेना अच्छा है
ब्याह तुम्हारा होगा, तुम गौने जाओगी,
कुछ दिन बालम सँग साथ रह, चला जायेगा कलकत्ता
बड़ी दूर है वह कलकत्ता
कैसे उसे सँदेसा दोगी
कैसे उसके पत्र पढ़ोगी
चम्पा पढ़ लेना अच्छा है!
चम्पा बोली : तुम कितने झूठे हो , देखा ,
हाय राम , तुम पढ़-लिख कर इतने झूठे हो
मैं तो ब्याह कभी न करुँगी
और कहीं जो ब्याह हो गया
तो मैं अपने बालम को संग साथ रखूंगी
कलकत्ता में कभी न जाने दुंगी
कलकत्ता पर बजर गिरे’।

कितना सादा, किंतु अर्थपूर्ण बयान है! यहाँ शब्दों का चमत्कार देखिए…चम्पा खुद ब्याह नहीं करेगी…पक्की है अपनी बात पर……पर अगर हो जाय तो….ब्याह के करने और होने में अंतर होता है, यह बात बडी़ सूक्ष्मता से कवि कह जाते हैं और दूसरी ओर चम्पा को यह विश्वास है कि उसको अपने बालम से अलग रहना ही नहीं पडेगा, इसलिए कलकत्ते जाने की आवश्यकता ही नहीं है, बल्कि वह चाहती हैं कि कलकत्ते पर ‘बजर गिरे’…ताकि बलम के जाने की नौबत ही न आये। यहाँ कवि एक साधारण लडकी के माध्यम से महानगरीय व्यस्त जीवन कितनी बड़ी बात कितनी आसानी से कह जाते है….’बरज गिरे’ में जो ठेठपन है उसमें ह्र्दय की जो सादगी है वह बस यही मिलेगी। इसी प्रकार ‘गाय’ कविता की पंक्तियाँ देखिए-

“गाय जुगाली करती हो चाहे खड़ी खड़ी
या लेटी अधलेटी अपने खूंटे पर हो
या चरने के लिए खुली होकर बाहर हो
खोज खोज कर घास पर रही हो, जरा बड़ी
चक्कत्तियाँ पाकर थोड़ी सी देर को अड़ी
हो, आगे ही बढ़ते चारों पैर, पंवर हो
पूंछ डांस, कुकुरौछी, इधर उधर हो
तो कौवा भी आता है इसी घड़ी
पूंछ चलाती है गैया तो उसे बचाकर
वह शरीर से लिपके कीड़े चुन लेता है
खा जाता है, और मैल भी आँख कान के
हर लेता है गैया के, कितना संभाल कर
यह संबंध मुझे चुपके से जो देता है
वह संभाल लेता हूँ मन में, निजी मान के”।

त्रिलोचन इस कविता में अपने आसपास के परिवेश का चित्र कलात्मकता के साथ प्रस्तुत करते हैं, इसमें कोई विचार नहीं है, ना ही कल्पना की ऊँची उड़ान ही है। यह शुध्द पर्यवेक्षण की कविता है। जो जिस रुप में देखा, हू-ब-हू वैसा ही रच दिया। अपनी ओर से जोड़-तोड़ नहीं किया। यही लोक का स्वभाव भी है, यानि खरा, पवित्र। यहाँ भावना प्रधान होती है, न कि कला। अर्थात वे हृदय से लिखते थे, बल्कि कविता को अपना हृदय ही देना चाहते हैं। कलम की दिमागी कसरत नहीं करते थे। मुझे लगता है कि यह कविता वर्णन की अद्भुतता के कारण ही संभव हुई है। ‘गाय’ कविता की अंतिम दो पंक्तियाँ – ‘यह संबंध मुझे चुपके से जो देता है। वह संभाल लेता हूँ मन में, निजी मान के’।कविता को एक भिन्न केनवास पर ले जाती हैं। कवि समाप्त होती हुई कविता में लगभग अंत में अपनी बात गहरे अर्थों में सम्पन्न कर देते हैं। ‘गाय और कौवे’ का संबंध केवल त्रिलोचन ही देख सकते हैं और उसे सहेज भी सकते हैं। इसी क्रम में एक अन्य कविता ‘परदेसी के नाम पत्र’ में गाँव के जीवन का, वहाँ के विषयों का जिक्र करते हैं जहाँ लोक का सहज भावबोध व्यक्त हुआ है,

“वह जो अमोला तुम ने धरा था द्वार पर,
अब बड़ा हो गया है। खूब घनी
छाया है। मौंरों की बहार है। सुकाल
ऐसा ही रहा तो फल अच्छे आयेंगे”।

कविता में और आगे बछिया की बात, मन्नु बाबा की भैंस का ब्यायना आदि मजमुन पत्र में है। यूँ है तो यह एक मामुली सा पत्र, पर यही पत्र गाँव की भावधारा का जीवंत मानचित्र खड़ा कर देता है। त्रिलोचन का यही विशेष व निजी स्वभाव है कि वे बिलकुल जनमानस से जुड़ जाते हैं।

जो कवि धरती से जुड़ा है उसकी कविता घर परवेश से दूर तो रह ही नहीं सकती। ‘दिगंत’ तथा ‘धरती’ में त्रिलोचन घर परवेश के कवि हो जाते हैं। मुलतः घर त्रिलोचन की कविता का स्थायी धरातल है। यह अनुभव भरा घर उनकी कविता की बनावट भी है और बुनियाद भी।

“अपना ही घर
महल खड़ा करने की इच्छा है शब्दों का
जिसमें सब रह सकें, रम सकें,
सांचा ईंट बनाने का मिला नहीं है, अब्दों का
समय लग गया, केवल कामचलाऊ
ढांचा किसी तरह तैयार किया है.”

इसीतरह एक अन्य कविता में कवि कहते हैं,

“जब जब बाहर से आया तब तब मेरा घर
अपने अपनेपन से अधिकाधिक अपनाता
मुझे मिला। आवाजों से ही जान बचाता
किसी तरह घर आता हूँ, इसमें अपने स्वर
सुनता हूँ, गुनता हूँ, बार बार भी सुनकर
तृप्ति नहीं पाता। अपने मन को समझाता
हूँ, जीवन भी बन्दी स्वर है, स्वर का नाता
कहाँ छोड पाता है जीवन, जग में जग कर”।

अपनी धरती की सोंधी गंध से गहरे जुड़े त्रिलोचन की कविता लोक जीवन से सीधा साक्षात्कार करती है। प्रखर लोक चेतना कवि की कविता का सशक्त पक्ष है। कवि की कविता में देसीपन है, गाँव का खाटी संस्कार है। लोक संवेदना, लोक संस्कृति, लोक परंपराओं, लोक ध्वनियों, बोलियों को कवि की कविता शब्दबद्ध करती है। कविने एक बातचीत में इस तथ्य को स्वीकार किया है कि ‘उन्होंने कविता लोक से सीखी है, पुस्तक से नहीं’। ‘लोक’ समकालीन कवियों की कविताओं में अपनी समग्र प्राणवत्ता, जीवंतता के साथ उपस्थित हुआ है। त्रिलोचन की कविता में लोक का समूचा परिदृश्य उभरा है। कवि की कविता के महत्वपूर्ण पात्र ‘भोरई केवट’, ‘नगई महरा’, ‘चंपा’, ‘चित्रा’, ‘परमानंद’ आदि सीधे-सीधे लोक से ही लिए गए हैं। त्रिलोचन का गाँव से गहरा रिश्ता है। उनकी कविता में लोक जीवन के उनके अनुभव, स्मृतियाँ दिखाई देती हैं-यह अनुभूति देखिए.

“घमा गए थे हम
फिर नंगे पाँव भी जले थे
मगर गया पसीना, जी भर बैठे जुड़ाए
लोटा-डोर फाँसकर जल काढ़ा
पिया
भले चंगे हुए
हवा ने जब तब वस्त्र उड़ाए”।

भारतीय किसान की निश्छल, भोली-भाली दुनिया कवि की वास्तविक दुनिया है। भारतीय किसानों की मानसिकता, उनके मनोविज्ञान की बड़ी सूक्ष्म पकड़ कवि को है।

वह उदासीन बिल्कुल अपने से,
अपने समाज से है, दुनिया को सपने से अलग नहीं मानता
उसे कुछ भी नहीं पता दुनिया कहाँ से कहाँ पहुँची, अब समाज में
वे विचार रह गए वहीं हैं जिनको ढोता
चला जा रहा है वह, अपने आँसू बोता
विफल मनोरथ होने पर अथवा अकाज में।
धरम कमाता है वह तुलसीकृत रामायण
सुन पढ़कर, जपता है नारायण नारायण।

डॉ.कृष्ण बिहारी मिश्र जी ने अपने एक लेख में त्रिलोचन के काव्य का सही आकलन किया है उनके ही शब्दों में, ‘त्रिलोचन को पढ़कर कभी मन उमगता है, कभी कलेजा मसोसने लगता है, देश का पूरा अतीत बाँह पकड़कर अपनी ओर खींचने लगता है । एक पूरा राष्ट्र शरीर धारण कर सामने खड़ा हो जाता है, कहीं उसकी सिहरन और रोमाँच, कहीं बुद्धि का तज़ुर्बा और अनुभव दूर-दूर प्रवेशों के दृश्यों की पेंटिंग, कालिदास और देव के अभिसार ही नहीं, कबीर का फक्कड़पन, तुलसी का स्वाभिमान, घाघ और भड्डरी का लोक चातुर्य और लोक अनुभव, सेनापति और पंत का प्रकृति-निरीक्षण और निराला की शिल्प चेतना आदि कितनी ही चीज़ें एक साथ मिलेंगी’। ( सृजनगाथा )

उनकी कविता का जनमानस में देर तक बने रहने की वज़ह है उनका लोकसंस्कारी स्वभाव और गाँव के कृषक-समाज से समीपता, जो उन्हें चिरानीपट्टी गाँव और काशी में मिली थी। चिरानीपट्टी ने उनको लोक की समझ दी और काशी ने काव्य- चिंतन की। उनका लोक जिन तत्वों से बना है, उसमें बडी़-बडी़ बातों के लिये जगह नहीं। हम नगरवासी संभवतः त्रिलोचन के उस गहन अनुभूति को समझने में छोटे पड़ सकते हैं कारण हमारे अनुभव का दायरा कमरों-गलियारों तक ही सीमित हैं …..वहाँ वह नहीं जो गाँव की खुली हवा में महसूसा जाता है। मुझे त्रिलोचन की कविता की नब्ज पकडने में बडी मुश्किल लग रही थी इसका प्रमुख कारण उनकी वस्तु और भाषा का ठेठपन। उनकी वस्तु को समझने के लिए गाँव देहात की समीपता आवश्यक है…जहाँ मुझ जैसी की अपनी सीमा भी एक अड़चन है।

प्रकृति की लीला और सौन्दर्य

त्रिलोचन के कविता का एक अन्य महत्वपूर्ण विषय प्रकृति है । त्रिलोचन जितने मानव-संघर्ष के कवि हैं, उतने ही प्रकृति की लीला और सौन्दर्य के भी। इसीलिए प्रकृति बहुत गहराई तक उनकी कविता में रची-बसी है। उनकी कविता में प्रकृति भी आती है तो वह मनुष्य के साथ कोई न कोई रिश्ता लेकर आती है। त्रिलोचन प्रकृति को देखकर मौन नहीं हो जाते हैं। वे उसमें जीवन देखते हैं। अपने मन की अनुभूतियाँ और मनुष्य के प्रकृति के साथ बनते-बदलते संबंधों और मनुष्य के प्रकृति के साथ लंबे संघर्ष को देखते हैं जैसे – ‘पृथ्वी गल गई है, पेड़ों की पकड़ ढीली हो गई है’। प्रकृति के बारे में त्रिलोचन का दृष्टिकोण बहुत कुछ उस ठेठ भारतीय किसान के दृष्टिकोण जैसा है जो कठिन श्रम के बीच भी उगते हुए पौधों की हरियाली को देखकर रोमांचित होता है। निराला की तरह त्रिलोचन ने भी वर्षा के अनेक चित्र अंकित किये हैं।(उदा. भादों की रात, उड़ते है पारावात, कृष्ण मेघों से, निझरे झीने झीने बादल) और बादलों के कठोर संगीत को अपनी अनेक कविताओं में पकड़ने की कोशिश की है। परन्तु ऐसा करते हुए वे किसी विलक्षण सौन्दर्य-लोक का निर्माण नहीं करते, बल्कि अपनी चेतना के किसी कोने में दबे हुए किसान का मानो आह्वान करते हैं – ’उठ किसान ओ, उठ किसान ओ, बादल घिर आये।’ प्रकृति और जीवन के प्रति यह किसान-सुलभ दृष्टि त्रिलोचन की एक ऐसी विशेषता है, जो सिर्फ़ उनकी अलग पहचान ही नहीं बनाती, बल्कि उनकी विश्व-दृष्टि को समझने की कुंजी भी हमें देती है।

उनकी कविताओं में बड़ी मात्रा में लोक-चित्र मिलते हैं। वे अपने आस-पास की प्रकृति का सूक्ष्म निरीक्षण करते हैं, उनकी बारीक गतिविधियों का अवगाहन करते हैं और सादी भाषा की लड़ियों में पिरोकर कविता की सुन्दर माला रच देते हैं। इस प्रकार प्रकृति के व्यापारों से न्यस्त होकर उनकी कविता में कला का स्वत: प्रस्फूटन हो जाता है । इसलिये उनकी कविता में वक्रता और गूढ़ता की जगह आत्मीयता और सरलता का बोध होता है।

“आज पवन शांत नहीं है श्यामा / देखो शांत खड़े उन आमों को / हिलाए दे रहा है/ उस नीम को / झकझोर रहा है /और देखो तो / तुम्हारी कभी साड़ी खींचता है / कभी ब्लाउज़ /कभी बाल /धूल को उड़ाता है /बग़ीचों और खेतों के/ सूखे तृण-पात नहीं छोड़ता है/ कितना अधीर है /तुम्हारे वस्त्र बार बार खींचता है/ और तुम्हें बार बार आग्रह से/छूता है /यौवन का ऎसा ही प्रभाव है /सभी को यह उद्वेलित करता है
आओ ज़रा देर और घूमें फिरें /पवन आज उद्धत है /वृक्ष-लता-तृण-वीरुध नाचते हैं/ चौपाए कुलेल करते हैं /और चिड़ियाँ बोलती हैं।

‘वातावरण’ की यह पक्तियाँ भी देखिए

“सांझ गुलाबी काँप रही है ठण्ड से
उधर गुलाबों के पौधे लाचार हैं
झूल झूल कर फूल हवा से कह रहे
हैं यह, इतनी छेडछाड़ अच्छी नहीं”।

कवि ने प्रकृति के उपादानों के साथ एक रिश्ता कायम किया है, वे उनके जीवन के संगी साथी है, सेमल का वृक्ष इसका एक अच्छा उदाहरण है, “साथी है मेरा एक, सेमल का पेड़, जो पुराना है”। इस पेड़ ने कई पतझरों पर अपने पत्त्ते लुटा दिये हैं, दिशाओं को रंग दिये है, जिसकी खाल अब काली हो चुकी है, चिडिया आकर किलकिलाती है, जानवर छाँह के लिए आ जाते हैं, अपने इस साथी का परस पाकर सिराओं में नई रवानी आती है….पर सेमल में सुगंध नहीं…उससे कवि को कोई शिकायत नहीं है वे कहते हैं.

“मुझ को शिकायत नहीं कभी
क्यों नहीं सुगन्ध कभी देता वह
फूलों में जो कुछ भी देता है
वही कौन कम है”।

प्रकृति तो उनमें रची बसी है। उनके व्यक्तित्व का अभिन्न अंग है। मधुमक्खियाँ, गौरेया, कठफोड़ा, धूप ,हवा, पानी, फल, फूल बादल, चाँद, सूरज, बसंत, शरद, बरसात, सुबह ,शाम रात, तमाम प्राकृतिक उपादान उनकी कविता में आ जाते हैं, पर उनकी ओर देखने का कवि का दृष्टिकोण भिन्न है। प्रकृति के साथ रहनेवाले त्रिलोचन की निरिक्षण क्षमता पर मुग्ध हुए बिना रहा नहीं जा सकता। ‘बेले के पत्ते’ कविता देखिए या फिर इन पंक्तिय़ों को ही दिखिए-

“बादलों ने ली अंगडाई
एक ओर ज़रा चमक बढ गई
हवा नए अंखुओं से यों ही बतियाती है
उनका सिर हिलता है
फूल खिलखिलाते हैं”।

पर एक बात और कि त्रिलोचन केवल प्रकृति का रसास्वादन ही नहीं करते बल्कि उनके सामने एक सवाल भी आता है, ‘अगर चाँद मर जाता, झर जाते तारे सब, क्या करते कविगण तब? खोजते सौन्दर्य नया? देखते क्या दुनिया को? रहते क्या, रहते हैं, जैसे मनुष्य सब? क्या करते कविगण तब? ‘ त्रिलोचन प्रकृति को देखकर मौन नहीं हो जाते हैं। वे उसमें जीवन देखते हैं। अपने मन की अनुभूतियों के साथ साथ वे मनुष्य के प्रकृति के साथ बनते-बदलते संबंध और संघर्ष को भी देखते हैं। उनकी अभिव्यक्ति में यही तो बातें रूपाकार पा जाती हैं, इतना ही नहीं प्रकृति के विनाशक रूप में भी उनका भावबोध एक भिन्न अनुभूति दे जाता है, इस संदर्भ में ‘आँधी औऱ चारों और बाढ आई है’, कविता को लिया जा सकता है। जिसमें कविने बाढग्रस्त प्रकृति को शब्दबद्ध किया है जैसे – ‘पृथ्वी गल गई है, पेड़ों की पकड़ ढीली हो गई है, आज ककरिहवा आम सो गया’।

इसी प्रकार जेठ की दूपहरी कविता है। इस सॉनेट में शुरू में कवि कहानी सा कहता जाता है, लेकिन इनके तीन पक्ष स्पष्ट हैं, एक- जेठ की दुपहरी का प्रकोप, दो- उस प्रकोप को सहने की दृठता और तीन- एक अंधविश्वास का मखौल..

“हम तुम समय नहीं मुहूर्त देख चले थे।
पंखे लू के मारूत ने अमिराम झले थे”।

इन अंतिम पंक्तियों को समझना भी ज़रूरी है। यहाँ जेठ की दुपहरी का एक अन्य अर्थ जीवन से जुड़ जाता है। वस्तु, वस्तु ही बनी रहे और पूरा चित्र जीवन से जुड़ जाय यह त्रिलोचन की लेखनी का ही कमाल है।

भाषिक संरचना

भाषा के प्रति त्रिलोचन सजग हैं। उनकी भाषा सबसे अलग, अनूठी और कला की ही तरह सरल है जिसका ठेठ देशज जातीय रुप ही उनकी पहचान भी है और महानता भी। त्रिलोचन ने भाषा शैली और विषयवस्तु सभी में अपनी अलग छाप छोड़ी है। त्रिलोचन ने लोक भाषा अवधी और प्राचीन संस्कृत से प्रेरणा ली। इसलिए उनकी विशिष्टता हिंदी कविता की परंपरागत धारा से जुड़ी हुई है। मज़ेदार बात यह है कि अपनी परंपरा से इतने नजदीक से जुड़े रहने के कारण ही उनमें आधुनिकता की सुंदरता और सुगंध है।

त्रिलोचन अपनी कविता की शब्दावली लोकजीवन से ग्रहण करते हैं। छुट्टा, ग्वैड़े, थेथर, हरहा, पलिहर, बारी, इनार, जैवरी, बकैंया, मड़ई, सीवान जैसे लोक के जाने बूझे खाँटी शब्द कवि की कविता के सौंदर्य में वृद्धि करते हैं। ऐसे शब्दों का प्रयोग लोकजीवन से गहरे जुड़ा कवि ही कर सकता है। बोली, भाषा के साथ यहाँ इतनी रची-बसी हैं कि इसका संश्लेषण इतने व्यापक रुप में किसी अन्य कवि की रचना में दृष्टिगोचर नहीं होता। त्रिलोचन जी का कथन है कि, कविता में बोलचाल की भाषा आनी चाहिए। जो शब्द खपते हो उन्हें लेने में संकोच नहीं होना चाहिए।…..जीवन्त भाषा किताबों से नहीं आती। अपनी भाषा के इस प्रकृत गुण को त्रिलोचन ने सदैव बनाए रखा।

यथार्थवादी शैली और बातचीतवाली भाषा ने त्रिलोचन की कविता को एक नया आयाम दिया है। कविता में छोटी बड़ी कहानी एक संश्लिष्ट काव्य रूप है। गंभीरता विचारशील भाव, अनुभूति की गहन एकाग्रता और कसी हुई भाषा के साथ ही चौदह पंक्तियों का अनुशासन, जो सॉनेट की विशिष्टता है, त्रिलोचन की मनोभूमि के अनुसार है। कला या रूप की दृष्टि से तो यह सर्वमान्य तथ्य है कि सॉनेट के क्षेत्र में त्रिलोचन का काम अद्वितीय है। हिंदी में सॉनेट को विजातीय माना जाता था। लेकिन त्रिलोचन ने इसका भारतीयकरण किया। इसके लिए उन्होंने रोला छंद को आधार बनाया तथा बोलचाल की भाषा और लय का प्रयोग करते हुए चतुष्पदी को लोकरंग में रंगने का काम किया। इस छंद में उन्होंने जितनी रचनाएँ कीं, संभवत: स्पेंसर, मिल्टन और शेक्सपीयर जैसे कवियों ने भी नहीं कीं होगी। सॉनेट के जितने भी रूप-भेद साहित्य में किए गए हैं, उन सभी को त्रिलोचन ने अजमाया। फ्री वर्स के ज़माने में एक बंधन लेकर चलनेवाला यह ठेठ भारतीय किसानी मन का कवि अपनेआप में अनोखा है।

त्रिलोचन की कविताओं में अभिव्यक्ति की सहजता भी इतनी अलग है कि एक नये काव्य-सौंदर्य की अनुभुति कराती है जिसका पाठक के मन पर गहरा प्रभाव पड़ता है। यह सहजता मात्र लोक की बानगी के कारण नहीं है, अपितु भाषा की तरलता, हृदय-तत्व का समावेश लोक-स्पर्श का परिणाम है जो मात्र त्रिलोचन में ही देखा जा सकता है। इसलिये यह अद्भुत है, और इसका विशेष महत्व है। दूसरी ओर वे ठेठ अवध के कवि हैं फलतः अवधी बोली का सर्जनात्मक क्षमता से खडी बोली को अधिक आत्मीय और व्यंजनाक्षम बनाने के आग्रही है। अवध अपनी सारी प्राकृतिक और सांस्कृतिक गरिमा के साथ त्रिलोचन की कविता में अवतरित हुआ है।

लोक, जीवन का सूक्ष्म निरीक्षण और प्रकृति ही स्वयं त्रिलोचन की कविता की कला का रुपाधार हैं। प्रेम, प्रकृति, सौंदर्य और लोक की प्रामाणिक उपस्थिति के साथ आम जनता के संघर्ष, उसकी वेदना को सशक्त शब्दों में अभिव्यक्त करने वाली इस कवि की कविता अपना विशेष स्थान रखती है। संस्कृत की प्राचीनतम परंपरा से लेकर हिंदी की ठेठ जनपदीय बोली तक प्रभाव ग्रहण करते हुए त्रिलोचन की काव्य वस्तु और भाषा मौलिक है, जो अपना गंभीर, संयत प्रभाव डालती है।
प्रतिभा मुदलियार

रीडर हिंदी विभाग, मैसुर विश्वविद्यालय, मानस गंगोत्री, मैसुर
जन्मः बेलगाँव, कर्नाटक,
शिक्षाः एम.ए., पीएच.डी. डी.लिट, डिप्लोमा इन ट्रान्सलेशन