चितचोर कृष्णः शैल अग्रवाल

चितचोर
देवकी नन्दन कहूँ तुम्हे या मैं जसुमति को लाला
नन्दगांव से बरसाने तक एक तुम्ही तो नंदलाला
नन्दन वन में गूंज रही पायलिया की रुनझुन
और दुष्टन हित धारो तुमने वो चक्र सुदर्शन
प्रेम, सद्भाव, भेदभाव रहित समाज के रखवाले
सबके प्रेरक, आदर्श, मोहित तुम पर है हर प्राणी
गाय-बछिया गोपी-ग्वाले और सलोनी राधा रानी।

जड़ चेतन में व्याप्त तुम्ही सुरों के अनहद नाद बने
करते मानस में रास हो जुगलकिशोर के रूप सजे
शैशव में कपटी बकासुर और पूतना को मारा
तरुणाई में जितनी गोपी थीं उतने दिखते कान्हा
चित चोर माखन चोर चतुर तुम ही हो रणछोड़
सबके कल्याण सभी की खुशी का रखते ध्यान
पर खुद का ही नाम यूँ बदनाम कर डाला !

हर रूप अनूप तुम्हारा तुम ही तो आनन्द स्वरूप
प्रेम पाश में बंध रिश्तों को दी एक नई परिभाषा
मुरलीधर, गिरधर, नाग नथैया, रास रचैया
चंद्र खिलौने पर मचलने वाले, हे अगम अबूझ
गीता का ज्ञान दे मुंह में हमें बृह्मांड दिखलाया
हे योगेश्वर हे लीलाधर तुम ही तो हो मनमोहन
मधुर सुभाषित बातें, हर रूप तुम्हारा मोहने वाला।

एक तुम सुदामा के कृष्ण परवाह नहीं जिसे
गरीब-अमीरों की, मुठ्ठी भर चावल पे रीझे
द्रौपदी के सखा आ भरी सभा बचाई लाज
अबला के अंसुवन पर तुम सदा पसीजे
मित्र की खातिर निहत्थे ही कुरुक्षेत्र जीता
पार्थसारथी, हर रिश्ता ही संपूर्ण तुम्हारा
जिसने भी तुम्हें चाहा पूरा ही पाया
फिर राधा का प्यार ही क्यों रहा आधा ?

हे गो-विन्द, हे गो-पालक, सर्वज्ञ और सृष्टि संचालक
कैसा था वह नेह का बंधन पूर्ण भी जो अपूर्ण भी
ललित करुण रम्य अगम्य पथ और पाथेय दोनों
प्रेम विभोर अंतस में बैठा आज भी झूला झूले
आत्मा और शरीर-से रिंधे-बिंधे साथ दिखे सदा
पर छलिया तुमने ही सुधि ना ली दोबारा
क्या लौटना तुम्हारे लिए भी इतना कठिन था
या कर्मयोगी कर्तव्य ही सर्वोपरि रहा आजीवन!

याद तो आते ही होंगे पर
राधा के संग वो कालिंदी तट
कदम्ब का पेड़ और बचपन के सखा सारे
छोड़ जिन्हे तुम द्वारिकाधीश बने
रुक्मणि को ब्याहे नया संसार रच डाला !

दूधिया चांदनी से धवल राधा की आंख के मोती
ढुलके बिखरे बस तस्बीरों और गीतों में ही नहीं
चंदनहार से आज भी तुम्हारे हिय पर सुशोभित
अदभुत तुम अद्भुत तुम्हारी नेहलीला के संदेश
त्याग ही सदा इस प्रेम का लक्ष और सुख
अलौकिक संजोग दो आत्माओं का ये मोरपंखी !

गूंजते तुम्हारी मूक बांसुरी में विरहन के सुर
सुरीले ये गीत-अगीत सारे हमारा अंतस बींधते
किस रूप बखानूँ, कैसे पूजूँ तुम्हें मैं बोलो केशव
आंखें गर मीचूँ आज भी तो सुनो चितचोर
सलोनी वो सूरत ही सामने खड़ी मुस्काए
मधुबन में गूंज उठे फिर वही बांसुरिया
जुगल जोड़ी ही हिया में रही बिराजे
मंदिर-मंदिर यही तो आज भी पूजी जावे।


प्रेमी मतवाला
———–

गाय चराता भोला भाला ग्वाला था
ज्ञान नहीं गुमान नहीं
दधि माखन पर मचल जाने वाला था
तरुण कृष्ण के थी अधर बांसुरी
और नयनन में चतुर राधिका
द्वारिकाधीश एक चक्रवर्ती सम्राट
सोलह कलाओं में निपुण छलिया
दुष्ट कंस और शिशुपाल का संहारक
जग का पालक कुशल संचालक था
दोनो ही रूप तुम्हारे, पर कितने भिन्न
क्या वो कृष्ण कोई और था
और ये द्वारिकाधीश कोई और
या फिर समय की मांग पर
बदला प्रेमी मतवाला
विवेकी शूर वीर ने तजी बांसुरी
चक्र संभालकर तारक बन गया गोपाला
प्रेम की खातिर कुंजगली से गुजरा
और रणभूमि तक जा पहुँचा
वही, जो सबका रखवाला था।

भ्रमर गीत
———

फोड़ मटकी नित दूध दही खावै
छेड़ै निशि दिन राह चलत रिझावै
तुम्ही कहो कैसे उसै हम बिसरावैं
गोपी हम अपने नटखट कान्हा की
पल पल रहीं उसी में रची रमी
और किसी को कैसे अब जानें मानें

जाकी मुरली पै नाचे हम
नितनित ही ता-ता थैया
वो ही सुध ना लेवैगो हमारी
वृंदावन की कुंज गलिन में
ज्ञान की अपनी धूनी ना रमाओ
जाओ भ्रमर तुम वापस जाओ!

छोड़ हमें मथुरा को जावै
बहलावन को फिर दूत पठावै
पानी मैं क्यों चांद दिखावै
मनमानी ना चलैगी इसकी
बातों से ना हमें फुसलाओ
हिय के ये तार छूटें ना छुटाए

कान्हा से ज्यादा निर्मोही
कान्हा की कठीली ये बांसुरिया
बिन कान्हा के एक गीत ना गावे है
मूक पायलिया अब हंसे ना रोए
पनघट पै बैठी राधा
अंसुवन गागर भर लावै है ।

ज्ञान की खिड़की से आती जाती
देखी बहुत आड़ी-तिरझी धूप
तिसपर तुमरो औघड़ वैरागी रूप
हमें ना बहलाएँ चासनी लिपटी
बहकी-बहकी बतियाँ ये तुम्हारी
चुभतीं अंतस ज्यों विषमय शूल।

तरुवर पंछी तक रहते आकुल
रंभा रही हैं गैया और बछिया
बेसुध नन्द बाबा और जसुमति मैया
रूप गंध हीन है कान्हा बिन
जमुन जल कालिंदी तट
बृंदावन की पूरी उजड़ी बगिया

अंखियाँ किरकें इत उत बरसें
नयन बावरे दरसन को तरसें
कब गूंजेगी मुरली फिर बंसीबट
पग-पग गोपी ग्वाला सब भटके
अंखियन रचे रमे हैं मनमोहन
रास रचाएँ नित पलकन बैठे
तान पे इनकी ही पग नूपुर छनके

अधर बांसुरी शीश पै मोरपंख धारे
भटक रही इतउत बृषभान लली
ढूँढती अपने कान्हा को गली गली
भोली हैं हम बृज की बाला
हर सुख बिसराय पूत पालने छोड़े
राह तकें धूल भरी सड़कन पे खड़े

सुनो, निठुर तुम कान्हा के दूत
कान्हा ते इतनी कहियो जाय
प्रेम-संदेश बांचैगो वही
जाके हृदय में प्रेम समाय
इतनो ध्यान हमारो तो
क्यों ना खुद मिलने को आय !

लड्डू गोपाल
———-
एक वही थे सब कुछ वही
माँ और उनके लड्डू गोपाल
सेवा में जिनकी बीतते
माँ के सारे दिन और रात।

झूला झुलाते, सुलाते जगाते
न माँ थकतीं ना लड्डू गोपाल
नहलाती धुलातीं सजातीं नित नित
नित-नए वस्त्र सिलकर पहनातीं ।

मेवा मिश्री का फिर भोग लगातीं
वे ही तो थे उनके असली लाल
जो कुछ भी आता घर में
पहले उन्हे ही समर्पित कर आतीं।

सारे सुख दुख अपने बस
उनसे ही वे साझा करतीं

हमसे भी प्यारे अधिक थे शायद
माँ को वे नन्हे-से लड्डू गोपाल।

एक दिन ईर्षा ने आग लगाई
हमने भी कुछ करने की ठानी
बंद आंखों संग जब वो ध्यान मगन
गायब कर दिए मां के लड्डू गोपाल ।

गाती रहीं वो भावभीना भजन –
‘छोटी-छोटी गैया छोटे-छोटे ग्वाल
छोटो सो मेरो मदन गोपाल’
सुन नहीं सकते थे पर बेबस
मुंह में हमारे थे जो बंद
मा के मधुर गीत और छंद।

घबराकर माँ ने आखें खोलीं
देख गालों की बढ़ी गोलाई
कान उमेठे और डांट लगाई
मूरत तुरंत वो बाहर आई
गंगा जल से गई नहलाई।

काजू कतली का भोग लगाया
गोद बिठाकर हमें समझाया-
माना तुम मेरी आंख को तारे
इनकी दया पे पर प्राणी सारे।

धारक यही, पालक यही
एक यही, सबकुछ हैं यही
इनपर मोहित दुनिया सारी
गोपी ग्वाले और राधा रानी।

सुन माँ की बातें प्यारी
मूरत वो मन्द-मन्द मुस्काई
अपनी आँखों में भी थी तब
कितनी थी वो झूमी इठलाई।

किलके मां की गोदी फिर तो
एक नहीं, दो-दो लड्डू गोपाल
बीत गए यूँ ही खुश-खुश
जाने कितने साल।

पर मां की मृत्यु उपरांत
हो रहा था जब शैया दान
शैया पर विचलित से दिखे
उदास और अकेले बैठे
माँ के प्यारे लड्डू गोपाल।

मां बिन मैं ही नहीं
ये भी तो हो चुके थे अनाथ
कौन करेगा अब सेवा इनकी
बेचैन था अपना भी मन।

कई प्रश्न थे मन को घेरे
ये भी क्या बेच दिए जाएँगे
अनमोल यूँ ही धेले अधेले
बसे रहे जिनमें माँ के प्राण!

ममता का एक सैलाब उमड़ आया
नास्तिक को जिसने आस्तिक बनाया
लपक उन्हें तब मैंने झट से उठाया
आंसू भीगे अपने आंचल में झुपाया
मधुर एक भजन गा-गाकर सुनाया।

अकेला उन्हें मैं छोड़ ना पाई
संग अपने घर को ले आई
रहते अब एक दूजे पे निहाल
माँ, मैं और हमारे लड्डू गोपाल …

प्यासी थी
——-
तुम्हे ढूंढने निकली
तो मथुरा जा पहुँची
तुम्हारे जन्म स्थल पर
कारावास की उस शिला पर
जी भरकर हाथ फिराया
पर मन में विशेष भाव न आया
तुम ही न थे जब बांके बिहारी
तो भला मैं कैसे वहाँ टिक पाती
दौड़ी-दौड़ी गोकुल जा पहुँची
चौरासी खंभों में भटकी
मखन मिश्री का भोग लगाया
पर वहाँ भी तुम्हें ना पाया
मोटा पंडित पैसे लूटे
वादे करे कितने सच्चे झूठे
बरसाना और नंदगांव
थे हमारे अगले पड़ाव
वहाँ भी बस वही हुआ
शोर भरी राहें और उजड़े मंदिर
एक अनोखा बजारवाद
गोवर्धन की परिक्रमा संग
घूम डाला पूरा ही वृज
पहुंचे फिर हम जब वृंदावन
रम्य था और अति मनोरम
पर कान्हा नहीं
कान्हा की परछांईयों डूबा
मोर तोते तो दिखे सब
राधा-कृष्ण के सानिध्य का
पर असली सुख ना मिला
एक ही रही तब अपनी साध
डूंढूं तुम्हें द्वारिका में जाकर
द्वारिका नगरी थी भव्य खड़ी
रहस्यमय और रोमांचक बड़ी
उमड़ती लहरों के किनारे
देखा जहाँ अनूठा
द्वारिकाधीश का मंदिर
भेट द्वारिका की यात्रा
रुक्मणि का वो अकेला मंदिर
कितनी यादें कितनी बातें
सोमनाथ का मंदिर भी
भव्य विशाल और रोचक
पर मन की प्यास
खींच ले गई भालका स्थल
कृष्ण ने जहाँ थे प्राण तजे
सघन उस वृक्ष के नीचे
पर सब जगह स्मारक ही दिखे
मूर्तियों में टूंढा किए हम तुम्हें
जगह जगह और इधर उधर
पर ना वो कृष्ण, ना वो राधा
ना ही मीरा ही दिखी कहीं पर
बेचैन मन बावरा ढूँढै
अंतस में छुपा सांवरिया…


मधुर हैं अति मधुर
————-
सबके अपने अपने कृष्ण,
सबकी अपनी अपनी राधा
बंसीबट का वह तट
जमुना जी का बहता
हरित श्यामल नीर सुहाना
मधुर कृष्ण की बांसुरी
मधुर कृष्ण की राधारानी
इनसे भी अधिक मधुर पर
है तुम्हारी प्रीत की रीत पुरानी
मधुर मुस्कान सजी होठों पर
बिजुरी सा चंचल भृकुटि विलास
युद्ध भूमि में या प्रेम पाश में
थिरकते पग नूपुर
कालिया मर्दन पर जमुन जल पर
मधुर लगे हौले हौले डोलता पीतांबर
गोपी ग्वालों संग नटखट का हास परिहास
और मां के हाथों तुरंत खंबे भी बंध जाना
मोर मुकुट नीचे वह चंचल चितवन
शरद चांदनी में गोपियों संग रास
मधुर मधुर अति मधुर है
तुम्हारी हर क्रीडा प्रेम रस से पूर्ण
बाल कृष्ण की लीला हो या
युद्धभूमि में गीता का ज्ञान
मधुर आज भी हर रूप तुम्हारा
हर अदा पर हम बलिहारी
हे मोरपंख धारी, नवनीत के रसिया
मधुर सदा है शरण तुम्हारी।

रूप अनूप
———
अधर बांसुरी
अराधिका राधिका
अंतस में जो…
कृष्ण तुम्हारे ये रूप अनूप
सदा ही आनंद स्वरूप।
-शैल अग्रवाल

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