चांद परियाँ और तितलीः सितंबर अक्तूबर 2020

वीर क्षत्राणी पन्ना धाई
देशप्रेम की कहानियां शौर्य और ओज से भरी होती हैं और हमारे देश के इतिहास में कई ऐसी अविस्मरणीय कहानियाँ हैं। बच्चों आज हम एक ऐसी वीर मां की कहानी सुनेंगे जिसके त्याग और बलिदान की करुण गाथा आज भी बेमिसाल है।

चित्तौड़ के महाराज संग्राम सिंह बाबर के हमलों से देश को बचाते हुए वीरगति को प्राप्त कर चुके थे और उनके भाई युवराज उदय की हत्या करके राजसिंहासन को हड़पना चाहते थे परन्तु उनकी धाई पन्नादेवी ऐसी क्षत्राणी थी जो कर्तव्य और देशप्रेम की खातिर अपना सर्वस्व न्योछावर करने की हिम्मत रखती थीं। नंगी तलवार लिए जब दुष्ट बनवीर के सिपाहियों को उन्होंने आते देखा, तो बुद्धिमती और हिम्मती पन्नाबाई को उसके काले इरादे भांपते देर न लगी। तुरंत ही उसने अपने हमउम्र सोते बेटे को राजकुमार के कपड़े और जेवर पहनाए और राजकुमार के बिस्तर पर लिटा दिया और अपने बेटे के कपड़े पहनाकर माली के साथ राजकुमार उदय को वहां से दूर सुरक्षित स्थान पर पहुंचवा दिया, यह जानते हुए भी कि उसके पुत्र की उसकी आंखों के आगे अगले कुछ ही पलों में हत्या कर दी जाएगी और बचाना तो दूर, वह एक छोटी-सी सिसकी तक नहीं ले पाएगी। पाषाणवत् उसने बहुत धैर्य और शौर्य के साथ कर्तव्य पर अपने पुत्र की बलि दे दी।

इस तरह से राजकुमार उदय को पन्ना धाई ने अपना सबकुछ कुर्बान करके बचा लिया और मेवाड़ की साख को भी।

राजकुमार उदय बड़े होकर न सिर्फ एक वीर योद्धा हुए, उन्होंने चाचा से अपना खोया राजपाट वापिस लिया और मेवाड़ की शान को अपनी सूझबूझ और शौर्य से दुगना चौगुना कर दिया। यही नहीं, खूबसूरत शहर उदयपुर को बसाकर पूरे देश को एक नायाब तोहफा भी दिया।
शैल अग्रवाल

***

वीर तुम बढ़े चलो

वीर तुम बढ़े चलो ! धीर तुम बढ़े चलो !

हाथ में ध्वजा रहे बाल दल सजा रहे
ध्वज कभी झुके नहीं दल कभी रुके नहीं
वीर तुम बढ़े चलो ! धीर तुम बढ़े चलो !

सामने पहाड़ हो सिंह की दहाड़ हो
तुम निडर डरो नहीं तुम निडर डटो वहीं
वीर तुम बढ़े चलो ! धीर तुम बढ़े चलो !

प्रात हो कि रात हो संग हो न साथ हो
सूर्य से बढ़े चलो चन्द्र से बढ़े चलो
वीर तुम बढ़े चलो ! धीर तुम बढ़े चलो !

एक ध्वज लिये हुए एक प्रण किये हुए
मातृ भूमि के लिये पितृ भूमि के लिये
वीर तुम बढ़े चलो ! धीर तुम बढ़े चलो !

अन्न भूमि में भरा वारि भूमि में भरा
यत्न कर निकाल लो रत्न भर निकाल लो
वीर तुम बढ़े चलो ! धीर तुम बढ़े चलो !

-द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी