चांद परियाँ और तितलीः महामना मालवीय, बालगीत-द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी

युगपुरुष महामना मदन मोहन मालवीय

भारत की पावन धरती पर अनेक महापुरुषों ने जन्म लिया है। इन्ही महापुरुषों में एक थे पं. मदन मोहन मालवीय।
मालवीय जी के पूर्वज मालवा के निवासी थे, जो उत्तर प्रदेश के प्रयाग नगर में आकर बस गए थे।
इनके पिता पं. ब्रजनाथ मालवीय अपनी विद्वत्ता एवं मृदुभाषिता के लिए प्रसिद्ध थे। इन्ही गुणों के
कारण उन्हें राजा-महाराजाओ के यहाँ भी आदर प्राप्त था। इसी साधारण किंतु सम्मानित परिवार में 25 दिसंबर1861 को मदन मोहन मालवीय का जन्म हुआ। पिता के आचार-विचार और पाण्डित्य का प्रभाव बालक मदन मोहन पर पड़ा। बाल्यावस्था से ही वे संयमी एवं उदार थे। उनका हृदय अत्यंत निर्मल था। साधारण शिक्षा प्राप्त कर वे आरंभ में शिक्षक बने, किंतु उनकी प्रतिभा से प्रभावित होकर मित्रों ने उन्हें कानून पढ़ने की सलाह दी।

कानून की परीक्षा पास कर मालवीयजी प्रयाग के उच्च न्यायालय में वकालत करने लगे। यद्यपि वे बड़े प्रतिभावान वकील थे, तथापि उन्हें वकीलों के दांवपेच में रुचि नहीं थी। वकालत से देश-सेवा के कार्य में बाधा पड़ रही थी। अतः समय की पुकार पर उन्होंने वकालत छोड़कर भारत माँ की सेवा का व्रत लिया।

उस समय पराधीनता की नींद में सोया भारत अँगड़ाई लेने लगा था। देश की जनता में स्वतंत्रता की भावना जागृत हो चुकी थी। मालवीयजी का युवा हृदय भी उससे अछूता न रह सका। वे भी स्वतंत्रता के आंदोलन में कूद पड़े। सन् 1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का दूसरा अधिवेशन मद्रास में हुआ। उस अधिवेशन में उनका ओजस्वी भाषण सुनकर लोग चकित रह गये।

सभा में एक से एक प्रसिद्ध वक्ता उपस्थित थे। मालवीय जी ने अपनी विद्वता तथा मधुर वाणी से सारी सभा को मंत्रमुग्ध कर दिया। उनकी प्रतिभा में उत्तरोत्तर निखार आता गया। कहते हैं उन दिनों इनके समान हिंदी, संस्कृत और अंग्रेजी का प्रभावशाली वक्ता कोई दूसरा न था।

मालवीयजी समाज में फैले अशिक्षा के अंधकार से बहुत चिंतित थे। वे भलीभांति जानते थे कि समाज की अनेक बुराइयों का कारण शिक्षा का अभाव ही है। अतएव उन्होंने काशी में विश्वविद्यालय की स्थापना की। वाराणसी नगर में स्थापित ‘ काशी हिन्दू विश्वविद्यालय ‘ मालवीय जी के साहस और संकल्प, परिश्रम और त्याग का प्रतीक है। इस विश्वविद्यालय की कीर्ति-पताका भारत में ही नहीं, संपूर्ण विश्व में फहर रही है। यहाँ विश्व की प्रायः समस्त विधाओं का पठन-पाठन होता है। देश और विदेश के सहस्त्रों युवक और युवतियाँ उच्च शिक्षा प्राप्त कर प्रति वर्ष यहाँ से निकलते हैं।

विश्वविद्यालय के प्रवेश द्वार पर ही मालवीय जी की विशाल प्रतिमा स्थापित है। मुख्य द्वार से प्रवेश करते ही विश्वविद्यालय की शोभा मन को मुग्ध कर देती है। वहाँ की सड़कें सीधी और समतल हैं। दोनों किनारों पर छायादार वृक्षों की पंक्तियां हैं, रंग-बिरंगे फूलों की महकती क्यारियां हैं। विश्वविद्यालय में अनेक ध्वज और विशाल भवन हैं जिनके शिखर-कलश ध्वज से सुशोभित हैं। इन सबको देखकर लगता है कि हम किसी नए संसार में प्रवेश कर रहे हैं।

आजादी की लड़ाई में मालवीय जी सदैव आगे रहे। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के वे कई बार सभापति बनाए गए। उन्होंने अपनी सूझ-बूझ से देश को सदैव सही रास्ता दिखाया। विद्यार्थी समाज से उन्हें विशेष प्रेम था। वे विद्यार्थियों को व्यायाम, संयम तथा देश-सेवा का उपदेश दिया करते थे। बालिकाओं की शिक्षा के वे बहुत बड़े समर्थक थे। उनके हृदय में मातृभाषा हिन्दी के प्रति अगाध प्रेम था।

पं. मदन मोहन मालवीय, समाजसेवा की भावना तथा उदारता के कारण ही महामना कहलाए। उनका जीवन एक तपस्वी का जीवन था। मानव के प्रति उनके हृदय में आदर था। वे सच्चे मानव, सच्चे देशभक्त और सच्चे महापुरुष थे। गांधीजी ने उनके विषय में कहा था- ” मैं तो मालवीय जी का पुजारी हूँ। यौवनकाल से आजतक उनकी देशभक्ति का प्रवाह अविच्छिन्न है। उन्हे मैं सर्वश्रेष्ठ हिन्दू मानता हूँ। वे आचार में नियमित और विचारों में बड़े उदार हैं। वे किसी से द्वेष कर ही नहीं सकते। उनके विशाल हृदय में शत्रु भी समा सकते हैं।”

12 नवंबर, 1945 को भारत के आकाश का यह उज्ज्वल नक्षत्र अस्त हो गया; परन्चु उनकी अमर कीर्ति आज भी दिग्-दिगंत को आलोकित कर रही है।

साभार ज्ञान भारती


हम सब सुमन एक उपवन के

हम सब सुमन एक उपवन के,
एक हमारी धरती सबकी
जिसकी मिट्टी में जन्मे हम,
मिली एक ही धूप हमें है
सींचे गए एक जल से हम।

पले हुए हैं झूल-झूल कर
पलनों में हम एक पवन के।।

रंग रंग के रूप हमारे
अलग-अलग हैं क्यारी-क्यारी,
लेकिन हम सबसे मिलकर ही
इस उपवन की शोभा सारी।

एक हमारा माली हम सब
रहते नीचे एक गगन के।।

सूरज एक हमारा, जिसकी
किरणें उसकी कली खिलातीं,
एक हमारा चांद चांदनी
जिसकी हम सब को नहलाती।

मिले एक-से स्वर हमको हैं,
भ्रमरों के मीठे गुंजन के।।

काँटों में मिलकर हम सबने
हँस हँस कर है जीना सीखा,
एक सूत्र में बँधकर हमने
हार गले का बनना सीखा।

सबके लिए सुगंध हमारी,
हम श्रृंगार धनी-निर्धन के।।

-द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी

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