चांद परियाँ और तितलीः चार बाल कविताएँ


सूरज दादा
सुबह सुबह आ जाते हैं
हमको रोज जगाते हैं
मेरे प्यारे सूरज दादा।

बाग में खिल जाते फूल
उनके ही आ जाने से
करते हैं पंछी स्वागत
उनका मीठे गाने से
मन्दिर के प्रांगण में वे
शंख-धन्टियां बजवाते
मेरे प्यारे सूरज दादा।

सरदी, गरमी, बारिश हो
रोज उन्हें तो आना है
नदियां, पर्वत, हरी दूब
धरती को सहलाना है
खामोशी से काज करे
सबका सलाम पा जाते
मेरे प्यारे सूरज दादा।

अपनी ड्यूटी के पक्के
नहीं कभी छुट्टी करते
जग में प्राण भरे निरंतर
केवल खुद रहते जलते
बिना थके चलते रहते
मोल समय का समझाते
मेरे प्यारे सूरज दादा।

चन्दा मामा

चन्दा मामा चन्दा मामा
अब ना करना कोई बहाना
आज जन्मदिन मेरा आया
मेरे घर तुमको है आना।

मुझ से कभी न मिलने आते
केवल अपनी शक्ल दिखाते
छोटे कभी बङे हो जाते
जादू कैसे यह कर पाते
तेरी सूरत मुझे दिखाकर
मम्मी रोज खिलाती खाना
चन्दा मामा चन्दा मामा
अब ना करना कोई बहाना।

आसमान में खेल रहे तुम
तारों के संग आॉंख मिचोली
कभी ना आते उनके हाथ
चढ़ जाते बादल की डोली
बुढ़िया बैठी इक कोने में
बुनती है क्या ताना बाना
चन्दा मामा चन्दा मामा
अब ना करना कोई बहाना।

कभी बहुत ही दूर लगे तुम
कभी पास लगते मुझको
कितनी बार पुकारा मैनें
याद नहीं आती तुझको
सभी दोस्त मिलने को आतुर
अबकी बार पङेगा आना
चन्दा मामा चन्दा मामा
अब ना करना कोई बहाना।

अपना केक तभी काटूंगा
जब मामाजी तुम आओगे
मम्मी से कहकर बनवा लूं
बोलो क्या क्या खाओगे
भले गिफ्ट कोई मत लाना
केवल जल्दी आ जाना
चन्दा मामा चन्दा मामा
अब ना करना कोई बहाना।

डॉ पूनम गुजरानी
9 ए मेघ सर्मन 1 सीटी लाइट सूरत 395007

मो. 9825473857

मेंढ़क दफ्तर कैसे जाए

सूट पहनकर,बूट पहनकर,
और लगाकर टाई।
जाना था दफ्तर, मेंढ़क ने,
अपनी बाईक उठाई।
किक पर कूदा उचक उचककर,
पूरा जोर लगाया।
पर बेचारा मेंढ़क बाईक,
चालू न कर पाया।
अब तो था लाचार पहुँच वह,
कैसे दफ्तर पाए।
टर्राने के सिवाय उसे अब,
कुछ भी समझ न आये।
प्रभुदयाल श्रीवास्तव

सुबह के अखवार में

क्या- क्या छपा,लिखा क्या- क्या है,
सुबह के अखबार में।
एक राह चलती महिला का,
छीना हार झपट्टे से।
स्कूटी से जाती लड़की,
फँस कर गिरी दुपट्टे से।
कुत्ता मरा एक मंत्री का,
जूड़ी ताप बुखार में।
शाला की बस गिरी खाई में,
बच्चे दबकर मर गए बीस।
पिटी एक बच्ची टीचर से,
चुका न जो पाई थी फीस।
चाँदी चढ़ गई सोना लुढ़का,
रंगों के त्यौहार में।
मुनियाँ यह सब पढ़ती है तो,
उसे अजूबा लगता है।
रोज- रोज अखवारों में क्यों,
उल्टा सीधा छपता है।
क्या सचमुच में ऐसा होता,
होगा इस संसार में !

प्रभुदयाल श्रीवास्तव

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