कहानी समकालीनः विकल्प-शैल अग्रवाल


जिन्दगी हमें कई विकल्प तो देती है, पर जीना इसी की शर्तों पर है। एक निर्धारित नियति और निर्धारित समय से सब चलता है। आगे या पीछे कुछ नहीं। फिर ये सच और झूठ भी तो कभी हमारे अपने नहीं। एक का सच दूसरे का झूठ हो सकता है और दूसरे का सच-झूठ तो जान पाना ही असंभव है, जैसे कि वे सपने। खैर… छोड़ें इन बातों को।
मेरी लाख कोशिशों के बावजूद भी वह महल और उसके कंगूरेदार छज्जे—बारबार दिखते थे। स्पष्ट नहीं, धुंधले-से और हवा में तैरते हुए। लाख भूलने की कोशिश करता , जबर्दस्ती जग तक जाता उन बेकल रातों में, फिर भी भटकता ही रहता मन, बड़े-से उस भुतहे बगीचे में…एक भूल भुलैया में।
कमल और काई से भरा तलाब और शिव जी का वह पुराना मंदिर और बाहर खड़ी काली की आदमकद प्रतिमा …फिर अचानक ही तेज पीली रौशनी का चटक घूप-सा वहाँ फैल जाना और बदलते उस दृश्य के साथ ही पेड़ से लतर-सी लटकी और झूलती वे लाशें, धू-धू करती चितायें- एक नहीं कई-कई। धूल उड़ते मैदान में सैकडों असह्य बेचैन पुकारें… उजाड़ और सांय-सांय करती चिलकती लू-सी ही उग्र और तीव्र। क्रुद्ध रणचंडी मानो खुद खून भरा खप्पर लिए घूमने लग जाती।
बिलखते-सुबकते वे बच्चे मांओं से लिभड़े हुए और स्तब्ध माँयें भी तो खुद भी पाषाण प्रतिमा-सी-ही निर्जीव, सूनी दृष्टि से आकाश को निहारतीं- पता नहीं प्रार्थना करती हुई या फिर शिकायत। गांव या शहर है- मेरा इससे क्या संबंध है कुछ भी तो नहीं जान पाता था मैं ? बस, बारबार देखते रहने की वजह से जाना-पहचाना अवश्य लगने लगा था। सपना जो धीरे-धीरे कहानी-सा खुलने को तत्पर जान पड़ता, परन्तु जाने किस रहस्य के रहते खुल ही नहीं पाता था कभी। अगले पल ही सब गडमड और गायब भी हो जाता। मानो कुछ कहना चाहते हों वे क्रमबद्ध दृश्य , पर किसी दवाब या योजना के तहत कह नहीं पा रहे हों और उन अधूरी ख्वाइशों की जिम्मेदारी मुझ पर हो…बेचैनी इतनी कि मानो था मैं भी वहाँ पर, जब वह सब घट रहा था। मात्र साक्षी ही नहीं, भुक्तभोगी था मैं भी। आज भी तो देखते ही घुटन होने लगती है, उस पाषाणवत् जलती असह्य बेचैनी में… मैं एक बेबस और साधारण-सा व्यक्ति, होकर भी तो नहीं हेो पाता था वहाँ उस घटना में। कोई मदद नहीं कर पाता था, ना तो अपनी और ना ही किसी और की। कायर नहीं हूँ, पर शामिल ही नहीं हो पाता था उनके उस समय-काल में।
कोई स्पष्ट संदेश भी तो नहीं, बस ढ़ूँढ़ते और देखते रहो यूँ ही घंटों खोए-खोए और व्यग्र जो जी चाहे, और जबतक जी चाहे! मानो बस एक रंगो और भावों का बिखरा कोलाज हो पूरा करने को…एक आधुनिक तस्बीर हो जिसमें रंग और भाव सबकुछ खुद ही तो ढूँढने थे । चाहने न चाहने का तो विकल्प ही नहीं था मेरे पास! मेरी आत्मा दिनरात बेचान रहती उस बोझ का कर्ज उतारने के लिए। वैसे भी यह विकल्प शब्द जितना सहारा देता है, उतना भटकाता भी है। परन्तु अब जब गोताखोर गोता लगा ही चुका है, तो तल तक जाने के सिवाय और कोई चारा भी तो नहीं!
वो भी आ जाती हैं कभी-कभी उस सपने में। बोलता तो कोई कुछ नहीं, बस वही जाना पहचाना आत्मीयता का अहसास चारो तरफ फैल जाता है। मानो खूब परखा-बरता हो मैंने उन्हें। और देखते ही तुरंत पहचान भी जाता हूँ। उनकी उपस्थिति का वह अहसास ही काफी है हम दोनों के होठों पर आ बैठी उस करुण मुस्कान के लिए । चेहरे ही नहीं, कपड़ों की एक-एक सिलवट तक जानी-पहचानी है । अक्सर ही आने लगी थीं इधर कुछ दिनों से तो अपनी महारानियों-सी सजधज लिए। उसी महल के अंदर बैठी, भटकती और भटकाती रहतीं। और तब उनके आते ही एक पुराने और फीके पड़ते तैल चित्र की तरह ही एक अनकही सी उदासी भी तैरने लग जाती हवा में । एक विवशता को सदा ही ओढ़े रहती हैंं वह, बिल्कुल अपनी उसी परिचित और रहस्यमय मुस्कान की तरह ही। जाने कितने जन्मों का बोझ है आत्मा पर जो साझा करना चाहती थीं मुझसे, परन्तु कर नहीं पा रहीं- यह भी भलीभांति जान चुका था मैं ।
अक्सर मन चीत्कारता – यदि अपना मानती हैं, तो एकबार साझा करके तो देखें। मैं अवश्य सामर्थानुसार आपका अधूरा काम या उद्देश्य पूरा करने की कोशिश करूँगा । परन्तु कोई जबाल न मिलता। वैसे ही उदास आँखों से देखती रह जातीं। और फिर पल में ही दूर होते धुंए-सी दूर भी चली जातीं और मैं घंटों बैठा अकेला-अकेला ही पीछे छूटी उन गुत्थियों को सुलझाता रहता – क्या है यह सपना- पिछले जनम की कोई याद, या फिर मन और मस्तिष्क का एक मज़ाक मेरे साथ! जितना सोचता, उतना ही उलझता चला जाता उन रहस्यों में। संग्रहालय में उपस्थित विषय पर सारी किताबें उलट डाली थीं, परन्तु कहीं कोई सुराख तक हाथ नहीं लगा था ।…
दीवान पर बैठी चुपचाप पंखा झलती और एकटक मुझे ही देखती रहतीं, मानो कुछ कहना और बताना चाहती थीं, परन्तु मैं सुन नहीं पा रहा था, जुड़ नहीं पा रहा था। कभी-कभी तो खड़ी होकर संग आने का इशारा भी करने लगतीं, परन्तु मैं ही ठिठक जाता । डर जाता था शायद उस स्वप्न की दिव्यता और गूढ़ता से ! परन्तु यदि मुक्ति चाहिए थी इस उलझन से, तो समझना ही होगा, जुड़ना ही होगा ।
कल तो उनका पूरा चेहरा तक साफ-साफ दिखा था -कोमल गुलाब-सा, परन्तु कांटों सी बेंधती सजल आंखों की वह याचना घंटों मन बीधती रह गई थी। बस में होता तो मिनटों में जा पहुंचता उनके उस संसार में और आमने-सामने बैठकर सारी बातें कर लेता …दुख मिटा नहीं पाता ,तो भी सांत्वना देकर थोड़ी बहुत पीड़ा तो कम कर ही सकता था। परन्तु मेरी तो उनतक पहुँच ही नहीं, फिर कैसे संभव हो यह? जहाँ वह पहुँच चुकी थीं, वहाँ से लौटना , मिलना संभव ही नहीं, फिर इन असंभव बातों को सोचने का भी क्या अर्थ? क्यों इतनी अपनी-सी लगती हैं वह, उनकी कही-अनकही हर बात बेहद जानी-पहचानी!

माँ बताती हैं, नानी मेरे पैदा होने के सत्रह साल पहले ही गुजर चुकी थीं, आखिर क्या चाहती हैं अब यह इतने वर्ष बाद? फिर यह कैसे मैंने मान लिया कि सपने में नानी ही आती हैं, मात्र एक उर्वर कल्पना की उपज नहीं है यह सब। जरूरी तो नहीं कि सपने सच की परछांई ही हों! कल्पना की कूंची कितने भी नए-नए रंग से बदलना चाहे, फिर भी सच तो सच ही रहता है। अनर्गल तर्कों से इसे झुठलाया तो नहां जा सकता… कुछ बातें कही नहीं जातीं बस महसूस की जाती हैं, मान ली जाती हैं । बुद्धि से नहीं, आत्मा से- मानो मैं खुद ही खुद को ही समझाने का निरर्थक प्रयास करता और वह सपना दृश्य-ब-दृश्य स्मृति को वैसे ही घटाघोप किए रहता।
चालीस के आसपास की उम्र और उम्र की धूप में तपा कांसे-सा दमकता उनका रंग। राजसी चेहरा, माथे पर बोल्ला और सिंदूर की बडी-सी बिन्दी, और इस सबके साथ उदास आँखों में खिंची गहरी काजल की लकीर, हर दर्द को समेटे हुए…अधिक देख पाऊं, कुछ पूछ पाऊं कि तुरंत ही जग भी गया मैं। बस एक आवाज गूंज रही थी , जगने के बाद भी- हवा के भँवरों-सी बेचैन और तप्त।
कभी-कभी तो मां की आवाज तक में बदल जाती है वह आवाज, याद दिलाती-सी कि मेरी तो उनसे कभी बात ही नहीं हुई, जो भी सुना, बस माँ से ही तो सुना है। पर अब मुझे लगता कि वह मुझे सबकुछ खुद ही बताना चाहती थीं-
‘ छतरानियों की तरह जौहर करने की हिम्मत नहीं थी मेरी । नन्हे बच्चों ने पल्लू पकड़ लिया। तेरी माँ तो पेट में ही थी , फिर जान कैसे ले लेती , कैसे दे देती ?… उमर भर एक चिता में ही तो जली हूँ, पर। अब तू …’
और फिर सब गायब। बस अधूरा ‘अब तू…’ कानों में गूंज रह था।
बोलता कोई कुछ नहीं था, परन्तु में उनकी हर बात साफ-साफ समझता था। शायद माँ सा ही लगाव हो चला था मुझे उनसे भी या फिर शायद आत्माओं से ऐसे ही बातें होती हैं-अधूरी और अस्पष्ट। फिर बहक रहा हूँ मैं। सच्चाई तो यह है कि मां की सुनाई वह कहानी बचपन से ही सपनों का रूप ले चुकी है स्मृतियों में। सपनों की यही तो प्रकृति है, यही तो चलन है इनका।
अंधविश्वासी नहीं हूँ। ना ही इन बातों में विश्वास ही करता हूँ। बीमार भी नहीं। छलते हैं सपने, जैसे छलती है जिन्दगी। इंतजार रहेगा मुझे इस फिल्म की अगली रील का। पर सपने मन-माफिक रुक-रुककर तो नहीं देखे जा सकते, जैसे कि एक फिल्म देखी जा सकती है, सी.डी. या यू ट्यूब पर। अब तो स्मार्ट टीवी भी है। चाहे जो सहेज लो, चाहे जो मिटा दो। कभी-कभी मन करता है मिटा दूँ सबकुछ. इस सपने को भी जो पिछले पच्चीस साल से परेशान कर रहा है मुझे। जानता हूँ भलीभांति कि मेरे पास यह विकल्प नहीं।
काश् जिन्दगी भी इतनी स्मार्ट होती । कम-से-कम हम हिन्दुस्तानी ही थोड़े स्मार्ट रहे होते। सुनते हैं पूरा-का-पूरा गांव साफ कर दिया गया था एक ही दिन में- पुरुष विहीन, युवा विहीन। बस चारो तरफ औरतें और बच्चे ही , अभिशप्त और अकेले।
‘ गांव में 18 से तीस उम्र के हर मर्द ने झंडे उठा लिए थे, प्रण ले लिया था कि क्रूर विदेशियों को तो देश के बाहर ही खदेड़ कर मानेंगे- मेहनत करें हम, धरती हमारी , हमारे पूर्वजों की और फल खायें ये फिरंगी। मौज करें सात समंदर पार से आए!
कैसे इतनी बड़ी बगावत होने देते पर फिरंगी ! ऐसी आग भड़की कि फिर तो बस…’ और बोलते-बोलते माँ चुप हो जाती थीं ।
मैं पूछता ही रह जाता- ‘ बताओ ना कैसी आग, क्या हुआ था , माँ?’
पर कोई जबाव नहीं मिलता। सूनी आंखों के संग खुद में ही खोई रह जातीं माँ – ‘ मुझे क्या पता मैं तो थी ही नहीं । तीन महीने बाद पैदा हुई हूँ इस घटना के। ‘
कई बार सुनाई थी माँ ने यह आधी-अधूरी कहानी और कड़ी हमेशा उसी एक बिन्दु पर आकर टूट भी जाती । मानो वक्त ही नहीं, एक ऐंठी रस्सी सा गल चुका था उनके मन में भी सबकुछ। ताकत ही नहीं बची थी जुबान में बारबार सुनी-सुनाई कहानी को दोहराने की। या फिर यह भी एक सच ही था कि बचाना चाहती थीं माँ मुझे नफरत की उस काली परछाइयों से। इंगलैंड जो भेजना था । वहीं पर कैमिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करनी थी और गांव में सबसे बड़ी फैक्टरी लगानी थी। ताकि गांव का पुराना गौरव, सुख समृद्धि वापस लौट सके। सैकड़ों बेकार युवाओं को रोजगार मिल सके। औध्योगीकरण के इस नए युग में उद्योग और स्वावलंबन ही तो नई स्वतंत्रता है। सुख समृद्धि के रास्ते हैं।
भविष्य के सपने देखती, मां आंखें पोंछ, काम में लग जातीं। मेरे बड़े होने का इंतजार करतीं। मैं भी तो जिद नहीं करता था उनसे उस अधूरी कहानी को पूरा करने के लिए । तप्त संवेदनाओं ने उम्र से पहले ही बड़ा कर दिया था मुझे। बहुत प्यार करता हूँ माँ से मैं और अपने प्रश्नों से उनके दुख को कुरेदना मेरे लिए कभी भी आसान नहीं रहा।
हाँ, एक दिन अपने आप ही इतना जरूर बोली थीं –‘जैसे तू छोटे से ही दूध के लिए कभी नहीं रोया, चार-चार घंटे सबर से सोता रहता था, मैं भी नहीं रोती थी। पर मुझे तो मेरी मां अफीम खिला देती थी ताकि रोऊँ न, मिलने जुलने वाली आती रहती थीं लगातार हालचाल लेने। तेइस बरस की ही तो थी नानी, जब तेरे नाना छोड़ गए थे हमें अनाथ करके। तीन बरस के भइया और दो बरस की रक्षा दीदी और ऊपर से नवजात मैं – अभागी और अनचाहे बोझ-सी उनपर।‘
उनकी आवाज के दर्द से कटता मैं हर बात बड़े ध्यान से सुनता था। इतने ध्यान से कि आज तक कुछ नहीं भूल पाया हूँ, एक-एक शब्द हृदय में धंसा पड़ा है।
‘ तू ही बता-तीन-तीन बच्चों से घिरी कैसे निपटती,मुझे अफीम न खिलातीं तो, ऐसे समझौते न करतीं तो? खूब समझती हूँ मैं उनका दर्द। सब कुछ था घर में सिवाय एक मर्द के। कोई मेरे गोविंद को जलेबी खिला लाओ। ए जरा कोई बाहर घुमा लाओ। घर में बैठा-बैठा घुल गया है- बस ऐसे ही गुहारें लगाती रह जाती थीं। इन छोटे-छोटे कामों के एवज अक्सर तुरंत ही अंटी से अशर्फी निकालकर भी दे देती थीं सामने वाले को। फिर तो जाने किसकी नजर लगी। ऊंटों पर लाद-लादकर ले गए सब कुछ। तिजोरी-तहखाने सभी खाली कर दिए। डकैत नहीं, कुनबे के और खानदानी ही थे , जो आधी रात में मुंह पर फेंटा मारकर आए थे उस दिन । अम्मा ने पहचान भी लिया था पर बोलीं कुछ नही थीं । अकेली विधवा और न्याने बालक… सामने पहाण-सी जिन्दगी, मुंह खोलतीं भी तो किसके भरोसे ! संतोष कर लिया था यह कह और मानकर कि सामान तो फिर से आ जाएगा , बना लेंगे बच्चे बहुतेरा, अगर जीते रहे तो, किस्मत में हुआ तो।… अनाज की कोठरी में छुपी टुकुक-टुकुर बस देखती रही थीं अम्मा खुद को रीता होते , उस रात।
जाने किसी की दया थी या वे ही नहीं चाहते थे कि अम्मा और हम तीनों को कोई नुकसान नहीं पहुँचाया। बस घर में अनाज पानी के अलावा कुछ भी नहीं छोड़ा था लुटेरों ने। धन-माया कुछ भी नहीं, जिसके सहारे जिन्दगी थोड़ी बहुत आराम से कट सकती थी, हम अनाथों की।
ये वो लोग थे जो आजादी के बाद भी यही कहते सुने जाते थे कि रानी विक्टोरिया के राज में जो बात थी , वो अब कहाँ- जिन्हें अंग्रेज जाते-जाते राय बहादुर और राय साहब जैसे खिताबों से नवाज गए थे। सत्ता सौंप गए थे। आजादी के बाद ये ही तो जज , कलक्टर और मंत्री बने थे, बिलायत पढ़ने गए थे।
भइया तो बस गांव में ही आठवीं तक पढ़े। पूरे गांव में बहुत इज्जत थी पर मेरे भैया की और मन उससे भी बड़ा। कोई कसर नहीं छोड़ी दूसरों की मदद में। शरीर के कपड़े तक उतारकर दे देते थे , दूसरे की तकलीफ में। नम्बरदार बनते ही खानदानी हवेली तक पंचायत को दे दी। सयानों ने समझाया तो बोले- बाबा सपने में आए थे और कह रहे थे कि तेरी गुजर तो बगल के छोटे घर में भी आराम से हो जाएगी। गांव को सुधार। हमारे बलिदान को व्यर्थ मत जाने दे, बेटा। सोचती हूँ, उन्हें तो पर बाप की शकल तक याद नहीं। छोटे ही तो थे जब अनाथ हुए थे, फिर बाबा उनके सपने में कैसे आते थे ? बातें कैसे करते थे ? मन के ही तो निर्देश और संदेश हैं ये सारे ! ‘
बोलते-बोलते माँ रुलाई रोकने की कोशिश करने लग जातीं और फिर पल्लू से आंसू पोंछ पत्थर की हो जातीं।
स्पष्ट तो कभी कुछ नहीं बताया, बस उस आधे-अधूरे अफसाने के एकाध बोल ही कभी-कभार आ पाते थे उनके भिंचे होठों से बाहर। मेरी आत्मा में रिसता उनकी आवाज का वह गीलापन आज भी मन में भावों की दलदल करने की सामर्थ रखता है। उस जिगसौ के खोए टुकड़ों को ही तो आजतक ढूंढ रहा हूँ मैं । उस बिखरी तस्बीर को पूरा करने के लिए ही तो भटक रहा हूँ। पांच वर्ष का भले ही खेल-कूद में भूल जाता था , पर अब पच्चीस का होकर कुछ भी भूल पाना संभव नहीं है मेरे लिए ।
जबसे इंगलैंड पढ़ने आया हूँ, ( मां ने ही जिद करके भेजा है) एक बार फिर उन सपनों ने मेरी रातों की नींद हराम कर दी है। सपने जो श्रंखला-बद्ध होकर बचपन से ही आते रहे हैं, नई इस जमीन पर और भी उर्वर हो गए। मानो एक नई उर्मा मिल गई हो उन्हे, मानो एक किताब पढ़कर रख दी गई हो , और अगली रात अगले पन्ने से, वही से वह कहानी फिर से शुरु करने को बाध्य था मैं। परन्तु यह तो समझकर भी समझ में न आने वाली बात है। ये परछाँइयों , इन मूक आवाजों ने भरी नींद से कई रात पसीने-पसीने उठाया है। हाथ-पैर ठंडे और गला खुश्क कर डाला है, बिना बताए ही कि क्यों चुना गया है मुझे ही?

जाना ही पड़ेगा नानी के गांव , उस किले में जहाँ तीन सौ लोगों को एक साथ फांसी दी गई थी। सुनते हैं कोई नहीं जाता अब वहाँ पर। अभिशप्त और उपेक्षित खड़ा है वह गिरता ढहता खंडहर तभी से। अपराध बस इतना ही तो था कि महारानी विक्टोरिया के दूत और उसके वायसराय, साथ में उनके पिठ्ठू, कायर राजा के खिलाफ बगावत कर दी थी गांव के मुठ्ठी भर साहसी नौजवानों ने। सुनते हैं कि तेईस वर्षीय युवा नाना ही अगुआ थे । राजा ने तो अपनी पगड़ी तक उतार कर पैरों में रख दी थी और औरत, मर्द, बच्चे सभी, गली-गली भारत छोड़ो का नाता लगाते निकल पड़े थे पीछे-पीछे। समझ सकता हूँ, बात जब अपनों पर हो, देश की अस्मिता पर हो तो भला चुप भी कोई कैसे बैठ पाता !
अभी भी तो कुछ नहीं बदला। लड़ाई आज भी जारी है , यह बात दूसरी है कि संघर्ष और खतरे दोनों ही अब कुछ अलग हैं -जैसे भृष्टाचार, गरीबी और इन सबसे बढ़कर पड़ोसियों द्वारा परोसा आतंक। लड़ने वाले लड़ रहे हैं। जान दे रहे हैं। टेलिविजन पर खबर चल रही है-हैलिकौप्टर क्रैश हो गया है। 14 देश के वीर जवान , और उच्च अधिकारी जिनमें कमांडर जनरल रावत भी थे, बवजह ही काल के गाल में जा पहुँचे हैं। बेवजह ही मंसूबे और हवाई किले बनाने से फायदा नहीं। आदमी सोचता कुछ है और होता कुछ है । पता नहीं जिंदगी मुझे भी नानी और उन सैकड़ों अतृप्त आत्माओं के तर्पण का साधन बनाएगी भी या नहीं, और यदि हाँ तो किस रूप में और किस तरह से? कुछ भी तो नहीं जानता, मैं !
कमरा साफ करने वाली पूछे जा रही है- यह कमरा पहले साफ करवाना है या फिर नीचे का हिस्सा ? जबाव देने को आंखें उठीं, तो दंग रह गया हूँ । वही रूप, वही रंग…खुद को चिकोटी काटना चाहता हूँ कि वाकई में जगा हुआ हूँ या अभी भी सपना ही चल रहा है। पहली बार इतने ध्यान से देखा है किसी को और पहली बार ही इतना चकित भी हुआ हूँ। होम हेल्पर है। नई-नई आई है । आना-जाना अब तो लगा ही रहेगा इसका …पर यह सब साफ-सफाई का काम क्या मैं करवा भी पाऊंगा इससे? कमरे और कपड़ों से लेकर खाने-पीने, मेरी हर चीज का ध्यान इसे ही तो रखना है!
द्वंद जब बोझ हो गया, तो खुलकर हंस पड़ता हूँ एकबार फिर… रहस्य थोड़ा-थोड़ा खुलने लगा है अब। अचरज की बात तो यह है कि मेरी नजर में औलीविया का चेहरा ही मानो नानी के चेहरे में बदल चुका है- परन्तु यह कैसे संभव है- वही हरी आंखें, शहतूती बाल और तांबे-सा रंग, वही अपनत्व से भरी बेबस मुस्कान। उम्र भी तो लगभग वही, चालीस के आसपास की ही। लगा, नानी ही औलीविया का रूप लेकर मुझ तक आ पहुंची थीं- जानता हूँ संभला नहीं तो पागल होने में कोई देर नहीं।
यह क्या हो रहा है मुझे ? सद्बुद्धि दो, प्रभु। कहीं इसका भी तो कोई रिश्ता नहीं इस कहानी से, मेरे सपनों से? कहते है हर वह व्यक्ति जो हमारी जान-पहचान की परिधि में आता है, एक पूर्व सुनिश्चित योजना के तहत ही आ पाता है। कोई उद्देश्य तो होता ही है हर बात का। कहाँ फालतू की बातों में उलझ गया हूँ मैं? बकवास है सब, जैसे कि वे सपने… कोरी कल्पना की उपज। एक बार फिर उसी ठंडे अवसाद से बचने के लिए सिर झटक कर उठ खड़ा हुआ हूँ।
‘ नहीं , इसी कमरे से सफाई शुरु कर लें आप। तबतक मैं शावर लेकर आता हूँ। फिर नाश्ता करूँगा।‘ कहकर शावर में बन्द कर लिया है मैंने खुदको, ताकि इस नए इत्तफाक को, मात्र एक इत्तफाक मानकर भूल सकूँ। परन्तु मन तो मानो जिद पर उतर आया है। औलीविया के बारे में सबकुछ जान लेना चाहता हूँ, परन्तु संकोच और संस्कार वश कुछ भी नहीं पूछ पा रहा हूँ नव परिचित, स्पैनिश जिप्सी फार्म वर्कर से। बात आई गई भी हो जाती, अगर हम इन्सान चाहतों का रचा-बुना अद्भुत एक पुतला न होते…और डोरियाँ सारी वह अपने हाथों में संभाले न बैठा रहता।
इंगलैंड में हूँ, परन्तु भारत से दूर नहीं, पल भर को भी नहीं। हर वर्ष ही, हर छुट्टी में पहुँच जाता हूँ। अब एक नई चाह पनपने लगी थी। नानी की कोई फोटो तो होगी उस किले में, क्या वाकई में यही चेहरा है…देखना तो होगा ही जाकर। कैसा लगेगा जब माँ देखेंगी, या फिर यह खुद ही देखेगी हूबहू अपनी ही तस्बीर किसी दीवार पर टंगी …कल्पना नित नई उड़ानें लेने लगी थी।
इसबार क्रिसमस पर जब भारत जाऊँगा तो वह किला तो निश्चित ही। पर क्या बचा होगा उस किले में भी- शायद कुछ भी नहीं जानने और संजोने लायक, सिवाय एक भव्य उजाड़ खंडहर और इधर-उधर लिपटी इतिहास की जिद्दी धूल के…जो मन ही नहीं कभी-कभी तो आत्मा तक को कसैला कर देती है। पर आवेगी मन कब डरा है ! इतिहास के झाड़-झंकार में बारबार ही तो जोश की तलवार लेकर जा खड़ा होता है, खुद को नायक समझता हुआ, नायक मानता।
कुछ नहीं मिला था वहाँ भी तो। बरसों की प्रतीक्षा के बाद लंदन की पार्लियामेंट की वह गैलरी भी देखी थी, जहाँ से भगत सिंह ने वह ऐतिहासिक बम फेंका था जिसकी सजा ने फांसी के फन्दे पर झूले थे। वक्त सारे निशान मिटा देता है। अब कोई याद शेष नहीं। बस तारीखें हैं। इक्के दुक्के याद कर लेते हैं इधर-उधर, बस।
शहीदों की मजार पर …होठ वह शेर खुद-ब-खुद गुनगुनाने लग जाते हैं। तो और करें भी तो क्या करें…वक्त ही हमारी सबसे बड़ी बेबसी भी है और सबसे बड़ी शक्ति भी। जितने बड़े घाव देता है उतनी ही जल्दी सब भुलवा भी देता है एक सशक्त मरहम की तरह ही। लोग कहते हैं कि गांधी चाहते तो बचा सकते थे, परन्तु संधि कर ली थी उन्होंने अंग्रेजों के साथ … वह कोहनूर हीरा आज भी रानी के मुकुट में है और वह राजा रणधीर सिंह की तलवार आज भी टावर हाउस में …जब ऐसे बहादुर कुछ नहीं कर पाये तो मैं क्या कर सकता हूँ? यह इतिहास भी तो बस एक किताबी विषय ही है। मुरदे जिन्दे नहीं होते, ना ही सच-झूठ का ब्योरा देने ही आ पाते हैं। फिर गड़े मुर्दे उखाड़ने से भी क्या फायदा ! वसुधैव कुटुम्बकम का जमाना है यह … मर खप गए जिन्होंने अत्याचार किए, जिन्होंने अत्याचार सहे, फिर मुझसे ही यह अपेक्षा क्यों? क्या करना होगा मुझे इस अतृप्त प्यास को शांत करने के लिए, वाकई में नहीं जानता था मैं ! संभला नहीं तो पर पागल होने में भी कोई कसर नहीं थी जान चुका था मैं। हर जगह, इन यूरोपियन तक में अब तो नानी ही नजर आने लगी थी मुझे।
इसके पहले कि माथे पर बेवजह ही छलक आए पसीने को पोंछ तक पाऊं, वह पुनः एकबार फिर मेरे सामने आ खड़ी हुईं थीं। नहीं, काम पर आई औलिविया नहीं, वही सपने में आने वाली नानी। पता नहीं दिवा स्वप्न था या अंतरात्मा की पुकार – साफ-साफ सुन और देख पा रहा था अब मैं उन्हें, वह भी सोता नहीं, जगा हुआ और अपने पूरे होशो-हवाश में चैतन्य- ‘नहीं तुम युवाओं को ही संभालना है देश, तुम्हारे हाथों में ही तो है इसका भविष्य। ‘ एक फर्क जरूर था इसबार वह उदास नहीं, मुस्कुरा रही थीं।
परन्तु मेरा मन दिनभर उचाट ही रहा। किसी भी काम में नहीं लग पाया। बारबार भारत पहुंच जाता था। घर नहीं, अपितु उसी किले में। पूरे दो हफ्ते थे, क्रिसमस की छुट्टियों में-उतावला मन पुनः पुनः याद दिलाता रहा। निकल जायेंगे ये दो हफ्ते भी-समझा लिया था पर जैसे-तैसे मैंने खुद को फिर एकबार ।
कई तैयारियाँ करनी थीं अब जाने से पहले। औलीविया का हिसाब, तीन हफ्ते नहीं हूँ घर पर, उसे यह भी बतलाना और अंत में उसके लिए कोई क्रिसमस का तोहफा खरीदना- साल में एक ही तो त्योहार होता है इनका। सोचते-सोचते मैं अपने पसंदीदा किताबों के स्टोर में आ पहुँचा हूँ और एक चौकलेट के डिब्बे के साथ-साथ भारत का इतिहास नाम की पुस्तक भी बंधवा ली है , जिसके रंगीन छायाचित्रों को मैं खुद ही बारबार मंत्रमुग्ध-सा पलटे जा रहा हूँ। पता नहीं औलीविया को घूमने का शौक है, भारत जाना भी चाहेगी या नहीं? अब कोई फरक नहीं पड़ता इन बातों से ! मुझे तो उसे यह किताब देनी ही है और संभव हुआ तो उसके साथ भारत भी जाना है। अभी महीने भर से ही तो काम पर आई है। वह भी हप्ते में बस दो दिन चार-चार घंटे के लिए। इससे ज्यादा न तो मैं अफोर्ड ही कर सकता हूँ और ना ही जरूरत ही है। फिर इतने विश्वास के साथ कैसे सोच सकता हूँ मैं यह बात उसके बारे में कि वह मेरे साथ भारत चलेगी ही… मेरी तो कभी खाने पीने और सफाई के निर्देशों के अलावा कोई बात ही नहीं हुई उससे। हैरानी थोड़ी और गहराई, जब किताब को देखते ही बच्चों सी चमक आ गई थी उसकी आँखों में और झूमकर वह बोली थी –
‘ थैंक्यू इतने प्यारे तोहफे के लिए। भारत तो जाना ही है मुझे। यह किताब सहायता करेगी वहाँ घूमने में।‘
‘ अच्छा, यदि जाना चाहती हो, तो मैं तुम्हारी मदद कर सकता हूँ।‘ उसके इस जबाव को सुनकर मैं अब खुश ही नहीं बेहद खुश था।
‘ सच, तो मुझे वह जगह बताओ जिन्हें देखकर मैं भारत की आत्मा से परिचित हो सकूँ?’
बातचीत के दौरान अनजाने ही आ पैठे इस आत्मा शब्द ने जाने क्यों सिहरन पैदा कर दी। जैसे-तैसे खुदको संयत करके बात आगे बढ़ाई –
‘कब जा रही हो ?’
‘दस दिसंबर को ।‘
‘ और मैं पांच को।‘
‘ कहाँ-कहाँ घूमोगी?’
‘ पता नहीं। अभी कुछ निश्चय नहीं किया।‘
अगले पल ही मैं दिल्ली का पता दे रहा था । बता रहा था- ‘मथुरा के पास ही मेरी नानी का गांव है , बृज बहुत खूबसूरत है , चाहें तो मैं आपको चार-पांच दिन बृज घुमा सकता हूँ। देखें, मना ना करें, प्लीज। आप मेरा और मेरे घर का इतना ध्यान रख रही हैं, तो इतना तो मेरा भी फर्ज बनता है। फिर इससे मेरे आपके प्रति कृतज्ञता के भाव को भी संतुष्टि मिलेगी और आपको भी बहुत अच्छा लगेगा। सहूलियत तो रहेगी ही, घूमने का भी अधिक आनंद आएगा, जब आप किसी भारतीय के संग उसकी आंख से भारत को देख और घूम पायेंगी।‘
चकित था मैं अपने शब्दों के चयन पर और औलीविया बच्चों सी उत्साहित-
‘ मथुरा-वृंदावन…कृष्ण की जन्मभूमि, अवश्य । धन्यवाद, धन्यवाद। तुम हिन्दुस्तानी कितने भावुक, कितने अच्छे हो।‘
औलीविया ने कोई समय नहीं लगाया सहर्ष प्रस्ताव स्वीकार करने में। यही नहीं, आगे बढ़कर मेरा माथा भी चूमा, बिल्कुल वैसे ही जैसे घर के बड़े बच्चों का आशीष देते वक्त चूमते हैं। मैंने भी सारी जरूरी सूचना और फोन नं ही नहीं, दिल्ली में मां के साथ अपने ही घर पर रहने का आमंत्रण भी दे डाला उसी वक्त , बिना कुछ सोचे-समझे ही, जाने किन अज्ञात भावों के तहत ।
….
दस दिसंबर को औलीविया भारत आ गईं और हमारे घर भी।
मैंने देखा कुछ घंटों में ही मां से पूर्णतः हिलमिल गई थीं वह मानो पुरानी जान-पहचान हो। प्यार भी अजीब-सी शह है, बेवजह ही तार जुड़ जाते हैं और पल में ही पराये और अजनबी भी अपने महसूस होने लगते हैं। हमारे साथ भी कुछ ऐसा ही हो रहा था। अगली सुबह ही हम गांव को चल प़ड़े। गांव में भव्य स्वागत हुआ हमारा। मैं और मां तो थे ही, अपनेपन और लाड़-दुलार में औलीविया भी पीछे नहीं थी। चार कदम आगे ही, कहूँ तो भी अतिशयोक्ति न होगी। कभी बच्चों में टौफियां बांटती, तो कभी औरतों संग उनके घर में जाकर साफ-सफाई करवा आती। नई-नई जानकारियाँ देती। घर चलाने और बागवानी के नए-नए तरीके सिखलाती । अक्सर गोशाला भी चली जातीं। गायों को नहलाती-धुलातीं, गोबर के कंडे ऐसी सुघड़ता से थापतीं, मानो बरसों से यही करती आई हों । खाली बैठना तो इंगलैंड में भी नहीं आता था परन्तु यहाँ आकर तो उनके हाथ-पैरों में मानो पंख ही निकल आए थे। महीना भर कैसे निकल गया न तो हमें ही पता चल पाया और ना ही गांव वालों को ही। इतना प्यार था कि पूरा गांव ही अब उन्हें, औलिविया नहीं, आदर सहित विद्या चाची पुकारने लगा था। जाने कब और किसने यह बात सोची और देखी थी कि शकल ही नहीं हूबहू नानी विद्या देवी जैसी ही थीं, सूरत-शकल और स्वभाव, सबकुछ । चौबीसों घंटे गांव वालों के ही सुख-दुख की फिक्र रहती उन्हें। आग सी फैल गई थी अब तो यह नेह की लौ पूरे गांव में । उस आखिरी शाम तो हद ही हो गई, जब हर गांव वासी अपनी विद्या चाची के लिए गहने कपड़ों की सौगात लेकर विदा देने आया। बिल्कुल वैसे ही, जैसे कि वह पहनती थीं। जैसे कि उसके शाही रूप और गुण के अनुकूल थे। दालान में लटके उसी झूले पर बिठाकर श्रृंगार किया गया उनका। सुनते हैं यही वह झूला था, जिस पर नानी बैठी-बैठी पंखा झलती रहती थीं गांव वालों से बोलते-बतियाते वक्त। गांव वालों का सपना साकार हो चुका था और मेरा भी। पता नहीं ढलती शाम का धुंधलका था या दैवीय शक्ति, सच में नानी उतर आई थीं उनमें उस दिन। पीछे टंगी स्वर्गीय विद्या देवी की तस्बीर और झूले पर बैठी औलीविया में कोई फर्क नहीं दिख रहा था किसी को । और तब भावातुर बुजुर्ग और बच्चे, सभी ने उनके पैरों में गिरना शुरु कर दिया। भौंचक्की सी औलीविया भी अब सबके सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद दे रही थी। पता नहीं किसने सिखाया फिरंगन को यह सब- इतना भी सोचने की फुरसत नहीं थी किसी के पास। जरूर, भारतीय फिल्मों में ही शायद देखा होगा यह सब मेरे घर में काम करते-करते हुए इम्होंने। अब तो मैं भी अभिभूत था। अचानक ही माँ वहाँ दौड़ती-सी आईं और लिपटकर रोने लगीं- ‘ बोलो माँ, तुम ही हो न? मुझे क्या पता था कि तुम इतने बरस बाद मेरे जीवन में यूँ लौट आओगी ? वह भी अपने नवासे के साथ !’
माँ रोती रहीं और औलिविया उन्हें चुप कराती रहीं सीने से लगाकर , बिल्कुल वैसे ही जैसे एक माँ बेटी को कराती है। दोनों को ही कुछ समझ में नहीं आ रहा था सिवाय इसके कि अब हम तीनों का ही एक-दूसरे से दूर -दूर रह पाना असंभव था। और यह भी कि हम हर साल लौटेंगे इस गांव में और मदद करेंगे इनकी। तन मन धन तीनों से ही। शायद यही तो उद्देश्य था उन सपनों का , यही तो संदेश था उनका। पर तभी एक दुर्घटना या आश्चर्य जैसा हुआ। औलीविया गायब हो गई। ढूंढे नहीं मिली। मैंने ही नहीं, पूरे गांव ने मिलकर ढूँढा, मानो वह हवेली ही निगल गई हो। हवा-सी उस बगीचे में ही कहीं रुल गईं हों। जिन्दा या मुर्दा कहीं कोई निशान नहीं। पुलिस, सी. आई.डी , सबको खबर की थी। पानी की तरह पैसा बहाया था, फिर भी कुछ पता नहीं चला। अब तो केस की सारी फाइलें तक बंद हो चुकी हैं। पर मैं अनिकेत राजपूत, संभल नहीं पा रहा। चाहता हूँ नानी फिर से आएँ। मुझसे मिलें। कम-से-कम अपने होने का कोई संकेत तो दें ही-औलीविया नहीं तो, फूल चिड़िया, तितली, सपने… किसी भी रूप में।
अब तो वे सपने तक आने बन्द हो गए हैं। वही आखिरी था, जब मैं अपना घर -हवेली सब गांव में बन रहे नए स्कूल के लिए दान करके लौट रहा था वापस, तभी आखिरी बार मेरे सपने में आई थीं वह और मेरा सिर अपनी गोदी में रखकर कहा था-‘ बहुत गर्व होता है अनिकेत । बहुत प्यार आता है तुम पर। मेरा आशीर्वाद सदा तुम्हारे साथ है। मुझे यूँ भटक-भटककर ढूँडो मत। मुक्त कर दिया है तुमने ही मुझे इस बंधन से। इन इच्छाओं से। देखो, एक नहीं अब तो पूरी दुनिया ही तुम्हारा घर है। जिन्दगी हमेशा नए विकल्प देती है। हर राह मंजिल तक ही तो जाती है। बस ध्येय तक चलते रहने की हिम्मत और लगन चाहिए। तुम जैसे युवा जो देश के अंदर या देश के बाहर रहकर यूँ निस्वार्थ सेवा में लगे हैं, नए राजदूत हो आज के इस नए चैतन्य युग के।
देखना, तुम ही बदलाव और नई क्रांति लाओगे सद्भाव और मानवता से भरी हुई, सभ्यता के मोर्चे पर लड़ती और टूटती-बिखरती, बीमार इस दुनिया में ।‘
एक आश्चर्य और हुआ । सपने में ही सही, मुझे नानी के पैर छूने जैसा आभास हुआ और तब उन्होंने मुझे गले भी लगाया था। अजीब शान्ति थी चारो तरफ… मेरे मन में भी।
एक नहीं दो-दो अनिकेत कैमिकल्स की फैक्टरी लगा चुका हूँ, भारत और ब्रिटेन दोनों ही देशों में, दोनों ही सरकार की मंजूरी और सहयोग से लगी ये सैकड़ों परिवारों का पेट पाल रही हैं। …किसी याद में घुलता नहीं अब मैं , अपितु जीता हूँ- एक भरपूर जीवन। कोई कटुता नहीं रही मन में, ना ही कोई वैमनस्य ।
‘यह हवा पानी धरती आकाश सबके लिए बनाए हैं ईश्वर ने और सबके हैं। किसी अकेले का आधिपत्य नहीं इन पर।
इन्सान सब एक , चम़ड़ी के रंग और भाषा-भूषा के सैकड़ों फर्क के बावजूद । इतिहास के वे सच्चे-झूठे मुर्दे तो इतिहास में ही गड़े ठीक… हवा की सरसराहट में कुछ आवाजें अभी भी यदा-कदा सुनता हूँ, मानो कोई आसपास और साथ हैं, समझाता है, प्रेरणा देता रहता है ।…

शैल अग्रवाल
आणविक संकेतः shailagrawal@hotmail.com

सर्वाधिकार सुरक्षित (Copyrights reserved)

error: Content is protected !!