बोलती रहो माँ-डॉ. रमाकांत मिश्र

“आओ बेटा, अंदर आ जाओ” – रवीश की मां ने मेरे नमस्कार का जवाब देते हुए कहा।
मैंने अपने जूते बाहर उतारे और कमरे में घुसते ही एक मूढ़ा खींच कर बैठते हुए पूछा – “रवीश नहीं है क्या? कहीं बाहर गया है?”
“अरे, मैंने उसे दही लेने भेजा है। सोच रही थी आज कढ़ी बनाऊंगी। अब कढ़ी के लिए तो बेसन चाहिए। एक-एक कर सारे डिब्बे खोल डाले किसी में बेसन नहीं मिला। मैं तो सिर पकड़ कर बैठ गई। बेसन तो घर में था। दो दिन पहले ही मैंने इन्हें फोन करके कहा था दफ्तर से आते समय ब्रेड और बेसन लेते आना। शाम को जब ये घर आए तो ब्रेड तो ले आए, बेसन लाना भूल गए। मैंने कहा बेसन कैसे भूल आए? तुम्हें कुछ याद भी रहता है या नहीं? बूढ़े होते जा रहे हो। ये तुरंत ही चार नंबर की गली जाकर शाहू की दुकान से बेसन ले आए। मैंने अपने सिर पर हाथ मार लिया, कितनी बार इन्हें समझाया है कि शाहू की दुकान का बेसन मुझे पसंद नहीं….।“
“फिर आपको बेसन मिला या नहीं?” मैंने उन्हें टोकते हुए कहा। मुझे पता था वे कोई भी बात इतने विस्तार से बताती थीं कि असली बात कहीं खो सी जाती।
“सुन तो सही, ये थके-हारे तो थे पर तुरंत ही वापस चले गए और पांच नंबर की गली से इंदर के यहां से आधा किलो बेसन ले आए। उसके यहां बेसन बहुत अच्छा मिलता है। पर ये भी बस, इनसे एक किलो बेसन मंगाया था पर लेकर आए आधा किलो। मैं भी क्या करती, इन्हें तो भूलने की आदत हो गई है। मैं न होऊं तो पता नहीं कैसे चलेगा। ये कपड़े-वपड़े बदलने अंदर चले गए तो मैं वही आधा किलो बेसन का पैकेट लेकर रसोईघर में चली गई। अब वहां कोई खाली डिब्बा ही नहीं मिले। परेशान हो गई मैं। बड़ी मुश्किल से च्यवनप्राश का खाली डिब्बा मिला, उसमें लिफाफे समेत बेसन रखा था मैंने। कितनी बार कहा है कि च्यवनप्राश खत्म हो गया है, पर कोई मेरी सुने तब तो ……..”
“अरे जयेश, तुम कब आए?”-रवीश ने खुले दरवाजे से कमरे में घुसते हुए कहा।
“बस, अभी थोड़ी देर पहले आया हूं।“
“बोर तो नहीं हुए?”
“नहीं, आंटी थीं ना?”
रवीश ने मेरी बात पर ध्यान दिए बिना मां को दही का पैकेट पकड़ाते हुए कहा – “जयेश के लिए चाय बना कर लाओ ना मां, इस बार तो बहुत दिन बाद आया है।“
“कैसी चाय पियोगे बेटा? अदरक वाली या गरम मसाले वाली। पिछले महीने हम इस्कॉन मंदिर गए थे, वहां से लाए थे चाय का मसाला, एकदम प्योर। इससे पहले वाला मसाला, अरे वही जो सुधा की शादी में अमृतसर से लाए थे, इतना अच्छा नहीं था। इसके पापा कहते हैं कि मेरे हाथ की बनी चाय लाजवाब होती है। मैं हंस पड़ती हूं – प्योर चाय मसाले का काम, सुघड़ बीबी का नाम। वैसे बिना मसाले की चाय भी मैं अच्छी ही बनाती हूं। मसाले वाली तो अब बनाने लगे हैं, पहले तो अदरक वाली चाय ही बनती थी घर में। अब मेरी सास तो रही नहीं, वो भी कहती थीं कि बहू तेरे हाथ की बनी चाय पीकर मजा आ जाता है। बेचारी पोते को जवान होते नहीं देख पाईँ। उनके जाने से यह घर खाली-खाली …..”
रवीश ने उन्हें बीच में रोकते हुए कहा – “मां, जयेश को मसाले वाली चाय पसंद है। वह चला जाए उससे पहले चाय बना कर ले आओगी तो मेहरबानी हो जाएगी।“
“अरे, इसमें मेहरबानी की क्या बात है, बस मैं यूं गई और यूं चाय बना कर लाई।“
मां किचन में चली गई तो रवीश ने कहा – “मां ने तुम्हें बोर तो नहीं होने दिया होगा। तुम्हें तो पता है, छोटी सी बात को लंबी कहानी बना कर सुनाने की उनकी आदत है। रिश्तेदार उनकी इस आदत का मजाक बनाते रहते हैं, पर मां को समझ नहीं आता। कोई नया आदमी आता है और उनकी बातें सुनकर मंद-मंद मुस्कराता है या उसके चेहरे पर बोरियत के भाव उभरने लगते हैं तो मुझे अच्छा नहीं लगता। कैसे समझाऊं मां को?”
“समझाने का क्या मतलब? देख यार, यह तो अपना-अपना स्वभाव है। इसे बदला नहीं जा सकता। फिर आंटी के बात कहने का ढंग इतना अच्छा होता है कि कहानी सुनने जैसा आनंद मिलता है।“
“तुझे सचमुच ऐसा लगता है?”
“हां, बिलकुल।“
“तू कभी-कभी आता है ना इसलिए। हमें तो ……।“
“लो गरम-गरम चाय पियो” – कहते और दोंनों हाथों में एक-एक कप पकड़े रवीश की मां अंदर आई। कप मेज पर रख कर वे अपने पल्लू से पसीना पौंछती हुई कुर्सी खींच कर बैठ गईं।
हम दोनों ने हाथ में कप उठाए ही थे कि वे बोलीं – “हां तो बेटा, मैं बता रही थी कि मेरी सास बहुत अच्छी थीं। वो सभी को बताती रहती थीं कि पिछले जन्मों के अच्छे कर्मो की वजह से उन्हें इतनी अच्छी बहू मिली है। मेरे भी पिछले जन्मों के कर्म अच्छे रहे होंगे जो मुझे उनके जैसी सास मिली, सास क्या थीं मां थीं मेरी …….. चाय कैसी लगी बेटा?”
“आंटी सचमुच बहुत अच्छी चाय है, मजा आ गया।“
“मैं तो पहले ही कह रही थी कि चाय मैं अच्छी बनाती हूं। अब मैं तुम्हें काफी पुरानी बात बताती हूं। तब इनकी पोस्टिंग गाजियाबाद में थी। ये अपनी नौकरी पर गए हुए थे और रवीश स्कूल गया हुआ था। मेरी सास अपने मायके गई हुई थीं। साल में एक बार वे मायके जरूर जाती थीं और एक महीने से पहले नहीं लौटती थीं। …….हां, तो मैं कह रही थी कि घर में कोई नहीं था। मैं सुबह ही नहा ली थी और पूजा-पाठ करके आराम कर रही थी। पता नहीं कब आंख लग गई। हड़बड़ा कर उठी तो देखा कि रवीश के स्कूल से आने का समय हो रहा है। झटपट उठी और गैस पर दाल चढ़ा दी। शायद मसूर की दाल थी।“
“मां……..तुम तो मसूर की दाल बनाने लगीं, जो बात बताने जा रही थीं, उसका क्या हुआ?” – रवीश ने उनकी बात का प्रवाह रोकने की गरज से कहा।
“ठहर तो सही, वही बताने जा रही हूं। तो मसूर की दाल चढ़ाकर मैं आटा गूंथने लगी। तभी दरवाजे की घंटी बजी। अब मेरे दोनों हाथ आटे से सने। दरवाजा खोलूं या फिर आटा देखूं। उधर दाल अलग खदक रही थी। उसकी खदबद-खदबद का मतलब था कि पहले दाल देखूं। पर जब दरवाजे की घंटी तीसरी बार बजी तो हाथों से आटा छुड़ाने के लिए सिंक का नल खोल कर दोनों हाथ उसके नीचे रख कर उन्हें जोर-जोर से रगड़ने लगी। जल्दबाजी में उंगलियों पर आटा लगा ही रह गया। फिर घंटी बजी तो मैं जोर से भागी और दरवाजा खोल कर देखा तो दिल्ली में रहने वाले मेरे बड़े भैया खड़े थे।“
“बड़ी देर लगाई दरवाजा खोलने में बिब्बो, क्या कर रही थी?”
“कुछ नहीं भैया, खाना बना रही थी। दोनों हाथों में आटा लगा था। अरे, मेरी तो दाल जल रही होगी। आप अंदर तो आओ। भैया ने अंदर आते ही बता दिया कि वो सरकारी काम से सुबह की लोकल से गाजियाबाद आए थे और बस एक घंटा बाद ही वापस दिल्ली चले जाएंगे।“
“बस, खाना बना ही रही हूं, आप खाना खा कर जाना।“
“खाना तो मैंने खा लिया है। सोचा, तुझसे मिलता चलूं और तेरे हाथ की चाय पीता चलूं। क्या बात है तेरे हाथ की चाय में, वाह भई वाह।“
“मैं निहाल हो गई। उनसे बातें करते-करते गैस का दूसरा बर्नर जलाया और उस पर चाय रख दी। मेरे हाथ की चाय पीने के लिए मेरे भैया इतनी दूर से आए थे। जिसने मेरे हाथ की चाय एक बार पी ली…….।“
“मां, जयेश को जरूरी काम से निकलना है” – रवीश ने कहा।
“अरे, तो मैं कब उसे रोक रही हूं? ठीक है, जयेश बेटा, कभी-कभी आ जाया करो, मेरे हाथ की चाय पीने।“
मैं और रवीश तुरंत ही उठ गए थे। दरवाजे की तरफ बढ़ते हुए मैंने कहा था – “क्यों नहीं आंटी, इतनी अच्छी चाय पीने तो बार-बार आना ही पड़ेगा।“
आंटी के चेहरे पर एक चौड़ी मुस्कान खेल गई। वे कुछ कहने के लिए मुंह खोलतीं उससे पहले ही हम दोनों तेजी से बाहर निकल आए। दोनों गली के मोड़ पर खड़े काफी देर तक बात करते रहे। मुझे विदा करते समय रवीश ने कहा – “सॉरी यार जब मां शुरू हो जाती है तो फिर किसी और को बोलने का मौका ही नहीं मिलता। अगली बार मैं तेरे घर आ जाऊंगा। ठीक है?”
“मां हैं यार, मुझे तो कोई दिक्कत नहीं होती। तू जैसा उचित समझे वैसा कर लेंगे।“
उसके बाद हम दोनों का बहुत समय तक मिलना ही नहीं हुआ। मैं नौकरी के सिलसिले में भोपाल चला गया। करीब छह माह बाद अपने शहर लौटा तो रवीश को फोन किया – “यार, छह महीने हो गए तुझसे मिले। मुझे ज्यादा छुट्टियां नहीं मिली हैं। तीन-चार दिन में वापस लौट जाऊंगा। तुझसे बिना मिले तो वापस जाने का सवाल ही नहीं है, बोल कहां मिलना है? ऐसा कर तू मेरे घर आजा या फिर किसी रेस्त्रां में मिल लेते हैं।“
कुछ क्षण के इंतजार के बाद रवीश की आवाज आई – “जयेश तू मेरे घर ही आ जा। और फिर फोन कट गया।
रवीश अपने घर के बाहर खड़ा मेरा इंतजार कर रहा था। जैसे ही मैं वहां पहुंचा रवीश ने मुझे वहीं रुकने का संकेत किया। मुझे बड़ा अजीब सा लगा। वह मुझे घर के अंदर आने के लिए क्यों नहीं कह रहा था। क्या वह आंटी की वजह से मुझसे पहले की तरह घर के बाहर खड़ा होकर बात करना चाहता था।
रवीश ने मेरे चेहरे के भाव पढ़ लिए, उसने मेरे कंधे पर हाथ रखा और कहा – “घर के अंदर जाने से पहले मैं तुझे कुछ बताना चाहता हूं।“
“क्या बात है रवीश? तू कुछ परेशान सा लग रहा है। मुझे तो खुल कर बता सकता है, यार।“
“हां यार, इसीलिए तो तुझे यहां बुलाया है। मां ने बोलना बंद कर दिया है।“
“यह क्या कह रहा है तू? क्या हुआ है उन्हें? कोई बीमारी……..?”
“नहीं यार, उन्होंने मुझसे नाराज होकर बोलना बंद कर दिया है। आज पूरे पच्चीस दिन हो गए हैं, वे एक शब्द भी नहीं बोली हैं।“
“ऐसा क्या हो गया?”
“मेरी ही गलती थी। उस दिन मेरा बॉस अपनी वाइफ के साथ हमारे घर आया था। मां ने अपनी आदत के अनुसार उन्हें छोटी-छोटी बातें विस्तार से बतानी शुरू कर दीं। बॉस या उनकी बीबी सिर्फ सुनते रहे, उन्हें बोलने का कोई मौका ही नहीं मिल रहा था। मैंने कई बार बहानों से मां को अंदर भेजा तब जाकर हम कुछ बात कर पाए। लौट कर आने पर मां छोड़ी गई बात का सिरा पकड़ कर फिर से शुरू……..।“
“तो इसमें क्या हुआ? आंटी कोई गलत बात तो करती नहीं, वे सिर्फ बात को विस्तार से बताती भर हैं। इसमें किसी को क्या बुरा लगना चाहिए?”
“लेकिन, उस दिन मुझे सचमुच बहुत बुरा लगा जब बॉस ने कार में बैठते हुए कहा – रवीश, योर मदर इज़ वैरी इंटरेस्टिंग। बात करने का अंदाज तो उनसे सीखना चाहिए।“
“मैं उनके तंज को समझ रहा था।“
“हो सकता है, वह तंज न हो, उन्हें आंटी की बातें सचमुच मजेदार लगी हों” – मैंने कहा।
“जो भी हो, मैं घर में घुसते ही मां पर बरस पड़ा – कम से कम ये तो देख लिया करो, किससे बात कर रही हो। मेरा बॉस और उसकी वाइफ थे वो। आप तो जब बोलना शुरू कर देती हो तो सबकुछ भूल जाती हो। थोड़े कम शब्दों में बात नहीं कर सकतीं तो वहां बैठने की क्या जरूरत थी?” मां ने मुझे हैरानी से देखा और कहा – “मेरा बोलना तुझे इतना ही बुरा लगता है तो आगे से नहीं बोलूंगी। मैंने सोचा था वे ऐसे ही कह रही हैं, पर उसके बाद से वे बिलकुल चुप हैं। बोलती ही नहीं यार……मैं मन ही मन बहुत पछता रहा हूं, उनसे माफी भी मांग चुका हूं, पर……..।“
“शायद भीतर से आहत हुई हैं आंटी। उनका ऐसे चुप हो जाना कोई मामूली बात नहीं है।“
“वही तो, तभी तो तुझे यहां बुलाया है। तेरे ऊपर मां का बड़ा स्नेह है, कुछ कर यार….।“
“मैं क्या कर सकता हूं? चलो, फिर भी देखते हैं।“
आंटी ड्राइंग रूम में बैठी टीवी देख रही थीं। मुझे और रवीश को देख कर उन्होंने टीवी बंद कर दिया और उठ खड़ी हुईं। मेरे नमस्कार के जवाब में उन्होंने सिर्फ हाथ जोड़ दिए और अंदर जाने लगीं। मैंने उन्हें रोकते हुए कहा – “आंटी आपके हाथ की चाय पीने भोपाल से यहां आया हूं। सच कह रहा हूं, वैसा स्वाद कहीं नहीं मिला कभी।“
वह हाथ से इशारा करते हुए अंदर चली गईं और कुछ देर में चाय बनाकर ले आईं। वे वापस जाने लगीं तो मैंने उनका हाथ पकड़ कर उन्हें कुर्सी पर बैठा दिया। रवीश गर्दन लटकाए बैठा था। आंटी की चुप्पी मुझसे भी सहन नहीं हो रही थी। चाय का घूंट भरते हुए मैंने कहा – “आंटी, बहुत चुप-चुप सी लग रही हो। लगता है आपकी तबीयत ठीक नहीं है, तभी चाय में वह मजा नहीं आ रहा …………….।“
“मेरी तबीयत को क्या हुआ है? आज तक मेरी चाय को किसी ने भी बेमजा नहीं बताया है – आंटी भड़क गईं। पता है, मेरे बड़े भैया सिर्फ मेरी चाय पीने के लिए दिल्ली से गाजियाबाद आते थे। मेरी सास…..।“
अचानक आंटी की नजर रवीश पर पड़ी तो वे एकदम चुप हो गईं। रवीश उठ कर उनके पास गया और उनके पैर पकड़ते हुए भरे गले से कहने लगा – “बोलती रहो मां…….मेरी गलती की इतनी बड़ी सजा मत दो। पूरा घर काट खाने को दौड़ता है। बहुत घुटन होती है मां।“
आंटी कुछ क्षण चुप रहीं और फिर उन्होंने रवीश के सिर पर हाथ रखते हुए कहा – “चल उठ, जयेश बहुत दिन बाद आया है, मुझे उससे ढ़ेर सी बातें करनी हैं।“
“हां, तो बेटा मैं बता रही थी कि मेरी सास ……….।“
रवीश की भरी आंखें कह रही थीं – “बोलती रहो, मां।“
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डॉ.रमाकांत मिश्रा
शिक्षा – एम.ए. अर्थशास्त्र, एम.कॉम, एलएल.बी, सीएआइआइबी, पीएच.डी(कॉमर्स)
पिछले लगभग 45 वर्ष से लेखन
लगभग सभी प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित
कहानी संग्रह – नया लिहाफ, अचानक कुछ नहीं होता, भीतर दबा सच, डा. रमाकांत शर्मा की चयनित कहानियां, तुम सही हो लक्ष्मी, सूरत का कॉफी हाउस(अनूदित कहानियां)
व्यंग्य संग्रह – कबूतर और कौए
उपन्यास – मिशन सिफर, छूटा हुआ कुछ
अन्य – रेडियो (मुंबई) पर नियमित रूप से कहानियों का प्रसारण
यू.के. कथा कासा कहानी प्रतियोगिता प्रथम पुरस्कार
महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी से सम्मानित
कमलेश्वर स्मृति कहानी पुरस्कार (दो बार)

अखिल भारतीय स्तर पर अन्य कई कहानियां पुरस्कृत

कई कहानियों का मराठी, गुजराती, तेलुगु और उड़िया में अनुवाद
संप्रति – भारतीय रिज़र्व बैंक, मुंबई से महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति के बाद स्वतंत्र
लेखन
संपर्क – मोबाइल-919833443274 ईमेल –rks.mun@gmail.com

402-श्रीराम निवास, टट्टा निवासी हाउसिंग सोसायटी, पेस्तम सागर रोड नं. 3,चेम्बूर, मुंबई – 400089