कहानी समकालीनः बिखरे शब्दों का चांद- मधुलिका सिन्हा

सपने देखना हमारे वश में नहीं होता। चाहें या न चाहें, वे आँखों में आ ही जाते हैं। फिर यह तो मेरा ऐसा सपना था, जो अनायास ही मेरी आँखों में आ बसा था। कब और कैसे—यह ठीक-ठीक याद भी नहीं। उम्र कच्ची थी और कल्पनाओं के दायरे बढ़ने लगे थे। फिर क्या था—मैं, कृतिका, अपने उसी सपने के पीछे बस भागती रहती थी।

न दिन में चैन था, न रात की सुध। नई-नई पहचान जो हुई थी। बस वही दिमाग में घूमता रहता—कैसे उसकी विवेचना करूँ, कैसे उसे विस्तार दूँ, कहाँ से शुरुआत करूँ। क्या उसके मीठे, कोमल पंखों को सहलाऊँ या यथार्थ की कठोर धरती पर उसे तिलमिलाता छोड़ दूँ?

अतीत के पन्ने उधेड़कर दिखाऊँ या भविष्य के सुनहरे सपनों की झलक दिखलाऊँ? किसी तरह उसे मुकम्मल करने की कोशिश में जुटी रहती थी। पर महीनों की मेहनत के बाद भी जब सपनों को हकीकत से कोसों दूर पाती, तो निराश और हताश हो जाती। कभी खीझ, कभी गुस्सा—सब कुछ उमड़ आता।
लेकिन नियति को तो कुछ और ही मंज़ूर था। उन दिनों मेरे स्वभाव में भी खासा बदलाव आ गया था। हमेशा उधम मचाने वाली मैं अब कुछ चुप-सी रहने लगी थी। बस खयालों में गुम रहती, हर समय कुछ न कुछ सोचती रहती। माँ ने सबसे पहले इस बदलाव पर ध्यान दिया। माँ तो माँ ही होती है।

अब वे आए दिन पूछतीं—
“कृतु, क्या बात है बेटा? आजकल कुछ खोई-खोई सी रहती है। कॉलेज में कुछ हुआ है क्या?”
“अरे नहीं माँ, कुछ भी नहीं। बस पढ़ाई का थोड़ा दबाव है।”
माँ चुप तो हो जातीं, पर हर दूसरे दिन वही प्रश्न—कॉलेज में कुछ हुआ है? दोस्तों से लड़ाई हुई है? वगैरह-वगैरह।
और मेरा भी वही उत्तर—ऐसी कोई बात नहीं है। पर माँ को मेरे जवाब संतुष्ट नहीं कर पाते। वे थोड़ा परेशान रहने लगीं। समय तो अपनी अविराम गति से चलता ही रहता है, सो वह भी चलता रहा।

एक दिन कॉलेज से लौटकर मैं जैसे ही कमरे में पहुँची, माँ ने चाय-नाश्ता दिया और मेरे कमरे में चली गईं। मैंने ध्यान नहीं दिया। जब फ्रेश होकर चाय लेकर कमरे में पहुँची, तो देखा—माँ मेरी डायरी हाथ में लिए बैठी थीं। कलेजा धक से रह गया—लो, माँ ने तो सब पढ़ लिया होगा!

मैं झेंपकर बोली—
“माँ, यह क्या? दूसरों की डायरी पढ़ना अच्छी बात नहीं है। खुद ही सिखाती हो और खुद ही भूल गईं!”

पर मेरी बात जैसे उनके कानों तक पहुँची ही नहीं। उन्होंने मेरा हाथ पकड़कर मुझे अपने पास बिठाया, सिर पर स्नेह से हाथ फेरते हुए कहा—
“कृतु, बेटा, तू लिखती है? कहानियाँ, कविताएँ, कुछ गीत… मैंने तेरी डायरी में देखा।”
मेरी निराशा अब रुलाई में बदल गई। माँ से लिपटकर बोली—
“माँ, मैं लिखना चाहती हूँ… सिर्फ लिखना। मन के उद्गार, खुशियाँ, आँसू—सब कुछ पन्नों पर उकेरना चाहती हूँ। पर शायद यह मेरे बस की बात नहीं। जब भी लिखने बैठती हूँ, शब्दों के जाल में उलझकर रह जाती हूँ। सोचा था, कुछ पूरा लिख लूँ, फिर तुम्हें दिखाऊँगी। अब तो लगता है, मेरा यह सपना कहीं सपना बनकर ही न रह जाए।”

मेरी आवाज़ भर्रा गई।
माँ ने मुझे अलग किया, आँसू पोंछे और कहा—

“किसी भी काम में हार नहीं माननी चाहिए। मैं यह तो नहीं जानती कि कहानी या कविता कैसे लिखी जाती है, पर एक बात बताती हूँ।”

वे मेरा हाथ पकड़कर आँगन में ले गईं और आसमान की ओर इशारा करते हुए बोलीं—

“देखो, आसमान में करोड़ों तारे हैं और एक अकेला चाँद। फिर भी चाँद की रोशनी उन टिमटिमाते तारों से कहीं अधिक उजली है। पता है क्यों?”

मैंने प्रश्नवाचक दृष्टि से उन्हें देखा।

उन्होंने मुस्कराकर मेरे गाल पर हल्की-सी चपत लगाई—
“क्योंकि तारे पूरे आसमान में बिखरे पड़े हैं और चाँद अपनी सारी चाँदनी स्वयं में समेटे हुए है। यदि सारे तारे मिलकर एक झुरमुट बना लें, तो क्या चाँद की रोशनी फीकी नहीं पड़ जाएगी? मैंने तेरी डायरी में भी यही देखा—रचनाओं में शब्द तो बहुत हैं, पर वे बिखरे हुए हैं। उन्हें समेट, झुरमुट बना। देखना, तेरी कल्पनाओं की सारी रचनाएँ उसके नीचे आकर बैठ जाएँगी। तुझे हिम्मत हारना तो मैंने सिखाया ही नहीं। बस शब्दों को समेट और लिखना शुरू कर। सपनों को कहानियाँ बनते देर नहीं लगती—हाँ, उन्हें सच होने में समय ज़रूर लगता है।”

मैंने माँ को फिर से गले लगा लिया और देर तक सिसकती रही।

आज मैं नहीं जानती कि मैं कितनी अच्छी लेखिका बन पाई हूँ। पर जब कभी मुझे साहित्य के किसी छोटे-बड़े पुरस्कार से सम्मानित किया जाता है या मेरी किसी पुस्तक का विमोचन होता है, तो सैकड़ों की भीड़ में भी मैं उनकी नज़रों से नज़रें मिलाने से बचती हूँ—क्योंकि उनकी आँखों के कोरों में छिपे गर्व के आँसू मुझे साफ दिखाई दे जाते हैं। और हर बार मुझे अपने सपने के सच होने का विश्वास हो जाता है।

मधुलिका सिन्हा
गुरुग्राम (हरियाणा)

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