धागे-शैल अग्रवाल

‘जो भी हमारे इर्द-गिर्द या परिचय में आता है उससे पूर्व जन्म का कोई नाता, उधार या फिर कुछ उद्देश्य होता है जीवन में’- याद नहीं कब कहाँ, पर कुछ ऐसा ही पढ़ा था पुनर्जन्म और रिश्तों की दुरुहता पर औक्सफोर्ड में इंडियोलौजी की पढ़ाई करते युवा क्रिस ने। पर, तब उसे क्या पता था कि वाकई में क्या अर्थ होगा इस वाक्य और इस जटिल दर्शन का उसके जीवन में! वैसे भी दर्शन और जीवन, एक डोर के दो छोर ही तो रहे हैं हमेशा से । कभी सुलझे हुए तो कभी बेहद उलझे हुए भी। फिर इनके तो अंश से पैदा हुआ था, यह जीवन, यह आकार पाया है उसने। एक बार तो मिलना ही पड़ेगा अब इनसे!

एक बम के धमाके की तरह ही सबकुछ अचानक ही घटा था उस दिन। और फिर तो घटनाएँ दर-परत-दर बड़ी तेजी से उसकी आँखों के आगे खुद को उधेड़ती चली गई थीं । शुक्रवार को कौलेज से लौटते ही क्रिस ने फैसला कर लिया था कि अब वह इस रहस्य की जड़ तक पहुंच कर ही चैन लेगा। पता तो जन्म के रिकौर्ड और उससे जुड़ी अन्य खबरों से उसने पहले ही लगा लिया था, पर यह नहीं जानता था कि अगला कदम कैसे, क्या और कब ले। यह भी सहूलियत ही थी कि इसी शहर में दो गली छोड़कर ही रहते थे उसके जैविक पिता। फौन पर बात कर ली थी उसने। राजी भी हो गए थे मिलने को सब कुछ जानकर भी। साफदिल और नेक इंसान लगे थे क्रिस को वह। अब न सिर्फ क्रिस उनसे मिलने को बेचैन था उनकी तरफ खिंचता भी जा रहा था, उनके अंश के रूप में खुद को देख पा रहा था।

शुरु शुरु में तो कुछ असहज ही थे अर्जुन सिंह तेइस साल के अपने इस अपरिचित बेटे को पाकर। बेटा जो उसी स्पर्म से पैदा हुआ जिसे उन्होंने स्पर्म बैंक को दान दिया था। कुछ अटपटा भी लगा था यह सोचकर कि कुँआरे अर्जुन सिंह का बेटा है …क्या कहेगी दुनिया, किस-किस को और क्या-क्या समझाते फिरेंगें!

पर साथ-साथ खुशी की एक अद्भभुत लहर भी थी जो अब उन्हें अपने साथ बहाए ले जा रही थी- उनका अपना बेटा,जीता-जागता बेटा, वह भी यहीं, इसी शहर में…बेटा जिसका वह अक्सर उदास पलों में यार-दोस्तों के बच्चों को देखकर खाका खींचने लग जाते थे। पर जब कोई औरत ही उनकी जिंदगी में नहीं आई तो बेटा कहाँ से आता…हाँ, एक बार खून के साथ-साथ स्पर्म का दान अवश्य किया था उन्होंने और वही अब आज…एक सुखद एहसास होगा बेटे को देखना, बाँहों में समेटना, दुलराना, बातें करना। मन में उठती खुशी की इस लहर ने शीघ्र ही हर संशय को धो दिया। अब एक व्यग्र उन्माद धीरे-धीरे उनके मन-मस्तिष्क पर छाने लगा था। कैसा दिखता होगा उनका बेटा और कैसा होगा उनका मिलन … क्या कोई परिणाम भी निकलेगा इस मिलन से?
मिलने से पहले ही अब खिड़की पर बैठे बेटे का इन्तजार कर रहे थे अर्जुन सिंह।
कहते हैं बेटे के पैर जूते में आने लगें तो दोस्त बन जाता है, फिर क्रिस का तो पैर ही नहीं कद भी उनके जितना ही था…क्या पता, इंच दो इंच ऊँचा ही हो…बेटे को देखते ही अर्जुन सिंह बग्घा की खुशी मानो सातवें आसमान को छूने लगी थी। मन ही नहीं भर रहा था देखते-देखते, बातें करते-करते। अगले शनिवार को भी जिद करके फिरसे बुला लिया था उन्होंने उसे। यही नहीं, रोक भी लिया था रात में, वहीं अपने पास । ‘आए हो तो एक रात तो बिताओ मेरे साथ’…कहते-कहते आवाज की वह आंसूभरी थर्राहट क्रिस ने भी तो महसूस की थी और बिना ना-नुकुर किए रुक भी गया था वह।

सुबह बेटे को सोता देखकर बाल और माथा सहलाकर ही बगीचे में आ पाए थे अर्जुन सिंह, पर उठाया नहीं था उन्होंने उसे।
सोने दो….जाने कबका थका है। आज अपने घर, अपने कमरे की नींद पूरे तेइस साल बाद नसीब हुई है। बेटो को पाकर पूरा अस्तित्व ही मानो ऊदा-ऊदा हो चला था। शादी न करने का और बुढ़ापे में अकेले रह जाने का अब कोई दुःख नहीं था उन्हें। बारबार मल्हार जैसा कुछ गाने को मन कर रहा था …गिद्धा पाते बचपन के यार-दोस्त और पीछे छूटे घर-दालान और नेह के पल घूम रहे थे भीगी आंखों के आगे। बगल में रखे रेडियो पर भी तो किशोर कुमार भी कुछ ऐसा ही गा रहे थे –आ लेकर चलूँ तुझे एक ऐसे गगन के तले, जहाँ गम न हो, आंसू न हों बस प्यार ही प्यार पले।

तब अपनी उस मनःस्थिति से लड़ने के बजाय उन्होंने भी जोर-जोर से गाना शुरु कर ही दिया।…

सुबह-सुबह एक बेहद मीठी धुन पर गूंजती और उतनी ही सोजभरी आवाज को सुनकर ही क्रिस की आँखें खुली थीं उस दिन।

अमित मजमूदार बाप का यही नाम तो जानता था वह आजतक और तथ्य की पुष्टि करने को जन्म प्रमाण पत्र पर भी यही नाम लिखा देखा था उसने। साथ में यह भी कि एक दुर्घटना में उसके जन्म लेने से पहले ही गुजर गए थे वह, इसीलिए ‘स्वर्गीय’ मिस्टर अमित मजमूदार, जो कि पेशे से इंजिनियर थे और सात साल के संक्षिप्त वैवाहिक जीवन के बाद ही उसकी माँ जैनी को अकेला भी कर गए थे। क्रिस ने भी तो पूरी तरह से जोड़े ऱखा था खुद को मां की उस कहानी से- यहीं औक्सफोर्ड में ही पढते हुए मिले थे दोनों सहपाठी जैसे कि वह रैचेल से मिला है… पर जबतक समझ में आया कि कितना बड़ा झूठ किस सहजता से बोल गई है मां , बहुत देर हो चुकी थी। पूरा बचपन गंवा चुका था वह स्वर्गीय मिस्टर अमित मजमूदार की फोटो से बातें करते हुए। होते हुए भी, बिना पिता के जिन्दगी के 23 बसंत पार कर लिए थे उसने। वह तो भला हो मिस्टर पॉल का, जिन्होंने उसकी माँ से शादी करने के 15 साल बाद सच बता ही दिया उसे, भले ही गुस्से में ही सही।

…गुजरनी तो वह रात सैकड़ों उलझनों में ही चाहिए थी, परन्तु बहुत चैन सो सोया था क्रिस महीनों बाद उस घर में। मानो उसका अपना घर हो, अपना कमरा हो। एक अपनापन, अधिकार सा महसूस हो रहा था उसे घर पर। कमरे की हर चीज़ पर। सच कहे तो खुद अर्जुन सिंह पर भी।

खुशनुमा सुबह थी वह। परदा खोलते ही धूप ने पुरजोर स्वागत किया उसका। कोना-कोना उजाले से भर उठा था। अधखुली आंखों से उसने देखा, पौप, बाहर क्यारियों को तन्मयता से उकेरते नरगिस और अन्य वासंती फूलों की गांठें गाड़ रहे थे, वह भी एक कलाकार-की-सी कुशलता और एकाग्रता के साथ।

…तो इन्हे भी उसकी ही तरह बागवानी का शौक है? नहीं गलत कह गया वह, उसने ही अपने पौप से यह शौक विरासत में लिया है, जैसे कि मम से कुकरी का। मन-ही-मन आज उसने जी भरकर अर्जुन सिंह को कई बार पौप्स कहकर पुकारा। अन्य भारतीय सहपाठियों के मुंह से सुना यह ‘पौप्स‘ शब्द आज दुनिया का सबसे मधुर और आत्मीय शब्द लग रहा था उसे-‘मम‘ से भी ज्यादा। पर जितनी सहजता से मन में गूंज रहा था, जितना आत्म-सुख दे रहा था, उतनी सहजता से गले से बाहर नहीं निकला वह इच्छित संबोधन। पिछले सात आठ साल से पौप्स को ढूँढते क्रिस के अंतस् की गहराइयों में बस गूंजता ही रहा उस दिन भी।…

अगर ढूँढता नहीं तो इतने पास रहकर भी कहाँ मिल पाता इनसे! न साथ कभी क्रिकेट खेला, न कहानी सुनी, ना ही रूठा मचला गोदी में चढ़कर कभी, बचपन का एक पल भी तो साझा नहीं किया उसने इनके साथ। फिर कैसा लगाव और कैसी बेचैनी, गोपी सही ही तो कह रही थी- दुनिया में आने की खुशी तो दूर, पता तक नहीं चला होगा इन्हे उसके आने का। ..दिन-तारीख क्या यह भी तो पता नहीं था इन्हें तो कि उस स्पर्म ने लड़का बनकर जन्म लिया या फिर लड़की ! इन्तजार नहीं था इन्हे उसका ! प्यार से उगाया फूल नहीं…एक परित्यक्त, बेचा हुआ स्पर्म भर है वह बस ! जैसे सूर्य वीर्यदान करके कर्ण को भूल गए थे। होकर भी बेटा कहाँ हूँ मैं इनका! उसका उत्साह सोच की भंवरों में फंसा अब ज्वार-भाटे-सा पलपल उठ गिर रहा था!
बेटा नहीं, एक परित्यक्त अंश मात्र , बस। फिर पिता-पुत्र के संबंध की यह अपेक्षा क्यों, भावनाओं का यह उमड़ता आवेग क्यों? डाली से टूटे फूल कितना ही पेड़ पर दावा करें वापस तो नहीं जोड़े जा सकते ! पर, ना तो यह एक जड़ ठूँठ हैं और ना ही वह एक टूटा हुआ फूल । पांच फीट 11 इंच का क्रिस है वह, और यह उसके वास्तविक पिता ।‘

जाने किन परिस्थियों में कैसे संरचना हुई थी उसकी। किसे जरूरत थी उसकी, जानना चाहता था वह ठीक-ठीक से ,परन्तु समझ नहीं पा रहा था। सही-सही तो बस इतना ही पता था उसे कि मि. पौल बकल उसकी मां के दूसरे पति हैं और गोपी उन दोनों की बेटी, वह नहीं। फिर मां ने अपने पहले पति अमित मजमूदार का नाम क्यों दिया उसे ? सच तो यह है कि दुनिया में ही लाने की क्या जरूरत थी? क्या जरूरत थी उसके इस अस्तित्व की जिसे कई झूठ का सहारा लेकर गढ़ा और जिया गया था? पर अब और मजमूदार नहीं। उनका तो मां के अतीत और उनकी भावनात्मक जरूरतों के अलावा और कोई संबंध ही नहीं है उसके साथ। न चाहकर भी क्रिस एक अनकहा चुम्बकीय खिंचाव महसूस कर रहा था अर्जुन सिंह की तरफ। माँ ने सही ही कहा था उसे यहाँ नहीं आना चाहिए था…इससे कई रिश्ते बिखर सकते हैं , परिवार टूट सकते हैं। आक्रोश और प्यार के बीच यूँ हिलोरें लेता क्रिस चाहकर भी पौप्स कहकर आवाज नहीं ही दे पाया उन्हें।
संकोच की जाने कैसी दीवार खड़ी थी दोनों के बीच। कोई कुछ भी कहे, सोचे-समझे, उनकी विरासत से हक मांगने नहीं आया था वह उनके घर पर, बस जबसे पता चला है कि अर्जुन सिंह बग्घा का बेटा है वह क्रिस सिंह बग्घा, कहने को, लिखने को बारबार मचल उठा है बावरा मन। किसी को दुख देने का, आहत करने की चाह नहीं, बस इस प्यार और दुविधा की बाढ़ को बांधना और लांघना चाहता है वह…एकबार तैरना या फिर डूबना, इस बाप-बेटे के रिश्ते की ताकत और गहराई जानना चाहता है वह, बस्स।

कांपते हाथों से आँसू पोंछते हुए परदा पूरा खोल दिय़ा क्रिस ने। बस्स, आवाज नहीं दी , पौप्स कहकर नहीं पुकारा , पर जाने कैसे आवाज सुन ली थी उन्होंने। सही ही तो है, कहते हैं- प्यार की तो पीठ तक पर आंखें जड़ी होती हैं।

‘ उठ गए तुम। सुनो गरम-गरम आलू के पराठे और दही, अचार वगैरह सब डाइनिंग टेबल पर रखे हैं। मैंने खुद बनाए हैं तुम्हारे लिए। परकुलेटर में कौफी भी तैयार है। दो औरेंज जूस फ्रीज से निकाल कर गिलास में डालो। मैं बस हाथ का काम निपटाकर पांच मिनट में आता हूँ। साथ ही नाश्ता करेंगे आज हम ।‘

‘ एक अचरच का बंडल ही हैं यह पौप भी, खाना भी बना लेते हैं …पराठे, वह भी इतनी जल्दी…इन्हें किसने बताया कि उसे आलू के पराठे बहुत पसंद हैं! ‘ क्रिस झटपट तैयार होकर नीचे आ गया और उसने वैसा ही किया जैसा कि उन्होंने कहा था। दो गिलास जूस बेसिल की दो पत्तियों से सजे अब बाप बेटे का इंतजार कर रहे थे। अगले पल ही खुशी से दमकते वह भी आ गए और कुरसी पर बैठते ही उन्होने खुद अपने हाथों से न सिर्फ उसकी प्लेट लगाई अपितु जिद कर-करके एक-एक कौर खिलाने लगे उसे, साथ में कभी कुछ तो कभी कुछ बतलाते भी जा रहे थे ।

जब वह रोल बनाकर पराठा और चम्मच से दही खाने ही वाला था, तभी उठकर रोक दिया अर्जुन सिंह ने उसे। बताया कि कैसे असली स्वाद के लिए पराठे के एक-एक निवाले को कभी दही तो कभी अचार से छुआ-छुआकर खाया जाता है, यूँ अलग पराठे का रोल और चम्मच से दही अलग नहीं खाते अपने यहाँ।

क्रिस अवर्चनीय सुख में डूबा चुपचाप खा रहा था और ध्यान से उनकी एकएक बात सुन रहा था- ‘ अच्छा तो पौप्स कैसा है भारत, कैसा है आपका पंजाब? सरसों का खेत, गन्ने का रस…यूँ तो मैंने कई-कई बातें किताबों में पढ़ी हैं, फिल्में देखी हैं और अपने गुरु व माँ से भी बहुत कुछ सुना व जाना है भारत के बारे में, पर आज सब आपकी आँखों और मन से जानना चाहूंगा। दिखाएंगे, बताएंगे ? ‘ बच्चों की सी सहजता और अबोधता से अब पौप्स कहता और निष्पलक उनकी तरफ देखता, बीच-बीच में मंत्रमुग्ध क्रिस एकाध ऐसे सवाल भी पूछ ही ले रहा था जो अर्जुन सिंह की आत्मा तक को गुदगुदा रहे थे अब। अब कोई अटपटापन शेष नहीं था उनके बीच।

बेहद अपना, बेहद प्यारा लग रहा था क्रिस उन्हें। कैसे इतने दूर रह पाए वह, आश्चर्य था खुद पर ही उन्हे। बिन-ब्याहे, बिन पत्नी के अर्जुन सिंह का इतना खूबसूरत, इतना समझदार बेटा ! उनकी आंखों से स्नेह उमड़ा पड़ रहा था। पूरे बाप बने दिख रहे थे वह…दिख क्या, बन ही चुके थे। क्रिस की एक खोज, एक लगन ने उनके जीवन को अपिरमित खुशियों से भर दिया था। बेटे की पीठ थपथपाते बोले. ‘चलेंगे, जरूर चलेंगे। साथ –साथ घूमेंगे, सबसे मिलेंगे। और तुम्हें मैं वह सब दिखाऊंगा। सब बताऊंगा…दिल्ली का लाल किला, अमृतसर का स्वर्ण मंदिर और भी बहुत कुछ …तुम्हारा अपना घर, मोहल्ला, अपने लोग…जरूर मिलवाऊंगा तुम्हें सबसे, जरूर बताऊंगा सबके बारे में। तुम्हारा हक है जानने का।‘

‘और हाँ, अगली बार मैं तुम्हें मक्के की रोटी और सरसों का साग मठ्ठे के पेय के साथ परोसूंगा। अक्सर सुबह के नाश्ते में मैं यही खाया करता था दिल्ली में। आए दिन जिद करके बनवाता था। मुझे मालूम है तुम्हें भी बहुत अच्छा लगेगा…और हाँ गरम-गरम दूध और जलेबी भी। ‘

वह अब अपने और क्रिस के बचपन को पूरा-का-पूरा हर खट्टी-मीठी याद के साथ दोबारा जीना चाहते थे। वाकई में बालक क्रिशिव की उंगली पकड़े अपने गांव में ही तो पहुंच गए थे अर्जुन सिंह, हुलस-हुलसकर खेत खलिहान, बाग बगीचे सब दिखलाते, सबसे मिलवाते…गुरुद्वारे , मंदिर हर देवी-देवता के आगे मत्था टेकते अपने गबरू जवान बेटे के साथ।

चन्द मुलाकातों में ही कितना सहज हो गया था उनका यह रिश्ता। पॉल के साथ तो बीसियों साल में भी ऐसा नहीं हो पाया। उचित-अनुचित और यह वह के दायरे में ही गुत्थंगुत्थ रहा वह सदा । तुलना नहीं करना चाहता था, फिर भी बहुत कुछ मथ रहा था क्रिस के मन और मस्तिष्क को। बेचैन मन कभी उड़कर उनके सीने से जा लगता तो कभी रूठकर कोप भवन में जा बैठता- ‘जब साथ नहीं रख सकते थे तो क्या अधिकार था, मुझे यह बाप के नेह और संरक्षण से वंचित अनाथ जीवन देने का !’

एकबार, बस एकबार उनकी गोदी में सिर रखकर लेटना चाहता था क्रिस, बच्चों की तरह उनकी गोदी में बैठना चाहता था। परन्तु आमने सामने हाथ भरकी दूरी पर बैठे रहकर भी, अभी भी दूरियां थीं उनके बीच…

‘अच्छा तो चलूँ, मां इंतजार कर रही होगी।‘
सारे भावनात्मक तूफान से उद्वेलित, बेचैन वह उठ खड़ा हुआ। पैर कांप रहे थे उसके। सहारा चाहिए था उसे। आंख, कान सब लाल हो चुके थे और पसीने की धार माथे से लेकर कनपटी तक बह रही थी।

बेटे का पसीने से लथपथ चेहरा देखते ही, दौड़ते-से अर्जुन सिंह उठे और बाँहों में भरकर तुरंत ही सहारा बनकर जा खड़े हुए उसके बगल में। माना दे कर भूल गए थे, पर है तो उनका अपना ही बेटा, अब अनदेखा करना संभव नहीं था उनके लिए। अभी तक जो पिता-पुत्र का स्नेह एक एहसास मात्र था, गले लगाते ही मूर्त रूप ले चुका था। जाने कितनी देर सीने से लगाए खड़े रहे अर्जुन सिंह। क्रिशिव भी अब उनके सीने में सिर छुपाए, एक अबोध शिशु सा सुबक रहा था और अर्जुन सिंह की उँगलिय़ां कभी उसके बाल तो कभी पीठ सहला-सहलाकर सांत्वना दे रही थीं। फिर अचानक मानो सोते से जग गए बाप-बेटे और तुरंत ही तटस्थ भी हो गए दोनों। और तब एकबार फिर भीगी पलकों को पोंछते हुए अर्जुन सिंह ने ही पहल की -चलो क्रिस, तुम्हें अपनी लाइब्रेरी दिखाता हूँ आज। वहाँ अपने बचपन की कुछ तस्बीरें भी हैं मेरे पास। अमृतसर, तुम्हारी अपनी दादी सबसे मिलवाउंगा मैं तुम्हे आज।

‘सौरी, आज नहीं। मुझे जाना होगा अब। स्क्वाश खेलने जाना है अभी।‘

संबोधन घोट गया क्रिस इसबार। उसे जैनी की चेतावनी याद आ गई थी।

‘ एक रात सोना है, तो सो लो। कुछ समय बिताना है तो बिता लो। रोकूंगी नहीं मैं तुम्हे। पर ध्यान रखो, उनकी जिन्दगी में तुम्हारी कोई जगह नहीं है। माना कि एक अच्छे और शरीफ इन्सान जान पड़ते हैं अर्जुन सिंह फिर भी उनके लिए तुम्हारे अस्तित्व का कोई महत्व नहीं। आड़े वक्त में चन्द पाउन्ड की जरूरत का साधन मात्र थे तुम। जान लिया, ठीक है। परन्तु दूसरों की जिन्दगी में यूँ अनचाहा अतिक्रमण न तो ठीक और ना ही वांछनीय।‘

शब्द नहीं, मानो एक बेसुरे रिकौर्ड की क्रिच-क्रिच करती आवाजें थीं कानों में जिन्हें चाहकर भी वह भूल नहीं पा रहा था। अनचाहा अतिक्रमण…क्रिस का मन किया फूटफूटकर रोए । शायद ही कोई बाप-बेटे इतने एक से लगते हों। विडंबना थी यह भी प्रकृति की…दूर से ही देखकर कोई भी कह सकता था कि वे बाप-बेटे ही हैं।

‘सुनो मैं भी तुम्हारे साथ स्क्वाश खेलूँगा। खेलने दोगे न?’

अर्जुन सिंह खुद अब क्रिस के आगे बच्चों से मचल रहे थे, अपनी उम्र, अपने ओहदे…सारी औपचारिकता को भूलकर। ‘और हाँ, तुम चाहो तो मुझे डैड कह सकते हो। अगर तुम्हें पौप्स अच्छा लगता है तो यही कहो। इसमें भी कम प्यार नहीं। और हाँ हफ्ते में नहीं , तो कम-से-कम महीने में तो यहाँ आकर रहना ही है। यह कमरा अब तुम्हारा ही है। जैसे चाहो रखो, रहो, तुम्हारी अपनी मर्जी है। बस भूलना नहीं कि इसे और मुझे सदा ही इंतजार रहेगा तुम्हारा। ‘

दरवाजे से बाहर जाते-जाते क्रिस को रुधे गले से अर्जुन सिंह ने रोककर कहा था यह सब। और फिर –‘यह तुम्हारे लिए है। हाल ही में खरीदी थी।’-कहते सुएड की मंहगी अरमानी की अपनी जैकेट उसके हाथों पर रख दी।

‘लाया तो अपने लिए था पर अब चाहता हूँ कि तुम ही इसे पहनो। तुम पर खूब फबेगी भी खूब। देखो, ना नहीं करना। यह पौप्स का आशीर्वाद है तुम्हारे लिए।‘

ना नहीं की थी क्रिस ने तब। बस, सबकुछ वहीं छोड़ता, पीछे मुड़े बिना, बिना उन्हे देखे, जबाव दिये बगैर ही, तेजी से बाहर निकल आया था वह। पास के ही पार्क में एक बेंच पर जा बैठा था। कितनी देर तक बैठा रहा एकांत में, याद नहीं, परन्तु उठा तो डूबता लाल सूरज भी उसकी रोती आंखों से कम लाल था और जलते अंगार-सा चुभ रहा था अब उसकी आँखों में।

घर पहुँचा तो बेहद उद्वेलित, प्रतीक्षा करती माँ ने ही दरवाजा खोला।

फिर तो सवालों की बौझार थी।

‘कहाँ थे तुम अब तक? मोबाइल क्यों स्विच औफ कर रखा था ? बताओ, कैसे कौन्टैक्ट करती मैं तुमसे ! और यह क्या शक्ल बना रखी है ? ‘ मां की आंखें थीं। कुछ नहीं छुपा पाया क्रिस उनसे।

‘ईजी मौम, ईजी। यू वरी टू मच। आइ एम ए ग्रोन अप बौय नाओ।‘

क्रिस मां को तसल्ली देता, करीब-करीब गोदी में उठाता-सा घर के अंदर ले आया।

क्रिस ने देखा कदकाठी में छोटी-सी, सुकुमार उसकी माँ गुस्से और भय से पत्ते-सी थरथर कांप रही थी और सामने दीवार पर दोनों की आपस में मिली गुंथी परछांई भी। यह कैसे भंवर में फंस गया है वह और उसकी माँ…अबतक आने वाले तूफान का पूरा एहसास हो चला था उसे ।

‘तुम अब वहाँ नहीं जाओगे।‘ जैनी के स्वर में ऐसी दृढ़ता उसने पहले कभी नहीं देखी और सुनी थी।

मां के स्वर की वह सख्ती क्रिस को आहत कर रही थी। बिना जबाब दिए वह भी खिन्नमन ऊपर अपने कमरे में चला गया और दरवाजा अन्दर से बन्द कर लिया। जब भी आहत होता है, या खुदको सुलझाना चाहता है, ऐसे ही करता है क्रिस, जैनी जानती थी, इसलिए उसने भी नहीं रोका ।

निढाल जैनी खुद भी तो कमरा बन्द करके बिस्तर पर जा पड़ी थी। उसका भी तो मन नहीं कर रहा था किसी से मिलने या बात करने का। बन्द पलकों के नीचे बेहिसाब आंसुओं की नमी थी। एक साधारण खुशहाल जिन्दगी की चाह में जिन्दगी दूर और दूर फिसलती ही चली गई थी उससे और अब एकबार फिर सारे सिरे गडमड थे सुलझे धागों के। फिर भी एक मोर्चे पर डटे सिपाही की तरह हिम्मत नहीं हारेगी जैनी। हाँ, पर अब इस उम्र में जाकर जिन्दगी यूँ उलझ जाएगी, कब सोचा था उसने। फिर, अपने को , अपनी सोच को संभाला जा सकता है, दूसरों की को तो नहीं ही। कैसे दूर रखे खुद को , बेटे क्रिस को, इस मि. अर्जुन …’व्हाट एवर हिज नेम इज ‘ से। माना कि सज्जन लगता है…पर तूफान को आमंत्रण दोगे तो नाव तो डूबेगी ही। फिर उसकी तो पतवार तक टूट-टूट कर जुड़ी हुई है, सैकड़ों तूफान पार कर चुकी है वह अकेली ही। जिन्दगी आसान नहीं रही कभी जैनी के लिए, पर अतीत का यह प्रेत इतना परेशान करेगा- इसअनहोनी की तो कल्पना तक नहीं की थी उसने। स्पर्म को कोख में प्रतिष्ठित करवाते समय कोई चेहरा कोई अस्तित्व नहीं था इस व्यक्ति का। कुछ नहीं था उसकी आंखों के आगे, सिवाय अमित को, उसकी यादों को जिन्दा और अपने पास रखने के अलावा। इसीलिए तो बस एक भारतीय सपर्म ही चाहती थी जेनी और उसे ही अपनी कोख में पाल रही थी, बस्स यही एक उसका ध्येय भी था और लक्ष्य भी। उसके लिए तो न होते हुए भी, वह अपने दिवंगत पति अमित का ही बेटा था। जैसे कभी हिन्दू पौराणिक कथाओं में पार्वती ने अपने सुख, अपनी रक्षा के लिए गणपति को गढ़ा था वैसे ही रचा था उसने भी क्रिस को बिना पति या किसी पुरुष के सहवास के।

क्रिस हुआ तो खुश थी वह । शकल-सूरत में काफी कुछ अमित की तरह ही था क्रिस। वही घुँघराले बाल, वही मन बेंधती आखें और वही मोहक मुस्कान ! वह तो कभी कुछ बताती ही नहीं। जरूरत भी नहीं थी इसकी। पर, जैनी के रोकने पर भी पॉल ने यह सब क्रिस के लिए जानना जरूरी समझा था- भविष्य में ग्रन्थियाँ और तनाव नहीं चाहतीं न तुम, तो सच का सामना करने दो इसे। रोकने पर यही कहा था। पर जैनी आगत के भय से कांप उठी थी-यह कैसे संभव है कि नींव का पत्थर खींचा जाए और इमारत न हिले, फिर यह नींव तो खुद एक भावात्मक जरूरत, एक झूठ पर टिकी हुई थी।

समझदार होते हुए भी पॉल न सहेज पाया था उसके इस अवर्चनीय सृजन और रहस्य को। सब बता दिया था क्रिस को उसने। कैसे और क्यों वह इस दुनिया में आया, क्यों वह उसे पौप्स नहीं कह सकता, क्यों वह देखने में , कद-काठी में परिवार से भिन्न है। यहां तक कि जिसका नाम अपने नाम के साथ जोड़कर घूमता है वह, वह भी तो उसका बाप नहीं। एक हाइब्रिड, जैसे-तैसे जोड़ा-घटाया बेटा ही है बस वह इस परिवार का।

‘ पर जैनी तो मेरी मां है…यह तो सत्य है…या फिर इसमें भी कोई शक है, आपको? ’ नफरत और हिराकत की लपटों से धधक उठा था क्रिस उस दिन । पैर पटक कर आग्नेय निगाहों से सबको देखता, ताश के पत्तों सा ढह गया था चौदह वर्षीय किशोर।
खुद को संभालने में , खड़ा करने में फिर हफ्तों लगे थे उसे। तब क्रिस के मन में यह तूफान …यह अपने बायलौजिकल पिता को ढूँढने की बेचैनी भी एक ज़िद ही तो बन गई थी ।

जैनी समझ सकती थी बेटे का दर्द, परन्तु अब तो सिर्फ एक खोज नहीं, वह देख रही थी, भावात्मक रूप से भी जुड़ा जा रहा था क्रिस अर्जुन सिंह से। और यह जुड़ाव शीत और उष्मा का जुडाव था। अतीत में नहीं ही लौटा जा सकता, उम्र भर का अनुभव था जैनी का यह। वक्त और समाज की बड़ी खाई थी दोनों के बीच। दोनों परिवारों को ले डूबेगा यह तूफान। इसे रोकना ही होगा। जैनी कृत संकल्प थी। अपने लिए नहीं तो क्रिस के लिए तो अवश्य ही कुछ करना होगा उसे। बहुत प्यार करती थी वह अपने बेटे से।

उधर क्रिस शावर लेकर कपड़े बदल चुका था । आत्मा में जब बेचैनी हो तो भूख प्यास किसे लगती है? बिना कुछ खाए पिए सोने की तैयारी में बिस्तर पर लेटा तो टेलिवजन पर चल रही एक खबर ने चौंका दिया। पूरी तरह से जगा ही दिया उसे। जापान में साढ़े छह मीटर बर्फ गिरी थी , पूरा खड़ा आदमी डूब जाए इतनी। जिसमें कई जानें भी गईं और कई अजूबे भी हुए। खबर चल रही थी- बर्फ में फंसी एक कार में दम्पत्ति की तो चलते इंजन से पैदा कार्बन मौनोऔक्साइड से मौत हो गई पर मां की कोख में पलता बच्चा जिन्दा है, डॉक्टरों ने उसे बचा लिया है। ‘-क्या जिन्दगी होगी उस बच्चे की भी?’ क्रिस एक बार फिर बेहद बेचैन था अपने लिए नहीं, उस बच्चे के लिए। ‘ मिलना तो दूर, वह तो कभी अपने मां-बाप को ढूँढ तक नहीं पाएगा ! शायद धिक्कारे भी विधाता को कि क्या जरूरत थी उसे पैदा ही करने की , बचाने की ! खुशकिस्मत है वह कि दूर भले ही सही, उसके मां बाप दोनों जिन्दा हैं। वह उन्हें देख सकता है, उनसे मिल सकता है, सुख-दुख बांट सकता है। अपनी अपनी मजबूरियों के बाद भी दोनों उसे बेहद प्यार करते हैं, यह भी जान चुका है वह। फिर दुख किस बात का, यह उदासी क्यों? ‘

‘…खुश ही रहना होगा उसे और मां बाप को भी खुश ही रखना होगा ! ‘
क्रिस वाकई में अंतस् के कोर तक भारतीय महसूस कर रहा था अब खुद को।

योग्य पुत्र राम की तरह होते हैं जो मां-बाप के वचन और इच्छाओं का पूरा ध्यान रखें जानता था वह परन्तु योग्य पुत्र श्रवण कुमार की तरह भी होते हैं जो मां-बाप के हर दुख हर कठिनाइयों को अपने कांधे पर ले ले और उन्हें हर सुख दे, यह भी जानता था वह। जान गया था वह अपनी पहचान को, अपनी परंपरा को अपनी जड़ों को। जान गया था वह कि क्यों सैकड़ों विषयों में से इंडियोलौजी को ही पढ़ने के लिए चुना था उसने। यूरोप की इस सभ्यता में पल बढ़कर भी जान गया था वह कि उसके अंदर के राम और श्रवण को अब और सुप्त अवस्था में नहीं रखा जा सकता। वे उसके बगल में खड़े, एक अबूझ और अद्भुत आत्मबल और संतोष देने लग गए थे उसे।

क्रिस अमित मजमूदार वाकई में अंतस् के कोर-कोर तक भारतीय था..एक बेहतरीन इंसान था…मन से भी और संस्कारों से भी। उसने खुद को कैसे भी संभाल ही लिया।

बाथरूम से आंसू भरा चेहरा धोकर वापस ही लौटा था कि दरवाजे पर खटखट हुई। जैनी और साथ में गोपी और पॉल सभी उसके लिए ऊपर ही खाना लेकर आ गए थे। मिलबैठकर सबने खाना खाया और एक गेम स्क्रैबल का भी खेला। रात के एक बजे तक हंसी ठहाकों की महफिल चलती रही। उदासी कहां गुम हो गई पता ही नहीं चला। अगली सुबह तक वह एक निश्चय कर चुका था और शाम कौलेज से लौटते ही बरबस उसके पैर 5, औक्सफर्ड ड्राइव, अर्जुन सिंह के घर की तरफ स्वतः ही मुड़ गए।

क्रिस ने देखा गुजरे इतवार की तरह ही, उस दिन भी अर्जुन सिंह बाहर बगीचे में अपनी बागवानी में ही मस्त थे । पलभर को तो क्रिस उमड़ते स्नेह के साथ अपलक खड़ा उन्हें देखता रहा। फिर चहककर उनके कहते ही- ‘आओ बेटे, आओ। व्हाट ए प्लेजेन्ट सरप्राइज ’ आंसू पोंछ, कैसे भी लड़खड़ाते कदमों से उनके पास पहुंच भी गया। पर जिस मन्सूबे से आया था, बहुत मुश्किल से ही बता पाया। खुद अपनी ही रुंधे गले में डूबी वह आवाज बेहद बेगानी लग रही थी क्रिस को।

– ‘ सौरी, पौप्स, मैं अब आपसे मिलने नहीं आ पाऊंगा। ‘

जाने कितनी हिम्मत जुटाकर क्रिस ने यह बात कही थी खुशी से दमकते अर्जुन सिंह से। पर तभी क्रिस को पूरी तरह से चौंकाते और दहलाते, अर्जुन सिंह अचानक भरभराकर गिरते से पास पड़ी बेंच का सहारा लेते, जैसे तैसे संभले और गिरने से ठहर पाए। क्रिस भी चुपचाप उनकी बगल में जा बैठा। उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि अब उसे और क्या करना या कहना चाहिए। पौप को ऐसे छोड़कर भी तो नहीं जाया जा सकता! बेसब्री से उसका इंतजार करते पौप से यह कहकर उसने सही किया या गलत, नहीं जानता था वह। आसान तो नहीं था उसके लिए भी यह कह पाना, इतना कठोर निर्णय लेना , उस निर्णय पर टिक पाना! पर यह सुख-दुख भी तो एक संक्रामक बीमारी ही हैं और उसके अंदर भी तो बहुत कुछ टूट और रिस रहा था उनके बहते आंसुओं के साथ साथ।

सूनी सूनी निराश आंखों से उसकी तरफ देखते हुए, अर्जुन सिंह ने झुककर धरती से मुठ्ठी भर धूल उठाई , तो सूखी गिरी बूढ़ी टहनियों के साथ कुछ बीज भी आ गए उनकी खुली हथेली पर। सिर उठाकर देखा तो सूखी वाइचिलिया और मेपल की शाखें अकुआने लगी थीं । जाड़े भर निस्तेज खड़े हायसिन्थ ने भी लहलहाना शुरु कर दिया था। नीचे कुछ कोपलें भी उग आई थीं। और पातहीन शाखों की ऊंची टहनियों पर नजर आ रहे थे कुछ हाल ही में बने चिड़िया के घोंसले। बसंत पंचमी के आते आते हवाओं में फागुनी सरसराहट शुरु हो जाती है। मौसम का मिजाज गुलाबी हो उठता है, बसंत के मादक पदचापों की आहट साफ सुनाई पड़ने लग जाती है चारो तरफ और धरती की कुलबुलाती कोख से उगने लगते हैं तरह तरह के बेल बूटे- इस मौसम के बदलाव को कोई भी नहीं रोक सकता भलीभांति जानते थे वह…क्रिस भी नहीं।

और तब एक क्षीण मुस्कान तैर गई पपड़ियाए होठों पर..’.हम चाहें न चाहें..प्रकृति का क्रम कौन रोक पाया है, कब रुकता है यह। हर ऋतु का अपना एक जादू है, एक परिवर्तन है क्रिस ,जो अवश्यंभावी भी है और सही भी।… जीवन की तरह ही। हम भी तो यूँ ही उगते-मिटते फिर फिर के उगते रहते हैं। प्रकृति का यह नियम ना तो बदला है और ना ही बदलेगा। हमारा मिलना, तुम्हारा जन्म, यह सब भी बस उसी के अधीन था। हमारा इस मौसम में यूँ मिलना भी क्या उसका ही एक और संकेत ही नहीं ? सुनो, ध्यान से देखो, क्रिस। मैं जाता हुआ शिशिर, बहार, यानी कि तुम्हे बीज रूप में अपने अस्तित्व में छुपाए हुए था.. हूँ, तुममें आज भी। जाऊंगा कहाँ-मैं तो जिऊंगा, हंसूगा तुममें ही रचा बसा क्रिस, जैसे कि तुम जिओगे हंसोगे मेरी छांव में… मुझमें। यह क्रम तो चलता ही रहेगा। इसे न तुम बदल सकते हो और न मैं।‘

क्रिस ने देखा अब उनकी आवाज बहुत शान्त हो चुकी थी। तटस्थ हो चुकी थी, मानो दूर कहीं गहरे कुँए से आ रही हो-‘ तुम भी समझोगे, महसूस करोगे इस बात को एकदिन, आज नहीं तो कल, जब मैं तुम्हारा बेटा या पोता बनकर खेलूंगा तुम्हारी गोद में। हम तुम यूँ ही उलका पात से टकराते रहेंगे, गुजरते रहेंगे एक दूसरे के पथ से। तुम न चाहो, तुम्हारी मां जैनी न चाहे, पर कोई नहीं रोक सकता इस क्रम और आकर्षण को। विछोह के साथ-साथ सृजन की..मिलन की ऋतु भी तो यहीं पर है। और मैं इंतजार करूंगा उस ऋतु का, तुम्हारे लौटने का।…कहते हैं दान की हुई चीज से कोई मतलब नहीं रखना चाहिए पर कुछ दान पुण्य बनकर लौटते हैं हमारे जीवन में…अचानक अर्जुन सिंह जोर-जोर से हंसने लगे । क्रिस देख रहा था एक और अनहोनी हुई पौप अपने में ही समाधिस्थ-से होते जा रहे थे। होठों पर एक संतोष जनक स्मित थी और आंखों से निर्मल अश्रुधार । तब एक योगी-से ही तो लगे पौप उसे।

‘ डैड-डैड, कहीं नहीं गया हूँ मैं। यहीं हूँ। हाँ, डैड यहीं हूँ, आपके पास। हम भला एक दूसरे को छोड़कर कहाँ जा सकते हैं ?’

और तब बूढ़े बाप के झुके कंधों को सहारा देता उनके लिए चिंतित क्रिस उन्हे कमरे के अंदर ले आया ।

आराम कुर्सी पर बिठलाकर जब अर्जुन सिंह को गरम-गरम सूप पिला रहा था क्रिस तब उसने पहली बार देखा उस अदृश्य परन्तु बेहद मजबूत नेह के धागे को, जिसे कोई नहीं तोड़ सकता था। जैनी भी नहीं। हर शक और सुबहे, सच-झूठ की गुंजाइश से परे, शाम के उस गुलाबी धुंधलके में अब तो दोनों की परछाइयां तक एक हो चुकी थी । …

शैल अग्रवाल
21 जनवरी 1947 वाराणसी, भारत में जन्म व संपूर्ण शिक्षा। 1968 से सपरिवार ब्रिटेन में। 50 से अधिक देशों का भ्रमण।
अंग्रेजी, संस्कृत व चित्रकला में स्नातक प्रथम श्रेणी आनर्स के साथ। अंग्रेजी साहित्य में एम.ए. । सितार और भारतनाट्यम में प्रशिक्षण। रुचि कलात्मक व रुझान दार्शनिक। बचपन के छिटपुट लेखन के बाद गंभीर लेखन जीवन के उत्तरार्ध में 1997 के बाद। रचनाएं देश विदेश की प्रमुख पत्रिका व संकलनों में। दो उपन्यासः शेष अशेष व मिट्टी धारावाहिक की तरह प्रकाशित। पिछले दो दशक से अधिक हिन्दी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में निरंतर लेखन। प्रकाशित पुस्तकेः समिधा -काव्य संग्रह, ध्रुवतारा- कहानी संग्रह, बसेरा- कहानी संग्रह, लंदन पाती -निबंध संग्रह। रचनाएँ मराठी, नेपाली, मलयालम व अंग्रेजी में अनुवादित।
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