कहानी समकालीनः गुनाह बेलज्जत-राम नगीना मौर्य

‘‘उस दिन बाजार जाते समय पूरे रास्ते भर यही सोचती रही कि घर से निकलते वक्त नल में पानी नहीं आ रहा था। लाइट भी कुछ देर पहले ही चली गयी थी। पता नहीं मैंने नल की टोटियां बन्द की थीं कि नहीं…। कमरे और बरामदे में पंखे और ट्यूबलाइट्स आदि के स्विच बन्द किये थे या नहीं…। गैस का नॉब खुला ही तो नहीं छोड़ दिया था…। यहां तक कि घर के पिछवाड़े वाले दरवाजे में ताला लगाया भी था या सिर्फ कुण्डी ही बन्द की थी…। सोचा आपसे कहूंगी तो खाहमखाह परेशान होंगे, मुझ पर नाराज होंगे। डांटने भी लगेंगे। सो चुप लगा गयी। पूरे रास्ते इन्हीं सब उहा-पोह में रही। मन में उलझन बना रहा। बाजार से जो भी सौदा-सुलुफ आदि खरीदना था, कुछ भी ठीक से याद नहीं आ रहा था। उसी उधेड़बुन में ये ध्यान भी नहीं रहा कि खरीदने वाले सामानों की लिस्ट कहां रख दी…? बाजार से लौट कर देखा तो मेरी सभी आशंकाएं निर्मूल साबित हुईं। नल की टोंटियां बन्द थीं। पंखे-बत्तियों…के सभी स्विच, यहां तक कि गैस का नॉब भी बन्द था, और पिछवाड़े के दरवाजे पर ताला भी बन्द मिला। देखिए जी! अब आगे से हम जब भी घर से बाहर निकलेंगे तो आप भी इन सब बातों का ध्यान रखेंगे। अब मेरी भी तो उमर हो चली न!…कुछ चीजें आप भी तो याद रखा कीजिए…।’’

पत्नी ने अभी पिछले हफ्ते ही तो लगभग चिरौरी की सी मुद्रा में ये सब कहा था मुझसे। अब बीच रास्ते में इस समय मैं यही सोच रहा हूं कि आज सुबह घर से निकलते वक्त हमने पंखे-बत्तियां, गैस का नॉब, और नल की सभी टोंटियां, वगैरह, बन्द किये थे कि नहीं…? आगे-पीछे के सभी दरवाजों के लॉक आदि ठीक से चेक किये थे या नहीं…? मुझे तो ठीक-ठीक कुछ याद नहीं आ रहा, पर क्या पत्नी को इन सब के बारे में याद दिलाना ठीक रहेगा? मान लीजिए…मैं उन्हें अपनी इन आशंकाओं के बारे में अगर बताऊं, तो वो भी तो इस बारे में सोच-सोच कर परेशान होंगी। ऐसे में कहीं इस खुशनुमा सफर, उनकी छुट्टियों का मजा ही किरकिरा न हो जाये…?

पत्नी तो अपने बगल वाली सीट पर बैठी महिला संग खूब घुल-मिल कर…चहकते हुए बतियाने में मगन हैं। साफ दिख रहा है कि उनसे बतियाते समय पत्नी के मुख-मण्डल पर गजब की आभा बिखरी हुई है। घर में तो हमेशा इनके सिर में मधुरे-मधुरे…अधकपारी ही धरे रहता है। ऐसा लगता है जैसे इनके मुंह में जुबान ही नहीं है? यहां देखिये…कैसे पचर-पचर बतियाये जा रहीं हैं। आखिर…काफी समय बाद नइहर जाने का उल्लास भी तो इनके मन में होगा…?

सामने की सीट पर एक बच्चा, जिसके माथे पर उसकी मां ने काला डिठौना लगा रखा था, कभी अपनी मां के कंधे पर तो कभी गोद में आते-जाते, खेल रहा है। खेलते-खेलते कभी वो बच्चा अपनी मां की लटों को, तो कभी उनकी कनबालियां खींचते, उन्हें परेशान कर रहा है। महिला भी अपने बच्चे संग खेलती, गुस्साती तो कभी उस संग खुद भी किलकारी मार रही है। मां-बेटे को इस तरह खेलते देखना अत्यन्त सुखद लग रहा है। बड़ा ही सुहावना मंजर है। थोड़ी देर के लिए मैं भी अपने संशय-वंशय भूल कर उस बच्चे को देखने में मशगूल हो गया।

मेरे दोनों बच्चे, काफी देर तक खिड़की के बगल वाली सीट पर बैठने के लिए लड़ने-झगड़ने, ‘ओक्का-बोक्का’ खेलने के बाद अब मशगूल हैं…रास्ते में पड़ने वाले बीच के स्टेशनों के कुछ दूर तक पटरियों के दोनों किनारों पर बसी बस्तियों, दुकानों, उन पर लगी होर्डिंग्स आदि को अपनी ही स्टॉयल में खीसें निपोरते, बोल-बोल कर पढ़ने में मगन हैं। यानि सभी मगन हैं अपने-अपने तरीके, और या़त्रा का भरपूर आनन्द भी ले रहे हैं।

ऐसे में दाल-भात में मूसलचन्द बनना अच्छी बात नहीं होगी। अपनी आशंकाओं के बारे में पत्नी-बच्चों से कुछ पूछ-ताछ कर, उन्हें बिलावजह ही डिस्टर्ब करना, उन्हें संशय में डालना अच्छा नहीं होगा। पत्नी, लगभग चार साल बाद अपने नइहरे जा रहीं हैं, और फिर बच्चे भी तो जा रहे हैं अपने नाना-नानी के घर। ऐसे में इन्हें टोकना, इनके रंग में भंग डालने के बराबर होगा। या़त्रा के दौरान, आखिर…कोई तो निश्चिन्त रहे? थोड़ी देर के लिए ही सही?

पर बार-बार मेरे मन में ये विचार आलोड़न-बिलोड़न भी हो रहे हैं…‘मान लीजिए…वापस घर लौटने से पहले ही पत्नी ने इन आशंकाओं के बारे में कहीं मुझसे पूछ लिया अगर तो मैं उन्हें क्या जवाब दूंगा?

मैं भी कितना बेवकूफ हूं। मुझे घर से ऐन निकलते वक्त ही इन सब बातों के बारे में क्यों नहीं याद रहा…? अब तो घर से पचासों किलोमीटर दूर निकल आये हैं हम-सब-जन। अब तो चाह कर भी इस संशय का तात्कालिक समाधान सम्भव नहीं। पत्नी तो बाज मौके कहती भी हैं…‘‘आप भी बुड़बकै रह गये।’’

पत्नी इतने दिनों बाद अपने नइहर जा रही हैं। मुझे उन्हें किसी प्रकार के धर्म-संकट में डालना उचित नहीं रहेगा। फिर बच्चे भी तो कितने खुश हैं…। हाल-फिलहाल-बहरहाल अब इस मुद्दे पर मुझे ज्यादा मंथन नहीं करना है।

इस कहानी को तो यहीं समाप्त हो जाना चाहिए। पर ऐसा हो नहीं सका। ये चंचल मन-मयूर भी जाने किन-किन बियाबानों में नाचता-भटकता फिरता रहता है? किसी करवट चैन से बैठना ही नहीं चाहता। रह-रह कर बेकाबू हो रहा है। बड़ी देर से न खुद चैन से बैठ रहा है, न मुझे ही चैन से बैठने दे रहा है।

इस समय पत्नी पूरे उत्साह से लबरेज अपने बगल में बैठी महिला संग बतियाने में मशगूल हैं। दोनों महिलाओं के बीच घर-परिवार-सास-ससुर आदि की निन्दा-स्तुति की वार्ता का प्रथम दौर समाप्त हो चुका है। वार्ता के दूसरे चरण में वे अपने-अपने पतियों की नौकरी, कितना तनखाह पाते हैं? कितने लरिका-बच्चा लोग हैं? किस-किस क्लॉस में पढ़ते हैं? आदि-आदि की चर्चा के बाद, अब वे वार्ता के तीसरे चरण में महंगाई, चुनाव, सरकार गठन आदि खबरों पर चर्चारत हैं।

उनकी आपसी बातें सुन, कभी पढ़ी, कुम्भ मेले पर लिखी ‘कैलाश गौतम’ की कविता ‘अमौसा का मेला’ की ये कुछ पंक्तियां बरबस ही याद आ गयीं…‘‘ए ही में चम्पा-चमेली भेंटइली, बचपन की दूनों सहेली भेंटइली/ ई आपन सुनावें उ आपन सुनावें, दूनों आपन गहना-गदेला गिनावें/ असों का बनवलू, असों का गढ़उलू, तू जीजा का फोटो न अब तक पठवलू/ न इन्हें रोके न उन्हें रोकें, दूनों अपनी दुल्हा की तारीफ झोंके।’’

चूं कि इस प्रकार की बात-बतकहियों में पत्नी के अन्दर भरपूर आत्मविश्वास एवं चेहरे पर आई अप्रतिम-आभा का अभूतपूर्व संगम सा दिखने लगता है, अतः ऐसे में उनके आत्मविश्वास एवं चेहरे पर आयी इस कांति को मैं असमय ही निस्तेज नहीं करना चाहता, पर क्या करूं मजबूरी है? ये चंचल, अधीर मन, मान ही नहीं रहा। अब ज्यादा माथा-पच्ची करने के बजाय उचित होगा कि मैं उन्हें भी, उनके कर्तव्यों की याद दिला ही दूं, क्योंकि समय रहते याद न दिलाने पर, या बाद में याद आने पर भी तो वो मुझे ही कोसेंगी न?

ट्रेन अभी खड़ी है। यही उपयुक्त अवसर है, और यही समय की पुकार भी। बेवजह, किसी किसिम का कोई ग्लानि-बोध-अपराध-बोध क्यों हो? मुझे भी समय रहते, अपनी आशंकाओं-संशयों का समाधान कर लेना चाहिए। क्यों न पत्नी से ‘इनडायरेक्ट-मेथड’ से ही पूछ लूं?

‘‘तुमने कुछ कहा क्या मुझसे…?’’

‘‘नही तो…! आपके कान बज रहे होंगे शायद…।’’ पत्नी, जो ऐसे किसी अवांछित- अप्रासंगिक प्रश्न के लिए तैयार नहीं थीं, ने अचकचाते-अनमने ढ़ंग से मेरी ओर देखते कहा।

‘‘वही तो…तुमने कुछ कहा भी नहीं, पर मुझे लगा कि जैसे तुमने मुझसे कुछ कहा हो…जबकि तुमने तो कुछ कहा ही नहीं…पर मुझे ऐसा क्यों लगा?’’

‘‘हां…वही तो…! बिना मेरे कुछ कहे ही आपको सुनाई भी दे गया। क्या पता आपके कान बज रहे हों…, पर आप तो कहते हैं कि आपको कुछ-कुछ कम सुनाई देने लगा है। लेकिन…ये क्या कि बिना कुछ कहे भी आपको सुनाई देने लगा?’’

‘‘ऐसी बात नहीं है…अभी पिछले हफ्ते ही तो डॉक्टर को दिखाया हूं? ऑडियो-टेस्ट में उन्होंने सब ठीक बताते, कहा था कि ज्यादा परेशानी-वरेशानी लगे, तो अपाइंटमेंट लेकर आ जाइयेगा, कुछ टेस्ट-वेस्ट करेंगे, और हां…ये भी कहा था कि जरूरत हुई तो सुनने वाली मशीन-वशीन भी लगा देंगे।’’

‘‘लगता है…पिछली बार आपने अपना कान ठीक से चेक नहीं करवाया था। इस बार मैं भी आपके साथ चलूंगी। ऐसा लगता है…शायद, आप डॉक्टर साहब को अपनी समस्या ठीक से समझा नहीं पाये? इतना तो आप भी जानते होंगे कि किसी के सामने अपनी बात रखना भी एक कला है। आपके पास सचमुच अक्ल नहीं है। आखिर…साइन्स-साइड और आर्ट-साइड की पढ़ाई में फरक तो रहेगा ही न!’’

‘‘ठीक है, तुम बड़ी अक्लवान हो न! तो इस बारी तुम भी चलना मेरे साथ, डाक्टर साहब के पास, और बतिया लेना, अपने हिसाब से?’’

‘‘बकवास मत करिये। ट्रेन में बैठे हैं, घर में नहीं हैं। चार लोग सुनेंगे तो क्या कहेंगे? पर आप इतना बुझे-बुझे, नरभसाए से क्यों दिख रहे हैं? आपके चेहरे पर बारह क्यों बजे हैं? जबकि इस समय तो शाम के पौने चार बज रहे हैं। ऐसा लग रहा है जैसे कहीं खोये हुए हैं…या कुछ भूले हुए हैं, जिसे बार-बार याद करने की कोशिश कर रहे हों। लगता है…हमारे नइहर जाने की वजह से आप ज्यादा ‘खुश्श…’ नहीं हैं? कहीं इसी वजह से तो नहीं उड़ गया है आपके चेहरे का रंग?’’

‘‘अरे नहीं भई…ऐसी कोई बात नहीं है…अचानक कुछ जरूरी काम याद आ गया था, समझ में नहीं आ रहा कि वो काम क्या था। मैंने किसको सौंपा था…। कहीं मेरे स्तर पर ही तो पेंडिंग नहीं है।’’ इस तरह पैंतरा बदलते, निकष अपनी ही स्टायल, मैंने…पत्नी को बहलाने की कोशिश की।

‘‘ऐसा करिये…जब तक आपको वो काम याद आये, आप ये अखबार पढ़िये। इसमें आपके मतलब की खबर छपी है। आपके पसंदीदा साहित्यकार का इण्टरव्यू भी छपा है। इन्हें पढ़िये…और उनके सुविचारों से भरपूर लाभ उठाइये।’’ ये बहुमूल्य सुझाव देते पत्नी ने साथ लाया अखबार, बैग में से निकाल कर मुझे थमाते, अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर ली।

ससुराल पहुंचने में अभी काफी देर है। पर मेरे मन में चल रहे आलोड़न- बिलोड़न का कुछ समाधान नहीं सूझ रहा। चाहता तो नहीं था, पत्नी से अपनी आशंकाओं का जिक्र करना। पर क्या करूं…मेरा मन अनन्त…पल-भर स्थिर भी तो नहीं रह पा रहा। अब इस व्यग्र हो रहे मन को झूठ-मूठ की दिलासा दिलाना ठीक नहीं। ज्यादा सोच-विचार भी ठीक नहीं। आगे बढ़कर मुझे पत्नी से पूछ ही लेना चाहिए…,यह गुनाह-बे-लज्जत ही सही…।

‘‘बड़ी देर से एक ठो आशंका मन में रह-रह कर उठ रही है, तुम कुछ सुनो तो कहूं…?’’

‘‘उं…हूं कहिये-कहिये सुन रही हूं…।’’ पत्नी, जो उस समय सीट से पीठ टिकाए हल्के ऊंघ रहीं थीं, ने अनमने से कहा।

‘‘आज घर से निकलते वक्त, पंखे, बत्तियां, नल की टोंटियां, गैस का नॉब, सभी दरवाजों के ताले आदि चेक करने के लिए मैं तुम्हें याद नहीं दिला सका। मुझे भी इनके बारे में याद नहीं रहा। अब इतनी दूर निकल आये हैं, तो याद आया। निकलने से पहले तुमने इन सबको ठीक से चेक तो कर लिया था न?’’ कोई लाग-लपेट बतियाने के बजाय मैं सीधे ही प्वाइंट पर आ गया।

‘‘घर से निकलते वक्त वो ‘काम वाली बाई’ दिख गयी थी। कहीं उसी के खयालों में तो नहीं खो गये थे आप? जो भूल गये मुझे इन सब की याद दिलाना?’’ पत्नी ने अपनी सीट पर ही बैठे-बैठे लगभग नाइंटी डिग्री पर घूमते, थोड़े तैश भरे लहजे और व्यंग्यात्मक सुर में पूछा।

‘‘अरे नहीं भई…तुम्हें तो मेरी हर बात पर ही मजाक सूझता है।’’

‘‘लेकिन मैंने गौर किया था। घर से निकलते वक्त आप उसकी ओर कनखियों देख जरूर रहे थे।’’

‘‘हां मैं उसकी तरफ देख रहा था, पर अगर तुम्हें कोई दुविधा थी तो मुझे उसी समय टोकना चाहिए था?’’

‘‘मैंने तो इसलिए नहीं टोका कि देख लेने दूं, जी भर के, काहे से कि आज के बाद तो, आप एक हफ्ते के लिए ‘आउट-आफ-स्टेशन’ जा रहे हैं। एक हफ्ते तक तो आपको उसके दर्शन ही दुर्लभ हो जायेंगे।’’

‘‘मैं उसकी तरफ कनखियों देख जरूर रहा था, पर उसे नहीं उसके बच्चे को, जो मुंह में एक ‘कैण्डी’ डाले चूस रहा था। कितना मासूम लग रहा था? उसे कैण्डी चूसते देख मुझे यक-ब-यक अपना बचपन याद आ गया। बचपन में लेमनचूस चूसने वाले दिनों की याद आ गयी।’’

‘‘अच्छा तो आप उस बच्चे की मासूमियत से इस कदर मुतअस्सर थे कि घर से निकलते वक्त, आप अपने बचपन की यादों में खो गये?’’

‘‘नेचुरली’…पर…बस्स थोड़ी देर के लिए ही।’’

‘‘गजब का फ्लैशबैक वाला सेन्स पाया है आपने भी! क्षण में अतीत में, क्षण में भविष्य में, और अगले ही क्षण इधर-उधर से टहल-घूम कर, आपका दिमाग वर्तमान में वापस भी आ जाता है…? इतना क्विकली…कैसे आप ये डिसीजन ले लेते हैं? इसी वजह से तो सारा खेल बिगड़ गया। न बचपन की यादों में खोते, न इस उमर में पछताते। तभी तो कहूं कि आपका फ्यूज काहे उड़ा हुआ है? पर आधा रस्ता पार करने के बाद आपको ये दिव्यज्ञान कैसे हुआ?

‘‘तुम्हें बचपना सूझ रहा है? ये बचपना नहीं है।’’

‘‘बिलकुल! ये तो आपका सयानापन है। मैं कहां आपसे असहमत हूं। पर जहां तक मेरी जानकारी है, घर से दो-चार दिन के लिए कहीं बाहर निकलते वक्त…टिकट, पैसा, मोबायल-चार्जर, दवाइयां, जरूरी कपड़ा लत्ता, पानी की बोतल, आई-कार्ड, ए.टी.एम. कार्ड आदि जरूरी सामान रख लिए हैं कि नहीं? घर के सभी ताले, घर की सभी बत्तियां, गैस की नाब, नल की टोंटियां आदि बन्द हैं या नहीं? इत्यादि चीजों के बारे में तसदीक कर लेना चाहिए…न कि बचपन की यादों में खो जाना चाहिए…समझे कि नहीं?’’

‘‘अब बूझ-बुझौव्वल छोड़ो, और ये सोचो कि फिलवक्त समाधान क्या है…मेरी इन शंकाओं-आशंकाओं का…?’’ पत्नी को विषय की गहराई में जाते देख या बहस को गुरू-गम्भीर होते देख, मैंने पुनः ‘टू-दॉ-प्वाइण्ट’ बात करने में ही भलाई समझी।

‘‘अरे मेरे बुद्धू महराज…घर से निकल जाने के बाद, स्टेशन पर आने पर, ये सब बातें तो मेरे भी जेहन में आयीं थीं, पर क्या करती। ये सोच कर चुप लगा गयी कि आपसे जिक्र करूंगी तो आप मुझे ही दोषी ठहराते, मुझ पर गुस्साने-झल्लाने लगेंगे। नाहक ही ऊल-जलूल बातें सोचने-विचारने लगेंगे, और फिर मैं सफर का मजा भी तो किरकिरा नहीं करना चाहती थी।’’

‘‘यानि तुम्हें भी मेरी ही तरह फिक्र थी?

‘‘हां पर…जिन चीजों पर हमारा अख्तियार नहीं, उनके बारे में खाहमखाह सोच कर क्या परेशान होना…? वैसे इस बात की तसदीक तो आपको बहुत पहले कर लेनी चाहिए थी। जब घर से निकल रहे थे तभी, न कि इस समय। अब इन सब फिजूल बातों पर ज्यादा ध्यान देने से फायदा भी क्या, सिवाय दिमाग में टेंशन बढ़ाने के।’’ पत्नी ने मेरा मार्ग-दर्शन करना चाहा।

‘‘लेकिन ये तो एक तरह से रिस्क लेने के बराबर है?’’

‘‘आप ही तो कहते हैं न!…कभी- कभी हमें रिस्क भी लेना चाहिए। बोले तो ‘कैलकुलेटेड-रिस्क’। हमें अपने ‘कम्फर्ट-जोन’ से भी बाहर निकलना चाहिए। वैसे भी अब तो थोड़ी देर में हमारा स्टेशन भी आने वाला है। बच्चे अपनी नानी के घर पहुंचने वाले हैं। अब ये सब बातें सोच-वोच कर, इन्हें याद कर अपना मूड क्यों खराब कर रहे हैं? निश्चिन्त रहिए। किसी भी प्रकार की शंका-आशंका में बेवजह ही अपनी छुट्टियों का मजा खराब मत करिए।’’

‘‘फिर भी…तुम्हें तो पता है न!…‘लीक छांड़ि तीनों चलें, शायर, सिंह, सपूत।’ आखिर लिखने-पढ़ने वालों की जमात से हूं। चिन्तन करना स्वाभाविक जो है।’’

‘‘हां-हां…बड़का भारी लिख्खाड़ के खानदान से तो बिलांग करते ही हैं आप…। फिर भी…विर भी कुछ नहीं। ये चिन्तन नहीं है, चिन्ता है। अब आप अपने दिमाग में रत्ती-भर भी कोई आशंका-वाशंका मत पालिए। निशा खातिर रहिए, और ज्यादा सेण्टी भी मत होइये। देखिये, वहां सामने वाली सीट अब खाली भी हो गयी है। उसी पर पैर फैला कर चैड़े से लेटिये। हां पर…ध्यान रखियेगा, ऐसा न हो कि ये सब अकबास-बकवास सोचने के चक्कर में मूल मुद्दे से ही आपका ध्यान भटक जाये?’’

‘‘अब ये मूल मुद्दा किस बला का नाम है?’’

‘‘अरे…भई, घर से निकलते वक्त मैंने आपको समझाया था न! स्टेशन पर उतरते ही आपको पाव-भर नहीं, बल्कि एक किलो बर्फी खरीदना है…ठीक से याद है ना…! पिछली बार तो आपने बेइज्जती ही करवा दिया था।’’

‘‘अब भला मैं ये कैसे भूल सकता हूं? आखिर…मैं भी तो किसी से मिलने अपने ससुरारी जा रहा हूं?’’

‘‘किससे…? अरे हलो…किसी खामखयाली…और भ्रम-व्रम में मत रहियेगा…मेरे ‘देवदास जी’…? पिछले साल ही आपके ‘पारो जी’…? की शादी-वादी भी हो चुकी है, और आपसे सटकर, आपके बिलकुल बगल में ही बैठी ये माधुरी, तो वैसे भी आपका पीछा, सात-जनम तक नहीं छोड़ने वाली।’’

‘‘ये नाकिस और मनहूस सी खबर भी, तुम्हें मुझे बीच रास्ते में ही देना था? घर से जब हम निकल रहे थे, तो उस वक्त भी तो बता सकती थी?’’

‘‘ये इस कर…ताकि कोई मनो-मालिन्य न हो। पूरे रास्ते आपके दिमाग में कोई फितूर सा खयाल न सूझे। आपका ध्यान भी न अटके-भटके।’’

‘‘तुम्म्…मुझे कभी नहीं समझ सकती?’’

‘‘आप क्या समझते हैं कि इतने बरस से हम आपको समझ ही नहीं पाये होंगे? वैसे आपके ऐसे चिरकुट-चिन्तन के बारे में तो दैवो न जान पायेंगे, हम तो इस पावन धरा-धाम के सिर्फ अदने से प्राणी भर हैं। वैसे…अब क्या सोचने लगे?’’ मुझे पुनः ध्यानमग्न देख पत्नी ने सवाल दागा।

‘‘कुछ नहीं?’’ मैंने पत्नी के इस संक्षिप्त सवाल का लगभग अचकचाते हुए उत्तर दिया।

‘‘आपको हमेशा ही शिकायत रहती थीं न! कि आपको अपने ससुराल में बड़ी बोरियत होती है। साले- सालियों की शादी-वादी हो चुकने के बाद, अब आपसे बोलने- बतियाने वाला कोई हम-उम्र…भी वहां नहीं है…? फिर तो इस बार आपके लिए अच्छा-खासा मसाला है।’’ पत्नी ने मेरा ध्यान बांटने का प्रयास किया।

‘‘मसाला मतलब?’’

‘‘देखिये…लिखना आपका प्रिय शगल है न? कहिये हां…तो फिर जितने दिन ससुराल में रहियेगा, बोर होने के बजाय अपनी इस अद्भुत-यात्रा वृत्तान्त, एवं इस दौरान हुए अपने विशिष्ट-अनुभवों को ही लिखियेगा। इससे आपका समय कट जायेगा, और हमारी हफ्ते-भर की छुट्टियां भी खुशी-खुशी बीत जायेंगी।’’

‘‘शायद तुम ठीक कह रही हो…।’’

‘‘अच्छा अब ज्यादा सोच-विचार कर, अपना और मेरा भी मगज मत खराब करिये। आपकी जिस काम में मास्टरी है, वही करिये।’’

‘‘मेरा भी यही मानना है…शायद, जीवन में कुछ प्रश्नों को अनुत्तरित ही रहने देना चाहिए। बहुत सी चीजों पर आपका वश नहीं होता। हमारा अख्तियार, न अतीत पर था, न भविष्य पर होगा। अख्तियार है, तो सिर्फ वर्तमान पर।’’

‘‘आप भी न! कभी-कभी इतनी समझदारी वाली बातें करने लगते हैं कि आपको समझना ही टेढ़ी खीर हो जाता है। हम भी कन्फ्यूज हो जाते हैं। वैसे हमें कभी-कभी कन्फ्यूजन का लुत्फ उठाना भी चाहिए।’’ अपनी खास स्टायल, में फिस्स् देना…हंसी बिखेरते पत्नी ने कहा।

वैसे अपनी जान में तो पत्नी ने मुझे आश्वस्त करने का पूरा-पूरा प्रयास किया था। पर क्या सचमुच…निश्चिन्त हो गया हूं मैं…?

मैं तो ये भी नहीं तय कर पा रहा हूं कि खुद को आश्वस्त करने के फेर में, अपनी आशंकाओं के बारे में चर्चा करके, जाने-अनजाने मैंने पत्नी को भी तो आशंका में नहीं डाल दिया? खाहमखाह ही मैंने उनकी सुखद-यात्रा का कबाड़ा तो नहीं कर दिया…?

राम नगीना मौर्य
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