कहानी समकालीनः एक कहानी-शैल अग्रवाल

एक कहानी ही तो है जिन्दगी ! विशेषतः वह जो याद रह जाए, ख़ुद को दोहराती ही चली जाए जैसे एक धुन, एक याद, एक चेहरा, एक आँसू भीगी मुस्कान। …

चहल-पहल भरा समुद्र के किनारे बसा खूबसूरत शहर था वह।

औरत, मर्द और बच्चे, सभी बाँहों और ट्रालियों में सिर से ऊपर तक सामन भर-भरकर दौड़ते-भागते, वह भी शाम के धुँधलके तक, जब तक कि सारी दुकानें बन्द न हो जाएँ। भीड़ लगी रहती है यहाँ इन दुकानों में, मानो मुफ़्त बट रहा हो सारा सामान। वैसे भी फ़िक्र किसे थी, अमीर देश है। उसके देश जैसा नहीं, जहाँ सभी के बस का नहीं यह बेजरूरत ख़रीददारी का खेल खेलना, वह भी सिर्फ़ मनोरंजन के लिए।

और सड़क के दूसरी ओर बस रेत ही रेत और हाहाकार करता हुआ समंदर, कुछ भी तो भुलाए नहीं भूलता !

किनारे-किनारे घूमने वालों के लिए बनी अंतहीन, मीलों लम्बी पगडंडी नुमा सड़क और आठ दस सीढ़ियाँ नीचे उतर जाओ, तो सामने खड़ा शानदार प्रौमेनाड , यानी की रेत के अथाह विस्तार को फलांगता एक लम्बा और आकर्षक पुल, जो समुद्र की उछाल खाती लहरों को खूबसूरत शहर से जोड़े रखता है, और साथ-साथ बाज़ार व मनोरंजन भी। लहरें इतनी ऊँची कभी-कभी तो कि बगल की झिर्रियों से उछलकर पूरा भिगो जाएं। अच्छी लगती है खुली गुनगुनी धूप में लहरों की यह छेड़छाड़ भी।

चर्च की उँची-उँची खिड़कियों के रंग-बिरंगे कांचों पर चमकती धूप, तो कभी भुरभुरी रेत की गीली कलुछाई आभा, कितना कुछ है लुभाने और बहलाने को यहां-खास करके वह ठंडी गीली हवा का मछली और शैवाल की महक में डूबकर आना और पल भर में ही तरोताजा कर जाना, एक औषधि-सा ही तो है यह चहस-पहल और सन्नाटे का मेल। मादकता है गर्म सुनहली धूप में भी।

चर्च की ऊंची खिडकियों में चित्रित वे ईशू की जीवन कथाएँ और उनमें जड़े रंग-बिरंगे कांच – जब -जब धूप उन पर पड़ती है , नीला कांच तो नीलम-सा ही चमकता है आँखों में । कुछ ही दिन तो हुए हैं उसे यहाँ आए हुए, फिर भी चप्पा-चप्पा घूम चुकी है वह।

वह यानी नीलोफर सिकंद, स्थानीय अस्पताल में नियुक्त सर्जिकल रजिस्ट्रार की युवा पत्नी।

बारह महीने की धूमधाम वाला शहर है यह। कुछ-न-कुछ चलता ही रहता है। कभी मिस वर्ड तो कभी लेबर पार्टी की सालाना कौनफ्रेंस। नए-नए थियेटर और शो भी। और क्रिसमस पर तो पूरे तीन महीनों की अनोखी सजावट। दूर-दूर से आते हैं लोग। सैलानियों को भूल जाएँ तो रहने वाले अधिकांश वृद्ध ही तो हैं पर यहाँ पर। चटक धूप को अक्सर ही समेट लेती सिलेटी बदली कहीं इक्का ही तो नतीजा नहीं। आदमी कम और महिलाएँ अधिक हैं यहाँ । जीती अधिक हैं न, सुना तो यही था उसने।…

समुद्र का किनारा क्या पूरा परीलोक ही समझो फैला रहता उसकी विस्मित आँखों के आगे । आइस्क्रीम और जूस की दुकानें । गरम हौट-डौग और चाय-काफी देर रात तक । भुनते पौपकौर्न की महक तो अक्सर ही उसे भी खरीदने को मजबूर कर ही देती थी। तरह-तरह की स्लौट-मशीन और खेल भी थे भरमाने को। इनाम जीतो और पैसे हारो। एक बार ज़िद में खाने की ख़रीद-दारी के लिए रखे सारे पैसे हारने के बाद दूर ही रहने लगी हूँ वह इनसे, चाहे बन्दूक के निशाने का खेल हो या काँटे से रबर की मछली और बतख़ उठाने वाले खेल का लालच। बच्ची तो नहीं कि यूँ मन बहलाए- कभी बड़ी-सी गुड़िया तो कभी छह फ़ीट का भालू, सब धूल ही तो खाते हैं घर पहुँचकर। वैसे भी रोज़ ही तो खरीदकर ले जाती है एक खिलौना , जिसकी तरफ़ बेटी आँख भरकर देख भर ले बस वही उसके लिए। बहुत प्यार करती है बेटी से और यह उसकी बेटी की जी भरकर खेलने, खुश रहने की उम्र है। यह बात दूसरी है कि अभी तो वह ही अधिक खेलती है और बेटी कम ही हाथ लगाती है खिलौनों को।

समुद्र के किनारे रेत पर भी तो भीड़-ही भीड़ दिखती है दिनभर । रेत के क़िले बनाते बच्चे, शंख, सीप बटोरते बच्चे। संग-संग धूप सेकते युवा और वृद्ध। सभी से तो दिनभर बज-बज करता रहता है समुद्र का रेतीला यह किनारा । आराम कुरसी पर तो कई तौलिया बिछाए ही लेटे लोग एक दूसरे को तेल लगाते और फिर थोड़ी-थोड़ी देर बाद ही एक दूसरे का हाथ बग़ल में रखकर मिलाते कि किसकी चमड़ी कितनी भूरी और सुनहरी हुई, या हुई ही नहीं!…

अपने देशों में भूरे गोरा होना चाहते हैं और ये हमारी तरह से ‘टैन्ड ब्राउन’…हंसी आती है कभी-कभी तो । आदमी का स्वभाव ही ऐसा है, जो नही है, उसी के पीछे भागता जाता है।

खाने-पीने का सामान लेने और बेटी को ताजी हवा देने के बहाने रोज़ ही आ जाती है वह भी यहाँ पर । कुछ घटों के लिए दूर बैठी देखती रहती हूँ सभी को, मानो एक चिड़िया ऊँची डाल पर बैठकर निहार रही हो आस-पास फैली हरियाली को।

नया-नया ही तो है सब कुछ उसके लिए ।

उसके शहर में नदी थी, समंदर नहीं। और उस नदी की पूजा होती थी, मनोरंजन का अड्डा नहीं थी नदी। अंतिम यात्रा पर आए लोगों की चिता जलती थी वहाँ दिन रात। उन्हें भी तो पर वह ऐसे ही देखती थी वह-तन्मय परन्तु निर्वीकार हो-होकर। आदतें कब बदलती है। देखती ही नहीं, सोखती रहती है सब कुछ अंदर-ही-अंदर । समुद्र और उसकी लहरें भी और भागते-दौड़ते, हँसते-खेलते, लेटे-लेटे ही पूरा दिन बिताने वाले इन सोते-जगते अलसाए लोगों के मन में क्या चल रहा है…यह सब भी।

यह पश्चिम का मेला और जीवन का उच्छृंखल उत्स और नग्नता नहीं देखी थी उसने अपने दबे-ढके पूर्व के एक छोटे शहर की संस्कृति में। विचलित कर दें दृश्य इतनी संकीर्ण तो नहीं ही थी पर आश्चर्य अवश्य होता इतना अंतर कैसे इन दो देशों में? नदी में नहाती तो औरतें वहाँ भी थीं , कई बार अंदर के कपड़े उतारकर भी। परन्तु एक झीना आवरण रहता था उनके गीले शरीरों पर। पर यहाँ युवा तो युवा, वृद्धा भी अक्सर सब उतार कर उलटी-सीधी, आड़ी-तिरझी पड़ी चमकती रहती हैं धूप में। झुर्रीदार शरीरों को देखकर कभी-कभी तो एक वितृस्णा-सी होने लगती है । फिर भी उसका ध्यान खींचती हैं ये वृद्धा और इनकी बातें,जो अपनी बूढ़ियों से बहुत फ़र्क़ हैं।

अधिकांश बहुत बूढ़ी ये औरतें अपने महँगे और आधुनिक वस्त्रों में सजी, कभी नए-नए आए लिपिस्टिक के रंग पर चर्चा करतीं तो कभी नए बौय-फ्रैंड के बारे में। कभी-कभी तो किशोरियों सा मज़ाक़ तक उड़ाने लग जातीं बग़ल से निकल रहे मर्द का। अधिकांश अमीर विधवाएँ हैं, कुछ ऐसी भी जिन्होंने कभी शादी ही नहीं की। पर हंसी -ठहाके और इरादे बेहद मनचले। जीने की ललक पूरी ज्यों-की-त्यों दिखती है इनमें। सिर्फ़ भगवान और भजन में ही नहीं सिमटकर रह जाती इनकी ज़िन्दगी।

पर वह ऐसी नहीं थी। दिन भर उसे ही देखे जा रही थी वह एकटक। किसी झुंड में नहीं, अकेली वह औरत सबसे दूर बैठी थी और अपनी गहरी नीली आँखों से नीले समंदर में जाने क्या कबसे ढूँढे जा रही थी। नीला आकाश और उसकी उसी नीले रंग की शिफौन की हवा में उड़ती ड्रेस, सुनहरे बाल, तस्बीर-सा ही तो सुंदर था पूरा दृश्य। रंगों में बांधने को , कागज पर उतारने को मचलने लगा उसका मन। सभी के जाने का वक़्त हो चला था, पर।…

धीरे-धीरे सब उठते चले गए पर बड़े स्ट्रा के हैट के नीचे अपना खूबसूरत और उदास चेहरा छुपाए वह रहस्यमय औरत नहीं उठी अपनी जगह से। वैसे ही बैठी रही एकचित्त वहीं उस गीली होती रेत पर। लहरें दौड़-दौड़कर उसे भिगोना शुरु कर चुकी थीं। अचानक कोस्ट-गार्ड ने लम्बी और तेज़ सीटी बजा दी। यह ख़तरे का और तेज़ फुँकारती लहरों के ज्वार का संकेत था। रेत से उठकर सुरक्षित किनारे पर जाने का संकेत था। सभी अपना-अपना सामान उठाकर चले गए थे।

ख़ुद में ही खोई उस औरत को उठता न देखकर कोस्टगार्ड खुद वहाँ आया और बाँहों में भरकर किनारे पर ले गया।

पास ही पार्क की कार में बेटी के संग बैठते हुए उसने भी मुड़कर देखा था- अब वहाँ हाहाकार करती लहरों के अलावा कुछ नहीं दिख रहा था, सिवाय आकाश में उड़ते समुद्री पक्षियों के, जो मझलियों के इंतज़ार में झुंड-के झुंड मंडरा रहे थे।

अगले दिन फिर पहुँच गई थी वह, उसी समय और उसी जगह पर। व्यस्तता और ज़िम्मेदारियों के बीच भी घड़ी-सी नियमित ही तो रहती है ज़िन्दगी। और आदतें भी।

एक आकर्षण भी तो था उसके मन में समंदर और इन किनारे के लिए , नीले रंग के लिए।

सामने फैला गहरा नीला समंदर और ऊपर स्वच्छ नीला आकाश जहाँ बादल अठखेलियाँ करते रहते थे। बाज़ार की चहल-पहल से ज़्यादा अच्छा लगता था उसे यह सिर्फ़ अपने लिए चुना हुआ एकांत । आपाधापी से चुराया वक़्त। धूप नहीं हो तो भीड़ भी नहीं होती। पर वह आती है रोज, जैसे कि वह अकेली दूर बैठी उदास औरत। उदास इसलिए क्योंकि न तो उसने उसे अन्य औरतों की तरह चहकते ही देखा है, और ना ही चहलते-फिरते ही। बस समुद्र को घूरती जाने क्या-क्या सोचती, याद करती रहती है। एक कौतूहल बनती जा रही है वह अब उसके लिए। मन करता है पास जाए, बात करे उससे।…अचानक दूर बैठी औरत एक ओर को लुढ़की और मुँह से झाग निकलने लगे। इस बार भी गार्ड ने ही सँभाला था। मिनटों में एम्बुलेंस आई और अस्पताल ले गई।

बात वहीं पर आई-गई भी हो जाती, अगर शाम को पति खाने पर पुनः ज़िक्र न छेड़ देते फिर से उसका- ‘ बड़ा बुरा हाल है यहाँ पर बुजुर्गों का।’

‘क्यों क्या हुआ?’

पूछने पर बताया कि- ‘ आज बीच से एक औरत लाई गई थी मिरगी के दौरे के बाद। जब ठीक होने के बाद उसकी छुट्टी करनी चाही, तो फूट-फूटकर रोने लगी- यहीं रहने दो, प्लीज़। घर जाने से डर लगता है मुझे। बहुत अकेला महसूस करती हूँ। यहाँ कम-से-कम दूसरों की आवाज़ तो सुन पाती हूँ। दो दिन के लिए तो भरती रहने दिया है वार्ड में, पर इससे ज़्यादा तो नहीं रखा जा सकता। घर तो जाना ही पड़ेगा उसे।’

‘किस वार्ड में है ?’ अचानक उसके मुँह से निकला।

‘वार्ड नं. तीन में । नैली व्हाइट नाम है उसका। तुम तो ऐसे पूछ रही हो, जैसे मिलने जाओगी?’

‘ हाँ, सोच तो मैं यही रही हूँ। क्या फ़र्क़ पड़ता है, अपने फ़्लैट और अस्पतालके बीच एक सड़क ही तो है पार करने को। अगर किसी का दुख , अकेलापन थोड़ा कम कर सकूँ, तो अच्छा लगेगा, मुझे।’ बेचैन-सी वह तुरंत ही बोल पड़ी थी।

‘ मुझे कोई एतराज़ नहीं। पर देखना मेरी बेटी को कोई तकलीफ़ न हो!’

पति ने आधे मज़ाक़ में और आधे मालिकाना हक़ के अंदाज में अंततः उसकी इच्छा को स्वीकृति दे दी थी।

अगले दिन ही एक छोटे चौकलेट के डिब्बे और बेटी के साथ जा भी पहुँची थी वह, अपरिचित नैली व्हाइट से मिलने और उसके एकाकीपन को दूर करने के लिए ।

कोई उससे मिलने आया है सुनकर पहले तो नैली को आश्चर्य हुआ था, फिर कान तक खिंची मुस्कुराहट के साथ स्वागत किया था मिसेज़ व्हाइट ने नीलोफर का। मित्र होते भी देर नहीं लगी थी उन्हें। डूबकर खेली थी नैली उसकी बेटी के साथ। आश्चर्य तो तब हुआ , जब हाल ही ननिहाल से लौटी बेटी ने भी उसकी गोदी में वापस जाना चाहा- और नाना कहकर पुकारा था नैली को।

नानी की ही उम्र की तो दिख रही थी नैली व्हाइट।

अगले दिन ११ बजे के क़रीब जब वह बेटी को लेकर समुद्र के किनारे और दैनिक फल सब्ज़ी के लिए निकलने वाली थी कि अचानक दरवाज़े की घंटी बजी। देखा तो नैली व्हाइट खड़ी थी, एक सुंदर-सी गुड़िया और कुछ अन्य खिलौनों के साथ।

अंदर आने का आमंत्रण दिया तो तुरंत आ भी गई, मानो पुरानी परिचित हो। बेटी को ऐसे सीने से लगाया, जैसे उसकी अपनी ही बेटी हो। मंत्रमुग्ध सी खिलाती और खेलती रहीं दोनों। कभी नैली घोड़ा बनकर बेटी को पीठ पर बिठाती, तो कभी घुटनों पर झुलाने लग जाती।

रोका-टोका नही था उसने भी । नैली के चेहरे पर उदासी की जगह अब उल्लास और संतोष ने ले ली थी। फिर तो रोज़ का ही नियम बन गया था। अक्सर ही मिसेज़ नैली व्हाइट आने लगी थी उसके फ्लैट में । साथ समय बिताती और चली जाती। कभी-कभी तो साथ ही बीच पर भी जातीं दोनों। अब उनका दोपहर का वह खाली वक़्त साथ-साथ ही बीतता था, चुपचाप नहीं, हंसते-बतियाते।

वैसे भी ज़्यादा दूर नही थी नैली की कौटेज अस्पताल से।

खुलने लगी थी मिसेज़ नैली व्हाइट अब उसके साथ। पति मज़ाक़ बनाते-‘ जैसे तैसे तो सास से पीछा छुड़ाया था, पर यहाँ भी एक माँ ढूँढ ही ली मेरी नीली ने। एक नीली और एक नैली, राम बनाई जोड़ी…हा.हा.हा’ पर उसे क़तई न खलता पति का यह उलाहना भरा मज़ाक़। इतना सहज होता जा रहा था उन दोनों का रिश्ता।

एक दिन मिसेज़ व्हाइट कहकर बुलाने पर नैली ने समझाया कि अगर आपत्ति न हो तो मिस व्हाइट ही कहा करे नीलोफर उसे। मिसेज़ तो कभी बन ही नहीं पाई थी वह। शादी नहीं हो पाई थी उनकी। होने वाली थी, पर इसके पहले ही लड़ाई छिड़ गई और वह चला गया। कभी लौटकर न आने को, एक बेटी का उपहार देकर। पर बेटी भी तो उसके पास नहीं रह पाई। सुरक्षा के नाम पर कई बच्चे आस्ट्रेलिया भेजे गए थे। उसकी आठ महीने की ट्रेन भी छीन ली गई थी उससे। कुँआरी माँ यहाँ भी उतना ही बड़ा टैबू था तब जितना कि तुम्हारे देशों में है। जितनी बड़ी तुम्हारी बेटी है इतनी ही बड़ी थी मेरी कैरन भी तब। तभी मिली थी आख़िरी बार और वही शक्ल याद है अब तक मुझे। अब तो वह भी शायद तुम्हारी जितनी ही बड़ी होगी और उसकी भी शायद ऐसी ही अपनी बेटी भी हो । पर मैंने तो देखा ही नहीं कुछ।

नैली ने मुँह घुमाकर तब चुपचाप अपनी आँखें पोंछ ली थीं। पर नीलोफर अंदर तक भीग गई थी उस नमी से। समझ में नहीं आया कैसे और क्या सांत्वना दे। चौके में जाकर गरम-गरम चाय बना लाई थी और बेटी को उसकी गोदी में बिठाकर मन बहलाने की कोशिश करने लगी थी। इस अप्रत्याशित लगाव और जुड़ाव के सारे रहस्य खुलने लगे थे पर आँखों के आगे। एतराज़ नहीं था, अगर वह और उसकी बेटी दोनों में ही नैली अपनी खोई बेटी की प्रतिछाया देख पा रही है। अच्छा ही तो है यह नैली के मानसिक स्वास्थ्य के लिए।

कुछ महीने बाद ही, अचानक एक दिन फिर पति ने बताया कि ‘तुम्हारी वह मिसेज़ व्हाइट तो फिर से अस्पताल में भरती हो गई है, इसबार घातक दिल के दौरे के साथ। बचेगी नहीं । बस एक ही रट है अब उसे-कैरेन को देख लूँ, कैरन से मिल लूँ। कैरी में ही जान अटकी है उसकी और चैन से मर भी नहीं पा रही बेचारी। पर हम कहाँ से ढूँढें कैरन को। फिर भी यहाँ की सरकार बहुत सहायता करती है। पूरी कोशिश की जा रही है, कैरन को ढूँढने की। तुम्हें पहले इस लिए नहीं बताया कि तुम तो सबकुछ भूल लग जाओगी उसकी सेवा में और लोग समझेंगे कि प्रौपर्टी का लालच है हमें।’

‘ऐसे कैसे?’ वह अब वाकई में व्यग्र हो चली थी।

‘ फिर तुम्हें कबसे परवाह होने लगी कि लोग् क्या कहेंगे!’

अगले दिन ही वह फिर अस्पताल में मिस व्हाइट को ढूँढ रही थी। वार्ड में पहुँची तो आस्ट्रेलिया से आई तीन-तीन कैरेन लिपटी खड़ी थीं नैली से पर नैली की आंसू-भीगी आँखें अभी भी दरवाज़े पर अटकी अपनी कैरेन का इंतज़ार ही कर रही थीं।

उसे देखते ही आँसू पोंछकर बाँहें पसार दीं नैली ने। वह भी दौड़कर लिपट गई उससे। दोनों ही जानते थीं कि उसकी असंभव उस चाह का पूरा हो पाना संभव ही नहीं। फिर भी एक शांत और संतुष्ट समझौता था अब उनकी गलबहियों में और एक संतोष भी। एक अवर्चनीय सुख में डूबी रहीं दोनों। पर अचानक आलिंगन शिथिल पकड़ने लगा और शरीर की गर्मी ठंडे अहसास में पलटने लगी। मिलन यह कहीं अंतिम विछोह का क्रूर अहसास तो नहीं, नीलोफर ने नैली को ध्यान से देखा पर नैली अभी भी पूर्णतः शांत और संतुष्ट थी।

उसके बाल सहलाने को नैली का दाहिना हाथ अभी आधा ही उठा था कि पल में ही झूल गया। नैली की संतुष्ट आँखें भी पलट गईं और गुलाबी चमड़ी नीली पड़ने लगी। कमरे में उपस्थित सभी का मुँह आश्चर्य से वैसे ही खुला छोड़कर वह उलटे पैर भयभीत भागी। अब उसके लिए वहाँ उस कमरे में कुछ नहीं था। सिवाय कुछ और कसकती यादों के…

‘नहीं मैं कैरन नहीं।’ . बुदबुदाती वह तीर-सी अपने फ्लैट में वापस आ गई थी वह ।

रात के सन्नाटे में साँय-साँय करती हवा तक कभी-कभी नैली की आवाज़ सुनाने लग जाती है उसे। कितना सूना कर गई है नैली उसे। शांत समुद्र के किनारे बसे इस शहर की हवा तक इतनी प्रचंड हो गई है अब कि आदमी तक को ले उड़ती है । वह खुद उड़ चुकी है जमीन से चार-पांच फीट ऊपर और चार-पांच फीट दूर तक उस दिन जब साढे पांच फीट के गढ्ढे में अकेली नैली को अकेला छोड़ा था उसने। न तब विश्वास होता था और ना आजतक हुआ। पर बहुत कुछ होता रहता है जीवन में अचानक ही, असंभव और अकल्पनीय, जो ताउम्र साथ रह जाता है जैसे कि नैली का उसके जीवन में आना। तीन महीने की ही तो पहचान थी उनकी फिर भी एक पूरी कहानी लिख सकती है वह नैली पर…

पर उदास नही होती कभी नैली को याद करके वह। छोटी ही सही पर बहुत अपनेपन से भरी हैं नैली की स्म़तियाँ । हाँ, नीली पड़ती नैली को देखने के बाद ऐसा जरूर होता है कि नीला रंग उतना नहीं लुभाता अब उसे। विशेषतः तब जब थोड़ा मटमैला और सिलेटी-सा हो जाए, चाहे वह समुद्र हो या फिर आकाश!

कभी-कभी तो यह भी सोचने लग जाती है नीलोफर कि कौन-सा अंतिम पल था उनकी मुलाकात का , वह जब नैली ने अंतिम स्वास ली थी या फिर वह जब वह अंतिम स्वास लेगी!

समुद्र से तो माना भाग भी ले, पर आकाश से कैसे और कब भाग सकती हैं!…


शैल अग्रवाल
बरमिंघम यूँ.के.

संपर्क सूत्रःshailagrawal@hotmail.com
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