कहानी समकालीनः अनकही-शैल अग्रवाल

प्रिया ने कमरे में घुसते ही रौशनी कर दी । मिनटों में ही अंधेरा कमरा उजाले से भर गया पर देवकी पर इसका कोई असर ही नहीं हुआ, मानो उसे अब किसी रौशनी की जरूरत ही नहीं रह गई थी। बेहद बीमार दिखती वह गहन उदासी की कई-कई परतों को ओढ़े बुत- सी वैसे ही बैठी रही, जैसे सहमा खरगोश घनी अंधेरी झाड़ियों में खुदको छुपाए रखता है। वैसे ही पैर के अंगूठे से कारपेट को बेमतलब कुरेदती। और नजर भी कहीं शून्य में ही अटकी।
न तो प्रिया द्वारा पकड़ाई चाय का ही एक भी घूंट ही लिया उसने और ना ही उसकी तरफ देखा ही। पुकारने पर भी बस प्याली हाथ में पकड़े भेदती-सी आँखों से घूरती रही उसे।

पत्थर के बुत-सी जड़ हो चुकी थी देवकी । कोई उत्साह या स्पंदन शेष नहीं था उसमें। और तब तेज आवाज से करीब-करीब उसे झकझोरती-सी ही बोली थी प्रिया, ‘संभालो खुद को । कबतक यूँ शोक मनाओगी उसका? पूरा दिन बीत गया है तुम्हे यहीं पर बैठे-बैठे ही और उसे जेल गए भी। ऐसे जिन्दगी नहीं गुजरती। बेवकूफ था वह। साथ जीने लायक तो कतई ही नहीं।‘

पर कान में गूंजती प्रमोद की खामोश चीखों ने तो मानो देवकी को बहरा ही कर रखा था और परिस्थिति की जटिल अवशता पर बहते आँसुओं ने अंधा भी।
सब कुछ जानते और समझते हुए भी, प्रिया बोलती ही चली गई, ‘लोग जाने क्या-क्या करके बेदाग छूट आते हैं, और एक यह है कि बिना कुछ किए ही सजा भुगतेगा अब। छोटी-सी बात भी तो नहीं संभाल पाया बुद्धू! यदि मेरा पति इतना घामड़ होता तो कबका छोड़ चुकी होती ! फिर तुम ही क्यों अभी भी इसीके नाम का सिंदूर लगाए बैठी हो ? उम्र ही क्या है अभी तुम्हारी! क्यों खुद को भी बलि का बकरा बनना चाहती हो?’

और तब देवकी ने उदास आँखों से उसकी तरफ देखा, मानो कहना चाहती हो, ‘कई लड़ाइयाँ ऐसी होती हैं, जिन्हें लड़ना ही पड़ता है प्रिया। विशेषतः तब जब अपना सब कुछ ही दांव पर लगा हो। यह लड़ाई सच और झूठ की है। अच्छाई और बुराई की है। जैसी कृष्ण ने लड़ी थी, राम ने लड़ी थी। मेरे अपनों की है, फिर पीछे कैसे हट सकती हूँ मैं?‘

देवकी की आँसू डूबी आँखें तो अब बहुत कुछ समझाना चाहती थीं प्रिया को, परन्तु समझदार पलकों ने तुरन्त ही परदे डाल दिए उनपर, मानो सावधान कर रही हों, ‘हर बात कही नहीं जाती और ना ही दूसरे की परेशानी पूरी तरह से समझ या हल ही कर सकता है दूसरा। लड़ाई तुम्हारी है और तुम्हें ही लड़नी पडेृगी, देवकी।

पर प्रिया अभी भी मास्टरनी वाले अंदाज में ही थी। सहानुभूति कम और बात मनवाने की जिद ही अधिक स्पष्ट थी उसके हर रवैये से।

‘कइयों को जानती हूँ मैं, जिन्होंने अवारागर्दी की सारी हदें पार कर रखी हैं। खुले आम कहते हैं कि लौंडियाबाजी और तेज मंहगी कार ही दो सबसे बड़े शौक है उनके। मजाल है कि कोई उन्हें जेल भेज सके, या उनकी तरफ उंगली तक उठा सके। सच-झूठ , अच्छा-बुरा कुछ नहीं रहा अब। बस पैसा बोलता है। पद बोलता है। सही-गलत नहीं। मंदिरों में भगवान की मूर्ति का उद्घाटन करने के लिए बुलाया जाता हैं इन्हें। आए दिन इनकी छाती पर तमगे लगाए जाते हैं। और एक तुम्हारे यह मौनी बाबा हैं, जिन्होने पूरी जवानी सेवा और समर्पण में गुजार दी, पर कुछ हासिल नहीं। और अब चुपचाप झूठे आरोप में जेल में भी जा बैठे। कायर का अदालत में मुँह तक नहीं खुला था। एक ही खिसा-पिटा वाक्य अटके रिकौर्ड-सा बजता रहा, ‘मैने कुछ गलत नहीं किया। निर्दोष हूँ मैं।‘ इस हरिश्चन्द्र की औलाद को यह तो समझना चाहिए था कि सिर्फ कहने से बात सिद्ध नहीं हो जाती, कोर्ट-कचहरी सबूत मांगती हैं। है कोई सबूत ? नहीं ना ! प्रायः ऐसे केस में होता भी नहीं। जिसकी लाठी उसी की भैंस। सशक्त जीत जाता है। लड़की अगर कह रही है कि डाक्टरी जांच करते वक्त हाथ बहके थे और निजी गरिमा का अतिक्रमण हुआ था, तो बस हुआ था। गोरी चमड़ी है और मंत्री की बेटी भी। कौन काटेगा उसकी बात या फिर दुश्मनी मोल लेगा उससे?’

प्रिया के हाथ अब हवा में चारो तरफ घूम रहे थे बेमतलब ही, जैसे कि उसके विचार।

‘मैंने तो यह तक कहा था इससे कि अगर गले पड़े फंदे को निकालने की अकल नहीं है तुम्हारे पास, तो लौट जाओ यहाँ का सबकुछ बेच-बाचकर। कुछ नहीं बिगड़ा है जबतक वक्त है। पर एक बार सजा मिल गई तो कुछ भी नहीं बचा पाओगे। जानती थी कि बचना मुश्किल ही है पर इसका। बड़े-बड़े लोगों को नाराज कर दिया है हेकड़ी भरे रवैये और सच बोलने की इसकी बेरहम आदत ने। कंटीले झाड़-सा खड़ा हो जाता है बेवजह ही, जब चाहे तब अपने आदर्शवाद का झंडा गाड़कर। जाने कितनों का भांडा फोड़ चुका है अबतक दुनिया के आगे। अब उन्हें भी तो बिखरा रायता समेटना ही था? पानी में रहकर मगरमच्छ से बैर नहीं करते। कैसे बर्दाश्त कर पाता कोई इस युधिष्ठर को कौरवों की सभा में? यह तो होना ही था!
बात-बात पर वेदों की ऋचा दोहराने वाला, गीता और बाइबल सुनाने वाला, पागल ही तो समझा जाने लगा था। अरे भाई , ‘संभवामि युगे-युगे’ होता होगा पर वह अवतार नहीं। नहीं आती उसकी संस्कृत यहाँ समझ में। अंग्रेजों का देश है यह। पंडित-पादरी नहीं एक चिकित्सक था। वैसे ही रहता, और मौज करता। औरों की तरह ही दिन रात शराब पीता, दावतें खाता और ठहाके लगाता। मस्त न रहता, पर जेल में तो न सड़ता कम-से-कम! उसे तो कहना चाहिए था उस वक्त -‘छोड़ो यार, क्या रखा है इन बातों में, रुटीन जांच की थी, वह भी जच्चा-बच्चा की सेहत के लिए। अतिक्रमण और बहकने की बात कहाँ से ले आए? हर तीन महीने पर आती थी जांच करवाने, फिर उसी दिन ऐसा क्या हुआ जो तिल का ताड़ बना डाला। बचकाना यह मुकदमा रफा-दफा करो और सिलटाओ झगड़े को कैसे भी। लेने-देने का मन या कोई शर्त है तो वह भी बता दो?’
पर वहाँ तो बस एक ही रट थी, आत्म-सम्मान पर आघात है। चरित्र मलिन हो रहा है मेरा।‘
‘मैं कायरों की तरह नहीं भागूंगा। निर्दोष हूँ, निर्दोष सिद्ध करवाकर ही मानूँगा खुद को। यह गलत और गंदा दाग तो हटाना ही होगा मुझे। और इस अपराध के लिए माफी भी मांगनी होगी एकदिन इन्हे। भले ही मुझे अपना सब कुछ बेचना ही क्यों न पड़े, नंगा हो जाऊँ चाहे बीच बाजार में, फिर भी लड़ूंगा। आखिरी सांस तक लड़ूंगा। इस झूठ और अन्याय के खिलाफ तो मरते दम तक लड़ूँगा मैं।
अगर इतनी ही अकड़ है तो फिर सड़े अब जिन्दगी भर जेल में।‘

आवेश में प्रिया हांफने लगी थी अब तक फिर भी बोले ही जा रही थी। और अब तो देवकी भी ध्यान से समझने की कोशिश कर रही थी । कुछ समाधान भी तो निकल ही सकते थे इस अनर्गल प्रलाप से भी।

पर कुछ हाथ नहीं लगा सिवाय इसके कि देवकी को भी मान लेना चाहिए कि उसका पति गलत नहीं तो बेवकूफ तो अवश्य ही है और छोड़ देना चाहिए उसे।

पर ‘जिन्दगी भर?’ शब्द पत्थर से ही गिरे थे देवकी की उम्मीदों पर।

बहुत ही हिराकत से उसे देखते हुए कही भी थी प्रिया ने यह बात। फिर भी देवकी की समझ में नहीं आया कि ऐसा गलत क्या कहा था उसके पति ने? यही तो कहना चाहिए था और करना भी। असह्य गन्दगी से नहलाया गया है, तो आदमी सफाई तो करेगा ही। गलत क्या है इसमें? पर प्रिया, जो मर्दों की दुनिया में मर्दों से भी अधिक दबंग बनकर जीती है, दुनिया को जानती और समझती है। साम, दाम और दंड, भेद, चारो विधाएँ साध रखी हैं। यही वजह है सफल है। जाल बुनती है, जाल में फंसती नहीं। ऐसा हो भी क्यों नहीं? कहाँ आजमगढ़ का गंवई-गंवार सीधा-सपाट उसका पति और कहाँ दिल्ली की तेज-तर्रार प्रिया! कैसे भी अपना हर काम करवा ही लेती है । पर अगर हितैषी है तो मदद करे ना…व्यर्थ के भाषणों से क्या फायदा? अब उसके विचार एक तूफान में फंसी नाव-से डगमगा रहे थे।

‘माना सफल है, बहुत सफल है, पर ऐसी सफलता भी किस काम की? जब अंदरूनी खुशी ले और दे ही न पाए। अकेले-अकेले ही रहना पड़े खुद के ही बनाए राजमहल में? न पति, न परिवार… साठ के पार पहुँचकर भी! शादी की भी तो दो महीने में ही तलाक देकर दूध में पड़ी मक्खी-सा निकाल फेंका पति को? अच्छा नहीं लगा इसे कि शादी प्यार की वजह से नहीं, पद और पैसे की वजह से ही हुई । इंगलैंड में बसना था, वीसा चाहिए था, इसलिए हुई। किसी भी वजह से हुई, पर हुई तो? अच्छा-खासा पति भी मिला। समझ से काम लेती, तो आज इसका भी एक खुशहाल परिवार होता। इस उम्र में तो शादियाँ प्यार-व्यार में पड़कर नहीं, समझौते या फिर किसी लालच के बस ही होती हैं। क्या हुआ अगर उसने इसके आलीशान घर और स्वीमिंग पूल को दिखलाकर भारत से आई बहन के आगे थोड़ी शान मार ली? इसकी खरीदी स्पोर्ट्स मर्सेडीज कार में बिना इजाजत के घुमाने ले गया अपनी बहन को? इज्जत तो करनी ही पड़ती है, भले ही खरीदा हुआ ही पति हो। पालतू कुत्ता तो नहीं कि जब चाहे बिस्कुट डाल दो और जब चाहे दुत्कार कर बाहर कर दो? ना ही इसे पुराने कपड़ों सा तुरंत हटाया ही जा सकता है। सात फेरों और सात वचनों का अर्थ दिल से जानना-मानना पड़ता है। एक ईंट-पत्थर के मकान को भी घर बनाने में उम्र गुजर जाती है। तोड़ने को तो बस एक पल ही काफी है! फिर शादी का तो मतलब ही एक हो जाना है। सुख-दुख सब पर समान अधिकार और साझा है । मेरा-तेरा कुछ नहीं रह जाता पति-पत्नी के बीच।‘

तर्क-वितर्क की उठती लहरें सुनामी-सी हर संयम को तोड़ देना चाहती थीं। पर संयम और समझ ही तो देवकी का जीवन रहा है। संभाल ही लिया कैसे भी खुद को उसने।

‘कौन होती है वह दूसरों को सलाह-मशवरा देने वाली, जब खुद अपने पति तक को नहीं बचा पाई? उसकी हडिया झूठ की आँच पर पूरी जल गई है, पर जिसे यह अवगुण कह रही है, पति की उसी सच बोलने की आदत और ईमानदार सहजता ने ही तो उसे उसका भक्त बना दिया। इसी वजह से तो लाखों में एक लगता है उसका प्रमोद उसे। सच्चा, समर्पित और ईमानदार इनसान है, घामड़ नहीं। गुण अवगुण कैसे हो सकता है , जैसे सोना पीतल नहीं, चाहे कितना भी गंदा कर दे कोई? कोई चाहे कुछ भी कहे, उसे तो अपने पति का इंतजार करना ही होगा और कर भी लेगी, चाहे जिन्दगी कितनी भी कठोर परीक्षा क्यों न ले उसकी!’

चुपचाप एक दृढ़ता के साथ सारे आंसू पोंछ लिए थे देवकी ने अपने ।

दोनों को उनकी सोच ने अब दो अलग-अलग किनारों पर ला खड़ा किया था। और बीच की खाई भी बढ़ती ही जा रही थी।

‘जिन्दगी तुम्हारी है और निर्णय भी तुम्हारा ही । भुगतना ही चाहती हो तो भुगतो इसे अकेले-अकेले।‘

कहती, जैसे आई थी, वैसे ही तीर की तरह चली भी गई प्रिया, देवकी को वैसे ही उदास और अकेला, वहीं पर बैठा छोड़कर।

देवकी अपनी दमघोटू उदासी में भटकती ही रह गई फिरसे।

अँधेरे अब उसकी हर खुशी को निगल रहे थे। चालीस वर्षीय देवकी शादी के बाद कभी प्रमोद के बिना नहीं रही थी। आदत पड़ चुकी थी उसे उसकी। हर बात उसके सलाह-मशवरे से ही होती थी। जाहिर है इस वक्त नहीं समझ पा रही थी कि कैसे संभाले, कहाँ से शुरुवात करे और किसकी मदद ले इस जटिल समस्या को सुलझाने में वह? अट्ठारह वर्षीय बेटा प्रखर भी तो इसी वर्ष दूसरे शहर में पढ़ने चला गया था।…

‘वैसे तो अच्छा ही हुआ, जो नहीं है उसके पास। नहीं तो वह भी घुटता साथ-साथ। पर पता तो चलेगा ही उसे भी?’

ध्यान आते ही, पति की ही नहीं, बेटे की भी फिक्र होने लगी थी उसे, ‘कैसे मुँह दिखाएगा दोस्तों को, समाज को, कल जब अखबारों में पिता डॉ. प्रमोद शर्मा की फोटो के साथ जेल जाने की खबर छपेगी? हर आदमी तो सच्चाई नहीं जानता, जान भी नहीं सकता। सभी तो विश्वास कर लेते हैं सच्ची छूटी इन खबरों पर तुरंत ही। कैसा होगा उसका अपमानित, प्रताड़ित और पूरा अकेला प्रमोद पर? कैसे झेल रहा होगा असह्य शारीरिक और मानसिक यातना को वहाँ?’

वह पति के साथ होना चाहती थी अब। दुःख-दर्द बांटना चाहती थी। छोड़ना नहीं। पूरा भरोसा था उसे अपने पति के अच्छे स्वभाव और चरित्र पर। विश्व-सुंदरी नहीं, ना ही विशेष पढ़ी-लिखी ही थी देवकी, पर कभी असंतुष्ट नहीं रहने दिया था उसने अपने पति को, न तो मन से और ना ही तन से ही। तिनका-तिनका संजोकर एक खुशहाल घरोंदा संजोया है, बिखरने नहीं देगी यूँ इसे । इसके कहने से क्या होता है, किसी और के हाथ के खाने तक में तो स्वाद नहीं आता उसके पति को । जाने कबतक और कितने दिन तक रहना पड़े पर वहाँ? वकील ने कहा तो है कि छुड़वा लेगा, ब्रिटेन के महाराजा से अपील भी कर रखी है!’

उसके विचार अब एक बेसहारा आँधी में फंसे सूखे पत्ते सा ले उड़े थे उसे । संभलना और संभालना चाहती थी पर एक अगन थी अब उसके अंदर और बाहर… अगन क्रोध की, अपमान की और अगन क्षोभ और असह्य बेबसी की भी।

उधर अपराध की उस दुनिया में सहज हो पाना तो दूर की बात, खुद को अपराधी मानना तक संभव नहीं हो पा रहा था प्रमोद के लिए तो। जुबां और मन दोनों पर ही इतने फफोले थे कि ‘ सुख-दुखे समे कृत्वा‘ श्लोक तक बस मस्तिष्क में ही गूंजता रह जाता । गूंगे और बहरे-से हो चुके थे डॉ. प्रमोद शर्मा गुजरे चौबीस घंटों में ही जेल के अंदर बंद होकर। मानें या न मानें, पर सच्चाई तो यही थी कि वह एक कैदी थे और जेल में थे। हथकड़ी डालकर और अन्य कैदियों के साथ वैन में भरकर लाया गया था उन्हें यहाँ, और कैदियों के कपड़े और हथकड़ियों में ही रहेंगे भी अब।…

‘अन्याय तो हुआ है, पर जल्दी ही मानेंगे इस सच को भी सभी । यहाँ से बाहर निकलूँगा मैं। …भगवान के घर देर है पर अंधेर नहीं। घर, परिवार और समाज के बीच फिरसे वही इज्जत होगी मेरी। जब कोई गलती ही नहीं की तो सजा किस बात की?‘
खुदपर पूरा विश्वास था उन्हें अभी भी।

‘सुख-दुख किसकी जिन्दगी में नहीं आते-जाते? खुद भगवान राम ने भी तो चौदह वर्ष वन में बिताए ही थे! और कृष्ण की तो पूरी जिन्दगी ही अन्याय के खिलाफ लड़ते ही गुजरी ।‘
भूल गए वह कि ना तो वह अवतारी हैं और ना ही अलौकिक अस्त्र-शस्त्रों से सज्ज ही। फिर जिन्दगी भी तो इतनी सीधी-सपाट और सरल नहीं!…

जेल का बिस्तर झाड़ कर साफ किया उन्होंने लेटने से पहले और प्राणायाम योग आदि भी किए उसी छोटी-सी बंद कोठरी में , जैसे हर रात अपने घर में करते थे ।
गंदे बाल और बढ़ी दाढ़ी वाला सेल-मेट देखता ही रह गया। एक व्यंगभरी मुस्कान थी उसके होठों पर, ‘ ओह, अपरक्लास, पढ़ा-लिखा बेवकूफ ! पर यहाँ कैसे और किस अपराध के चलते?’

पर नाम या परिचय तो कोई था ही नहीं अब उनका। गले में बस एक बिल्ला लटक रहा था- नं. ३७ लिखा हुआ, जैसे कि सामने बैठे अजनबी पर नं. १४ का था। वैसे तो इससे ज्यादा जानने की जरूरत भी नहीं थी उनके बीच।

सोने की तैयारी कर ली प्रमोद ने और बगल में ऱखी बाइबल उठाकर पढ़ने लगे। पर सामनेवाला कुढ़ गया उनकी इस बेरुखी से- पत्थर की दीवार नहीं वह , जिससे मुँह घुमाकर यूँ लेट गया है यह। झटके से उठा और उनकी रजाई खींचकर नीचे फेंक दी।

‘विद्वान होने का नाटक बन्दकर और चल सुड़का लगा हमारे साथ। ताजा माल आया है आज ही। ‘

फिर भी जब ध्यान नहीं दिया तो कुछ-कुछ फुसलाता-सा बोला,

‘ चल, उठ भी यार, सारे गम भूल जाएगा। जेलर भी मिला हुआ है अपना। वही तो माल मंगवाकर देता है, लड़कियाँ भी। जैसी चाहो, जो चाहो। किसी को कानो-कान खबर तक नहीं होती। साथ रहेगा, बात मानेगा तो जीते-जी स्वर्ग में न पहुँचा दूँ, तब कहना? अपना ही राज चलता है यहाँ पर भी !’

इतने पास आकर बोल रहा था वह कि शराब भरी सांस की दुर्गंध से प्रमोद का दम घुटने लगा।

‘कैसे गुजरेंगे दिन-रात इसके साथ इस छोटी-सी कोठरी में?’

पल में ही उबकाई आने लगी साफ-सुथरी जिन्दगी और रहन-सहन वाले डॉ. प्रमोद को। एक-से-एक लती और आवारा मरीज देखे थे उन्होंने, पर इस तरह के नाली से उठते भभके से यह पहला वास्ता था उनका। एकबार फिर मुँह घुमाकर सोने के लिए जबर्दस्ती आँखें बन्द कर लीं उन्होंने। बचपन से ही आँसू छुपाने के लिए यही तो करते आए हैं वह । संयम ही संयम रहा है उनके स्वभाव में हमेशा-से ही।

नं. १४ ने भी देखे उनके वो दो पलकों की कोर में छुपे हुए आंसू।

‘नया मुर्गा है। अभ्यस्त हो जाएगा धीरे-धीरे।‘

और उस रात के लिए तो अपनी जिद छोड़ ही दी उसने ।

पर आगे उन जैसा धैर्य नहीं था उसके पास।

उसके बाद तो हर रात ही एक अलग और दारुण कहानी थी उनके लिए।

बात न मानने पर नए-नए तरीकों से यातना देनी शुरु कर दी थी खूंखार दरिंदों ने। कभी आकर सिगरेट से जलाते, तो कभी बाल पकड़ कर खींचने लग जाते। कहीं भी हाथ चला जाता उनका, कुछ भी भद्र-अभद्र मनमानी करने लग जाते । लाज शरम, निजता और शालीनता कुछ नहीं बची थी अब उनके पास। हैवानियत की हद से नीचे उतर चुका था व्यवहार । रोकने की कोशिश करते, तो मारते-पीटते। कोई न्याय, कोई सुनवाई नहीं थी उस जंगल राज में उनकी अब। पढ़ा-लिखा वह सभ्य और सज्जन, उस सामूहिक अत्याचार को चुपचाप सहने के अलावा और कुछ कर ही नहीं पाता था, इतने लाचार और मजबूर होते जा रहे थे वह। मेहनत मजदूरी तो श्रमिकों की तरह ईमानदारी से कर लेते, पर रात में गलत काम के लिए जोर-जबर्दस्ती और नर्क में गिराते ये प्रयास, अब तन को ही नहीं, उनके आत्मबल को भी तोड़ने लगे थे। एक भयभीत और लगातार खदेड़े जाते जानवर की तरह चौबीसों घंटे आशंकित और व्यग्र रहने लगे थे वह। फिर भी बचाने की कोशिश करते, जो कुछ बचा था, या बचा सकते थे वह।

जाने किसकी साजिश थी यह भी कि उनके अपने शहर से ३०० मील दूर लिंकन की जेल में रखा गया था उन्हे। वह भी छटे हुए अपराधी और हत्यारों के बीच। कई तो एक नहीं, दो-तीन हत्या और नाबालिगों के साथ व्यभिचार की सजा भुगतते कैदी थे इनमें।

रुचि, संस्कार शिक्षा या फिर अपराध, कुछ भी तो एक जैसा नहीं था उनमें। फिर भी वह थे वहाँ, उसी नरक में। रह रहे थे उन्ही के साथ और उन्ही के बीच। जाने किस जनम के पाप की सजा थी, जो ऐसे लोगों के साथ बन्द थे?

‘इस घुटन से तो मर जाना ही बेहतर है।’ …ख्याल भी आया कईबार मन में, ‘पर आत्महत्या तो पाप है।‘ समझा लेते थे खुद को।

संस्कार रोकते रहे, बचपन में माँ-बाप और गुरु की शिक्षा , उनका खुद अपने ऊपर विश्वास और भरोसा रोक लेता उन्हें कुछ भी उलटा-सीधा करने से।

आँसू बहते और चुपचाप पोंछ लेते प्रमोद- ‘जेहि बिधि राखे राम, तेहि बिध रहिए।‘

संयम ही संयम था उनके स्वभाव में बचपन से ही। प्री-मेडिकल की तैयारी कर रहे थे सत्रह साल के प्रमोद, तो जब यार दोस्त घूमने या सिनेमा जाने को कहते, तो वह शांत और संयमित जबाव देते।

‘ तुम घूम आओ । मैं डॉ. प्रमोद होने के बाद पूरी दुनिया घूमूंगा और अपना खुद का सिनेमा-हाल भी बनवाऊँगा, वह भी अपने ही घर में। फिर हम सब मिलकर रोज देखेंगे एक नया सिनेमा।‘

और यही किया भी उन्होंने।

हठी और धुन के पूरे पक्के थे प्रमोद। जो ठान लेते, पूरा करके ही दम लेते। पैसा आते ही खुद को और अपनों को सारी सुख-सुविधाएँ दीं, जिनकी बचपन से चाह थी उन्हें।

शायद यह लगन और दृढ़ता ही थी चरित्र की, लक्ष को पाने की आकुलता थी, जिसने ईर्षा भर दी थी परिचित और तथाकथित उनके मित्रों में इस विदेशी धरती पर। अधिकांश गोरे वैसे भी बर्दाश्त नहीं कर पाते गुलाम देशों से आए उन जैसे कालों को ! शीघ्र ही ढाह भरे फंदे कसने लगे और एक दिन सहज ही असह्य उस जाल में फंस भी गए वह, जैसे चने के संग घुन को पिसना ही पड़ता है।

देवकी हफ्ते में एकबार ही मिलने आ सकती थी । वह भी बस दस मिनट को ही। पर मुलाकातों के दौरान खुद पर चल रही यातना और तकलीफों की भनक तक नहीं लगने दी पत्नी को।
देवकी ही अक्सर पूछती, ‘ चोट कैसे लगी, यह खरोंच कैसे आई माथे पर?’ और वह प्यार से हाथ थपथपाकर कह देते, ‘आदत नहीं है न यहाँ की, तो रात के अँधेरे में दीवाल से टकरा गया था ,’ या फिर ’ फल काटते समय उँगली कट गई थी। तुमने यह सब कभी सीखने ही नहीं दिया मुझे।‘

और तब देवकी का मुँह खुला-का-खुला रह जाता उनके प्यार भरे पर दुख देते अनगिनत बहानों पर- ‘क्या जेल में भी फल खाने को दिए जाते हैं तुम्हें ?’

भगवान ने पर जल्दी ही सुन ली उनकी। ज्यादा देर नहीं लगी। मुश्किल से बस तीन हफ्ते ही बीते होंगे कि उनकी उस जेल की अंतिम रात भी आ गई ।

चार-चार एक साथ ही घुसे कोठरी में । जबकि दो से अधिक की तो खड़े होने तक की जगह नहीं थी वहाँ ।

चमचमाते छुरों को हवा में लपलपाकर एक संग ही गरजे थे, ‘ हमारे साथ चलता है तुरंत, या तेरी सारी हेकड़ी निकाल ही दें हम आज?’

डरे तो थे , पर कम जिद्दी और स्वाभिमानी नहीं थे प्रमोद। सामूहिक धमकी पर भी टस-से-मस नहीं हुए।

और तब दो ने हाथ-पैर पकड़े उनके और तीसरे ने कोहनी से गर्दन भींचते हुए बड़ी बेरहमी के साथ मरोड़ा । फिर गोश्त काटने वाले उस हाथ में पकड़े तेज छुरे-से ही दाढी छीलनी शुरु कर दी ।

असह्य दर्द के साथ बाल और गोश्त साथ-साथ गिरने लगे जमीन पर। चौथा बन्दा आँखों के आगे उठा-उठाकर कभी कुछ लहराता तो कभी घायल चेहरे पर ही दे मारता। ‘कायर कहीं का’- की क्रूर और फूहड़ हँसी से कोठरी गूंज उठी थी। असह्य दर्द था पर एक चीख तक नहीं निकल पा रही थी बंधे मुँह से। कुरते को फाड़कर पूरा मुँह में ठूंस दिया गया था ताकि पिशाच अपना अमानवीय काम करते रहें। फर्क नहीं पड़ रहा था उनके आँख से बहते आँसुओं से उनको। इतना महत्वहीन था वह ‘ब्लैक बास्टर्ड’ उनके लिए ।

चद्दर और फर्श भीगते गए खून की बहती धार से। मानो आदमी नहीं बकरा जिबह हो रहा था वहाँ पर । जब और बर्दाश्त नहीं हुआ तो धीरे-धीरे उनकी चेतना सुन्न होती चली गई और प्रमोद दूसरी ही दुनिया में चले गए हर दर्द से परे। माँ अब खुद आकर अपनी गोदी में लिटा चुकी थी उन्हें और पिता घावों की मरहम -पट्टी कर रहे थे। आंसू डूबी उन आँखों में एक नई शान्ति थी उस वक्त, मानो नीलकमल खिल आए हों कीचड़ भरे तालाब में।
और तब आधा चेहरा वैसे ही साबुत और ठीक छोड़ते हुए, पीछे हट गए चारो डरकर।

बेहोश प्रमोद को उसी खून सनी चद्दर से गले में फंदा लगाकर लटका दिया गया। ताकि पूरा मामला हत्या नही, आत्महत्या का लगे। यही नहीं चलते समय भद्दी गालियों के साथ चारो ने ही मल-मूत्र भी किया चारो तरफ, उनके इर्द-गिर्द। यह साबित करने को, कि विक्षिप्त हो चुके हैं वह। घोर निराशा के चलते कोई संयम या होश नहीं रहा , विवेक नहीं बचा उनमें। और इसी

विक्षिप्त अवस्था में फांसी लगाकर आत्महत्या भी कर ली उन्होंने।
पर फांसी पर लटकते ही तो मानो मुक्ति ही मिल गई थी। हर दुख और हर उम्मीद से परे थे वह अब। न कोई दुख साल रहा था और ना कोई चाह ही शेष थी।
सुबह-सुबह स्तब्ध देवकी को फोन पर खबर दे दी गई कि उसके पति कैदी प्रमोद ने आत्महत्या कर ली है। आकर निजी सामान ले जाए वह।

सामान के नाम पर एक गीता, एक चश्मा और लिओ टौल्सटौय की वार एन्ड पीस नामकी किताब ले आई वह वहाँ से, जिसे दो-तीन दिन पहले ही पढ़ना शुरु किया था प्रमोद ने और देवकी उनकी माँग पर बड़ी मुश्किल से उपलभ्ध करवा पाई थी जेल में।
हर सामान साफ कर दिया गया था। रात के अत्याचार का कोई निशान नहीं था किसी भी चीज पर और जब तक देवकी पहुँची, लाश पोस्टमार्टम के लिए भी भेज दी गई थी।.
सुना है देवकी भी ज्यादा दिन जिन्दा नहीं रह सकी थी उस सदमे के बाद।

हाँ, बेटा प्रखर जो डाक्टर बनना चाहता था। डॉक्टरी छोडकर, अब एक सफल व्यापारी बन चुका है यहीं इंगलैंड में। अपना सारा अतीत भूल एक नई शुरुवात की है उसने और समाज में पूरी प्रतिष्ठा है उसकी। राजनीति में भी पूरी दखल रखता है।

किसी उच्च गोरे पदाधिकारी ने हाल ही में एक भरपूर दावत में हंसी-मजाक और चुटकुलों के बीच बताया था उसे कि आश्चर्य तो अवश्य होगा यह सब जानकर, पर बरसों पहले हुए उसके पिता के आकस्मिक पतन में उसकी माँ की सहेली प्रिया का ही हाथ था।

‘ असल बात यह थी कि तुम्हारे पिता पर दिल रखती थी। और जब उन्होंने उसकी पुनः पुनः की यौन-याचना पर ध्यान नहीं दिया, तो उसी ने गोरी पड़ोसन के साथ मिलकर पूरी साजिश रची। पहले तो सर्जरी में मरीज की तरह नामांकिन करवाया, फिर उनके खिलाफ अभद्र व्यवहार और यौन-अतिक्रमण का आरोप लगाकर पूरी बरबादी का कारण बनाया। जेल भिजवाया, जहाँ से छूटना तो दूर, जिन्दा भी नहीं निकल पाए बेचारे! सुनते हैं बहुत हैंडसम थे?…पर उनकी जेल में जो दुर्दशा हुई सभी को पता है। जेल के रिकौर्ड में चाहे कुछ भी दर्ज हो, बहुत दर्दनाक और निर्दयी घटना थी वह!

कैदियों के बीच तो पर यह सब आम बात है। कीड़े-मकोड़ों से ज्यादा महत्व नहीं है इनका। अक्सर एक दूसरे को ही निगल लेते हैं ये। पर तुम होशियार हो। सफल भी हो। और हमारे मित्र भी। अपना ध्यान रखना।‘

जान-बूझकर फेंके गए उस तेजाब से पूरा झुलस तो अवश्य गया प्रखर, परन्तु रोया नहीं। ना ही गोरे के सामने अपने चेहरे पर एक भी भाव ही आने दिए उसने।

‘मित्र या नो मित्र’ यह सुख और नहीं देना चाहता था वह उन्हें अब।

पूरा नहीं तो आधा अंग्रेज तो हो ही चुका था वह भी अब तक।
मुस्कुराकर घड़ी देखी, हाथ मिलाया। और ‘माफ करना मित्र, मुझे जाना होगा।’ कहता, तेजी से बाहर निकल आया।

पर उसके पिता तो बीस साल से रह रहे थे यहाँ और अपने सेवा-भाव और स्वास्थ-चिकित्सा में निपुण होने की वजह से मसीहा भी माने जाते थे अड़ोस -पड़ोस में। फिर…?
गुंडागर्दी भी तो ताकत का ही एक इजहार है। और षडयंत्र भी बल और कूटनीति का ही एक हिस्सा।

तुरंत वापस घर के लिए कार स्टार्ट कर दी उसने। अगर यहाँ रहना है तो ऐसी घटनाओं को भूलना ही पड़ता है। अतीत तो वैसे भी अतीत है ही । ये ‘अनकही’ बातें, न कही जाएँ, यही बेहतर है। उसके लिए भी और उसके परिवार के लिए भी। फिर अच्छा हो या बुरा, यही देश है अब तो उसका। और न्याप्रिय समझे जाने वाले इस देश में ऐसी अन्यायभरी क्रूर साजिशें आम हैं। होती ही रहती हैं। विशेषतः काले, भूरे, पीले, और बाहर से आए अवान्छितों के साथ। खासकर उन देशों से आए शरणार्थियों के साथ, जहाँ राज का सूरज नहीं डूबता था । सड़क पर, दफ्तर में कहीं भी पिटते और मारे जाते हैं ये आज भी । और खबर छोटी-मोटी सजा के बाद दबा भी दी जाती है।

हाँ, मौका मिला तो बदला अवश्य लेगा अपने पिता का। सजा देगा अपराधियों को, पर अपनी सुख-शांति में बिना किसी क्षति के।

इनके घर में रहकर, बिल्कुल इन्ही के जैसा होकर।‘…

थोड़ा सावधान हो गया है प्रखर।

गोरी-काली सभी औरतों से दूर रहता है। पर मिलने पर मुस्कराकर ही मिलता है। मन की तड़प पर पैसे फेंककर इस्तेमाल भी करता है इनका, इससे ज्यादा और कोई संबंध नहीं उसका इनके साथ ।

सच, यह नागफनी-सी नफरत भी गजब चीज है, मरती ही नहीं कभी कमबख्त !…

शैल अग्रवाल
संपर्क सूत्रः shailagrawal@hotmail.com
shailagrawa;a@gmail.com

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