बिखरे आंसू-शील निगम


आज सुबह ही जैनी का वाट्सअप पर सन्देश आया कि वह हमेशा के लिए भारत वापस आ रही है। मैं सन्न रह गयी। मुझे तो लगा था एक बार जॉन से शादी हो जाने के बाद वह इंग्लैंड की ही हो कर रह जाएगी पर अब अचानक क्या हुआ? जो उसने यह निर्णय लिया. काफी महीनों से मेरी उससे बात नहीं हुई थी सो मैं ने सोचा कि फोन लगा कर बात कर लूँ। पर उसका फोन बंद था, लग ही नहीं रहा था। इ-मेल पर हाल-चाल पूछा पर कोई जवाब नहीं आया। स्काइप पर भी जानने की कोशिश की पर सारी कोशिश नाकाम रही, अब मेरे पास सिवाय उस दिन के इंतज़ार के सिवाय और कोई रास्ता नहीं बचा था,यह अच्छा था कि अपने सन्देश के साथ उसने अपने आने की तारीख़ और फ़्लाइट नंबर लिख दिया था।
एयरपोर्ट पर उसकी बुझी-बुझी सी हालत देख कर मुझे और भी दुःख हुआ उसका चेहरा भी उतरा हुआ था. लग रहा था कि कुछ भी पूछा तो उसकी आँखें बरस पड़ेंगी। इसलिए मैंने कुछ न पूछने में ही भलाई समझी। चुपचाप उसे अपने गले से लगा लिया। गले लगते समय उसके दो बूँद आँसू मेरी गर्दन पर ढुलक पड़े। मैंने उसकी पीठ थपथपा कर उसे सांत्वना देने की कोशिश की तो उसने अपनी आँखें पोंछ लीं।
सामान भी उसका ज्यादा नहीं था इसलिए मेरी ही कार में समा गया था। रास्ते भर हमारे बीच ख़ामोशी का आलम था। ड्राइवर की उपस्थिति में कुछ भी पूछती तो उसका सारा दुःख आँसुओं का गुब्बार बन कर फट पड़ता, इसलिए मैंने चुप रहने में ही भलाई समझी।
जैसे ही हम घर पहुँचे वह सीधी गुसलखाने में चली गयी और काफ़ी देर बाद बाहर आयी अब तक उसका चेहरा लाल हो चुका था और आँखें भी सूज गयी थीं। लगता है नहाने के बहाने उसने अपने दुःख के गुब्बार निकालने की पहली किश्त पूरी कर ली थी। फिर भी मैंने उसे संयत होने का अवसर दिया और गरम चाय का प्याला उसके हाथ में दिया।
मैंने जब उसके लिए नाश्ता परोसा तो उसने बताया कि उसे जेटलैग हो रहा था, वह सोना चाहती है। मैंने भी उसे ज्यादा डिस्टर्ब करना उचित नहीं समझा। चुपचाप कमरे का ऐ.सी.चला दिया और अपने बिस्तर पर चादर उढ़ा कर सुला दिया। मैं कमरे का दरवाज़ा बंद करके ड्राइंग रूम में आ गयी। ऑफिस से छुट्टी ली हुई थी। कंपनी के ड्राइवर को भी चाय-नाश्ता दे कर विदा किया और सोफ़े पर आकर लेट गयी।
लेटे-लेटे न जाने कब आँखें बंद हो गयी और मैं यादों की दुनिया में खो गयी।
उन यादों में मैंने जॉन को जैनी के साथ देखा। उन दोनों के प्यार की कोई मिसाल ही नहीं थी वह लन्दन से आया था और हमारे ऑफिस में ब्रांच मैनेजर के रूप में नियुक्त हुआ था। जैनी उसकी सेक्रेटरी थी और मैं सहायक मैनेजर। जैनी रूप-रंग में किसी अंग्रेज़ महिला से कम नहीं दिखती थी. ब्रिटिश राज्य के समय उसके अंग्रेज़ पिता ने उसकी बंगाली माँ से शादी का वायदा किया था, उसकी माँ पूर्णिमा सेना के अस्पताल में नर्स थी और अंग्रेज़ पिता ब्रिटिश फ़ौज में अफ़सर। उसकी माँ ने उसके पिता पीटर पर भरोसा किया और उसी भरोसे का परिणाम थी जैनी, जिसे माँ के गर्भ में ही छोड़ कर उसका पिता देश आज़ाद होने के समय अपनी ब्रिटिश सेना के लाव-लश्कर के साथ इंग्लैंड वापस चला गया और उसकी माँ पूर्णिमा जीवन भर पीटर के लौटने का इंतज़ार करती रही।
और जैनी … जीवन भर माँ के साथ पिता के लौटने का इंतज़ार करते कब ५० की उम्र पर पहुँच गयी उसे पता ही नहीं चला। वो तो माँ की सरकारी नौकरी थी, बिना किसी आर्थिक सहायता के माँ ने उसे पाल-पोस कर इतना लायक बना दिया कि उसे किसी पर आश्रित न होना पड़े, पर अपनी माँ की संघर्षभरी ज़िंदगी को देखते हुए जैनी ने जीवन भर माँ का साथ निभाने का निर्णय किया और विवाह नहीं किया।
जैनी और मेरी नियुक्ति इस ऑफिस में एक साथ हुई थी. पहले ही दिन से हम दोनों के बीच इतनी आत्मीयता हो गयी थी कि हम दोनों का रिश्ता सगी बहनों से भी बढ़ कर हो गया था। मैं भी अपना घर छोड़ कर इस शहर में अकेली आई थी और जैनी अपनी माँ के साथ रहती थी। उसकी माँ ने मुझे भी बेटी जैसा प्यार दिया था इसलिए मैं भी उन दोनों के बहुत करीब आ गयी थी। जैनी अपने मन की हर बात मुझसे कह देती थी और जब उसे जॉन से पहली नज़र में प्यार हुआ तो अपने मन की हालत मुझसे छिपाए बगैर न रह सकी। मैं भी उसके मन की ख़ुशी में शामिल हो गयी और धीरे-धीरे जैनी और जॉन की निकटता बढ़ती गयी. ऑफिस के बाद दोनों मिलने भी लगे। हालाँकि जैनी की उम्र ज्यादा हो गयी थी पर अपने सौंदर्य और कद- काठी के कारण वह पैंतीस की उम्र से ज्यादा नहीं लगती थी। जॉन उससे उम्र में छोटा था पर दोनों की जोड़ी खूब सजती थी।
जॉन और जैनी में प्यार बढ़ता जा रहा था पर वह हमारे ऑफिस में केवल दो वर्ष के लिए डेप्युटेशन पर नियुक्त हो कर आया था। वापस जाने से पहले वह जैनी को बहुत सारे तोहफ़े दे कर गया और अपने देश आने का न्योता भी दे गया। प्यार के नाते जैनी ने विदेश जाने की हामी तो भर दी पर उसे पता था कि वह अपनी माँ को अकेली छोड़ कर कभी भी विदेश नहीं जा सकेगी। पर इस बीच फ़ोन पर दोनों के प्रेम का आदान-प्रदान होता रहा। जब भी उसकी जॉन से फ़ोन पर बात होती उसके चेहरे का हाव-भाव बड़े खुशनुमा रहते पर अगर एक अंतराल तक बात न होती तो वह गुमसुम हो जाती। फिर उसका दिल बहलाने की ज़िम्मेवारी मुझ पर आ जाती। कभी हम एक साथ फ़िल्में देखते या फिर छुट्टी होने पर माँ के साथ हम तीनों घूमने या पिकनिक मानाने निकल पड़ते।
पर एक दिन अचानक दुःख की घड़ी आ ही गयी और जैनी की माँ को रात को सोते-सोते ही दिल का दौरा पड़ गया। सुबह जब देर तक वो सो कर नहीं उठीं तो ऑफिस जाने से पहले जैनी उन्हें उठाने गयी। जैनी ने माँ को आवाज़ दी, हिलाया भी पर उनकी तो साँसें ही बंद थीं। जैनी को विश्वास नहीं हुआ। तुरंत पहले डॉक्टर को फिर मुझ्र फ़ोन लगाया। मैं भी ऑफ़िस जाने की जल्दी में थी, पर सीधी उसके घर ही पहुँची। तब तक डॉक्टर ने पूर्णिमा जी को मृत घोषित कर दिया था। अब तो जैनी का रो रो कर बुरा हाल था। एक माँ ही तो थी उसके पूरे जीवन की तपस्या … जिसके लिए वह जी रही थी … अब किसके लिए जियेगी? कौन बनेगा उसका सहारा? किसके सहारे जियेगी अब … पूरी ज़िंदगी अकेलेपन में ही गुज़र जाएगी क्या? अभी वह सोच ही रही थी कि जॉन का फ़ोन आ गया। जैनी ने फ़ोन उठाया पर उसका गला रुंध गया और एक शब्द भी न बोल सकी वह, मैंने ही जॉन को सारी बातें बतायीं।
जब तक माँ की अंतिम क्रिया की रस्में चलती रहीं, हम दोनों ने ही ऑफ़िस से छुट्टी ले ली थी और मैं जैनी के घर ही रही फिर मैं कुछ दिनों के लिए अपने घर ले आयी थी। मेरा भी अपना कहने को कौन था यहाँ ? शादी मेरी भी होने के दो महीने में ही टूट चुकी थी क्योंकि मेरे पति विजय के पहले से ही किसी रजनी नाम की किसी महिला के साथ आंतरिक संबंध थे। शादी तो उन्होंने महज़ अपने घरवालों को खुश करने के लिए की थी। पर जैसे ही मुझे इन बातों का पता चला मुझे अपना भविष्य अधर में लटकता हुआ दिखा और एक बार मायके आने के बाद मैं फिर ससुराल गयी ही नहीं। पति को भी मुझसे छुटकारा मिला और मुझे अपना भविष्य सुधारने के लिए यह नौकरी … शुरू-शुरू में मैं और जैनी इस विषय बात करते समय बहुत दुखी हुआ करते थे पर धीरे-धीरे अकेलेपन की आदत पड़ गयी और अब जैनी के दुःख में मैं पूरी तरह से शामिल थी।
पूर्णिमा जी की मृत्यु के ठीक एक महीने बाद जॉन का पत्र मिला उसमें वीज़ा सम्बंधित कागज़ थे और पत्र में जैनी को इंग्लैंड आने का न्योता दिया था। जैनी कुछ समझ न पाई। इस दुःख भरे क्षणों में वह निर्णय नहीं ले पायी कि क्या जवाब दे? उसके बाद जॉन ने फ़ोन पर कई बार इसरार किया तो जैनी उसके पास जाने को राज़ी हो गयी। वो तो अच्छा था कि जॉन ने जाने से पहले ही जैनी का पासपोर्ट बनवा दिया था तो वीज़ा लेने में समस्या नहीं हुई और एक हफ्ते के अंदर ही जैनी लन्दन पहुँच गयी। जाने से पहले अपने घर की चाबियाँ मुझे सौंप गयी।
उसके जाने के बाद कुछ दिनों तक हमारा आपस में संपर्क फोन पर होता रहा, मैंने जैनी का घर अपनी कंपनी को गेस्ट हाउस के रूप में किराये पर दे दिया था और किराया सीधे उसके बैंक अकॉउंट में जमा हो जाता था। धीरे-धीरे वह भी वहाँ अपनी गृहस्थी में मशगूल हो गयी और मैं भी अब कंपनी के मैनेजर पद पर पहुँचने के कारण और ज्यादा व्यस्त हो गयी थी। समय पंख लगा कर उड़ता गया और आज एक लम्बे अंतराल के बाद जैनी हमेशा के लिए लन्दन छोड़ कर वापस आ गयी।
इस बीच क्या कुछ गुज़रा होगा जैनी पर कि आज अपना सब कुछ छोड़ना पड़ा, यह जानने की जिज्ञासा मेरे मन में हुई ही थी कि जैनी ने बैडरूम का दरवाज़ा खोला और पानी माँगा। मैं रसोई घर से पानी लेकर कमरे में गयी। नींद से उसकी आँखें भारी थीं। पानी पी कर उसने थोड़ी ताज़गी महसूस की।
थोड़ा फ्रेश हो कर वह ड्राइंग रूम में आ गयी, हम दोनों ने कॉफ़ी पी और मैंने उसका हाल-चाल पूछा। अब तक वह काफी संयत हो चुकी थी।
उसके बाद जो उसने अपनी कहानी बयान की उसे सुन कर तो मुझे विश्वास ही नहीं हुआ कि जो कुछ उसके साथ बीती वह एक सच्चाई थी। जॉन उसके साथ ऐसा व्यवहार कैसे कर सकता था? उसे तो वह बहुत प्यार करता था। पर जैनी की पूरी कहानी सुनने के बाद पता चला कि जैनी के प्रति जॉन का प्यार केवल दिखावा था। भारत से जाने के बाद तीन महीने बहुत अच्छे बीते। जैनी को लगा उसे जीवन की सारी खुशियाँ मिल गयीं हैं, हनीमून के लिए जॉन उसे पेरिस ले गया था। वो शामें ,वो रातें उसके लिए बहुत सुहावनी थीं। इन खुशियों में वह अपनी माँ का दुःख भी भूलने सी लगी थी।उसका वीज़ा केवल छह महीने का था, शादी के बाद जॉन ने उसके वीज़ा की अवधि भी बढ़वा ली थी। हनीमून से लौटने के बाद जब वह दोनों लन्दन वापस पहुँचे तो जॉन की माँ जूली दो छोटे बच्चों डेविड और विक्टर के साथ घर में मौजूद थी। बच्चों का परिचय माँ ने जॉन के बच्चों के रूप में करवाया तो जैनी के पैरों तले जमीन खिसक गयी। तो क्या जॉन पहले से ही शादीशुदा था? उसने प्रश्नसूचक नज़रों से जॉन की तरफ़ देखा तो जॉन बिना उत्तर दिए अपने कमरे में चला गया।
कमरे में जा कर जब जैनी ने उससे उसके बच्चों और और उनकी माँ के बारे में पूछा तो वह गुस्से से बिफ़र गया। जैनी भी उसका यह रूप देख कर आश्चर्य चकित रह गयी। पर उसने धैर्य से काम लिया, उसने सोचा कि जॉन का गुस्सा शांत होने पर ही वह उससे बात करेगी।
उस दिन के बाद जब-जब जैनी ने उस बात को उठाया जॉन ने उसे कोई उत्तर नहीं दिया। जब जैनी को वहाँ कोई तसल्ली नहीं मिली तो उसने उसी समय भारत वापस आने में ही अपनी भलाई समझी। पर जॉन ने उसका पासपोर्ट वापस नहीं दिया। जब भी वह भारत वापस आने की बात करती जॉन खूब जोर जोर से चिल्लाता और इसका अंत दोनों में झगड़े के साथ ही समाप्त होता। एक महीने वहाँ रह कर जूली भी बच्चों को छोड़ कर वापस अपने घर चली गयी। अब बच्चों की ज़िम्मेदारी भी उस पर आ गयी थी. गुस्से और प्रतिशोध की भावना से वह स्वयं तो भूखी सो सकती थी पर बच्चों को भूखा कैसे रखती? इसलिए सुबह से शाम तक या तो वह बच्चों को सँभालने में या घर के कामों को निपटाने में खटती रहती। सुबह का गया जॉन रात को देर से घर पहुँचता तो नशे में धुत होता, उस समय उससे कुछ भी कहना व्यर्थ होता इसलिए जैनी भी बिना कुछ खाए-पिए सो जाती।
वक़्त गुज़रता गया धीरे-धीरे बच्चे भी बड़े होते गए अब जैनी को भी बच्चों से लगाव होने लगा था। उसे लगता वहाँ जो भी हो रहा था उसमें उन बच्चों का क्या दोष? अब वह उनकी पढ़ाई-लिखाई में भी रूचि लेने लगी थी। उसके जीवन में जो कुछ घट रहा था उसने उसे ही अपने जीवन की नियति मान कर परिस्थितियों से समझौता कर लिया था। उसने जॉन से भी कुछ भी पूछना या कहना-सुनना बंद कर दिया था। जॉन ने भी जब उसमें यह परिवर्तन देखा तो थोड़ा नरम पड़ गया था। अब वह शाम को ही घर वापस आ जाता। थोड़ा समय बच्चों के साथ गुज़ारता। रात को जैनी को मनाने की कोशिश करता। जैनी कब उसकी बलिष्ठ बाँहों में पिघल जाती उसे पता ही नहीं चलता और अब इसी तरह ज़िंदगी आगे बढ़ने लगी और समय गुज़रता गया।
बच्चे बड़े हो गए थे। एक-एक करके यूनिवर्सिटी चले गए थे। अब घर में थे केवल जॉन और जैनी। अब कभी-कभी वक़्त मिलने पर दोनों में अंतरंगता भी बढ़ने लगी थी. एक दिन अंतरंगता के उन क्षणों में जॉन ने बता ही दिया कि दोनों बच्चे रोज़ी के थे जो उसकी पार्टनर थी, पर जब उसकी पोस्टिंग भारत में हुई तो उसे पता चला कि रोज़ी अकेलेपन से ऊब कर अपने एक पुरुष मित्र के साथ रहने लगी थी और बच्चों को उसकी माँ जूली के पास छोड़ गयी थी.उसके बाद वो कभी वापस नहीं आयी और न ही जॉन ने उसे वापस बुलाया। जैनी के मन में आया कि वह जॉन से पूछे कि जब पहले से ही रोज़ी उसकी ज़िंदगी में थी तो फिर उसने भारत में उसके साथ प्यार का नाटक क्यों रचाया? पर न जाने क्या सोच कर वह चुप रह गयी।
और फिर एक दिन जॉन के ऑफिस से खबर आयी कि जॉन को हार्ट अटैक हुआ है और वह अस्पताल में है। जब तक जैनी अस्पताल पहुँची जॉन की मृत्यु हो चुकी थी, ऑफिस वालों ने जॉन की माँ को भी खबर कर दी थी। वह भी अस्पताल पहुँच चुकी थीं।
जॉन की मृत्यु के बाद जब उसकी वसीयत खुली तो एक बार फिर उसके पैरों तले जमीन खिसक गयी, वसीयत में जॉन ने उसके नाम कुछ भी नहीं लिखा था,सारा पैसा, सारी जायदाद,सब कुछ डेविड और विक्टर के नाम था। उन दोनों ने अपनी माँ को भी खबर कर दी थी, उनकी माँ रोज़ी भी उसी घर में वापस आ गयी और सबने मिल कर जैनी का भारत वापसी का टिकट और पासपोर्ट उसके हाथ थमा दिया था।
बेचारी जैनी क्या करती? उसे समझ में आ चुका था कि शुरू से ही जॉन के घर में उसकी हैसियत एक अवैतनिक नौकरानी के सिवाय कुछ नहीं थी। जॉन ने उसका भरपूर इस्तेमाल किया था। अब वापस भारत लौटने के सिवाय कोई चारा नहीं बचा था उसके पास।

शील निगम

शील निगम

शिक्षा-बी.ए., बी.एड.
कवयित्री, कहानी तथा स्क्रिप्ट लेखिका.
मुंबई में १५ वर्ष प्रधानाचार्या तथा दस वर्ष हिंदी अध्यापन.
दूरदर्शन पर काव्य-गोष्ठियों में प्रतिभाग तथा साक्षात्कारों का प्रसारण.
आकाशवाणी के मुंबई केंद्र से रेडियो तथा ज़ी टी.वी. पर कहानियों का प्रसारण.
प्रसारित कहानियाँ -‘परंपरा का अंत’ ‘तोहफ़ा प्यार का’, ‘चुटकी भर सिन्दूर,’ ‘अंतिम विदाई’, ‘अनछुआ प्यार’ ‘सहेली’, ‘बीस साल बाद’ ‘अपराध-बोध’ आदि .

देश-विदेश की हिंदी के पत्र -पत्रिकाओं तथा ई-पत्रिकाओं में कवितायें तथा कहानियाँ प्रकाशित.विशेष रूप से इंगलैंड की ‘पुरवाई’ तथा ‘लेखनी’ कनाडा के ‘द हिंदी टाइम्स’ व ‘प्रयास ‘ तथा ऑस्ट्रेलिया के ‘हिंदी गौरव’ व ‘हिंदी पुष्प’, नीदरलैंड्स की ‘आम्स्टेल गंगा’ में बहुत सी कविताओं, आलेख तथा कहानियों का प्रकाशन. ‘हिंद युग्म’ द्वारा कई कविताएँ पुरस्कृत.
स्टोरी मिरर तथा शीर्षक साहित्य परिषद द्वारा कहानी ‘ज्योति पुंज’ ‘काठ की हाँडी’ तथा ‘माँ’ पुरस्कृत.

अनुवाद कार्य-

‘टेम्स की सरगम ‘ हिंदी उपन्यास का अंग्रेजी अनुवाद.
एक मराठी फिल्म ‘स्पंदन’ का हिंदी में स्क्रीनप्ले लेखन.

अंतरराष्ट्रीय सेमिनार में सहभागिता-
विषय-

पर्यटन और मनोविज्ञान
ऑस्ट्रेलिया में हिन्दी
विश्व मैत्री और भाईचारे पर सोशल मीडिया का प्रभाव
महिला कलाकार: सांस्कृतिक धरोहर की परिवाहक
कथक गुरु सुश्री काजल शर्मा (इंग्लैंड)

सम्मान-
जनवरी २०१४ में बाबा साहब अम्बेडकर राष्ट्रीय पुरस्कार (देहली).

जून २०१५ में ‘हिंदी गौरव सम्मान’ (लंदन).

मार्च २०१६ में ‘हम सब साथ साथ’
द्वारा ‘प्रतिभा सम्मान’ (बीकानेर).

नवंबर २०१७ में ‘सिद्धार्थ तथागत साहित्य सम्मान’ (सिद्धार्थ नगर).
जून २०२० में ‘आखर आखर सम्मान’ (भारत)

‘नया लेखन नये दस्तखत’ द्वारा लघुकथा प्रतियोगिता में बहुत सी कहानियाँ सर्वश्रेष्ठ घोषित.

‘शीर्षक साहित्य परिषद’ द्वारा आयोजित दैनिक प्रतियोगिता में कविताएँ, लघुकथाएँ तथा कहानी ‘माँ’ सर्वोत्कृष्ट घोषित.

साहित्य प्रहरी समूह द्वारा आयोजित कहानी प्रतियोगिता में कहानी ‘ज्योति-पुंज’ को प्रथम पुरस्कार.

यश पब्लिकेशन द्वारा आयोजित ‘कलम की कसौटी’ कहानी प्रतियोगिता में ‘ईर्ष्या’ विषय पर लिखी कहानी को द्वितीय स्थान प्राप्त.

अगस्त २०११ में ‘द संडे टाइम्स’ के स्पेशल इश्यू में इक्कीसवीं सदी की १११ लेखिकाओं में नाम घोषित.

इ पुस्तकें-
मंद-मंद मुस्कान ,काव्य बीथिका, कथा मंजरी.

साझा संकलन-
अनवरत, मुंबई की कवयित्रियाँ, १४ काव्य रश्मियाँ, प्रेमाभिव्यक्ति, सिर्फ़ तुम, मुम्बई के कवि.

आलेख प्रकाशित-
एक सवाल हूँ मैं (ज्योतिर्मयी पत्रिका)
पर्यटन और मनोविज्ञान (अंतरराष्ट्रीय पत्रिका ‘लेखनी’)
स्त्री पुरुष का पर्याय- शिखंडी (अंतरराष्ट्रीय पत्रिका लेखनी)
पत्रकारिता का बदलता स्वरूप: आम आदमी की नज़र में (न्यू मीडिया)
आदिवासी कला: एक झलक (आदिवासी साहित्य एवं संस्कृति)
मो. नं
7900154861
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