एक नयी दिशा-सुधा ओम ढींगरा

वह डिब्बों में रखे अपने आभूषणों को निहार रही है। कई वर्षों की मेहनत से उसने बड़े चाव और ख़्वाहिशों से उन्हें बनवाया है। तभी उसकी नज़र एक ही हीरे वाले नैकलेस पर गई। ज्योंही उसने उसे हाथ में लिया, उसके पति परेश ने कमरे में प्रवेश किया।
उसके हाथ में हीरे का वह नैकलेस देख कर परेश ने कहा -‘मौली देखती ही रहोगी या इसे पहनोंगी भी। कभी पहन लिया करो। तुमने बड़े शौक से ये आभूषण बनवाए हैं।’
‘परेश पहनने से डर लगने लगा है। घबराहट होनी शुरू हो जाती है।’ मौली के हाथ में पकड़ा हीरा उसकी आँखों के पानी में चमकने लगा।
‘आजकल नकली मोती ही पहनती हो। क्या फायदा इतने ज़ेवर बनवाने का। अब तो सब कुछ ठीक है।’ तभी लैंड लाइन फ़ोन हॉल में बजा। परेश उस तरफ बढ़ गए।
परेश के कह देने से तो सब ठीक नहीं हो गया। वह सोचने लगी। वह पहले वाली मौली कहाँ रही है! पहनना-ओढ़ना कितना कुछ बदल गया। भीतर एक असुरक्षा- सी बनी रहती है। हाथ में पकड़े हीरे के नैकलेस को देख कर उसे उस दिन की याद आ गई जब उसे वह फ़ोन आया था-
‘क्या मैं मौली देव से बात कर सकती हूँ?’
‘जी मैं बोल रही हूँ।’
‘मेरा नाम रीटा भास्कर है। हम एक घर ख़रीदना चाहते हैं क्या आप हमारी मदद करेंगी?’
‘मिसेज़ भास्कर मेरा तो काम ही यही है। इससे पहले कि मैं आपका काम शुरु करूँ, आपको एक फ़ॉर्म साइन करना पड़ेगा।’
‘कैसा फ़ॉर्म?’
‘बस यही कि आपने मुझे अपना रियल एस्टेट एजेंट बनाया है। साइन किया हुआ फ़ॉर्म मिलते ही मैं आपना काम शुरू कर दूँगी।’
‘क्या मुझे आपके ऑफ़िस आना पड़ेगा?’
‘नहीं, मैं फ़ॉर्म आपको ऑन लाइन भेज देती हूँ आप उस पर अपने साइन करके मुझे वापस ऑनलाइन ही भेज दें।’
कुछ पलों बाद ही साइन किया हुआ फ़ॉर्म उसके पास आ गया और उसके साथ ही फ़ोन की घंटी बज उठी थी। उसके फ़ोन उठाते ही दूसरी तरफ़ से आवाज़ उभरी-
‘मैंने सोचा आपको बता दूँ, कि मुझे कैसा घर चाहिए!’
‘मिसेज़ भास्कर अगर आप मुझे अपनी अपेक्षाएँ, ज़रूरतें, किस इलाके में, कितनी कीमत का, कितने एरिया का, कितने कमरों का घर लेना चाहते हैं, लिख भेजें तो मुझे घर ढूँढ़ने में आसानी होगी।’ उसने विनम्रता से उत्तर दिया।
‘जी मैडम, लिख भेजती हूँ।’
‘और हाँ, आपके कितने बच्चे हैं, किस उम्र के हैं, वह भी लिखें ताकि घर देखते समय स्कूल को भी कंसिडर किया जाए।’ उसे लगा था कि उस ओर से आई युवा आवाज़ इस देश में नई है। वह हमेशा ही देश से आए नए लोगों को घर ख़रीदने में मदद करती है; क्योंकि भारत से आई युवा पीढ़ी को यह पता नहीं होता कि इस देश में घर ख़रीदने के लिए एरिया के साथ स्कूल का भी बहुत महत्व है।
यहाँ के हर शहर को एक काउंटी के भीतर रखा गया है। कानून व्यवस्था काउंटी के शेरिफ़ और सभी स्कूलों में शिक्षा की एक जैसे व्यवस्था तथा सिस्टम काउंटी के शिक्षा बोर्ड की ज़िम्मेदारी होती है। बस देखना यह होता है कि जिस इलाके में घर लिया जा रहा है, उसके स्कूल की रेटिंग क्या है? और शिक्षा बोर्ड ने उसे क्या-क्या और सुविधाएँ दी हुई हैं जिनका लाभ बच्चा ले सकता है। हालाँकि शिक्षा का स्तर और कोर्सेज़ हर स्कूल में एक जैसे होते हैं । पर प्रतिभाशाली बच्चों के लिए एडवांस कोर्सेज़ का प्रावधान कई स्कूलों में होता है। इन्हीं सब महीन- सी बातों से वह नए आने वालों को अवगत करवाती है।
दो घंटे बाद ही उसे रीटा भास्कर की ओर से लंबी-चौड़ी ईमेल मिली। पढ़कर वह हैरान रह गई थी। जिन इलाकों में रीटा घर चाहती थी, वे शहर के पॉश सब डवीज़न हैं और जितना बड़ा वह घर चाहती थी, वह मिलियन डालर से अधिक का होगा, कम का नहीं। उसे लगा था वह इस देश में नई आई है, अभी आर्थिक रूप से सुदृढ़ नहीं होगी, शायद संघर्षशील हों। पहला छोटा-सा घर चाहिए होगा; जो यहाँ अक्सर होता है। पहले छोटा, फिर बड़े घर को बनवाया या बना बनाया लिया जाता है, पर यहाँ तो बात ही कुछ और थी। पहले ही बड़ा- सा घर। वह आचंभित थी! वह गलत नहीं हो सकती, अमेरिकन अंग्रेज़ी में उसका उच्चारण बता रहा था कि वह स्वदेश से नई आई थी।
उसने सिर को झटका। फालतू की सोचों में पड़ गई थी। उसका काम अपने ग्राहक की इच्छा का घर ढूँढ़ना है, ग्राहक पैसा कहाँ से लाता है, यह उसकी सिर दर्दी है। देश के बहुत से उद्योगपति, नेतागण अपने बच्चों को यहाँ पढ़ने भेजते हैं, उन्हें बड़े-बड़े घर लेकर देते हैं। बच्चे कुछ वर्ष यहाँ रहते हैं, फिर उन घरों को रियल एस्टेट एजेंसियों को दे जाते हैं, जो उन्हें किराए पर चढ़ाती हैं और उनकी देख-रेख भी करती हैं। इस तरह विदेश में उनके धन का निवेश हो जाता है ( ब्लैक या व्हाईट, वह नहीं जानती ) और समय-समय पर वे भारत से आकर अपनी प्रॉपर्टी को देख भी लेते हैं। वह ऐसे कई घरों की देख-रेख कर रही है। उसने सोचा था एक और सही।
‘रईस ज़ादी लगती है, जिस तरह का घर वह चाहती है।’ उसने स्वयं से ही बात की। वह इस बारे में इतना क्यों सोच रही थी ? उसने खुद को ही समझाया था। पर कुछ खटक रहा था। छटी इंद्री सचेत कर रही थी। इंसान की फितरत है, अक्सर कई बार स्वार्थ हावी हो जाता है और उसके चलते अपने भीतर की आवाज़ को अपने स्वार्थ तले दबा जाता है। वह भी शायद यही कर रही थी, बड़ी सी कमीशन नज़र आ रही थी। कुछ जानने-समझने की कोशिश नहीं की। हालाँकि भीतर से बार-बार संकेत मिल रहा था।
उसने दो दिन में ही पूरी रिसर्च कर अलग-अलग सब डवीज़न के घरों की जानकारी और लिंक्स रीटा को भेज दिए, ताकि वह उन घरों को देखने आने से पहले उनका वर्चुअल टूर ले ले। उसने घरों को तलाश करते समय पूरी कोशिश की, लिस्ट में दी गई जानकारी के मुताबिक ही घरों को ढूँढ़े। वह हर ग्राहक को बहुत गंभीरता से लेती है। खरीदते तो वे मकान हैं, जिसे वे घर बनाते हैं। जहाँ वे सुख, शांति, समृद्धि पाते हैं।
उसकी एक साथी मलिंडा तो उसे टोकती रहती है-‘अरे मौली तुम क्यों इतनी जान मारती हो ग्राहकों के लिए। घर मकान में रहने वालों से बनता है, अगर वे ही समझदार नहीं होंगे तो घर बनते-बनते रह जाएगा और मकान भी उजड़ जाएगा। मकानों की भाषा सुननी बंद कर दो।’
ईंट, गारा , पत्थर , चूना , लकड़ी जब मिल जाते हैं तो कई तरह की ऊर्जा पैदा करते हैं, वही उनकी भाषा होती है। उसे इन ऊर्जाओं को समझने का संज्ञान इस देश में आते ही उसकी सबसे पहली जो सहेली बनी वेडा ( जिसे हिंदी में वेदा कहा जाएगा ) उसने दिया। वह अमेरिका की स्थानीय इंडियन थी, जिन्हें यहाँ अब आदिवासी बना दिया गया है यानी रेड इंडियन। इनके कई नाम भारतीय पुरा ग्रंथों से मिलते-जुलते हैं। प्रकृति की पूजा भी भारतीय पूजा विधियों की तरह है। मकानों की सकारात्मक और नकारात्मक ऊर्जा को पकड़ना वेडा ने ही उसे सिखाया। वेडा वास्तु कला की ज्ञाता थी। रेड इंडियनज़ के वास्तु कला अनुसार घरों में कोण नहीं होने चाहिए, उन्हें गोल कर देना चाहिए। कोण परिवार वालों की सकारात्मक ऊर्जा धीरे-धीरे हरण करके नकारात्मक ऊर्जा छोड़ते रहते हैं। कोण की जगह गोलाई घर के लोगों की सकरात्मक ऊर्जा बढ़ाती है। वेडा ने उसे वॉशिंगटन डीसी में उनके म्यूज़ियम को देखने की भी सलाह दी थी ताकि वह कोण और गोलाइयों को समझ सके। उसने वह म्यूज़ियम देखा भी था। दो दीवारें आपस में गोलाई से मिलाई गई हैं। बाहर और भीतर से हर जगह। दिशाओं को ये लोग बहुत मानते हैं। जो भारतीय वास्तु के अनुसार घर लेना चाहते हैं, वह उनकी पूरी सहायता करती है ।आजकल स्थानीय लोगों में भी उसने दिशाओं के प्रति रूचि देखी है। भूमंडलीकरण का शायद प्रभाव है।
रीटा भास्कर की ईमेल आई। उसने और उसके पति ने कई घर पसंद किए, जिन्हें वे देखना चाहते थे, पर समस्या समय की थी। दोनों काम करते थे और लंच की एक घंटे की छुट्टी थी। दो घंटे वे और निकाल सकते थे। उसने उन्हें अपने दफ़्तर से थोड़ी दूर के रेस्टोरेण्ट में लंच के लिए बुला लिया ताकि लंच का उनका समय बचे और वह उन्हें जान भी ले। एजेन्ट ऐसा अक्सर कर लेते हैं। वह रेस्टोरेण्ट उन घरों के करीब था, जिन्हें देखने जाना था।
रेस्टोरेण्ट में एक युवा जोड़े ने प्रवेश किया। उन्हें देख ऑंखें चौंधियाँ गईं। इतना खूबसूरत भारतीय जोड़ा उसने अर्से बाद देखा था। ईमेल में उन्होंने लिखा था, उनके कोई बच्चा नहीं, और उनकी शादी को पाँच साल हुए हैं। अभिजात वर्ग का रईस दंपति। वहाँ बैठे लोगों की नज़रें भी उनकी तरफ उठीं। दोनों ने ब्रांडिड कपड़े पहने हुए थे। रीटा के हाथ में लुई विटॉन का पर्स और उसी से मैचिंग सैंडिल थे।
लंच के दौरान उन्होंने बताया कि वे आज़मगढ़ के राजघराने से हैं। उनके पिता और दादा व्यापारी स्वभाव के थे। धन का निवेश उन्होंने बहुत अच्छा किया था। उनके पिता की बिजली के ऑउटलेट बनाने की फैक्टरी और कंपनी है और अमेरिका उनका सबसे बड़ा खरीददार है। उनके पूरे परिवार के पास ग्रीनकार्ड है। वे दोनों सॉफ़्टवेयर इंजीनियर हैं पर पिता की कंपनी का एक ऑफिस यहाँ खोल कर उसे चला रहे हैं। उन्होंने उसे अपना बिज़नेस कार्ड दिया। जिस पर कंपनी के नाम के साथ समीर भास्कर , सीईओ लिखा था और रीटा भास्कर के नाम के साथ मैनेजर लिखा था। उसने सुना भी था कि अमेरिका में बिजली के ऑउटलेट भारत की एक कंपनी सप्लाई करती है। यकीन न करने की कोई गुँजाइश नहीं बची थी।
‘मैडम आप बहुत गरिमामय हैं। आपके हीरे आपके व्यक्तित्व में और भी चार चाँद लगा रहे हैं।’ समीर ने बहुत आदर से कहा।
‘धन्यवाद मिस्टर भास्कर।’ उसने भी विनम्रता से उत्तर दिया।
‘पहले तो मैडम मुझे सिर्फ समीर कहें, मैं आपसे बहुत छोटा हूँ। दूसरा यह जानकारी दें कि ये आपने कहाँ से ख़रीदे? भारत या अमेरिका ? मैं रीटा के लिए लेना चाहता हूँ।’ जिस अदब से वह बात कर रहा था, वह उसके अंदाज़ पर फ़िदा हो गई थी।
‘मैंने तो यहाँ खरीद हैं। पर आप तो भारत में खरीद सकते हैं।’ उसने भी बड़े प्यार से बात की।
‘मैडम हमने खरीदे हैं। इंटरनैशनल डॉयमंड एक्सपर्ट को दिखाए तो उसमें खोट निकली ।’ उदास होकर उसने कहा।
‘ब्लू नॉयल डॉयमंड की वेब साइट पर जाओ। वहाँ से खरीदो। जो हीरा आपको पसंद आएगा, एक्सपर्ट चैक भी कर देंगें।’ वह कह कर रेस्टोरेण्ट से बाहर आ गई। वे उसके पीछे बाहर आ गए थे। उसके साथ ऐसा पहली बार हुआ कि घर खरीदने आए किसी जोड़े ने घर की बात न करके उसके हीरों की बात की, जबकि वह किसी को नहीं बताती थी कि वह असली हीरे पहनती है। किसी के पूछने पर टाल जाती थी। आज कैसे सब बोल गई और अपनी ही बेवकूफ़ी को नज़रअंदाज़ भी कर गई।
उसका व्यवसाय ही ऐसा है, समय-असमय लोगों की सुविधानुसार उसे घर दिखाने पड़ते हैं। कभी-कभी शहर से बाहर दूर -दराज़ के इलाकों में भी। वह हमेशा सतर्क रही है । उस दिन उसकी सतर्कता कहाँ चली गई और फिर वह अपने -आप से लापरवाह अपनी कार की ओर बढ़ गई तो वे भी उसके साथ ही आ गए।
‘मैडम हमने तो अपनी कार को वापिस भेज दिया। सोचा आपके साथ ही घूम लेंगे और साथ ही घर देख लेंगे। वापिस जाने से पहले बुला लेंगे। ऑफिस की गाड़ी है।’ समीर ने बड़ी आत्मीयता से कहा।
‘हम तो अक्सर ऐसा कर लेते हैं, कोई बात नहीं।’ उसने कह तो दिया था पर साथ ही कुछ खटका भी था। इस देश में ऑफिस की गाड़ी। कुछ अजीब लगा। पता नहीं क्यों वह फिर अपनी शंका को टाल गई।
‘मैडम, कंपनी में काम करने वाले बहुत से वर्कर हम भारत से लाते हैं। आते ही वे कार खरीद नहीं सकते, हमने कंपनी की ओर से एक कार रखी हुई है, सबको लाने -ले जाने के लिए। एक ड्राइवर रखा हुआ है। हम भी उसी गाड़ी से आते-जाते हैं ताकि कंपनी में काम करने वाले अच्छा महसूस करें।’ उसने ऐसे कहा जैसे सफाई दे रहा हो।
वह यह सुन ख़ामोश रही। सब कुछ सही था, पर उसके भीतर बेचैनी क्यों थी ? उसकी सफाई देना या उसे कुछ और परेशान कर रहा था। उसने अपने आपको सँभाल लिया, अपनी भावनाओं पर यह सोचकर काबू कर लिया कि जिन भारतीय कंपनियों के ऑफ़िस यहाँ हैं, उन सबके घटियापन को वह जानती है। उनमें काम करने वालों ने वहाँ की कहानियाँ बताई हुई हैं। घर खरीदते समय ग्राहक और एजेंट का एक रिश्ता-सा बन जाता है। बहुतों ने अपने दिल खोले हैं, कइयों का उसने मार्गदर्शन भी किया है।
बावजूद शंकाओं के उसने खुश होकर उन्हें घर दिखाए। एक के बाद एक। शहर के अलग-अलग कोनों में उसे घूमना पड़ा, उनके पास समय की कमी थी। जल्दी-जल्दी उन्हें घर दिखाए। सोचा अगर कोई घर पसंद आएगा तो दोबारा तो देखेंगे ही। वह ड्राइव करती रही और सारे रास्ते वे दोनों चुपचाप अपने फ़ोन पर व्यस्त रहे , उन्होंने आपस में भी बात नहीं की।
‘मैडम, यह घर देखिए, हमें इसे देखना है और हमें लगता है यह हमें पसंद आ जाए गा। जितना बड़ा हमारा परिवार है, इसी घर में समा सकेगा। और हमें महल जैसा एहसास भी देगा।’ समीर ने एक लिंक और घर दिखाते हुए कहा। उसने कार सड़क की साइड पर रोक कर उसे देखा।
‘इसकी कीमत देखी है?’ वह कीमत देख कर अचंभित थी। एक मिलियन से पाँच मिलियन की छलाँग थी।
‘जी परिवार से बात कर ली, वे तैयार हैं। मैडम, फ़ोन पर हम यही तो फाइनल कर रहे थे। आप से बात करना चाहते हुए भी आपसे बात नहीं कर पा रहे।’ समीर ने बड़े प्यार से कहा।
‘यह घर जिस एजेंट ने मार्किट में बिकने के लिए रखा है, मुझे उससे बात करनी पड़ेगी। आज हम इस घर को देख भी सकते हैं या नहीं।’ उसने टालने के लिए कहा। वह उस दिन वहाँ जाना नहीं चाहती थी।
‘मैडम, हमने बात कर ली है, अभी वह एजेंट आपको फ़ोन करेगी।’ समीर ने बात समाप्त की ही थी कि, एजेंट मोना का फ़ोन आ गया। उसने घर देखने के लिए ‘हाँ’ कर दी और वहाँ उसने जो नंबरों वाला ताला लगाया हुआ है, उसका कोड भी उसे दे दिया। उसके पास अब कोई विकल्प नहीं था। उसे थोड़ी खीझ भी आई। उस दिन वह दूर के घर दिखाने जाना नहीं चाहती थी।
उस घर को देखने के लिए शहर के नॉर्थ से सॉउथ जाना पड़ना था। उसने कार उस दिशा में मोड़ ली। ट्रैफिक बहुत था। हर स्टॉप साईन पर कार रुक रही थी। वे फिर दोनों अपने-अपने फ़ोन पर व्यस्त हो गए। एक स्टॉप साईन पर अचानक समीर ने पूछा-‘मैडम, जो डॉयमंड आपने पहने हैं वे तो इस वेबसाइट पर हैं नहीं। मैं रीटा के लिए ख़रीदना चाहता हूँ, इसलिए पूछ रहा हूँ।’
उसने अपने स्वभाव की सरलता के चलते उससे फ़ोन लिया और उस पेज को खोल कर दिखा दिया; जहाँ से उसने डायमंड चुने थे।
उसे देखते ही वह अपनी सीट से कूदा-‘ मैडम यह तो पाँच कैरेट के हैं, मैं इन्हें अभी नहीं अफ़ोर्ड कर सकता। मम्मी-पापा से पैसा लेना नहीं चाहता।’
उसने रीटा की ओर देखते हुए कहा-‘डियर, तुम्हें लेकर ज़रूर दूँगा। जब इनको खरीदने के काबिल हो जाऊँगा। परिवार के पैसे से नहीं खुद के पैसे से।’ रीटा उसे देखकर मुस्करा दी।
उसे स्वाभाविक लगा। युवा जोड़े का उत्साह, उतावलापन। पर उसका मन विचलित हो रहा था। समीर उसके हीरों की ही बात कर रहा था और वह उसकी बातों में आ रही थी।
ड्राइव करते हुए उसके पति की कही हुई बात पता नहीं कहाँ से उसके दिमाग में कौंध गई-‘मौली तुम जिस प्रोफ़ेशन में हो वहाँ तुम्हें कई बार उजाड़ में भी घर दिखाना पड़ता है और तुम असली ज़ेवर पहनती हो। पता नहीं कब किसी का दिमाग ख़राब हो जाए। तुम्हारे कुलीग भी जैलेस हो सकते हैं। तुम कई बार ऑफ़िस में देर तक बैठती हो, कोई लालच में आकर तुम्हें नुक्सान पहुँचा सकता है।’
परेश उसके पति जब चिंता करते हैं तो उसे बहुत प्यार आता है उन पर। उसने अपने पति के गाल पर किस्स करके कहा था-‘हनी, आप जानते हैं कि मैं अर्टिफिशियल ज्वैलरी नहीं पहन सकती। एलर्जी हो जाती है मुझे और मेरे कुलीग्ज़ को यही पता है कि मैं अर्टिफिशियल पहनती हूँ। किसी को नहीं बताती यहाँ तक कि अपनी बेस्ट फ्रेंड मालिन्डा को भी नहीं।’
‘पर कोई ग्राहक जान सकता है।’ परेश ने बहुत नरम लहजे में कहा।
‘पर कैसे? जब तक मैं बताऊँगी नहीं! यार, आप भी कमाल करते हो। घर खरीदने वालों के साथ मैं अपने हीरों की बात करुँगी।’ उसने नाराज़ होकर कहा था।
‘स्वीटी, शातिर लोगों का कुछ पता नहीं होता। वे भांप जाएँ कि तुम भावुक, सरल हृदय हो और वे बात ऐसी करें कि तुम पिघल जाओ।’ परेश ने बात पूरी भी नहीं की, वह बिफर गई थी-‘ यार बच्ची समझा है ,बीस सालों से इस व्यवसाय में हूँ। शुरू से ही रियल ज्वैलरी पहन रही हूँ।’
‘मौली तुम भड़क बड़ी जल्दी जाती हो। पहले इतने बड़े-बड़े हीरे पहनती थी क्या? इतना पैसा कहाँ था? बस सचेत रहने को कह रहा हूँ। दिल की बजाय दिमाग से भी काम लेना।’ परेश ने कह कर बात समाप्त कर दी थी।
उसने अपने मुँह पर कल्पना में एक करारा-सा तमाचा जड़ा। अब उसने क्या किया? सोच कर ही क्षोभ हुआ। बच्चों से भी बद्तर हरकत की। परेश सही हैं। वे उसे उससे कहीं अधिक जानते हैं।
उसने घर जाना बेहतर समझा। उसने उन दोनों को कहा-‘ यहाँ ट्रैफिक बहुत समय ले रहा है और आपको भी काम पर पहुँचना है। फिर किसी दिन इसके साथ और घर भी दिखा दूँगी। एजेंट से मैं बात कर लूँगी। फिर से अपॉइंटमेंट ले लेंगे।’
दोनों एक साथ बोले-‘मैडम, बहुत समय है।’ रीटा ने समीर को बोलने दिया-‘हमने ऑफ़िस मैसेज कर दिया है। अब सारा दिन हमारा है। कुछ घर हमने और भी ढूँढें हैं, हम आज घर फ़ाइनल कर लेंगे।’ उस समय वह दुविधा में पड़ गई थी । इनकी एजेंट बनने में उसने जल्दी की थी। भीतर की बेचैनी का तब एहसास हुआ। उसने परिस्थिति को सँभाला। सहज हो कर कहा-‘पर मैं अधिक घर नहीं दिखा सकती, मुझे पाँच बजे ऑफ़िस पहुँचना है। पहले से समय तय है, एक घर की क्लोज़िंग करनी है, यानी खरीददार और बेचने वाले की डील फ़ाइनल करवानी है।’
‘ठीक है जितने दिखा सकते हैं, दिखा दें।’ समीर ने कंधे उचकाते हुए कहा और दोनों अपने-अपने फ़ोन पर कुछ देखने लगे।
उन्हें अपने में व्यस्त देखकर, उसने अपने घर का एग्ज़िट ले लिया। जिस रास्ते से शहर के साऊथ में वह जा रही थी, वहाँ से उसका घर पाँच मिनट की दूरी पर था। वे अपने में इतने मस्त बैठे थे कि उन्हें पता ही नहीं चला। ज्यों ही उसने अपने सबडिवीज़न में प्रवेश किया, समीर ने फ़ोन से आँख उठाई।
‘मैडम, यहाँ भी एक घर है क्या?’ समीर ने पूछा।
उसने मुस्करा कर कहा -‘यहाँ मेरा घर है। मैंने अपने पति से कोई बात करनी है, पाँच मिनट से अधिक समय नहीं लगेगा।’
‘आपने हमें बताया नहीं।’ समीर की आवाज़ बता रही थी कि उसे अच्छा नहीं लगा।
‘पर पहले तुम लोगों का भी तो सारे दिन का प्रोग्राम नहीं था। अब जब इधर से निकल रही थी तो सोचा पति को सब निर्देश दे जाऊँ। मैं तो अब लेट आऊँगी। ऑउट ऑफ़ वे तो नहीं गई, रास्ते में ही रुकी हूँ।’ उसकी आवाज़ और शब्दों के दबाव को वह भाँप गया बोला -‘नहीं…. नहीं मैडम, मैं तो इस लिए कह रहा था कि हम किसी कॉफ़ी हॉउस में बैठ जाते।’
‘बस पाँच मिनट का काम है।’ उसके मुँह की बात भी पूरी भी नहीं हुई, वह बोला-‘हम कार में बैठते हैं, आप हो आएँ।’
उसने घर के आगे कार रोकी और कार से बाहर आ घर में चली गई। उसका पति घर पर था। उसने अपने पति को एक ट्रैफिक सिग्नल पर मैसेज कर दिया था। जल्दी से उसे अपनी बेवकूफ़ी बताई और माफ़ी माँगी।
‘मौली यह समय माफ़ी माँगने का नहीं है, हल निकालने का है।’ उसके पति ने बड़े प्यार से कहा। परेश की यही बात उसे अच्छी लगती है, कभी नीचा नहीं दिखाते, गलती पर छोटा नहीं होने देते।
‘क्या हल निकालूँ ?’ उसने हथियार डालते हुए कहा।
‘तुम्हारे पास मिलता-जुलता एक सेट है, शायद सर्वोसकी का।’
उसने ‘हाँ’ में सिर हिला कर कहा -‘बिलकुल उसी डिज़ाइन की तरह का तो असली में बनवाया था। नकली पहन कर एलर्जी होती है। कुलीग तो यही सोचते हैं कि मैं वही सेट पहनती हूँ।’
‘इसे उतार दो मैं सँभाल कर रख देता हूँ। दूसरा पहन जाओ, एलर्जी की गोली ले लो। इससे उन्हें यह नहीं लगेगा कि तुमने उन पर शक करके अपना सेट उतार दिया। अगर वे सही हैं तो उन्हें अपना अपमान लगेगा। चिढ़ भी सकते हैं, हालाँकि हक़ नहीं उन्हें कुछ भी कहने और सोचने का। तुम कभी भी अपने कपड़े और ज़ेवर बदल सकती हो। पर सिर फ़िरों की कमी नहीं। तुम्हारे बॉस को फ़ालतू की बात पर रिपोर्ट कर दी या सोशल मिडिया पर कुछ लिख दिया तो वर्षों की मेहनत पर पानी फिर जाएगा। याद है पैमेला के साथ क्या हुआ था! शहर से बाहर जाने पर जो तुम लोगों के प्रोटोकॉल हैं वे फॉलो करो और अपना बीपर ऑन रखना। जाओ, गुड लक!’ परेश ने उसके माथे को चूमते हुए कहा।
उसने रॉबर्ट, जिस एजेंट की ऑफ़िस में शाम तक की ड्यूटी थी, उसे बता दिया कि उसका बीपर ऑन रहेगा। अपनी हेड को भी बता दिया। इस देश में, इस व्यवसाय में, एजेंट्स की सुरक्षा के लिए कुछ नियम हैं। सब एजेंट्स को उन नियमों का पालन करना पड़ता है। महीने में चार दिन हर एजेंट को डेस्क पर बैठ कर काम करना पड़ता है। उस दिन वह बाहर नहीं जा सकता, घर नहीं दिखा सकता और शाम को उस समय तक रहना पड़ता है जब तक अंतिम एजेंट अपना काम समाप्त कर ऑफ़िस नहीं छोड़ता। हेड तो हर रोज़ सबसे बाद में जाता है। दूर -दराज़ ज़मीन या घर दिखाने वाले एजेंट का बीपर ऑन रहता है और ऑफ़िस में बैठा एजेंट उसे चैक करता रहता है। एजेंट मर्द हो या औरत सुरक्षा एक जैसी प्रदान की जाती है।
वह सुरक्षा का पूरा इंतज़ाम कर घर से बाहर निकली। कार में बैठी तो दोनों औंधे मुँह होकर सो रहे थे। बिलकुल अपने अंदर सिमटे हुए, कार की सीटों में धंसे हुए। वह कार ऑन कर चलाने लगी। वे नहीं उठे। ज्योंही उसने सबडिवीज़न पार किया वे उठ गए।
कुछ बोले नहीं, काफी उखड़े-उखड़े चुप थे। उसने भी ऐसा दिखाया कि उसने उस तरफ ध्यान नहीं दिया। उसने गाने लगाए और ड्राइव करने लगी। वह पानी की बोतलें घर से लाई थी, वे उन्हें दे दीं। पानी पीकर वे फिर अपने-अपने फ़ोन के साथ लग गए।
घर सच में दूर था। साऊथ के एक गाँव और शहर की सरहद के साथ। बहुत बड़ा। छह एकड़ ज़मीन पर। उसने कार को पार्क करने से पहले चारों ओर देखा। घर का बाहरी गेट सड़क से जुड़ा था, घर बहुत भीतर में जाकर था। उसने कार को सड़क पर ही पार्क कर दिया। रीटा और समीर कार के अंदर बैठे रहे इस उम्मीद के साथ कि वह बाहरी गेट खोलकर कार को ड्राइवे से अंदर ले जाकर पार्क करेगी। कार से उतर कर उसने बाहरी गेट का ताला खोलने के लिए जानबूझ कर गलत नंबर डाले, ताला खुला नहीं।
उसने एजेंट मोना को फ़ोन किया, जिसने इस घर को बेचने के लिए रखा था। वह उसे बुला लेना चाहती थी, अकेले इस घर को दिखाना नहीं चाहती थी। उसका ऑफ़िस कहीं आस-पास था, मौली को अंदाज़ा था। पता चला कि उसका ऑफ़िस सड़क पार था। उसने सड़क पार देखा तो वहाँ फोनविल मौरिसी रियल एस्टेट कंपनी का बोर्ड लगा था। उसने मोना को बाहर निकलते भी देख लिया। वह घर दिखाने आ रही थी।
उसे पता नहीं चला कब वे दोनों कार से बाहर आ गए। फ़ोन समाप्त कर जब उसने नज़र घुमाई तो वे उसे देख रहे थे, उसे नहीं बल्कि उसके नैकलेस को। दोनों के चेहरों पर जो भाव थे वह पकड़ नहीं पाई। उसने उन भावों को नज़रअंदाज़ करते हुए कहा-
‘ताला खुल नहीं रहा था तो मैंने एजेंट को बुला लिया, देखिए… वह आ रही हैं।’ उसने सड़क के पार इशारा करके दिखाया। मोना पैदल ही आ रही थी। ऐसा लगा उन्होंने उसकी बात सुनी ही नहीं।
समीर बड़े गौर से उसे देखते हुए बोला-‘मैडम, अपने घर क्या आप अपना डॉयमंड नैकलेस बदलने गई थीं।’
समीर का यह पूछना उसे असहज कर गया। यह एक युवा जोड़े का उत्साह नहीं, जो वह समझती रही, कुछ और था… समीर की आँखों में भी वह अजब से भाव देख रही थी।
‘मिस्टर भास्कर मैंने क्या पहना है, उस तरफ ध्यान न दें! इस समय आपको घर की ओर ध्यान देना चाहिए, जिसे आप खरीदना चाहते हैं।’ उसने अपने भावों को प्रकट न करते हुए शांति से कहा।
उसके इस उत्तर पर रीटा ने तंज कसा-‘मैडम, सारे रास्ते घर की ही बात कर रहे थे अपने परिवार के साथ। आपने सेट बदला, कपड़े भी बदल आतीं। हम तो इंतज़ार कर ही रहे थे।’
‘मिसेज़ भास्कर, आप लोगों से मेरा कांट्रेक्ट घर दिखाने और खरीदवाने का है। मेरी निजता उस कांट्रेक्ट में नहीं आती। मानती हूँ, एजेंट और क्लाईंट का एक रिश्ता बन जाता है। पर दोनों में एक अदृश्य रेखा भी होती है, जिसके आर-पार दोनों खड़े रहते हैं; जिसे पार करने का अधिकार मैं किसी क्लाईंट को नहीं देती। मैं क्या पहनती हूँ, कितनी बार कपड़े बदलती हूँ, इस पर टिप्पणी या तंज़ की इजाज़त नहीं दूँगी ।’
दोनों के चेहरे मुरझा गए और कई तरह के भाव आने-जाने लगे…. पर नज़र उनकी उसके नैकलेस पर ही रही।
‘मिस्टर भास्कर और मिसेज़ भास्कर शहर से बाहर रिमोट एरिया में आ रही थी, सुरक्षा नियमों का पालन करने में पांच मिनट तो लगते, चाहे ऑफ़िस रूकती या घर।’ यह सुनकर दोनों ने एक दूसरे की आँखों में देखा, जैसे आपस में कुछ कह रहे हों।
इतना बताने के बाद भी दोनों में से किसी ने माफ़ी नहीं मांगी।
मोना आ गई। एक दूसरे को अभिवादन कर उसने उन दोनों को मोना से मिलवाया।
‘मोना आप इन्हें घर दिखाएँ, मुझे शाम को एक घर की क्लोज़िंग करनी है, उसके लिए कुछ फ़ोन कॉल करने हैं, कार में बैठकर कर लेती हूँ।’ उसने उन दोनों की ओर देखते हुए कहा-‘मैं यहीं कार में बैठी हूँ।’ दोनों ने उसे खा जाने वाली नज़रों से देखा।
‘क्यों ?’ वह नहीं समझ पाई।
‘माय प्लेज़र’ कह कर मोना उन्हें गेट से भीतर ले गई।
कार में बैठते ही उसने परेश को फ़ोन पर सब कुछ बताया और साथ ही कहा, अब
सोशल मिडिया पर लिखें या रिपोर्ट करें, वह सँभाल लेगी, पर निजता की सीमा किसी को भी पार नहीं करने देगी।
परेश ने हँसते हुए कहा -‘दैट्स माय गर्ल।’
दस मिनट भी नहीं बीते, वे बाहर आ गए। वह भी कार से निकली। मोना और उसे देख कर समीर ने कहा-‘ परिवार से सलाह करके आपसे कॉन्टेक्ट करते हैं।’
‘चलिए, आपको ऑफ़िस तक ले चलूँ।’ उसने उन दोनों को मुख़ातिब होकर कहा।
‘नहीं मैडम, हम इस सड़क के कॉर्नर पर मैकडोनल्ड तक पैदल ही चले जाएँगे। हमारी गाड़ी हमें ले जाएगी, वह इसी एरिया में है।’ कह कर वे तेज़ी से चलने लगे, ढंग से अभिवादन भी नहीं किया।
‘मौली, यह स्ट्रेंज कपल कहाँ से पकड़ा? इस घर को देखने में लोगों को एक घंटे से अधिक समय लगता है। हैरानी है इतनी दूर से तुम्हें लेकर आए हैं और वाइफ़ अनमने मन से घर देखती रही और पति किसी को मैसेज भेजता रहा। दस मिनट में बाहर भी आ गए।
अगर इच्छा नहीं थी तो इतनी दूर से तुम्हें लेकर क्यों आए?’ मोना ने रुष्ट होते हुए कहा।
‘मोना हर तरह के लोग होते हैं। चल मिलते हैं फिर कहीं।’ कह कर वह कार में बैठ गई और कार स्टार्ट कर दी। उसने यही समझा, वे उससे उखड़ गए हैं।
वह अभी कार में ही थी कि मोना का गुस्से में फ़ोन आया था-‘मौली, जाने से पहले हाथ मिलाते समय तुम्हारे क्लाईंट मेरी डायमंड की अँगूठियाँ उतार ले गए हैं। मुझे पता भी नहीं चला। मैं पुलिस को रिपोर्ट कर रही हूँ , उनकी जानकारी मेल करो।’
परेश फ़ोन समाप्त कर लौटे। ऐसा लगा यादों के द्वार पर किसी ने खटखटाया। उसका ध्यान टूटा। हीरे का नैकलेस अभी तक उसके हाथों में था।
‘अरे इसे अभी तक लेकर बैठी हो…. तुम्हारी सतर्कता से तुम्हारे ये हीरे बच गए। समीर और रीटा तुम्हारे हीरों के पीछे थे। पुलिस का फ़ोन था। जो भी जानकारियाँ उन्होंने फॉर्म में भरी थीं, सब झूठी थीं।’
‘इतना बड़ा धोखा…’ मौली अपने हाथ में पकड़े एक हीरे वाले नेकलेस को गौर से देखने लगी।
‘पुलिस की सोच है, किसी क्लाइंट ने तुम्हारे असली हीरों और नगों को पहचान लिया था और उसी का रचाया यह खेल है। कब हीरे पहनती हो और कब दूसरे आभूषण, उसने तुम्हारा पैटर्न भी पकड़ लिया था। तभी जिस दिन तुमने हीरे पहने थे, उसी दिन रीटा और समीर सब कुछ फाइनल करना चाहते थे। मोना से हाथ मिलाते समय उन्होंने उसकी अँगूठियाँ उतार लीं। तुमसे हाथ मिलाते या गले मिलते हुए तुम्हारा भी सब कुछ उतार लिया जाता अगर तुमने अपना हीरे वाला नैकलेस बदला न होता।’
यह सब सुनकर मौली चिंतित खामोश बैठी रही। कुछ बोली नहीं।
‘मौली चिंता की कोई बात नहीं। तुमने तो उनके स्कैच भी बनवा दिए। पुलिस के पास हैं वे स्कैच।’ परेश ने मौली के उदास चेहरे की ओर देखते हुए कहा।
‘परेश मैं सोच रही हूँ कि गहनों को लॉकर में रखने की बजाय क्यों न इनका सदुपयोग करें।’ मौली ने उदास स्वर में कहा।
‘लॉकर में क्यों रखने? अब तुम इन्हें पहनों। बड़े शौक से बनवाए हैं। पुलिस उन दोनों को ढूँढ़ निकालेगी।’ परेश ने मौली के कंधे पर हाथ रख कर सांत्वना दी।
‘फिर किसी और क्लाइंट या किसी कुलीग के मन में खोट आ गई तो ? असुरक्षा के इस दौर में जहाँ मैटीरियल थिंग्स और पैसे के लिए लोग कुछ भी कर सकते हैं, मन ज़ेवरों से उचाट हो गया है।’
‘दिस इज़ नॉट माय मौली। एक झटके से बिखर गई।’ परेश ने मौली की ओर ग़ौर से देखते हुए कहा।
‘परेश मैं बिखरी नहीं, एक नई सोच और दिशा के साथ उभर कर आई हूँ। सारी उम्र इंसान धन, सामान और ज़ेवर इकट्ठे करता रहता है और आँख बंद होते ही वह सब महत्त्वहीन हो जाते हैं। शायद उम्र का तकाज़ा होता है, मैंने भी यही किया। शौक से बनवाए गहनों को दिल से पहना। खूब ख़ुशी हासिल की। अब सोच रही हूँ, जीते जी इनका महत्त्व बढ़ा लूँ। मरने के बाद इन्हें कौन पूछेगा ?’ मौली ने बहुत शांति से कहा। ऐसा कहते हुए उसके चहरे पर चिंता नहीं उत्साह नज़र आने लगा।
‘मौली, तुम क्या कह रही हो? मैं समझ नहीं पा रहा। स्पष्ट कहो।’ परेश ने उसकी ओर देखते हुए कहा।
‘परेश मेरे ये गहने बेशकीमती हैं। मैंने इनका एंज्यॉय भी बहुत किया है। क्यों न इन्हें बेचकर उस धन से उन बच्चों को शिक्षा दिलवाएँ जो प्रतिभाशाली हैं पर धन की कमी से आगे पढ़ नहीं सकते। चाहती हूँ, जब भी मेरी ऑंखें बंद हों, मेरे भीतर शांति हो, सकून हो, कि मैं अपने लिए ही नहीं दूसरों के लिए भी जी हूँ। कुछ फूलों को खिलने में मदद की है।’ कह कर मौली परेश की आँखों में देखने लगी।
परेश ने मौली के चेहरे पर उतर आए नूर और आँखों की चमक को देखते हुए उसका हाथ अपने हाथ में ले लिया और उस हाथ को चूम कर अपने साथ की स्वीकृति दे दी।
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सुधा ओम ढींगरा
उपन्यास:नक़्क़ाशीदर केबिनेट। कहानी संग्रह: खिड़कियों से झाँकती ऑंखें, प्रतिनिधि कहानियाँ, सच कुछ और था, दस प्रतिनिधि कहानियाँ, कमरा नंबर 103, कौन सी ज़मीन अपनी, वसूली। कविता संग्रह: सरकती परछाइयाँ, धूप से रूठी चाँदनी, तलाश पहचान की, सफ़र यादों का। निबंध संग्रह: विचार और समय , साक्षात्कारों के आईने में।
संपादन: वैश्विक प्रेम कहानियाँ,अम्लघात, बारह चर्चित कहानियाँ , विमर्श: अकाल में उत्सव (आलोचनात्मक पुस्तक ) वैश्विक रचनाकार: कुछ मूलभूत जिज्ञासाएँ भाग-1 एवं 2( साक्षात्कार संग्रह ) , इतर ( प्रवासी महिला कथाकारों की कहानियाँ), सार्थक व्यंग्य का यात्री: प्रेम जनमेजय, , मेरा दावा है (अमेरिकी शब्द-शिल्पियों का काव्य संकलन का संपादन ), संपादन सहयोग: गवेषणा , प्रवासी साहित्य: जोहान्सवर्ग।
अनुवाद: परिक्रमा (पंजाबी से अनुदित हिन्दी उपन्यास), कौन सी ज़मीन अपनी का ‘कुनखन आपून भूमि’ (असामी में ) ‘टॉरनेडो’ और ‘ओह कोई होर सी’ (पंजाबी में) कई कहानियाँ अंग्रेज़ी में अनुदित, 65 संग्रहों में कविताएँ, कहानियाँ और आलेख प्रकाशित, माँ ने कहा था (काव्य सी.डी.)। आलोचना ग्रंथ:अनुसन्धान( प्रवासी कथाकार सुधा ओम ढींगरा पर केंद्रित ) संपादक-शगुफ़्ता नियाज़ विमर्श दृष्टि- सुधा ओम ढींगरा का साहित्य-पंकज सुबीर, विमर्श- नक़्क़ाशीदार केबिनेट- पंकज सुबीर, शोध दृष्टि- सुधा ओम ढींगरा का साहित्य – बलबीर सिंह, प्रकाश चंद्र बैरवा, सुधा ओम ढींगरा: रचनात्मकता की दिशाएँ-वंदना गुप्ता। शोध पुस्तकें:डॉ. सुधा ओम ढींगरा की कहानियों में अभिव्यक्त तथा निहित समस्याएँ- लेखिका निधिराज भडाना एवं रेशू पाण्डेय, सुधा ओम ढींगरा की कहानियों में प्रवासी जीवन-शहनाज़,प्रवासी भारतीय की समस्याएँ एवं संवेदनाएँ ( सुधा ओम ढींगरा की कहानियों के विशेष सन्दर्भ में )-प्रसीता पी।
नार्थ कैरोलाइना के यूएनसी चैपल हिल और एनसी स्टेट विश्वविद्यालयों में कविताएँ और कहानियाँ पढ़ाई जाती हैं। भारत के तकरीबन 1000 पत्र-पत्रिकाओं में कहानियाँ, कविताएँ और आलेख प्रकाशित। सम्प्रति: विभोम-स्वर की प्रमुख संपादक और ढींगरा
फ़ाउण्डेशन की उपाध्यक्ष एवं सचिव हैं।
सम्मान:केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा द्वारा 2014 का पद्मभूषण डॉ. मोटूरि सत्यनारायण पुरस्कार राष्ट्रपति महोदय के हाथों प्राप्त। उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ द्वारा 2013 का ‘हिन्दी विदेश प्रसार सम्मान’, स्‍पंदन संस्‍था, भोपाल की ओर से 2013 का स्‍पंदन प्रवासी कथा सम्‍मान,’कौन सी ज़मीन अपनी’ कहानी संग्रह को पन्द्रहवाँ अम्बिका प्रसाद दिव्य पुरस्कार, अमेरिका में हिन्दी के प्रचार -प्रसार एवं सामाजिक कार्यों के लिए वाशिंगटन डी.सी. में तत्कालीन राजदूत श्री नरेश चंदर द्वारा सम्मानित, हिन्दी विकास मंडल, नार्थ-कैरोलाईना( अमेरिका), हिंदू-सोसईटी,नार्थ कैरोलाईना( अमेरिका), एवं अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति (अमेरिका) द्वारा हिन्दी के प्रचार-प्रसार एवं सामाजिक कार्यों के लिए कई बार सम्मानित।
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