कविता धरोहरः हरिवंशराय बच्चन


एकांत संगीत
तट पर है तरुवर एकाकी,
नौका है, सागर में,
अंतरिक्ष में खग एकाकी,
तारा है, अंबर में,

भू पर वन, वारिधि पर बेड़े,
नभ में उडु खग मेला,
नर नारी से भरे जगत में
कवि का हृदय अकेला!


नभ में दूर-दूर तारे भी!

देते साथ-साथ दिखलाई,
विश्व समझता स्नेह-सगाई;
एकाकी पन का अनुभव
पर, करते हैं ये बेचारे भी!
नभ में दूर-दूर तारे भी

उर-ज्वाला को ज्योति बनाते,
निशि-पंथी को राह बताते,
जग की आँख बचा पी लेते
ये आँसू खारे भी!
नभ में दूर-दूर तारे भी

अंधकार से मैं घिर जाता,
रोना ही रोना बस भाता
ध्यान मुझे जब जब यह आता-
दूर हृदय से कितने मेरे,

मेरे जो सबसे प्यारे भी
नभ में दूर-दूर तारे भी


जा रही है यह लहर भी!

चार दिन उर से लगाया,
साथ में रोई, रुलाया,
पर बदलती जा रही है
आज तो इसकी नजर भी!
जा रही है यह लहर भी!

हाय! वह लहरी न आती,
जो सुधा का घूँट लाती,
जो न आकर लौटती फिर
कर मुझे देती अमर भी!
जा रही है यह लहर भी!

वो गई तृष्णा जगाकर,
वह गई पागल बनाकर,
आँसुओं से यह भिगाकर,
क्यों लहर आती नहीं है
जो पिला जाती जहर भी!
जा रही है यह लहर भी!


खिड़की से झाँक रहे तारे!

जलता है कोई दीप नहीं,
कोई भी आज समीप नहीं,
लेटा हूँ कमरे के अंदर
बिस्तर पर अपना मन मारे!
खिड़की से झाँक रहे तारे!

सुख का ताना, दुख का बाना,
सुधियों ने है बुनना ठाना,
लो, कफ़न ओढाता आता है
कोई मेरे तन पर सारे!
खिड़की से झाँक रहे तारे!

अपने पर मैं ही रोता हूँ,
मैं अपनी चिता संजोता हूँ,
जल जाऊँगा अपने कर से
रख अपने ऊपर अंगारे!
खिड़की से झाँक रहे तारे!

जा कहाँ रहा है विहग भाग?

कोमल नीड़ों का सुख न मिला,
स्नेहालु दृगों का रुख न मिला,
मुँह-भर बोले, वह मुख न मिला,
क्या इसीलिये, वन से विराग?
जा कहाँ रहा है विहग भाग?

यह सीमाओं से हीन गगन,
यह शरणस्थल से दीन गगन,
परिणाम समझकर भी तूने क्या
आज दिया है विपिन त्याग?
जा कहाँ रहा है विहग भाग?

दोनों में है क्या उचित काम?-
मैं भी लूँ तेरा संग थाम,
या तू मुझसे मिलकर गाए
जीवन-अभाव का करुण राग!
जा कहाँ रहा है विहग भाग?

फिर वर्ष नूतन आ गया!

सूने तमोमय पंथ पर,
अभ्यस्त मैं अब तक विचर,
नव वर्ष में मैं खोज करने को
चलूँ क्यों पथ नया।
फिर वर्ष नूतन आ गया!

निश्चित अँधेरा तो हुआ,
सुख कम नहीं मुझको हुआ,
दुविधा मिटी, यह भी नियति की
है नहीं कुछ कम दया।
फिर वर्ष नूतन आ गया!

दो-चार किरणें प्यार कीं,
मिलती रहें संसार की,
जिनके उजाले में लिखूँ
मैं जिंदगी का मर्सिया।
फिर वर्ष नूतन आ गया!
– हरिवंश राय बच्चन

(२७ नवंबर १९०७ – १८ जनवरी २००३)