कविता धरोहरः सर्वेश्वर दयाल सक्सेना


बहुत दिनों से सोच रहा था
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बहुत दिनों से सोच रहा था
थोड़ी धरती पाऊँ।
उस धरती में बाग-बगीचा
जो हो सके लगाऊँ।

खिले फूल-फल, चिड़ियाँ बोले
प्यारी खुशबू डोले ।
ताज़ी हवा जलाशय में
अपना हर अंग भिगो ले।

लेकिन एक इंच धरती भी
कहीं नहीं मिल पाई।
एक पेड़ भी नहीं, कहे जो
मुझको अपना भाई

हो सकता है पास तुम्हारे
अपनी कुछ धरती हो,
फूल-फलों से लदे बगीचे
और अपनी धरती हो।

हो सकता है कहीं शांत
चौपाए घूम रहे हों।
हो सकता है कहीं सहन में
पक्षी झूम रहें हो।

तो विनती है यही
कभी मत उस दुनिया को खोना,
पेड़ों को मत कटने देना
मत चिड़ियों को रोना।

एक-एक पत्ती पर हम सब
के सपने सोते हैं।
शाखें कटने पर वे भोले
शिशुओं-सा रोते हैं।

पेड़ो के संग बढ़ना सीखो
पेड़ों के संग खिलना,
पेड़ों के संग-संग इतराना
पेड़ों के संग हिलना।

बच्चे और पेड़ धरती को
हरा-भरा रखते हैं।
नहीं समझते जो, दुष्कर्मों
का वे फल चखते हैं।

आज सभ्यता वहशी बन
पेड़ों को काट रही है,
ज़हर फेपड़ो में भरकर
हम सबको बाँट रही है।

अँतर्व्यथा
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अक्सर एक गन्ध
मेरे पास से गुज़र जाती है,
अक्सर एक नदी
मेरे सामने भर जाती है,
अक्सर एक नाव
आकर तट से टकराती है,
अक्सर एक लीक
दूर पार से बुलाती है ।
मैं जहाँ होता हूँ
वहीं पर बैठ जाता हूँ,
अक्सर एक प्रतिमा
धूल में बन जाती है ।

अक्सर चाँद जेब में
पड़ा हुआ मिलता है,
सूरज को गिलहरी
पेड़ पर बैठी खाती है,
अक्सर दुनिया
मटर का दाना हो जाती है,
एक हथेली पर
पूरी बस जाती है ।
मैं जहाँ होता हूँ
वहाँ से उठ जाता हूँ,
अक्सर रात चींटी-सी
रेंगती हुई आती है ।

अक्सर एक हँसी
ठंडी हवा-सी चलती है,
अक्सर एक दृष्टि
कनटोप-सा लगाती है,
अक्सर एक बात
पर्वत-सी खड़ी होती है,
अक्सर एक ख़ामोशी
मुझे कपड़े पहनाती है ।
मैं जहाँ होता हूँ
वहाँ से चल पड़ता हूँ,
अक्सर एक व्यथा
यात्रा बन जाती है ।


यह सिमटती साँझ
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यह सिमटती साँझ,
यह वीरान जंगल का सिरा,
यह बिखरती रात, यह चारों तरफ सहमी धरा;
उस पहाड़ी पर पहुँचकर रोशनी पथरा गयी,
आख़िरी आवाज़ पंखों की किसी के आ गयी,
रुक गयी अब तो अचानक लहर की अँगड़ाइयाँ,
ताल के खामोश जल पर सो गई परछाइयाँ।
दूर पेड़ों की कतारें एक ही में मिल गयीं,
एक धब्बा रह गया, जैसे ज़मीनें हिल गयीं,
आसमाँ तक टूटकर जैसे धरा पर गिर गया,
बस धुँए के बादलों से सामने पथ घिर गया,
यह अँधेरे की पिटारी, रास्ता यह साँप-सा,
खोलनेवाला अनाड़ी मन रहा है काँप-सा।
लड़खड़ाने लग गया मैं, डगमगाने लग गया,
देहरी का दीप तेरा याद आने लग गया;
थाम ले कोई किरन की बाँह मुझको थाम ले,
नाम ले कोई कहीं से रोशनी का नाम ले,
कोई कह दे, “दूर देखो टिमटिमाया दीप एक,
ओ अँधेरे के मुसाफिर उसके आगे घुटने टेक!”

सर्वेश्वर दयाल सक्सेना
(15 सितम्बर 1927-24 सितम्बर1983)