कविता आज और अभीः सितंबर-अक्तूबर 2020

यह साहिल और समंदर
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यह साहिल और समंदर
लहरों के नीचे बिखरा ठहरा
परछांइयों का एक झूठा
पर मोहक मंजर।

सूरज की किरनें गिरतीं
गिनगिन के इन पर पड़तीं
लहराती मटमैले कणों को भी
निज आभा से स्वर्णिम करतीं।

कुछ तेरे अहम् कुछ मेरे अहम्
कुछ तेरे वहम कुछ मेरे वहम
गढ़ते रहते नित कितने फरेब
जर्जर दीवारों पर भी छाते छप्पर।

डूबेंगे अब एक साथ ये
यूँ ही किनारों पर खड़े खड़े
या फिर मझधारों के बीच अड़े
सपनों के रंग-बिरंगे जो विभ्रम।

शैल अग्रवाल

”किसकी धरती?”
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आँसुओं और चीखों के बीच
धरती खून में रंगी है
और अपने बच्चों से कहती है
‘मेरा वक्ष छोड़कर भागो यहाँ से
कहीं जाकर अपनी जान बचाओ’
और पल भर में
वह बच्चे अनाथ हो जाते हैं
उनके नीड़ छिन जाते हैं
परिवार मिट जाते हैं
आपत्तिकाल की भगदड़ में
न जाने कितने सुहाग लुट गये
समुद्र को भी रहम नहीं आया
न जाने कितनो को निगल गया
और कितने ही बच्चे अनाथ हो गये
बचे हुये कहाँ जायें?
कौन इन्हें अपनाये?
तुर्की, लेबानन, ईराक
जोर्डन, फारस, अफ्रीका
बुल्गारिया या अमेरिका
कौन इन्हें आसरा देना चाहता है?
किस्मत ने इन्हें भिखारी बना दिया
सहारा माँगते यह मजबूर शरणार्थी
इन सभी देशों पर आश्रित अवांक्षित बोझ हैं
भिखारियों से पसंद नहीं पूछी जाती
विवश होकर इन देशों में धूल फांकते
आश्रय ढूँढते, भूख से बिलखते
सर्दी-गर्मी के थपेड़े सहते
किस्मत की ठोकरें खाते
हर किसी की तरफ ताक रहे हैं
अनाथ बच्चों के मुरझाये चेहरों में
दर्द और भय के साये मंडराते हैं
पर उनकी खामोश आँखों में
उम्मीद के चिराग जलते हैं
‘’कोई देखे मेरी तरफ
और मेरी किस्मत बदल दे’’
पता नहीं कब, कहाँ और किस दिन
कितने और तूफ़ान आने वाले हैं
कब किसका नीड़ उजड़ने वाला है
कब किसकी धरती छिनने वाली है
आने वाले किसी कल का हमें पता नहीं
विधाता ने इन्हें शतरंज के मोहरे बना दिया
कहीं से उठाकर कहीं और रख दिया
जब तक है शरीर में साँस
तब तक धरती पर आवास
फिर भी बंट गयी देशों में धरती
जिसका रहता सबको आभास
इंसानी जंग और नफरत की आग
कितने लोगों का जीवन उजाड़ देती है
जीवन के शांत समुन्दर को मथकर
उसकी लहरों का सीना फाड़ देती है
कहाँ किसका दुर्भाग्य इन्तजार कर रहा है
अगले किसी भी पल का हमें पता नहीं l
-शन्नो अग्रवाल

तेरा आँचल
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इक दिन मेरे सीने से
लिपट रो दिया तेरा आँचल
अगली पिछली दास्तान सब
सुना गया तेरा आँचल।
किन बेदर्द हाथों ने उसे
मसला है पूरी ज़िन्दगी
शिकनों से अपने दर्द को
दिखला गया तेरा आँचल।
रोया कितना सिसक-सिसक
लिपट सीने से तेरे
रोता हुआ उसका मुकद्दर
कह गया तेरा आँचल।
बेबसी का वो मेरी
मज़ाक सा उड़ा गया
तेरी उंगली में लिपटा
इशारों से सब कुछ
कह गया तेरा आँचल।
मुकद्दर खराब है मेरा
या फिर उसकी ये फब्तियाँ
जाते-जाते मुझपर फिर
कस गया तेरा आँचल।
दिल चाहा लिपट कर रो दें,
और कह दूँ सब मजबूरियाँ
मेरे ही होठों में दुबककर मुझे
फिर से छू गया तेरा आँचल।
– शबनम शर्मा
अनमोल कुंज, पुलिस चैकी के पीछे, मेन बाजार, माजरा,
तह. पांवटा साहिब, जिला सिरमौर, हि.प्र. – १७३०२१
मोब. – ०९८१६८३८९०९, ०९६३८५६९२३

कशमकश
जिन्दगी एक कशमकश सी लगती हैं
सबकुछ होकें भी एक कमी सी लगती हैं
पा के खोना खो के पाना यह तो एक रीत पुरानी है
इस जीवन में अपनी सासें अब बोझिल सी लगती हैं
एक सुनहरा सपना देखा उसमे था हर अब्र भरा
न जाने क्युँ घर की दीवारें अब बदरंग सी लगती है
तेरे मेरे उसके सपने शायद यही बिखर पड़े हैं
समेटना जब चाहा उनको वक्त की कमी सी लगती हैं
कुमारी इन्दु जोषी ’’ रितु ’’

फिर भी हम जगतगुरू
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आज जनतंत्र-धनतंत्र हो गया ,
सुजनतंत्र- स्वजनतंत्र हो गया।
लोकतंत्र-थोकतंत्र बन गया ,
रामराज्य अब दामराज्य हो गया।
यह प्रजातंत्र ,
चन्द लोगों के लिए मजातंत्र है ,
बाकी लोगों के लिए सजातंत्र।
सस्ती के साथ मस्ती चली गयी,
और लाइफ को फाइल खा गई।
मूल्यवृध्दि, शुल्कवृध्दि, करवृध्दि से
कष्टवृध्दि हो रहा है ।
अफसर अजगर के प्रतिरूप हो गए,
एक बार फुफकारकर,
सीधे निगल जाते हैं।
हड़ताल अब हर ताल हो गया ,
न जाने कब ताण्डव शुरू हो जाय।
भरपेट भोजन प्लेटभर हो गया,
गोरस का स्थान कोरस ने ले लिया।

प्रेम सट्टा बाजार का सौदा हो गया,
विद्युत स्विच की भाँति,
जब चाहो ऑन करो,
जब चाहो ऑफ
वह चरमकोटि से चर्मकोटि पर आ गया।

यहाँ भाषण की अधिकता है,
राशन की न्यूनता।
महादेव क्षीरसागर में गोते लगा रहे हैं,
कुपोषित बच्चे यमराज को गले लगा रहे हैं।
क्षुधामृत्यु-वृथामृत्यु हो गई।
फिर भी,
हम जगतगुरू हैं,
महान हैं,प्रगति पर हैं।

किसमत्ती चौरसिया ‘स्नेहा’
पीएचडी, हिन्दी विभाग,
इलाहाबाद विश्वविद्यालय, प्रयागराज।

ग्राम – कनेरी , पोस्ट- फूलपुर, जिला-आजमगढ़, उत्तर प्रदेश।

अस्सी का लॉक डाउन
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अस्सी का दशक
उम्र थी चौदह पंद्रह बरस
घर में जोर से बोलना
या गाना , गाना था मना
डर था बाबा का
उन तक आवाज न पहुंचे
ये लाक डाउन था साहब
अस्सी के दशक का ।।
जोर से रोना ????
तो बस कयामत ही समझो
डाटने या मारने वाले की ।।।
ये लाक डाउन था साहब
अस्सी के दशक का ।।
बाहर निकलना तो पैर तुडवाने जैसा
पर बचा ली जाती दादी के कारण
क्योंकि सारा इल्ज़ाम वो अपने सर लेतीं
कहतीं — नीमक मगवाऐ क रहल
हमही भेजली रहलीं ।।।
ये लाक डाउन था साहब
अस्सी के दशक का ।।
पढाई के समय
माँ के साथ ही बस से
विद्यालय जाती – आती
रास्ते में चाट और गोलगप्पे देख
मुँह में पानी आ जाता
पर कहें कैसे ??
आगे की पढाई घर पर
ये बडा सवाल था
क्योंकि हिम्मत नहीं होती
ये भी लाक डाउन था साहब
अस्सी के दशक का ।।
बाजार से सब्जी लेने दादी के साथ जाती
सामान जो लाना होता ।।।
हाट और मेला पिता जी ले जाते
गुब्बारे, तीर धनुष तो मिल जाता
पर कंगन और चूडिय़ों पर मन अटक जाता
नहीं ये नहीं लेना है मंहगा है
क्या करता मन रोकर रह जाता
ये लाक डाउन था साहब
अस्सी के दशक का ।।
घर से निकलना था मना
अकेले तो बिलकुल नहीं
कभी पिक्चर देखने जाना होता
तो घर में पूछे कौन ??
तब बडे को भेजा जाता
बडे सहमें सहमे जाते
हम सब दीवार के पीछे वार्ता सुनते
पिता जी पूछते – कहां जाएके हौ ?
कौन सिनेमाघर ज इबा ??
के के जाई ????
कहीं दूर जाना होता तो
कभी इजाजत नहीं मिलती
रियायती दर पर भी नहीं
नहीं तो नहीं बस नहीं
सिनेमा आ कर चला जाता
हम अफसोस कर के रह जाते
कभी कभी मन आहत होता
तो रो भी लेते
ये लाक डाउन था साहब
अस्सी के दशक का ।।
और तो और पहनावा भी
हर तरह का नहीं पहन सकते
बस सलवार कमीज
दूसरे पहनावों पर मनमसोस कर जाते
करते भी क्या ???
बगाबत ?????
सोचा भी तो
सिर धड से अलग समझिए साहब
लाक डाउन था साहब
अस्सी के दशक का ।।
पर दिन थे अच्छे
बडे सुनहरे बडे अच्छे ।।।।

डॉ संगीता श्रीवास्तव ‘सहर’
वाराणसी, यू पी,.भारत

आदिवासी के मन की बात

जंगल सी ज़िन्दगी
ऊबड़- खाबड़ और झुर्रीदार
पर
सामाजिक – मानसिक प्रदूषण से मुक्त
स्नेह – सद्भाव की हरियाली से युक्त

जल, जंगल और जमीन
प्राकृतिक जीवन हसीन
शाखाश्रयी मड़ई में मुस्कुराते हुए प्राण
दूब की नोक पर चमचमाती
तुहिन कण के समान

काला अक्षर भैंस बराबर
पर ,
काली भैंस के सफेद भावों को समझ
हम समझाते हैं शिक्षित जंगल को
मानवता का पाठ।

हमारी बस्ती में खंभे हैं, खंभों में तार नहीं
सुना है विश्व में कोरोना है,
हम तक समाचार नहीं।

साहब! हम भी मतदाता हैं, नाम है आदिवासी
तिरछी नजर से देख लो , हम भी हैं भारतवासी

सुनील चौरसिया ‘सावन’
ग्राम- अमवा बाजार , पोस्ट- रामकोला, जिला- कुशीनगर, उत्तर प्रदेश
90 44 9740 84,
84 14015 182

जांगर
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विपत्तियों के दौर में
उजाले भी चुपके से
पंहुच जाते हैं
अंधेरों के पाले में
छोड़ देते हैं साथ सब
न साथ रहता हाथ अपना
आपदा की आंधियां भी हौले -हौले
ले बवन्डर साथ – साथ
गह बहियाँ बाधाओं संग
झंझावात के आगोश में
जलजले ओ जलालत भी
लगाते हैं झरी मुसीबतों की
ढाते हैं कहर लेकिन
न होता है बाल बांका
आसमां को छूती लहरें
न डुबो पाती हैं जीवट को
विपत्तियों के प्रबल लहरें
क्या डुबोयेंगी उस किस्ती को
जिस किस्ती की पतवारें
मजबूती से गिरफ्त हैं
सबल बाजुओं के पंजों में
जब जांगर की जंग दृष्टि
थाम कर वल्गा
अपनी मजबूत बाहों में
मोड़ कर तुरंग तूफां
बांधकर सेहरा कफन का
संजोकर अदम्य साहस
करता है किलोल
क्रोड़ में प्रलय की
विन्ध्य सा अचल गिरि को
न डिगा पाता पवन कोई
न हिला पाती है शैलावें
हो गहरी जड़ें जिसकी
जिसका अन्त ही अडिग हो
क्या करेगी नदी कोई
जो सूरज को जगाता हो
सुलाता हो रातों को
दिवा के सपने सजाता हो
न आंखें जिसकी कभी सोई
बिछेंगे फूल राहों में
न रोक सकेगा कदम कोई
मेट कर भाल कुअंक
विधि विधान अभिलेख के
वही लिखेगा धवल अंक
अमिट श्रम जल की बूंदों से
जांगर दृष्टि हो मंजिल पर
हर कदम मंजिल होगा
मंजिल ही हम सफर होगी

— सुभाष चौरसिया ‘बाबू’
महोबा, उत्तर प्रदेश

ऐसे ही जन्म लेते रहे हैं मेरे अंदर असंख्य ईश्वर
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थककर अपने हाथ से सहलाता हूँ अपना सिर
तो मेरे हाथ माँ के हाथ बन जाते हैं
उंगलियाँ चटकाते हुए पैरों की
हाथ में छोटी बहन की मासूमियत गुँथ जाती
खूब उदास होकर लग जाता हूँ दरवाजे के गले
तो दरवाजे में पिता की छाती आ चिपकती है
किसी बीहड़ में खो गया अगर
तो पूरब की ओर मुँह कर खड़ा हो जाता हूँ
सूरज में बाबा की तस्वीर चमक जाती है
छंट जाता धुँधलका
देखता हूँ अगर कोई फूल सुंदर
तो आँख में खिल आती है वह भूरी आँखों वाली लड़की
जो हँसती थी तो वसंत आता था
हाथ मिलाता हूँ किसी अजनबी से
तो पास खड़े वे दोस्त मुसकुराते हैं
जिनका पता-ठिकाना अब नहीं रहा मेरे पास
ऐसे ही पार किया है जीवन का एक लंबा रास्ता
सहस्त्र हाथों और पैरों के साथ
ऐसे ही जन्म लेते रहे हैं मेरे अंदर असंख्य ईश्वर
हर बार मुझे एक गहरी नदी में डूबने से बचाते ।
विमलेश त्रिपाठी

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