कविता आज और अभीः रौशनी की सियाही में डूबकर


सूरज को करना था राजी

तारामंडल. नभ में हँसता
गलियों में थी, आतिशबाजी
अँधियारे से, लड़ना सीखा, सूरज को करना था राजी।

नेकनीयती अच्छी लगती
कीमत भारी, पड़ती वैसे
सादा जीवन, प्यारा जिसमें
सूखी रोटी लड़ती घी से
गुत्थमगुत्था, रोटी जीती, लच्छा-रबड़ी, निकली पाजी।

न्याय वही जो तेरे मन में?
स्नेह सभी कुछ देना चाहे
हृदय तराजू तोल न पाए
धड़कन कोई सुनता काहे
न्याय, प्रेम में युद्ध हुआ तो, झगड़े में क्या करता काजी।

माधव की थी, बड़ी समस्या
माखन की जब, बहती धारा
छप्पन भोगो, के सुवास में
दिल की वाणी, ने ललकारा
मेवे में क्या रक्खा? मनवा, साग विदुर घर, खा कर राजी।

खुली हवा में, पंछी उड़ता
बीज खुशी के, फैला देता
अपराधी मन, कैद हमेशा
भले जेल से, बाहर होता
खुली हवा में मौज रहेगी बयार बहती, ताजी ताजी।

-हरिहर झा, मैलबौर्न, आस्ट्रेलिया

मैं अभी शेष हूँ

मेरी कोई एक मूर्ति नहीं है,
कोई बड़ा नाम नहीं,
जिसे देख कर मैं अपने भीतर की थकान उतार देती हूँ।
मेरी प्रेरणा बहुत साधारण है—
पर उसी साधारणता में मेरी पूरी ताक़त छुपी है।
मेरी प्रेरणा है—खुद को थामे रखने की कला।

यह कला मैंने किताबों से नहीं सीखी।
यह मुझे उन दिनों ने सिखाई,
जब सब कुछ ठीक दिखता था
किंतु भीतर बहुत कुछ बिखरा हुआ होता था।

बरसात में खिड़की के पास बैठकर,
चाय के कप में उठती भाप को देखते हुए
मैंने पहली बार समझा था—
कि जीवन में हर उबाल,
ज़रूरी नहीं कि टूटने के लिए हो,
कुछ उबाल हमें थोड़ा और टिकाऊ बना देते हैं।

मेरी प्रेरणा कोई दूर खड़ा आदर्श नहीं,
बल्कि वही स्त्री है
जो रोज़ अपने डर के साथ रसोई में उतरती है,
काम पर जाती है,
बच्चों की कॉपियों में भविष्य खोजती है
और फिर भी रात को
अपने मन से यह सवाल करती है—
“आज मैं अपने लिए क्या बचा पाई?”

बहुत बार लगा
कि मजबूत होना ही शायद
मेरी सबसे बड़ी पहचान बन गई है।
पर समय ने यह भी सिखाया
कि हर समय मजबूत बने रहना,
अपने भीतर की कोमलता से
बेईमानी करना है।
मेरी प्रेरणा वही क्षण हैं
जब मैं स्वीकार कर पाती हूँ कि
मैं थक गई हूँ।
कि मुझे सहारे की ज़रूरत है।
कि मुझे हर लड़ाई जीतनी ही नहीं है।

मैंने अपने बच्चों की आँखों में
अपनी सबसे सच्ची प्रेरणा देखी है—
उनकी निश्चिंत हँसी में,
उनके छोटे-छोटे सवालों में,
और उस भरोसे में
जो वे बिना कहे मेरे कंधों पर रख देते हैं।
वहीं से मुझे ऊर्जा मिलती है—
खुद को बेहतर इंसान बनाने की,
खुद से थोड़ा कम सख़्त और
दुनिया से थोड़ा कम नाराज़ होने की।

मेरी प्रेरणा मुझे मंच नहीं देती,
तालियाँ नहीं दिलवाती,
लेकिन हर बार जब मैं टूटने के बाद
फिर से रोज़मर्रा की साधारण ज़िंदगी में लौट आती हूँ—
तो वह मेरे भीतर धीरे से कहती है,
“तुम अभी खत्म नहीं हुई हो।”

मेरे लिए आदर्श वह नहीं
जो ऊँचाइयों पर खड़ा दिखता है,
मेरे लिए आदर्श वह है
जो गिरकर भी
अपने भीतर मनुष्य बने रहने की जिद नहीं छोड़ता।
और अंततः मैंने जाना है—
प्रेरणा कोई ऊँचा शिखर नहीं,
जहाँ पहुँचकर सब सिद्ध हो जाए।
वह तो रोज़ का छोटा-सा साहस है,
जो गिरने के बाद भी
हाथों से जीवन को छूटने नहीं देता।

जब अँधेरा थोड़ा गहरा होता है,
वही भीतर एक दीया रख देती है।
जब मन हार मानना चाहता है,
वही धीमे से कहती है—
“ठहरो, अभी तुममें रोशनी बाकी है।”

मेरी प्रेरणा कोई और नहीं—
वह मेरा अपना जीवित रहना है,
हर दिन
थोड़ा और सच के साथ,
थोड़ा और धैर्य के साथ,
थोड़ा और प्रेम के साथ।
और शायद
यही थामे रहने की कला
जीवन की सबसे बड़ी विजय है।

—डॉ. वन्दना गुप्ता
22, निर्माण नगर
उज्जैन (मध्यप्रदेश)
पिन – 456010
मोबाइल – 9827535043, 9340400089


स्व से स्वत्व तक

विकल मन
अंतस्तल का ज्वार
स्व से स्वत्व तक
भटकता आर पार
स्वत्व में स्व को ढूंढती
भटकन,उच्चाटन
साधती कुंडलिनी का छोर,

शांति ,शांति ,शांति
आओ मेरी ओर
चंचल मन डूबता
अथाह सागर में,
डूबती, उतराती आकांक्षाएं
तलहटी से चुन लेती हूं
कुछ शांति के शीप
उन्हें गोद में रख
आखें बंद कर
दीप्त करती हूं त्रिपुटी पर ध्यान,

देखा मानस हंस को
किलोल करते
मंद मंद स्फुरित जलराशि में
स्मित हो अरुणाभ
उसकी रक्तताभ रश्मियों को
पकड़, झूलती रही मैं मगन
भीतर नव उजास शांति
स्थिर,दृढ़ मन,नव स्फूर्ति
स्व को पाकर।

***

राग – विराग

खिलते रहना
अमलतास तुम
बौरते रहना आम
मंजरियों से लदे ,
अलसाये से तुम
कितने सुंदर,
सज्जित हो जाते हो
झर जाती हैं मंजरियाँ
लस लेते कीट
मार देते हैं
गर्भ में ही
तुम्हारे अंकुरण
तुम भूल कहाँ पाते हो ?
पुष्पित होना ही होगा तुम्हें
पुनः पुनः
पुष्पित पल्लवित
ओ मेरे अमलतास !
हवाओं ने उड़ा दी
पुष्प मञ्जूषा,
तुम्हारी सज्जित डालिया
झकोरों ने तोड़ दी।

सूने तुम ,
तप्त ,दग्ध वियोगी से
कितने दिन
वैरागी बने
निरपेक्ष रहोगे

फिर बही जब पुरवइया
फिर झूमे
फिर मुस्काये
नाश और निर्माण
सृजन विंदु के
अटल सत्य से
जीवन के इस परम्
सत्य से
कितने अविचल
हम तुम निश्चल

डा रेनू सिंह
rs70smile@gmail.com

देहरी के भीतर स्त्रियाँ

देहरी से निकलना आसान
नहीं होता स्त्रियों के लिए
देहरी -देहरी नहीं होती
इसमें उनको बताए जाते हैं
स्त्री होने के मायने
उनको उनकी हद
हद में रहकर नपे -तुले शब्दों में
जबाब देना है ..
बाहर निकलते समय रखना है
पर्देदारी
बहुत बेहतर है अगर
ज्यादा हँसें बोलो नहीं
मर्दों से
बस काम -से-काम रखना चाहिए
स्त्रियों को
साँझ के बाद नहीं निकालने हैं
कदम उनको घर के
बाहर
सीमाएँ बहुत जल्दी समझाई जाने लगती
हैं , उनको

एक देहरी खींची होती है उसमें
समय से निकलना है और
वापस लौटना भी है समय से

जैसे लगता है समय की सलीब
पर टाँगी दी गईं हैं ,ये स्त्रियाँ
स्त्रियाँ आड़े- तिरछे नहीं चल
सकतीं
उनको चलना है
समानांतर रेखाओं की
सीध में

सब कुछ तय किया गया है
उनके लिए
समय के
भीतर खींची गयी रेखा में

ये जो लड़कियाँ हैं
मुझे लगता है एक वृत की तरह चक्कर
लगा रहीं हैं
नाच रहीं हैं किसी वलय में
सदियों से
चलते रहना उनकी नियति है
इस वृताकार घेरे में
बदलता कुछ भी नहीं है
कुछ समय बदलने पर बदलतीं हैं
उनकी कक्षाएँ
लेकिन उनको टँगे रहना है उसी
वृत के छल्ले पर और
लगाते रहना है देहरी के चक्कर
महेश केशरी


सबसे बड़ा उपहार
प्यार, प्यार और ढेर सारा प्यार
जीवन का सबसे बड़ा उपहार
प्रेरणा तो बस यही जीवन में
प्यार की बोली भी बस एक
हिन्दी, बृजभाषा या मैथिली
मन चाहे तुम कह लो जो भी
अरबी चीनी जापानी या फिर प्रांसिसी
समझ आती पर भाषा वही
जो प्यार की बात कहे बिना कहे ही
अपनों बीच हो या सब अजनबी
जैसे उस दिन चलते वक्त रो पडीं थीं माँ
मुझे गले लगाते ही,
‘सपने सी आवै अब तो लाडो
और सपने-सी ही चली जावै
कई बार खुदको ही चिकोटी काटूँ
बारबार छूकर देखूँ कि
छोरी सच में आई भी या
सपनौ ही देखौ मैंने
इतनी गुमसुम और उदास
पहले तो तू कुछ कहती भी थी
अब बस चुप ही चौं
इतनी अकेली और उदास चों
माँ जिन्दा है अभी तेरी
आ गले लग जा हंस-रो लै
जी हल्कौ कर लै ठहरकर मेरे पास
इतनी बड़ी भी मत बन मेरे आगै
करेजा फटौ जाय मेरौ
सूनी-सूनी आँखन कू देख।”

माँ विदा होती बेटी से भी ज्यादा उदास थीं
अतिरेक था शायद उमड़ते लाड़ का
खुद को ही बारबार समझा रही थीं वह
तरसेगा वात्सल्य पूरे साल फिर से
चेहरा जब न दिखेगा लाडली का
पर विधि से कौन लड़ पाया है?

तभी नौकर दौड़ता आया और हाँफता-सा बोला,
‘बाबूजी अथुआ का रायता बनाए वास्ते कहे हैं
दीदी खा लींहः एकबार अऊर चलते- चलते
नीक लागे बा, फिर उहां कहां मिली बिलायत मां?’

‘जे का अथुआ अथुआ लगा रखी है मरे तैनै
मेरी तो समझ मैं कछु ना आ रयौ
कहीं बधुआ तौ नाय कै रयो, नासपीटे ?’

‘हाँ उहे त मांजी, उहे त कहत रहली हम
भुलाय गइल रहल. कथुआ बूझल भी नाहीं पड़त !’

हंस पड़े थे तब हम तीनों ही एक साथ
पल भर में ही बींधते सारी उदासी
विदा की उस बेला में प्रेम की एक डोरी ने
जोड़ दिया था तुरंत पूरा वार्तालाप
जैसे भूखे पंछियों की गुटरगूं सुनते ही
रख आते हम पानी संग
चंद दाने बाजरा ज्वार या गेहूँ चावल
जो भी हाथ लगे उसी के…

***

जिन्दगी
छलिया जिन्दगी, नादान जिन्दगी
जीतकर भी ना जीत पाईं पर कभी
चाय की प्याली पर उठते धुँए-सी
उडती ही फिरी झणिक यह जिन्दगी

सजाया संवारा निखारा कितना इसे
सीखा समझा और पुकारा कितना इसे
बहलाया कभी तो दुलराया कितना इसे
मुड़कर ना देखा ना ही यह रुकी कभी

फिर भी शेष है हर आस आज भी इसीसे
उम्मीद और विश्वास है कि सीखेगी जरूर
समझेगी जरूर गुरु से किताबों से
कुछ और नहीं तो अपनों से आखर अबूझ

सपनों का झिलमिल आकाश भी यही
और उगते डूबते सूरज चांद भी यही
जल में कमल सी रही ना जो कभी
बहुत प्यार करती है जिन्दगी से जिन्दगी

खिलती कली-सी नाजुक है यह
पतझर के झरते पत्ते-सी भी दिखती
रिश्तों में लुटा देती अनमोल खजाने
कृपण बन तौलती कभी मारकर डंडी

हर रिश्ते में सज आती है मोहिनी
कांटों पर खिल आएँ जैसे गुलाब
हर दश्य अनूठा और रंगों का मेला
फिर भी बेसहारा ही लाचार जिन्दगी

हर चुभन कसक और चुंबन इसके
आत्मा पर छोड़ जाते अमिट निशान
मीत भी यही और दुश्मन भी यही
बदलती मौसम मन के पलपल जिन्दगी

गोदी में ले बहलाती सहलाती कभी
चुनौती तो कभी अग्नि परीक्षा लेती
बातें और चालें समझ ना आएँ इसकी
अबूझ पहेली-सी भटकाती जिन्दगी

प्यार करूं या फिर लडूँ इससे
ना कोई दुश्मनी ना ही स्पर्धा
सुख-दुख और स्वप्न अभिलाषा
जीने की तो है यही प्रेरणा जिन्दगी

माता,पिता, गुरु, सखा और संतान
कितने रूप धरे साथ निभाने को
आगे-आगे चलती जैसे ईश्वर साक्षात
हाथ में लेकर जलती मशाल जिन्दगी….

शैल अग्रवाल, बरमिंघम, यू.के.

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