कविता आज और अभीः रिश्ते


हम सटे थे एक दूजे से ….

कोहिमा के एक चर्च में हमारा विवाह हुआ
चर्च में बेथलहम जैतून की लकड़ी से बनी
एक नाद के बगल में खड़े हम दोनों
पृथ्वी के सबसे सुंदर दूल्हा दुल्हन लग रहे थे
दजुकोउ घाटी और जप्फु चोटी पर
हाथों में हाथ डाले
घूम रहे थे हम
अचानक ….
अचानक स्वप्न टूटा
घड़ी देखी थी तो भोर के चार नहीं बजे थे
ये सब स्वप्न था
हाँ स्वप्न ही तो था
फिर याद आया पिछली दफे कैसे लड़े थे हम
साईबेरियन बाघ और तिब्बतियन भेड़िये की तरह

दो अलग अलग दिशायें थे हम
दोनों का कोई मेल नहीं
एक अंतरीप तो दूसरा सियालदह जंक्शन
एक भारत का संविधान तो दूसरा संघ
एक मणिपुर तो दूसरा पुरानी दिल्ली
एक लोकटक झील तो दूसरा पथरीला पहाड़
कैसे रिझाया था अर्जुन ने चित्रांगदा को
एक शिरोई लिलि पुष्प देकर
कैसे रिझाओगे तुम मुझे
कोई पुष्प, कोई पत्ता, कोई बेलपत्र तक ना रखा मेरी हथेली पर
आजतक तुमने

उतना ही तो सटे थे हम एक दूसरे से जितना जलपाईगुड़ी की
अंतर्राष्ट्रीय सीमा से सटा है भूटान
जैसे क्षितिज
जैसे पिता की सुराही से सटा रहता था माँ की सूती साड़ी का फटा हुआ एक हिस्सा
माँ सुराही को ठंडा रखने के लिए रोज़ कपड़े को गीला करके
सुराही से लपेट देती थी
उतनी भर ही तो महक थी तुम्हारी जैसे
रसोई में पंच फोरन की महक
जैसे सक्या मठ के प्रार्थना कक्ष में फैली धूपबत्ती की महक
जैसे शिशु के ओष्ठ पर फैली हो माँ के स्तन के दूध की महक

तत वितत, सुषिर,घनवाद्य ,अवनद्ध
संगीत गूँजता था हमारे कानों में
आँखें बंद करते थे हम
और पहुँच जाते थे एक दूसरे के पास
तितिक्षा भर शक्ति थी हमारे अंदर
धार चढ़ रहे थे हम
पानी उतर रहा था तीस्ता में
उधर मैं धागा बाँध रही थी हमारे मिलन के लिए

हम एक दिन उभरेंगे चेचक की तरह
लाल दानों की तरह दिखेंगे
सिरदर्द, भूख की कमी और बुखार की तरह
खत्म हो जायेंगे एक दिन
ना तुम मुझे गले से लगाओगे
ना मैं तुम्हारा माथा चुमूँगी
हम बिछड़ जायेंगे एक दिन
पृथ्वी के शून्य में

ज्योत्सना अडवानी

रिश्ता भी व्यापार

रोटी पाने के लिए, जो मरता था रोज।
मरने पर चंदा हुआ, दही, मिठाई भोज।।

बेच दिया घर गांव का, किया लोग मजबूर।
सामाजिक था जीव जो, उस समाज से दूर।।

चाय बेचकर भी कई, बनते लोग महान।
लगा रहे चूना वही, अब जनता हलकान।।

लोक लुभावन घोषणा, नहीं कहीं ठहराव।
जंगल में लगता तुरत, होगा एक चुनाव।।

भौतिकता में लुट गया, घर, समाज, परिवार।
उस मिठास से दूर अब, रिश्ता भी व्यापार।।

श्यामल सुमन

आशा

रुकी हुई ट्रेन से
जो भी फूल लेना चाहता था
बच्ची के हाथों से
उसमें कोई उसका पिता नहीं था

किसी की भी तस्वीर नहीं मिलती थी
लड़ाई पर गए पिता से

वह कितनी दूर और कहाॅं गया था
यह भी उसे मालूम नहीं था
विश्वास था उसके लौटने का

ट्रेन आगे बढ़ती जाती
घर लौटे सैनिकों को छोड़कर

स्टेशन खाली होता जाता
वह आशा में बार-बार आती

उसके फूल कभी मुरझाए नहीं
हिम्मत कभी टूटी नहीं

नरेश अग्रवाल

अलविदा ऐ साथी

अलविदा ऐ साथी
फरेबी फ़ितरत के तुम वारिस
मैं शातिता से हूँ नावाकिफ़
खुद को लुटा कर अब सीखी हूँ
और विश्वास के साथ कहती हूं
‘ तुम अपनी दुनिया बसाओ
मैं अपनी फना करूं
अपना अंत लाकर उस वजूद के साथ
समस्त कायनात का खात्मा करूं
अपने ही वारिस को अपनी कोख में
दफ़ना कर, खुद को फ़ना करूं’

अभी तक विश्वास नहीं आता
कि मेरी कोख में
मेरे और तेरे बच्चे के भ्रूण में
मेरे और पराए खून की मिलावट है
हां तुमने कहा था, और मैंने सुना था
मेरे विश्वास पर यह तुम्हारे विश्वासघात का वार था
सच कहती हूं
‘वह तुम्हारा ही बच्चा है
तुम कहते हो ‘नहीं’
सच क्या है, तुम भी जानते हो और मैं भी
पर अब, मैं खुद मुख्तियार हूँ
तुम्हारी याद की कोई भी निशानी
न अपने पास, और न इस धरती पर
छोड़ना चाहती हूँ
अलविदा ऐ साथी
मैं अपने आप को फ़ना कर के
इस समस्त कायनात का खात्मा करूंगी
मेरे भीतर धड़कते हुए उस वारिस का
वजूद मिटाकर, अपनी ही कोख में उसे दफ़ना कर
साथ उसके फना हो जाऊंगी.’
देवी नागरानी

अंकुरण
———
एक रिश्ता जो
उग आया था खुद-ब-खुद
और
पनपता रहा हौले-हौले
पल्लवित, पुष्पित
वह रिश्ता
इतना प्यारा है कि
होता नहीं विश्वास

ना उसने किया प्रयास अलग,
ना मैंने की कोई कोशिश अतिरिक्त
खुद से उग आए इस
मधुर रिश्ते को
क्या नाम दूँ
जिसमें उम्र और लिंग का
बंधन नहीं कोई

पर है बहुत ही खास
प्यारा सा एहसास
हम दोनों
अघोषित सहेलियों के बीच
उम्र के तमाम
फासले पार कर
पनप कर कुसुमित हो गया जो।
-अनिता रश्मि
ईमेल : anitarashmi2@gmail.com

–संबंध में अपनापन हो
सुख दुख में सहभागी बनकर
जो प्रतिबिंबित जीवन पथ पर
वह एक अकेला साथ, मधुर
रिश्तों का सुंदर दर्पण हो
संबंध में अपनापन हो,,
मेरे आंसू उसके मन की
पीड़ा बन कर बह जाते हों
उसके सुख मेरे जीवन में
सुख के बादल बन छाते हो
एक स्नेह भरा स्पन्दन हो
संबंधसंबंधों का अपनापन हो
सुख दुख में सहभागी बनकर
जो प्रतिबिंबित जीवन पथ पर
वह एक अकेला साथ, मधुर
रिश्तों का सुंदर दर्पण हो
संबंधों का अपनापन हो,,
मेरे आंसू उसके मन की
पीड़ा बन कर बह जाते हों
उसके सुख मेरे जीवन में
सुख के बादल बन छाते हो
एक स्नेह भरा स्पन्दन हो
संबंधों में अपनापन हो
जीवन की मुश्किल राहों पर
जो कदम बढ़े हो संग,सत्वर
फूलों का वैभव दान किया
शूलो की चाहत खुद लेकर
यादों का प्रतिपल आवर्तन हो
संबंधों में अपनापन हो
जीवन की मुश्किल राहों पर
जो कदम बढ़े हो संग,सत्वर
फूलों का वैभव दान किया
शूलो की चाहत खुद लेकर
यादों का प्रतिपल आवर्तन हो
संबंधों में अपनापन हो
पद्मा मिश्रा जमशेदपुर झारखंड

रिश्ता दोस्ती का

मित्रता संजीवनी सी
लो यह सुमन आशीष भी
मै आज तुमको सौंपती हूँ,
नेह का उपहार समझो या ह्रदय की भावनाएं,
कामनाओं का सकल संसार तुमको सौंपती हूँ,
यह नहीं प्रतिदान कोई,
अनछुए अनजान पल का,
कह सकोगे क्या कभी तुम,
यह नहीं अवदान मन का?
अश्रु बूंदों में समर्पित दान तुमको सौंपती हूँ,
मित्रता संजीवनी सी,
मधुरता गंगा सी पावन ,
मलिनता की बूँद भर भी,
कर सकी ना मन अपावन,
भावनाओं में गुंथा सम्मान तुमको सौंपती हूँ
पद्मा मिश्रा जमशेदपुर झारखंड

मेरे अपने
अपनों का आशीष,प्यार संग साथ लिए,
जगमग हो घर का हर कोना कोना,
दीवारों पर सजें प्यार के इन्द्रधनुष,
साकार बने जीवन का हर प्यारा सपना
आलोक बिखेरें दीपों सी झिलमिल रातें ,
जीवन मधुमय मंगलमय हो जाये,
खुशियों की वन्दनवार सजे ,देहरी आँगन,
आँचल में सुख का सारा संसार लिए,
ममता की छत हो,नींव बने विश्वासों की,
महके सारा जीवन फूलों सा प्यार लिए,
पद्मा मिश्रा जमशेदपुर झारखंड


बोल, तेरी उँगलियाँ पकड़े कहाँ तक मैं चलूँगा ?
बोल, तेरी उँगलियाँ पकड़े कहाँ तक मैं चलूँगा ?
देख दूर अतीत में, गन्तव्य जब कोई नहीं था,
राह जब कोई नहीं थी, साथ जब कोई नहीँ था,
झाड़ियों की ओट से तुम आ गए बन कर सहारा,
और बोले, सोच मत, तेरे लिए तो मैं यहीं था,
साथ मिलकर ढूँढ लेंगे किस तरफ मंज़िल हमारी,
रात जब आया करेगी दीप बनकर मैं बलूँगा ।

रात आयी, हाँ, दिया बनकर किया तुमने उजाला
पाँव जब फिसले, बढ़ाकर हाथ, हाँ, तुमने सँभाला,
थक गया जब, फेर सर पर हाथ, हाँ, तुमने सुलाया,
जब उषा आयी, पुकारा प्यार से, मुझको जगाया,
फिर चले हम, क्या पता था, मैं जिसे मंज़िल समझता
मात्र एक सराब है, जिसको नहीं मैं छू सकूंगा ।

है नहीं मंज़िल अगर, तो पथ सभी हैं एक जैसे,
भटकना, जाना, सफ़र करना, सभी हैं एक जैसे,
और, रुकना, याकि फिर मुड़कर कहीं से लौट चलना,
लौट चलना भी कहाँ ? अब चाहता कुछ भी न कहना,
हम कहाँ तक आ चुके हैं पूछ कर भी क्या करूँगा ?
बोल, तेरी उँगलियाँ पकड़े कहाँ तक मैं चलूँगा ?

: सुधांशु कुमार मिश्र
प्रोफेसर, अर्थशास्त्र विभाग
नार्थ-ईस्टर्न हिल विश्वविद्यालय
शिलांग, मेघालय (भारत) – 793022
इ-मेल: mishrasknehu@gmail.com

क़हर

ये किसकी नयना यूँ झड़ी
पत्थर को मोम जो कर गई
वर्षों की सूखी रेत में
समवेदना सी भर गई ।

सागर में जो ये उबाल है
तूफान या सैलाब है
करुणा भरी चीत्कार ये
किसके हृदय की पुकार है

फिर से दिया किसका बुझा
नभ कालिमा से भर गया
ये साँझ फिर क्यों हहा रही
अमृत कलश अलसा रही

वो किसकी आँहें आ रही
जो दिल को यूँ दहला रही
माँ है , पिता या भाई है ?
या पुत्र की अगुआई है ?

पश्चिम दिशा की ओर से
जो रोशनी सी आ रही
दुल्हन ने की श्रृंगार या
जलती चिता की आग है ?

हे राम ! अब तो बस करो
थोड़ी कृपा व रहम करो
कलुषित पड़ी है चेतना
देवत्व से निर्मल करो

जीवन न अब कुछ शेष है
अब बस यहाँ अवशेष है
जो है बचा उसे रक्ष दो
बस प्राण इनकी बख़्श दो

-डॉ आशा मिश्रा ‘मुक्ता’

फागुन का दर्द

हे कृष्ण ! फागुन फिर से आया ।
शब्द मेरे प्रश्न बन
फिर जूझने तुमसे चले हैं ।
कह सको ग़र आज ,
बस इतना बताना
रंग फगुआ का क्या तुझ पर भी चढ़ा है ?

नाम तेरा सुनके जब मेरी कपोलें
रोज़ ही फगुआ का रंग बिखेरती हैं
तेरे गालों पर भी क्या ऐसा असर है ?
तेरी फगुआ भी क्या मेरी ही तरह है ?

धानी चूनर ओढ़कर फिर भोर उतरा
सतरंगी चादर बिछाने मेरे अंगना ।
लाल किरणों से धरा की रेत भी
ऐसी सजी कि
तेरी सब पटरानियाँ ज्यों
लाल चूनर में सजी हैं।

पर,
साँझ जो डूबा है
गहरी वेदना में
रंग उसका क्या
ये क्या तुझको पता है ?

सुनती हूँ तुमने किया आज़ाद ,
और उद्धार भी उन देवियों का ।
तुम ही हो उद्धारकर्ता ,
लो, ये मैं भी मानती हूँ ।
मेरी भी एक बात मानो
प्रेम से अपने मुझे
आज़ाद करके भी बता दो।

फगुआ की चंचल बयारें
आज भी मन मोहती होंगी तुम्हारा
जानती हूँ ।
संग तेरे डोलती होंगी सभी पटरनियाँ भी
ठीक वैसे ही कि
जैसे डोलते थे संग मेरे
प्रेम रंग में डूबकर
तुम ।

बिखरे लम्हों को
अगर तुम जोड़ पाओ
माप पाओ प्रेम की गहराइयों को
तो मुझे इतना बताना ।
वेदना और प्रेम की गहराइयों में
भेद क्या है ?

तुम हो अंतरज्ञ
यह मुझको पता है
रंग फागुन का नहीं तुमसे छिपा है ।
अनगिनत पटरानियों का रंग जो तुझपर चढ़ा है ।
पर ज़रा मुझको बता दो
रंग मेरे प्रेम का क्या है ,
और फिर वेदना का कौन सा रंग ?

हे कृष्ण !
फागुन फिर से आया
कह सको ग़र आज ,
बस इतना बताना
तेरी फग़ुआ भी क्या मेरी ही तरह है ?
तेरे गालों पर भी क्या मेरा असर है ?
बस ज़रा इतना बताना ।
-डॉ आशा मिश्रा ‘मुक्ता’

जीवनसंगिनी

हाँ मैं
तुम पर कविता लिखूँगा
लिखूँगा बीस बरस का
अबूझ इतिहास
अनूठा महाकाव्य
असीम भूगोल और
निर्बाध बहती अजस्त्र
एक सदानीरा नदी की कथा
आवश्यक है
जल की
कलकल ध्वनि को
तरंगबद्ध किया जाए
तृप्ति का बखान हो
आस्था, श्रद्धा और
समर्पण की बात हो
और यह कि
नदी को नदी कहा जाए!
जन्म, मृत्यु, दर्शन, धर्म
सब यहाँ जुड़ते हैं
सरिता-कूल आकर
डूबा उतराया जाए इनमें
पूरा जीवन
इस नदी के तीर
कैसे घाट-घाट बहता रहा
भूख प्यास, दिन उजास
शीत-कपास
अन्न की मधुर सुवास
सब कुछ तुम्हारे हाथों का
स्पर्श पाकर
मेरे जीवन जल में
विलीन हो गया है
शैलेन्द्र चौहान

वो उतना ही पढ़ना जानती थी?

वो उतना ही पढ़ना जानती थी?
जितना अपना नाम लिख सके
स्कूल उसको मजदूरो के काम
करने की जगह लगती थी!
जहां वे माचिस की डिब्बियों
की तरह बनाते थे कमरे,
तीलियों से उतनी ही बड़ी खिड़कियां
जितनी जहां से कोई
जरुरत से ज्यादा साँस न ले सके!
पता नहीं क्यों?
एक खाली जगह और छोड़ी गयी थी!
जिसका कोई उद्देश्य नहीं,
इसलिए उसका उपयोग
हम अंदर बहार जाने
के लिए कर लेते है,
वो माचिस की डिब्बियों के
ऊपर और डिब्बिया नहीं बनाते
क्योंकि उन्हें लगता था
कही वे सूरज तक न पहुँच जाये?
इसी लिए नहीं बनाते उन डिब्बियो
के सहारे सीढ़ियां,
लेकिन नज़र से बचने के लिए
छोटा टीका ही काफी होता है?
फिर भी,
दीवारों पर पोता जाता था
काला आयत
जिस पर अलग-अलग बौने
लकड़ी को काटने की जगह
समय को काटने के लिए
सफेदी पोतते थे
और उतना ही पढ़ाते रहे
जितना वो अपना नाम लिख सके?

मंजुल सिंह


मॉब लिंचिंग में मारी गयी पहली औरत
वो तो बस यू ही खड़ी थी
वो न हिन्दू थी न मुसलमान
और न ही किसी और समाज से
वो तो बस एक औरत थी
जो खड़ी थी
वो न तो कुछ चुरा कर भाग रही थी
और न ही कुछ छिपा कर
वो तो बस अपने सपनों को
जगा कर भाग रही थी
वो न तो अपने पसंद के
मर्द के साथ भाग रही थी
न ही उसके पास कोई गौ माँस था
या उसके जैसा कुछ और
उसके जिस्म पर भी
आम बोल चाल वाली
औरतो की तरह ही कपड़े थे
न तो वो सबरीमाला में
घुसने की कोशिश कर रही थी
न ही बुर्क़ा पहनने से इंकार
वो तो बस यू ही खड़ी थी
फिर भी भीड़ ने
मॉब लिंचिंग में उसे मार दिया

एक भीड़ का झुण्ड
रैला बना आ रहा था
जिसमे टोपी और चोटी
वाले दोनों थे
और चीख कर बोल रहे थे
ऐसा नहीं होने देंगे
वहाँ कई सारे लोग
खड़े होकर देख रहे थे
कुछ ने अपनी आत्माएं
अपनी जेब में रख ली
तो कुछ ने अपनी आत्माएं
सुनार को गिरवी रख दी

प्रशासन ने पूछा
तुम अपनी आत्मा के साथ
खुले मे घूम रहे थे
साहब मेरी आत्मा
तो मेरी जेब में ही थी
पर भीड़ ने बताया
उस वक़्त तुम्हारी आत्मा
तुम्हारी जेब से झाँक रही थी
क्या तुम?
उस औरत को जानते थे
नहीं साहब
तुमने किसी को कुछ बोलते
देखा या सुना
नहीं साहब
बस महसूस किया
पर पता नहीं क्यों साहब
जब उस औरत को याद करता हूँ
तो वो कभी माँ जैसी दिखती है
तो कभी पत्नी जैसी
कभी बहन तो कभी बेटी जैसी
पर मैं उसे नहीं जानता
वो तो बस यू ही खड़ी थी

वो महसूस करा रहे थे
ऐसा नहीं होने देंगे
ऐसा नहीं होने देंगे
और मैं उस भीड़ के झुण्ड
में शामिल हो गया
अच्छा ठीक है
हम लोकतंत्र में रहते है
सख्त कार्यवाही होगी
उस खड़ी औरत के खिलाफ
क्या कोई बता सकता है
क्या वो किसी कानून या हिंसा
के ख़िलाफ खड़ी थी
नहीं साहब
पता नहीं
ठीक है तो रिपोर्ट में लिखो
वो औरत खड़ी थी
अपने पसंद के मुसलमान मर्द
के इंतज़ार में गौ मांस लिए
और भाग जाना चाहती थी
निकाह करने के लिए
किसी अदृश्य शक्ति ने
आकर उसे मार दिया

नहीं साहब
ऐसा नहीं था
वो भीड़ थी
सभी के चेहरों पर मुखोटे थे
सभी के मुखौटो से खून टपक रह था
और बोल रहे थे
ऐसा नहीं होने देंगे
क्या किसी ने उनके हाथों में
तेज धारदार हथियार देखा
नहीं साहब
लेकिन सभी की जुबान
किसी तेज धारदार हथियार से कम न थी
और वो बोल रहे थे
ऐसा नहीं होने देंगे

नहीं, नहीं ऐसा कुछ नहीं था
तुम्हारी आत्मा तो
उस वक़्त तुम्हारी जेब में थी
साहब आदमी तो बहुत मर गए
कही ऐसा तो नहीं साहब
वो मॉब लिंचिंग में मारी गयी
पहली औरत हो!

-मंजुल सिंह
विजय नगर, गाजियाबाद

ऊँ शान्ति
एक प्रार्थना और
फिर शान्त था सब
धमाका कैसा धमाका
बहुत दूर है अभी
किसी और देश में
अपना पेट भरो
अपनी सुरक्षा का
बस इन्तजाम करो
फिर वसुधैव कुटुम्बकम्
क्या सिर्फ एक नारा
एक मुखौटा ही नहीं,
परेशान थी अब तो
प्रार्थना भी।
शैल अग्रवाल

कृष्ण तुम आओ फिरसे
शंख चक्र और अर्जुन ही नहीं
बांसुरी व प्रेममयी राधा को लेकर
बहुत जरूरत है तुम्हारी।
-शैल अग्रवाल

रिश्ते भी आज अटैचियों जैसे
जरूरत पर ही होंगे इस्तेमाल
वरना धूल खायें अटारियाँ चढ़े
-शैल अग्रवाल

एक खेल ही तो,
बूढी हो चली धरती
बूढे हो चले आदर्श
बूढ़ी होती मान्यतायें
बूढ़े हो चले सारे रिश्ते
शांति तलाशते
सामंजस्य ढूंढते
निरीह और लाचार
एक खेल हुआ जीवन
हार का जीत का
जीने-मरने का प्रश्न
अब मायने नहीं रखता
बस एक सवाल कबतक
शस्त्र शूर वीर के हाथ नहीं
कपटी शकुनी के बिखरे पासे
माँ बहन और बेटियाँ
कुदरत का उपहार नहीं
मात्र दासियाँ और खिलौना
भोग विलास का
बच्चे पैदा करने की मशीन
बदल भी दी जाती तुरंत
पुरानी होने पर
पुजती नहीं अब
ईश्वर की तरह ही
बना लिया गया है
इसे भी बस
एक हथियार
जीत का हार का
जहाँ मुख्य कतई
इन्सान नहीं।
शैल अग्रवाल

भाई- बहन- मित्र
सब ही तो हैं प्यादे
न्योछावर कर दिए जाते
रिश्तों के खेल में
मेरे तेरे, इसके उसके नाम
दौड़ाए गए घोड़े
रौंदेंगे जबतक रौंद पाएँ
हार जीत का फैसला
मात्र एक बुद्धि विलास
हृदय हीन।

कराहते दम दोड़ते
अंतिम सांस लेते
ये रिश्ते
बिना प्यार की आक्सीजन के
बेसुध ही सब सहते जाते
लालच के चूहों ने
कुतर डाला है तानाबाना
मैं सही, मेरे सही, मेरी ही बात सही
के चश्मे से सूझता नहीं कुछ
पीर मन की कहे कौन, सुने कौन
-शैल अग्रवाल

ये रिश्ते
ये रिश्ते कोमल बहुत
कोमल है इनका अहसास
सिर पर फैला
तारों छिटका आकाश
मन्द पवन और पुष्पित बगिया
कलकल बहती नदिया के छोर
बैठा ईश माता-पिता आज भी
गोदी में जिनकी हम रहते बैठेे

फिरभी इनका यह नित
अनादर और तिरस्कार
सहते हारे टूटे बिखरे
ना क्रुद्ध ना उदास अब
हक मांगते बच्चों की
फरमाइश से चुपचाप
बिखरे टूटे
मर रही है धरती
दिन प्रतिदिन
उदासीन ईश के संग।
शैल अग्रवाल

फल फूल और टहनी जड़
एक दूजे बिन जी पाएँ कब
आँखों के आगे बिखरी यह दुनिया
यात्रा है आदि से अनंत की
नेह डोर से ही रहती सधी।
-शैल अग्रवाल


-तैरने दो मुझे
तैरने दो मुझे
डूबने के भय से
निजात पाऊँगा
हाथ-पैर चलाकर
तैरना सीख जाऊँगा।।
लड़ने दो मुझे
हार के दहसत से
जीत जाऊँगा
गिरकर उठने से
लड़ना सीख जाऊँगा।।
खेलने दो मुझे
डर के काल को
बेहाल कर दूंगा
हार से लड़कर
खेलना सीख लुंगा।।
बहने दो मुझे
दशाओं से लड़कर
दिशा बदल दुंगा
बाधा को तोड़कर
बहना सीख लुंगा।।
लिखने दो मुझे
कलम की धार से
बुराई समेट दुंगा
फिज़ा को सींचकर
लिखना सीख लुंगा।।
खोजने दो मुझे
अंधकार से दूर
कुकृत्यों को मार दुंगा
ग़ायब क़िरदार को
खोजना सीख लुंगा।।
देखने दो मुझे
आँख से पट्टी हटा
बदला रूप बदल दुंगा
आत्म मंथन कर
देखना सीख लुंगा।।
प्यार करने दो मुझे
कांटे से गुज़र कर
कली को सींच लुंगा
लहू के कतरे से
प्यार की शाख दुँगा।।
-ज़हीर अली सिद्दीक़ी

रोक रहा हूँ…
अस्तित्व बचाने
धुंध निहार रहा हूँ
ख़ुद को नही
ख़ुदा को मार रहा हूँ
ऊँचाई की चाह में
सीढ़ी बना रहा हूँ
गिरने के डर से
बिन दर्द कराह रहा हूँ…
माला की चाह में
मोती जुटा रहा हूँ
डूबने के डर से
नौका चला रहा हूँ…
पानी की चाह में
कुआँ खोद रहा हूँ
प्यासे की राह से
पानी हटा रहा हूँ…
कर्मों को तौलने
तराजू टटोल रहा हूँ
गुनाहों का मोलकर
सस्ते में बेच रहा हूँ…
नाव में छेद से
पानी को रोक रहा हूँ
डूबने से बचने
नदी में ही कूद रहा हूँ…
लहरों से लड़ने
हुंकार भरता हूँ
इसकी विकरालता से
मन को मोड़ता हूँ…
-ज़हीर अली सिद्दीक़ी

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