कविता आज और अभीः नवंबर दिसंबर 2020


यही तो लिखा था
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कुछ अपनी जीवन चर्या के बारे में लिख भेजिए
लिख था सम्पादक महोदय ने
सोच में पड़ गयी
क्या लिखूँ क्या न लिखूँ
कलम काग़ज़ ले बैठी
सोच की सेज पर
कहाँ से शुरू करूँ , क्या लिखूँ
ऐसा क्या नया है
जिसपर कुछ लिखा जाय
या
वही जो सभी लिखते हैं
उसमें से हर एक एक का कुछ
जो मैं हर रोज़ पढ़ती हूँ
कभी स्मरण तो कभी संस्मरण
कभी कोई शेर, तो कभी पूरी ग़ज़ल
और तो और सोच रही हूँ
बताऊँ या न बताऊँ
पर रहा नहीं जाता
फिर भी जो सच है वही लिख रही हूँ
यही सोच रही हूँ
कि इसमें क्या ख़ास बात है
कौन सी नई बात है
जो और करते हैं
और मैं नहीं करती
या वो बात
जो और न करते हों
और मैं करती हूँ
हाँ यही ठीक है और सही भी है
वैसे भी, नक़ल करने में क्या मज़ा है
मज़ा तो उसमें है
जो असल हो, अर्थपूर्ण हो और पठनीय हो
अब यह तो पाठक ही बता सकते हैं
तो लीजिये
पढ़िएगा और प्रतिक्रिया लिखिएगा
तब तक मैं सोचती हूँ
क्या लिखूँ क्या न लिखूँ?
देवी नागरानी
यू.एस.ए.


पाँवों के छाले
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बेहद आएँगे याद 2020
तुम्हारे दिये हुए पाँव के छाले,
कभी भूल नहीं पाएँगे

ये छाले तो
पहचान हैं हमारी
कभी देखा किसी ने कहाँ
ईंट-गारे संग जीते हुए
रहें हैं सदा से सदा के लिए
हमारे साथ ये पाँवों के छाले

गर्भवती ईंट-भट्ठे की
या
माय पीठ पर बँधे बच्चे की
बाँस की लचकती सीढ़ी से
जब चढ़तीं ईंट-गारा थामे
सर पर अपने
पाँवों में उनके छाले भी होते हैं,
उतरतीं कीचड़ के चंदन में
घंटों, कई दिनों तक
खेतों में करती रोपा
छालों से पाँव भरे होते हैं

चुनवा-छुनुआ जब-तब
पिट जाते हलवाई की
दुकान में चढ़ी कड़ाही पर
जिलेबी के मिठास से परे
जिह्वा पर कुनैनी स्वाद लिये
उनके नन्हें-किशोर पाँवों में भी तो
भरे छाले होते हैं

पत्थर तोड़ें, गिट्टी लादें, ढोएँ बालू,
माथे पर लादे लकड़ियों को
छालों से भरे पैरों को नकार
हम कुसमय खटते रहते हैं
छालों का दर्द हमें कभी रूलाता नहीं
हमारे हिस्से आई
सँवारने शहर की जिम्मेदारी से
भागते कहाँ हैं हम कभी

पर आज
हाँ! आज भगा दिया तुम सबने
अपने सजे-सँवरे शहर से
गए थे सँवारे जो हमारे हाथों ही
पाँवों के तमाम छालों संग,
तब ये पाँव के भूखे-पियासे छाले
बहुत दुख रहे हैं।
अब झेले नहीं जाते
काँधे से जबरन उतर गए
मुनवा-चुनिया, रजिया-असरफ,
भुखल-उपासी के पाँव के छाले।

फिर भी है विस्वास
एक दिन अब सही
पहचान पाओगे तुम हमें,
हम ही सँवार सकते
तुम्हारा वर्तमान, भूत, भविष्य
अपने पाँवों के
उन्हीं छालों संग हर बेला खटकर
और उस दिन
तुम्हारी आँखें झुकीं होंगी
पाओगे नहीं भूल कभी
2020 के ये अनगिनत
पाँवों के अनगिनत छाले!
अनिता रश्मि


नन्हीं चिड़िया
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एक थी नन्हीं सी चिड़िया और एक चकत्तीदार चिरौंटा,
दोनों ही मेरी बालकनी में छुपन-छुपायी खेलते थे.…
चिड़िया छिपती खिड़की की ओट,कभी गमले के पीछे,
चुपके-चुपके चिरौंटा भी पहुँच जाता उसके आगे-पीछे ,
चीं-चीं-चूँ-चूँ करके शोर मचाते, मस्ती-मौज मनाते थे.

तिनका-तिनका जोड़ पेड़ पर अपना छोटा सा नींड़ बनाया,
चिड़िया के नन्हें अंडों से तीन बच्चों ने अपना सिर उठाया,
पर एक दिन बदला मौसम, बहुत तेज बारिश-तूफ़ान आया,
तेज हवा के झोंके ने चिड़ा-चिड़ी का नींड़ बहुत दूर उड़ाया,
बच्चों से बिछड़े चिड़ा-चिड़ी तो दुःख में मेरा दिल भर आया.

कुछ दिन चुप-चाप रहे दोनों मेरी बालकनी में शोक मनाया,
मौन-हृदय से दिया दाना-पानी मैंने, दोनों ने मुँह न लगाया,
पर एक दिन चिरौंटा उड़ा अनंत दिशा में, फिर वापस न आया,
मुझ सी अकेली रोती चिड़िया को देख मेरा भी मन भर आया,
मन की करुण-व्यथा समझ उसने मुझे अपने दिल से लगाया,

अब हम दोनों सखियाँ बालकनी में कुछ वक़्त साथ बिताती हैं,
बिना डरे रात को चुपके-चुपके, चिड़िया मेरे कमरे में आती है,
बिस्तर या मेज़ पर मेरे साथ रोटी और चावल के दाने खाती है,
मेरे ऑफिस जाने पर दूर-दूर उड़, शाम को वापस आ जाती है,
एक दूसरे का दुःख बाँट अब हम दो सखियाँ जीवन बिताती हैं.

मधु शर्मा
(फ़िनलैंड)

मेरा सपना तारों से सजा…
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हर सुबह एक नया सपना
देखती हूँ मैं उसके लिये ।
चाँद और तारे जड़कर
सँवारती हूँ इसे मैं उसके लिए ।
बड़े प्यार से आँखो में सजाकर
अपनी पलकों पर बिठाती हूँ उसके लिये
इस रंग से खेलेगी वह, उस रंग में खिलेगी
रंगों के इन्द्रधनुष संजोती हूँ उसके लिये ।

दिन चढ़ते चढ़ते टूट जाता है मेरा सपना
बिखर जाते हैं सारे तारे जो सजाए थे उसके लिए ।
इन्द्रधनुष रूठकर लेजाता है सारे रंग
जो बटोरे थे मैंने उसके लिये ।

ढलती हुई शाम के अन्धेरे में चुभ न जाये उसे
टूटे हुए काँच के सपने का कोई टुकड़ा,
सारे टुकड़े आँचल में समेट लेती हूँ मैं उसके लिए ।

रात की चुप्पी में,
सपनों के टुकड़ों की चुभन को लिए
थोड़ा सा रो लेती हूँ मैं उसके लिए ।

अगली सुबह एक नया, रंगों से भरा, तारों से सजा
काँच का सपना फिर देखती हूँ मैं उसके लिए ।
डॉ. गरिमा बैनर्जी
मैनचेस्टर

कविता लिखती स्त्रियाँ
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घर-बाहर के छंद
मकान के अंदर के द्वंद
बच्चों की किलकारियों की भाषा
रिश्तों की अनगिन परिभाषा
संजोकर क्या खूब
कविता लिख लेती हैं स्त्रियाँ

ना मेज-कुर्सी की खिचखिच
ना समय की किल्लत की चिकचिक
बस चूल्हे पर पकते
रंग-रूप गंध के संग
सपनों की हांडी में डूब
रच लेतीं हैं एक मुक्कमल कविता
व्यस्त… बहुत व्यस्त रहते हुए
मन के अंदर ही अंदर
ये कविता लिखती स्त्रियाँ।
अनिता रश्मि
झारखंड, भारत

विश्वास है
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अब बस प्रार्थनाएं रह गई हैं
हमारी खुली हथेलियों पर
फिसलता जा रहा है सब
आँखों से अजस्र आंसू बना।

गुजरते वक्त के साथ
गुजर चुके हैं जाने कितने
और अभी गुजरेंगे
जाने और कितने…

डराती हैं अब तो ये खबरें
फिर भी विश्वास है बाकी
तुम में जीवन में
तुम्हारे न्याय में सर्वोपरि

प्रेम प्रतीत भरी यह करुणा
तुम्हारी व्यापक यह संरचना
विनाश के कगार पर
औप तुम दूर बहुत दूर
जाने किस अनोखे आसमान में

विश्वास है कि एकदिन पर
पिघलोगे जरूर इस आँच से…
शैल अग्रवाल
यू.के.