करोनाः शब्द चित्र-शैल अग्रवाल

कोरोना वायरस हमें और हमारे समाज को बदल रहा है। इससे जुड़े चन्द शब्द चित्र जो विचलित तो करते हैं, परन्तु संग-संग कुछ ऐसे भी हैं जो मानवता में विश्वास जगाते हैं। यह एक अनहोनी और अप्रत्याशित घटना है। खबरें ही खबरें हैं चारो तरफ , भय, षडयंत्र, त्याग, हर भाव से भरी।


घर के बाहर सड़कों का सन्नाटा शोर कर रहा है, न कोई कार न आदमी, एकाध बच्चे जरूर मास्क लगाए साइकिल चलाते चुपचाप माँ के साथ टहलते दिख जाते हैं या फिर इक्के-दुक्के दौड़ते लोग…कहते हैं इस देश का सबसे बड़ा शहरी पार्क है यह।


रात भर मरीजों के साथ ड्यूटी देकर जब नर्स अस्पताल से निकली तो भूख के मारे अंतड़ियाँ कुड़कुड़ा रही थीं । रेस्टोरैंन्ट सब बन्द और सुपर मार्केट के रैक खाली, कहाँ जाती, क्या खाती! कल की किसे पता…हो सकता है महीनों सामान न मिले , सोचकर लोग जितना भर सकते थे रात में ही अपने-अपने घर ले गए थे और अब उसके लिए वहाँ कुछ नहीं था। बेकाबू भूख और गुस्से के मारी वहीं फफक-फफककर रो पड़ी बेचारी।


केयर होम से फोन आया, पापा ठीक नहीं। क्या अंतिम बार बात करना चाहेगी वह उनसे। धिक्कार उठी वह खुदको क्या जरूरत थी बूढ़े माँ-बाप को वहाँ भेजने की । तीन महीने पहले ही तो छोड़कर कर आई थी, बेहतर देखभाल होगी यह सोचकर। करती भी क्या करती पर; घर, नौकरी, बच्चे उसपर से बूढ़े माँ-बाप, नहीं संभल रहे थे। पर अब आंसू नहीं रुक रहे थे। हफ्ते भर पहले ही माँ बिछुड़ी थीं और अब पापा भी, चन्द पलों के ही… न माँ से मिल पाई और ना ही पापा से। बात तक नहीं हुई। जाना मिलना सब मना है। बिना एक भी मिनट गंवाए विडियो कौल की तो पापा की आंखों में उसे देखते ही चमक आ गई। हाथ आशीर्वाद देने को उठा ही था कि बेजान एक ओर लुढ़क गया । फटी आँखों में एक भयभीत चीख जम गई सामने कौरिडोर में कई कौफिन एक के ऊपर एक लाइन में तैयार रखे थे।


जब भी डॉक्टर बेटा अस्पताल से लौटता तो कलेजा मुंह को आ जाता थका चेहरा देखकर- …अशुभ सोचना नहीं पर न सोचते हुए भी भय घेर लेता। जबतक नहा धोकर खा-पीकर बेटा वापस स्वस्थ न दिखने लग जाता कुछ खा तक नहीं पाती और दूसरे से तो बगल में रहकर भी मिलना जुलना बन्द । भगवान इन स्टेथ्सकोप से लड़ते सैनिकों की सदा रक्षा करे …


वेन्टिलेटर की बहुत कमी थी, भगवान का शुक्र था कि उसे एक मिल गया और वह आराम से सांस ले और छोड़ पा रहा था। उम्मीद थी कि बच भी जाएगा। अचानक उसकी निगाह कोने के एक युवक पर पड़ी जो बेचैनी में तड़प रहा था और एक-एक सांस बड़ी मुश्किल से ले पा रहा था। उम्र यही बीस-पच्चीस के करीब। हे भगवान , इसने तो अभी कुछ नहीं देखा, वह तो 65 साल जिया है , अच्छी और भरपूर जिन्दगी। इतना स्वार्थी होकर क्या मुंह दिखाएगा भगवान को और उसने अपनी नली निकाल दी ताकि युवक की जीवन डोर जुड़ सके इससे। नर्स ने देखा तो दौड़ी पर तबतक बहुत देर हो चुकी थी। मरीज की आँख का आंसू तो ठंडा था पर दोनों हाथ अभी भी प्रार्थना में ही जुड़े थे।
24-5-2020

6. ब्रिटेन में वायरस ने म्यूटेट होकर नया रूप ले लिया। संक्रमित 22 व्यक्ति जब भारत पहुंचे तो पौजिटिव पाए जाते ही वे गायब हो गए। अब पुलिस सरकार सभी ढूंढ रहे हैं उन्हें। केसा देश है यह मेरा, जहाँ कुछ नहीं बदलता और अपने ही अपनों को खतरे में डालते रहते हैं… गुमराहों को छुपाते व पनाह देते हैं!
21-12- 2020

वैक्सीन के आ जाने से उम्मीद जगी है। पत्तों से झरती यह जिन्दगी शायद रुके। कब लगेगा टीका पूछने गया वह 32 वर्षीय युवक जिसके पास कोई नौकरी नहीं थी। हफ्ते में 3 दिन डस्टबिन मैन की तरह काम करके कैसे भी बिना मां के दोनों बच्चों को पाल रहा था वह। बीमार होना या मरने की सुविधा नहीं थी उसके पास छोटे बच्चों की वजह से। परन्तु कांउसिल ने बताया उसके टीके का नंबर तीन महीने बाद , अभी तो ,सौ से ऊपर के ही नहीं निपटे हैं।
27-12-20