
पाँच लघुकथा 
ऋता शेखर ‘मधु’
बंगलूरु
लघुकथा-१
कटौती
आयोजन विशेष था तो सभागार भी खचाखच भरा था। मंच पर प्रबुद्ध रचनाकार और शिक्षाविद शोभायमान थे। बहुत लोगों के सम्भाषण होने थे और सभी के लिए समय भी निश्चित करके बता दिया गया था। उसके बाद कवि गोष्ठी भी होनी थी।
नीता के हाथ में चार पन्नों का आलेख था। पर्यावरण जैसे महत्वपूर्ण विषय पर उसे बोलना था।वह उत्सुकता से अपनी बारी की प्रतीक्षा कर रही थी।
मंच पर विद्वानों के वक्तव्य आरम्भ हो चुके थे। जब नीता की बारी आई तो चार पन्नों के आलेख से वह सिर्फ चार पंक्तियाँ बोली और कहा,” समय सीमा को ध्यान में रखना आवश्यक है, उसे संतुलित करने के लिए मैं बस इतना ही बोलूँगी।”
मंचासीन प्रबुद्ध शिक्षाविद थोड़े परेशान दिखे जिन्होंने अभी-अभी तीन वक्तव्यों का समय ले लिया था।
सभागार में वापस आते ही एक श्रोता ने नीता ने प्रश्न किया,” “दीदी, आप ने इतनी तैयारी की और बोल नहीं पायीं। जैसे सबने बोला, आप भी बोल लेतीं। कोई कुछ नहीं कहता।”
नीता ने मीठी मुस्कान के साथ कहा,”कोई कुछ कहे या न कहे, दी गयी समय अवधि के अंदर ही बोलना हर एक की जिम्मेदारी होती है। ऐसे में कोई अधिक समय ले ले तो आगे का समय भी बढ़ता जाता है। घर हो या बाहर, अव्यवस्था को धैर्य से संभालना तो स्त्रियों को ही पड़ता है। वही मैंने भी किया और अपने वक्तव्य और समय में कटौती कर ली।”
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लघुकथा-२
अधूरा उपन्यास
“रमा जी, आप लगातार पन्द्रह दिनों से दोपहर में यह कहकर बाहर जा रहीं कि आप दान देने मंदिर जा रही हैं| किन्तु न तो आपके हाथों में कोई सामग्री होती है और न ही आप मुझसे पैसे ही लेती हैं,” आज रमेश बाबू ने पत्नी को टोक ही दिया|
बाहर निकलते हुए रमा जी के कदम रुक गए|
“ आज आप भी मेरे साथ चलकर देख लीजिए, दान ही देने जाती हूँ।”
“चलता हूँ,” कहकर रमेश बाबू ने अपनी शर्ट बदली और साथ हो लिए|
मंदिर के बगल में एक बड़ा सा चबूतरा था। वहाँ जमीन में दरी बिछाकर कुछ बच्चे बैठे थे| उनके हाथों में कॉपी- पेंसिल थी| रमा जी मंदिर के अंदर न जाकर उसी चबूतरे पर चढ़ गयीं |
“गुड आफ़्टरनून मैडम,” कहते हुए बच्चे खड़े हो गए|
रमा जी ने रमेश बाबू की ओर देखते हुए कहा, “अभी मैं यहाँ पर एक घंटा पढाऊँगी| आप रुकना चाहें तो रुक सकते हैं।”
“अभी जाता हूँ, आप पढ़ाइए,” कहकर रमेश बाबू वापस लौट गए|
रमा जी के घर लौटते ही रमेश बाबू ने थोड़ी नाराजगी से कहा, “ये कौन सा दान है| आप मुफ़्त में अपना बहुमूल्य समय बरबाद कर रहीं| कुछ ऐसा कीजिए कि आमदनी भी हो|”
रमा जी चुपचाप शो केस में सजे दो मेडल निकाल लाईं और उन्हें रमेश जी की मेज पर रखकर कहने लगीं, “ मेरे दोनों बच्चों ने बारहवीं में अपने-अपने विद्यालयों में टॉप किया था जिसके लिए उन्हें ये मेडल मिले थे| आपने कहा था कि मैं पढ़ी- लिखी हूँ तो ट्यूटर की जरूरत नहीं| उस वक्त भी मेरा समय बहुमूल्य था। मैं नौकरी कर सकती थी या लेखन के क्षेत्र में अपना नाम प्रतिष्ठित कर सकती थी किन्तु आपके कहे अनुसार ट्यूटर न रखकर मैं वह कीमती समय बिना किसी कीमत के बच्चों को देती रही। अब वही दान समाज के लिए होगा| मेरे ज्ञानदान से कई बच्चों की जिंदगियां बदल जाएँगी। यही मेरी आमदनी होगी। ”
“साथ ही अब ये डायरी भी भरी जाएगी और एक लेखिका का जन्म होगा,” कहते हुए रमा जी ने अपनी डायरी के ऊपर लिखा– अधूरा उपन्यास
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लघुकथा-3
सुपर मॉम
“भैया, जब मम्मी को पहले भी थकान लगी थी तो आपने दिखाया क्यों नहीं ।”
“मम्मी तो सुपर मॉम हैं। सब कुछ सम्भाल लेती हैं। कभी थकते नहीं देखा उन्हें। काम करते हुए थोड़ी बहुत थकान तो हो ही जाती है, इसमें कौन सी बड़ी बात है। लेकिन तुझे कैसे पता कि मॉम को थकान लग रही थी।” भैया ने सफाई देते हुए कहा।
मैं परसों भी आई थी तो अपने लिए कभी कुछ न कहने वाली मॉम ने हताश स्वर में कहा था,” थकान लग रही। चलते हुए लगता है कि गिर पड़ूँगी।”
जब मैंने कहा कि डॉक्टर के यहाँ चलते हैं तो उन्होंने कहा कि
डॉक्टर की जरूरत नहीं, ठीक हो जाएगा। पहले भी ऐसा हुआ है।
बहन ने भाई को एक कागज़ थमाते हुए कहा,
” मैंने उसी दिन उनका ब्लड टेस्ट करवाया। भैया, ये सुपर मॉम की ब्लड रिपोर्ट आई है।”
” ओह ! विटामिन ‘डी’ और हीमोग्लोबिन ,दोनों इतना इतना कम “, रिपोर्ट भैया के हाथों में फड़फड़ा रही थी।
“तुम दोनों बेकार ही परेशान हो। मैं कुछ बनाकर लाती हूँ तुम दोनों के लिए,” माँ ने बात टालने के लिए कहा।
“आप सुपर मॉम हो, मेटल मॉम नहीं ” , कहते हुए भैया ने माँ को कुर्सी पर बिठा दिया और खुद रसोई में चले गए।
“माँ, यह आपकी भी भूल थी कि खुद को न थकने वाली मशीन समझा आपने। अब आप सारी दवाएँ समय पर लेकर स्वयं को स्वस्थ बनायें। पढ़े लिखे होने का कोई फायदा भी दिखना चाहिए न।”
बिटिया की झिड़की सुन माँ को अपनी माँ की याद आ गयी जो शरीर में हड्डियों का घनत्व कम होने के कारण ऑस्टियोपोरोसिस का शिकार होकर दस वर्षों तक बिस्तर से उठ नहीं पाई थीं।
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लघुकथा-४
किसकी कस्टडी
आज माननीय जज साहब के सामने एक पिता की ओर से बच्चे की कस्टडी के लिए बिंदुवार दलील पेश की गई।
१- बेबी हमदोनों की सहमति से संसार में आया।
२- पत्नी को गर्भावस्था से डर लगता था तो सरोगेशी का निर्णय लिया गया।
३- सरोगेशी वाली माँ का ध्यान हमदोनों ने बराबर रखा।
४- जन्म के बाद बेबी से हमदोनों का रिश्ता एक साथ जुड़ा।
५- पत्नी यदि बच्चे को अपनी कोख में रखती तो उसका जुड़ाव नौ महीने पहले हो गया होता। यदि जन्म देने के लिए नॉर्मल या ऑपेरशन का सहारा लिया जाता तो उसे शारीरिक कष्ट होता और बच्चे से दर्द का रिश्ता जुड़ता किन्तु ऐसा नहीं हुआ। पहले इसी आधार पर बच्चे पर सारा हक सिर्फ माँ को दिया जाता रहा है।
६- बेबी को पालने के लिए हमदोनों ने अपनी नींद छोड़ी।
७- बेबी जब बीमार हुआ तब हम दोनों ने ऑफिस से छुट्टी ली। हमदोनों ने एक जैसी ममता दिखाई।
८- अब हम साथ नहीं रहना चाहते और बेबी की कस्टडी दोनों को चाहिए। जब सब कुछ बराबर हुआ तो कस्टडी के लिए जज साहब किसे प्राथमिकता देंगे।
एक बड़ा प्रश्न सामने आ गया था जिसके लिए कोई धारा नहीं थी। समाज की बदलती तस्वीर के नए नियम बनाने की आवश्यकता जज साहब के सामने चुनौती बन गयी।
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लघुकथा-५
‘दरार’
दोनों सहेलियों की मित्रता पूरे कॉलोनी में प्रसिद्ध थी। एक मुखर, एक चुप्पा। जो मुखर थी वह कॉलोनी के विशेष आयोजनों को बहुत अच्छी तरह सम्भाल लेती थी। चुप्पा बस सुझाव देने में माहिर थी।
कॉलोनी में पुनः एक आयोजन था जिसमें स्वभाव के अनुरूप ही काम दिया गया था । मुखर को सारी व्यवस्थाएँ करनी थीं और चुप्पा को कोषाध्यक्ष बनाया गया। पैसे ऑनलाइन आने लगे। प्रथम दिन ही प्रबंधन समिति ने पूछा कि सहयोग के लिए कितने पैसे आये।
चुप्पा थी सिद्धान्त की पक्की, उसने सही सही बता दिया। ज्योंहि समिति के व्हाट्सअप समूह में उसने बताया, मुखर का फोन आ गया।
“पूरे पैसे क्यों बताने थे आपको?”
चुप्पा हैरान होते हुए बोली, ” ये पूछना समिति का अधिकार है और कोषाध्यक्ष होने के नाते बताना मेरा कर्तव्य।”
“आयोजनों में कुछ पैसे इधर-उधर भी करने होते हैं। आप सारा हिसाब सही- सही देंगी तो फिर आयोजन के लिए सारे इंतज़ाम करने का क्या फायदा। आपने आज बता दिया तो बता दिया। कल से नहीं बतायेंगी।”
चुप्पा के सामने सारी सच्चाई अचानक उजागर हो गयी थी। उसने दृढ़ स्वर में कहा, “बताना तो पड़ेगा ही मुझे, कोषाध्यक्ष बनाया गया है तो सही रास्ते ही चलना होगा।”
“तो मुझे कोई तैयारी नहीं करवानी,” यह कहते हुए मुखर ने फोन पटक दिया।
दोस्ती में पड़ चुकी दरार को चुप्पा ने महसूस कर लिया पर उसे भी अपने सिद्धान्त प्यारे थे।
कुछ देर बाद मोबाइल पर मुखर का मैसेज आया।
” इस बार के आयोजन में राशि की पारदर्शिता पर आपका बहुत नाम हो रहा सखी। मैं आयोजन में पूरे मन से आपके साथ हूँ। अपने सिद्धान्त से समझौता न करके आपने बहुत अच्छा सन्देश दिया है।”
चुप्पा के मुख पर मुस्कान आ गयी।

पाँच लघुकथा 
मुकेश पोपली
बीकानेर
लघुकथा-१
कचरा
पिछले चंद हफ्तों से लगातार यही क्रम चल रहा था। सुबह-सुबह ‘मॉर्निंग वॉक’ के बहाने से नजरें फिसलती एक के बाद एक कचरा बीनने वाली कुछ स्त्रियों पर। कुछ फटे-पुराने कपड़ों में अपने जिस्म को छुपाने का असफल प्रयास करती हुई वह सब हमेशा अपने काम पर लगी रहती। प्लास्टिक की पारदर्शी रंग-बिरंगी बेरंग होती थैलियां, टूटे-फूटे गत्ते के छोटे-बड़े डब्बे, मुड़े-तुड़े कोल्ड-ड्रिंक वाले हरे-काले कैन, पानी की खाली बोतलों के साथ-साथ और भी बहुत कुछ उठाती और कंधे पर लटके बड़े से झोले में डालती। एकदम साफ तो नहीं किंतु फिर भी कुछ के भूगोल की झलक दिख जाती थी। इनमें से एक पर नज़र हमेशा ही अटक जाती थी। कुछ कशिश भरा और मुस्कराता हुआ चेहरा था उसका। नख-शिख सबसे अलग थे। रंग भी कुछ-कुछ गोरा। माथे पर बड़ी से बिंदी और मांग में मटमैला सा सिंदूर भी।
उस दिन संयोग से साथ वाले शर्मा जी नहीं थे। आदत के मुताबिक भूगोल देखने के लिए बार-बार नजरें उसकी ओर उठ रही थी। अचानक मन का कीड़ा कूदने लगा। पीछे की तरफ से जाकर उसका हाथ पकड़ने के लिए जैसे ही नजदीक पहुँचा, वह एकदम से पलटी। इरादा भांप लिया था शायद। कचरे के ढेर पर गिरते-गिरते बचा।
“आपकी आँखों में कचरा भर आया है बाबू जी। घर जाकर साफ कर लो।” वह अपनी रोज़मर्रा वाली मुस्कान के साथ आगे बढ़ गई थी।
शिकारी खिसियाया हुआ सा अपनी आंखें मसलने लगा था।
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लघुकथा-२
करवा चौथ
अपार श्रद्धा और आदर के साथ मां ने उन्हें मखमली आसन पर बिठाया था। आसन ग्रहण करवाने से पहले मां ने उनके पांव भी धोए थे और अपनी ही लाल रंग की साड़ी के पल्लू से उन्हें साफ भी किया था। भोजन परोसने से पहले उनके लिए जल एवं हवा की व्यवस्था भी मां ने उचित प्रकार से कर दी थी।
अति विशिष्ट भोजन करने के पश्चात् सूखे मेवे से मिश्रित खीर उन्हें परोसी गई। उस खीर में न जाने कहां से एक चावल अधपका सा आ गया।
वह क्रोधित होकर उठ खड़े हुए और बोलने लगे, “कंकर खिलाकर क्या स्वयं को पतिव्रता घोषित करना चाहती हो? करवा चौथ पर पति का अपमान सबसे भयंकर पापों की श्रेणी में आता है, ऐसा व्रत रखने से अच्छा है कि तुम अपने हाथों से पति को विष दे दो।” इतना कहकर वह थाली को लात मारकर भोजनकक्ष से बाहर चले गए।
आशीर्वाद की अपेक्षा में बैठी मां की आंखों से अश्रुधारा बहने लगी। मां ने धीरे-धीरे बर्तनों को समेटना शुरु कर दिया था। उसे अपने पिता की इस हरकत पर बहुत हैरानी हुई।
उसने मां से जब भोजन करने को कहा तो मां ने उसे समझाया, “जब तक पति पूर्ण रूप से भोजन कर संतुष्ट न हो और पत्नी को भोजन करने का आदेश न दे तब तक धर्मपत्नी द्वारा अन्न ग्रहण करना पाप होता है, ऐसा शास्त्रों में लिखा है।”
वह सोच रही थी कि शास्त्रों में क्या यह भी लिखा है कि पति को पत्नी का तिरस्कार करना श्रेयस्कर है और पत्नी को तिरस्कार सहना अनिवार्य है।
कुछ क्षणों पश्चात् वह देख रही थी कि मां ने आंखों पर चश्मा चढ़ाकर हलवे के लिए सूजी को साफ करना शुरु कर दिया था।
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लघुकथा-३
लघुकथा
खामियाज़ा
“भाई साहब, आप ज़रा मेरा यह बैग पकड़ लेंगे?” मेट्रो में सवार होने के बाद मैंने एक सज्जन पुरुष की ओर अपना लैपटॉप वाला बैग बढ़ाते हुए पूछा?
“क्यों भई? और भी तो लोग बैठे हैं, आप मुझे ही अपना बैग पकड़ने के लिए क्यों कह रहे हैं? कहीं इसमें कुछ बम वगैरह हुआ तो? अपना बैग अपने पास ही रखो। चले आते हैं भारी-भारी बैग लेकर।”
“बम वगैरह…, खैर कोई बात नहीं, मैं अपने पास ही रख लेता हूं।” फिर मैंने अपना बैग अपने पैरों के बीच में ही रख लिया।
दो स्टेशन गुजर जाने के बाद तिलक नगर मेट्रो स्टेशन से एक सुंदर सी युवती गाड़ी में चढ़ी और मेरे दाहिने ओर आकर खड़ी हो गई।
अचानक उसका फोन बज उठा। वह उसी सज्जन पुरुष से मुखातिब होते हुए बोली, “एक्सक्यूज मी प्लीज़, विल यू होल्ड माई हैंड बैग फॉर समटाइम प्लीज़? आई हैव एन अर्जेंट काल ऑन माई सेल।”
मैं सोच रहा था कि इस सुकन्या को भी यही दुर्जन दिखा बैग पकड़ने के लिए! अब इस रूपसी का भी दिमाग खराब हो जाएगा। यह बैग पकड़ने की बात पर फिर बम फूटने की बात करेगा।
“ओ येस! वह तो जैसे खुशी के मारे उछल पड़ा था। “व्हाई नाट, इट्स माय प्लैजर…” और उसने मुस्कराते हुए युवती का गुलाबी रंग का हैंड बैग अपने पास बड़ी मासूमियत के साथ रख लिया।
‘थैंक यू।” फिर वह अपनी लट संवारते हुए मोबाइल पर बात करने लगी।
अब मेरे चौंकने की बारी थी और मैं सोच रहा था कि उसने अब बम की बात क्यों नहीं की? बैग हल्का होने के कारण, लड़की खूबसूरत होने के कारण या फिर अंग्रेजी भाषा के प्रयोग के कारण?
यह मेरे लिए बहुत बड़ा खामियाज़ा भुगतने जैसा था। शायद, भारी सामान साथ लेकर चलने के कारण। शायद, आदमी होने के कारण। शायद, हिंदी भाषा में बात करने के कारण।
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लघुकथा-४
पेट की आग
“आज इस ट्रक में क्या आया है, साहब?” अहाते में आए हुए ट्रक से कार्यालय अधीक्षक सक्सेना जी को उतरते देख चौकीदार शम्मी ने उनसे पूछा।
“एक हजार पौधे हैं। आज से ही कुछ मजदूर कार्यालय परिसर, स्टॉफ के मकानों और आसपास की खाली जमीन पर गड्ढे खोदेंगे। 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस पर यह पौधे लगाए जाएंगे।”
“लेकिन साहब, वो जो पिछले साल लगाये थे, उसमें मोहन माली ने तो पानी कभी दिया ही नहीं। कुछ बरसात की वजह से ज़िंदा हैं, बाकी तो सब मर गये।”
“जो मर गए, उनको कचरा बनाकर जला देंगे। अब यह दूसरे पौधे लगेंगे।”
“साहब, क्या इस बार भी बड़े साहब लोगों के नाम की प्लेट पौधों के आसपास लगेगी?” चौकीदार ने फिर एक जानकारी चाही।
“पौधे भी लगेंगे और नेम प्लेट भी। क्या करें शम्मी भाई, ऊपर से आदेश आते हैं। हम तो नौकर हैं। कोई कोताही बरती तो घर बिठा दिया जाएगा। पेट की आग बुझाना सबसे ज़रूरी है।”
“वही तो। साहब, मेरे बेटे ने नाम वाली तख्तियों का काम शुरू किया है। अगर इस बार यह काम…..।” चौकीदार शम्मी हाथ जोड़ता हुआ उनके सामने खड़ा हो गया था। “वो क्या है कि उसके पेट की आग भी…..।”
सक्सेना जी उसके कंधे को थपथपाते हुए कार्यालय के अंदर चले गए। चौकीदार के चेहरे पर मुस्कान तिर आई थी।
लघुकथा-५
भविष्य
जो सुमरे हनुमत बलबीरा……..उदयपुर से नई दिल्ली जाने वाले गाड़ी के एसी टू-टियर कोच में अचानक मोबाइल की घंटी बज उठी। फोन उठाने वाले ने कहा, “जय श्रीराम, हाँ, हम महाराज बोल रहे हैं।”
“………………………………………..”
“आयुष्मान भव:”
“………………………………………..”
“यजमान, आप तनिक भी विचलित न हों। हम रेलगाड़ी में बैठ चुके हैं। प्रात:काल हम पहुँच रहे हैं। वहाँ आकर आपको सभी सामग्री बता देंगे और आने वाले शुक्रवार को यज्ञ का आयोजन करेंगे। हमें विश्वास है कि आपकी सभी कठिनाइयों का निवारण यथाशीघ्र हो जाएगा। आपके सभी रुके हुए कार्य भली-भांति पूर्ण होंगे।”
“……………………………”
“यजमान, गाड़ी पहुंचने का समय प्रात: साढ़े पांच बजे है।”
“……………………………”
“यजमान, हम प्रतीक्षा करेंगे। प्रात:काल की पावन बेला में दर्शन होंगे, जय श्रीराम।”
“……………………………”
वह महाराज जिस सीट पर विराजमान थे, वह ग्यारह नंबर सीट थी और ‘साइड लोअर’ थी।
“महाराज, अपना टिकट दिखाइए।” उनकी बात समाप्त होते-होते टीसी मेरे साथ-साथ अन्य मुसाफिरों की टिकट देखते-देखते उन तक पहुँच गया था।
“टिकट तो है साहब…” एक धार्मिक पुस्तिका से उन्होंने टिकट निकालकर टीसी को दिखाते हुए अति विनम्र स्वर में कहा, “यह लीजिए, बस आरक्षित नहीं है।”
“आप तो यहाँ पर अपना आसन इस तरह बिछाकर बैठे हैं जैसे यह स्थान आप ही के लिए आरक्षित है।”
“हाँ, हमें तो जो यजमान विदा करने आए थे, उन्होंने कहा था, आप यहीं बैठ जाइए। सो, हम बैठ गए।”
“लेकिन…?”
“एक शयनिका तो खाली होगी भाई”, महाराज बीच में ही बोल उठे, “अगर आप व्यवस्था कर सकें तो आपकी मेहरबानी। यहाँ न हो तो प्रथम श्रेणी में करवा दीजिए। हम उस तरफ गए तो थे लेकिन, उधर तो कुछ विदेशी बालाएँ आसीन थी। हमारा सुबह दिल्ली पहुँचना अति आवश्यक है, हमारे एक यजमान वहाँ घोर संकट में है।”
“फिलहाल मुसीबत आप पर है। आपको पहले पूछ लेना चाहिए था। अभी मुझे तीनों कोच में टिकट देखना बाकी है। आप अभी तो यह आसन इनके लिए खाली कर दीजिए।” मेरी ओर इशारा करते हुए टीसी ने उनसे कहा।
पता नहीं, मेरी आंखों में उस समय कौन सा सागर लहरा रहा था कि भगवा वस्त्रधारी एकदम से सकपका गए और मुझसे नजरें चुराते हुए टीसी से बोले, “जैसा आप चाहें, लेकिन मेरे लिए कहीं भी व्यवस्था अवश्य कर दीजिए।”
कुछ समय बाद मैं अपनी सीट पर था और दरवाजे के पास आसन बिछाए बैठे महाराज के मोबाइल पर घंटी फिर से बजने लगी थी – जो सुमरे हनुमत बलबीरा……..।

पाँच लघुकथा 
नीरू मित्तल
चंडीगढ़
लघुकथा-१
मौज-मस्ती
सरकारी दौरे पर हिमाचल से लौटते हुए तीन अधिकारी- पैंतीस वर्षीय लोकेश, पैंतालीस के नज़दीक के शर्माजी और दो साल बाद रिटायर होने का इंतज़ार करते महेशबाबू एक छोटे से मोटल में रुके। सरकारी काम तो बहाना था, असली मकसद तो सरकारी खर्चे पर मौज-मस्ती करना ही था। दारू का दौर चलता रहा और साथ ही वो चुटकुले जो परिवार के बीच नहीं सुनाये जा सकते। लोकेश कुछ आपत्तिजनक वीडियो भी लेकर आया था। उन्होंने मोटल के मैनेजर से सांठगांठ कर एक लड़की भी बुला ली, जो उन्हीं के साथ बैठकर दारू पी रही थी। लोकेश और शर्माजी इस तरह की पार्टियाँ पहले भी कर चुके थे इसलिए उन्हें इंतज़ाम करने का भी पता था, परंतु महेशबाबू का यह पहला अवसर था। थोड़ी-सी ना-नुकर के बाद वह भी पार्टी का आनंद लेने लगे। सारी ज़िंदगी अपनी पत्नी और बच्चों पर समर्पित, आज वह फ़िसलते ही चले गए। वापसी में उन लोगों ने शॉर्टकट से जाने की सोची और गाँव के अंदरूनी रास्तों से होते हुए चले। आगे जंगल था, जहाँ गाड़ी दलदल में फँस गई। जितना गाड़ी को आगे ले जाने की कोशिश करते, उतना ही धंसती चली जा रही थी।
मुसीबत में फँसे महेशबाबू को आत्मग्लानि हो रही थी- “मैं ज़िंदगी में पहली बार फ़िसल गया। तुम लोगों के साथ मैं भी किस दलदल में गिर गया।”
“हमने तो नहीं कहा था आपको कुछ भी करने को… आपने जो किया अपनी मर्ज़ी से किया।”
“वह लड़की मेरी बेटी से कुछ ही साल बड़ी होगी। भगवान ने मुझे सबक सिखाने के लिए ही इस दूसरी दलदल में फँसा दिया।”
“यार महेशबाबू! हम पहले ही बहुत मुसीबत में हैं, अब हमें इस तरह गिल्ट महसूस ना करवाओ,” लोकेश ने स्टेयरिंग घुमाते हुए कहा।
“मुझसे बहुत बड़ा अपराध हो गया और उसकी सज़ा मिल रही है।” जान पर पड़ी मुसीबत देखकर महेशबाबू अपराध भावना से ग्रसित हो रहे थे।
“महेशबाबू, कम से कम आप चुप रहें, हम कोशिश कर रहे हैं न।” कह कर शर्माजी ज़ोर-ज़ोर से हॉर्न बजाने लगे, शायद आवाज़ सुन कर कोई मदद के लिए आ जाए। डांट दिए जाने पर महेशबाबू चुप तो हो गए पर दिल-ही-दिल में सोच रहे थे कि अनैतिकता की कैसी दलदल में फँस गया मैं, पता नहीं किन मजबूरियों में वह लड़की यह सब करती होगी। अगले ही पल एक विचार दिल में कौंधा- ‘अगर मैं आज इस दलदल से नहीं निकल सका तो मेरी तीनों लड़कियों का क्या होगा? उन्हें कौन संभालेगा… कहीं उनमें से भी कोई… नहीं… नहीं… मेरी बेटियाँ ऐसा नहीं कर सकतीं।’ महेशबाबू इस सोच से बुरी तरह सिहर गए।
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लघुकथा-२
कवयित्री की पहचान
इस बार अपनी संस्था की गोष्ठी मैंने अपने घर करवाने का निश्चय किया। आमंत्रित कविगणों की लिस्ट तैयार की और संस्था के अध्यक्ष के सामने प्रस्तुत की। अल्पना का नाम देखते ही वह चौंक गए।
“अरे! अल्पना को तुम अपने घर बुलाओगी? तुम्हें पता भी है, वह कहाँ से आती है?”
“कहाँ से सर? मुझे तो बस इतना पता है कि वह बहुत अच्छा लिखती है, उसकी कविताएँ बहुत गहरी होती हैं।”
“तुम अल्पना का नाम लिस्ट से निकाल दो।” अध्यक्ष महोदय ने आदेशात्मक लहजे में कहा।
“परंतु क्यों सर?”
“अरे, वह रेड लाइट एरिया से आती है, ऐसे लोगों को घर पर नहीं बुलाया जाता।”
मैं दो मिनट असमंजस में चुप बैठी रही फिर साहस करके बोल पड़ी- “सर, फिर तो उसको सबसे पहले आमंत्रित करना चाहिए। वह इतनी विषम परिस्थितियों में भी साहित्य के प्रति समर्पित है। रोज़ न जाने कितनी चुभती हुई निगाहें सहती होगी, ना जाने कितनी उपेक्षा सहती होगी, फिर भी साहित्य सेवा में लगी है।”
“अगर वह इस गोष्ठी में आएगी तो मैं नहीं आऊँगा।”
“सर! अगर गोष्ठी मेरे घर होगी तो अल्पना अवश्य आएगी, बाकी कोई आए या ना आए।” मैं अपनी बात कह कर खड़ी हो गई।
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लघुकथा-३
समझौता पत्र
पति रात देर से घर पहुँचा। दिन भर ऑफिस में काम का तनाव और बॉस की झाड़ सुनकर वह सूखे पेड़ जैसा हो रहा था, अब गिरा कि अब गिरा। डोरबेल बजाई तो पत्नी ने खा जाने वाली निगाहों से देखते हुए दरवाज़ा खोला और बिना कुछ बोले अंदर चली गई। थका-टूटा पति सोच रहा था कि पत्नी कम-से-कम बात तो कर ले। अगर डांटेगी, बुरा-भला कहेगी तो चुपचाप सुन लूँगा। पत्नी अगर अपनी भड़ास निकाल ले तो पति निश्चिंत हो जाता है कि चलो, बादल छँट गए, कम से कम अगला दिन तो ठीक बीतेगा। पर अगर पत्नी मुँह फुलाए रहे और कुछ ना बोले, तो मौसम कितने दिन खराब रहेगा और कितनी बर्बादी करेगा, यही सोच पति घबराता रहता है।
पत्नी ने खाना परोसा तो उसने पूछा- “तुम्हारा खाना?”
“मुझे भूख नहीं।”
अब पति और अधिक संकट में फँसा हुआ महसूस कर रहा था। उसकी हालत दरार खाए मकान जैसी थी, ढहना तो है, परंतु कब और किस तरफ़? उसने खाना ढक कर रखा और सफ़ाई देने लगा- “आज ऑफिस में बहुत काम था, इसलिए देर हो गई। असल में अकाउंट में गड़बड़ निकल आई। बॉस ने हमारी क्लास लगा दी और अकाउंट्स मिलाते-मिलाते देर हो गई।”
पत्नी दूसरी तरफ मुँह किए पड़ी रही। पति श्रीलंका की तरह दिवालिया हो कर हर समझौता-पत्र पर हस्ताक्षर करने को बेकरार था और पत्नी चीन की तरह नई-नई शर्तें जोड़कर इस कॉन्ट्रैक्ट को अपने पक्ष में मजबूत कर रही थी।
लघुकथा-४
लो बन गई सड़क
एक दफ्तर से दूसरे दफ्तर चक्कर काटते मुखियाजी को अभी तक किसी ने कुछ हाथ-पल्ले नहीं पकड़ाया था। आज उनकी हालत पर तरस खाकर एक अधिकारी ने रिकॉर्ड्स खंगाले तो पता चला कि उस गाँव में तो छः महीने पहले ही पक्की सड़क बन चुकी है। सारे खर्चे का अनुमोदन भी कर दिया गया है।
“क्या मुखिया जी! छः महीने पहले सड़क बन गई, अपना हिस्सा भी आपने ले लिया होगा और अब यहाँ आकर पूछते हो कि सड़क कब बनेगी?”
मुखियाजी ठगे से देखते रहे। उनकी नज़रों के आगे गड्ढों भरा फिसलन वाला कच्चा रास्ता घूम गया। कई महीनों पहले जेसीबी मशीन पास वाले गाँव से इस गाँव तक के कच्चे रास्ते की मिट्टी क़ो समतल कर गई थी। गाँव वाले उम्मीद लगा बैठे कि अब यहाँ पक्की सड़क बन जाएगी। महीनों बीत गए, परंतु पक्की सड़क बनने का कार्य शुरू नहीं हुआ। मुखियाजी शहर के चक्कर काटते रहे। इस बीच बारिश से मिट्टी फिर जगह-जगह से बह गई और गड्ढे बन गए। आज अधिकारी कह रहा है कि सड़क तो छः महीने पहले ही बन गई। और मेरा हिस्सा??? मतलब मेरे नाम से भी पैसा खा लिया गया! मुखियाजी का चेहरा गड्ढे और फिसलन भरे कच्चे रास्ते जैसा ही हो गया।
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लघुकथा-५
अल्लाह और ईश्वर बह गये
“नहीं… इसे नहीं मारो भाईजान, इसका कोई कसूर नहीं है। जैसा आप कहोगे ये वैसा ही करेगा। ये हमारी गली में कभी चक्कर नहीं लगाएगा। प्लीज़ भाईजान, प्लीज़… इसको छोड़ दो।” रोते हुए अशरफा भाई के पैरों से लिपटी जा रही थी।
इब्राहिम के सिर पर खून सवार था। उसने और उसके दोस्तों ने राजू को पीट-पीटकर अधमरा कर दिया था। अशरफा बार-बार राजू की सलामती की भीख माँगती रही। “भाईजान इसे छोड़ दो, इस ने कुछ नहीं किया। गलती मेरी थी, मैं जहाँ आप कहोगे, वहीं निकाह कर लूँगी। भाईजान, मैं वादा करती हूँ, बस इसे छोड़ दो भाई जान! आपको अल्लाह की दुहाई।”
जब इब्राहिम पर कोई असर नहीं हुआ तो अशरफा आसपास इकट्ठा भीड़ से मुखातिब हुई- “अल्लाह के लिए कोई तो इन्हें रोको, इस बेकसूर की जान लेने पर आमादा हैं। आप सब लोग तमाशा क्यों देख रहे हो? इन्हें रोकते क्यों नहीं?” पर भीड़ के तो हाथ-पैर थे ही नहीं, बस मोबाइल के कैमरे थे जो सारा दृश्य अपने में समेटे जा रहे थे।
इब्राहिम ने अशरफा को ज़ोर से धक्का दिया, उसका सिर पत्थर से टकराया और खून सड़क पर बहने लगा। फिर राजू को लात मारते हुए बोला- “ह…ज़ादे, हमारी बहन-बेटियों पर नज़र डालेगा? तेरे धर्म में तुझे लड़कियाँ नहीं मिलती और हमारी कौम की लड़कियों पर निगाह रखता है?” अल्लाह हू अकबर! कहते हुए कुल्हाड़ी उठा राजू के सीने में उतार दी। खून का फव्वारा-सा बह निकला।
अल्लाह और ईश्वर दोनों अशरफा और राजू के बहते खून के साथ बह गए।
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