
आज से करीब तीस वर्ष पूर्व हमारा परिवार भारत से इंग्लैड में आकर बस गया था। तब से आज तक बहुत से देशों की यात्रा का अवसर मिला। पिछ्ले वर्ष गर्मियों की छुट्टियों में ईटली देश की यात्रा मेरे हृदय में एक यादगार बन कर रह गई है।
अगस्त, सन 2000 का महीना और ऊपर कड़कती धूप। हम सब विश्व प्रसिद्ध सुन्दर रोम नगरी के एतिहासिक स्थानों को देख रहे थे की अचनाक गाईड ने हमारा ध्यान एक खंडहर के आगे चौडे ढ़ालान की ओर आकर्षित किया जो किसी समय रोमन नागरिकों का पब्लिक फोरम था। यह वही स्थान था जहाँ रोम के अति शक्तिशाली सम्राट जूलियस सीज़र का धोखे से वध किया गया था। मेरा हृदय कल्पना की उड़ान भरने लगा और मैं तीस वर्ष पूर्व दिल्ली विश्वविद्यालय के लैकचर थिएटर में पहुँच गई जहाँ हमारे अंग्रेजी का प्रोफेसर शेक्सपीयर का ड्रामा ‘जूलियस सीजर’ पढ़ा रहा था। उस समय कभी सोचा न था कि एक दिन उस स्थान पर कदम रखने का अवसर मिलेगा जहाँ यह भयानक, क्रुर और रोमांचित और ऐतिहासिक घटना घटी होगी।
मेरी आँखों के सामने रोमन बादशाहों उनकी शानो-शौकत और एश्वर्य भरे जीवन के चित्र उभरने लगे। उनके सिल्क के चोंगें, हीरे-मोतीयों से चमकते-दमकते आभुषण, संगमरमर की मूर्तियों और फव्वारो से सजे सुन्दर महल तथा रथों पर सवार हथियारों से लैस सेनानी इत्यादि। रोम की सभ्यता और कला की महत्ता आज भी जीवित है। लेकिन मानव कितना भी सभ्य हो, राज्यसत्ता के मोह में किसी की प्राण हर ही लेता है। ‘जूलियस सीजर’ के मित्र ब्रुट्स ने भी शायद अपने राजनैतिक सिद्धान्त की आड़ में अपने मित्र की पीठ में धोखे से छुरा भौंक दिया था। मेरा हृदय अत्यंत भावुक हो उठा और कुछ क्षणों के लिए ऐसा लगा मानो सदियों पुराने ऊबड़-खाबड़ पत्थरों पर जूलियस सीजर का लाल गर्म खून बह रहा था।
राजा हो या रंक सभी को एक दिन मिट्टी में मिल जाना है। अचानक एक शेर याद आयi
‘उड़ाते थे जो हर रात लाखों की नींदे
आज वह खुद कितने खामोश हो गये है।
इस ज़मी की आगोश में हाय
न जाने कितने हँसी सो गये है।’
10 अगस्त 2000
रोम देखने के बाद हम टूरिस्ट बस में बैठे मशहूर शहर पेयजल की ओर बढ़ रहे थे। मेरा ध्यान बस की खिड़की से बाहर गया और पीले-पीले फूलों के खेत नजर आये। हजारों लाखो या शायद करोड़ो की संख्या में सूरजमुखी के मुरझाये और झुलसे हुए फूल। अचानक मन में एक प्रश्न उठा कि अब इन फूल का क्या होगा? इतने में गाईड की आवाज कानों में पड़ी कि इन फूलों को मुरझाने दिया जाता है। धूप में जितना पक और सड़ जाये उतना ही अच्छा तेल इनकी पत्तियों से निकलेगा।
सच यह प्रकृति भी कितनी अदभुत है, पहले फूल की सुन्दरता निहारने का आनन्द प्रदान करती है और फिर उसकी मुरझाई पत्तियों से तेल निकालने की सुविधा देती है। शरीर तो नरवर है लेकिन प्रकृति का दिया हुआ वरदान प्रेम और उसकी सुगन्ध अमर है। प्रकृति के वरदान सत्यम् शिवम् सुन्दरम के साथ कुछ पंक्तियां याद आई…..
‘वफा बुलन्दियों पर है तो सर बुलन्दियों पर जायेगी जब यह फूल बिखेरेगा तो खुशबू आयेगी।’
11 अगस्त 2000
पाम्पई जो बरसों तक भूचाल के कारण भूमि के अन्दर दबा रहा देखने योग्य शहर है। इसकी खोज बरसों के अथक परिश्रम के पश्चात हुई है। शहर के बीचों बीच एक घर था जिसमें बहुत से छज्जे और खिड़कियाँ थी। अन्दर बहुत छोटे-छोटे से कमेरे थे। देखते ही देखते दर्शकों की लम्बी कतार लग गई। मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि हर व्यक्ति इस घर को देखे को इतना उत्सुक और लालायित क्यों था? गाईड भी हँस रहा था और इटालियन और अंग्रेजी भाषा के मिश्रण से कुछ बना रहा था। बहुत भीड़ होने के कारण मैं अन्दर नहीं जा सकी लेकिन पूछने पर पता लगा कि यह घर एक वेश्यालय था। रोम के रसिक और ऐयाश लोगों को दूर जाने की कठिनाई न हो इसलिए सम्य रोमन लोगों ने शहर के बीचो बीच इस वेश्यालय को स्थापित किया था। हृदय फिर एक बार दुख भरी भावनाओं में बह गया। नारी जो एक ओर पत्नी, बेटी, बहन और माँ के रूप में सम्मानित होती है दूसरी ओर सदा पुरूष के मनोरंजन का सामान बनती रही है।
संस्कृत का श्लोक याद आया….
‘यत्र नायरितु पूजन्ते रमन्ते तत्र देवता’
साथ ही साहिर लुधियावनी का गीत याद आया…
‘औरत ने जन्म दिया मरदों को।
मरदों ने उसे बाजार दिया।
जब जी चाहा मचला कुचला।
जब जी चाहा दुत्कार दिया।’
12 अगस्त 2000
ईटली की यात्रा का अन्तिम दिन था सब लोग थक चुके थे। अचानक मेरी नजर बस की खिड़की से बाहर पड़ी और बहुत बड़े काले पहाड़ नजर आये। गाईड ने बताया कि यह महशूर वजूवियां पर्वत है जो लावा से भरा है। इस पर्वत के कदमों में बसा सुन्दर वजूवियां नाम का शहर कई बार बर्बाद हो चुका है यह जानते हुए भी कि ज्वालामुखी पर्वत के मुख से निकला लावा कभी भी जला कर सबको भस्म कर देगा लोग यहाँ रहते चले जा रहे हैं। सच है इन्सान जिस धरती पर जन्म लेता है जिसकी मिटटी में खेल कर बड़ा होता है, उसे अपनी जमी से कितना मोह कितना लगाव होता है। यह एक ऐसा अहसास है जिसे कोई दूसरा नहीं समझ सकता। घरों की छते काली और स्लेटी रंग की थी। पूछने पर गाईड ने बताया कि जो राख ज्वालामुखी से निकलती है बाद में मकान बनाने के काम आती है। प्रकृति के क्रूर और दयालु दोनो रूप नजर आये। जैसे माँ बच्चे को थप्पड़ मार कर फिर बहला लेती है। मातृभूमि के प्रति इन लोगों की असीम स्नेह की भावना को जान देश प्रेम पर लिखी कुछ पंक्तियां याद आई…..
‘यह मत सोचो कि देश ने तुम्हारे लिये क्या किया है।
यह सोचो कि तुमने देश के लिए क्या किया है।’
स्वर्ण तलवाड़